27 September 2013

क्या बिहार में साहित्य का बाहुबल सम्मेलन हो रहा है ?

बिहार में पिछले कुछ समय से जिन साहित्यकारों का नाम हो रहा है, जो साहित्यकार चर्चा में रहे हैं, उनमें मुन्ना शुक्ला, पप्पू यादव, आनन्द मोहन का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है। अब जब इस तरह के महान साहित्यकारों की नई पौध बिहार से निकल रही है तो बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन को अब आम साहित्यकारों के भरोसे नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए अजय कुमार सिंह जैसा कोई बाहुबली ही ठीक रहेगा। नीतिश कुमार के इस फैसले की साहित्य जगत चाहे तो आलोचना करे लेकिन इसमें उनकी दूर दृष्टि ही नजर आती है। इस दर्द को मुख्यमंत्री ने ठीक-ठीक समझा, उसके बाद ही अजय को यह जिम्मेवारी सौंपा।

वैसे भी अब राजनीति से कुछ भी अछूता नहीं है। वर्ना ऑस्कर के लिए लंचबॉक्सजैसी उम्दा फिल्म के मौजूद रहते, नेशनल फिल्म डेवलपमेन्ट कॉरपोरेशन की गुजरात पर केन्द्रित फिल्म गुड रोड्स क्यों भेजी जाती? जिसमें गुजरात का रोतू चेहरा है। यहां मंत्री पद से लेकर बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन तक में जागरूक लोगों की जगह मुस्तैद लठैतों को प्राथमिकता मिलने लगी है। यह लोग अधिक सुविधाजनक हैं क्योंकि यह किसी तरह का सवाल नहीं उठाएंगे और उठाना भी होगा तो साहब के लिए लाठी उठाएंगे, जो साहेब के खिलाफ बोलेगा- उनेक सिर पर बजाएंगे।

नीतीश कुमार के लिए साहित्य जगत में अजय कुमार सिंह से बेहतर आदमी कौन हो सकता है? पत्नी कविता नीतीश की पार्टी से विधायक हैं और अब विधायक पति कदकुआं के साहित्य सम्मेलन में प्रवेश कर चुके हैं। प्रवेश करते ही उन्होंने अपनी काबिलियत भी दिखा दी। उन्नीस सितंबर को जब वे साहित्य सम्मेलन में 'पदभार' ग्रहण करने पहुंचे तो लठैतों, बंदूकधारियों को साथ लेते गये थे। हालांकि चुनाव अभी भी नियत समय के अनुसार 5 और 6 अक्टूबर को होने हैं लेकिन अरुण कुमार सिंह का दावा है कि प्रबंध समिति ने उनके नाम पर मोहर लगा दिया है लिहाजा अब निवर्तमान अध्यक्ष अनिल सुलभ को वहां रहने का कोई हक नहीं है। अनिल सुलभ कहते हैं तो कहते रहें कि यह बाहुबली की गुण्डागर्दी है लेकिन अरुण कुमार सिंह ने बिहार के हिन्दी साहित्य की संस्था पर अपना दावा पूरा कर लिया है। भले ही हिन्दी साहित्य में उनका स्वागत न हो लेकिन अब वे एक एकड़ क्षेत्र में फैले बिहार साहित्य भवन के नये मालिक हैं।

बाहुबली अरुण कुमार सिंह जिस तरह से बिहार साहित्य सम्मेलन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं उसके बाद 1919 से कार्यरत यह साहित्य सम्मेलन ध्वस्त हो जाएगा, इसमें कोई दो राय नहीं। बाहुबली ने खुद साहित्य सम्मेलन पहुंचकर निवर्तमान अध्यक्ष का नेमप्लेट उखाड़कर फेंक दिया है। अब माननीय बाहुबली साहित्यकार और माननीय मुख्यमंत्री को एक काम और करना चाहिए। बिहार साहित्य सम्मेलन का नाम बदलकर बिहार बाहुबल सम्मेलन कर देना चाहिए। साहित्य भी बच जाएगा और बाहुबली के शान में कोई गुस्ताखी भी नहीं होगी।
 
हो सकता है बिहार का अतीत हिन्दी साहित्य का गढ़ रहा हो लेकिन बिहार के हर हिस्से में अगर बाहुबल काल है तो अकेले साहित्य इससे अछूता क्यों रहे? नेताजी भी यह बात जानने लगे हैं कि कलम तो घिस कर कोई भी कलम घिस्सू हो सकता है लेकिन लाठी चलाने का जिगरा किसी-किसी के पास होता है।भीड़ हांकने का काम वैसे भी कलम घिसने वाले कहां कर सकते हैं और लोकतंत्र की रैलियों में पर्चे से अधिक भीड़ का महत्व होता है। भीड़ इकट्ठा करने के लिए लाठीवाला ही चाहिए। फिर अरबों की संपत्ति पर कब्जे का सवाल तो हमेशा प्रासंगिक रहता ही है जो किसी कलमघिस्सू के जरिए कब्जा नहीं किया जा सकता। उसके लिए तो अरुण कुमार सिंह जैसे किसी काबिल बाहुबली की ही जरूरत होती है।

मुख्यमंत्रीजी के लिए वैसे भी सत्ता अब भैंस सरीखी हो गयी है, इसलिए वे लाठी को अधिक महत्व देने लगे हैं। सरकार को तो पूरा देश लाठी से चला रहा है लेकिन साहित्य को लाठी से डुगराने का काम बिहार के मुख्यमंत्री ने ही किया है। बिहार के मुख्यमंत्री के खुद की ट्रेनिंग चाहे लाठी की ना हो लेकिन वे लाठी के महत्व को जानते खूब हैं।

पिछले दिनों बिहार के मुजफ्फरपुर की बात है, छुटकन मिश्रा और फायरिंग पासवान में इस बात पर बहस छीड़ गई कि दोनों में अच्छी कविता कौन लिखता है? फैसला के लिए यादव गैंग के पुराने सिपहसालार सफेदी पहलवान बुलाए गए। उनके 16 हत्या और ना जाने कितने दूसरे इरादतन-गैर इरादतन अपराधों की कहानियां पुलिस फाइलों में दर्ज है। सबको एक साथ इकट्ठा कर दिया जाए तो एक मोटा-छोटा उपन्यास ही बन जाए लेकिन इस महान प्रतिभा सफेदी पहलवान की तरफ किसी साहित्यकार की नजर नहीं गई है अब तक। ना ही मुख्यमंत्री ही इन्हें तलाश पाए। पहलवान की प्रतिभा को पहचाना, दो कस्बाई झपटमारों ने।

पहलवान ने पहले मिश्रा की कविता 'कट्टा' सुनी। फिर फायरिंग की कविता 'तोप'। पहलवान का फैसला निष्पक्ष था, चूंकि कट्टे से तोप बड़ी होती है। उसकी मारक क्षमता भी अधिक है, इसलिए तोप, कट्टे के मुकाबले श्रेष्ठ कविता हुई। इस निर्णय के बाद छुटकन मिश्रा का हिन्दी साहित्य में जो कट्टा विमर्श चलाने का सपना था, वह धरासायी हुआ।

वैसे बिहार सरकार के नए फैसले के बाद, छुटकन मिश्रा का सपना फिर से जी उठा है। एक बार हिन्दी साहित्य में कट्टा विमर्श बिहार से ही शुरू हो, फिर कौन जाने कल को दिल्ली के अकादमियों और संस्थानों पर भी सिंह, शुक्ला, यादव का कब्जा हो? फिर कट्टा विमर्श को हिन्दी साहित्य में स्थापित होने में वक्त ही कितना लगना है?

कोल इंडिया का गोलमाल !

क्या दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादन करने वाली कंपनी कोल इंडिया संभावित शेयरहोल्डरों से अपने कोयला भंडार के सच को छिपा रही है? एक गैरसरकारी संस्था द्वारा किये गये अध्ययन में यही तथ्य सामने आया है कि कोल इंडिया अपने पास जितने कोल ब्लाक होने का दावा कर रही है उतने उसके पास है नहीं। इसके बावजूद कोल इंडिया अपने अतिरिक्त शेयर को अन्तर्राष्ट्रीय निवेशकों को बेचने की तैयारी भी कर रही है जो कि संभावित निवेशकों के साथ धोखाधड़ी है। "कोल इंडियाः रनिंग ऑन इम्पटी" रिपोर्ट के अनुसार कोल इंडिया ने अपने आंतरिक आंकलन को शेयर बाजार में जाहिर नहीं किया है जिसमें दिखाया गया है कि 2010 में कंपनी ने जितना निष्कर्षण योग्य कोयला भंडार दिखाया है उससे 16 % कम भंडार ही उपलब्ध है। 

ऐसे में कोल इंडिया अपने निवेशकों के सामने झूठ बोल रहा है जो कि सेबी के नियमों का उल्लंघन है। अभी भी कोल इंडिया अपने वेबसाइट पर दावा करती है कि उसके पास 21.7 बिलियन टन निष्कर्षण योग्य कोयला भंडार है। कंपनी के आंतरिक दस्तावेजों के समीक्षा में  ग्रीनपीस और इंस्टीच्युट फॉर इनर्जी इकोनोमिक्स एंड फाइनेंशियल एनलिसिस ने पाया है कि संयुक्त राष्ट्र रिजर्व वर्गीकरण सिस्टम के अनुसार कंपनी के पास सिर्फ 18.2 बिलियन टन निष्कर्षण योग्य कोयला भंडार ही उपलब्ध है। निर्धारित उत्पादन लक्ष्य के हिसाब से यह भंडार सिर्फ 17 साल में ही समाप्त हो जाएगा।

इसी तथ्य के मद्देनजर ग्रीनपीस इंडिया ने कोयला भंडार के बारे में सही अनुपात को छिपाने के बारे में कोल इंडिया के खिलाफ इंडियन सिक्युरिटी कॉन्ट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट 1956 के तहत  भारतीय शेयर बाजर नियामक के पास आधिकारिक शिकायत दर्ज करवाई है। ग्रीनपीस के आशिष फर्नानडिस ने इन निष्कर्षों पर कहा कि कोल इंडिया अपने निष्कर्षण योग्य कोयले के सच को छुपा कर अपने वर्तमान और संभावित शेयरहोल्डरों को धोखा देने का प्रयास कर रही है। कोल इंडिया का यह कानूनी कर्तव्य है कि वो लोगों को सच बताए लेकिन ऐसा करने में वो असफल रहा है

सुप्रीम कोर्ट के वकील शौनक कश्यप ने कहा कि कोल इंडिया संवैधानिक प्रावधानों को विशेष रुप से सेबी अधिनियम, सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स रेगुलेशन अधिनियम 1956 के तहत सूचीबद्ध करार और सेबी के 3 अप्रैल, 2006 के परिपत्र के अधीन तथ्यों का खुलासा करने का उल्लंघन कर रहा है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अपने भंडार के बारे में सूचित करने में एक सरकारी नियंत्रण की कंपनी असफल रही है, जिसका निवेशकों और बड़े पैमाने पर देश दोनों के लिए गंभीर प्रभाव पड़ता है

कोल इंडिया ने अपने नये शेयर ऑफर को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने के लिए  बैंक ऑफ अमरीका, ड्यूशचे बैंक, गोल्डमैन  सैक्स, क्रेडिट सुइस जैसे दुनिया के बड़े बैंकों के साथ करार किया है जबकि यूनियन द्वारा  शेयरों को बाहर भेजने पर हड़ताल की धमकी भी दी गयी है। वहीं हाल के हफ्तों में कंपनी के शेयर गिरे भी हैं। साथ हीइन बैंकों की भी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है कि कंपनी के भंडार से संबंधित सही तथ्यों को निवेशकों के सामने लाया जाए।

कोल इंडिया के भंडार के बारे में नये आंकड़ों ने सरकार द्वारा कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में निवेश करने की मौजूदा नीति का पालन करने की क्षमता पर भी संदेह पैदा कर दिया है। फिलहाल कोल इंडिया देश का लगभग 80% कोयला उत्पादन कर रहा है और भारत साल 2017 तक 100,000 मेगावाट नये कोयला ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र लगाने की योजना बना रहा है जबकि कंपनी वर्तमान  बिजली संयंत्रों को ही आपूर्ती करने में संघर्ष कर रही है। परिणामतः बढ़ता कोयला आयात भारत के बढ़ते चालू खाते और बढ़ती बिजली दरों में भी भूमिका अदा कर रहा है।

क्या विभाजनकारी है राष्ट्रवादी विचारधारा ?

जबसे भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के क्षितिज पर नरेंद्र मोदी का उदय हुआ है तबसे छद्म सेकुलरवादी धारा ने एक प्रचार शुरू किया है कि उनके प्रधानमंत्री बनने पर देश की एकता और अक्षुण्णता को बरकरार रखना मुश्किल हो जाएगा। छद्म सेकुलरवादियों का यह दुष्प्रचार इतना व्यापक है कि मीडिया में प्रकट होने की क्षमता वाले बैठकबाज बुद्धिजीवी भी बड़े और जटिल शब्दों का प्रयोगकर इस आशंका को बल देने का काम कर रहे हैं।

राहु-केतु से मुक्ति की गारंटी नहीं

जुलाई से सितंबर के बीच संघ परिवार और भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी जिस तरह का विचारमंथन चला उससे नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व की उम्मीदवारी का अमृत निश्चित तौर पर प्रकट हुआ। जब अमृत प्रकट होता है तो उसे चखने के लिए सुर-असुर युद्ध भी छिड़ता है। असुरों की पराजय सुनिश्चित भी मान लें तो राहु-केतु से मुक्ति की गारंटी कोई नहीं दे सकता। सुर-असुर द्वंद्व में सुरों के मन में लक्ष्मी, ऐरावत से लेकर भयंकर गरल तक के पान के पात्र को लेकर कोई संभ्रम नहीं था। समुद्र मंथन से अमृत का प्राकट्य तो हर किसी ने देखा, ऐरावत पर इंद्र ही सवार हों इस पर मुहूर्त से लेकर स्थान तक तमाम मतभेद रहे हैं। मतभेदों को मात देकर सर्वमत स्वपक्ष में कर सत्ता हासिल करना राजनीति का मान्य ध्येय है। इस ध्येय की सिद्धि जितनी आवश्यक है उतनी ही जटिल। इसलिए मई २०१४ में नवगठित संसद की लोकसभा में सत्तारूढ़ संसदीय दल का नेतृत्व किसे करना चाहिए का भाव साफ होकर भी कौन करेगा की आश्वस्ति न नरेंद्र मोदी- राजनाथ सिंह-लालकृष्ण आडवाणी दे सकते हैं, न राहुल गांधी- सोनिया गांधी- डॉ.मनमोहन सिंह की तिकड़ी। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से देश विभाजन का शिकार हो सकता है?

विभाजन का दोषी कौन?

आज तक देश का एकमेव विभाजन १९४७ में जब हुआ तब उसका दोष किसी भी सांप्रदायिक संगठन पर नहीं फोड़ा जा सकता। जिस मुस्लिम लीग ने विभाजन की बांग दी उसका सारा का सारा नेतृत्व सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद, फारुख अब्दुल्ला, मोहम्मद आजम खां, असदुद्दीन- अकबरुद्दीन ओवैसी, अबू हाशिम आजमी, अली अनवर, शाहनवाज हुसैन आदि वर्तमान मुस्लिम नेताओं से ज्यादा सेकुलर थे। अल्लामा इकबाल जो मोहम्मद अली जिन्ना की पाकिस्तान की परिकल्पनाके मान्य उस्ताद थे का शेर- मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना!आज भी हिंदुस्तानी सेकुलरवाद का बोध वाक्य है। इकबाल ने मजहबी आधार पर ही  मुसलमानों की अलग राष्ट्रीयता की प्रथम पैरवी की। 

सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा!हम इकबाल की यह नज्म गाते रहे और इकबालवादी पाकिस्तान बनाने की सफल बांग लगाते रहे। इस देश के छद्म सेकुलरों का संकट है कि वे सच को समझकर भी समझने को तैयार नहीं। फिर भगवा खेमे में भी सुधींद्र कुलकर्णी जैसे उधार के सेकुलर मौजूद ही हैं। जो लालकृष्ण आडवाणी को अटल बिहारी वाजपेयी से ज्यादा सेकुलर साबित करने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना को भी सेकुलर होने का प्रमाणपत्र दे आते हैं। सुधींद्र कुलकर्णी के ज्ञानचक्षु का लोहा तो मानना ही पड़ेगा कि उन्होंने उन आडवाणीजी का राजनीतिक खयाल बदल दिया जो जिन्नाकृत विभाजन की विभीषिका को झेल अपने वतन सिंध से निर्वासित होकर दिल्ली आए थे।

वाजपेयीकाल में कोई विभाजन नहीं हुआ

यदि किसी सेकुलर की सांप्रदायिकता इतनी विभाजनकारी हो तो उसके सांप्रदायिक होने की जरूरत भी क्या बचती है? दूसरी ओर विभाजन के जो जिम्मेदार थे पाकिस्तानियों की नजर में वे महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद और रफी अहमद किदवई ये सब भी आज की सोनिया गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह, मुलायम सिंह यादव, करुणानिधि, मायावती, नीतिश कुमार से ज्यादा सेकुलर थे। इसलिए यह कहना कि संघ की दक्षिणपंथी विचारधारा विभाजनकारी है ऐतिहासिक असत्य के अलावा कुछ नहीं। मई १९९६ में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी और सबको लगा कि गैर भाजपा की अस्थायी ही सही वैकल्पिक सरकार बन सकती है तो येर्रन नायडू, शरद यादव, राम विलास पासवान हर कोई कह रहा था कि वाजपेयी और उनका संघ परिवार सांप्रदायिक है। 

तीसरे मोर्चे की डेढ़-दो साल सीताराम केसरी की मेहरबानी से जो सरकार चली तो सबको लग गया कि कांग्रेस आती नहीं, आती भी हो तो उसके समर्थन से स्थायी सत्ता सुख नहीं। १९९८ आते-आते मधु लिमये के उन सारे चेलों का रुख बदल गया जिन्होंने १९७९ में दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर अटल-आडवाणी को अपमानित किया था। संघ का नागपुर मुख्यालय ताउम्र सेकुलर होने का डफ पीटने वालों को आदरणीय लगने लगा। वाजपेयी की ६ वर्षीय सरकार में देश का कोई विभाजन नहीं हुआ।

इंदिरा-राजीव कालीन दंगों को याद करो

जो २००२ के दंगों की याद करते हैं वे कृपया इंदिराकालीन बिहार के दंगे, मोरारजी कालीन गुजरात के दंगे, राजीव गांधी कालीन सिख दंगे और १९९२-९३ के राष्ट्रव्यापी दंगों को याद कर लें। असुविधा न हो तो १९८९-९० में कश्मीर से लाखों पंडितों का जैसा कत्लेआम हुआ और २ दशकों के हिंदू पीड़ितों की निर्वासन की जो व्यथा-कथा है उसे भी याद कर लें। उसका दोष किसे दें विश्वनाथ प्रताप सिंह को या फारुख अब्दुल्ला को? गुजरात के दंगे निश्चित तौर पर दुर्भाग्यपूर्ण थे। यह  दुर्भाग्य शुरू होता है उस बाबरी आंदोलन से जिसका सिर-पैर ही बेतुका है। इस्लाम बुतपरस्त नहीं। इसलिए मक्का में सऊदी शासक उस मस्जिद को भी ढहाने में आगा-पीछा नहीं सोचते जिसमें खुद इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मोहम्मद साहब ने नमाज अदा की थी। इसलिए बाबरी मस्जिद नामक बुत पर अड़ना इस्लाम के लिहाज से भी शरारत और कुफ्र के अलावा कुछ नहीं। अल्लामा इकबाल चाहे जितने पाकिस्तान परस्त रहे हों, पर उन्हें भी हिंदुओं के प्रभु रामचंद्र को इमामे हिंद मानने में कोई संकोच नहीं था। हिंदू घोषित बुत पूजक हैं इसलिए बुत शिकन औरंगजेब ने भी कुछ मंदिरों का ध्वंस कराने के अलावा हिंदू मंदिरों के संरक्षण के बदले में जजिया कर वसूला।

क्या बाबर कभी अयोध्या गया था?

अयोध्या की पहचान राम के नाम पर है, बाबर कभी अयोध्या आया हो ऐसा कोई ऐतिहासिक साक्ष्य भी नहीं। सो बाबरी मस्जिद के नाम पर अड़ना और हिंदुओं के मन में अनर्गल आक्रामकता से अविश्वास पैदा करने का औचित्य क्या था? कुछ मुल्लों की शरारत थी यदि मौलाना आजाद और रफी अहमद किदवई जैसा नेतृत्व होता तो दो दिन में बाबरी को पैâजाबाद में लाकर राम-रहीम के अमर प्रेम की इबारत लिख ली जाती। पर जैसे आडवाणीजी के पास सुधींद्र कुलकर्णी जैसे  जिन्नावादी जिन्न प्रकट कर गए वैसे ही राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, नरसिंहराव के पास तमाम इतिहास के वैमनस्य के बोध को कुरेदने वाले मनीषी थे। सो, सेकुलरवाद का जो बाबरवाद हुआ उसकी दूसरी कड़ी में रामशिलापूजन कर साबरमती लौटते कारसेवकों की ट्रेन का एक डिब्बा गोधरा के बाबरीवादियों ने फूंक दिया।

गुजराती का हिंसक बनना विज्ञानसम्मत है

मुजफ्फरनगर में मोहम्मद आजम खां के पालक मंत्री होते और टोपी को अपना परमधर्म मानने वाले अखिलेश सिंह यादव के शासनकाल में भी २-४ मौतों ने दर्जनों का खून बहाने भर की वहशियत भर दी। उत्तर प्रदेश का समाज यदि मुलायम-अखिलेश-आजम और सैन्यबल से बेखौफ होकर प्रतिशोध पर आमादा हो जाता है तो दशकों से उबल रहा गुजराती का हिंसक बनना उचित भले न हो पर विज्ञानसम्मत तो है। जब गुजरात के २००२ के दंगे और सोमनाथ से अयोध्या के महारथी लालकृष्ण आडवाणी का गृहमंत्रालय का कार्यकाल देश के विभाजन का कोई कारण नहीं बन सका तो मोदी का राज्याभिषक विभाजन का बीज बो देगा यह एक राजनीतिक आरोप तो हो सकता है, राजनीतिक सच्चाई नहीं। जहां तक रही सांप्रदायिक संघर्ष की आशंका तो इसे भी काल्पनिक ही मानना चाहिए। हिंदुस्तान एक सांस्कृतिक-भौगोलिक-राजनीतिक-आर्थिक इकाई बन चुका है। इसमें क्षेत्रीय शक्तियों का उभार गुणात्मक वृद्धि करेगा विभाजन नहीं।

विभाजन के लिए उकसाता है संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र की संरचना विभाजनकारी है। यह राष्ट्रों के विभाजन को उकसाती है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि से जुड़ी संस्थाओं-कॉरपोरेट और क्षेत्रीय संगठनों से जुड़े एनजीओ और विद्वान जिसे विभाजनकारी करार दें, समझना चाहिए कि वह व्यक्ति या संस्था न्यूनतम विभाजक है। जब १९४५ में संयुक्त राष्ट्र बना था तब उसमें ५० राष्ट्रों का समावेश था। ६८ साल बाद उसके सदस्य देशों की संख्या १९३ है। १४३ देश संयुक्त राष्ट्र की पैदाइश हैं। अगले दशक-दो दशक में इनकी संख्या कुछ और सैकड़ा बढ़ सकती है। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और वैश्विक अलंबरदारों ने अगले २० वर्षों में हिंदुस्तान के विभाजन को अपने लिए लाभदायक पाया तो बेशक इस देश को बांटने की एक और कोशिश होगी। 

यदि इस देश में लोकतंत्र को प्रबल करना है तो आधुनिक लोकतंत्र की मांग यही रहेगी कि उसमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों ही पुराने बैरों को भुलाकर अपने को राष्ट्रवादिता से जोड़ें और राष्ट्रवादियों की एक नई बिरादरी खड़ी कर लें। इस बिरादरी में आवश्यक होगा कि वे एक-दूसरे की अलग पहचान, सिद्धांत, मान्यता का आदर करें। यह तभी संभव होगा जब अल्पसंख्यक के मनोमस्तिष्क से असुरक्षा का भाव मिटाया जाए और बहुसंख्यक यह विश्वास कर सके कि अल्पसंख्यक उसकी थाली का हक नहीं मार रहा।