28 September 2013

राजमहल में राजवंश की घबराहट के मायने !

जब से नरेन्द्र मोदी के पक्ष में एक लहर सी चल निकली है और भारतीय जनता पार्टी ने भी लोकमत का सम्मान करते हुये, लोकसभा के आगामी चुनावों में मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, तब से सोनिया कांग्रेस के भीतर खलबली मच गई है। राजमहल और राजवंश दोनों ही सकते में हैं। 1947 में अंग्रेज़ों के भारत से चले जाने के बाद शायद इस राजवंश को पहली बार भारतीयों की ओर से संगठित रुप से इतनी बड़ी चुनौती मिली है। राजमहल की घबराहट समझ में आ सकती है लेकिन उससे भी ज़्यादा घबराहट राजमहल में मौजूद दरबार में देखी जा सकती है।
 
घबराहट में संतुलन खोने और दरबारियों की स्तरहीनता के उदाहरण भी सामने आने लगे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे की पिछले दिनों ऐसी ही अमर्यादित भड़ास देखने में आई। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर उन्होंने हिकारत से कहा कि आजकल कोई भी रामू , शामू या दामू अपने आप को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार कह सकता है। मीडिया ने शिन्दे के इन कीमती विचारों पर बहस करवाना ज़रुरी नहीं समझा, जबकि तथाकथित राष्ट्रीय चैनल, स्त्रियाँ बाल लम्बे कैसे करें, जैसे विषय पर भी दो दिन तक बहस करवा सकते हैं। क्योंकि ये उदगार देश के गृहमंत्री के हैं, इसलिये इसका नोटिस लिया जाना ज़रुरी है। वैसे भी ये उदगार राजमहल और राजवंश के अन्दर चल रहे चिन्तन और दरबारियों में पैदा हो रही बदवहासी का नमूना तो हैं ही। इससे राजवंश की भविष्य की रणनीति का संकेत भी मिलता है।

शिन्दे जिन को रामू, शामू या दामू कहते हैं, वे कौन लोग हैं? दरअसल वही भारत की आम जनता है। वही आम जनता जिसने महात्मा गान्धी के नेतृत्व में अंग्रेज़ी साम्राज्य के खिलाफ लड़ाई ही नहीं लड़ी थी बल्कि उसे परास्त भी किया था और राजवंशों को ध्वस्त किया था। इन्हीं रामू, शामू और दामुओं के बलबूते हिन्दुस्तान में लोकतंत्र स्थापित हुआ। भारत की इसी सम्मिलित शक्ति ने साम्राज्यवाद, सामंतवाद और राजवंश तीनों को ही समाप्त किया। एक हज़ार की ग़ुलामी के बाद, देश में सचमुच रामू, शामू और दामू का लोकतंत्र स्थापित हुआ। पंजाब में छठे दशक में एक गीत प्रसिद्ध हुआ था, हुण राजे नीं जमदे रानियाँ नूं। जिसका अर्थ है कि अब राजा किसी रानी के पेट से जन्म नहीं लेता है। अपना राजा रामू, शामू ख़ुद चुनते हैं और वे ख़ुद राजा बन भी सकते हैं। लेकिन जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा है कि किसी भी थीसिस के भीतर जल्दी ही उसका एंटी थीसिस पनपने लगता है, वैसा ही भारतवर्ष में लोकतंत्र के साथ हुआ। 

लोकतंत्र के भीतर एक राजवंश विकसित होने लगा। छह दशकों में ही उस राजवंश ने लोकतंत्र की आत्मा को निगल लिया और केवल उसकी बाहरी दीवारें बची रहीं। यह राजवंश नेहरु राजवंश है । इसी को नेहरु गान्धी राजवंश कहा जाने लगा । यही राजवंश परिवार के दोनों मर्दों की मौत के बाद सोनिया के नाम से जुड़ गया और अब युवराज के राजतिलक के शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहा है। जो कांग्रेस पार्टी कभी महात्मा गान्धी के नेतृत्व में एक जनान्दोलन बन कर देश के रामू शामू की पार्टी बन गई थी, वह भी धीरे धीरे राजवंश के दरबार में बदल गई।

कांग्रेस की ओर से गैर गांधीवादी परिवार के प्रधानमंत्री रह चुके नरसिम्हाराव ने इस स्थिति पर बहुत ही सटीक टिप्पणी की थी। जिन दिनों वे प्रधानमंत्री थे, उन दिनों अनेक वरिष्ठ कांग्रेस जन विद्रोह कर रहे थे। किसी ने राव से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लोगों की नेहरु गांधी राजवंश के किसी भी व्यक्ति के नेतृत्व में काम करने के लिये मानसिक रुप से कंडीशनिंग हो चुकी है, उस परिवार से बाहर के किसी भी व्यक्ति के साथ वे काम करने को अपनी तौहीन मानते हैं। सुशील कुमार शिन्दे की वर्तमान टिप्पणी को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है।

इतिहास का एक चक्र पूरा हुआ। अब दूसरे चक्र की घडघडाहट सुनाई देने लगी है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की आम जनता राजवंश को चुनौती देने के लिये घरों से बाहर निकल आई है। नेहरु गान्धी ख़ानदान के राजवंश के षड्यंत्रों से देश की आम जनता के मन में एक गहरा अवसाद छाने लगा था। पूरी व्यवस्था के प्रति निराशा छाने लगी थी। इस अस्थिरता को बढ़ाने में कुछ निहित स्वार्थों वाली विदेशी शक्तियाँ भी सक्रिय होने लगीं थीं। देश के रामू शामू चिन्ता में थे, इतने ताक़तवर राजवंश से पार कैसे पायेंगे? नरेन्द्र मोदी ने देश के जनमानस में विश्वास पैदा किया। उनके आत्मविश्वास को जागृत किया। वे यह सब कुछ इसलिये कर सके क्योंकि वे स्वयं भी उन्हीं में से एक हैं। वे आम भारतीय के सुख दुख को केवल समझते ही नहीं बल्कि स्वयं उसी का हिस्सा हैं। मोदी ने गुजरात में जो किया उसकी पूरे देश में मिसाल दी जाने लगी।

पूरा देश, ख़ासकर युवा पीढ़ी, जिसका वर्तमान राजनैतिक स्वरुप से मोहभंग होने लगा था , मोदी में एक नई आशा के दर्शन करने लगा । मोदी ने देश को केवल वाक् चातुर्य से सम्मोहित नहीं किया बल्कि अपने कर्म कौशल से एक नई कार्यशैली का ठोस उदाहरण प्रस्तुत किया । मोदी का प्रशासन पारदर्शिता का उदाहरण बना। वहाँ कोलगेट स्कैंडलों के भ्रष्टाचार को छिपाने के लिये किसी को सचिवालय से फाईलें चुराने की ज़रुरत नहीं पड़ी।

देश के आगे असली समस्या सोनिया कांग्रेस को हटाने की है। इस राजवंश से देश को मुक्त करने की है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजवंश अपने आप में ही समस्या बन जाते हैं। क्योंकि राजवंश गुज़रे ज़माने में जीते हैं और उसी आइने से देश को देखते हैं। राजवंशों के लिये देश के लोग प्रजा होते हैं। जबकि लोकतंत्र में देश के रामू शामू देश के भाग्य निर्माता होते हैं। अब जब भारत इतिहास के उस मोड़ पर आकर खड़ा है, जहां से वह इक्कीसवीं शताब्दी में विश्व शक्ति बन सकता है और दुनिया के देशों को नैतिक और सांस्कृतिक नेतृत्व प्रदान कर सकता है, तब कांग्रेस का आवरण ओढे खडा राजवंश देश की गति के पैरों में जंजीर बन रहा है।

 इक्कीसवीं सदी में भारत का नेतृत्व कोई राजवंश नहीं कर सकता, यह नेतृत्व देश के लोक को ही करना होगा। यह नेतृत्व यहां के रामू शामू को ही करना होगा। नरेन्द्र मोदी भारत के उसी लोक के प्रतिनिधि हैं। ऐसे हालत में नरेन्द्र मोदी के साथ जब पूरा देश उत्साह में आगे बढ़ने का संकल्प ले रहा हो तो दरबारियों का भयभीत होना समझ में आता है। ज़ाहिर है दरबारियों की निष्ठा राजवंश के साथ होगी तो ग़ुस्सा भारत के सामान्य जन को लेकर ही होगा। कांग्रेस से राजवंश बनने की लम्बी प्रक्रिया ने ग़ुस्से की इस परम्परा को जन्म दिया है।

27 September 2013

वह कश्मीर जो कांग्रेस का नहीं है !

राजनीतिक उठापटक और जीत हार की जद्दोजहद जब राष्ट्रीय हितों को प्रभावित करने लगे तो क्या कहना चाहिए? राष्ट्र संकट में है। कश्मीर के हवाले से अगर इसी दिशा में सोच विचार करें तो सचमुच राष्ट्र संकट में है। केन्द्र की कांग्रेस सरकार द्वारा बीते एक साल में दो ऐसी गंभीर और मूर्खतापूर्ण काम किये गये कि कश्मीर एक बार फिर संकट का कारण बनता जा रहा है। अफजल गुरू की फांसी और जनरल वीके सिंह के सीक्रेट फण्ड के खर्च का खुलासा। कांग्रेस की केन्द्र सरकार द्वारा उठाये गये ये दो ऐसे मूर्खतापूर्ण निर्णय हैं जो भाजपा को कमजोर करने के लिए लिये गये लेकिन इसका असर यह हुआ कि कश्मीर में भारत कमजोर हो गया।
 
दिल्ली में अफजल गुरू को फांसी भले ही राष्ट्रद्रोह के खिलाफ किसी आक्रमण को शिकस्त साबित की गई हो लेकिन हकीकत यह है कि अफजल गुरू की फांसी ने कश्मीर में फसादियों को नये सिरे से पैर पसारने का मौका दिया वह भी गुरू को गॉड का दर्जा देते हुए। अफजल गुरू के दफन होने के बाद भी उसके दोषी पर कई सवाल बरकरार हैं और हम भारत के लोग भले ही उन सवालों को भूल जाएं वे कश्मीर के लोग उन सवालों को अपने जेहन में कभी दफन नहीं होनें देंगे जिनकी राष्ट्रीयता की परिभाषा भारत के राष्ट्रवाद से बिल्कुल मेल नहीं खाती है। भारत की समूची संसद, सुप्रीम कोर्ट सारा का सारा प्रशासन किसी घटना को अंजाम देने के लिए जो चाहे वह कर सकती है क्योंकि सवाल उसके राष्ट्र की सुरक्षा का होता है लेकिन अगर उस राष्ट्र में कोई जम्मू कश्मीर जैसा राज्य भी शामिल होता है तो लमहों की खता सदियों की सजा बन जाती है।

अफजल गुरू की फांसी के साथ ही कश्मीर में आतंकवाद का जो उफान शुरू हुआ है वह धीरे धीरे तूफान में तब्दील होता जा रहा है। 9 फरवरी को अफजल गुरू को दिल्ली के तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। उससे दो दिन पहले 7 फरवरी को अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने मोहम्मद मकबूल भट की शहादत दिवस पर कश्मीरियों को एक साथ आने की अपील की थी। वही मकबूल भट जिसे 1984 में कुछ उसी तरह तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी जिस तरह से 2013 में अफजल गुरू को दी गई। मकबूल भट की मौत के बाद से ही कश्मीर में आतंकवाद का वह दौर शुरू हुआ जो कमोबेश 2000 तक जारी रहा। मकबूल भट ने भी राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से दया मांगी थी और अफजल गुरू ने भी प्रणव मुखर्जी से दया मांगी थी। दोनों का एक ही तर्क था कि उनके मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई है। अदालत में फेयर ट्रायल नहीं हुआ है लिहाजा उनके साथ रहम किया जाए।

दिल्ली में भले ही कांग्रेस और भाजपा कश्मीर के लिए राष्ट्रवादी आंसू बहाते हों लेकिन हकीकत यह है कि दोनों दल कश्मीर में एक दूसरे से उतनी ही अदावत रखते हैं जितना दिल्ली में। अच्छा होता कि कांग्रेस और भाजपा पहल करके कश्मीर में एक दूसरे से हाथ मिला लेते। अगर कश्मीर की खातिर जम्मू कश्मीर में कांग्रेस और भाजपा मिल जाएं तो कश्मीर समस्या के राजनीतिक समाधान की दिशा में यह मील पत्थर साबित होगा।
 
अभी 11 फरवरी को मकबूल भट के शहादत दिवस पर लोगों के इकट्ठा आने का मौका आता इससे पहले ही 9 फरवरी को दिल्ली की उसी तिहाड़ जेल में अफजल गुरू को फांसी दे दी गई जहां कभी मकबूल भट को दफन किया गया था। एक संप्रभु राष्ट्र के नागरिक होने के नाते अगर हम देंखे तो हमें गर्व होना चाहिए कि हमारी व्यवस्था ने एक आतंकवादी को उसके अंजाम तक पहुंचा दिया। लेकिन यह तो तब जब फैसला कोई आम नागरिक के हाथ हो। जो फैसला करनेवाले लोग थे कम से कम वे इतिहास भी जानते थे और वर्तमान भी। इसलिए उन्हें भविष्य का अंदाजा न रहा होगा इसका अंदाज लगाना मुश्किल है।

फांसी देने से अगर समस्या खत्म हो जाती है तो जरूर दे देनी चाहिए लेकिन फांसी देने से समस्या नये सिरे से शुरू हो जाती हो तो क्या करना चाहिए? भारतीय निति निर्धारकों के गलतियों की प्रयोगशाला बन चुके कश्मीर के लिहाज से देखें तो आतंकवाद को 'सख्ती से कुचल देने' की नीति पर अमल करते हुए अफजल गुरू को फांसी दी गई, क्योंकि उसने भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रतीक भारतीय संसद पर हमला किया था। लेकिन यह नहीं सोचा गया कि कश्मीर की जन संसद में इस फांसी की जो तीखी प्रतिक्रिया होगी उससे हमें ''क्या क्या और कैसे कैसे कुचलना पड़ेगा?''
 
भारत सरकार इस बात को जानती थी इसलिए अफजल गुरू को फांसी और कश्मीर में लंबे वक्त का सख्त कर्फ्यू एक साथ सामने आया। तात्कालिक तौर पर सरकार ने विरोध की आवाज को सख्ती से कुचल दिया और घाटी का गुस्सा घाटी में ही घुटकर रह गया। सर्दियों के बीतने के साथ ही परिस्थितियां सामान्य होती दिखाईं जरूर दी लेकिन अचानक से घाटी के भीतर आतंकी वारदातों का एक नया दौर शुरू हो गया। घुटा हुआ गुस्सा घुट घुट कर बाहर निकलने लगा। जाहिर है इसी मौके की ताड़ में वे अलगाववादी भी बैठे थे जिनकी राजनीति घाटी में हाशिये पर जा चुकी थी और वह पाकिस्तान भी जिसके लिए कश्मीर में अशांति का मतलब पाकिस्तान में शांति है। 

ऐसे में यह कहना तो थोड़ा मुश्किल है कि अफजल गुरू को फांसी न दी जाती तो क्या किया जाता लेकिन यह समझ पाना भी कम मुश्किल नहीं है कि अफजल गुरू की फांसी को हमने रणनीतिक या कूटनीतिक फैसला बनाने की बजाय भावनात्मक फैसला क्योंकर बना दिया? अफजल गुरू की फांसी घाटी में उस फांस की तरह दोबारा अटक गई जैसे मकबूल भट्ट की फांसी से कश्मीर भारत के गले में फांस की तरह फंस गया था। इसलिए अफजल गुरू की फांसी ने भाजपा के खिलाफ सिर्फ कांग्रेस को ही राजनीतिक संजीवनी नहीं मिली, कश्मीर घाटी में कमोबेश खत्म हो चुके आतंकवाद को पनपने का नया बहाना मिल चुका था। मार्च से लेकर सितंबर तक आतंकी घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है और अर्धसैनिक बलों पर आतंकियों के ही नहीं स्थानीय लोगों के हमले भी तेजी से बढ़े हैं।

लेकिन दिल्ली की गद्दी पर दावा मजबूत करने और भाजपा के तथाकथित राष्ट्रवाद को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस ने अकेले अफजल गुरू को फांसी देने की ही गलती नहीं की। कांग्रेस के कुशासन के लिए खतरा बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी नामक उभार को कमजोर करने की हर संभव कोशिशों में एक कोशिश जनरल वीके सिंह को भी घुटने के बल बैठाने की हो रही है। सेनाध्यक्ष रहते हुए जनरल वी के सिंह की सरकार से अदावत जग जाहिर हो चुकी थी लेकिन सेना से रिटायर होने के बाद जनरल की जन सक्रियता कांग्रेस के लिए उससे भी बड़ा कांटा साबित हो रही है। इसलिए यह महज संयोग नहीं हो सकता है कि जनरल वी के सिंह अन्ना हजारे और नरेन्द्र मोदी के साथ मंचों पर नजर आते हैं और अचानक ही कांग्रेस को जनरल में भ्रष्टाचार के तत्व दिखाई देने लगते हैं।

रक्षा मंत्रालय की जिस जांच में जनरल वीके सिंह पर आठ करोड़ के हेराफेरी का दोषी बताया जा रहा है, कथित तौर पर वह पैसा उसी जम्मू कश्मीर में खर्च किया गया जो कमोबेश आज भी सेना की निगहबानी में भारत के पास है। जनरल का कथित भ्रष्टाचार और आठ करोड़ रूपया कोई इतनी बड़ी रकम नहीं थी कि उसका भंडाफोड़ करके ऐसा राजनीतिक खामियाजा भुगता जाता जैसा कि अब सामने आ रहा है।

अभी तक घाटी के अलगाववादी या फिर अलगावादी राजनीतिक दल ही घाटी के राजनीतिक समाधान की बात करते रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि केन्द्र के दो बड़े दल भाजपा और कांग्रेस कश्मीर के राजनीतिक समाधान के लिए आपस में हाथ मिला लें और समूचे देश की राजनीति से अलग जम्मू कश्मीर में स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करें। शायद जम्मू कश्मीर के लिहाज से यह पहल कश्मीर में स्थाई राजनीतिक समाधान की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।कांग्रेस के जिन रणनीतिकारों को जनरल को जमींदोज करने के लिए यह तुरूप का पत्ता चला है वे शायद दूर तक नहीं देख पाये कि इसका कश्मीर की जमीनी राजनीति पर क्या असर होगा। नेशनल कांफ्रेस हो या फिर पीडीपी दोनों ही अर्ध अलगाववादी राजनीतिक दलों की भारत में उतनी ही रुचि है जितनी भारत सरकार की पीओके की पोलिटिक्स में। 

नेशनल कांफ्रेस और पीडीपी की राजनीतिक मजबूरियां हैं कि उन्हें अलगाववादियों के बीच अपनी जगह भी बचाकर रखनी है और सरकार में रहने पर भारत सरकार का हिस्सा भी बनकर रहना है। इसलिए कांग्रेस सरकार के इस खुलासे का सबसे बड़ा फायदा वह नेशनल कांफ्रेस उठा रही है जो राज्य में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चला रही है। कांग्रेस को भी अंदाज नहीं था कि जनरल के पलटवार में जिस मंत्री गुलाम हसन मीर का नाम सामने आ जाएगा वह कांग्रेस के कोटे का मंत्री निकलेगा और जो कश्मीरी आवाम के बीच 'प्रो इंडिया पॉलिटिशियन' की छवि रखता है। नेशनल कांफ्रेस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए कांग्रेस को दबोचने के लिए इससे सुनहरा मौका और क्या हो सकता था? और इस मौके का उपयोग करके उन्होंने कश्मीरी आवाम के बीच यह साबित करने की कोशिश शुरू कर दी है कि वे तो कश्मीर के साथ हैं लेकिन कांग्रेसी नेता सेना के हाथ कठपुतली बने हुए हैं।

साल 2013 में ये दो ऐसी बड़ी घटनाएं हैं जिसने कश्मीर में भारत की स्थिति को कमजोर किया है। सुरक्षा के लिहाज से भी राजनीतिक दृष्टिकोण से भी। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने विषम परिस्थितियों में भी कश्मीर में अलगाववादियों और आतंकवादियों के बीच जो फर्क विकसित किया था, कांग्रेस की दिशाहीन राजनीति ने उस फर्क को खत्म कर दिया है। निश्चित तौर पर यह सब उनसे उसी भाजपा को जवाब देने के लिए किया है जो कश्मीर में अपने तरह के राष्ट्रवाद को थोपना चाहती है। इसलिए कांग्रेस कश्मीर में यह सब शायद इसलिए कर रही है क्योंकि उसकी प्राथमिकता दिल्ली है, कश्मीर नहीं। अगर कश्मीर को कुर्बान करके दिल्ली पर दावा बरकरार रखा जा सकता है, तो इसमें हर्ज क्या है? आखिर अब तक कांग्रेस ने ऐसी ही 'अनगिनत कुर्बानियों' की बदौलत दिल्ली पर अपना दावा बनाकर रखा है। 

रमन राज में मंत्री दमन !

छत्तीसगढ़ सरकार में ऐसा नज़ारा कभी देखने में नहीं आया जब मुख्य सचिव और मंत्रियों के बीच टकराव इस हद तक बढ़ जाए कि मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़े। डॉ.रमन सिंह ने विवादित पक्षों के बीच मध्यस्थता करते हुए यह दावा किया है कि मामला सुलझ गया है लिहाजा न तो मुख्य सचिव हटाए जाएंगे और न ही कथित फर्नीचर घोटाले की जांच होगी। लेकिन मुख्यमंत्री के कहने मात्र से यह समझा जाए कि सब कुछ दुरुस्त हो गया है तथा उभय पक्षों के बीच अब कोई विवाद नहीं है? सही नहीं है। यकीनन इस दावे पर पूरी तरह एतबार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह अंतत: अहम् के टकराव का मामला है। मुख्यमंत्री के समझाने-बुझाने से अंगारों पर भले ही राख पड़ गई हो किंतु भीतर ही भीतर शोले दहकते रहेंगे और इसकी तपिश प्रशासनिक गलियारों में महसूस की जाती रहेगी।

निश्चय ही, मुख्य सचिव सुनील कुमार की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता। वे कर्तव्यनिष्ठ होने के साथ-साथ सख्त भी हैं और गलत बर्दाश्त नहीं कर सकते भले ही सामने कोई भी क्यों न हो। लेकिन व्यवस्था इतनी लचर हो चुकी है कि उनके जैसे अफसर के लिए घुटन महसूस करना स्वाभाविक है। मुख्य सचिव शायद ऐसा ही महसूस करते हैं। इसलिए वे यहां से जाना चाहते थे। एक बार वे ऐसी कोशिस कर भी चुके हैं। पर चूंकि अब उनके रिटायरमेंट में कुछ ही महीने शेष हैं, और अगले तीन महीनो में राज्य विधानसभा के चुनाव भी होने हैं अत: न तो उनकी नई पदस्थापना का प्रश्न है न ही उन्हें केन्द्र में जाने की इजाजत दी जानी है। यानी वे यहां बने रहेंगे। लेकिन इस बीच मंत्रियों खासकर राज्य के कद्दावर मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के साथ उनकी पटरी बैठ पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है। ऐसा लगता है कि अब दोनों सिर्फ संबंधों की औपचारिकता निभाएंगे।

दरअसल दोनों के बीच विवाद पुराना है और जड़ें काफी गहरी। चूंकि मुख्य सचिव स्वच्छ एवं ईमानदार प्रशासन के हिमायती हैं लिहाजा वे अनियमितताओं को सख्ती से रोकने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो कतिपय मंत्रियों को पसंद नहीं आए। संयोग से लोक निर्माण विभाग, स्कूली शिक्षा एवं पर्यटन से जुड़े मामले इस दायरे में आए जो बृजमोहन अग्रवाल के विभाग हैं। चाहे वह स्कूली बच्चों के लिए सायकिल खरीदी का मामला हो अथवा पाठ्यपुस्तक निगम द्वारा कागज खरीदी में घपले की कोशिश का, मुख्य सचिव ने सार्थक हस्तक्षेप किया। गरियाबंद जिले की तेल नदी के पुल के बह जाने के लिए जिम्मेदार इंजीनियरों की बहाली भी दोनों के बीच टकराव का एक कारण बनी। बृजमोहन इस हस्तक्षेप से अप्रसन्न थे। अपनी नाराजगी व्यक्त करने उन्हें तब मौका मिला जब मुख्य सचिव ने एक आरटीआई कार्यकर्ता की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए अपने ही खिलाफ सीबीआई जांच बैठाने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया। आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा केन्द्रीय सतर्कता आयोग को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया था कि स्कूलों के लिए फर्नीचर की खरीदी में धांधली हुई है। सुनील कुमार इन दिनों शिक्षा विभाग में अपर मुख्य सचिव थे।

अंतत: नैतिकता के नाते उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सीबीआई जांच के लिए अनुरोध करना बेहतर समझा। चूंकि मुख्य सचिव का पत्र सार्वजनिक हो गया इसलिए बृजमोहन अग्रवाल को यह कहने का मौका मिल गया कि सुनील कुमार ने पत्र लीक करके अनुशासनहीनता की है अत: उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। मुख्य सचिव के पत्र से जो खलबली मची थी, उसकी परिणति विस्फोट के रूप में बृजमोहन के उस पत्र से हुई जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री से सुनील कुमार को हटाने की अपील की थी।

इस समूचे घटनाक्रम से यदि कोई सबसे ज्यादा परेशान हुए होंगे, तो वह रमन सिंह हैं क्योंकि यह राज्य शासन की छवि का सवाल है, विशेषकर ऐसे मौके पर जब चुनाव नजदीक हों तथा शासन जनता को यह समझाने की कोशिश कर रहा हो कि वह पारदर्शी है तथा जनोन्मुखी भी। विवाद से शासन की छवि को धक्का लगना स्वाभाविक है। फिर भी मुख्यमंत्री ने अपनी ओर से पहल करके मरहम-पट्टी करने की कोशिश की है। उनका नरम-गरम संदेश यानी न तो मुख्य सचिव हटाए जाएंगे और न ही फर्नीचर घोटाले की सीबीआई जांच होगी, यह दर्शाने के लिए पर्याप्त है कि मुख्यमंत्री रहमदिल होने के बावजूद कड़े फैसले लेने में भी सक्षम हैं। उन्होंने बृजमोहन अग्रवाल को आईना दिखाने में संकोच नहीं किया जो उनकी कैबिनेट के सबसे ताकतवर मंत्री माने जाते हैं। सुनील कुमार की अर्जी नामंजूर करके उन्होंने नौकरशाही में आत्मविश्वास जगाने के साथ-साथ आत्मसंयम बरतने का भी संदेश दिया है। यानी उन्होंने अपने मंत्री एवं मुख्य सचिव को यह समझाने की कोशिश की है कि आपसी विवाद के इस तरह उछलने से अंतत: शासन के बारे में लोगों की धारणाएं प्रभावित होती हैं।

इस समूचे घटनाक्रम से बृजमोहन अग्रवाल राजनीतिक दृष्टि से नुकसान में रहे। उन्होंने मुख्यमंत्री पर दबाव बनाने की हर चंद कोशिश की। और तो और उन्होंने कुछ मंत्रियों को भी इस मुद्दे पर सहमत करने का यत्न किया। उन्हें उम्मीद थी कि सामूहिक दबाव काम आएगा तथा मुख्यमंत्री उनके पत्र को संज्ञान में लेंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कैबिनेट में नम्बर दो कहे जाने वाले मंत्री के राजनीतिक जीवन की यह सबसे बड़ी भूल थी। उन्होंने पत्र लिखकर अपने पक्ष को सार्वजनिक कर दिया। वे मुख्यमंत्री को विश्वास में लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकते थे। तत्संबंध में भले ही मुख्यमंत्री का निर्णय अपरिवर्तनीय रहता लेकिन कम से कम बृजमोहन की इतनी किरकिरी नहीं होती। राजनीतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से उनके लिए अब बेहतर यही है कि वे अपने गिले-शिकवे दूर रखकर मुख्य सचिव के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करें। क्योंकि यह अटूट सत्य है कि समय के साथ गहरे से गहरे घाव भी भरने लगते हैं। मुख्यमंत्री भी तो यही चाहते हैं।