27 September 2013

क्या बीजेपी दीनदयाल उपाध्याय के साथ दगाबाजी कर रही है ?

भारतीय जनता पार्टी की भोपाल रैली के लिए सिर्फ अलग अलग संभागों और विभागों से कार्यकर्ता ही नहीं बुलाए गये थे। गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड से जुड़े कार्यकर्ताओं को भी वहां मौजूद रहने के लिए कहा गया था। कारण यह कि किसी भी राजनीतिक दल द्वारा यह इतिहास का सबसे बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन था जिसमें मंच से इस बात की पुष्टि की गई कि कुल 7 लाख 21 हजार कार्यकर्ता इस सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं। अब पता नहीं गिनीज बुक वालों ने इसे इतिहास का सबसे बड़ा सम्मेलन बताकर रिकार्ड में दर्ज किया या नहीं लेकिन एक कारण ऐसा जरूर था जिसके चलते भाजपा के भीतर यह रैली इतिहास के रूप में दर्ज हो गई। वह कारण है- दीनदयाल से दगाबाजी।
 
भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना भले ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की हो लेकिन इसका सांगठनिक ढांचा जिस व्यक्ति ने खड़ा किया उसका नाम पं दीनदयाल उपाध्याय था। दीनदयाल उपाध्याय संघ के प्रचारक थे और संघ ने उन्हें राजनीतिक कार्य करने के लिए भारतीय जनसंघ में भेजा था। 1951 में भारतीय जनसंघ की उन्हें पहली जिम्मेदारी मिली थी- उत्तर प्रदेश का मंत्री। जल्द ही वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री बना दिये गये और उस वक्त कानपुर अधिवेशन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दीनदयाल उपाध्याय के बारे में कहा था कि अगर उन्हें दो दीनदयाल मिल जाते तो वे भारतीय राजनीति की दशा बदल देते।

डॉ. मुखर्जी ने दीनदयाल उपाध्याय के बारे में कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। पंडित जी में कई विलक्षण प्रतिभाएं थीं। एकसाथ वे जितने कुशल संगठनकर्ता थे, उतने ही कुशल विचारक। पवित्रता उनके जीवन का सार थी और प्रचार से वे हमेशा दूर रहते थे। उनकी इन्हीं खूबियों की वजह से वे केवल जनसंघ के आदरणीय नेता नहीं थे बल्कि 1963 में जब अमेरिका ने पंडित जी को वीजा देने में अड़ंगा लगाया तो खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने हस्तक्षेप करके उन्हें वीजा दिलवाया। हालांकि अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्र राज्य और अमेरिकी नागरिकों को अलग अलग देखा और अपनी पोलिटिकल डायरी में लिखा कि वहां की जनता वैसी नहीं है जैसी वहां की सरकार दिखती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी जनता के व्यवहार में व्यापक परिवरर्तन आया है।

लेकिन दीनदयाल उपाध्याय का जिक्र यहां अमेरिका प्रकरण के कारण नहीं बल्कि उनके राजनीतिक और आर्थिक चिंतन और वर्तमान संदर्भों में उसकी समीक्षा के कारण है। दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनता पार्टी एकात्ममानववाद का प्रणेता मानती है जो मूल रूप से आर्थिक चिंतन है लेकिन इस चिंतन का विस्तार समाज और संस्कृति तक विस्तारित होता है। एकात्म मानववाद पर बहुत विमर्श है लेकिन पंडित जी का एक और डायग्राम है अखण्ड मंडलाकार व्यवस्था। यह अखंड मंडलाकार व्यवस्था पंडित दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक चिंतन है। एक रेखाचित्र के जरिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने इस राजनीतिक चिंतन की जो रुपरेखा खींची है उसमें व्यक्ति, परिवार, ग्राम, नगर, राज्य और राष्ट्र का क्रम निर्धारित किया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इस अखंड मंडलाकार व्यवस्था में राष्ट्र पर इति नहीं की गई है। इसके आगे एक पायदान और हैं। और वह पायदान है- मानवता। पंडित जी के राजनीतिक चिंतन में यह बात समाहित थी कि हर प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक या फिर आर्थिक चिंतन के मूल में इंसान और इंसानियत में अगर किसी एक को चुनना हो तो इंसानियत को चुनना चाहिए। मानवता मानव से भी श्रेष्ठ लक्ष्य है। अगर कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है जिसके मूल में इंसानियत को आला दर्जा दिया जाता है तो वही व्यवस्था अखंड मंडलाकार व्यवस्था हो सकती है।

भोपाल की रैली में उमा भारती ने किनारे कर दिये गये महारथी लालकृष्ण आडवाणी को यह कहकर प्रासंगिक रखने की कोशिश की कि वे भाजपा के जीवित दीनदयाल हैं। राजनीतिक कसौटी पर परखें तो बहुत आंशिक तौर पर ही उमा भारती की यह बात सही नजर आती है। लेकिन उन मोदी महराज का क्या जो दीनदयाल के विचार के उलट सिर्फ प्रचार और भितरघात की पैदाइश बनकर भाजपा के क्षितिज पर उभर आये हैं? अगर वे भी दीनदयाल को अपना अतीत बताएं तो दीनदयाल के सामने संकट पैदा हो जाएगा कि वे किसे अपना भविष्य बताएं। आडवाणी को या फिर मोदी को?
पंडित जी जिस दौर में इसी राजनीतिक चिंतन के आधार पर भारतीय जनसंघ का सांगठनिक विस्तार कर रहे थे उसी दौर में जनसंघ में अटल बिहारी वाजपेयी का उभार हुआ था। लिखित तौर पर प्रमाण कहीं मिले या न मिले लेकिन दिल्ली के राजनीतिक इतिहासकार अक्सर इस बात की चर्चा करते हैं कैसे दीनदयाल जी के सामने अटल बिहारी वाजपेयी बौने साबित होते थे। कारण सम्मान भी हो सकता था लेकिन असल बात थी दीनदयाल उपाध्याय की वह नीति जो शायद अटल बिहारी जैसे उभरते नेतृत्व को अपच होती थी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रचारात्मक प्रवृत्ति के नेता थे और मानते थे कि नेता का प्रचार दल के प्रसार के लिए जरूरी है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस बात के सख्त खिलाफ थे। वे राजनीति को वैमनस्य की नीति नहीं मानते थे और विरोधी दल की निंदा करने की बजाय अपनी नीतियों का प्रचार करने पर बल देते थे।

दीनदयाल उपाध्याय की असमय मौत हुई। भारतीय जनसंघ असफल होते हुए भारतीय जनता पार्टी में परिवर्तित हो गया और परिवर्तन की इस प्रक्रिया में अटल बिहारी वाजपेयी का वही राजनीतिक उदारीकरण साथ हो गया जिसके तहत उन्होंने भाजपा को एकात्म मानववादी रास्ते पर आगे ले जाने की बजाय समाजवादी संस्करण गढ़ने में व्यस्त हो गये। 1980 से 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के भीतर निर्विरोध और निर्विवाद रूप से अटल कालखण्ड रहा और उन्होंने संघ की राजनीतिक विचारधारा के साथ गैर संघीय राजनीतिक दलों के साथ ऐसा साझा तालमेल किया कि देश के हाथ गठबंधन दलों की स्थिर सरकार का फार्मूला लग गया। हालांकि इस फार्मूले का समर्थक संघ कभी नहीं रहा लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के सामने संघ भी सिवा तालमेल के और कोई घालमेल कर नहीं सका।

लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के मुक्त होते ही संघ ने राजनीतिक रूप से भाजपा को फिर से उसी दिशा में ले जाने कोशिश शुरू कर दी जहां से जनसंघ का रास्ता भटका था। हालांकि इस भटके रास्ते पर दोबारा वापसी के बीच गंगा में बहुत पानी बह चुका है लेकिन संघ जिस नयी राजनीति की बिसात बिछा रहा है उसमें अटल बिहारी वाजपेयी के संघीय समन्वय का पूरी तरह से इंकार तो है ही, बहुत सारे वैचारिक मामलों में वह दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को भी तिलांजलि देता है। संघ द्वारा नरेन्द्र मोदी का समर्थन उन्हीं में से एक है। दीनदयाल उपाध्याय जिस कट्टर राजनीतिक हिन्दुत्व के पैरोकार नहीं थे और राजनीति को नफरत का औजार नहीं बनने देना चाहते थे, नरेन्द्र मोदी उन्हीं तत्वों के माहिर खिलाड़ी हैं। अगर दीनदयाल उपाध्याय को उस दौर में भी प्रचार प्रेमी अटल बिहारी वाजपेयी नागवार गुजरते थे तो इस दौर में नरेन्द्र मोदी सिर्फ और सिर्फ प्रचार और प्रोपोगेण्डा की ही देन हैं। फिर भी संघ नरेन्द्र मोदी को सिर्फ भाजपा का नहीं बल्कि संघ का उद्धारक भी मान बैठा है क्योंकि अपने प्रचार तंत्र की बदौलत वे भीड़ को आकर्षित करते हैं।

यानी आज संघ हो कि भाजपा दोनों ही दीनदयाल के उस मूल विचार को पूरी तरह से खारिज करते हुए दिखाई दे रहे हैं जो उनके राजनीतिक चिंतन और कार्यशैली का मूलाधार है। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे शालीन और अपेक्षाकृत कम प्रचार प्रेमी भी अगर दीनदयाल उपाध्याय को खटकते थे तो नरेन्द्र मोदी जैसे प्रचार की पैदाइश कहां से दीनदयाल की भाजपा के भविष्य हो सकते हैं? लेकिन वह जनसंघ तो उसी दिन तिरोहित हो गया जिस दिन अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा बनाई। लेकिन वह भाजपा भी उस दिन नहीं रही जिस दिन नरेन्द्र मोदी जैसे प्रायोजित और प्रक्षेपित नेता को साजिश के तहत पार्टी के भीतर शीर्ष नेतृत्व घोषित कर दिया गया। वह संघ तो वह संघ रहा ही नहीं जो दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ में काम करने की जिम्मेदारी सौंपता है। वह संघ होता तो आज जरूर सवाल उठाता कि आखिर दीनदयाल से इस दगाबाजी से भाजपा क्या हासिल करना चाहती है?

25 September 2013

हिन्दू कोड बिल क्या हिन्दुओं के साथ अन्याय है ?

16 सितंबर 1951 का दिन था. दिल्ली में एक मुद्दे पर प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के खिलाफ नारे लगाए जा रहे थे. कट्टरवादी हिंदू की एक भीड़ नेहरू से गद्दी छोड़ देने की मांग कर रही थी. आजाद भारत में सबसे बड़े नेता और पहले प्रधानमंत्री नेहरू के खिलाफ विरोध की आवाज बुलंद थी. नेहरू के खिलाफ उठे आंदोलन का नेतृत्व अखिल भारतीय राम राज्य परिषद के संस्थापक स्वामी करपात्री महाराज कर रहे थे. स्वामी करपात्री के अनुसार हिंदू कोड बिल हिन्दु रीति-रिवाजों, परंपराओं और धर्मशास्त्रों के विरुद्ध था. जब भारत आजाद हुआ तब हिंदू समाज में पुरुष और महिलाओं को तलाक का अधिकार नहीं था, हिंदू पुरूषों को एक से ज्यादा शादी करने की आजादी थी लेकिन विधवाएं दोबारा शादी नहीं कर सकती थी. विधवाओं को संपत्ति से भी वंचित रखा गया था. नेहरू समाज की इन रुढ़िवादी परंपराओं को बदल देना चाहते थे. नेहरू जिस सामाजिक बदलाव की हिमायत कर रहे थे हिंदू समाज उसका विरोध कर रहा था. फरवरी 1949 को संसद भवन में नेहरू ने कहा, ‘इस कानून को हम इतनी अहमियत देते हैं कि हमारी सरकार बिना इसे पास कराए सत्ता में रह ही नहीं सकती.’ 

तत्कालिन कानून मंत्री डॉक्टर बीआर अंबेडकर हिंदू कोड बिल के पक्ष में नेहरू का साथ दे रहे थे. 1948 में ये बिल संविधान सभा में पहली बार पेश किया गया. लेकिन अंबेडकर के तमाम तर्क और नेहरू के समर्थन के बावजूद हिंदू कोड बिल का जबरदस्त विरोध हुआ. कानून मंत्री अंबेडकर ने 5 फरवरी 1951 को हिन्दू कोड बिल को संसद में दोबारा पेश किया. तब भारत का संविधान भी बनकर तैयार था. लेकिन संसद के सदस्यों को जनता ने नहीं चुना था. इन सदस्यों को बहुसंख्यक हिंदू समाज में बदलाव और पुराने रीति-रिवाजों को बदलने का निर्णय करना था. संसद में तीन दिन तक बहस चली. हिंदू कोड बिल के विरोधियों का सबसे बड़ा तर्क था कि संसद के सदस्य जनता के चुने हुए नहीं है इसलिए इतने बड़े विधेयक को पास करने का नैतिक अधिकार नहीं है. दूसरा तर्क था कि सिर्फ हिंदुओं के लिए कानून क्यों लाया जाए बहुविवाह की परंपरा तो दूसरे धर्मों में भी है. इस कानून को सभी पर लागू किया जाना चाहिए.

मार्च 1949 से ऑल इंडिया एंटी हिंदू कोड बिल कमेटी सक्रिय थी. करपात्री महाराज के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक, हिंदू महासभा और दूसरे हिंदूवादी संगठन हिंदू कोड बिल का विरोध कर रहे थे. इसलिए जब इस बिल को संसद में चर्चा के लिए लाया गया तब हिंदूवादी संगठनों ने इसके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन शुरू कर दिए. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अकेले दिल्ली में दर्जनों विरोध-रैलियां आयोजित कीं. महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा दिए जाने, तलाक का अधिकार दिए जाने और स्त्रियों को समानता का अधिकार दिए जाने जैसे प्रावधानों की वजह से हिंदू कोड बिल के खिलाफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के कोने-कोने में प्रदर्शन किए. डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी इस बिल को लाए जाने के खिलाफ थे. राजेंद्र प्रसाद ने बिल के विरोध में कई पत्र नेहरू को लिखे. 1950 में राष्ट्रपति बनने के बाद भी नेहरू को चेताया कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय पर इस तरह का कानून जबरदस्ती थोपा नहीं जाना चाहिए और वो राष्ट्रपति के अधिकारों का इस्तेमाल कर कानून को मंजूरी न देने के विकल्प पर विचार कर सकते हैं.

कांग्रेस नेताओं और राष्ट्रपति के विरोध से नेहरू विचलित नहीं हुए और अपनी जिंद पर अड़े रहे. आखिरकार नेहरू और डॉक्टर अंबेडकर ने 17 सितंबर 1951 को चर्चा के लिए इस बिल को सदन के पटल पर रखा. संसद में विरोध और बहस को देखते हुए प्रधानमंत्री नेहरू ने हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में बांटने का एलान कर दिया. डॉक्टर अंबेडकर नेहरू के इस प्रस्ताव के खिलाफ थे. अंबेडकर ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर नेहरू का साथ छोड़ दिया. दूसरी तरफ हिंदू कोड बिल के विरोध को देखते हुए नेहरू को ऐहसास हो गया था कि बिना जनादेश के इस कानून को पास कराना आसान नहीं होगा. इसी वजह से उन्होंने चुनाव तक इस बिल को टालने का मन बना लिया. 

1951-52 में भारत के पहले आम चुनाव होने वाले थे. नेहरू के लिए यह काफी अहम थे. इलाहाबाद की फूलपुर सीट से नेहरू लोकसभा का पहला चुनाव लड़ रहे थे. इन चुनावों में हिंदू कोड बिल सबसे बड़ा मुद्दा था. नेहरू के खिलाफ संन्यासी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी चुनाव लड़ रहे थे. हिंदू कोड बिल के समर्थन में जनसंघ और हिंदू महासभा जैसे दलों ने अपना उम्मीदवार खड़ा करने के बजाय प्रभुदत्त ब्रह्मचारी को समर्थन दिया. देशभर में वोट डाले गए और नतीजे घोषित हुए. प्रभुदत्त ब्रह्मचारी अपनी जमानत भी नही बचा पाए थे और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने जबरदस्त जीत हासिल की. नेहरू का साथ छोड़ चुके डॉक्टर अंबेडकर भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव हार चुके थे. 

देश के पहले लोकसभा चुनाव के बाद नेहरू ने हिंदू कोड बिल को कई हिस्सों में तोड़ दिया. जिसके बाद 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट बनाया गया. जिसके तहत तलाक को कानूनी दर्जा, अलग-अलग जातियों के स्त्री-पुरूष को एक-दूसरे से विवाह का अधिकार और एक बार में एक से ज्यादा शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. इसके अलावा 1956 में ही हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, हिंदू दत्तक ग्रहण और पोषण अधिनियम और हिंदू अवयस्कता और संरक्षकता अधिनियम लागू हुए. ये सभी कानून महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा देने के लिए लाए गये थे. इसके तहत पहली बार महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिया गया. लड़कियों को गोद लेने पर जोर दिया गया. यह कानून हिंदुओं के अलावा सिखों, बौद्ध और जैन धर्म पर लागू होता है.

नेहरू के इस कदम का भी संसद के बाहर और अंदर जबरदस्त विरोध हुआ लेकिन बहुमत की सरकार होने की वजह से नेहरू इन विधेयकों को पास कराने में कामयाब रहे.

अखबारों की सुर्खियों में दंगे का डमरू !

अखबारों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के हालात को बयां कर रही सुर्खियों का रंग वाकई लाल है। इंसानी खून में लिथड़ा—लिपटा, सड़ांध मारता। लाशें गिनी जा रही हैं, मुआवजे तय हो रहे हैं। नाकारा साबित हुए हाकिम—हुक्कामों को हटाया जा रहा है। केंद्र से और बंदोबस्ती मदद मांगी जा रही है। मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ और बागपत में बढ़ रही बारूदी घुटन से आसपास के जिलों के लोग दहशत में हैं। इन तमाम आपाधापियों के बीच इंसानियत एक कोने में हाथ बांधे खड़ी है, कई सवालों के साथ। 

सवाल, जिनका आज जवाब नहीं तलाशा गया तो वक्त का मुहर्रिर अपनी किताब में लिखेगा—पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वो कौमें आपस में उलझ गईं, जो कभी घी—बूरे की तरह एक-दूसरे में घुली रहती थीं। जो सिर्फ काश्त करना जानती थीं। साथ ही प्यार और भाईचारे की फसल भी बोती—काटती थीं। इन दोनों कौमों को सियासत नहीं आती। इनकी राजनीति तो बस गन्ने और खाप—पंचायतों तक सीमित थी। खान—पान में भले ही परहेज हो, लेकिन शादी—ब्याह, सगाई और त्योहारों में एक-दूसरे को नोतना नहीं भूलते थे। मरनी—करनी साझा गम और मातम होता था। हक-हुकूक की लड़ाइयां मिलकर साथ लड़ीं। वक्त का मुहर्रिर सवालिया निशान के साथ यह भी लिखेगा कि शहर से भेजे गए नफरत के अंगारों को गांव वालों ने कैसे अपने इलाके में घुसने दिया।

पूरे देश में अब तक हुए हजारों दंगों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है 90 फीसद दंगे शहरों में हुए और कई मामलों में उनके पीछे राजनीतक और आर्थिक कारण थे। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद पैदा हुए मजहबी जुनून की आंच जरूर गांव तक पहुंची थी, लेकिन ज्यादा मारकाट शहरों में ही हुई थी। लेकिन मुजफ्फरनगर,शामली, मेरठ और बागपत में गांव तक पहुंची नफरत की आंच ने साबित कर दिया है कि शहरों में वोटों के ध्रुवीकरण से काम नहीं चल रहा। गांवों में भी जुगाड़ फिट करने के तहत ही दंगे कराए गए।

इन दंगों ने सरकार और प्रभावित जिलों के प्रशासन को भी कठघरे में ला खड़ा किया है। क्या वजह है कि जब—जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है, दंगाई हथियार लेकर सडक़ों पर आ जाते हैं। वर्ष 2012 में प्रदेश में साम्प्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए थे। 100 से ज्यादा दंगों में 34 लोगों ने जान गंवाई और 456 बेकुसूर जख्मी हुए। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मानते हैं कि पिछले साल प्रदेश में 27 दंगे हुए। मुख्यमंत्री पिछले और मौजूदा दंगों का दोष उन साम्प्रदायिक ताकतों के सिर मढ़ दिया, जो उनकी सरकार को कमजोर करना चाहती हैं।   

देखने में भले ही लगता हो कि दंगे एका—एक भडक़े हैं, लेकिन उनकी काफी सोच—विचार और साजिशों के बाद उनके लिए मैदान बनता है। कई सवाल हैं, जिनका जवाब राज्य की सरकार को देना होगा। 27 अगस्त को मुजफ्फरनगर के कवाल में छोटी सी वारदात के बाद एक युवक की हत्या और प्रतिक्रिया में दो लोगों के कत्ल की खबर क्या प्रशासन ने लखनऊ में बैठी सरकार तक नहीं पहुंचाई थी। क्या सरकार को तुरंत नहीं लगा था कि क्रिया—प्रतिक्रिया की ये जंजीर इतनी लंबी हो जाएगी कि गांवों को जकड़ लेगी। पुलिस और उसका खुफिया महकमा उस वक्त क्या कर रहा था, जब कुछ नेता जाटों और मुसलमानों को बहका रहे थे। पंचायतें और महापंचायतें होती रहीं।

 मारे और काटे जाने की अफवाहें बेधडक़ गश्त करती रहीं और प्रशासन किसी नादान बच्चे की तरह सब होता देखता रहा। सरकार ने क्यों नहीं फौरन बड़ी संख्या में फोर्स की तैनाती की। साम्प्रदायिक दंगों को लेकर केंद्र की तरफ से राज्यों के लिए जारी गाइड लाइंस में साफ लिखा है कि उपद्रव की स्थिति में राज्य तुरंत अधिकतम बल का इस्तेमाल करें। अभी हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर सूचित किया है कि उसकी तीस फीसद पुलिस फोर्स नेता और अधिकारियों की सुरक्षा में तैनात है। उत्तर प्रदेश में चार पुलिस गार्ड लेकर चलना वैसे भी स्टेटस सिम्बल बन गया है। 

अब केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे भी कह रहे हैं कि उन्होंने दंगों को लेकर अखिलेश सरकार को सचेत कर दिया था। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने केंद्र को जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें भी दंगों के लिए साफ तौर से शासन और प्रशासन की लापरवाही को रेखांकित किया गया है। प्रधानमंत्री ने फोन पर अखिलेश यादव से बात की तो उन्होंने स्थिति नियंत्रण में होने का भरोसा दिया। क्या केंद्र सरकार को इस मामले में प्रदेश सरकार को कड़ा नोट नहीं भेजना चाहिए था। यहां केंद्र सरकार की राजनीतिक मजबूरियां आ खड़ी हुई हैं। समर्थन की बैसाखी टूट जाने का डर है। 

मुजफ्फरनगर प्रशासन ने अमन कमेटियों को सक्रिय क्यों नहीं किया। मुजफ्फरनगर में मीनाक्षी चौक की पंचायत हो या फिर नंगला मंदोड़ में 36 बिरादरियों की महापंचायत, प्रशासन ने क्यों नहीं उन्हें रोका। अब भले ही रालोद, भाजपा और सपा के नेताओं को दंगाग्रस्त जिलों में जाने से रोका जा रहा हो और उनपर मुकदमे दर्ज हो रहे हों, लेकिन उस वक्त सम्प्रदाय के नाम पर इकट्ठा भीड़ में सियासी पार्टियों के नेताओं को क्यों जाने दिया गया। हिंदू और मुसलमानों के बीच सौहार्द की जो विरासत चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत छोड़ गए थे, उनको क्यों मटियामेट होने दिया गया। इन दंगों को लेकर सियासत शुरू हो चुकी है। आरोपों के तीर छोड़े जा रहे हैं। अखिलेश सरकार को बर्खास्त करने की मांग की जा रही है, लेकिन चुनावी विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करने वाले नेता और पार्टियों की तरफ से एक भी एेसा इश्तेहार देखने को नहीं मिला, जो दोनों समुदाय से संयम बरतने की अपील करता दिख रहा हो। 

दंगे सिर्फ जिस्मों पर जख्म नहीं देते। आत्मा को भी छलनी कर देते हैं। पिछले कई दिनों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आर्थिक गतिविधियां ठप हैं। डरे-सहमे लोग कफ्र्यू हटने की प्रार्थना कर रहे हैं। बच्चों की दूध नहीं मिल रहा है। बीमार दवा के लिए तड़प रहे हैं। रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले परिवारों में भुखमरी की स्थिति है। ये हालात कब तक बने रहेंगे, कुछ नहीं पता। अपना ही लिखा एक पीस याद आ रहा है—काश हर मस्जिद की खिडक़ी मंदिर में खुलती। यह लेख पुणे में स्थित मंदिर और मस्जिद के अगल-बगल होने पर था, जिसमें मैंने मुजफ्फरनगर के कांधला में जामा मस्जिद और लक्ष्मी नारायण मंदिर जमीन के एक ही टुकड़े पर खड़े होने का जिक्र किया था। आज भी दोनों धर्मस्थल ‘मजहब के कारोबारियों’ को आईना दिखा रहे हैं। इस वक्त नफरत नहीं, बल्कि कांधला में मौजूद उस नजीर को याद करने का है, जो हमारी शानदार एकता और भाईचारे की प्रतीक है। आमतौर से मुसलमानों द्वारा पहनी जाने वाली गोल टोपी को लेकर खासा बवाल मचता रहा है।

 गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक समारोह में एक मोलवी द्वारा पेश की गई गोल टोपी को स्वीकार करने से इनकार करने पर मीडिया में काफी हंगामा मचा था। हाल में ही ईद के मौके पर फिल्म अभिनेता रजा मुराद की मौजूदगी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ईद मिलन समारोह में गोल टोपी पहन ली तो उसे लेकर टीवी न्यूज चैनलों और सोशल नेटवर्किंग साइट् पर काफी हंगामा मचा था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार साल भर में इफ्तार पार्टियों और अन्य कार्यक्रमों में गोल टोपी पहनकर दिखते रहते हैं। इस बीच, सोमवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा हाजियों को मक्का रवाना करते समय गोल टोपी पहनने को लेकर भी सुगबुगाहट है। सवाल पूछा जा रहा है कि जब प्रदेश का एक हिस्सा दंगों में जल रहा है तो क्या जरूरी था इस तरह व्यवहार। क्या गोल टोपी पहनकर उन्होंने एक वर्ग को संदेश देने की कोशिश नहीं की है।

दंगे की आग में जल गया कोयला !

दंगा हुआ मुजफ्फरनगर में। लोगों के घर जले और दिल भी। लेकिन दंगों पर सद्भावना दिखानेवाली कांग्रेस सरकार ने क्या किया? उसने बड़ी चालाकी से दंगों की इसी आग में कोयला भी जला लिया और राख का ढेर भी फूंककर हवा में उड़ा दिया। आप सोच रहे होंगे कैसे तो समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। कोयले की आग में जल रही केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने सीएजी की उस रिपोर्ट को हवा कर दिया है जिसमें एक बार फिर यही बात कही गई है कि खनन कंपनियां देश को लूट रही है। लेकिन तब जब सीएजी ने यह बात कही थी तब शुरू हुआ हंगामा अब तक जारी है लेकिन अब सीएजी वही बात कह रही है तो किसी को कान देने की फुर्सत नहीं है। न मीडिया को, और न ही विपक्ष को। सब मुजफ्फरनगर की आग में हाथ सेंक रहे हैं।
 
2002 से 2012 के बीच की इस रिपोर्ट में हालांकि सीएजी ने विपक्षी दल भाजपा की एनडीए सरकार पर भी अंगुली उठाई है लेकिन कांग्रेस को भी इतनी फुर्सत कहां कि वह भाजपा को आइना दिखा सके। इस बीच भाजपा भी भूल ही गई है कि सीबीआई की फाइलें भी गायब हैं और गायब फाइलें मिल रही हैं उसमें से पन्ने के पन्ने गायब हैं।  कोलगेट कांड में राजनीतिक दलों की यह उदासी शायद इसलिए कि मुजफ्फरनगर कांड के कोलाहल के बीच आई सीएजी की रिपोर्ट पर किसी ने कान देने की जरूरत ही नहीं समझी। इसलिए इस रिपोर्ट की कही न कोई ठीक से खबर आई और न ही विपक्षी दलों ने मुद्दे के रूप में उठाया। राजनीतिक रूप से देखें तो विपक्ष के लिए यह एक शानदार और महत्वपूर्ण मौका था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को कोलगेट मामले में फटकार लगा रहा था और जनता के जेहन में कोलगेट की बात अभी भी बनी हुई है। 

कभी छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, झारखंड तो कभी उत्तर प्रदेश में काले सोने के काले धंधे का दाग किसी न किसी प्रदेश पर जरूर लगता है। मीडिया में शोर मचता है, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है, पर होता कुछ नहीं। सैकड़ों करोड़ों रुपये के घपले की सत्यता परखने के लिए जांच बैठा दी जाती है। जांच की रिपोर्ट कब आती है, क्या कार्रवाई होती है, यह सब मीडिया के सुर्खियों में नहीं आ पाता है। कभी जांच पड़ताल में कोई मृत निकलता है तो फाइल गायब मिलती है। जानने वाले तो यह भी जानते हैं विभागीय  जांच पड़ताल के दौरान घपले की फाइलों को दबा दी जाती है या उसमें हेर फेर कर हिसाब किताब सुधार लिया जाता है।  सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, कोयले की लूट खसोट में हर दल शामिल रहा है।  कैग की ताजा रिपोर्ट 2002 से 2012 तक की अवधि पर आधारित है। 

इस समय अवधि में केंद्र में एनडीए और यूपीए दोनों की सरकार रही। मतलब साफ है, कोयले की लूट में हर प्रमुख दल शामिल रहा। लिहाजा, कौन सा दल किसका गिरबान पकड़े, आसान स्थिति नहीं है। गुजरात में नरेंद्र मोदी सरकार के जल संसाधन मंत्री जब लाइमस्टोन के अवैध खनन मामले में भीतर गए तो उनके साथ कांग्रेस के पूर्व सांसद भी थे।  जानकार लोग कहते हैं कि सत्ता के गलियारे में कोल परियोजनाओं से जुड़े माफियाओं का नेटवर्क इतना मजबूत है कि उनकी मनमर्जी चलती रहती है। जंगल क्षेत्रों में कोल खनन के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की भी हरी झंडी जरूरी है। कैग के नये रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खनन कार्य वन संरक्षण कानून के मुताबिक नहीं हो रहा है।  कोल माफियाओं का नेटवर्क इतना प्रभावशाली है कि वे सत्ता के संरक्षण में ही ऐसे कानूनों को अपनी मनमर्जी के आगे बेवस बना देते हैं। केंद्र और प्रदेश सरकार इनके प्रभाव में होते हैं। किसी भी कंपनी को कोल खनन प्रदेश सरकार सहमति के बगैर नहीं मिलते हैं। लिहाजा, लूट के खेल में प्रदेश सरकारों की भूमिका को भी बाखूबी समझी जा सकती है। 

दामन में दांग होने के कारण ही कई बार केंद्र के निर्णय पर प्रदेश सरकार चुपचाप रहती है। 52 निजी कंपनियों के पट्टे बिना गिरानी रिपोर्ट के ही बढ़ा दिए गए। न कहीं खबर चली और नहीं ही कोई शोर-शराबा हुआ। आमतौर पर यह देखा गया है कि ऐसे निर्णय उसी दौरान लिए जाते हैं जब देश की जनता व मीडिया का ध्यान दूसरी खबरों में डूबा रहता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश के दंगे में न केवल इंसानियत जली बल्कि उसके शोर-शराबे की आड़ में प्रकृति संसाधानों की लूट खसोड़ पर आधारित एक बड़ी रिपोर्ट गुम हो गई।

क्या दूरदर्शन सिर्फ सरकारी भोपू बन गया है ?

दूरदर्शन जैसे सार्वजनिक प्रसारण इसके बावजूद इन दिनों दुविधा में दिखता है। उस पर भी प्रोफेशनल और कमर्शियल होने का दबाव है तो वह अपनी सार्वजनिक प्रसारक की भूमिका को बचाए और बनाए भी रखना चाहता है। वह तय करता नहीं दिख रहा है कि उसकी कमर्शियल भूमिका किस सीमा तक होनी चाहिए कि उसकी सार्वजनिक प्रसारक की छवि पर सवाल ना उठे। इसलिए वह कई बार एक कदम आगे तो दो कदम पीछे चलता दिखता है। उसे इस दुविधा से निकलना होगा। देश में जितनी तेजी से टेलीविजन चैनलों और एफएम रेडियो का विस्तार हुआ है, उतनी ही तेजी से इन पर प्रसारित किये जा रही सामग्री को लेकर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। बेशक बाजार में चमक-दमक भरी दुनिया वाले निजी चैनलों का दबदबा कायम है। क्षेत्रीय भाषाओं के साथ मिलकर कुल मिलाकर पांच सौ से ज्यादा टेलीविजन चैनलों की भारतीय दुनिया से सकारात्कम कंटेंट की विदाई या तो हो चुकी है या फिर प्रक्रिया में है। 

हालांकि एक धारा ऐसी भी है जो एक फिल्म की तर्ज पर अंग्रेजी में कंटेंट इज किंग यानी कंटेंट ही असल ताकत है का नारा बुलंद कर रही है। लेकिन जब बेतुके कंटेंट, बेतुकी समाचार कथाएं और बेतुके सोप ऑपेरा की दुनिया से खासतौर पर बौद्धिक वर्ग का पाला पड़ता है तो एक बार फिर सवाल उठने लगता है कि क्या भारत जैसे बहुवर्णी और संस्कृतिबहुल देश में ऐसे प्रसारक नहीं होने चाहिए, जो देसी संस्कृति का खयाल तो रखे ही, संपूर्ण भारतीयता की अवधारणा के साथ फिक्शन और समाचार दोनों तरह के कंटेंट पेश करें।

ऐसे में एक बार फिर सार्वजनिक प्रसारण पर ही जाकर हमारी निगाह टिकती है। सार्वजनिक प्रसारण यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी। चूंकि यही वह दौर है, जिसमें जिंदगी की सारी इकाइयां उदारीकरण और पश्चिमी मानकों वाली आधुनिकता में रंगने के लिए सौंपी जा रही है। लिहाजा एक बहस यह भी है कि आखिर सरकार या सार्वजनिक पैसे का दुरूपयोग(?)  किया ही क्यों जाए। ये कुछ संदर्भ हैं, जिनकी वजह से यह सवाल उठ खड़ा होता है कि भारत में सार्वजनिक प्रसारण संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए। क्या उसे भी बाजारी ताकतों की तरह अपने कंटेंट का स्तर गिराकर चटपटा बना लेना चाहिए या फिर उसे अपनी खासियत बनाए रखनी चाहिए। इन संदर्भों में हमें प्रसिद्ध समाजशास्त्री पूरन चंद्र जोशी की अध्यक्षता में 1982 में गठित समिति की रिपोर्ट पर गौर करना चाहिए।  पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी। 

पीसी जोशी कमेटी की रिपोर्ट ही थी कि दूरदर्शन पर बुनियाद, हमलोग जैसे सोप ऑपेरा की बुनियाद रखी गई और यह सिलसिला गणदेवता, मैला आंचल होते हुए रामायण, महाभारत, कृष्णा और चाणक्य तक पहुंचा। भारतीयता का चेहरा दिखाने वाला दूरदर्शन तब तक आगे रहा। लेकिन जैसे ही नरसिंह राव की सरकार के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण के दरवाजे खोले, दूरदर्शन पिछड़ने लगा। आर्थिक उदारवाद और सॉफ्टवेयर क्रांति के दौर में दूरदर्शन के पिछड़ने की प्रक्रिया सतत प्रवाहशील बनी रही। इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया कि सेटेलाइट चैनलों के दौर में दूरदर्शन का नाम उपहास का पात्र भी बन गया। इस दौर में दूरदर्शन को उबारने की कोशिश हुई। जनता पार्टी की सरकार के दौरान बने बीजी बर्गीज कमिटी ने सार्वजनिक प्रसारण ट्रस्ट बनाने की सिफारिश की थी। जो न्यायपालिका जैसी स्वायत्त हो। लेकिन तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसे नकार दिया था। उन्होंने कहा था – “ कमेटी ने न्यायपालिका की तरह एक समानांतर स्वायत्त संस्था बनाने की सिफारिश की है, जिस पर विधायिका का भी कोई नियंत्रण ना हो। लेकिन हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। बेशक बाद में संयुक्त मोर्चा की सरकार ने 1996 में प्रसार भारती का गठन तो कर दिया। लेकिन उसके बाद आई एनडीए की सरकार ने प्रसार भारती के बावजूद अपना सीमित नियंत्रण जारी रखा। 

इसे लेकर हो हल्ला भी मचा था। तब तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन ने कहा था कि सार्वजनिक पैसे से चलने वाले सार्वजनिक प्रसारण माध्यमों पर अगर सरकारी पक्ष नहीं रखे जाएंगे तो क्या रखे जाएंगे। 1978 में लालकृष्ण आडवाणी सार्वजनिक प्रसारण ट्रस्ट की अवधारणा को जिस अंदाज में खारिज कर रहे थे, वह शालीन था। लेकिन उसके अंदर भी निहित वही था, जिसे करीब बीस-इक्कीस साल बाद प्रमोद महाजन ने कहा।

सार्वजनिक प्रसारण तंत्र को लेकर हमारे सामने ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन का मॉडल रखा जाता है। जिस पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं है। उसे ब्रिटिश संसद नियंत्रित करती है। लेकिन यह नियंत्रण सिर्फ प्रशासनिक और आर्थिक ही होता है। कंटेंट के स्तर पर उस पर किसी का सिद्धांतत: किसी संस्था या सरकार का नियंत्रण नहीं है। 1989 में जब राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी थी, तब के सूचना और प्रसारण मंत्री पी उपेंद्र के सामने बीबीसी की तर्ज पर ही भारतीय दूरदर्शन और आकाशवाणी को पेश करने और संगठित करने का सुझाव दिया गया था। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार इसके लिए तैयार भी थी। लेकिन जब तक वह इसे लागू कर पाती, सरकार गिर गई और उसके बाद आई नरसिंह राव सरकार ने उदारीकरण की तरफ कदम बढ़ा दिए। 

बदले माहौल में सार्वजनिक प्रसारण की भूमिका क्या होनी चाहिए, इस पर बहस की गुंजाइश ही नहीं रही। तर्क तो यहां तक दिए जाने लगे कि जब राज्य अपने उद्योगों और फैक्ट्रियों का विनिवेशीकरण करके बाजार के हवाले कर रहा है तो निजी चैनलों के दौर में दूरदर्शन ही क्यों सरकारी नियंत्रण में रहे। लेकिन विरोधाभास देखिए कि जिस एनडीए सरकार ने विनिवेशीकरण की प्रक्रिया को तेज किया, उसी एनडीए सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन सार्वजनिक प्रसारण संस्थान को सरकारी कब्जे में ही बनाए रखने के हिमायती रहे। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रसारण और खासतौर पर सार्वजनिक प्रसारण की ताकत और बदलते दौर में क्या भूमिका हो सकती है।

निश्चित तौर पर जब उदारीकरण की बयार तेज हुई तो उस वक्त दूरदर्शन ने खुद को बाजार से मुकाबले के लिए तैयार नहीं किया। रही-सही कसर टैम के टीआरपी पैमाने ने पूरी कर दी। जिसके आगे दूरदर्शन निस्तेज दिखने लगा। हालांकि अपनी पहुंच और प्रसार की वजह से वह देश के करीब 96 फीसदी हिस्से तक अपनी पहुंच रखता है। गांवों के खेतों-खलिहानों से लेकर सुदूर उत्तरपूर्व की पहाडियों तक अपनी पहुंच और अपना नेटवर्क होने की वजह से वह निजी चैनलों की बाढ़ के बीच अनचीन्हा और अनजाना ही नहीं, निस्तेज दिखता रहा। निश्चित तौर पर इसके लिए बाजार की शक्तियां जिम्मेदार थीं। जिन्हें अपने सपनीले प्रोडक्ट बेचने में दूरदर्शन के जरिए मदद नहीं मिलनी थी। सार्वजनिक प्रसारण होने के नाते उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है। वह मिथ्या प्रचार और मिथ्या तथ्य पेश नहीं कर सकता। लेकिन इस पूरी कवायद में निजी चैनलों से भारत लगातार पिछड़ता चला गया और नव इंडिया अपने नए तेवर के साथ सपनीली दुनिया के साथ आगे बढ़ता रहा। निजी चैनलों को देखकर कोई कह सकता है कि भारत की आज भी करीब सत्रह करोड़ आबादी सत्रह रूपए से कम पर जीने के मजबूर है। 

निश्चित तौर पर कुल आबादी के हिसाब से देखें तो यह छोटा प्रतिशत है। लेकिन संख्या के लिहाज से देखें तो यह भयावह संख्या है। योजना आयोग के ही एक अर्थशास्त्री अर्जुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता वाली समिति ने 2005 में एक रिपोर्ट दी थी। जिसके मुताबिक देश में 83 करोड़ 70 लाख लोग रोजाना बीस रूपए या उससे भी कम में जीने के लिए मजबूर थे। लेकिन निजी चैनलों की चमकीली दुनिया से भारत का यह स्याह पक्ष गायब था। निजी खबरिया चैनलों का नेटवर्क और प्रसार के साथ ही उदारीकरण की दुनिया की बादशाह उपभोक्ता कंपनियों को अपना बाजार सिर्फ उच्च मध्यवर्ग, दिल्ली, मुंबई और राज्यों की राजधानी तक के शहरों में ही दिखता है। लिहाजा निजी चैनलों और एफएम स्टेशनों के कार्यक्रम भी इसी वर्ग के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाए और पेश किए जा रहे हैं।

खबरिया चैनलों की हालत भी इसी तरह की है। बाजार पर कब्जे की ही दौड़ है कि कुएं में गिरा प्रिंस देश के निजी खबरिया चैनलों की बड़ी खबर बनता है। सांड गाजियाबाद के किसी घर की छत पर चढ़ जाता है तो वह राष्ट्रीय खबर बन जाता है। बिना ड्राइवर की कार, एलियन का गाय उठा ले जाना, राखी सावंत का चुंबन के साथ ही फिल्मों की रिलीज राष्ट्रीय खबरों में प्रमुख स्थान बनाती हैं। लेकिन चेरापूंजी में बारिश लगातार घट रही है, मानसून के बेहतर अनुमान के दौर में भी बिहार का एक हिस्सा, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सूखे का अंदेशा राष्ट्रीय कौन कहे, कोने की खबर भी नहीं बन पाती। सुदूर केरल में क्या घटित हो रहा है या फिर उड़ीसा में लोग कैसे जी रहे हैं, जैसे तथ्यों पर राष्ट्रीय मीडिया होने का दावा करने वाले निजी चैनलों तक से ऐसी खबरें गायब हैं। ऐसे माहौल में सार्वजनिक प्रसारण संगठन से ही उम्मीदें बंधती हैं। बेशक उसे भी चलाने में भारी रकम लगती है। उसे संचालित करने के लिए बेहतर राजस्व चाहिए। लेकिन सार्वजनिक प्रसारण होने के चलते उसकी सीमाएं भी हैं। 

चूंकि बाजार के दबाव में दूरदर्शन इतना नहीं झुका कि उसकी राष्ट्रीयता की अवधारणा पर सवाल उठाया जा सके, लिहाजा उससे उम्मीदें बरकरार हैं और पीसी जोशी के शब्दों में कहें तो देश को समझने और देखने के लिए एक बार फिर दूरदर्शन पर निर्भरता बढ़ी है जिस सार्वजनिक प्रसारण माध्यम को हम मॉडल के तौर पर मानते-देखते आए हैं, उस बीबीसी पर बेशक सरकार और उसके किसी संस्थान या अंग का नियंत्रण नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय हितों पर उठने वाली खबरों को लेकर उसे भी दबाव झेलना पड़ता है। याद कीजिए इराक हमले को लेकर हुए खुलासे का। इराक पर हमले का आधार तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने व्यापक जनसंहार वाले रासायनिक हथियारों को बनाया था। बाद में पता चला कि इराक के पास ऐसे कोई हथियार थे ही नहीं। इसका खुलासा का आरोप ब्रिटेन के एक वैज्ञानिक विलियम केली पर लगा।

 जिसे बीबीसी ने प्रसारित किया। बीबीसी पर इतना दबाव बढ़ा कि ये खबर प्रसारित करने वाले संवाददाता समेत बीबीसी के महानिदेशक तक को इस्तीफा देना पड़ा। इन अर्थों में देखें तो कोई सार्वजनिक प्रसारण पूरी तरह से स्वायत्त या पूरी तरह से नियंत्रण मुक्त नहीं हो सकता। दूरदर्शन शायद यह तथ्य समझता है। लेकिन राष्ट्रीय संपत्ति से संचालित होने के चलते राष्ट्रीय प्रतिबिंब बनना उसका पहला दायित्व होना चाहिए। राष्ट्र के स्पंदन पर भी उसकी नजर होनी चाहिए और राष्ट्र क्या बोल रहा है, उसके जरिए पता लगना चाहिए। पीसी जोशी कमेटी ने भी स्वायत्तता को बरकरार रखने की वकालत इन्हीं संदर्भों में की थी। क्योंकि अक्सर सत्ताधारी दल सार्वजनिक प्रसारण माध्यमों को अपना भोंपू बना लेते हैं। सार्वजनिक प्रसारक के संचालक अफसर भी चूंकि उसी नौकरशाही व्यवस्था से आए हुए होते हैं, लिहाजा वे सत्ताधारी दलों के सामने सरेंडर करने से नहीं हिचकते। 

निश्चित तौर पर तब राष्ट्र का प्रतिबिंब नहीं झलकता, तब राष्ट्र की बजाय एक अंग और एक छोटा सा हिस्सा ही बोलता नजर आता है। सूचना क्रांति के दौर में जब सूचनाएं कई स्रोतों से आ रही हैं, आम जनता के लिए यह पता लगाना आसान है कि क्या सच है और कितना एकांगी या सर्वांगी है। सार्वजनिक प्रसारक को यह चुनौती समझनी होगी। तभी जाकर वह सही मायने में राष्ट्र का प्रतिबिंब बन पाएगा।

24 September 2013

क्या देशहित के खिलाफ है सोशल मीडिया ?

मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बुलाई गई राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए सोशल मीडिया को आड़े हाथों लिया। उनका कहना था कि सोशल मीडिया का जिस तरह प्रयोग होना चाहिए वैसे नहीं हो पा रहा है। प्रधानमंत्री का कहना था कि युवाओं के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटें जानकारियां प्राप्त करने और उन्हें साझा करने का अच्छा माध्यम साबित हो सकती हैं लेकिन इसका प्रयोग इस दिशा में नहीं हो पा रहा है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उठी यह चर्चा कोई आज की बात नहीं है हर बार यही देखा जाता है कि जब भी कोई घटना घटित होती है तो उससे संबंधित चर्चाएं फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर आम होने लगती हैं। 

दिल्ली गैंग रेप केस हो या फिर मुजफ्फरनगर में हुए दंगे, हर बार यही देखा जाता है कि कई बार सोशल नेटवर्किंग साइटों पर डाली गई जानकारियां व्यवस्थित माहौल को बिगाड़ने लगती हैं और समाज में एक अजीब से तनाव को जन्म दे देती हैं। महिलाओं की सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव दो ऐसे मुद्दे हैं जिस पर सोशल नेटवर्किंग साइटों पर होने वाली पोस्ट सबसे ज्यादा प्रभाव डालती हैं। हमारा समाज बहुत संवेदनशील है और कोई भी नकारात्मक या भ्रामक जानकारी समाज के लिए खतरा पैदा कर सकती है। ऐसे हालातों के मद्देनजर सोशल नेटविंग साइटों पर नियंत्रण और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी उनकी भूमिका को लेकर एक बहस शुरू हो गई है।

लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सोशल नेटवर्क सबसे ज्यादा उपयोगी साबित होता है। जहां तक महिलाओं का मसला है तो ऐसी साइटों के माध्यम से वह अपने अधिकारों से संबंधित जानकारियां हासिल कर सकती हैं, अपनी बात अन्य लोगों को बता सकती हैं। वहीं दूसरी ओर इन सभी साइटों की ही वजह से आमजन अपने आसपास घट रही घटनाओं से परिचित होकर उन पर अपनी टिप्पणी कर सकते हैं, उनसे जुड़े पक्षों से अवगत हो सकते है। साथ ही सरकारी क्रियाकलापों और योजनाओं की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। इस वर्ग में शामिल लोग यह भी स्वीकार करते हैं कि हालांकि कुछ शरारती तत्व ऐसे हैं जो शांति व्यवस्था को आहत करने के लिए इन सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रयोग करते हैं लेकिन कुछ चुनिंदा लोगों की वजह से सोशल नेटवर्किंग को नियंत्रित करना सही नहीं है क्योंकि ये वो लोग हैं जो कोई ना कोई माध्यम ढूंढ़कर अपना मकसद पूरा कर ही लेंगे।

इस वर्ग के लोगों का यह साफ कहना है कि बिना नियंत्रण के कभी कोई चीज लाभप्रद नहीं हो सकती। सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्रियों पर कोई निगरानी ना होने के कारण राष्ट्रीय अखंडता पर हर समय खतरा मंडराता रहता है। कभी भी कोई भी व्यक्ति कुछ भी ऐसा संचालित कर सकता है जो सामुदायिक या जातिगत भावनाओं को भड़का सकता है जिसकी वजह से सामाजिक ढांचा लड़खड़ा सकता है। सोशल मीडिया पर नियंत्रण रखने की मांग करने वालों का यह भी कहना है कि निजता का हनन, धार्मिक और सामाजिक भावनाओं को भड़काना, महिलाओं के विषय में भद्दी टिप्पणियां करना अनियंत्रित सोशल मीडिया का बड़ा दुष्प्रभाव है, जिसे दूर सिर्फ सोशल मीडिया को नियंत्रित कर के ही किया जा सकता है।