02 October 2013

राहुल की दादागिरी पर मनमोहन की सियासत !

अगर 27 सितंबर को दिल्ली के प्रेस क्लब में अचानक अवतरित हुये राहुल गांधी के दागियों को बचाने के सरकारी अध्यादेश के धज्जियां उड़ाने से पहले और बाद के हालात को देखे तो तीन सवाल सीधे किसी के भी जहन में आ सकते हैं। पहला, मनमोहन सिंह के पीएम होने की उम्र पूरी हो चुकी है। दूसरा, राहुल गांधी कमान संभालने की तैयारी कर रहे हैं। और तीसरा हर गलत निर्णय का ठीकरा मनमोहन सिंह के मत्थे मढकर खुद को पाक साफ बताने में गांधी परिवार हुनरमंद हो चला है। हकीकत जो भी हो लेकिन राहुल गांधी ने जैसे ही दागियों के अध्यादेश को बेहुदा करार दिया वैसे ही उन्हीं कैबिनेट मंत्रियों को सांप सूंघ गया, जो 48 घंटे पहले तक मनमोहन सिंह के साथ खड़े थे। और सभी एक एक कर मनमोहन का साथ छोड़ राहुल गांधी के पक्ष में आ गये। मनीष तिवारी, राजीव शुक्ला, ऑस्कर फर्नाडिस, शशि थरुर ने बयान बदलने में देर नहीं की और 24 घंटे पहले जो तीन कैबिनेट मंत्री राष्ट्रपति को समझा कर आये थे कि अध्यादेश क्यों जरुरी है,वे वह तो मीडिया से लुका-छिपी का खेल खेलने लगे। 

गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ तो 27 सिंतबर को छुपते और भागते ही दिखायी दिये। जबकि इन्हीं तीनों मंत्रियों से जब 26 की रात राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने पूछा कि अध्यादेश की इतनी जल्दबाजी क्यों है तो तीनों ने ही मौजूदा राजनीतिक समीकरण और संसद की सर्वोच्चता पर बड़े बड़े तर्क गढ़े। ध्यान दें तो गांधी परिवार पहली बार सरकार और पार्टी के बीच कुछ इस तरह खडा है, जहां सरकार भी उसके इशारो पर है और पार्टी संगठन भी उसे ही मथना है। यानी पीएम हो या संगठन दोनों जगहों का मतलब गांधी परिवार है। लेकिन पहली बार सत्ता की जिम्मेदारी से गांधी परिवार मुक्त है और रास्ता टकराने के बाद ही निकल रहा है। तो क्या सरकार के निर्णय को बेहुदा करार देना और कैबिनेट के अध्यादेश को फाड देना राहुल गांधी के निजी गुस्से का प्रतीक है या फिर चित भी मेरी और पट भी मेरी के खेल की बिसात गांधी परिवार खुद ही बिछा रहा है और अजय माकन से लेकर मनमोहन सिंह महज प्यादे बन सिर्फ एक एक चाल रहे हैं?

तो पहला जवाब है कि राहुल गांधी मौजूदा वक्त में नंबर एक हैं। चाहे वह कांग्रेस संगठन को ही मथने में लगे हो लेकिन मनमोहन सिंह के सभी मंत्री भी जानते-समझते हैं कि बिना गांधी परिवार ना तो कांग्रेस का कोई मतलब है न ही सरकार का। दूसरा जवाब है कि जिस रास्ते मनमोहन सरकार चल निकली है, उसमें कांग्रेस से ज्यादा फजीहत सरकार की हो रही है और सरकार से बाहर कांग्रेसी मान रहे हैं कि गलती मनमोहन सिंह को बनाये रखने में है इसलिये पीएम पद की अगर टोपी उछाली भी जाये तो वह कांग्रेस के ही पक्ष ही जायेगा। क्योंकि कांग्रेस की विचारधारा से इतर मनमोहन सिंह की नीतियां चल निकली हैं। और कांग्रेस के पारंपरिक वोट का बंटाधार किये हुये है। और तीसरा जवाब है राहुल गांधी के अलावे कांग्रेस के पास ऐसा कोई हथियार नहीं है, जिससे वह 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर हवा में भांजे और वह जमीन पर कुछ करता दिखे।

लेकिन बड़ा सवाल है कि आखिर वह कौन सी स्थितियां रही हैं, जिसने गांधी परिवार के सामने ऐसी परिस्थितियां ला खड़ी की हैं कि वह पीएम पद की टोपी को हवा में उछाल कर राजनीतिक सुकुन पा रहा है। तो इसकी जड़ में उसी आम जनता का गुस्सा है जो अपराध और भ्रष्टचार में गोते लगाती राजनीतिक व्यवस्था को बर्दाश्त करना भी नहीं चाहता है लेकिन उसके सामने इससे निकलने का कोई विकल्प भी नहीं है। और अन्ना के आंदोलन ने बाद कोई राजनीतिक दल मौजूदा राजनीति का विरोध करते हुये नजर भी नहीं आया। 

ध्यान दें तो नरेन्द्र मोदी इसी गुस्से को राजनीतिक तौर पर भुनाने के लिये लगातार मनमोहन सरकार के कामकाज के तौर तरीको पर सीधे कटाक्ष कर रहे हैं और जब जब वह मनमोहन सिह के तौर तरीके की खिल्ली उडाते हैं तो तालियां बजती हैं। और राहुल गांधी भी जिस गुस्से में 27 सितंबर की सुबह प्रेस क्लब में पहुंचे और उसी गुस्से को शब्दों में उतार 10 मिनट के भीतर अपनी बात कह निकल गये, उसने भी उसी जनता को तालियां बजाने का मौका दिया जो गुस्से में है। अब तालियां बजी या नहीं या फिर जनता के गुस्से से कोई सरोकार अपने ही पीएम की टोपी उछाल कर राहुल बना पाये या नहीं यह तो कांग्रेस का अपना आंकलन होगा लेकिन रांहुल ने सच कहा, इससे किसे इत्तफाक ना होगा।

लोकसभा में 162 दागी हैं। राज्यसभा में 44 दागी हैं। देश भर की विधानसभा में 1258 दागी हैं। और 2009 के चुनाव में तमाम राजनीतिक दल या निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जो भी नेता उतरे उनकी तादाद सात हजार पार थी। और उसमें से 2986 उम्मीदवार ऐसे थे, जिनपर कोई ना कोई केस चल रहा था। 1490 उम्मीदवारो पर तो हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण सरीखे आरोप थे। तो जनभावना दागी अध्यादेश के पक्ष में थी नहीं और जमीन पर इसका उबाल पैदा होना शुरु हो गया था इसे कांग्रेस बाखूबी समझ रही थी। और राहुल गांधी ने इन्हीं परिस्थितियों को देखकर चाल चली। लेकिन यहीं से दूसरा सवाल निकलता है कि अध्यादेश के खिलाफ राहुल गांधी के तीखे तेवर के बावजूद वाशिंगटन में बैठे पीएम मनमोहन सिंह ने 27 सिंतबर को ही जब यह कहा  कि वह लौट कर कैबिनेट में चर्चा करेंगे और सोनिया गांधी ने भी उनसे फोन पर बात की तो खुले तौर पर फिर वही सवाल सामने आया कि जो दागी हैं, उनके पक्ष में सरकार है या दागी अपनी नाजायज ताकत से चुनाव जीतने का दम-खम रखते हैं तो इससे सत्ता समीकऱण बनाये रखने के लिये सरकार दागियो के आगे नतमस्तक है।

अब सवाल है कि अब आगे क्या होगा। क्योंकि बीजेपी भी दागियो को बचाने के पक्ष में रही है। राज्यसभा में इसीलिये यह पास हो गया। लेकिन अध्यादेश लाने का विरोध करते हुये राहुल की तल्खी ने बीजेपी को ऑक्सीजन दे दिया। यानी राहुल गांधी अभी खामोश नहीं होंगे और जिस अध्यादेश के लेकर उन्होंने बेहुदा शब्द का इस्तेमाल किया है उसका सरलीकरण वह पीएम की टोपी को उछालनेवाला बताने से बचने के लिये फिर सामने आयेंगे। और पीएम एक बार फिर काजल की कोठरी में बैठ कर निर्णय लेते हुये भी कही ज्यादा झक सफेद हो कर निकाले जायेंगे। जो पीएम की बेबसी भी दिखायेगी और संसदीय मर्यादा का पालन करने वाले नेता के तौर पर मान्यता भी दिलायेगी।

 इसलिये सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री अपनी टोपी के उछाले जाने से रोष में आयेंगे या कोई खटास पैदा कर देंगे। कांग्रेस और सरकार के लिये सवाल सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी इस विवाद में कौन सा आखिरी शब्द बोलेंगे, जिसके बाद आम जनता में यह भाव जगे कि राहुल गांधी पप्पू नहीं हैं। यह अलग बात है कि इतिहास के पन्नों में अपनी ही सरकार और अपने ही बनाये पीएम के कैबिनेट से निकले अध्यादेश को बेहुदा और फाड़ देने वाला राहुल गांधी का बयान इंदिरा से इंडिया की तर्ज पर दर्ज हो गया।

मुलाकात हुई मगर क्या बात हुई !

दुनिया की सबसे बड़ी मगर सबसे कमजोर पंचायत अर्थात संयुक्त राष्ट्र महासभा में में दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र के प्रधानमंत्री डा. मनमोहन शनिवार को कुछ विषयों पर दो टूक बोलते सुने गए। पहला विषय यह कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह बात सबको साफ साफ समझनी होगी। दूसरा यह कि किसी भी सूरत में भारत की क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं किया जाएगा। और तीसरा यह कि पाकिस्तान हमारे पड़ौस में आतंकवाद का एपिकसेंटर है और उसे अपनी भूमि से आंतक का कारोबार समेटना होगा।

तीनों ही बातें जिस ढंग से कही गई उन्हें सुन कर आम भारतीयों को खासा सुकून मिला होगा। खासकर युवा पीढ़ी को जो इन सवालों पर दिल्ली के पिलपिले आचरण ही नहीं ख्रोखले वचनों से भी बहुत आहत और परेशान है। विदेशी भूमि पर जाकर ही सही, देश की इस शाब्दिक-सेवा के लिए प्रधानमंत्री महोदय को प्रथम दृष्टया साधुवाद दिया जा सकता है। मगर वे जिन्हें इस वाक्य-विलास से बाहर की जमीनी स्थिति का एहसास है पलभर से अधिक डा. मनमोहन सिंह के अभिनंदन-वंदन में खड़े नहीं रह सकते। ऐसा इसलिए चूंकि जमीनी तथ्य और घरेलू सियासी सच्चाई भारत सरकार के इन तेवरों की कतई गवाही नहीं देती।

सबसे पहले जम्मू कश्मीर की भारत के साथ अभिन्नता के सवाल को ही लीजिए। संवैधानिक और कानूनी रूप में गिलगित-बाल्टिस्तान व पाक अधिकृत दूसरे क्षेत्र ही नहीं पाकिस्तान द्वारा चीन को सौंपे गए रियासत के बड़े भूखंड तक सब भारत के अभिन्न अंग हैं। महाराजा हरि सिंह द्वारा विलय पत्र पर दस्तखत किए जाने के बाद से उनकी पूरी रियासत की एक एक इंच भूमि भारत है और उसमें बसने वाले लोग भारतीय। याद रहे कि भारत में राज्य के विलय को वहां की संविधान सभा ने भी अंतिम और अपरिवर्तनीय करार दिया था। भारत की संसद भी एक सुर में उन्नीस सौ चौरानवे में इस बात को दोहरा चुकी है। मगर महासभा में क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखने का दम भरने वाले प्रधानमंत्री के मुख से इस संबंध में एक भी शब्द नहीं फूटा। पाकिस्तान और चीन अधिकृत जम्मू कश्मीर की जमीन खाली हुए बगैर क्या अखंडता के साथ समझौता न करने की बात के कोई अर्थ शेष रह जाते हैं?

इस प्रश्न पर चौकन्ने देशवासियों की पीड़ा महज इतनी नहीं है कि हमारे प्रधानमंत्री इस जमीनी सच्चाई से मुंह मोड़ कर अखंडता की खोखली हुंकार भर आए हैं। इससे गहरा दर्द तो उनकी विदेश यात्रा के दौरान उनकी पीठ के पीछे जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला दे गए। यूरोपियन यूनियन के एक प्रतिनिधिमंडल के सामने उमर ने तो भारत में रियासत के विलय पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने अंग्रेजी के दो शब्दों एक्सेशन और मर्जर की मनमानी व्याख्या करते हुए कह डाला कि भारत में महाराजा हरि सिंह की रियासत का पूर्ण विलय कभी हुआ ही नहीं।

अगर उमर के ही शब्दों में कहा जाए कि विलय नहीं हुआ था तो प्रधानमंत्री किस अभिन्नता की बात कर रहे हैं। फिर संसद के तमाम प्रस्ताव भी निरर्थक हैं। मगर चूंकि राज्य सरकार में कांग्रेस उमर की भागीदार है, शायद इसलिए उमर अब्दुल्ला को तुरंत राजनीतिक-झिड़क लगाने का काम डा. सिंह या उनके किसी वरिष्ठ सहयोगी ने नहीं किया। भला हो जम्मू कश्मीर की उमर सरकार में कांग्रेसी कोटे से मंत्री श्याम लाल का जिन्होंने कि राष्ट्रीय हितों पर विदेशी मेहमानों के  सामने उमर द्वारा सार्वजनिक रूप से किए गए इस कुठाराघात पर खुल कर प्रतिक्रिया की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार श्याम लाल ने उमर की ताजा औछी लफ्फ्फाजी को प्रदेश का माहौल खराब करने की साजिश करार देने का साहस जुटाया। कितना अच्छा होता कि उमर को उनके इस घिनौने और देशघाती खेल के लिए दिल्ली दरबार से भी कोई सख्त संदेश भिजवाया गया होता।

इससे अधिक पीड़ादायक बात और क्या होगी कि भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा महज भाषणों और वक्तव्यों में हो रही है और वह भी आधी अधूरी। धरातल पर देखिए तो कहीं हमारी धरती पर पाकिस्तान काबिज है और कहीं चीन। इतना ही नहीं हमारी जमीन को लेकर लेन-देन और समझौते इन देशों के बीच में हो रहे हैं और हम हैं कि मौन तोडऩे तक का साहस नहीं जुटाते। सच बात तो यह है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता एक से अधिक मोर्चों पर न केवल पहले से चकनाचूर है बल्कि उस पर अब भी लगातार आघात हो रहे हैं।

अंत में आइए बात आतंक की जननी या गढ़ या उसके सरकारी ठेकेदार बताए जा रहे पाकिस्तान की कर ली जाए। प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि जिस पाकिस्तान को वे आतंक का ऐपिसेंटर कह रहे हैं उसके प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बतियाने को वे लालालियत काहे दिखे? बातचीत भी उन परिस्थितियों में जबकि वहां की फौज आए दिन सीमा पर युद्ध विराम का उल्लंघन कर रही है। जिस देश से घुस आए आतंकियों ने चंद रोज पहले ही आपके नागरिकों , पुलिस कर्मचारियों, सैनिकों और सेनाधिकारियों को मौत के घाट उतारा हो, उनके मातम के परिवेश में हत्यारों के देश के प्रधानमंत्री के साथ नाश्ते की मेज पर बैठने का क्या अर्थ है? पाकिस्तान को गाली देते देते गलबाहियां डालने और नश्तर चुभौते-चुभौते नाश्ते की तश्तरी साझा करने को कुछ लोग शायद कूटनीति कहेंगे। मगर इसमें न कहीं नीति है और न ही कहीं कूटत्व। यहां सब कुछ शीशे की तरह साफ है और वह है विदेशनीति और सीमाओं के सवाल पर दिशाहीनता।

मुजफ्फरनगर के गांवों में पुलिस घुसी तो खैर नहीं !

मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फर्जी नामजदगी और उत्तर प्रदेश सरकार की तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ गांव-गांव महिलाओं का नया आंदोलन खड़ा होता दिखाई दे रहा है। मुजफ्फरनगर के 20 से अधिक गांवों में महिलाओं ने आक्रामक पंचायत कर अब तक मुख्यमंत्री से लेकर कई नेताओं के पुतले फूंक दिये हैं। वहीं हाथों में डंडे लेकर वो सीधे सरकार को ललकार रही है कि गांव के लोगों को छेड़ा गया और झूठे मामलों में फंसाया गया तो उसे महिलाओं से पहले लोहा लेना होगा। महिलाओं की लाशों से होकर ही पुलिस को गांव में घुसना होगा।

पुलिस और प्रशासन के लिए यह सिरदर्द अब इतना बढ़ता जा रहा है कि रविवार को मेरठ के सरधना क्षेत्र में की महिलाओं की पंचायत में जमकर बवाल हुआ। मेरठ-मुजफ्फरनगर के साथ-साथ कई अन्य स्थानों पर की महिलाओं का आंदोलन लगातार बढ़ता जा रहा है। महिलाएं सपा सरकार की भेदभाव की नीति के खिलाफ मुजफ्फरनगर में 10 अक्टूबर में सर्वखापों की पंचायत कर राष्ट्रपति कावन को घेरने की रणनीति बनायेंगी।

मुजफ्फरनगर में जब से साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं तभी से उत्तर प्रदेश सरकार पर जाट बाहुल्य गांव के लोग आरोप लगा रहे हैं कि सरकार निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं कर रही है और दंगों में फर्जी नामजदगी कराकर गांव-गांव हजारों युवाओं का कैरियर खराब कर दिया गया। पुलिस से बचने के लिए गांव के गांव खाली हो गये। गांव में इस समय केवल महिलाएं, बच्चे और पशु ही रह गये हैं। मुजफ्फरनगर में पिछले एक हफ्ते से गांव-गांव में महिला पंचायतों का जो दौर शुरू हुआ वह सरकार को सीधे टकराने का न्यौता दे रहा है। 

फुगाना, खरड़, लिसाढ़, कुटबा, कोपा, कोकरहेड़ी, कुरथल, मौहम्मदपुर, राय सिंह सहित अनेक गांवों में महिला पंचायत हो चुकी है। यहां महिलाओं और लड़कियों का एक ही सवाल है कि उत्तर प्रदेश सरकार साम्प्रदायिक हिंसा के बाद तुष्टिकरण पर क्यों उतर आई? वह दंगों का दूध का दूध पानी का पानी कराने के लिए क्यों नहीं सीबीआई की जांच होने देती और क्यों निर्दोष हजारों लोगों को हिंसा के मामले में नामजद कर जेल के सलाखों के पीछे भेजने की तैयारी की जा रही है?

गांवों में लड़कियों में इतना आक्रोश है कि लड़कियों ने पढ़ाई छोड़ने की घोषणा करते हुए अपनी किताबों व कापियों की होली तक जला दी। दिन निकलते ही महिलाएं गांव में डंडे हथियार लेते हुए पंचायत करते हुए दिखाई देती है और साफ कहती है कि गांव में पुलिस घुसी तो खैर नहीं। इन पंचायतों का दौर गांव-गांव बढ़ता जा रहा है। रविवार को मुजफ्फरनगर के मोरना व कोपा के नन्हेड़ा में महिलाओं ने पंचायत कर यही सवाल उठाये कि आखिर कब तक निर्दोष लोगों के सरकार फंसायेगी। एक ही समुदाय के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। यही नहीं उनकी फसलों व ट्यूबवैलों को भी नष्ट किया जा रहा है। तिगरी, बसेड़ा, नंगला, गादलापचैंडा में की लड़कियों ने दहशत के कारण स्कूल जाना छोड़ दिया। वहीं जौली गंगनहर पर हुई हिंसा में क्षतिग्रस्त 16 ट्रैक्टरों व छह बाइकों के मुआवजे के बारे में की सरकार अभी तक चुप है। 

 कुटबा की पंचायत में महिलाओं ने कहा कि यदि दो अक्टूबर से शासन व प्रशासन ने उनकी मांगें नहीं मानी तो वह 10 अक्टूबर को गांव कुटबा मे ही बालियान खाप के चौरासी की महिलाओ की पंचायत आयोजित की जायेगी जिसमे दिल्ली मे राष्ट्रपति भवन को घेरने की रणनीति बनेगी। पंचायत में आयी हजारों महिलाओ में सरकार के प्रति इतना आक्रोश था कि उन्होने सरकार विरोधी नारे लगाते हुऐ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पुतला फुका।

सरधना में जिस तरह से खेड़ा की महिला पंचायत में बवाल हो गया उसके बाद मुजफ्फरनगर के गांवों में पुलिस अगर नामजद लोगों को गिरफ्तार करने का प्रयास करती है तो स्थिति यहां भी बिगड़ सकती है। हालांकि उत्तर प्रदेश शासन मुजफ्फरनगर के हालात पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं और गांव से लेकर शहर तक सुरक्षाबलों को तैनात कर चौकसी के निर्देश दिये गये हैं। मुजफ्फरनगर के गांव और शहर में अब जो घटनाएं हो रही है।

 वो भी संभवत: साम्प्रदायिक हिंसा में प्रतिशोध का परिणाम मानी जा रही है। जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा कह भी चुके है कि मुजफ्फरनगर में जो अपराध हो रहा है उसमें बाहरी लोग शामिल है। जिस तरह से महिला पंचायत सामने आई उसके बाद सर्वखाप में भी सुगबुगाहट है। गठवाला खाप से लेकर बालियान खाप तक महिलाएं हर तरह से उत्तर प्रदेश सरकार से टकराने का मन बना चुकी है। शासन ने इस नाजुक स्थिति को नहीं भांपा तो मुजफ्फरनगर फिर एक बार गर्म हो सकता है।

राईट टू रिजेक्ट लागू मगर इसमें नया क्या है..?

उच्चतम न्यायालय के भारत के नागरिकों को नकारात्मक मतदान का अधिकार प्रदान करने के बीच कानूनी विशेषज्ञों ने कहा है कि यह नया प्रावधान नहीं है और जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 में उम्मीदवार को नापसंदकरने की व्यवस्था है, हालांकि इससे गोपनीयता सुनिश्चित होगी। शीर्ष अदालत के नकारात्मक मतदान या राइट टू रिजेक्टके पक्ष में फैसले से भारत उन गिने चुने देशों में शामिल हो गया है जहां नकारात्मक मतदान की व्यवस्था है। अमेरिका के एक प्रांत नवादा, यूक्रेन, स्पेन, यूनान, चिली, ब्राजील, बेल्जियम, स्वीडन, फ्रांस, कोलंबिया जैसे दुनिया के कुछ गिने चुने देशों में ही यह व्यवस्था है।
 
लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का कहना है कि, ‘‘नकारात्मक मतदान का अधिकार नया नहीं है। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 49 :ओ: में ऐसा प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहता है तो वह मतदान केंन्द्र पर जाकर इस बारे में इच्छा प्रकट कर सकता है और उसे एक कागज दिया जायेगा जिसमें वह कह सकता है कि उसे कोई उम्मीदवार पसंद नहीं है।’’ उन्होंने कहा कि यह कोई नया प्रावधान नहीं है, बल्कि मतदान के अधिकार में ही यह निहित है। यह दो तरीके से होता है। चूंकि भारत में अनिवार्य मतदान का प्रावधान नहीं है, इसलिए व्यक्ति मतदान केंन्द्र पर नहीं जाकर ही अपनी इच्छा जता देता है । 

शीर्ष अदालत ने हालांकि मतदान की गोपनीयता के नियम का उल्लंघन करने वाले चुनाव संचालन नियम 41 (2) (3) और जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 49 (ओ) को चुनाव के संदर्भ में अनुपयुक्त ठहराया है। इस प्रणाली के तहत रूस में 1991 के चुनाव में इनमें से कोई नहींका विकल्प मतदाताओं को दिया गया था, हालांकि इसे 2006 के बाद समाप्त कर दिया गया। बांग्लादेश में 2008 में ना वोटका प्रस्ताव किया गया जबकि पाकिस्तान में इस प्रस्ताव को इसी साल चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राइट टू रिजेक्टसे मतदान के प्रतिशत में वृद्धि होगी क्योंकि ऐसे लोग जो पसंद का उम्मीदवार नहीं होने के कारण मतदान करने नहीं जाते थे, वे अब राइट टू रिजेक्टका उपयोग करने के लिए मतदान केंद्र पर जायेंगे।