04 March 2013

जानिए कानून ताकि बच्चों पर नहीं हो जुल्म

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड की हालिया रिपोर्ट में देशभर के बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों  के आंकड़े चिंताजनक हैं।  भारत में बीते साल 5,484 बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ। देश भर में 1,408 बच्चों की हत्या हुई। बच्चों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार में मध्य प्रदेश पहलेराजधानी दिल्ली दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है। इसी तरह अन्य अपराध के भी आंकड़े हैं। हालांकि इन अपराधों के अलावा बच्चों के साथ कई तरह से बदसलूकी की बातें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बच्चों के प्रोटेक्शन के लिए कानून में क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देश में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के चौंकाने वाले तथ्य पेश कर रहे हैं। 2010 में मध्यप्रदेश में बच्चों के खिलाफ हुए अपराध के 4,912 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली में 3,640, महाराष्ट्र में 3,264 और उत्तर प्रदेश में 2332 मामले दर्ज किए गए। यूपी में 315 बच्चों को जान से मार दिया गया और 451 बच्चों से बलात्कार हुआ। महाराष्ट्र में 1,182 यौन दुर्व्यवहार के मामले सामने आए। देश की राजधानी दिल्ली में 304 बच्चों से बलात्कार हुआ और 29 हत्याएं हुईं। आंकड़ों के मुताबिक हत्या के मामलों में सिर्फ 2.3 फीसदी की कमी देखी गई।
सरकारी रिपोर्ट के कहती है कि बीते साल भारत भर में 10,670 बच्चों का अपहरण हुआ। यानी औसतन हर दिन 29 बच्चे अगवा किए गए। अपहरण के मामले में दिल्ली सबसे ऊपर है। दिल्ली से बीते साल 2,982 बच्चे अगवा किए गए। बिहार में बच्चों के अपहरण के 1,359, यूपी में 1,225, महाराष्ट्र में 749 और राजस्थान में 706 मामले दर्ज किए गए। आंध्र प्रदेशपश्चिम बंगालतमिलनाडुछत्तीसगढ़ और गुजरात की हालत भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। जम्मू कश्मीरउत्तराखंडसिक्किमअरुणाचल प्रदेशनगालैंड और झारखंड में बच्चों के साथ अपराध के कम मामले सामने आए हैं। 2009 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 24,201 मामले दर्ज हुए थे। 2010 में इनकी संख्या 10.3 फीसदी बढ़कर 26,694 हो गई। नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले अपराधों में 186.5 फीसदी वृद्धि हुई। वेश्यावृत्ति के लिए बच्चियों की खरीद फरोख्त और बलात्कार के मामले बढ़े।
2010 
में पुलिस ने बच्चों के साथ हुए अपराध के मुकदमों में 34,461 लोगों गिरफ्तार किया। लेकिन लचर जांच के चलते पुलिस सिर्फ 6,256 लोगों को ही दोषी साबित करा सकी। यानि बच्चों के साथ अपराध करने वाले 34.3 फीसदी मुजरिमों को सजा दिलाई जा सकीबाकी 65.7 फीसदी कानून को ठेंगा दिखाकर बच निकले।

यौन शोषण
बच्चों  नाबालिगों के साथ होने वाले यौन शोषण या सेक्शुअल हरासमेंट और अन्य तरह की प्रताड़नाओं से जुड़ी खबरें आए दिन देखने को मिलती हैं। इनमें बलात्कारअप्राकृतिक दुराचारछेड़छाड़  अन्य तरह की अश्लील हरकतें शामिल हैं। जानकार बताते हैं कि कई बार बच्चे संकोच के कारण अपने साथ होने वाले इस तरह की प्रताड़नाओं का जिक्र तक नहीं करते। कई मामले ऐसे भी देखने को मिलते हैं कि आरोपी सगा-संबंधी होता है। 

कानूनी जानकारों के मुताबिक 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ अगर उसकी सहमति से भी कोई संबंध बनाता है तो भी वह अपराध है क्योंकि नाबालिग की सहमति का कानूनी तौर पर कोई मतलब नहीं होता। अगर ऐसे बच्चों के माता-पिता को किसी भी समय पता चले कि उनके बच्चे के साथ गलत हुआ है तो उन्हें इस बारे में पुलिस को सूचना देनी चाहिए। ऐसे आरोपी के खिलाफ बच्चे का बयान अहम होता है। बच्चों के साथ इस तरह की प्रताड़ना को रोकने के लिए जागरूकता भी जरूरी है। 
अध्यापक प्रताड़ित करें तो क्या करें?  
शिक्षा का अधिकार (राइट टू एजुकेशन एक्टमें इसके बारे में जिक्र किया गया है। हालांकि इसके लिए किसी विशेष पैनल का प्रावधान नहीं है। आरटीईएक्ट की धारा  17 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई भी शिक्षक किसी छात्र को मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर प्रताड़ित करता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। सविर्स रूल के हिसाब से ऐसे दोषी शिक्षक के खिलाफ दुर्व्यवहार के लिए कार्रवाई की जा सकती है। 
चाइल्ड लेबर 
बाल श्रम या चाइल्ड लेबर रोकने को लेकर अदालत कई बार निर्देश जारी कर चुकी है। चाइल्ड लेबर करवाने वालों को सख्त सजा दिए जाने का प्रावधान भी है। चाइल्ड लेबर इसके बावजूद थम नहीं रहा है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों से खतरनाक उद्योगों में काम कराया जाना अपराध है। ऐसी स्थिति में 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। वहीं कानून में कई दूसरी तरह की बातों का जिक्र किया गया है। मसलनअगर 14 साल से कम उम्र के बच्चों से ये काम लिए जाते हैं तो वह चाइल्ड लेबर एक्ट के तहत जुर्म है। 14 साल के कम उम्र के बच्चों से अन्य कामों के अलावा घरेलू काम करवाना भी कानूनी जुर्म है और इसके लिए दोषी पाए जाने पर 1 साल तक कैद और 10 हजार से 20 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 
कानूनी जानकार एमएसखान के मुताबिक आपराधिक मामला बनने पर अगर किसी की उम्र 18 साल से कम पाई जाती है तो उसे बच्चा ही माना जाएगा। आरोपी 18 साल से कम है तो उसकी पहचान गुप्त भी रखी जाती है। साथ ही उसका मामला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेज दिया जाता है। इसके पीछे मकसद यह है कि जुवेनाइल को सुधारा जाए। यही कारण है कि उसे सुधार गृह में भेजा जाता हैजहां सजा देने की बजाए जुवेनाइल को सुधारने पर जोर दिया जाता है। जुवेनाइल को आमतौर पर जमानत दिए जाने का प्रावधान है। जुवेनाइल के खिलाफ हत्या या ऐसे किसी भी संगीन आरोप ही क्यों  साबित हो जाएंउसे 18 साल तक की उम्र तक ही सुधार गृह में रखा जाता है। सरकारी वकील नवीन शर्मा के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट इसलिए बनाया गया है ताकि बच्चों को सही राह दिखाई जा सके। जूवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा  23 में यह प्रावधान किया गया है कि अगर बच्चा हिरासत में है और उस हिरासत में बच्चे को मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है तो इसके लिए दोषी पाए जाने पर ऐसे लोगों के खिलाफ 6 महीने तक कैद अथवा जुर्माने की सजा दी जाएगी। 

1857 की स्वाधीनता संग्राम और अंग्रेजी हुकूमत

सन् 1857 का स्वतंत्रता-संग्राम अंग्रेजी हुकूमत पर वह पहला करारा प्रहार था, जिसकी परिणति 90 साल बाद 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के रूप में हुई। वास्तव में, यह स्वतंत्रता संग्राम कई मायनों में भारतीय इतिहास का सुनहरा अध्याय है। इसे आजादी की पहली लड़ाई माना जाता है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले अंग्रेजों की गुलामी के विरुध्द बगावत के स्वर नहीं उठे, निश्चित रुप से फिरंगियों को भारतवासियों की ओर से छिटपुट प्रतिरोध तो अवश्य झेलना पड़ता था, लेकिन पहली बार, 1857 में गुलामी की जंजीर को तोड़ फेंकने के लिए पूरा समाज एकजुट हो गया। इस विद्रोह के प्रमुख कर्णधार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, नाना साहब, अमर सिंह, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर, मौलवी अहमद शाह, राव तुलाराम, आदि थे। एक तरफ, आधुनिक शस्त्रों से लैस अंग्रेजों की सेना, सब तरह की सुविधाएं, उनकी 'फूट डालो-राज करो' की नीति। दूसरी तरफ, आम आदमी अपने ही बलबूते आधुनिक हथियारों के अभाव में भी, भाला, तीर-धनुष, लाठी और देशी बन्दूक लेकर अंग्रेजों के विरूध्द रणक्षेत्र में। भारतीयों ने उस महाशक्ति से लोहा लिया, जिसकी विश्व भर में तूती बोलती थी और उस समय ऐसा माना जाता था कि अंग्रेजी साम्राज्यवाद से टकराना, तबाही को आमंत्रण देने के बराबर था। इस संघर्ष में दिल्ली, झांसी, कानपुर, लखनऊ, अवधा आदि स्थानों में अंग्रेजों से खुले मुठभेड़ हुए, जिसमें भारतीयों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। प्रमुख रुप से उत्तर भारत- उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, मधय प्रदेश, पंजाब, राजस्थान में यह संग्राम फैला, जबकि दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में लोग बगावत के लिए मैदान में आए। इस क्रांति के परिप्रेक्ष्य में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि आर्थिक साधनों के घोर अभाव के बावजूद लोगों ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया।

क्रांति की चिनगारी
अंग्रेजों ने इस बात को समझ लिया था कि जब तक भारतीय अपने धर्म से जुड़े रहेंगे, तब तक भारत पर पूर्णरुपेण आधिपत्य नहीं जमाया जा सकता, क्योंकि भारतीय समाज की एकता का मुख्य आधार राजनीतिक न होकर धर्म और संस्कृति हैं, इसीलिए उन्होंने अपनी परम्परागत ''फूट डालो और राज करो'' नीति के तहत सभी भारतवासियों को ईसाई बनाने की कुटिल चाल चली और हिन्दू और मुसलमानों को लड़ाने की कोशिश की। कलकत्ता में अंग्रेजी शासकों ने 1 जनवरी, 1857 को सेना में 'एनफील्ड राइफल्स' इस्तेमाल करने का आदेश दिया। इस बन्दूक में प्रयोग होने वाले कारतूस की छर्रे गाय या सूअर की चर्बी से लिपटे रहते थे। बन्दूक में कारतूस भरने के पूर्व इसके छर्रों को मुंह से काटना होता था। इसको लेकर हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदायों में असंतोष के स्वर उभरने लगे। लेकिन लॉर्ड कैनिंग ने इसकी अवहेलना करने वाले सैनिक को कोर्ट मार्शल करने का निर्देश दिया। अवहेलना करने वाले कई सैनिकों से वर्दी और हथियार वापस लेकर उन्हें अपमानित किया गया।

बरहामपुर के 19 एन.आई. के सैनिकों ने चर्बीयुक्त कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। इसके फलस्वरुप अनुशासनहीनता के आरोप में पूरी कम्पनी को भंग कर दिया गया। इसे लेकर सैनिकों के बीच अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का वातावरण बनने लगा। इनमें से ही मंगल पांडे नामक एक सैनिक ने इस तुगलकी फैसले के खिलाफ खुलकर विरोधा किया और अंग्रेजों को सबक सिखाने का ठान लिया। 29 मार्च, 1857 ई को पांडे ने अपनी कम्पनी के दो अंग्रेज अधिकारियों पर गोली चला दी। इसके बाद कई अंग्रेज सैनिक उसे गिरफ्तार करने के लिए आगे बढ़े, उन पर भी उसने गोली चला दी। उन्होंने जमकर अंग्रेजी फौज का मुकाबला किया लेकिन अन्तत: वे पकड़ लिए गए और 8 अप्रैल, 1857 को उसे फांसी पर लटका दिया गया। साथ ही 34वीं कम्पनी भी भंग कर दी गयी। इस कम्पनी के सैनिक मंगल पांडे की बहादुरी और शहादत के बारे में अपने क्षेत्रों की जनता के बीच चर्चा करने लगे। इसी तरह की घटना लखनऊ में भी घटी। 2 मई को 7वीं अवधा रेजीमेंट के सैनिकों ने भी ऐसे कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया। इस आरोप में कम्पनी भंग कर दी गई। मंगल पांडे ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर देशधार्म की रक्षा की। उनकी शहादत रंग लाई। इससे प्रेरणा पाकर सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। उसकी प्रतिधवनि तुरन्त मेरठ में गूंजी।

6 मई, 1857 को मेरठ की सैनिक छावनी में 3 एल.सी. (घुड़सवार सैनिक टुकड़ी) की परेड में 90 भारतीय घुड़सवारों को चर्बीयुक्त कारतूसों के प्रयोग का आदेश हुआ। 5 को छोड़कर 85 ने दांत से कारतूसों को काटने से इनकार कर दिया। आदेश का स्पष्ट उल्लंघन था पर धार्म का उतना ही पालन। आदेश के उल्लंघन में इन 85 सवारों को कोर्ट मार्शल द्वारा 10 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा हुई। जेल भेजने से पूर्व 9 मई को परेड ग्राउण्ड पर शेष सैनिकों को चेतावनी देने के लिए बुलाया गया। उनके समक्ष उन देश-धार्मभक्तों को पूरे अपमान के साथ हथकड़ियां पहनाकर जेल भेजा गया। 9 मई की ही रात में 10 मई के लिए कार्यक्रम तैयार कर लिया गया। 3 एल.सी. के कमांडर लेटी, गफ को यह भनक मिल गई कि 10 मई को रविवार है, ईसाइयों का गिररिजाघरों में प्रार्थना का दिन। विद्रोह पैदल सैनिकों द्वारा प्रारंभ होगा फिर घुड़सवार सैनिक उनसे मिल जायेंगे। 10 मई, 1857 को मेरठ में सचमुच क्रांति का सूत्रपात हो गया। बंदी सैनिकों को मुक्त करा लिया गया। हथियार लूट लिए गए। मेरठ में अंग्रेज सेना थोड़ी थी। मेरठ आजाद हो गया।

आग की लपटों की तरह फैल गई क्रांति

मेरठ के विप्लवियों के दिल्ली प्रवेश के साथ यहां के सैनिक नागरिक भी उनसे मिल गए। 82 वर्षीय बहादुरशाह जफर को हिन्दुस्तान का सम्राट घोषित किया गया और उसके नाम पर अंग्रेजों से घमासान शुरू हो गया। पहले दौर में क्रांतिकारियों का दिल्ली पर अधिकार हो गया परन्तु अंग्रेज दिल्ली को वापस लेने पर कटिबध्द हो गए। सितम्बर, 1857 में दिल्ली पर अंग्रेजों का फिर से अधिकार हो गया। आगरा नगर में ऊपरी शांति रही पर उससे सटे क्षेत्रों से विप्लवी लपटें पश्चिमी संयुक्त प्रांत के रूहेलखण्ड इलाके में, अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी आदि जनपदों को छूने लगी। इन इलाकों की मुक्ति होती जा रही थी, लखनऊ में 3 मई को क्रांति का धामाका हुआ फिर वहीं से वह मई के अंत में अवधा रियासत को अपने प्रभाव में ले लेती है। नवाब वाजिदअली शाह के कलकत्ता निर्वाचन के बावजूद अवधा के सभी वर्ग के लोगों ने क्रांति में भाग लिया- जनक्रांति का नजारा था। प्रशासक जान लारेंस की पक्की पहरेदारी के बावजूद पंजाब में विप्लव की घुसपैठ हो गई, विशेष रूप से उन छावनियों में जहां सिक्ख सैनिकों की संख्या कम थी या जहां पुरविया पलटने थीं यथा पेशावर, फिरोजपुर, रमदान, जालंधार, अजनाला आदि।

पंजाब की तुलना में आज के हरियाणा के ग्रामीण अंचल के किसानों ने क्रांति में बढ़चढ़ कर भाग लिया। इनमें रिबाड़ी के जमींदार राव तुलाराम व राव कृष्ण गोपाल ,मेवाती सरदार अली हसन, समद खां, झझर के नवाब अब्दुर्रहमान, वल्लभगढ़ के नाहर सिंह, फरूखनगर के नवाब फौजदार खां ने छिटपुट विद्रोह किया। क्रांति की अग्निशिखा दक्षिण भारत में निजाम के हैदराबाद रियासत तक पहुंची, इधार के बड़े नवाब और राजा बाहरी तौर पर सरकार के प्रति वफादार रहे पर अंदर से भी उनमें साहस की कमी थी। फिर भी देशी पलटन और जनता ने युध्द में भाग लिया। हैदराबाद के जोतपुर, कोल्हापुर, सतारा, नागपुर, धार, जबलपुर, खानदेश, पूना, बाम्बे आदि में स्वाधीनता युध्द ने अपनी हाजिरी दर्ज कराई। इस क्रांति की मशाल बिहार में भी जली। यहां संघर्ष को नेतृत्व दिया जगदीशपुर रियासत के कुंवरसिंह और उनके भाई अमर सिंह ने। संघर्ष में जनता की भागीदारी ने हुकूमत को परेशानी में डाल दिया था। स्मरणीय है कि युध्द के दौरान अनेक क्षेत्रों रियासतों में ब्रिटिश राज का शामियाना उखड़ गया था। एक बार तो दिल्ली से बनारस तक ग्रेडट्रंक रोड़ आजाद था।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने सितम्बर-अक्टूबर 1857 में झांसी पर अपना पूरा कब्जा कर लिया। लेकिन उनका कब्जा महज छह महिने तक रहा। आखिरी विद्रोह 20 जून 1858 को ग्वालियर इलाके में दबा दिया। 8 जुलाई 1858 को एक शांति संधि हुई और यह विद्रोह अंतिम रुप से खत्म हो गया।

क्रांति की उपलब्धियां

कुछ ब्रिटीश और वामपंथी इतिहासकार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को मात्र 'सिपाही विद्रोह' कहकर इसकी आलोचना करते है, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। यह सही है कि सैनिकों ने इस लड़ाई का बिगुल बजाया लेकिन इसके साथ-साथ किसान, मजदूर, आदिवासी भी संगठित होकर रणभूमि में कूद पड़े थे। 1857 का युध्द राष्ट्रीय था। इसका राष्ट्रीयता की दृष्टि से सबसे सुखद परिणाम सामने आया कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया। मराठों ने बहादुरशाह को सम्राट और मुसलमानों ने नानासाहब को पेशवा की मान्यता दी। सन् 1908 ई. में प्रख्यात क्रांतिकारी व राष्ट्रवादी चिंतक विनायक दामोदर सावरकर ने 1857 की शौर्य-गाथा को 'वार ऑफ इंडिपेंडेंस' नामक ग्रंथ में लिखकर इसे स्वाधीनता युध्द की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रस्तुत किया। उनका भी मानना था, '1857 ई. का विद्रोह केवल सैनिकों का बलवा नहीं था, अपितु यह भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रथम प्रयास था।' सावरकर की इस पुस्तक ने क्रांतिकारियों को राष्ट्र की खातिर अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा दी।

अलगाववाद को बढावा देता अनुच्छेद 370

भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान एक दुर्भाग्य है। लोगों को तटस्थता से पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या इससे राष्ट्र का भला हुआ है और क्या यह भारत की अखंडता को मजबूती प्रदान करने में सहायक हुआ है? या फिर इसने समस्याओं में इजाफा किया है? पिछले 57 सालों का अनुभव बताता है कि अनुच्छेद 370 की यात्रा अलग दर्जे के बजाय अलगाव की ओर ले जा रही है। अनुच्छेद 370 एक राज्य और भारतीय संघ के बीच एक संवैधानिक अवरोध था और इस रूप में यह बराबर काम करता रहा। उद्यमियों को निवेश से रोककर इसने राज्य के आर्थिक विकास को बाधित कर दिया। 1947-48 में पाकिस्तान ने हमला कर जम्मू-कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था। तब से दो बार 1965 तथा 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो चुके हैं। जब पाकिस्तान को जंच गया कि परंपरागत युद्ध में भारत को हराकर वह पूरे जम्मू-कश्मीर पर कब्जा नहींकर सकता तो आठवें दशक के अंत तक पाकिस्तान ने भारत में आतंकवाद के रूप में छद्म युद्ध शुरू कर दिया, जो अब तक लगातार जारी है। इस प्रयास में वह भारत के और भूभाग पर तो कब्जा नहीं कर पाया, पर अपने एक भाग से हाथ जरूर धो बैठा। अनुच्छेद 370 से आशय निकलता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उसके हमारे देश के साथ बस विशेष संबंध हैं। इससे पाकिस्तान और आतंकवादियों, दोनों को यह संदेश मिला कि इसकी पूर्ण अखंडता को रोका जा सकता है। आतंकवाद के माध्यम से अलग दर्जे की ग्रंथि को स्वतंत्र राष्ट्र की मांग के रूप में स्थापित कर दिया। जिन समस्याओं के समाधान के लिए अनुच्छेद 370 लागू किया गया था उनमें से कोई भी हल नहींहुई। अनुच्छेद लागू करने के बाद के ऐतिहासिक घटनाक्रम से यह बात साफ हो जाती है कि इसके प्रावधान समाधान के बजाय खुद ही समस्या हैं।

सुरक्षा, विकास, क्षेत्रीय असंतुलन तथा कश्मीरी पंडितों को फिर से जम्मू-कश्मीर में बसाना कश्मीर की बड़ी समस्याएं हैं। इनके अलावा पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करना और उन्हें मुआवजा देना भी उतना ही अहम है। अब सवाल यह उठता है कि क्या अनुच्छेद 370 इन मूल समस्याओं के निराकरण में सहायक है? क्या और अधिक स्वायत्तता देने के लिए अनुच्छेद में परिवर्तन कर राज्य और राष्ट्र के संबंधों को और कमजोर करने से इन समस्याओं का समाधान संभव होगा? इन सब सवालों का एक ही जवाब है-नहीं। भारतीय संविधान का चरित्र संघीय है। केंद्रीय सूची की सातवींअनुसूची में वर्णित शक्तियां केंद्र और संघीय विधायिका के अधीन आती हैं, जबकि राज्य सूची में वर्णित शक्तियां राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। अनुवर्ती सूची में वर्णित शक्तियां राज्य और राष्ट्र, दोनों के अधिकार क्षेत्र में होती है। जम्मू-कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय सूची को छोटी कर दिया गया है तथा कुछ विशेष अधिकार ही केंद्र ने अपने पास रखे हैं। शेष अधिकार राज्य सूची में डाल दिए हैं। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में अनुवर्ती सूची का भी अस्तित्व नहीं है। यही नहीं केंद्र द्वारा पारित किए गए कानून भी जम्मू-कश्मीर में स्वत: ही लागू नहीं किए जाते। इन्हें लागू कराने के लिए राज्य सरकार की अनुमति की जरूरत पड़ती है। क्या राज्य की समस्याएं हल करने में विधानमंडल की शक्तियों की कमी आड़े आती है? ऐसा नहीं है। अन्य राज्यों की तुलना में जम्मू-कश्मीर सरकार और विधानमंडल के पास अत्यधिक शक्तियां हैं। भारतीय संविधान का संघीय चरित्र केंद्र के पक्ष में झुका है, किंतु जम्मू-कश्मीर के संबंध में इसका उलटा है। अधिकांश शक्तियां राज्य के पास हैं। क्या इन एकतरफा शक्तियों के कारण देश और देश के बाहर लोगों के एक समूह में अलगाववादी ग्रंथि नहीं पनप रही है? जो लोग अनुच्छेद 370 के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने या फिर इसमें और अधिक ढील दिए जाने की वकालत कर रहे हैं, उनकी मंशा राज्य की समस्याओं को दूर करना नहींहै, बल्कि लोगों की भावनाओं को भड़काकर अलग दर्जे के अलगाववाद की नई ग्रंथि विकसित करना है। इतिहास ऐसे लोगों को नहींबख्शेगा। हमें इतिहास के सबक भूलने नहीं चाहिए। अनुच्छेद 370 अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान से संबद्ध है। इस अनुच्छेद के चौतरफा विरोध के जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने संक्रमणकालीन पहलू पर जोर देते हुए कहा था कि यह घिसते-घिसते घिस जाएगा। आने वाली घटनाओं ने जवाहरलाल नेहरू का बयान को झुठला दिया है। ये प्रावधान खत्म नहीं किए गए। अब न केवल इनको स्थायी करने की मांग उठ रही है, बल्कि केंद्र और राज्य के संबंधों को और कमजोर करने की मांग भी उठ रही है। ये सब प्रस्ताव राज्य और राष्ट्र के संबंधों को प्रगाढ़ नहींकरते, बल्कि इसके विपरीत ये इन संबंधों को समग्र रूप में नष्ट कर देते हैं। भेदभाव जम्मू-कश्मीर व अन्य प्रदेशों के बीच ही नहीं, जम्मू-कश्मीर के विभिन्न इलाकों के बीच भी है। जम्मू-कश्मीर में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख प्रमुख इलाके हैं। स्वतंत्रता के बाद से सरकार में जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों की भागीदारी सीमित रही है।

 कश्मीर घाटी के मुकाबले जम्मू की आबादी अधिक होने के बावजूद राज्य में तैनात 4.5 लाख सरकारी कर्मचारियों में से 3.3 लाख कश्मीर घाटी के हैं। विधानसभा में कश्मीर क्षेत्र से 46 सदस्य और जम्मू क्षेत्र से 37 सदस्य चुने जाते हैं। लद्दाख से चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या कुल चार है। जहां तक विकास कार्यों की बात है, इसमें भी जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के साथ भेदभाव किया जाता है। भेदभाव समाप्त करने के लिए जम्मू और लद्दाख क्षेत्रों के लिए विकेंद्रित शासन पद्धति अपनाई जानी चाहिए। इसका एक विकल्प इन दोनों क्षेत्रों में प्रोविंशियल काउंसिलों का गठन हो सकता है। विकास कार्यों के मद्देनजर इन काउंसिलों के हाथ में वित्त और न्यायिक शक्तियां होनी चाहिए।

आदिवासी महिलए और लकड़ी का गट्ठर ढोने का सफरनामा

रीवा जिले का जनपद पंचायत जवा का क्षेत्र जंगल तथा पहाडों से ढका हुआ है। यहां विंध्याचल पर्वतमाला की श्रेणियां है यह क्षेत्र दलितए आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है। गरीबी और बेरोजगारी के कारण शोषण उत्पीड़न बहुत ज्यादा है। यहां जीवन जीने की सुविधायें बहुत कम है। सरकारी की विकास योजनायें यहां नाकारा सिद्व हुई हैं । सबसे ज्यादा शोषण यहां महिलाओं तथा बच्चों का हुआ है। कोई टिकाउ रोजगार न होने के कारण यहां की महिलायें जंगल से सूखी लकड़ियां काट.बीन कर गट्ठर बनाती हैं । फिर उस गट्ठर को ट्रेन द्वारा ५० से १०० किण्मीण् दूर कस्बा ध् शहर में ले जाकर बेचती हैं । जो पैसा मिलता है उससे मोटा अनाज ;चावल की कन्की आदिद्ध खरीद कर जब वापस घर आती है तब उनका चूल्हा जलता है। उत्तरप्रदेश व मध्यप्रदेश से अधिकतर आदिवासी महिलायें इस तरह से लकड़ी का काम करती हैं। इनको जलालत भरी जिदंगी जीना पड़ता है। ट्रेन के सफर में महिलाओं की जान भी जोखिम में रहती है। महिलाओं का गट्ठर ढोने बेचने का यह धंधा करीब ३० साल से चल रहा है। जब से जंगल में लकड़ी के कटान में रोक लगी तभी से इस धंधे की शुरूआत हुईए इसके पहले जंगल का ठेका स्थानीय ठेकेदार लेते थे और वह कटान की एक.एक इंच लकड़ी को बाजार ले जाते थे। तब यह आदिवासी एवं दलित जंगल से लकड़ी नहीं ला पाते थे। मार्केट की सप्लाई ठेकेदार ही करते थे। ठेका बंद होने के बाद लकड़ी गट्ठर का धंधा धीरे.धीरे अन्य इलाकों में भी फैल गया तथा गरीबों की आजीविका का आधार बन गया।

लकड़ी के गट्ठर कैसे बनते हैं . यह धंधा उन जंगली गांवों में ज्यादा है जो रेल्वे स्टेशन के आसपास हैए घर के पुरूष सदस्य और महिलायें कुल्हाड़ी लेकर आसपास के जंगल में भोर तड़के समूह में निकलकर जाते हैं और वहां चार.छरू घंटे में एक गट्ठर लकड़ी एकत्र कर के फिर उसे सिर पर रख कर घर लाते हैं । घर में महिलाओं के स्वास्थ्य व उम्र को देखते हुए २० किलो से लेकर ५० किलोग्राम वजन तक के गट्ठर बनाये जाते हैं। घर के पुरूष गठ्ठर को रेल्वे स्टेशन तक रेल में चढ़ाने जाते हैं। रेल में चढ़ाने के बाद आगे का सफर की जिम्मेदारी महिलाओं की होता है। पुरूष रेल में गट्ठर चढ़ाकर घर वापस आ जाते हैं। गट्ठर का सफरनामा. रेल मे गट्ठर चढ़ाने में बड़ी मुश्किल होती हैए काफी मात्रा में लकड़ी के गट्ठर चढ़ाए जाते हैं। इन्हें यात्री व अन्य लोग भी चढ़ने से रोकते हैं। रेल के दरवाजे खिड़की भी लोग बंद कर लेते हैं। ऐसी अवस्था में तमाम महिलायें गट्ठर सहित स्टेशन पर ही रह जाती है और फिर वो पूरे दिन दूसरी रेलगाड़ी का इंतजार करती है। अपने पास में जो नमक रोटी लिये होती हैंए उसी को स्वयं खाकर व गोदी के बच्चे को खिलाकर भूख को शांत करती हैं। यह लगभग हर मौसम में होता है।

रेल में गट्ठर चढ़ने के बाद डियूटी में लगे जीण्आरण्पीण् एवं आरण्पीण्एफण् के सिपाही हर डिब्बे में आते है और प्रत्येक गट्ठर का दो रूपये वसूलते हैं । यह उनका बंधा .बधाया रेट है जिसे हर आदिवासी महिला जानती है। इसलिये पहले से अपनी धोती के आंचल वाले छोर में अपने गट्ठर के हिसाब से फुटकर रूपया बांधे रहती है। रूपया न देने पर ये पुलिसवाले उनके गट्ठर नीचे उतारने की धमकी देते हैं ए कई बार गट्ठर फेंक भी देते हैं। रेल केए कस्बा स्टेशन पर पहुंचने पर वे अपना गट्ठर लेकर नियत दुकान पर जाती है और वहां तौल में ४ या ५ रूपये किलो की दर से बेचकर जो भी रकम मिलती है उससे जरूरत की चीजें और राशन खरीदती हैं। शोषण का दायरा बड़ा होता है। रेल में चढ़ाने पर टीण्टीण्ईण् भी इनसे एक रूपये गट्ठर लेता हैए वापस आने पर स्टेशन उतरते ही वन विभाग का वाचर व फारेस्ट गार्ड इनसे एक रूपया प्रति गठठर की दर से अपनी रकम वसूलता है। जो महिला पैसे नहीं देती हैं दूसरे दिन उनका गट्ठर नहीं चढ़ने दिया जाता है या फिर जंगल का रास्ता बंद कर देते हैं । इस प्रकार प्रति महिला को चार रूपये प्रति गठ्ठर की दर से पुलिसए रेल्वे फारेस्टगार्ड के कर्मचारियों को देना पड़ता है।

जब रेल के डिब्बे मे गट्ठर नहीं चढ़ पाते तब कभी कभार ये महिलाएं डिब्बों के ज्वाइंट में गट्ठर लादने का खतरा भी उठाती हैं। ऐसे सफर करते हुए कई महिलायें ट्रेन में अपनी जान गंवा चुकी है। कई के अंग.भंग भी हो गये हैं ए रेल में हर उम्र की महिलायें लकड़ी का गट्ठर ढोती हैंए इनमें बूढ़ीए जवान व लड़कियां भी है। कई बार तो रेल में या स्टेशन आने के रास्ते में ही गर्भवती महिलाओं के बच्चे पैदा हुए हैं । जवान लड़कियों व महिलाओं के साथ छेड़छाड़ भी होती है। सम्पूर्ण पठारी इलाके में 6 स्टेशन हैं जहां से दिन रात में जाने वाली गाड़ियों में लकड़ियों के गट्ठर चढ़ते है पैसेंजर गाड़ियों में यह धंधा ज्यादा होता है फिर जो ट्रेन मिल जाय उसी में गट्ठर चढ़ा दिए जाते हैं। रेलगाड़ी मे अपनी डयूटी लगवाने के लिये जीण्आरण्पीण् के सिपाही अपने थाने में डयूटी मुंशी को रिशवत देते हैं और अपनी डयूटी लगवाते हैंए क्योंकि वे लगभग एक हजार रूपये एक ट्रेन डिलीबरी में कमा लेते हैं। इस इलाके के दूर.दराज के कुछ गांव ऐसे हैं जहां से महिलायें १०.१२ किण्मीण् का सफर सिर पर गट्ठर लेकर तय करती हैं वे सीधे डभौराए जवाए त्योंथर रामबाग में पैदल पहुंच कर सस्ते में लकड़ियां बेचकर वापस घर जाती है।

गॉंव घरों में सम्पन्न तबके के यहां स्थानीय आदिवासी महिलायें यदि लकड़ी का गट्ठर लेकर जाती है तो उन्हें बदले में घर की औंरते २.३ किलो अनाज या फिर दालए बासी खाना फटा पुराना कपड़ा दे देती हैं । जंगल से लकड़िया लाने में कई बार उनका जंगली हिंसक जानवरों जीवों से सामना हो जाता है इनमें जंगली भालू के हमले की कई घटनायें हो चुकी है। सांप बिच्छू भी काट लेते हैं । कभी.कभी वन विभाग व रेलवे स्टेशन के कर्मचारी .अधिकारी अपनी खानापूर्ति के लिये ट्रेन के समय स्टेशनों पर छापा डालकर गट्ठर खेंचने का काम करते हैं ए उस समय यह महिलायें सिर में गट्ठर लिये बगल में बच्चा दबाए इधर से उधर दौड़ती हैंए वनकर्मी इन्हें डंडों से मारते हैं। सिर पर गट्ठर लिये इनको ढकेल देते है जिससे बच्चे व गट्ठर सहित महिला औंधे मुंह गिर जाती है। लकड़ी ढोने में महिलायें इसलिये लगी हैं क्योंकि रोजगार के विकल्प न होने के कारण यह काम करना उनकी मजबूरी है। दूसरी ओर कुछ अधिकारी .कर्मचारी कृपा भाव दिखाते हुए इन्हें औरत व गरीब समझकर छोड़ देते हैं। इनके परिवार के मर्दो का कहना है कि अगर हम गट्ठर लेकर जायें तो रेल वाले बिना टिकट पकड़ लेगें। आम तौर पर सफर में औंरतों के साथ ऐसा नहीं करते ।

चित्रकूट जनपद से लेकर रीवा जनपद के 150 गांवों की करीब 2000 महिलायें ट्रेन से गट्ठर ले जाने के कार्य में लगी हैं। वह एक दिन जब लकड़ी बेचकर लौटती है उसके दूसरे दिन जंगल जाती है फिर अगले दिन वह शहर जाती है। जिन परिवारों में पुरूष प्रतिदिन लकड़ी लाते हैं उनकी महिलायें रोजाना लकड़ी बेचने जाती हैं। इधर चार.पॉंच वर्षो से झांसीए महोबाए सतनाए कटनी आदि दूर के शहरों से कुछ महिलायेंए 15 से 20 रूपये थोक में इन ष्कोल ष् औरतों से स्टेशन या ट्रेन में गट्ठर खरीद कर ले जाती है। और मंहगे भाव में बेचती है इन थोक खरीददार महिलाओं के गठठर स्टेशन से रेल में चढ़ाने की जिम्मेदारी विक्रेता कोल आदिवासी परिवार की ही होती हैए जीण्आरण्पीण् के सिपाही इनसे रेल में 3 रूपये गटठा बसूलते हैं। ये दलित. आदिवासी महिलायें इस जलावन वाले लकड़ी के धंधे सेऊब तो चुकी है मगर इसका कोई विकल्प नहीं हैए अगर इन महिलाओं को क्षेत्र में कुछ रोजगार मिल जाये तो इससे निजात पा सकती है। क्योंकि तेंदूपत्ता सीजन में या महुआ बीनने के सीजन में जब 10 .15 दिन के लिये हर घर परिवार को काम मिलता है तब लकड़ी के गट्ठर ढोने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम हो जाती है। इस काम में लगी औरतों का कहना है कि जो हमारे साथ बीतता है उसे हम किसी से कह नहीं सकते । क्योंकि भूखए इंसान से सब कुछ करा सकती है गरीबी पत्थर से भी ज्यादा जड़ होती है।

03 March 2013

बांग्लादेश में हिंदु अत्याचार पर भारत सरकार चुप क्यों है ?

सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुंबकम को जीवन का आधार मानने वाले हिंदुओं की आज के दौर में काफी दयनीय हालात बनती जा रही है। खासकर बंग्लादेष और पाकिस्तान में, इन देषों में लगातार हिंदुओं पर अत्याचार के मामले बढ़े रहें हैं। यहा जबरन धर्मातरण, यौन उत्पीड़न, धार्मिक स्थलों पर आक्रमण, सामाजिक भेदभाव, संपत्ति हड़पना आम बात हो गयी है। आज भारत से बाहर रह रहे हिंदुओं की आबादी लगभग 30 करोड़ है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट में बांग्लादेष में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार उन्हें इस्लामिक मदरसों में रखकर जबरन मतांतरण का दबाव डाला जाता है। बांग्लादेश ने वेस्टेड प्रापर्टीज रिटर्न, एमेंडमेंट बिल 2011 को लागू किया गया है, जिसमें जब्त की गई या मुसलमानों द्वारा कब्जा की गई हिंदुओं की जमीन को वापस लेने के लिए क्लेम करने का अधिकार नहीं है। इस बिल के पारित होने के बाद हिंदुओं की जमीन कब्जा करने की प्रवृति में काफी जयादा बढ़ोतरी हुई है। सवाल यहा पर भारत सरकार को लेकर भी है कि एैसे मामले को अंतरराश्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं उठाई जा रही है। इसके अलावा हिंदू इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर भी हैं।

 ये कटरपंथी उनके साथ मारपीट, अपहरण, मंदिरों में तोडफोड़ और शारीरिक उत्पीड़न जैसे घटनाओं को अंजाम दे रहे है। बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ अत्याचार आज आम बात हो गई है। बांग्लादेश में हो रही हिंसा की गाज अक्सर वहां के हिन्दुओं और उनके मंदिरों पर गिर है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तीन दिन के दौरे पर बांग्लादेश जा रहे हैं। एैसे में उनसे बंग्लादेषी हिंन्दु काफी उमिंदे लगाए हुए है। बीते षनिवार को ही जमात-ए-इस्लामी समर्थकों ने मोरेलगंज इलाके में एक मंदिर में आग लगा दी। पूरे देश में कई हिन्दुओं के घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया है। करीब 70 हिंदू परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर अन्य जगह शरण लेनी पड़ी है क्योंकि जमात के लोग हिंदुओं के घर जलाने के साथ-साथ उनकी पिटाई भी कर रहे हैं। बांग्लादेश में फैली इस हिंसा पर अमेरिका ने भी चिंता व्यक्त की है। मगर भारत सरकार अब भी मौन बरती हुई है। इन घटनाओं ने बांगलादेषी हिंदुओं को 1971 के दौर की याद दिला दी है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की बांग्लादेष में हिंदु अत्याचार पर भारत सरकार चुप क्यों है।