06 October 2013

लोकतंत्र बनाम राज तंत्र !

चुनाव के दिन हैं। इसलिए मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भले ही यह कह दिया हो किराजा - महाराजा हमेशा से अपनी ही प्रजा को लूटते आए हैं। और वे सोचते हैं राज करना उन्हीं का जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन अब इन राजा-महाराजाओं की नहीं चलेगी।पर, उनकी अपनी ही पार्टी में देश में भी और प्रदेशों में भी राजा महाराजाओं की कोई कमी नहीं है। शिवराज के निशाने पर वहां के राजा दिग्विजय सिंह और महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। लेकिन बात यह है कि राजा महाराजाओं के राजनीति में आने का सिलसिला कोई आज शुरू नहीं हुआ हैं।
 
राज पाट छिन गए, लेकिन इससे राजा महाराजाओं को कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। राजनेता चाहे किसी भी जाति या प्रजाति का हो, पद पर आने और कद के बढ़ने के बाद राजा ही हो जाता है। राजे महाराजे इसी सूत्र को समझकर लोकतंत्र में भी सत्ता में पद पाने के लिए छा गए हैं।  और इतिहास भी गवाह है कि सिर्फ पद पाने की लालसा में उनकी निष्ठा भी बदलती रही। चलिये, सबसे पहले थोड़ा घूम आते हैं राजस्थान के राजनीतिक इतिहास के उस जंगल में, जहां कई राजे रजवाड़े राजनीति के आकाश पर खूब फले फूले, तो कुछ ठिकाने लग गए।  

बात, जयपुर से ही शुरू करते हैं। जयपुर राजघराने की राजकुमारी दीया सिंह के पिता जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह एक जमाने में कांग्रेस में थे। लेकिन 1989 के चुनाव में बीजेपी के गिरधाल लाल भार्गव से वे हार गए। ब्रिगेडियर भवानी सिंह को खिलाफ भार्गव ने खुद को एक टिमटिमाता दीया बताकर उस पूरी चुनावी जंग को ‘... ये लड़ाई है दीए की अब तूफान सेका नारा दिया और जोरदार ढंग से जीत गए। उसके बाद भवानी सिंह ने कभी टिकट तक नहीं मांगा। और गिरधारी लाल भार्गव, ‘जिसका कोई न पूछे हाल, उसके संग गिरधारीलालके नारे देकर हर चुनाव जीतते हुए जब तक जिये, जयपुर से सांसद रहे। 

वैसे दीया सिंह की सौतेली दादी राजमाता गायत्री देवी अपने जमाने की बेहद खूबसूरत महिला थीं और चक्रवर्ती राजगोपालाचार् के आग्रह पर राजनीति में आईं और जयपुर लोकसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी की सांसद भी रही। जयपुर में कुछ दिन पहले वसुंधरा राजे की परिवर्तन यात्रा के समापन पर आयोजित रैली हुई थी। बीजेपी की इस रैली में गुजरात के सीएम और देश में पीएम पद के एकमात्र घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी प्रमुख अतिथि थे। उसी रैली में राजकुमारी दीया ने कमल का परचम थामा। माना जा रहा है कि बीजेपी पहले उनको जयपुर में कहीं से विधानसभा का चुनाव लड़वाएंगी। फिर वहां की सीट पक्की करने के बाद जयपुर से लोकसभा के चुनाव में उतारेंगी। यह वही जयपुर लोकसभा की सीट हैं, जहां से 1989 में एक सामान्य कार्यकर्ता भार्गव से उनके पिता भवानी सिंह बुरी तरह हारे थे। नरेंद्र मोदी का करिश्मा कोई काम कर ले तो कर ले, मगर, अपने भलेपन की वजह से जनता में जबरदस्त पैठ बना चुके कांग्रेस के सांसद महेश जोशी के मुकाबले जयपुर की जनता राजनीति के अंधेरे में नई नई दीय़ा के उजाले को पसंद कर लेगी, इसकी उम्मीद बहुत कम ही है।

अलवर राजघराने के राजकुमार जितेंद्र सिंह केंद्र में पद के हिसाब से खेल राज्य मंत्री हैं। लेकिन एक प्रशासनिक चूक को अपने फायदे में तब्दील की राजनीतिक सूझबूझ से वे रक्षा राज्यमंत्री भी हैं। हुआ यूं था कि मंत्रिमंडल में फेरबदल के वक्त जयपुर ग्रामीण के सांसद लालचंद कटारिया को भी केंद्र में राज्य मंत्री बनाया गया। प्रशासनिक गलती से कटारिया और जितेंद्र सिंह एक ही राज्य के दोनों सांसदों को रक्षा मंत्रालय का राज्यमंत्री बना दिया गया। जितेंद्र सिंह भागे और रक्षा मंत्रालय का पदभार पहले संभाल लिया। कटारिया लटक गए। सांसद बनने के पहले जितेंद्र सिंह राजस्थान में विधायक थे। 

राहुल गांधी के खास हैं और कुंवर होने के बावजूद लोगों में भंवर जितेंद्र सिंह के नाम से ही जाने जाते हैं। दरअसल, राजाशाही परंपरा में दादा जीवित हो, तो पोता भंवर और उसके पिता को कुंवर का दर्जा प्राप्त होता है। लेकिन जिंतेंद्र सिंह के दादाजी के स्वर्गवास को करीब तीन साल बीत गए, फिर भी लोग उनको लाड़, प्यार और सम्मान से अब भी भंवर साहब के नाम से ही बुलाते हैं। वैसे, उनकी मां महारानी महेंद्र कुमारी बीजेपी से जुड़ी रहीं। इंदिरा गांधी के राज में 1977 में इमरजेंसी में उन्हें 19 महीने तक जेल में ठूंस दिया गया था। इसके वे जनता पार्टी से अलवर में लोकसभा की सांसद भी बनी। लेकिन राजनीति में पद के प्रभावों का रंग ही कुछ ऐसा होता हैं कि अपनी मां को जेल में डालनेवाली पार्टी के पाप को भुलाकर बेटा कांग्रेस के साथ हो जाता है।

मध्य प्रदेश में ग्वालियर के सिंधिया राजघराने की बेटी वसुंधरा राजे राजस्थान की बहू हैं। वे धौलपुर की महारानी हैं और केंद्र में मंत्री से लेकर प्रदेश की सीएम रही हैं। दूसरी बार प्रदेश बीजेपी की अध्यक्ष बनने के बाद वे दूसरी बार सीएम बनने की कोशिश में हैं। वसुंधरा राजे को आमतौर पर प्रदेश में महारानी साहिबा के नाम से जाना जाता है। क्योंकि उनके व्यवहार में विरासत की विभा और आभा दोनों साफ झलकती है। महारानी साहिबा के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़ से दूसरी बार सांसद हैं। लेकिन दो दो बार सांसद रहने के बाद भी राजनीति उनको कितनी आती है, यह कोई नहीं जानता। क्योंकि बीते साढ़े नौ सालों के उनके संसदीय काल में संसद से लेकर सड़क तक स्वतंत्र रूप से काम करके दिखाने और अपने होने को साबित करने के मामले वे अब तक तो कुछ भी नहीं कर पाए हैं।   

राजनीति में पद और कद के लिए इतिहास भुलाने की पुनरावृत्ति होती रही हैं। यहां के राजघराने की कहानी भी कुछ कुछ अलवर जैसी ही है। कोटा के राजकुमार इज्येराज सिंह कांग्रेस से लोकसभा के सांसद हैं। जी हां, वही कांग्रेस, जिसके राज में इमरजेंसी में इज्येराज के पिता कोटा के महाराजा बृजराज सिंह को जेल में डाल दिया गया था। बृजराज सिंह स्थापना के साथ ही जनसंघ से ड़े थे। लेकिन जेल से निकलने के बाद उन्होंने आस्था बदल दी, कांग्रेस में शामिल हो गए। राजनीति में लोग अकसर अपने साथ हुए का बदला लेते हैं, लेकिन महाराजा बृजराज सिंह बदल गए, तो प्रजा ने उनसे बदला लिया। इमरजेंसी के बाद बृजराज सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन उनके अपने ही साम्राज्य कोटा की प्रजा ने उनको बुरी तरह चित कर दिया। 

अलवर के पास के ही भरतपुर राजघराने के कुंवर नटवर सिंह लंबे समय तक विदेश मंत्री रहे। वे लोकसभा में रहे, राज्यसभा में भी रहे। वहां के महाराजा विश्वेंद्र सिंह इस समय कांग्रेस में हैं। वे पहले बीजेपी थे। उनकी पत्नी महारानी दिव्या सिंह भी भरतपुर से बीजेपी की सांसद रही। वहीं पास के ही डीग के महाराजा मानसिंह विधायक रहे। उन्होंने गुस्से में 1985 में सीएम शिवचरण माथुर के हेलीकॉप्टर पर अपनी जीप चढ़ा दी। पुलिस ने फायरिंग की और वे वहीं मारे गए। उनकी बेटी दीपा भी विधायक रहीं। डूंगरपुर के शासक महारावल लक्ष्मण सिंह सेवतंत्र पार्टी की नेता महारानी गायत्री देवी को कोशिश से राजनीति में आए, राज्यसभा के सांसद रहे और बाद में जनता पार्टी से राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष बने। 

बीकानेर राजघराने के महाराजा कर्णी सिंह 1952 से 1977 तक सांसद रहे। वे कांग्रेस में थे। अब उनकी पोती राजकुमारी सिद्धि कुमारी बीकानेर से बीजेपी की विधायक हैं। उदयपुर के महाराणा भगवत सिंह भी विश्व हिंदु परिषद के जरिये राजनीति किया करते थे। अब उदयपुर राजघराने में बहू के रूप में आनेवाली बोलांगीर की राजकुमारी राजनीतिक परिवार की निवृत्ति कुमारी के मेवाड़ आने से पहले ही वहां दीये जलने लगे हैं। वे बीजेपी में हैं।

राजस्थान सहित देश की राजनीति में राजपरिवारों का आना कोई नई बात नहीं हैं। इन सिद्ध और प्रसिद्ध और राजघरानों के अलावा भी कई छोटे मोटे राजा महाराजा भी राजनीति में थोक के भाव आते रहे हैं। वक्त के हिसाब से छाते रहे हैं और प्रदेश से लेकर देश की सत्ता तक में पद भी पाते रहे हैं। पद के बारे में तो यूं भी अकसर कहा ही जाता रहा है कि वह तो बेचारा पैदाइशी रूप से राजपरिवारों का गुलाम रहा है। पदों की परंपरा की शुरूआत ही राजपरिवारों से होती रही है।

 इसीलिए राजे रजवाड़े खत्म हो गए, तो पद पाने की लालसा राजघरानों को राजनीति में लाती रही है। राजनीति में प्रभावशाली पद, उन पदों पर राजघराने के लोग और उन लोगों की राजनीति के रंग राजस्थान के रजवाड़ों को अपनी तरफ खींचते रहे हैं, राजनीति को भी हमेशा से सुहाते रहे है, जनता को भी वे भाते रहे हैं और राजपरिवारों से आए लोग पद पाते भी रहे हैं। राजशाही चली गई, पर पद की लालसा में राजनीति के प्रति रजवाड़ों का मोह वक्त के साथ और मजबूत हुआ है, यह साफ है।

और अब सपा के भीतर कुशवाहा कांड !

तब भाजपा के भीतर कुशवाहा कांड हुआ था जिसके बाद मीडिया ने बड़ी हायतौबा मचाई थी और आखिरकार भाजपा को भीतर आये बाबू सिंह कुशवाहा को बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा था। अब सपा के भीतर भी एक कुशवाहा कांड चल रही है। उन्हीं कुशवाहा के भीतर आने को लेकर पार्टी के भीतर मौजूद कुशवाहा को बाहर कर दिया गया है। समाजवादी पार्टी के महासिचव राम आसरे कुशवाहा को समाजवादी पार्टी ने महासचिव पद से हटाते हुए उन्हें दी गई लालबत्ती भी वापस ले ली है। हालांकि कुशवाहा के खिलाफ यह कार्रवाई अनुशासन के नाम पर की गई लेकिन बात सिर्फ अनुशासन भर की नहीं है। अंदर की कहानी कुछ और है।
 
एक अक्टूबर को सपा के महासचिव और प्रवक्ता ने कुशवाहा को पहले संगठन के राष्ट्रीय महासचिव के पद से बर्खास्त किया फिर मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव ने सुदूर संवेदन उपयोगिता केन्द्र (रिमोट सेंसिंग) के उपाध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया। रामआसरे कुशवाहा को समाजवादी पार्टी से बर्खास्त करने के पीछे भले ही कहा गया हो उनका बडबोलापन जिम्मेदार है क्योंकि वे लगातार मीडिया (खासकर टीवी चैनलो पर) पार्टी का पक्ष रखने में सबसे आगे रहते थे लेकिन यह तथ्य उनकी बर्खास्तगी के पीछे का असल कारण नहीं है। असल कारण कुछ और ही निकल करके सामने आ रहा है। 

पार्टी के मौजूदा कुशवाहा को किनारे करने के पीछे का असल कारण कोई और नहीं बल्कि वही बाबू सिंह कुशवाहा हैं जिनका कुनबा अब सपा में शामिल हो चुका है। कहा जा रहा है कि रामआसरे कुशवाहा के इशारे पर उनके सर्मथक एनआरएचएम घोटाले के आरोपी बाबूसिंह कुशवाहा के कुनबे का न केवल विरोध कर रहे है बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं के इस कदम को लेकर खुलेआम आलोचना भी कर रहे है। यही बातें पार्टी की ओर से कार्यवाही की बड़ी वजह भी बताई जा रही है। यह भी बताया जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव ने जब बाबू सिंह कुशवाहा के परिवार को शामिल कराया तो रामआसरे कुशवाहा से कोई मशविरा नही किया गया जो राम आसरे कुशवाहा को बेहद नागवार गुजरी थी।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्य मंत्री का दर्जा पाए राम आसरे कुशवाहा ने पार्टी द्वारा उन्हें सरकार और संगठन से अचानक हटाए जाने पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है कि वह जल्दी ही पार्टी प्रमुख मुलायम यादव से भेंट कर पूछेंगे कि आखिर उनका कसूर क्या है। उन्होंने धमकी भरे अंदाज में कहा कि प्रदेश में नौ प्रतिशत के करीब कुशवाहा समाज की आबादी है, जो यादव समाज से कही अधिक है और इससे उनके समाज को काफी धक्का लगा है। समाज के लोग बुरी तरह से आहत हैं।

कुशवाहा ने अचानक पार्टी के संगठन और सरकार से बर्खास्त किये जाने से वह बहुत निराश और हताश हैं। वे कह रहे हैं कि पूरे प्रदेश से कुशवाहा समाज के लोग मुझसे मिलने आ रहे हैं। मैं नेताजी मुलायम का एक वफादार सिपाही था और पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को कुशवाहा समाज का वोट दिलाने में पार्टी की काफी मदद भी की थी। कुशवाहा कहते है कि प्रदेश में नौ प्रतिशत कुशवाहा वोट.हैं और कुशवाहा, मौर्य और सैनी उपनाम लगाते हैं, यह समाज यादव समाज के सात प्रतिशत वोट से कहीं अधिक है। पूरा समाज मेरे कारण पार्टी से जुड़ा था अब सब अपने को आहत और ठगा हुआ महसूस कर रहे है। 

वे कहते है कि अभी तो मैं समाजवादी पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता हूं। भविष्य में क्या होगा इस बारे में अभी मै कुछ नहीं कह सकता हूं। कुशवाहा ने 1990 से कांग्रेस कार्यकर्ता की हैसियत से अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया था। लेकिन बाद में पाला बदल कर वह बहुजन समाज पार्टी में आ गए और 1995 में उन्होंने बसपा के टिकट पर कानपुर देहात जिले की सरसौल विधानसभा सीट से विधायक बन गए। वह कुछ दिन भारतीय जनता पार्टी में भी रहे और राम प्रकाश गुप्ता के कार्यकाल में भाजपा की तरफ से प्रदेश सरकार में मंत्री भी बने। बाद में वह भाजपा से भी हटा दिये गए और 2009 में समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह के संपर्क में आकर सपा में शामिल हो गये और तब से अब तक यही थे।

वैसे कहा यह भी जा रहा है कि कैबिनेट मंत्री का दर्जा पाए समाजवादी पार्टी के नेता राम आसरे कुशवाहा मेरठ में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर अपने सहयोगियों के साथ शराब सेवन करते पाये गये थे। मंत्री जी के नाम पर सर्किट हाउस का कक्ष संख्या तीन आरक्षित था लेकिन रात के समय उन्होंने कक्ष संख्या चार व पांच भी खुलवा दिए। अगले दिन शनिवार को सुबह 11 बजे जब उन्होंने सर्किट हाउस छोड़ा तो सर्किट हाउस स्टाफ ने बकायदा इन तीन कक्षों की एंट्री मंत्री जी से रजिस्टर में कराई। 

उनके स्टाफ द्वारा मौज मस्ती किए जाने का मामला इतना तूल पकड़ गया कि सपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं सांसद राम गोपाल यादव के आदेश पर जिला अध्यक्ष जयवीर सिंह ने पूरे मामले की रिपोर्ट उन्हें व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भेज दी है। लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता एमएम निसार ने भी अपने स्तर से स्टाफ से पूरी रिपोर्ट मांगी है। उधर राम आसरे कुशवाहा ने भी इस मामले मे सफाई दी थी कि सर्किट हाउस में ऐसा कुछ भी नही हुआ है जैसा कि तूल दिया जा रहा है।

तो अब जेल में राजनीति पढ़ाएंगे लालू !

पांच साल की सजा पा चुके लालू प्रसाद यादव के लिए अब रांची की बिरसामुण्डा सेन्ट्रल जेल नया ठिकाना होगी। बिहार और देश में अपने तरह की राजनीति सिखानेवाले लालू यादव जेल में भी राजनीति का ही पाठ पढ़ायेंगे। देश को राजनीति का पाठ पढ़ाने पर भले ही उन्हें जेल नसीब हुई हो लेकिन यहां रोजाना के हिसाब से उनके खाते में 25 रूपये जुड़ेंगे। जेल के सुपरिटेण्डेन्ट वीरेन्द्र कुमार सिंह के अनुसार उनकी अवस्था को देखते हुए उन्हें यही काम करने के लिए दिया गया है। 

चारा घोटाला के एक मामले में पांच साल की सजा पाए आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव अब बिरसा मुण्डा जेल के कैदी नंबर 3312 हैं। लालू यादव कैदियों को राजनीति शास्त्र और मैनेजमेंट का ज्ञान देंगे। लालू को उनकी मर्ज़ी से ये काम दिया गया है। गौरतलब है कि लालू यादव ने पटना के बिहार नैशनल कॉलेज से राजनीतिशास्त्र में डिग्री ली थी। बाद में उन्होंने पटना लॉ कॉलेज से अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की थी। हालांकि, लालू की क्लास कब और कहां लगेगी यह अभी तय नहीं है।

बिरसा मुण्डा जेल में इस वक्त कुल 3000 के करीब सजायाफ्ता कैदी हैं जिसमें कुछ सजायाफ्ता तो कुछ का मामला अदालतों में विचाराधीन है। बिरसामुण्डा जेल में बंद कैदियों में करीब 200 कैदी ऐसे हैं जो इंटरमीडिएट परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो 100 कैदी ग्रेजुएट होने जा रहे हैं। 50 कैदी ऐसे हैं जो पोस्ट ग्रेजुएट की परीक्षा में बैठेंगे। लालू यादव क्योंकि खुद राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी और राजनीति के ही खिलाड़ी रहे हैं इसलिए वे विद्यार्थियों को सैद्धांतिक और व्यावहारिक राजनीति की पाठशाला लगाएंगे।

लालू यादव इससे पहले भी कई बार जेल जा चुके हैं। छात्र आंदोलन के समय में भी वे दो साल जेल रह चुके हैं तो जयप्रकाश नारायण आंदोलन में भी वे डेढ़ साल जेल में थे। चारा घोटाले में भी वे डेढ़ साल के करीब जेल में गुजार चुके हैं लिहाजा उन्हें जाननेवाले उनके करीबियों का कहना है कि लालू जेल में समय बिताना जानते हैं। हालांकि इस बार जब वे जेल गये हैं तो उनकी उम्र 67 की हो चुकी है। जाहिर है जवानी की जेल यात्रा ने अगर लालू को नित नई उचाईंया दी तो बुढ़ापे की यह जेल यात्रा उनके और उनकी राजनीति दोनों के लिए तकलीफदेह ही साबित होगी।

हिंदुत्व बनाम सकारात्मक सोच का शौचालय !

रेजीमेंटड सोच से आप शौचालय की अहमियत नहीं समझ सकते। आपकी समझ सांचे में ढली होती है। इस सांचे का परिसीमन आपका नहीं, आपके अफसर का बनाया होता है। परिसीमित सांचे को आप कभी मर्यादा, कभी धर्म, तो कभी अफसर का आर्डर कहते हैं। इसके पालन के बंधन में बंधे रहने को अभिशप्त होते हैं। कुछ भी समझते या सोचते वक्त आप पर परिसीमन हावी रहता है। सांचे के उल्लंघन को पाप समझते हैं और इसके खतरे से बचने के लिए अतिरिक्त सतर्कता और सावधानी बरतते हैं। इसलिए आप ना तो कांशीराम की सच्चाई को समझते हैं, ना जयराम रमेश के कहे पर पतियाते हैं, ना विद्या बालन आपको समझा पाती है और मोदी तो आपके गुस्से को आसमान पर पहुंचा देते हैं।

रेजीमेंटेड सोच के हैं, तो शौचालय की जरूरत समझते हुए भी कह नहीं सकते। सच बता नहीं सकते कि शौचालय आपकी पवित्रता का अहम आधार है। क्योंकि इस सच के आख्यान से मस्तिष्क में अमर्यादित ठहराए जाने का खतरा मंडरा रहा होता है। आप परवाह नहीं करते कि यह मर्यादा या धर्म आपके परिजीवी होने का निरंतर सबूत देता रहता है। यह कथित मर्यादा या धर्म खुद का बनाया नहीं होता है, बल्कि रेजीमेंट के अफसर की सीख पर आधारित, व्याख्यानित या अफसर के सिपहसलारों की ओर से परिभाषित होता है। इसमें जब भी किसी बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो आप खुद बदलने का विवेक गंवा चुके होते हैं।नीर-क्षीर विवेकको अभ्यास में लाना गलत समझते लगते हैं और मिलावटी दूघ पीकर सबसे ताकतवर होने का भ्रम पालने लगते हैं। इस रेजीमेंटड सोच की शिकार में इस्लामी आंतकवादी से लेकर नक्सलवादी और कट्टरपंथी संघी समान रुप से शामिल हैं।

यह कथित तौर पर घोर धार्मिकता का दोष है । संशोधन या बदलाव के लिए रजीमेंट के अफसर की तरफ भागते हैं। अफसर नहीं मिलता है, तो सिपहसलार से मदद लेते हैं। फिर भी समाधान नहीं निकलता है , तो आप अफसर की बताई बातों को सीमित दृष्टांत से परिभाषित करने लगते हैं। भूल जाते हैं कि इस वैचारिक आचरण की वजह से आप परजीवी जैसा हो जाता है। प्रकृति ने मनुष्य में स्वजीवी बने रहने की तमाम संभावना दे रखी है। इसका अहसास मर जाता है।

स्वजीवी की सोच सहज होती है। सहज सोच से शौचालय की जरूरत को बयां करने में दिक्कत महसूस नहीं होती। सोचते वक्त आपके जेहन में कोई अफसर नहीं अटकता है। बल्कि स्वतंत्रता से जरूरत को परख लेते हैं। आडंबर से दूर ले जाने की ताकत हासिल कर लेते हैं। रेजीमेंटेड और सहज सोच में मौलिक फर्क है। बचपन का दृष्टांत याद आ रहा है। एयरफोर्स स्टेशन के अफसर क्वाटर्स में छुट्टियां बिताने का मौका मिला करता था। हम सिविलियन थे। सो हर आने जाने और मिलने वाले हमतुरिया अजीब सी निगाह से देखा करते। हिलने मिलने की अतिरिक्त पहल करने पर टका सा जवाब मिलता कि तुम सिविलियन हो। विभेद समझकर मन कचोटता। इस हीनभावना को दूर करने के लिए ही एक समय शिद्दत से सेना की नौकरी पाने के लिए मेहनत की। पर अपने खाते में सिविलियन ही बने रहना था, सो बना रह गया।
 
सैन्य अफसर और सिपाहियों के बीच सुनहरा वक्त बिताने के और भी कई मौके मिले। हमने पाया कि सिविलियन की चर्चा में व्यापक होती है। राष्ट्र से इतर अमेरिका, जापान, रुस बिलावजह बातचीत में शामिल होते हैं। वितांड ब्रह्मांड की चर्चा होती है। जबकि सैनिक की बातचीत हमेशा कंटोलमेंट की गतिविधियों तक फोकस रहती है। रह सहकर वही बैचमेट की बात, बटालियन का जिक्र, कैंटीन की कहानी, मेस की घटनाओ पर ही लंबी चर्चाएं। घर परिवार की बहुत कम बात।

फिर भी सैनिक के सीमित साधन में ही बन ठनकर रहने की सफल कोशिश और दुरूह परिस्थिति में बने रहने की तैयारी प्रभावित कर रही। कठिन मेहनत के बाद अपराह्न घर लौटते वक्त सेना के लोग दुनियादारी के बजाय शाम की पार्टी के ड्रेस पर सोचते हैं। मेडल के जरिए एकदूसरे को पछाडने के लिए कमरतोड़ अंदरूनी होड मचाए रखते हैं। उनका प्रतिस्पर्धात्म जिंदगी जानदार होती है। उनमें रैंक के आधार पर किसी भी पल बडे को छोटा और छोटे को बडा मान लेने की सहजता होती है। उनके स्मार्टनेस का प्रतीक है कि मिलने पर झटके से एकदूसरे को पुरानी पोस्टिंग, पुराने दृष्टांत से याद करने की शानदार अदावत सबको लुभाती है। हमें यह भी लगा कि घनघोर प्रशिक्षण आधारित उनके दिमाग को कंटोलमेंट से बाहर की दुनिया तक विस्तारित होने से रोका जाता है। निगेटिविटी से बचने के लिए सिस्टम के करप्शन पर चर्चा से बचना उनकी आदत में शुमार है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद जब वो सहज संसार के सामने होते हैं, तो व्यवहारिक समस्याओं का सामना कर रहे होते हैं।

राष्ट्र के लिए मरने खपने पर आमदा सेना के रेजीमेंटेड दिमाग की बात कुछ हद तक ठीक है। देश की जरूरत और राष्ट्र की रक्षा के लिए सेना के रेजीमेंट में रहने और सोच को उस अनुरूप ढालने और बनाए रखने की जरूरत और मजबूरी दोनों ही समझी जा सकती है। लेकिन उन छद्म सैनिकों को क्या कहेंगे? जो सिविलियन संसार रहते हुए सैनिक होने का भ्रम पाल लेते हैं। फिर दिग दिगंत को अपने परिसीमित सांचे में ढालने में शिद्दत से लगे जाते हैं। यकीन मानिए रेजीमेंडेट सोच में सहजता आ ही नहीं सकती।

जो दुनिया को कंटोलमेंट में बदलने की सोच बना लेते हैं, वो प्राकृतिक सच्चाई से विमुख रहते हैं। अपने रेजीमेंट प्रमुख के सुझाए रास्ते पर दुनिया को चलाने के लिए उद्वेलित हो जाते हैं और हिंसक हिसाब पर उतर आते है। इनका इंसाफ व्यभिचार है। सहज बात है कि विविधता कायनात की पहचान है। इंसान को भिन्न मुंडा, भिन्न मत के सिद्धांत पर करीने से कसा गया है।

पूरी दुनिया को कंटोलमेंट में तब्दील करने की जिद से इंसानियत को नुकसान हो रहा है। इसका विस्तार समस्त सभ्यताओं को हमशक्ल, हम परिधान, हम पोशाक और हमजैसा बनाने पर आमदा जिद है। इस जिद ने इंसान को रक्त पिपासु बना दिया है। इसे एक्सट्रीमिज्म कहा जाता है। इस्लाम, संघ परिवार, नक्सलवाद या फिर रंगभेद से पैदा हुआ एक्सट्रीमिज्म का यह विष प्रकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांत के विरूद्ध है। इस सच के खिलाफ है कि एक एक्सट्रीमिज्म को दूसरा एक्सट्रीमिज्म कभी रास्ते पर नहीं ला सकता है।

यह वैसा ही है जब आपस में लड़ रहे लोग जोर जोर से बोलते हैं, तो सार्थक आवाज निरर्थक बन जाती है। आवाज जबतक मद्धिम नहीं पडती या तबतक आवाज की निरर्थकता बनी रहती है। दूसरा यह कि अपनी आवाज जोर से कहकर मनवा लेने का भ्रम कभी स्थायी हो ही नहीं सकता। क्योंकि इससे आवाज की कर्कश से कर्कशतम होने जाने रास्ता बनता है। इंसानियत को पटरी से उतार देता है। उग्रता आपको प्रकृति विरोधी बनाने को आतुर कर देती है। आप स्वभाव से कुछ करने को तैयार ही नहीं होते। परभाव के पराधीन होते चले जाते हैं। इसलिए नैसर्गिक क्रिया से निवृति का काम आपको छोटा और ओछा लगने लगता है।

रेजीमेंट का अफसर आपके मस्तिष्क में देवालय की अहमियत को इस कदर भर देता है कि आप सच से मुंह चुराकर झूठ के संसार को बनाए रखने के लिए उद्वेलित रहते हैं। देवालय को शौचालय से ज्यादा महत्व देने का ढोंग पाल लेते हैं।