06 October 2013

कानून को तोड़ती आज की फ़िल्म !

मीडिया का काम समाज में सूचनाओं को प्रेषित करना, शिक्षित करना तथा मनोरंजन करना होता है। सूचनाओं को प्रेषित करने तथा शिक्षित करने तक तो बात ठीक लगती है अपितु, मनोरंजन करना भी कुछ मायनों में उचित प्रतीत होता है। लेकिन यदि मनोरंजन का माध्यम समाज में अश्लीलता को फैलाना या उसको बढ़ाना देना हो तो बात गले से नीचे नहीं उतरती। चाहे हम हो या आप। मैं बात कर रहा हूं जिसने अभी-अभी अपने जीवन के 100 सालों का सफर तय किया है, मनोरंजन के सटीक और सूचारू माध्यम फिल्मों की। जिसमें समय के साथ परिपक्वता आ चुकी है। क्योंकि फिल्म मनोरजंन के साथ-साथ हमारे देश को संस्कृति सभ्यता और नए युग को प्रदर्शित करने का काम भी करती है। फिल्म ही एक ऐसा माध्यम जिसके जरिए लोग हर एक चीज से प्रभावित होते हैं। वैसे हमारे देश में फिल्मों को लेकर सभी वर्गों में एक विशेष उत्साह देखने को मिलता है। मनोरंजन से भरी फिल्म को देखने के लिए सभी वर्गों के लोग हमेशा तैयार रहते हैं। क्योंकि हमारे देश के हर एक राज्य में फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है।

इस आलोच्य में कहें तो फिल्मों में विभिन्न प्रकार के प्रदर्शन से प्रत्येक वर्ग प्रेरित और प्रभावित दोनों होता आया है। अगर फिल्मों के इतिहास पर चर्चा की जाए तो सन् 1913 का वर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण था, इस वर्षराजा हरिश्चन्द्रनामक फिल्म का निमार्ण किया गया था। राजा हरिचन्द्र से भारतीय फिल्मों का शुभारंभ हुआ। इसके बाद जैसे-जैसे समाज विकसित होता गया, फिल्मों में भी उसका अक्श देखने को मिलता गया। सामाजिक और सम सामयिक मुद्दों पर फिल्मों का निमार्ण शुरू हो गया जिसमें अछूत, कन्या, गोदान, गवन, दो बीघा जमीन, अपने पराये, मदर इंडिया आदि न जाने कितनी ऐसी फिल्में बनीं जिनमें अपने देश की समस्याओं को भी उठाया गया और उन्हें देखकर मन पर किसी अश्लीलता का कुप्रभाव भी नहीं पड़ा। परंतु 21वीं सदी के आते ही इस मनोरंजन के माध्यम ने नई विधा को अपने में समाहित कर लिया है। और इस नई विधा के परिणामस्वरूप बहुत-सी ऐसी फिल्मों का निमार्ण किया जाने लगा। जिन्हें देखकर ऐसा कदापि नहीं लगता कि दिखाए जाने वाले दृश्य हमारे देश की संस्कृति से सरोकार रखते हो। क्योंकि यह फिल्में अब मनोरंजन के साथ-साथ अश्लीलता परोसने का काम भी करने लगी हैं। रंग चुकी हैं उसी रंग में, अश्लीलता के रंग में।

अभी हाल ही में निर्मित कुछ फिल्मों की बात करें तो डर्टी फिक्चर, जिस्म 2, मर्डर 2, सिक्सटीन, बीए पास, नशा आदि इस क्रम में पहले और बाद में और भी फिल्में हैं। इन फिल्मों में चुंबन के दृश्य तो आम बात हो गई है। इसके साथ-साथ इन फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियों द्वारा एक दूसरे के वस्त्रों को उतारते हुए तथा महिला अंतःवस्त्रों को पुरुष के हाथों में साफ तौर पर दिखाया जाना, साथ-साथ कामकलाओं, संभोग की क्रियाओं को प्रदर्शित करते हुए दिखाना अब चलन बन चुका है। बिस्तर पर चादर में लिपटी नारी देह, खुला बदन, नंगी पीठ, कूल्हों और उभारों को प्रदर्शित करती, संभोग क्रिया और उत्तेजनात्मक आवाजों को निकालती हुई क्या कहें ऐसी फिल्मों को। सिर्फ ए (व्यस्कों के लिए) लिखने भर से क्या काम चल जाएगा? क्या इस तरह की फिल्मों को बनाकर समाज में अश्लीलता को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा? समाज और कानून को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

इस विषय पर कानून के संदर्भ में बात की जाए तो समाज में अश्लीलता फैलाना भी संगीन गुनाह की श्रेणी में आता है। अश्लील साहित्य, अश्लील चित्र या फिल्मों को दिखाना, वितरित करना और इससे किसी प्रकार का लाभ कमाना या लाभ में किसी प्रकार की कोई भागीदारी कानून की नजर में अपराध है और ऐसे अपराध पर आईपीसी की धारा 292 लगाई जाती है। इसके दायरे में वे लोग भी आते हैं जो अश्लील सामग्री को बेचते हैं या जिन लोगों के पास से अश्लील सामग्री बरामद होती है। अगर कोई पहली बार आईपीसी की धारा 292 के तहत दोषी पाया जाता है तो उसे 2 साल की कैद और 2 हजार तक का जुर्माना हो सकता है। दूसरी बार या फिर बार-बार दोषी पाए जाने पर 5 साल की कैद और 5 हजार रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। साथ ही साथ सार्वजनिक जगहों पर अश्लील हरकतें करने या अश्लील गाना गाने पर आईपीसी की धारा 292 लगाई जाती है। इस मामले में गुनाह अगर साबित हो जाए तो तीन महीने तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकता है।

हालांकि वर्तमान परिदृश्य में फिल्मों द्वारा भारतीय दंड संहिता की ये धाराएं और कानून का एक प्रकार से मजाक बनाकर दिन प्रतिदिन उल्लघंन किया जा रहा है। मुझे लगता है यह धाराएं सिर्फ पढ़ने और सुनने तक ही सीमित लगती है। शायद ही इनकों अमल में लाया जाता हो। अगर वास्वत में यह धाराएं कारगर सिद्ध होती, तो फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों, सिनेमाघरों के मालिकों के साथ-साथ देखने वाले दर्शकों को भी सजा हो चुकी होती। क्योंकि धाराओं में साफ तौर पर इंगित किया गया है कि अश्लील फिल्मों को दिखाना, वितरित करना, लाभ कमाना और उसका निर्माण करना कानून की भारतीय दंड संहिता की धाराएं 292, 294 में अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इसके बावजूद भी सभी कानूनों को तांक पर रखते हुए परोसते रहते है अश्लीलता। अब इसको क्या कहा जाए वर्तमान समय की मांग या पूर्णतः कानून का उल्लघं..?

शिवराज का विन्ध्य विनाश और सफ़ेद हाथी !

यहां बाघ ही सफेद नहीं हुआ करते थे, यहां के पहाड़ भी सफेद हैं। कभी सफेद बाघ की जन्म स्थली रहे विंध्य पर्वतमाला के कैमोर पहाड़ (छुईया घाटी) का अस्तित्व संकट में है। समूचा कैमोर पहाड़ उद्योगपतियों को पट्टे पर दे दिया गया है। इसकी कोख में डायनामाइट के धमाके हो रहे हैं। क्योंकि इसके पेट में उच्चस्तरीय लाइम स्टोन है, जिससे हाईग्रेड की सीमेन्ट बनेगी। सरकार ने समूचे कैमोर पहाड़ को टुकड़ों में एक हिस्सा जेपी घराने के नाम लिख दिया। एक हिस्से पर अम्बानी घराने की नजर है। बिड़ला और एसीसी पहले से ही यहां खदानें चला रहे हैं। एक बड़ा हिस्सा पिसकर सीमेंट बन चुका है और उसकी कमाई सत्ता -उद्योगपति -नेता और नौकरशाहों के गठजोड़ में बंट चुकी है।

एक तरफ प्रदेश की शिवराज सरकार रीवा के गोविंदगढ़ किले के निकट मांद संरक्षण क्षेत्र में एक चिडिय़ाघर, एक बचाव केंद्र तथा विलुप्त हो रहे सफेद बाघों के प्रजनन केंद्र को शुरू करने की तैयारी कर रही है। (यह वही जगह है जहां सफेद बाघ मोहन को 1951 से 1970 में इसकी मौत होने तक रखा गया था।) वहीं दूसरी तरफ इसके आस पास के वन्य और पहाड़ी क्षेत्र को खनन के लिए कंपनियों को दे दिया गया है। यहां रोजाना डायनामाइट का ब्लास्ट किया जा रहा है। इससे कैमोर पहाड़ी धंसक रही है। प्रसिद्ध छुहिया घाटी में बड़े पैमाने पर लैण्डस्लाइडिंग शुरू हो गई है। इसी की तराई पर जेपी का बड़ा सीमेंट प्लांट लगा है और कुछ दूर से ही लाइम स्टोन की खदानें शुरू हो जाती हैं। इसी सीमेंट प्लांट का पेट भरने के लिए कैमोर पहाड़ का 500 एकड़ का रकबा खदान के लिए पट्टे पर दे दिया गया है।

आंदोलनकारियों को भेजा जेल

क्षेत्र में खनिज संसाधनों की बंदरबाट और पर्यावरण एवं प्राणियों के अस्तित्व को उत्पन्न होने वाले खतरे को देखते हुए छुईया घाटी के आसपास के गांवों के लोगों ने जब आंदोलन शुरू किया तो उसे दबाने के लिए खनन एजेंसियों ने प्रशासन के साथ मिलकर दबाने का प्रयास किया। लेकिन जब सीधी और सतना जिले के दर्जनों गांवों के लोगों पर्यावरण प्रेमी उमेश तिवारी के टोको-रोको-ठोको क्रांतिकारी मोर्चा तथा समाजसेवी अनुसुईया प्रसाद शुक्ला के छुईया घाटी बचाओं संघर्ष मोर्चा के साथ जंगल के वृक्षों की कटाई को रोकने के लिए उनसे लिपटकर चिपको आंदोलन चलाया तो कुछ दिनों के लिए कटाई रोक दी गई। लेकिन एक बार फिर से कटाई शुरू हो गई है। इसको देखते हुए गामीण एक बार फिर से आंदोलन को तेज करने लगे तो 25 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर सीधी जेल में डाल दिया गया है।

आंदोलनकारियों का नेतृत्व कर रहे अनुसुईया प्रसाद शुक्ला कहते हैं कि विंध्य क्षेत्र में धीरे-धीरे घुसपैठ करने वाला माफिया और खनन कारोबारियों ने अब यहां अपना साम्राज्य फैलाना शुरू कर दिया है। प्रदेश में गुजरने वाले कैमोर पठार का हिस्सा बनी छुईया घाटी खनन माफिया की काली करतूत व प्रशासन की मिली भगत के चलते खोखली होती जा रही है। प्रदेश में खनिज संसाधनों की खुली लूट जारी है। शासन-प्रशासन के इशारे पर पर्यावरण एवं प्राणियों के अस्तित्व को उत्पन्न होने वाले खतरे पर चिंतन किए बगैर निजी स्वार्थों को साधते हुए सघन वनांचल में भी धड़ल्ले से खनन की अनुमतियां जारी की जा रही हैं। 

खनिज संपदा की लूट के इस मामले में सबसे अधिक खेदपूर्ण स्थिति यह है कि एक -दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले भाजपा-कांग्रेस के नेता भी एक सुर में राग अलाप रहे हैं। ऐसे में प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण पर करोड़ों खर्च कर चलाई जा रही योजनाएं व्यर्थ साबित हो रही हैं और पर्यावरण विनाश के चलते तेज बरसात में पहाड़ों से भूस्खलन होने पर तलहटी में स्थित गांवों की हालत उत्तराखंड की बर्बादी की दास्तान यहां भी दोहरा सकती है। शुक्ला कहते हैं कि छुईया घाटी (कैमोर पहाड़ी) के सघन वन क्षेत्र में प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार ने पर्यावरण और वन्य प्राणियों की क्षति का आंकलन किए बिना कुछ अधिकारियों की तथ्यहीन रिपोर्ट के आधार पर एक बड़ी निजी कंपनी को खनन अनुमति जारी कर दी है।

आमरण अनशन पर बैठे ग्रामीण

शासन और प्रशासन से गुहार लगाने के बाद भी छुईया घाटी क्षेत्र में सतना जिले की 200 और सीधी जिले की 300 एकड़ जमीन पर हो रहे उत्खनन को रोकने के लिए ग्रामीण अब आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। अनशन पर बैठे हरीशंकर तिवारी,देवेंद्र तिवारी और राजेश पांडेय ने बताया कि घाटी में हो रही ब्लास्टिंग से वनक्षेत्र के पटना, सरदा, मझगवां, करियाझार, मलगांव, पिपरांव, धौरहरह,बघवार,गुढ़हाटोला,चौडग़ढ़ी,हिनौती आदि गांवों के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो गया है।

इस तरह मिली अनुमति

अनुसुईया प्रसाद शुक्ला कहते हैं कि गत वर्ष जेपी समूह के जेपी सीमेंट मझगवां को पर्यावरण नियमों की अनदेखी करते हुए खनन की अनुमति दे दी गई थी। वर्षांत में भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय नई दिल्ली द्वारा दिनांक 12 नवंबर 2012 को जारी पत्र क्रमांक 8-66/2007- एफसी तथा मध्यप्रदेश शासन के वन विभाग भोपाल द्वारा दिनांक 24 नवंबर 2012 को जारी पत्र क्रंडी- 3274/3298/2012/10-3 के माध्यम से सीधे जिले के मझगवां ब्लॉक रेंज के 1121 नंबर कम्पार्टमेंट के 54.825 हैक्टेयर रकबे में जयप्रकाश ऐसोसिएट लिमिटेड रीवा के चूना पत्थर उत्खनन को स्वीकृति दे दी गई। जबकि इसी तरह उक्त तिथियों में भारत सरकार के वन और पर्यावरण तथा मप्र सरकार के वन विभाग द्वारा जारी पत्रों द्वारा बुढगौरा ब्लॉक के कम्पार्टमेंट क्रमांक 1119 एवं बधवार के गुडहा टोला के 66.945 हैक्टेयर रकबे पर भी उक्त कंपनी को चूना पत्थर उत्खनन को स्वीकृति दे दी गई। इसके अलावा स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की तथ्यहीन और गलत जानकारियों के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट के आधार पर शासन और केंद्र ने छुईया घाटी के सतना जिले के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में भी खनन को मंजूरी दे दी।

अरबों के सागौन वन स्वाहा

अनुसुईया प्रसाद शुक्ला कहते हैं कि अधिकारियों-जनप्रतिनिधियों को प्रभाव में लेकर जयप्रकाश ऐसोसिएट लिमिटेड ने खनिज अनुमति लेने के साथ ही वृक्षों की कटाई शुरू कर दी गई। वह कहते हैं कि इस वन क्षेत्र में सागौन के पेड़ लगे हुए हैं। वन विभाग के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की मिलीभगत से अब तक अरबों रूपए के सागौन के वृक्ष काटे जा चुके हैं। यह वही क्षेत्र है जहां कृष्ण मृग,चीतल,सांभर आदि रहते हैं। घाटी के आसपास के लोगों का कहना है कि उनका आंदोलन तब तक चलेगा जब तक वनक्षेत्र में खनन और कटाई पूर्णत: बंद नहीं हो जाता।

शिवराज और अजय सिंह की मिलीभगत

ग्रामीणों का कहना है कि विंध्य क्षेत्र की वन संपदा का दोहन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेताप्रतिपक्ष अजय सिंह की मिलीभगत से हो रहा है। वह कहते हैं कि यही कारण है कि न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।

जे पी के छात्र आंदोलन और लालू की घोटालेबाज राजनीति !

जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन की उपज लालू प्रसाद यादव भी अब उन नेताओं की फेहरिस्त को आगे बढाते नज़र आयेंगे जिनके बारे में यह कहा जाता है कि युवा राजनीति में प्रवेश करते ही इसके दांव-प्रपंचों को आत्मसात कर इसकी भ्रष्टता को बढ़ावा देते हैं। अपने मसखरे अंदाज और राजनीति में जातिवाद को साधकर बिहार के मुख्यमंत्री पद से लेकर केंद्रीय मंत्री बनने के सफ़र में लालू ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं और जब यह लग रहा था कि बिहार की राजनीति से लेकर केंद्र की राजनीति में उनका वर्चस्व पुनः बढ़ रहा है, सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें चारा घोटाले के एक मामले में ५ वर्ष की सज़ा और २५ लाख रुपए के जुर्माने का आदेश देकर उनकी लालटेन की चमक को फीका कर दिया है।

उनके साथ ही बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र और जदयू के सांसद जगदीश शर्मा को चार साल की सजा सुनाई गई है। जगन्नाथ मिश्र पर २ लाख रुपए और जगदीश शर्मा पर 5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगा है। तमाम राजनेताओं की तरह लालू ने भी राजनीति के उतार-चढ़ाव को देखा है और कई बार ऐसे-ऐसे निर्णय लिए हैं जो राजनीतिज्ञों से लेकर राजनीतिक विश्लेषकों तक ने नकार दिए किन्तु लालू की दूरदर्शिता ने उन्हें आईना दिखा दिया। फिर चाहे वह १९९७ में अपनी पत्‍नी राबड़ी देवी को रातोंरात बिहार का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हो या रेलवे को घाटे से उबारने सम्बन्धी उनकी आंकड़ों की बाजीगरी, उनके इन्हीं विवादास्पद निर्णयों ने उन्हें राजनेताओं की कतार से हमेशा अलग दिखाया है।

 राजनीतिक विरोधियों का कहना था कि लालू और उनकी पत्‍नी राबड़ी की लालटेन जब तक जली, बिहार की हर गली में अंधेरा रहा। उनके शासन को 'अपराध के व्यवस्थित कल्चर' और 'जंगल राज' के लिए भी याद किया जाता है। उपरी तौर पर विरोधियों का यह आरोप सही भी जान पड़ता है किन्तु फिर भी आप लालू को तमाम विरोधों के बावजूद ख़ारिज करने का साहस नहीं जुटा सकते। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली सरकार जब १३ दिन में लुढ़क गई थी, तो उनके विरोधियों को भी यह अहसास हो गया था कि बिहार का यह नेता किंगमेकर के रूप में कितना अहम है? युनाइटेड फ्रंट सरकार के एच डी देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में भी देवेगौड़ा का जलवा कम और लालू का ज्यादा था। लालू ने ही प्रधानमंत्री के रूप में उनका नाम आगे बढ़ाया था और ऐसा कहा जाता है कि खुद देवेगौड़ा भी इस बात पर हैरान रह गए थे। आज यही किंगमेकर जेल की सलाखों के पीछे खुद के और पार्टी के भविष्य की चिंता कर रहा है।

एक समय था जब देश भर का मीडिया होली के दिन लालू के रंग-बिरंगे अंदाज को चटखारे ले-लेकर सुनाता-दिखाता था और आज भी वही मीडिया लालू के उखड़े रंग को उनके खिलाफ जाती सुर्ख़ियों के जरिये दिखा रहा है। सीबीआई की विशेष अदालत ने लालू को जो सजा सुनाई है उसके अनुसार लालू अब ११ वर्षों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहेंगे। वहीं उनकी संसद सदस्यता भी रद्द होगी। दरअसल, उच्चतम न्यायालय के दागियों के संबंध में दिए गए हाल के निर्देशों की जद में आए लालू अब चाहकर भी राजनीतिक दांव-पेंचों का सहारा नहीं ले सकते। वैसे देखा जाए तो लालू को मिली यह सजा पहली नहीं है। 

लालू को छठी बार भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में जेल जाना पड़ रहा है। लालू को इससे पूर्व चारा घोटाले से ही जुड़े नियमित मामले ४७ ए ९६ में २६ नवम्बर २००१ को जेल जाना पड़ा था। उस समय उन्हें ५९ दिन जेल में रहना पड़ा। आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के नियमित मामले ५ ए ९८ में जमानत की अवधि समाप्त होने के बाद पटना में ब्यूरो की विशेष अदालत ने एक दिन के लिए २८ नवम्बर २००० को न्यायिक हिरासत में केन्द्रीय आदर्श कारागार बेऊर भेज दिया था। इससे पहले इसी मामले में लालू ५ अप्रैल २००० को तब जेल गए थे, जब सीबीआई की विशेष अदालत में आत्मसमर्पण के बाद न्यायाधीश ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। लालू की यह तीसरी जेल यात्रा थी।

 इस मामले में उन्हें ११ मई को ३ माह के औपबंधिक जमानत पर केन्द्रीय आदर्श कारागार बेउर से रिहा किया गया था। वहीं चारा घोटाले के दो अन्य मामलों में लालू जेल जा चुके हैं। पहली बार  उन्हें ३० जुलाई १९९७ में चारा घोटाले के नियमित मामले २० ए ९६ में १३४ दिनों के लिए जेल भेजा गया था और उसके बाद उन्हें २८ अक्टूबर १९९८ को चारा घोटाले के ही नियमित मामले ६४ ए ९६ में ७३ दिनों के लिए दोबारा जेल जाना पड़ा था। हालांकि लालू के पास उच्च न्यायालय जाकर अपनी कथित बेगुनाही साबित करने का रास्ता है किन्तु इस मामले में भी वे बदकिस्मत ही कहलायेंगे कि ५ अक्टूबर २०१३ से १६ अक्टूबर २०१३ तक झारखंड उच्च न्यायालय में दस दिवसीय अवकाश है और उनके वकीलों के पास अब १६ अक्टूबर के बाद ही उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प बचा है।

बिहार की राजनीति में एकछत्र राज के बाद केंद्र में किंगमेकर की भूमिका और फिर पतन के रास्ते में लालू ने राजनीति की मुख्य धारा के विपरीत ही काम किया है और शायद यही वजह है कि उनकी सजा एक ओर तो ख़ुशी पैदा करती है वहीं यह दुःख भी होता है कि जेपी आंदोलन की उपज यादव तिकड़ी में लालू का अवसान सचमुच किसी बुरे सपने के समान है। कांग्रेस के सहज सहयोगी के रूप में लालू ने यूपीए की पहली पारी को जिस जतन से संजोया था, कांग्रेस चाहकर भी अब उनके लिए कुछ नहीं कर सकती। फिर लालू को मिली सजा से यह सवाल भी उठता है कि अब बिहार की राजनीति में बुझती लालटेन को कौन प्रकाशवान करेगा? हालांकि लालू की पत्नी राबड़ी देवी का कहना है कि जिस प्रकार राजीव गांधी की असमय मृत्यु ने सोनिया और राहुल के कंधों पर कांग्रेस को मजबूत करने का बोझ डाला था, वही काम अब वे और उनका क्रिकेट में असफल बेटा लालटेन के लिए करेंगे।

 राबड़ी का यह विचार भावनात्मक रूप से तो सराहना का पात्र है किन्तु राजीव गांधी का दौर कुछ और था और लालू का दौर और है। राजीव की मृत्यु के वक्त कांग्रेस मजबूत थी और पीवी नरसिम्हा राव, अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता उनकी और गांधी-नेहरु परिवार की विरासत को संभालने के प्रति दृढप्रतिज्ञ थे। सोनिया के पास कांग्रेस की कमान को काफी बाद में आई जब सीताराम केसरी, जनार्दन द्विवेदी जैसे नेताओं ने कांग्रेस की डूबती नैया को संभालने का उनसे आग्रह किया था वरना तो पीवी नरसिम्हा राव ने सोनिया को राजनीति के ऐसे-ऐसे दांव दिखलाए थे कि सोनिया राहुल और प्रियंका को लेकर वापस इटली जाने का इरादा कर चुकी थीं।

 फिर कांग्रेस की कमान भले ही सोनिया के हाथ में रही हो किन्तु उनके सलाहकारों के रूप में राजनीतिक चाणक्यों की कोई कमी नहीं रही है। क्या राबड़ी के पास ऐसे राजनीतिक चाणक्य हैं जो स्वहितों को तिलांजलि देकर लालटेन की लौ को पुनः जलाने में अपना योगदान दें। फिर लालू ने राजनीति के अपने सुनहरे दौर में दोस्त कम दुश्मन ज्यादा बनाए, तो क्या यह संभव है कि परिवारवाद की राजनीति में कोई राबड़ी का खुलकर साथ देगा? शायद नहीं। लालू द्वारा बनाए गए माई समीकरण का खात्मा कर नीतीश ने लालू को राजनीतिक वनवास तो दे ही दिया था, रही-सही कसर दलितों में से महादलित के समीकरण ने पूरी कर दी। उनके साले साधू यादव से से लेकर अन्य तमाम राजनीतिक सहयोगी भी लालू का साथ छोड़ गए।

हाल ही में राजद की ओर से प्रभुनाथ सिंह ने महाराजगंज से जो उपचुनाव जीता था, वह भी लालू के करिश्मे के कारण नहीं बल्कि क्षेत्र में अपनी प्रभुता के कारण। यानि बिहार में राजद की ज़मीन लगभग खत्म ही थी। हां, यह अनुमान अवश्य लगाए जा रहे थे कि नीतीश के भाजपा से संबंध विच्छेद लालू की राजनीति को मजबूत करेंगे और राज्य के बिखरे मतदाता एक बार फिर अपने लाडले के सर माथे विजयश्री का तिलक करेंगे। मगर अफ़सोस की लालू को विजयश्री के तिलक की जगह हाथ में हथकड़ियां मिलीं। अब जबकि लालू जेल जा चुके हैं और उनकी राजनीति पर भी विराम लग गया है तो बिहार में निश्चित रूप से समीकरणों में बदलाव होगा और लालू का वोट बैंक भाजपा और नीतीश के बीच बंट जाएगा। 

अगड़ी जाति भगवा रंग में रंग सकती है तो मुस्लिमों को नीतीश के साथ टोपी पहनने में गुरेज नहीं होगा। अतिदलितों का जो थोडा बहुत कुनबा भी लालू के साथ था वह रामविलास पासवान के पक्ष में जाता दिख रहा है। कांग्रेस बिहार में लालू के समय में भी शून्य थी और अब भी शून्य ही है। कुल मिलाकर बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है जिसका असर निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति पर भी होगा। राहुल का दागियों को बचाने वाले अध्यादेश को बकवास करार देना और नीतीश का उनके पक्ष में जाना शायद इसी कड़ी का पहला सिरा है।