12 November 2013

चरमराती अर्थव्यवस्था क्या मंदी की आहट है ?

स्वतंत्र अर्थव्यस्था के इतिहास में 2003-08 के दौरान हमारे देश ने अब तक की सबसे शानदार विकास दर दर्ज की है। इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर औसतन 8-9 प्रतिशत सालाना रही है। परन्तु 2007-08 में पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं से शुरू हुयी महामन्दी का इस उछाह पर भी सीधा असर पड़ा है। 2008-12 के दौरान भारत की विकास (जीडीपी) दर 6.7-8.4 प्रतिशत के बीच झूलती रही है। 2012 के यूरो ज़ोन संकट के कारण तथा आंशिक रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर मैन्यूफेक्चरिंग एवं खेती में आए ठहराव की वजह से विकास दर और भी नीचे चली गयी है। 

2011-12 की चौथी तिमाही में विकास दर 5.3 प्रतिशत रही जो तकरीबन नौ साल में सबसे कम विकास दर थी। 31 मार्च 2012 को खत्म हुयी तिमाही में मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर 0.3 प्रतिशत पर पहुँच गयी थी जो 2010-11 को इसी तिमाही में 7.3 प्रतिशत थी। कृषि उपज में भी कुछ ऐसा ही रूझान दिखाई दिया। इस तिमाही में कृषि उपज में केवल 1.7 प्रतिशत का इज़ाफा दर्ज किया गया जबकि 2010-11 की चौथी तिमाही में ये इज़ाफा 7.5 प्रतिशत था। संकटों में फँसीं विश्व अर्थव्यवस्था के साथ गहरे तौर पर बँधे होने की वजह से आने वाले दौर की तस्वीर बेहद अनिश्चित दिखाई देने लगी है।

1991 से अब तक औद्योगिक उत्पादन तिगुना हो गया है जबकि बिजली उत्पादन दुगने से भी ऊपर चला गया है। बुनियादी ढ़ाँचे का फैलाव भी प्रभावशाली रहा है। संचार साधनों तथा वायु, रेल एवं सड़क यातायात की गुणवत्ता में भारी विस्तार और सुधार आया है।  2009 में हमारे यहाँ 2700 से ज्यादा बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ काम कर रही थीं।

दिनोंदिन बहिर्मुखी होती जा रही अर्थव्यवस्था में देश के विदेशी कर्जे को भी उसके विदेशी मुद्रा भण्डार के साथ मिलाकर देखना जरूरी है। 1991 में विदेशी कर्जा 83 अरब डॉलर था जो 2008 में 224 अरब डॉलर पहुँच गया था। यह कर्जा जीडीपी का लगभग 20 प्रतिशत था। पिछले कुछ सालों में यह कर्ज और तेजी से बढ़ा है। मार्च 2011 और मार्च 2012 के बीच ये 306 अरब डॉलर से बढ़कर 345 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। इसकी तुलना विदेशी मुद्रा भण्डार से की जा सकती है जो 1991 में लगभग शून्य पर पहुँच गया था और 2012 में 287 अरब डॉलर था। पिछले कुछ समय में भारत से पूँजी के निर्गम की वजह से मुद्रा भण्डार में कुछ गिरावट आयी है। जुलाई 2011 में ये 314 अरब डॉलर था जो साल भर बाद 287 अरब डॉलर रह गया था।

भारत का व्यापार घाटा (आयात और निर्यात का फासला) नब्बे के दशक की शुरुआत से ही तेजी से बढ़ने लगा था। सेवा व्यापार ने आंशिक रूप से इसकी भरपाई तो कर दी है लेकिन यह फासला देश के विदेशी मुद्रा भण्डार में गिरावट का स्पष्ट संकेत है। 2004 में हमारा घाटा जीडीपी का 0.4 प्रतिशत था जो 2011-12 में बढ़कर 3.6 प्रतिशत तक जा चुका था।

2011-12 में भारत सरकार के कुल बजट व्यय का 30 प्रतिशत खर्चा कर्जों का ब्याज चुकाने में जा रहा था। इस प्रकार, यह सरकार के खर्चों का सबसे बड़ा मद है। इसके मुकाबले रक्षा पर 8 प्रतिशत और स्वास्थ्य व शिक्षा पर कुल मिलाकर 2 प्रतिशत से भी कम खर्चा किया जा रहा है।

2007-08 से शुरू हुई वैश्विक मन्दी के दौरान भारत सरकार को भी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर दखल देना पड़ा ताकि सितम्बर 2008 के बाद अन्तरराष्ट्रीय बाजारों के चरमराने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर न पड़े। 2008-09 में सरकार को अर्थव्यवस्था में कुल 1200 अरब रुपये (27 अरब डॉलर) की पूँजी झोंकनी पड़ी जो जीडीपी के 2 प्रतिशत से ज्यादा बैठती है।

लन्दन स्थित न्यू इकॉनॉमिक्स फाउण्डेशन (एनईएफ) ने विश्व बैंक के आँकडों के आधार पर हिसाब लगाकर बताया है कि अगर 1990 से 2001 के बीच दुनिया की प्रति व्यक्ति आय में 100 डॉलर की वृद्धि हुयी है तो उसमें से केवल 0.60 डॉलर वृद्धि ही अपनी असली मंजिल तक पहुँची है जिसने एक डॉलर प्रतिदिन से भी नीचे जीवनयापन करने वालों की गरीबी पर अंकुश लगाने में योगदान दिया है। इसका मतलब ये है कि अगर हमें गरीबों की आय में एक डॉलर प्रतिदिन का इजाफा करना है तो गैर-गरीबों को 165 डॉलर अतिरिक्त देने होंगे।
जब 1991 में आर्थिक सुधारों का सिलसिला शुरू हुआ था तब मानव विकास सूचकांक (जिसमें साक्षरता, जीवन प्रत्याशा/औसत उम्र तथा प्रति व्यक्ति आय शामिल है) पर भारत दुनिया के देशों की सूची में 123वें स्थान पर हुआ करता था। 2009 में हमारा देश 134वें स्थान पर जा पहुँचा है।

भारत सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र की समस्याओं पर विचार करने के लिए बनायी गयी अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी के मुताबिक, 2007 में भारत की 77 प्रतिशत आबादी (यानी 83.6 करोड़ लोग) 20 रूपये प्रतिदिन से भी कम आय पर जीवनयापन कर रहे थे। इसका मतलब है कि हमारे पास इतनी भयानक विपन्नता में जीने वाली आबादी आजादी के समय की कुल भारतीय आबादी से लगभग ढ़ाई गुना हो चुकी है।

गरीबी के अध्ययन के लिए बनायी गयी तेंडुलकर कमेटी, जिसने 2009 में योजना आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, के मुताबिक 2004-05 में भारत में गरीबों का अनुपात ग्रामीण इलाकों में 41.8 प्रतिशत और शहरों में 25.7 प्रतिशत था। इस अध्ययन के लिए गरीबी की रेखा का पैमाना गाँवों मंे 15 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और शहरों व कस्बों में लगभग 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तय किया गया था। आज हिन्दुस्तान की प्रति व्यक्ति आय 150 रूपये प्रतिदिन है। देश के 80 प्रतिशत लोगों की दैनिक आय इससे कम है।

दुनिया भर में अल्पपोषित लोगों की सबसे बड़ी आबादी हिन्दुस्तान में बसती है। यह आबादी सारे उप-सहारा अफ्रीका के अल्पपोषित लोगों की कुल संख्या से भी ज्यादा है। एफएओ ने 2004-06 की अवधि के लिए यह आबादी 25.1 करोड़, यानी देश की कुल आबादी का एक चौथाई बतायी थी। इसमें जनसंख्या वृद्धि और जीवन प्रत्याशा में इज़ाफे का सिर्फ आंशिक योगदान है। अभी भी हमारे पास पर्याप्त भोजन है, एफसीआई के गोदाम अनाज से पटे रहते है और इसके बावजूद 20 करोड़ से ज्यादा लोग रोज भूखे पेट सोते है और 5 करोड़ से ज्यादा ऐसे है जो भुखमरी की कगार पर साँस ले रहे हैं।

2005-10 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में गुजरात की विकास दर सबसे ज्यादा (दो अंकों वाली) रही है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, गुजरात में 1992-93 में तीन वर्ष से कम आयु वाले ऐसे बच्चों की संख्या 44 प्रतिशत थी (बाद के आँकड़े उपलब्ध नहीं है)। सामान्य से कम वजन वाले बच्चों का अनुपात भी सुधारों के इस दौर में लगभग पहले जैसा ही रहा है (47-48 प्रतिशत)।

भारत की ‘विकास’ परियोजनाओं के कारण विस्थापित हो चुके, या परियोजना प्रभावित लोगों की संख्या 1947 से अब तक लगभग 6 करोड़ रही है। योजना आयोग द्वारा लगभग 2.1 करोड़ विस्थापितों पर किए गए अध्ययनों से पता चला कि उनमें से 40 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी लोग रहे हैं जबकि भारत की कुल आबादी में आदिवासियों का हिस्सा केवल 8 प्रतिशत है। 2008-09 में किए गए एनएसएस सर्वेक्षणों के मुताबिक, भारतीय शहरों में 49,000 झुग्गी-बस्तियाँ हैं। 2003 के एक संयुक्त राष्ट्र अध्ययन में बताया गया था कि भारत की आधी से ज्यादा शहरी आबादी झुग्गी-बस्तियों (पुनर्वास बस्तियों सहित) में रहती है। पूरी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या एक तिहाई है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के औपचारिक (संगठित) क्षेत्र में रोजगारों की संख्या 1991 से 2007 के बीच तकरीबन 2.7 करोड़ के आसपास ही थमी रही है। यह संख्या भारत की कुल श्रमशक्ति के 6 प्रतिशत से भी कम है। 1991 में अनाजों और दालों की प्रति व्यक्ति दैनिक उपलब्धता 510 ग्राम थी जो 2007 में 443 ग्राम प्रति व्यक्ति तक गिर गयी थी।

अप्रैल 2009 में भारत में मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वालों की संख्या 40.3 करोड़ थी। इनमें से लगभग 46 प्रतिशत यानी 18.7 करोड़ लोग ऐसे थे जिनके पास किसी बैंक में खाता नहीं है। भारत के 6 लाख गाँवों में से केवल 5.2 प्रतिशत गाँव ऐसे हैं जहाँ किसी बैंक की कोई शाखा है। इसकी वजह से ही ज्यादातर किसान महाजनों और सूदखोरों के चंगुल में फँसे रहते है। कर्जों के बोझ से तंग आकर 1997-2008 के बीच दो लाख किसान खुदकुशी कर चुके थे (सुधारों के शुरू होने के बाद इस संख्या में तेजी से इजाफ़ा हुआ है)। इन 10 सालों के दौरान औसतन लगभग हर 30 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा था।

2009 के नीलसन सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के 22 करोड़ परिवारों में से केवल 25 लाख परिवार ऐसे हैं जिनके पास कार और कम्प्यूटर दोनों साधन है। विदेशों में सैर-सपाटे के लिए जाने वाले परिवारों की संख्या केवल एक लाख है। तकरीबन 60 प्रतिशत भारतीयों के पास अभी भी समुचित स्वच्छता सुविधाएँ नहीं हैं। युनीसेफ के मुताबिक, बेहतर पेयजल स्रोत 88 प्रतिशत आबादी (1990 में 72 प्रतिशत) के लिए ही उपलब्ध है।

एक हाई-नेट-वर्थ-इण्डीविजुअल ऐसे करोड़पति व्यक्ति को माना जाता है जिसकी कुल निवेश योग्य सम्पदा (निजी घर, जमीन और/या सम्पत्ति के अलावा) कम से कम 4.5 करोड़ रुपये है। मेरिल लिंच के मुताबिक, भारत में 2010 में ऐसे लोगों की संख्या 1,26,700 थी। यों तो देश की कुल आबादी में इनका हिस्सा केवल 0.01 प्रतिशत ही बैठता है लेकिन इनकी सम्पदा का मूल्य भारत की जीडीपी के लगभग एक तिहाई के बराबर बैठता है। नैशनल इलेक्शन वॉच द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, वर्तमान लोकसभा के 543 में से 300 सदस्य डॉलर मिलियनेयर्स (यानी 4.5 करोड़ से ज्यादा सम्पत्ति वाले) हैं। 2004 में हुए पिछले आम चुनावों में चुनकर आए सांसदों में उनकी संख्या इससे केवल आधी थी। 543 सांसदों की कुल सम्पत्ति 2,800 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है और इस तरह औसतन हर सांसद एक डॉलर मिलियनेयर है। 64 केन्द्रीय कैबिनेट मन्त्रियों की सम्पत्ति 10 करोड़ डॉलर है।

राजनीति का व्यवसायीकरण कितना सही ?

राजनीति में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति चाहे वो पंच, सरपंच हो, विधायक मंत्री हो अथवा सांसद या प्रधानमंत्री। एक दो व्यक्ति विशेष को छोड़कर लगभग सभी राजनीति को व्यवसाय के रूप में देखने लगे हैं। कुछ लोग अब भी अपने मुख्य व्यवसाय के साथ साथ आंशिक रूप से राजनीति का व्यवसाय करते हैं तो कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपने सारे व्यवसायिक काम छोड़कर पूरा समय इसी व्यवसाय में लगाते हैं। भारतीय व्यवस्था में समाज की भूमिका सर्वोच्च होती है तथा प्रत्येक व्यक्ति या समूह के कार्य समाज केंन्द्रित होते हैं। यदि कोई विद्वान् होता है तो वह विद्वता के माध्यम से समाज को सशक्त करता है, उसे ब्राह्मण कहा जाता है। इन ब्राह्मणों का हीं अतिवादी स्वरुप धर्मगुरु अथवा सन्यासी के रूप में दिखाई देता है। जो समाज को न्याय और सुरक्षा उपलब्ध कराते हैं उन्हें राजनेता कहा जाता है जो प्राचीन समय में क्षत्रिय कहे जाते थे। इनका अतिवादी स्वरुप राजा के रूप में प्रकट होता था। जो समाज को आर्थिक दृष्टि से सहायता करते थे उन्हें वैश्य कहा जाता था, जिन्हें आज कल व्यपारी कहते हैं। जो लोग इन तीन प्रकार की योग्यताओं से अक्षम होते थे वे स्वयं या तीनों वर्गों की सहायता करके समाज को सशक्त करते थे। इन्हें वर्त्तमान में श्रमिक तथा प्राचीन समय में शुद्र कहा जाता था। 

वैश्य के अतिरिक्त कोई अन्य वर्ग यदि व्यवसाय करता या अथवा सीमा से अधिक धन संग्रह करता था तो उसे अपना वर्ण बदलकर वैश्य या व्यापारी मान लिया जाता था। इस तरह चारो वर्ग अपनी अपनी सीमाओं में रहकर अपनी अपनी क्षमतानुसार समाज सशक्तिकरण का काम करते थे। जब से अंग्रेज भारत में आये तो उन्होंने अपने स्वभाव के अनुसार समाज को तोडा और समाज सशक्तिकरण में लगे चारो वर्णों का व्यवसायीकरण कर दिया जो स्वतंत्रता के बाद भी न सिर्फ जारी है बल्कि बहुत तेजी से फल फूल रहा है।

वर्त्तमान समय में सब प्रकार के क्षेत्र अपने अपने सामाजिक कार्य को व्यवसाय मानकर करने लगे हैं। धर्म क्षेत्र में लगे चाहे निर्मल बाबा हों या आशाराम बापू, चाहे बाबा रामदेव हो अथवा रवि शंकर महाराज, सभी अधिकतम धन संग्रह करने और धन के माध्यम से स्वयं को स्थापित करने में लगे हैं। इनके सभी कार्य चाहे वे कोई भी कार्य क्यों न हो शुद्ध रूप से व्यवसाय है या शुद्ध रूप से व्यापार है। यदि हम खिलाडियों की चर्चा करें तो खेल के नाम पर जो भी लोग आगे आ रहे हैं वे अपने कार्य को शुद्ध व्यापार का स्वरुप दे रहे हैं। न खेलों में कहीं समाज सेवा का भाव छुपा है और न देश सेवा का। सिर्फ और सिर्फ अपना घर भरने का हीं भाव छिपा है, जिसे कभी समाज सेवा का नाम दे दिया जाता है तो कभी देश सेवा का। सामाजिक संगठन के नाम पर एनजीओ या अन्य संगठन भी इसी व्यावसायिक दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। साहित्य, समाचार पत्र अथवा मीडिया के अन्य साधन भी अप्रत्यक्षतः व्यवसायी हो चुके हैं। धर्म गुरुओं, खिलाडिओं अथवा एनजीओ वालों ने तो व्यवसाय और समाज सेवा के बीच अब भी एक हल्का पर्दा बनाये रखा है परन्तु मीडियावालों ने तो वह पर्दा भी हटा दिया है। फिर भी यह लेख लिखने का हमारा मुख्य उद्देश्य राजनीति के व्यावसायिकरण से जुड़ा है।

जिस तरह व्यवसाय करने वालों को व्यावसायिक ठेके प्राप्त होते हैं तथा जिसे ठेका कहीं नहीं मिलता वह निराश हो जाता है उसी तरह राजनीति में भी सत्ता के पद व्यवसायीक ठेके के अतिरिक्त कुछ नहीं है। मीडिया में तो एक परदे का आभास भी होता है परन्तु राजनीति ने तो वह आभास भी कराना बंद कर दिया है। वैसे तो अब राजनीति से न समाज सेवा का कोई सम्बन्ध रहा है न दलीय सिद्धांतों का किन्तु वर्त्तमान समय में तो जिस तरह दलीय निष्ठाएं मिनटो में बदली जा रही है और वह भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता के लालच में और वह भी बिल्कुल सड़क पर नंगे होकर वह वास्तव में चिंता का विषय है।

हम देख रहे हैं कि बड़े बड़े नेता टिकट न मिलने की घोषणा होते हीं राजनीति की दुकान बदल देते हैं। उससे तो दर्शकों को भी शर्म आने लग जाती है। ऐसी नग्नता तो सिनेमा के ऐक्टर भी एडल्ट फिल्मों में भी नहीं दिखाते। वहाँ भी कलाकार कामुकता को उभारते समय कुछ सीमा में रहते हैं परन्तु राजनीति में तो अब वह सीमा भी नहीं रही। कांग्रेस का टिकट नहीं मिलते ही उसके एक नेता ने मध्य प्रदेश में जहर खाकर अपनी जान दे दी। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी की छत्तीसगढ़ की स्थापित नेत्री करुणा शुक्ला ने टिकट नहीं मिलते ही कांग्रेस पार्टी के साथ आँख मिलाना शुरू कर दिया। देश भर में हर पार्टी के प्रमुख लोगों ने या तो टिकट बेचे या टिकर न प्राप्त होने वालों ने उन पर टिकट बेचने के आरोप लगाये। मायावती सरीखे दलों पर तो ऐसे आरोप लगते हीं हैं किन्तु अब तो कांग्रेस और भाजपा भी ऐसे आरोपों से दूर नहीं है। राज्य सभा की सीटें पूंजीपतिओं को बेचने की तो लगभग परंपरा हीं बन गई है। चुनावो में जीतने के लिए करोडो रूपया खर्च करना और जीतने के बाद अरबों रूपया कमाने की व्यवस्था करना हीं वर्त्तमान रजनीति का एक मात्र कार्य रह गया है। मनमोहन सिंह सरीखे जो लोग ऐसे व्यवसाय में फिट नहीं रहे हैं उनकी दुर्गति भी दिख रही है। संघ परिवार ने बहुत समय तक चरित्र की राजनीति की उसे भी हार थक कर अब नरेंद्र मोदी सरीखे अति चालाक राजनेता की शरण में जाना पड़ा है। लगता है कि अब राजनीति भी पूरी तरह खिलाडियों, कलाकारों, पाखंडी धर्म गुरुओं से भिन्न कोई अलग आदर्श की सम्भावना में नहीं रही है।

प्रश्न उठता है कि जब विद्वान लेखक, कलाकार, राजनेता धर्मगुरु सरीखे समाज सशक्तिकरण के स्तम्भ हीं समाज कमजोरीकरण में लग जायेंगे तो समाज का क्या होगा यह चिंता का विषय है। ये लोग न सिर्फ समाज को कमजोर कर रहे हैं बल्कि राजनेता तथा धर्म गुरु तो समाज को धोखा भी दे रहे हैं। फिर भी यदि हम साहित्यकारों, धर्मगुरुओं, खिलाडियों, कलाकारों, मीडियाकर्मियों की राजनेताओं से तुलना करें तो राजनेताओं को छोड़ कर अन्य सब लोग भले हीं समाज को धोखा दे रहे हो किन्तु वे समाज को किसी तरह से मजबूर नहीं कर रहे हैं। आम लोग भले हीं इनके प्रभाव में आकर इनसे चिपक जावें या ठगे जावें लेकिन इनका कोई कार्य समाज पर बंधनकारी नहीं है। जबकि राजनेताओं के आदेश समाज पर बंधनकारी होते है, वे जब चाहें जितना चाहे टैक्स लगा सकते हैं। चिंता का विषय है कि समाज सशक्तिकरण का कार्य कहाँ से शुरू होगा? कैसे शुरू होगा? कौन शुरू करेगा? अभी तो राजनेताओं का चरित्र देख देख कर गहरा अँधेरा हीं दिखता है।

10 November 2013

वंशवाद बनाम लोकतंत्र !

अपनी वंशवादी राजनीति को बचान के लिए कांग्रेस ने सिर्फ सरदार का ही अनादर नहीं किया है बल्कि राजेंद्र बाबू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस जैसे आजादी के सभी शीर्ष क्रांतिकारियों को आजाद भारत के इतिहास से आजाद कर दिया। आजादी के बाद देश में नेहरू, इंदिरा, राजीव के अभूतपूर्ण योगदान के प्रतीक तो स्थापित किये गये हैं लेकिन जिन शूरमाओं और शूरवीरों के कारण इस देश को अंग्रेजों से आजादी मिली उन्हें वर्तमान से पूरी तरह मिटा दिया गया है। और तो और महात्मा गांधी से पहले कांग्रेस की कमान सम्हालने वाले लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे कांग्रेसी नेताओं को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया। दूसरे दलों की तो छोड़िये खुद कांग्रेस के 90 प्रतिशत नेताओं को इन राष्ट्रीय नेताओं के बारे में जानकारी तक नहीं है। आजादी के बाद कांग्रेस को एक परिवार तक सीमित कर दिया गया, जबकि कांग्रेस का शाब्दिक अर्थ जमावड़ा या सम्मेलन होता है। दुख की बात है कि इंडियन नेशनल कांग्रेस आजादी के बाद नेहरू परिवार की जागीर बन गया, जबकि यह स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत करने वाले आंदोलनकारियों का जमावड़ा था, जिसमें सब शामिल थे। 

किसी को उम्मीद नहीं थी कि इतिहास के गर्त में खो चुके सरदार वल्लभ भाई पटेल आज बहस का विषय़ बन जाएंगे। लोग पटेल ही नहीं पटेल के पुशतैनी घर तक को याद करने लगे जो इलाहाबाद स्थित पंडित जवाहर नेहरू के पुश्तैनी मकान आनंद भवन के मुकाबले भारी जर्जर स्थिति में है। इसे चाहे जो कहें, राजनीति कहे, या कुछ और। पटेल को नरेंद्र मोदी ने बहस के केंद्रबिंदू में लाया है। एक अनोखे तरीके से जिसका जवाब कांग्रेस के पास नहीं है। जवाब से ज्यादा चिंता कुछ और है कांग्रेस में। खासकर नेहरू परिवार के सदस्यों में। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी नेहरू परिवार के हर उस प्रोजेक्ट, पुल, नहर, भवनों को पीछे कर देगा जो पिछले पचास सालों में मुगलों की परंपरा के हिसाब से नेहरू गांधी परिवार के नाम पर बनाया गया है। जिस पटेल को कांग्रेस भूला चुकी थी,जिस पटेल को कम्युनिस्ट हिंदूवादी कर गाली देते थे, उन्हें सेक्यूलर बताया जा रहा है। उन्हें कांग्रेस का बताया जा रहा है।

नरेंद्र मोदी का यह मास्टर स्ट्रोक है। यह मास्टर स्ट्रोक भारत के इतिहासकारों के लिए भारी चुनौती है। यह भारतीय इतिहास लेखन के सारे स्कूलों के लिए भारी चुनौती है। इतिहास लेखन के वामपंथी, गांधीवादी, दक्षिणपंथी और सबआल्टर्न स्कूल जिन्होंने पटेल को इतिहास लेखन में सही जगह नहीं दिया, नए सिरे से विचार करने को मजबूर है। इतिहासकारों के एक स्कूल ने आजादी के बाद इतिहास लेखन में नेहरू का गुणगाण किया। नेहरू को स्थापित करने के लिए उन्होंने सुभाष के समाजवाद को अपरिपक्व कहा था। सरदार पटेल को तो कहीं जगह ही नहीं मिली। इतिहास का हर स्कूल पटेल को पूरी तरह से नजर अंदाज करता रहा है। लेकिन स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी देश के इतिहासकारों को अब मजबूर करेगी। वो पटेल पर बहस करेंगे। उन्हें नए सिरे से स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास लिख पटेल को उचित जगह देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

आज पटेल को लेकर तमाम कांग्रेसी नेता आगे बढ़-बढ कर बयान दे रहे है। लेकिन जरा कोई इनसे पूछे कि इससे पहले कांग्रेसी नेताओं ने कब अपने भाषणों में पटेल को याद किया? पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की जयंती और पुण्य तिथि तो कांग्रेसियों को याद रहती थी, लेकिन सरदार पटेल की जयंती औऱ पुण्यतिथि कांग्रेस के किसी भी बड़े नेता को आजतक याद नहीं आयी। खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पिछले दस साल का भाषण उठा लें। कहीं पर भी उन्होंने पटेल का नाम नहीं लिया है। वो भी नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से आगे अपने भाषणों में नहीं बढे। लेकिन अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में पटेल का नाम लेने के लिए मनमोहन सिंह को नरेंद्र मोदी ने मजबूर कर दिया। मोदी ने जब पटेल के बहाने नेहरू पर वार किया तो मनमोहन सिंह बैचेन हो गए। मजबूरी में उन्हें कहना पड़ा कि उन्हें गर्व है कि वे उसी पार्टी से है जिस पार्टी से पटेल थे। पटेल का सेक्यूलरिजम भी इस वक्त मनमोहन को याद आया। आप राहुल गांधी का पिछले दस सालों का भाषण देख लें। कहीं पर उन्होंने आजतक सरदार पटेल का नाम अपने भाषणों में नहीं लिया। 

इस अखंड भारत के लिए उन्हें अपना परिवार ही हमेशा याद आया। उन्हें दादी, पिता और अपनीं मां से आगे कांग्रेस नहीं दिखती। यहीं पर मोदी की यह भारी सफलता है। उन्होंने भाजपा के नहीं बल्कि कांग्रेस के हर नेता को पटेल का नाम लेने के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसा नहीं कि मोदी पहली बार ऐसी कोई कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी सरदार पटेल को स्थापित करने का प्रयास कर चुका है। भाजपा के बड़े नेता एलके आडवाणी ने भी पटेल को हमेशा याद किया। यह दीगर बात थी कि संघ या आडवाणी को पटेल को स्थापित करने में वो सफलता नहीं मिली जो मोदी को मिल गई।

दरअसल मोदी ने पटेल को स्थापित करने का एक नायाब तरीका खोज लिया। मोदी ने कांग्रेस के हथियार से ही कांग्रेस पर वार किया है। आजादी के बाद देश के तमाम प्रोजेक्टों, योजनाओं, भवनों, सड़कों और पुलों का नाम सुनोयिजत तरीके से नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर रखा गया है। जब शासक वर्ग द्वारा ऐसा किया जाता है तो दरअसल यह शासक वर्ग की सोची समझी रणनीति होती है, ताकि उसे लंबे समय तक जिन्दा रखा जा सके जिन्हें वह अपने आदर्श के बतौर देखता है। कांग्रेस में यह काम सिर्फ नेहरू गांधी वंश तक सीमित कर दिया गया। नेहरू से शुरू होकर राजीव तक सब खत्म। देश में कोई हवाई अड्डा बने कि किसी कोई सरकारी योजना शुरू की जाए सब जगह बहुत सुनियोजित तरीके से सिर्फ नेहरू गांधी वंश के नेताओं के नाम पर योजनाओं और परियोजनाओं का नामकरण कर दिया गया। ऐसा इसलिए ताकि वंश परंपरा को लंबे समय तक जीवित रखा जाए। इसके साथ ही इतिहास के दूसरे लोगों की उपलब्धियों को छुपाने और अपने परिवार की उपलब्धि ही जनता के सामने लाने के लिए तमाम प्रोजेक्टों, कार्यक्रमों और भवनों के नाम एक परिवार के नाम पर रखे जाने लगे।

यह खेल खेल शासक वर्ग सदियों से करता रहा है। पंडित नेहरू के परिवार ने भारत में यही खेल खेला। यह मुगलों से उधार की ली गई  परंपरा थी, जिसमें लोकतांत्रिक तरीके से परिवारवाद को जिंदा रखने में नेहरू परिवार को सफलता मिली। मुगलों ने अपने शासन को लंबा रखने और इतिहास में हजारों साल तक अपने वंश का नाम दर्ज कराने के लिए  परिवार के किसी सदस्य की याद में मुगल स्थापत्य कला का एक नमूना देश को दिया। इसी का परिणाम आगरा का ताजमहल, आगरा का लाल किला, फतेहपुर सिकरी में अकबर का महल है। दिल्ली के लाल किला ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। इसमें वंशवाद, परिवारवाद और अहंकार की बू आती है। आजादी के बाद नेहरू परिवार ने इसी परंपरा के आधार पर वंशवाद, परिवारवाद और अहंकार से युक्त कई प्रोजेक्ट, योजना इस देश को दिए। 

हालांकि नरेंद्र मोदी का स्टैच्यू ऑफ यूनिटी इस परंपरा से उधार जरूर लिया गया है, लेकिन इसमें वंशवाद, परिवार और अहंकार को जगह नहीं मिली है। क्योंकि सरदार पटेल न तो मोदी के रिश्तेदार है, न ही पूर्वज है और न ही मोदी की जाति से है। मुगलों ने  अपनी सुख सुविधा  और बीबियों के याद में एक स्थाप्तय कला दिया। नेहरू परिवार ने अपने वंश के शासन को को लोकतांत्रिक परंपरा में ज्यादा समय तक चलाने के लिए इस परंपरा को जिंदा रखा। लेकिन मोदी ने इस परंपरा को परिवारवाद, वंशवाद से मुक्त कर दिया। यही मोदी की जीत है।

आध्यात्म बनाम विज्ञान !

स्वामी अग्निवेश कह रहे हैं कि इसरो के वैज्ञानिक के राधाकृष्णन अगर मंगलयान मिशन की सफलता के लिए तिरूपति मंदिर जाकर पूजा अर्चना करते हैं और मिशन के सफलता की कामना करते हैं, तो यह अंध विश्वास है। इतना ऊंचा वैज्ञानिक और ऐसी धार्मिक जड़ता? ईश विरोधी स्वामी अग्निवेश का यह सवाल एकबारगी सही भी लगता है कि जब आप उस ग्रह पर जाकर खड़े होने की सोचने लगते हैं जिसे आप अब तक देवता मानकर पूजा किया करते थे, फिर भी ऐसी धार्मिक अंधता तो अंध विश्वास ही है। लेकिन क्या ऐसा है? क्या वास्तव में धर्म विज्ञान की वह पूर्व पीठिका है जिसके नष्ट होने पर ही विज्ञान का उदय होता है? और अगर विज्ञान उदित राज हो जाए तो फिर धार्मिक अंधविश्वास और कर्मकांड के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। 

स्वामी अग्निवेश का विरोध बताता है कि उनका यह बयान पूरी तरह से राजनीतिक है और उनके चर्च समर्थक होने का एक और प्रमाण प्रस्तुत करता है। लेकिन हमारा सवाल स्वामी अग्निवेश से है भी नहीं। ऐसे लोग क्या बोलते हैं और क्यों बोलते हैं उसका मकसद समस्या का समाधान खोजना नहीं होता बल्कि समस्या को और अधिक उलझाना होता है। फिर भी स्वामी अग्निवेश के ही बहाने इस सवाल का जवाब खोजा जाना जरूरी है कि क्या विज्ञान मिल जाने पर धर्म विलीन हो जाता है? और फिर जब हम धर्म की बात करते हैं तो हम किस धर्म की बात कर रहे होते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम धर्म और आध्यात्म का घालमेल कर रहे हैं? ज्यादातर मामलों में अक्सर हम यही करते हैं।

विज्ञान का तात्विक अर्थ विधिवत ज्ञान से है। विशद ज्ञान को भी विज्ञान कहा जा सकता है। लेकिन यह विधिवत, विशद और विस्तृत ज्ञान विज्ञान को कभी पूर्णता प्रदान नहीं कर सकता है। ज्ञान की वैज्ञानिक व्यवस्था में पूर्णतम की बजाय अधिकतम को मान्यता मिलती है। और यह अधिकतम 99.99 प्रतिशत हो जाए तो वैज्ञानिक पूर्णता प्राप्त हो जाती है। आधुनिक औद्योगिक विज्ञान तो यह मात्रा घटाकर और कम कर दे तो कोई आश्चर्य नहीं। पूर्णता या वैज्ञानिक दृष्टिकोण नब्बे प्रतिशत पर भी निर्मित हो सकता है। सत्तर प्रतिशत पर भी। किसी एक प्रयोग में अगर सत्तर से लेकर नब्बे प्रतिशत भी सफलता हासिल कर ली जाए तो उसे वैज्ञानिक सफलता घोषित किया जा सकता है। लेकिन अगर कोई प्रयोग 100 प्रतिशत सफल हो जाए तो? तो क्या उस प्रयोग को हम संपूर्ण वैज्ञानिक सफलता घोषित कर देते हैं?

विज्ञान की मुश्किल यहीं से शुरू होती है। विज्ञान में 100 प्रतिशत पूर्णता जैसी कोई व्यवस्था या सफलता नहीं है। असल में तो प्रयोग की अपूर्णता ही विज्ञान है। क्योंकि जैसे ही प्रयोग को पूर्णता प्राप्त होती है विज्ञान ही विलीन हो जाता है। पूर्णता यह विज्ञान की कसौटी नहीं है। पूर्णता विज्ञान से परे की अवस्था है। विज्ञान में पूर्णता नहीं है बल्कि विज्ञान की पूर्णता है। और वह पूर्णता आध्यात्म है। अधि और आत्म।

अधि का अर्थ अधिष्ठान। स्थिर। और आत्म अर्थात वह जो इस अधि पर अधिष्ठातित है। अधि पर स्थित आत्म। लेकिन स्थिर क्या है जिस पर आत्म अवस्थित है? पृथ्वी से लेकर आकाश और आकाश से लेकर ब्रह्माण्ड तक कहीं कुछ स्थिर है कहां जहां आत्म अवस्थित पाया जाए? पूरे ब्रह्माण्ड की व्यवस्था अस्थिर है। लेकिन अब भौतिक प्रयोग वाले विज्ञान कम से कम हमें इतना तो बता ही दिया है कि इस अस्थिर ब्रंह्मांडीय व्यवस्था में विषम नहीं बल्कि सम व्यवहार है। जीव (पृथ्वी) से लेकर ग्रह (ब्रह्माण्ड) नक्षत्र (अंतरिक्ष) तक सभी एक निर्धारित व्यवस्था में गति कर रहे हैं। अस्थिर हैं लेकिन असम नहीं है। जीव से लेकर अंतरिक्ष तक यह गति इतनी व्यवस्थित है कि तिनका भर भी गति में अदल बदल हो जाए तो सिर्फ पृथ्वी की व्यवस्था ही नहीं बल्कि ब्रह्माण्ड में ऐसा तूफान खड़ा हो जाएगा जो कह कहां जाकर थमेगा कोई विज्ञान उसकी कोई भविष्यवाणी नहीं कर सकता।

न जाने कितने प्रकाश वर्ष से ब्रह्माण्ड और अंतरिक्ष की वह व्यवस्था कायम है जिसके कारण हमारा अस्तित्व है और आनेवाले कितने प्रकाश वर्ष तक वह व्यवस्था कायम रहेगी, इसका भी हमें कोई अंदाज नहीं है। बहुत सारे वैज्ञानिक अध्ययन हैं और उन अध्ययनों के अलग अलग निष्कर्ष भी। लेकिन ज्यादातर अध्ययन हमारे सौर मंडल के बाहर नहीं जा पाये हैं। 200 साल के वैज्ञानिक युग में जी लेने के बाद भी हम आज भी उतने ही ब्रह्माण्ड में भ्रमण कर रहे हैं जितने ब्रह्माण्ड की परिकल्पना 'धर्मकथाओं' में पहले से मौजूद हैं। अंतरिक्ष आज भी हमारे लिए उतना ही अबूझ है, जितना दो से पांच हजार साल पहले अबूझ रहा होगा। अतीत के पूरब से लेकर वर्तमान के पश्चिम तक जितने वैज्ञानिक प्रयोग हो रहे हैं वे एक ब्रह्माण्ड तक सीमित हैं। हमें जहां तक पता चला है वह यह कि अंतरिक्ष में हमारे ब्रह्माण्ड जितने और भी न जाने कितने ब्रह्माण्ड हैं। आकाशगंगाएं हैं। अंतरिक्ष अंतहीन है। अभेद्य है। अगम्य है।

इस अभेद्य, अगम्य और अंतहीन अंतरिक्ष में सिर्फ हमारा ब्रह्माण्ड ही ऐसी व्यवस्था है जिसके कुछ करीब तक पहुंचने की कोशिश हम कर पाये हैं। आनावाले कुछ सौ वर्षों तक अगर इसी तरह मनुष्य के जानने की जीजीविषा बढ़ती रही तो आधुनिक सभ्यता के विलीन होने तक हम ब्रह्माण्ड को शायद अतीत से आगे जाकर कुछ और अधिक जान पायें। इसमें कितना समय लगेगा इसकी कोई समयसीमा नहीं हो सकती। लेकिन ब्रह्माण्ड का रहस्य खोजते खोजते जैसे ही हम ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में अधि का अनुभव करने लगते हैं, एक चमत्कारिक घटना घटित होना शुरू हो जाती है। और वह कहीं और नहीं बल्कि अपने भीतर ही घटित होती है। इससे न तो अतीत के वैज्ञानिक (ऋषि) अछूते थे और न ही वर्तमान के ऋषि (वैज्ञानिक) अछूते रह सकते हैं। क्योंकि आखिरकार विधिवत ज्ञान (विज्ञान) जिस धरातल (आत्म) पर अनुभव उत्पन्न करता है वे ब्रह्माण्ड या शरीर की दो विरोधाभाषी धारणाएं नहीं बल्कि दो विपरीत अवस्था हैं जिसमें एक (विज्ञान) के पूर्ण हो जाने पर दूसरे (आध्यात्म) का अभ्युदय हो जाता है। यह तो हमारे अपने अंदर का विरोधाभास और तर्कबुद्धि का विकास है कि इस पूर्णता को परख नहीं पाते हैं।

ब्रह्माण्ड की व्यवस्था बाहर तो है ही, भीतर भी है। हर एक जीव एक संपूर्ण ब्रह्माण्ड है। अंतरिक्ष की दूसरी आकाशगंगाओं में तैरनेवाले ब्रह्माण्डों में अगर कहीं जीवन मौजूद है तो उनमें क्या व्यवस्था है, यह जानना शायद ही कभी संभव हो पाये लेकिन जिस एक ब्रह्माण्ड को हम समझ पाये हैं उसकी व्यवस्था और जीव के भीतर की व्यवस्था दो अलग अलग व्यवस्था बिल्कुल नहीं है। शायद यही कारण है कि अतीत में नक्षत्र विज्ञान को जीव पर पड़नेवाले प्रभाव से जोड़ दिया गया होगा। हमारे सौर मंडल के ब्रह्माण्ड में जितने ग्रह हैं वे सभी ग्रह हमारे पिण्ड में मौजूद हैं। अगर सौर मंडल के ब्रह्माण्ड का रहस्य समझने के लिए हम वैज्ञानिक उपकरणों और प्रयोगशालाओं का सहारा ले रहे हैं तो पिण्ड के भीतर अवस्थित ब्रह्माण्ड को भी समझा जा सकता है। अनुभव किया जा सकता है। पूरब ने पहले भी इस पर बड़ा काम किया है। और अब भी कर रहा है।

लेकिन न जाने क्यों और कैसे विज्ञान को आध्यात्म का दुश्मन साबित कर दिया गया। हमारे बुद्धि में यह बात न जाने क्योंकर बिठा दी गई है कि विज्ञान सर्वश्रेष्ठ चमत्कार है जबकि धर्म निकृष्ट अंधविश्वास। हमने इस लिहाज से कभी क्यों नहीं सोचा कि पिण्ड के जरिए ब्रह्माण्ड की व्यवस्था को अध्ययन करने की जो व्यवस्था है वह धर्म है। और उस धर्म का अनुपालन करने पर जो पूर्णता प्राप्त होती है, वह आध्यात्म है। विज्ञान भी तो उसी पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयासरत है। फिर दोनों में विरोधाभास कहां से आ गया? जो विज्ञान के रास्ते पर है वह अपनी पूर्णता (आध्यात्म) के अस्तित्व को कैसे नकार सकता है? और जिसे पूर्णता प्राप्त करनी है वह अवैज्ञानिक होकर भविष्य में कितना पग धर सकता है? पिण्ड को ब्रह्माण्ड से अलग कैसे किया जा सकता है? क्या स्वामी अग्निवेश इस बारे में कुछ बताएंगे?

संकट में सेफोलॉजिस्ट की भूमिका !

भले ही जनमत संग्रह "सेफोलॉजी" को विज्ञान का दर्जा दिया गया है और इसके विशेषज्ञ को सेफोलॉजिस्ट माना जाता है, लेकिन भारत के सन्दर्भ में इस विज्ञान की कोई उपयोगिता नहीं है. भारत एक विशाल एवं विविधितापूर्ण देश है और यहाँ इस तरह का जनमत संग्रह करवाना व्यावहारिक नहीं है. इस आलोक में जनमत संग्रह के पैमानों को भी सही नहीं माना जा सकता है. इसतरह के विज्ञान की उपयोगिता विकसित देशों में तो हो सकती है, लेकिन भारत में ऐसे सर्वेक्षणों के परिणाम के सही होने की उम्मीद करना बेमानी है.

देश में जनमत संग्रह पर घमासान मचा हुआ है। इसके मूल में चुनाव आयोग द्वारा जनमत संग्रह पर सभी राजनीतिज्ञ दलों से मांगी गई राय है. इस संबंध में विविध राजनीतिज्ञ दलों की राय अलग-अलग है. कांग्रेस, माकपा, बसपा आदि दलों का मानना है कि चुनाव पूर्व करवाये गये सर्वेक्षण से मतदाता प्रभावित होते हैं. वहीं प्रमुख विपक्षी दल भाजपा इन दलों की राय से इतिफाक नहीं रखती है। उसका कहना है कि सर्वेक्षणों पर रोक नहीं लगाया जाना चाहिए, क्योंकि इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होगा.

उसका यह भी मानना है कि हालिया जनमत संग्रहों में चूँकि कांग्रेस भाजपा के मुक़ाबले पिछड़ रही है, इसलिए कांग्रेस पार्टी डर गई है और उसे लग रहा है कि इस तरह के जनमत संग्रहों से जनता के बीच नकारात्मक संदेश जायेगा। लिहाजा वह चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों पर प्रतिबंध लगाने की वकालत कर रही है. गौरतलब है कि अटार्नी जनरल ने भी मामले में कांग्रेस के सुर में सुर मिलाया है. कानून मंत्रालय का मानना है कि मामले में चुनाव आयोग को फैसला करना चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग ने फ़िलहाल गेंद राजनीतिज्ञ पार्टियों के पाले में डाल दिया है.

बता दें कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद से जनमत संग्रह का चलन बढ़ा है, जिसे समग्रता में टीआरपी से जोड़कर देखा जा सकता है। जनमत संग्रह के सही साबित होने पर खबरिया चैनल उसे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते या प्रस्तुत करते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कारण मीडिया घरानों का राजनीतिज्ञ दलों से निकटता का होना है। मौजूदा समय में कॉरपोरेटस या नेतागण सभी मीडिया की ताकत के आगे नतमस्तक हैं. दक्षिण भारत के अधिकांश अखबारों व खबरिया चैनलों के मालिक नेता हैं, तो उत्तर भारत में कार्पोरेट्स. ये सभी अपने फायदे के लिये मीडिया का इस्तेमाल करते हैं.

मसलन, पीपुल्स समाचार और राज एक्सप्रेस मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले ऐसे दो अखबार हैं, जिनके मालिकों ने सिर्फ अपने मूल बिजनेस को कवच प्रदान करने के लिये इनका प्रकाशन शुरू किया था। अगर सर्वेक्षण करवाने वाले मीडिया घराने का मालिक नेता है तो वह निश्चित रूप से जनमत संग्रह में अपनी पार्टी का समर्थन करेगा। इसी तरह यदि जनमत संग्रह करवाने वाले मीडिया घराने का मालिक कार्पोरेट्स है तो वह किसी पार्टी विशेष का समर्थन करेगा, क्योंकि वर्तमान समय में तकरीबन सभी कार्पोरेट्स किसी न किसी पार्टी विशेष का समर्थन करते हैं। उनका कारोबार सरकार की कृपादृष्टि रहने पर ही फलता-फूलता है. आजकल चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है. किसी भी स्थिति में चुनाव जीतने की ललक ने पेड जनमत संग्रह करवाने के चलन को बढ़ाया है.

ऐसे समय में पेड जनमत संग्रह की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है. इस संबंध में आम आदमी पार्टी के सदस्य योगेंद्र यादव के द्वारा दिल्ली विधानसभा के चुनाव पूर्व किये गये आकलन का जिक्र करना समीचीन होगा, जिसमें उन्होंने अपने ही सर्वे में अपनी ही पार्टी (आम आदमी पार्टी) की दिल्ली में सरकार बनवा दी थी. जाहिर है श्री यादव का यह आकलन पूर्वाग्रह से ग्रसित है.

दूसरे परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जाये तो सर्वेक्षणों का परिणाम हमेशा सही हो, जरूरी नहीं है, क्योंकि आमतौर पर सर्वेक्षण सैंपल बेसिस पर करवाया जाता है। जनमत संग्रह में अमूमन दो-चार शहरों में जाकर दो-चार हजारों लोगों का मत लिया जाता है और उसी के आधार पर पूरे देश में जनता के रुझान का आकलन व प्रचार-प्रसार किया जाता है. इसतरह के आकलनों में कहा जाता है कि अमुक पार्टी के चुनाव में जीतने की संभावना अधिक है। इसतरह की खामियों की वजह से पूर्व में कई मर्तबा सर्वेक्षणों के परिणाम गलत साबित हुए हैं. यहाँ बताना जरूरी है कि वर्ष 2009 में करवाये गये सर्वेक्षणों में बताया गया था कि भाजपा को सत्ता मिलेगी, लेकिन चुनाव परिणाम आने पर सर्वेक्षणों में किया गया दावा गलत साबित हो गया। यह भी देखा गया है कि हर सर्वेक्षण के आकलन अलग-अलग होते हैं. मसलन, एवीपी टीवी द्वारा करवाये गये सर्वेक्षण में कांग्रेस को विजयी बताया जाता है तो आजतक के सर्वेक्षण में भाजपा को। इस अंतर का खुलासा कोई नहीं करता है और न ही इस मुद्दे पर कोई बहस होती है.  

वर्ष 2009 के आम चुनाव में पेड न्यूज़ के माध्यम से जनता को गुमराह करने के अनेकानेक मामले देखने को मिले थे, जिसके कारण मतदाताओं के रुझान में परिवर्तन आया  था. स्पष्ट है इस तरह की गतिविधि लोकतंत्र के लिये घातक है. लोकतांत्रिक मूल्यों की गरिमा को अक्षुण्ण रखने के लिये जरूरी है कि आलोकतांत्रिक कृत्यों को बढ़ावा नहीं दिया जाये. हमारे देश में मीडिया पर आज भी आँख मूँदकर भरोसा किया जाता है. अपनी बात को रखने या साबित करने के लिये लोग अक्सर अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों का सहारा लेते हैं. अखबार में प्रकाशित ख़बरों के आधार पर सत्ता तक बदल जाती है. पुलिस या सीबीआई भी अखबार में प्रकाशित ख़बरों को अपने अनसंधान का जरिया बनाती हैं. उल्लेखनीय है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आने के बाद से मीडिया के प्रभाव एवं दायरे में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है.

गलत खबरों से मतदाता का प्रभावित होना लाजिमी है. पेड न्यूज़ से गलत ऊमीदवार व पार्टी के सत्ता में आने की संभावना बढ़ जाती है. मोटे तौर पर पेड जनमत संग्रह को भी इसी आईने से देखा जा सकता है. आज भी हमारे देश में किसी पार्टी विशेष की लहर चलती है और इस तरह के लहर में "विचार" या "तर्क" के लिये कोई स्थान नहीं होता है. दरअसल हमारे देश में अभी भी वास्तविक साक्षरों की संख्या बहुत कम है.इस कारण यहाँ जाति व धर्म के आधार पर मतदान किया जाता है. इस क्रम में उम्मीदवार की ईमानदारी या उसके द्वारा किये गये विकास से जुड़े काम को तरजीह नहीं दी जाती है, जिसका फायदा बाहुबली उठाते हैं और चुनाव जीतकर विधानमंडल या संसद का हिस्सा बन जाते हैं.   

भारत एक विकासशील देश है। यहाँ की अधिकांश जनता अभी भी निरक्षर है, जो साक्षर है वह भी केवल नाम के लिये है. केवल नाम लिखने वाले साक्षरों की संख्या अभी भी हमारे देश में करोड़ों है. इसके अतिरिक्त भारत की 70 प्रतिशत जनता गावों में निवास करती है और उनका इस तरह के जनमत संग्रहों से कोई लेना-देना नहीं होता है. इस दृष्टिकोण से देखा जाये तो आज की तारीख में भी हमारे देश की जनता अपरिपक्व एवं इस तरह के आडम्बरों से अनजान है. न तो वह नीतिगत निर्णय लेने में सक्षम है और न ही उसके पास कोई विचार या तर्क है. इन कमियों की वजह से जनप्रतिनिधि का चुनाव गुणवत्ता के आधार पर नहीं हो पाता है. जाति एवं धर्म अक्सर जनता के निर्णय को प्रभावित करते हैं. इस तरह के संक्रमण के दौर में जनमत संग्रह की विश्वसनीयता को संदेह से परे नहीं माना जा सकता. जनमत संग्रह पर चल रहे घमासान का मूल कारण सर्वेक्षणों में भाजपा का कांग्रेस से आगे होना है, जोकि कांग्रेस को गवारा नहीं है. इस बाबत मजेदार बात यह है कि यदि सर्वेक्षण कांग्रेस के पक्ष में होता तो यकीनन कांग्रेस जनमत संग्रह का विरोध नहीं करती. पूरा खेल स्वार्थ का है.

आपदा की आड़ में धर्मांतरण की बाढ़ !

देहरादून और टिहरी में बहुत दूरी नहीं है। लेकिन इन दोनों ही जगहों से एक जगह बहुत दूर है जिसका नाम केदारनाथ है। इसलिए केदारघाटी में आपदा आई तो उसका असर न टिहरी पर पड़ा और न ही देहरादून पर। असर भले ही तराई तक न आया हो लेकिन यह आपदा भी एक अवसर लेकर आई है। ईसा भक्तों के लिए। ईसाई धर्म प्रचारक उत्तराखण्ड में जगह जगह अपने धर्मांतरण अभियान के तहत अब उत्तराखण्ड आपदा का जिक्र करते हुए यह समझा रहे हैं कि अगर हिन्दुओं के भगवान होते तो ऐसी आपदा क्यों आती? हिन्दुओं के भगवान नाकाम हो गये जिसके कारण यह आपदा आई। ऐसी आपदाओं से बचना है ईसा की शरण में जाना पड़ेगा क्योंकि इस तबाही का जिक्र आज से 3500 साल पहले लिखी बाइबल में किया जा चुका था।

दून में धर्मांतरण की धूम

देहरादून में धर्मांतरण अभियान के एक उदाहरण से यह बात शीशे की तरह साफ हो जाती है कि कुछ ईसाई संगठन सुनियोजित तरीके से गरीब और नासमझ लोगों के मनोविज्ञान से खेलकर धर्मांतरण करा रहे हैं। देहरादून में कैनाल रोड स्थित रमोला परिवार के सभी सदस्य बड़े संदेहास्पद और संगठित तरीके से लोगों को धर्मांतरण करा रहे हैं। इसका एक ज्वलंत उदाहरण देखिए।

केदारनाथ मंदिर में 16-17 जून को आयी भयंकर आपदा के क्या कारण थे? क्या यह आपदा भगवान के नाकाम हो जाने के कारण आई? उत्तराखंड में जेहादी तौर पर धर्म परिवर्तन के काम में जुटे ईसाई धर्म प्रचारक तो कम से कम यही समझा रहे हैं। उनका साफ कहना है कि 3500 साल पहले लिखी गई बाईबिल में केदारनाथ की तबाही का ब्यौरा लिखा गया है।

ईसाई प्रचारक इन दिनों आपदा के जख्म झेल रहे उत्तराखंड के दुखी व पीडि़त लोगों को इस तर्क की आड़ में फुसला रहे हैं। देहरादून के कैनाल रोड स्थित एक नई नवेली चर्च के ईसाई प्रचारक दीपक रमोला ने तो यहां तक कह दिया कि हिन्दु देवी-देवता चाहकर भी इस आपदा को टाल नहीं सकते थे। क्योंकि उनके पास तो यह अधिकार ही नहीं है। नए-नए प्रचारक बने दीपक यहीं नहीं रुके उन्होंने यह भी कहा कि जब देवता अपने मंदिर को नहीं बचा सके तो हिन्दुओं को क्या बचाएंगे?

यह बात बिल्कुल साफ है कि धर्म परिवर्तन के लिए किया जा रहा यह व्यवहार भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बिल्कुल उलट है। धर्म परिवर्तन के लिए बहकाने, धर्म के नाम पर डराने, प्रोपेगेंडा करने की आजादी भी किसी धर्म प्रचारक को हासिल नहीं है। बावजूद इसके मौत का डर दिखाकर लोगों को इसाई बनाने का काम हो रहा है।

कैनाल रोड के आखिरी छोर पर इंडेन गैस गोदाम के सामने बने चर्च के गेट पर  छोटे से बोर्ड पर चर्च के साथ-साथ प्रार्थना भवन का भी जिक्र किया गया है। गेट पर दस्तक देने पर भीतर की तरफ से आई महिला ने हमारा परिचय अमित नाम के एक युवक से कराया। जिससे जानकारी हुई कि इस प्रार्थना भवन तथा चर्च की स्थापना 2006 में की गई है और पास्टर रमोला इस चर्च का संचालन करते हैं। अमित ने बताया कि उसने डेढ़ साल पहले ही ईसाई धर्म अपनाया है। वह देहरादून में सेलाकुई के निकट हरबर्टपुर ग्राम पंचायत का रहने वाला है और उसके पिता का नाम महेंद्र पाल है। अमित कुमार अब इसी चर्च में रहता है और इसी बिल्डिंग के गेट से लगी चिकन मटन की दुकान चलाता है। ईसाई धर्म अपना रहे लोगों की जिंदगियों में आ रहे आर्थिक-सामाजिक प्रभाव के बारे में न तो अमित को कुछ मालूम है और न वह इस सवाल पर बात करना चाहता है। अमित का कहना है कि जब ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाकर मार डाला गया और उन्हें कब्र में डाल दिया गया, उसके तीन दिन बाद ईशु जी उठे और 4० दिनों तक लोगों को दिखाई देते रहे। अमित पूरी तरह से इस चमत्कार के वश में है और पूछता है आपने ऐसा चमत्कार क्या किसी दूसरे धर्म में कभी सुना या देखा है?

बातों-बातों में पता चला कि पास्टर रमोला का पूरा परिवार ही गरीब और वंचित लोगों को ईसाई बनाने के मिशन में जुटा हुआ है। मूल रूप से टिहरी जिले की भिलंगना घाटी निवासी पास्टर रमोला पिछले 15 सालों से देहरादून के चुक्खु मोहल्ला स्थित इंदिरा कालोनी में रहता है, लेकिन उसके जानकार उसके अलग-अलग ठिकानों का जिक्र करते हैं।

कैनाल रोड का यह चर्च भी पास्टर रमोला की  संपत्ति है, लेकिन उनका परिवार नये संपर्क में आए किसी भी व्यक्ति के सामने यह बात जाहिर नहीं होने देता। इस चर्च का धर्म प्रचारक पास्टर रमोला का बेटा दीपक रमोला है, जो कि खुद को इतिहास, भूगोल और धर्म शास्त्र का बड़ा ज्ञाता बताता है। लेकिन बाप-बेटे और परिवार के अन्य सदस्य प्रार्थना के दौरान अलग-अलग स्थानों पर बैठकर प्रार्थना का संचालन करते हैं और अपने मुताबिक लोगों को ढालते चलते हैं। अमित के अलावा इस चर्च में उत्तरकाशी और हरबर्टपुर का एक और लडक़ा, जिनका हाल-फिलहाल में धर्म परिवर्तन कराया गया है, रह रहे हैं। इतना ही नहीं पास्टर रमोला ने अपने पुत्र की शादी भी गढ़वाल के एक चौहान परिवार में की है।

चूंकि मिशन और उसकी गतिविधियों से जुड़ी अधिक जानकारी देने के पक्ष में यह लोग नहीं थे तो उन्होंने हमें पास्टर रमोला का मोबाइल नंबर देकर यह बताते हुए विदा किया कि अगले दिन रविवार को प्रार्थना सभा होगी। अगर हम पहुंचें तो पास्टर रमोला से हमारी मुलाकात होने के साथ ही हम इस प्रक्रिया को समझ सकते हैं।

अगले दिन 25 अगस्त को सुबह के करीब 11 बजे हम फिर वहीं पहुंच गए। रविवार को इस भवन के बेसमेंट में बना एक हाल लगभग भरा हुआ था। प्रार्थना के समय हाल में 23 पुरुष, 19 महिलाएं और 5 बच्चे मौजूद थे। पास्टर रमोला से मिलने की बात कहकर हम आसानी से हाल में दाखिल हो गए, जहां हमें बताया गया कि प्रार्थना के मध्यान्ह काल तक पास्टर रमोला से मिलना संभव नहीं है। प्रार्थना के लिए लोग घनसाली, हरबर्टपुर, राजपुर और कैनाल रोड में चर्च के आस-पास से जमा हुए थे। मंच पर पास्टर रमोला का बेटा दीपक रमोला धर्म प्रचारक के रूप में सभा को संबोधित कर रहा था। जोश-खरोश के साथ अपने अंग-प्रत्यंग हिलाते हुए वह अध्याय दर अध्याय बाइबिल के चरित्रों को वहां मौजूद लोगों को समझा रहा था। इस बीच एक बड़े मॉनीटर में ईसा मसीह के शूली में चढ़ाए जाने के दौरान के चित्र बार-बार लोगों को दिखाए जा रहे हैं।

सबसे बड़ा प्रोपेगेंडा यह है कि जैसे ही वह बाइबिल में बताई किसी अच्छाई या बुराई का ब्यौरा लोगों को बताता, सबसे पहले मंच के बायीं तरफ कुर्सी में आराम से बैठे पास्टर रमोला सबसे जोर से कहते-‘सच है, यहोवा, यह सच है, सच कहा’, ऐसा ही फिर प्रार्थना सभा में मौजूद दूसरे लोग भी कहते। हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं का जिक्र भी प्रचारक दीपक रमोला ने अनेक बार किया। उसका कहना था कि लोगों को अपनी जान बचाने के लिए हिन्दू धर्म को छोडक़र ईसा मसीह की शरण में आना ही पड़ेगा। साथ ही उसने यह भी जोड़ा कि जब भगवान केदारनाथ की तबाही को नहीं रोक पाए तो वे हिन्दुओं की रक्षा कैसे करेंगे?

ईसाई धर्म के अलावा अन्य धर्म के लोगों को शैतान की संज्ञा देना भी दीपक रमोला नहीं भूला। प्रार्थना सभा में मौजूद आम लोगों को जोडऩे के लिए रमोला परिवार का सबसे बड़ा ढोंग यह है कि पास्टर रमोला प्रार्थना के दौरान बीच-बीच में मंच पर चढक़र दीपक को गले लगाते और उसकी सराहना करते। प्रचारक बीच-बीच में जोर देकर इस बात को कहता, आज न्याय का दिन है और यहां मौजूद लोगों को ईशु ने इस दिन के लिए चुना है।’ साथ ही उसने कहा कि आज न्याय की देवी ने अपना दरबार लगाया है और लोगों की ओर इशारा करके वह कहता, कि आपको, आपको और आपको इसके लिए चुना गया है। ईसा मसीह को सूली में चढ़ाने के बाद जब प्रसंग में वह जी उठा तो प्रचारक ने जोर से कहा कि ‘और ईशु जी उठा’। मार डाले गए ईशु के चमत्कारिक ढंग से जी उठने के प्रसंग के बाद वहां मौजूद महिलाओं ने रोना शुरू कर दिया, लेकिन सबसे पहले रमोला परिवार की बहू ने ही रोना शुरू किया। बेसमेंट में बनाए गए इस चर्च को इस तरह से बनाया गया है, जैसे कोई कोल्ड स्टोर। बस्ती के बीच में बने इस चर्च के हॉल की बंद खिड़कियों को अंदर से परदों से सील किया गया है। इतना ही नहीं ‘ईगल्स डेल’ नाम के इस हॉल को चारों तरफ से सीलबंद करने का काम भी तेजी से चल रहा है। ईंटों की मजबूत दीवार लगाकर हॉल को एयर टाइट बनाया जा रहा है।

प्रार्थना सभा में मौजूद घनसाली, टिहरी के धनपत सिंह जो कि 6 महीने पहले ही ईसाई बने हैं, उनका कहना है कि बहते पानी के बीच जैसे उन्हें तिनके का सहारा मिला है। हिन्दू धर्म में रहते हुए उनके घर के सभी सदस्य लगातार बीमार रहते थे और देवी-देवताओं की पूजा और इलाज में बहुत सारा पैसा खर्च होता था, लेकिन अब सब ठीक हो गया है। लेकिन यह पूछने पर कि ईसाई बनने पर देवता पूजना तो कम हो सकता है, लेकिन बीमार लोग कैसे ठीक हुए, इसका जवाब वह नहीं दे पाए। प्रार्थना के बाद पास्टर रमोला से बात करने पर उन्होंने सबसे पहले फंड की  व्यथा सुनाई। खुद को फंड के फेर से दूर बताते हुए उन्होंने कहा कि एड तो एड्स की बीमारी जैसी होती है। और हम ‘फंड में ठंड करो’ से दूर हैं। नए-नए ईसाई बन रहे युवकों और महिलाओं पर इन बाप-बेटे का इतना असर है कि बातचीत के दौरान भी यह लोग उन्हें घेरे रहते हैं।

दूसरे दिन जब दीपक रमोला से मिलने आए तो देखा, आज उनकी चाल और अंदाज बिल्कुल बदला हुआ है। एक आम शहरी की तरह वह अपने पारिवारिक चर्च की नई बन रही चहारदीवारी का काम करवा रहा है। बातचीत की शुरुआत में ही वह केदारनाथ के प्रसंग को जोड़ते हुए हिन्दू देवी-देवताओं को त्रासदी न रोक पाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए कहता है कि यह त्रासदी पहले ही बाइबिल में लिखी गई है और इसे हिन्दू देवी-देवता रोक नहीं पाए। साथ ही पावर टू चूज, सोल एण्ड स्प्रिट के साथ ही प्यार, लगाव, सेवा जैसी अनेक बातों को समझाते हुए वह कहता है कि आज पूरा हिन्दुस्तान और दुनिया का एक बड़ा भाग रोमन कैथोलिक के मुताबिक चल रहा है। यहां तक कि कैलेंडर, कम्प्यूटर और शेयर बाजार भी रोमन के मुताबिक ही है। इस तरह से वह कहता है कि रोमन कैलेंडर यूज करने वाले लोग रोमन कैथोलिक ही तो हुए।

एक और बात जिसे वह जोर देकर समझाता है कि 6०6 ई.पूर्व दुनिया के 127 देशों में मादी फारसी सभ्यता के अहोसोरस राजा का राज था। भारत भी इसी राज्य का हिस्सा था और ग्रे गोरियस कैलेंडर, जो कि तारों-सितारों पर आधारित है, वह मादी-फारसी सभ्यता की ही देन है। इस तरह वह जोडक़र कहता है कि ऐसे भी तो पूर्व में गढ़वाल में ईसाई शासन रह चुका है और लोग ईसा के पास लौट रहे हैं। उत्तराखंड में चर्च की गतिविधियों पर दीपक रमोला कहते हैं, हम कोई एनजीओ या समाजसेवा की संस्था नहीं हैं। हम तो धर्म प्रचारक हैं। हम लोगों को समझाते हैं ‘अपनी जिंदगी बचाके भागो।’

खाड़ी गांव में खड़े ईसा

टिहरी में नरेंद्रनगर ब्लॉक से 30 किमी. आगे खाडी गांव है। यूं तो यह जगह कई सामाजिक आंदोलनों की जनक रही है, किंतु पिछले कुछ समय से यहां एक धार्मिक आंदोलन गुपचुप पैर पसार रहा है। एक इतवार की सुबह हम यहां पहुंच गए। खाड़ी से 2 किमी. पहले जाजल से बायीं ओर एक रास्ता उदखण्डा गांव को जाता है। इस रास्ते पर कई लोग झुण्ड बनाकर चल रहे थे। महिलाएं, बच्चे, बूढे, जवान सब। पहले तो हमें लगा कि आसपास गांव में कोई मेला लगा है। जिज्ञासावश हम भी उनके साथ-साथ चलने लगे। एक महिला को हमने पूछा कि आप लोग कहां जा रहे हैं? तो वह बोली कि हम सत्संग में जा रहे हैं। हमने पूछा कि राधास्वामी के सत्संग में? इस बार वह थोड़ा शर्माते और मुस्कराते हुए बोली, नहीं! क्रिश्चियन के सत्संग में।

कुछ ही दूर चलने पर जंगल के बीच में हमें एक सफेद रंग का बड़ा सा मकान दिखाई दिया। मकान से पहले ही काली पैंट सफेद कमीज पहने एक आदमी दिखा। हम उसी आदमी की ओर आगे बढ़े और दुआ-सलाम हुई। उसने बताया कि हम सब लोग यहां पर हर रविवार ईशु की प्रार्थना करने आते हैं। वह उत्साहित होकर कहने लगा- ‘‘ईशु की प्रार्थना में बड़ी शक्ति है साब। मैंने जीवन में हमेशा 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा की, लेकिन मैं हमेशा परेशान रहा। अब देखो साब, केदारनाथ में इतनी बड़ी आपदा आई। हजारों लोग मारे गए, तो बताओ साब कहां गए इतने करोड़ देवी-देवता।’’

सब लोग पास के ही गांव पिपलेथ, टिपली, जाजल, आमसेरा और सिलासौढ,  के रहने वाले हैं। ये सभी अनुसूचित जाति के बहुल गांव हैं। मान सिंह ने यह भी बताया कि ये सब वे लोग हैं जो इस समाज की धार्मिक मान्यताओं से खिन्न हो चुके हैं। अब सब लोग अपनी राह बदलना चाहते हैं। प्रभु ईशु की शरण में आना चाहते हैं। उसने अपना पूरा नाम मान सिंह रौतेला बताया। वह पास के ही गांव रामपुर का रहने वाला है। उसने बताया कि कई साल पहले पास के गांव की एक लडक़ी को वह बहुत चाहता था, किंतु वह हमारी जाति से थोड़ी छोटी जाति की थी। हमारे रिश्तेदार और गांव वालों ने इस बात का विरोध किया कि मैं उस छोटी जाति की लडक़ी से शादी करने वाला हूं। कई जिल्लतें सहने के बाद मैंने उसी लडक़ी से शादी की। गांव से मेरा बहिष्कार कर दिया गया।  तभी से मेरा जाति व्यवस्था से विश्वास टूट गया साब। इस बात को 10-12 साल हो गए साब। तब से अब तक आसपास के चार-पांच सौ लोग प्रभु ईशु की शरण में आ चुके हैं। रौतेला ने बताया कि अभी कुछ महीने पहले ही प्रभु ईशु की कृपा से हमने यहां पर यह प्रार्थना भवन बनाया है।

हमने प्रार्थना भवन की ओर देखा तो लगभग 100 से ज्यादा लोग अंदर हाल में बैठ चुके थे। सब लोग मंत्रमुग्ध होकर भजन में लीन थे। पीछे एक बैनर टंगा था, ‘हे सारी पृथ्वी के लोगों, यहोवा की जय-जयकार करो। आनंद से यहोवा की आराधना करो। जय-जयकार के साथ उसके सामने आओ।’ सब लोग जोर-जोर से ईशु का भजन गा रहे थे। बीच में खड़ी लडक़ी क्रास का चिन्ह वाले डायस पर रखी एक किताब देखकर बीच-बीच में भजनों का अर्थ समझा रही थी। एक-डेढ़ घंटे में चार से छह भजन पूरे हो चुके थे। अब सब अपनी-अपनी जगह पर खडे हो गए। पास्टर मान सिंह ने सामने डायस पर आकर उपदेश देना शुरू किया। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ईशु ही सच है, बाईबिल ही सच है। आज न्याय का दिन है, ईशु ने तुम्हें चुना है।’ आदि आदि। कुछ महिलाएं भावुकता के उफान में रोने लगी। बैकग्राउंड में भजन भी चल रहे थे। पास्टर मान सिंह ईशू का महिमामंडन कर रहा था। ईसा का आशिर्वाद चारों तरफ बरस रहा था। देवभूमि को 'हिन्दू देवताओं' से मुक्त कराने का ईसाई अभियान जारी है।

09 November 2013

सरकार किसी को डराती है तो किसी को बचाती है !

सीबीआई को लेकर जिस फैसले पर सरकार का हाथ पैर फुला हुआ वो दरअसल पूरा फैसला है क्या आईये हम आपकों विस्तार से बताते हैं। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की बेंच ने इस फैसले में कहा कि सीबीआई पुलिस फोर्स नहीं है, इसलिए वह न तो अपराधों की जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दायर कर सकती है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई को गैरकानूनी ठहरा दिया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में उस प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की सभी कार्रवाइयों को भी असंवैधानिक करार दिया है।

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि सीबीआई का गठन निश्चित जरूरत को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए ही किया गया था और गृह मंत्रालय का वह प्रस्ताव न तो केंद्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही उसके साथ राष्ट्रपति की स्वीकृति का कोई कार्यकारी आदेश है। कोर्ट का कहना है कि अपराध की जांच करने वाली ऐसी एजेंसी, जिसके पास पुलिस बल की शक्तियां हों, उसकी स्थापना केवल एक कार्यकारी निर्देश के जरिये नहीं की जा सकती।

कार्ट ने अपने फैसले में विस्तार से कहा है कि मामला दर्ज करने, आरोपियों को गिरफ्तार करने, तलाशी लेने जैसी सीबीआई की कार्रवाई संविधान की धारा-21 का उल्लंघन है। यही कारण है कि कोर्ट ने 1 अप्रैल, 1963 के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसके तहत सीबीआई की स्थापना की गई थी। सीबीआई, दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट एक्ट यानी डीएसपीई का अंग नहीं है। डीएसपीई कानून 1946 के तहत गठित एक पुलिस बल के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस प्रस्ताव को सिर्फ विभागीय निर्देश ही माना जा सकता है और उसे कानून के रूप में नहीं बदला जा सकता है।

असम में बीएसएनएल के कमर्चारी नवेंद्र कुमार के खिलाफ 2001 में सीबीआई ने आपराधिक षडयंत्र रचने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था, जिसके बाद नवेंद्र ने संविधान के तहत सीबीआई के गठन को चुनौती देते हुए अपने खिलाफ दायर एफआईआर को खारिज करने की मांग की। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने उसकी याचिका खारिज कर दी।

मगर नवेंद्र ने इसके बाद हाईकोर्ट की डबल जज बेंच में याचिका दायर की, जिसके बाद जस्टिस इकबाल अहमद तथा जस्टिस इंदिरा शाह ने यह फैसला सुनाते हुए सीबीआई के गठन को असंवैधानिक करार दिया। हाईकोर्ट ने नवेंद्र के खिलाफ सीबीआई द्वारा दायर की गई चार्जशीट तथा मामले की सुनवाई को खारिज कर दिया।

अदालत ने आगे कहा, मामला दर्ज करने, किसी व्यक्ति को अपराधी के रूप में गिरफ्तार करने, जांच करने, जब्ती करने, आरोपी पर मुकदमा चलाने जैसी सीबीआई की गतिविधियां संविधान के अनुच्छेद-21 को आघात पहुंचाती हैं और इसलिए उसे असंवैधानिक मानकर रद्द किया जाता है।

मगर अब सरकार ने सीबीआई को असंवैधानिक करार दिए जाने के गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया है। गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल जी वाहनवती ने अर्जी दी थी।

सरकार चाहती थी कि गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले पर स्टे मिल जाए। क्योकि यदि ऐसा नहीं होता तो कई अहम मामलों की सीबीआई जांच खटाई में पड़ जाने की आशंका थी। साथ ही सरकार के सबसे उपयोगी तोता पिजरे से आजाद हो जाता जिसके सहारे सरकार किसी को डराती है तो किसी को बचाती है।

क्या सीबीआई को बंद कर देना चाहिए ?

                            तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि कारवां क्यों लुटा।
                              मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।।

कुछ इसी अंदाज में सीबीआई को लेकर गुवाहाटी उच्च न्यालय ने सवाल खड़ा किया है। कलतक सरकारी भाशा बोलने वाला तोता आज खुद अपने ही अस्त्वि और वजूद को लेकर सवालों के घेरे में है। जिस तोते के आगे अब तक बड़े बड़े मंत्री से लेकर संत्री तक की तूती बोलती थी, आज वही इस तोते से पता पूछ रहे है। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की बेंच ने इस फैसले में कहा कि सीबीआई पुलिस फोर्स नहीं है, इसलिए वह न तो अपराधों की जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दायर कर सकती है। तो सवाल खड़ा होता है कि क्यों न फिर सीबीआई को बंद कर दिया जाय?

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सीबीआई को गैरकानूनी ठहरा दिया है। कोर्ट ने उस प्रस्ताव को भी रद्द कर दिया, जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था। हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की सभी कार्रवाइयों को भी असंवैधानिक करार दिया है। चुनावी माहौल में सीबीआई का दुरुपयोग का मामला इस हदतक पहुंच गया जहां विपक्ष अपनी लड़ाई कांग्रेस की जगह सीबीआई को उमीदवार बता डाला। मगर आज इस उमीदवार की उमीदवारी जब असंवैधानिक हो गया तो विपक्ष भी इसे तोता समझ कर खुली हवा में छोड़ दिया। तोते की आजादी के बहाने ही सही अब तो राजा से कलमाड़ी तक खुली वहा में सांस लेने की ख्वाब देखने लगे है। तो वहीं 1984 के सिख दंगे के आरोपी सज्जन कुमार न्यालय पहुंच गए है। ऐसे में एक सवाल यहा भी खड़ा होता है कि क्या इस हालात में सीबीआई को बंद कर देना चाहिए?

सरकार अपनी सत्ता और साख बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। तो वही तोते के चंगुल में फंसे आरोपी अपनी खुद की साख साफ सुथरी करने के लिए कतार में आकर खड़े है। आरोपी कोर्ट में आईपैड पर गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को दिखा कर न्याय मांग रहे हैं , और जो सजा काट चुका है वह प्राकृतिक न्याय को अन्याय बता रहे हैं।

कहने को तो सीबीआई एक स्वायत्त संस्था है परन्तु हकीकत इसके ठीक उलट है। विभिन्न मौकों पर सत्तारूढ़ दल के द्वारा इसका गलत इस्तेमाल होता रहा है हजारों आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। राजनीतिक फायदों के लिए सीबीआई का बेजा इस्तेमाल किया गया और अपने हितों को साधने के लिए उसे पंगु बना कर रखा गया ताकि सत्ता की बागडोर हाथों से न फिसल जाये। माया मुलायम से लेकर जगदीश टाइटलर, तक, और बोफोर्स घोटाला, गोधरा कांड, इशरत जहां एनकाउंटर, आदर्श सोसायटी, टुजी स्पेक्ट्रुम, हिंडाल्को जैसे मामले इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। 

सत्ता के लिये कैसे सीबीआई सत्ता के निर्देश पर काम करता है यह कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ने ऐसे ऐसे प्रयोग किये हैं कि सीबीआई देश में जांच एजेंसी से ज्यादा पिंजरे में बंद तोता बन गया है। जिसे पिंजरे से खोलने का डर दिख कर सत्ताधारी अपनी सत्ता बचाती है।

1998 में वाजपेयी के पीछे जयललिता भी खड़ी थी मगर जयललिता की खटपट 1999 में भाजपा से हुई तो जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया। लेकिन जब एनडीए को बहुमत मिला तो जयललिता की बंद फाइल खोल दी गई। तो वहीं नवंबर 2005 में मुलायम के खिलाफ सीबीआई ने करोड़ों की संपत्ति बटोरने के तथ्य रखे तो सरकार ने मार्च 2007 में सीबीआई को जांच का निर्देश दिया। लेकिन इसी बीच मनमोहन सरकार परमाणु डील पर फंस गयी। वामपंथियों ने समर्थन वापस लिया तो मनमोहन सरकार को मुलायम की जरूरत आन पड़ी। मुलायम ने मनमोहन से हाथ मिलाई सौगात में मनमोहन ने अपनी सत्ता बचाई। तो उपहार में मनमोहन ने मुलायम की सीबीआई केस बंद करवाई। ऐसे में सह मात का इस खेल और गुवाहाटी हाई कोर्ट के फैसले के बाद सवाल खड़ा होता कि क्या सीबीआई को बंद कर देना चाहिए ?

07 November 2013

देवभूमि में गरीब और दलित हिन्दुओं का धर्मान्तरण !

उत्तराखण्ड का गठन हुआ तो इस राज्य की पहचान दुनिया के नक्शे पर देवभूमि के रूप में की गई। लेकिन अब इसी देवभूमि उत्तराखंड में ईसाई धर्म के अधकचरे प्रचारकों का धर्मान्तरण-मिशन जोरों पर है। राज्य के दूर-दराज इलाकों में गरीब और दलित समुदाय के बीच प्रचारक अपनी जड़ें जमाकर व्यापक स्तर पर धर्मान्तरण में जुटे हुए हैं। उत्तराखंड के उपेक्षित, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को यह धर्म-प्रचारक ईसाई धर्म की ओर आकर्षित कर रहे हैं। उत्तराखंड में विभिन्न जनपदों के लगभग दो दर्जन से अधिक कस्बों में जाकर जुटाई गई जानकारी से यह बात और भी साबित हो जाती है कि ईसाई मिशनरियां प्रलोभन देकर तथा दूसरे धर्मों की आलोचना करके भोले-भाले और विकल्पहीन लोगों को बहका रहे हैं। ईसाई मिशनरी में प्रचारक हाल में आयी आपदा और आशाराम बापू जैसे विवादास्पद धर्म गुरुओं के नकारात्मक उदाहरणों को मुख्य हथियार बना रहे हैं। ईसाई धर्म अपनाने के लिए पादरी और धर्म प्रचारक लोगों को आर्थिक प्रलोभन देने के साथ ही बेहतर शिक्षा और मुफ्त ईलाज जैसे प्रलोभन भी दे रहे हैं। 

देवभूमि उत्तराखण्ड में नौसिखिए और अतिउत्साही धर्म प्रचारक एनकेन-प्रकारेण अपने अनुयायियों का दल-बल बढ़ाना चाहते हैं। भले ही इसके लिए उन्हें भारतीय संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ ही काम क्यों न करना पड़े। भारतीय संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म और धार्मिक मान्यताओं के प्रचार-प्रसार का पूरा अधिकार है। इसके साथ ही कोई भी भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी भी धर्म को अंगीकृत करने को स्वतंत्र है। कानून प्रदत्त इन अधिकारों के आलोक में सतही तौर पर देखने से कुछ भी गलत नहीं लगता लेकिन जायज-नाजायज तरीके से अपना कुनबा बढ़ाने में लगे हुए ईसाई मिशनरियों के क्रियाकलाप का हल्का सा विश्लेषण भी अन्य धार्मिक मतावलंबियों को विचलित कर सकता है, जिससे टकराव बढऩा लाजिमी है।

हरि के द्वार पर

उत्तराखंड के छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में धर्मान्तरण में जुटी ईसाई संस्थाएं बाकायदा आर्थिक प्रलोभन देकर या दूसरे धर्मों को निम्नतर साबित करके क्रिश्चियन धर्म अपनाने के लिए बरगला रही हैं। कुछ इसी तरह का संदेश देकर लोगों का धर्मांतरण करने का धंधा न सिर्फ जनपद हरिद्वार, अपितु समूचे उत्तराखंड में फल-फूल रहा है। हरिद्वार जिले में कम से कम एक दर्जन ऐसे स्थल हैं, जिनका उपयोग धर्मांतरण के लिए किया जा रहा है। कई बार हिन्दूवादी संगठनों के विरोध के कारण चर्चाओं में आये इन स्थलों की छानबीन भी की गई और धर्मान्तरण के कई मामले पकड़े भी गए, परंतु कुछ दिनों तक शान्त बैठने के बाद ईसाई मिशनरी के प्रचारक फिर सक्रिय होकर धर्म प्रचार और धर्मान्तरण में जुट जाते हैं।

विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े मुनेन्द्र शर्मा का कहना है कि देश में हर व्यक्ति को अपना अपना धर्म अपनाने व उस पर चलने की आजादी है, परंतु किसी को भी लालच देकर या फिर बहका फुसलाकर धर्मान्तरण के लिए प्रेरित करना कानून सम्मत नहीं है और ऐसा करना सामाजिक व्यवस्था के भी विरुद्ध है, इसीलिए धर्मान्तरण पर पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए। उन्हीं की जानकारी के अनुसार रुडक़ी के गणेशपुर, आदर्श नगर और रुडक़ी से सटे गांव ढन्डेरी में गरीब तबके के लोगों को थोड़े से लालच में उनका धर्म बदल देने का गोरख धन्धा ईसाई मिशनरी से जुड़े कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा है।

इसकी पुष्टि करते हुए क्रिश्चियन सोलिडेरिटी सोसायटी (सीएसएस) के अध्यक्ष सुनील ए. ल्यूक साफ कहते हैं कि ईसाई धर्म में किसी को भी प्रलोभन देकर या दूसरे धर्मों को हीनतर साबित करके अपने धर्म में शामिल कराना सर्वथा गलत है। श्री ल्यूक कहते हैं कि कुछ ईसाई प्रचारकों की इसीलिए पिटाई होती है क्योंकि वे गलत तरीके से धर्मान्तरण करते हैं।’ सीएसएस क्रिश्चियन संस्थाओं की एक संयोजक संस्था है। सीएसएस से देहरादून की 80 ईसाई संस्थाएं संबद्धित हैं। श्री ल्यूक कहते हैं कि प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराने वाली संस्थाएं और कुछ पाने के लिए ईसाई धर्म में आने वाले लोग दोनों ही शुरुआत में ही गलत राह पकड़ लेते हैं।

इतना ही नहीं ग्राम साढोली, मखदूमपुर, कलियर समेत आधा दर्जन गांव ऐसे हैं। जहां धर्मान्तरण का गोरखधन्धा लोगों को बहला फुसला कर व प्रलोभन देकर चलाया जा रहा है। कलियर में तो हाल ही में एक युवती को बहला फुसलाकर  एक युवक मंगुपुरा ले गया और उसे धर्म परिवर्तन करने के लिए प्रेरित किया गया। मामला पुलिस तक पहुंचा तब जाकर युवती का धर्म और उसकी लाज बचाई जा सकी। इस तरह की घटनाएं ज्यादातर प्रकाश में नहीं आ पाती, अन्यथा बड़े स्तर पर धर्मान्तरण का कार्य उत्तराखण्ड में ईसाई मिशनरी के कुछ लोग चला रहे हैं। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी, चमोली और कुमायूं का एक महिला आश्रम धर्म परिवर्तन के केन्द्र बिन्दु बने हुए हैं। धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करने और धर्म विशेष का प्रचार करने वाले ये मिशनरी लोग ज्यादातर गरीब तबके को ही अपना निशाना बनाते हैं और पिछले पांच सालों में तेजी से हजारों परिवारों का धर्म परिवर्तन हुआ है।

2008 में रुडक़ी के ग्राम साढोली में धर्म परिवर्तन के लिए लोगों को उकसाने को लेकर कई सगंठनों ने एतराज जताया था, लेकिन फिर भी इस गोरख धंधे पर लगाम नहीं लगायी जा सकी। रुडक़ी के गणेशपुर पुर्वावली में भी एक प्रार्थना घर में धर्म बदलने के लिए पे्रित करने हेतु पहले लोगों को उनके घर जाकर ईसाई धर्म का साहित्य बांटा जाता है और फिर उन्हें प्रार्थना सभा में बुलाने के बहाने धर्म परिवर्तन के लिए तैयार करने की मुहिम चलायी जा रही है। विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े मुनेन्द्र शर्मा की मानें तो उत्तराखण्ड के विभिन्न जिलों में करीब साढ़े चार हजार ईसाई प्रचारक दूसरे धर्म के लोगों का धर्मान्तरण करने के लिए तरह-तरह के अभियान चला रहे हैं।

टिहरी जिले के भिलंगना विकासखंड में सक्रिय रोमन कैथोलिक चर्च तो धर्मांतरण की हदें पार कर रहा है। भिलंगना विकासखंड के 60 गांवों में से बासर पट्टी के केपार्स गांव को ही ले लीजिए। केपार्स-वासर के लगभग 2० से अधिक लोहार परिवार ईसाई मत स्वीकार कर चुके हैं। इन परिवारों के सभी सदस्यों को छतियारा वासर के पास बालगंगा में निर्मित एक तलैया में कमर तक पानी में खड़ा करके बपतिस्मा देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित किया जा चुका है। सभी धर्मांतरित परिवारों के बच्चे शासकीय विद्यालयों के अभिलेखों में हिन्दू अनुसूचित जाति ही अंकित हैं तथा आरक्षण संबंधी सभी प्रकार के लाभ भी ले रहे हैं, जबकि वे हिन्दू रीति-रिवाज के सभी तीज-त्यौहार छोड़ चुके हैं। महिलाओं ने बिंदी तक लगानी छोड़ दी है और वे न्यू टेस्टामेंट पढ़ते हैं। क्षेत्रवासियों द्वारा इस संबंध में तहसीलदार और उपजिलाधिकारी घनसाली से शिकायत भी की गई।

लाचार लोगों को आर्थिक प्रलोभन

अपने अभियान के पहले चरण में गांव या कस्बों में पैठ बनाने के लिए कई जगह तेजतर्रार स्थानीय लोगों को पादरियों ने भवन निर्माण में सहायता करके या फिर आर्थिक मदद करके अपने साथ मिला लिया है। अब वही धर्मान्तरित लोग अपने परिचित स्थानीय  लोगों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कुछ सहायता पाने के लालच में गरीब तबके के लोग ईसाई धर्म अपना लेते हैं कि कुछ धन या सहायता मिल जाएगी। लेकिन जब धर्मान्तरण कराकर यह लोग ईसाई बन जाते हैं और उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं भी मिला तब भी वे शर्म के कारण इसलिए वापस हिंदू धर्म में नहीं जा पाते क्योंकि तब तक या तो उनकी बिरादरी उनसे अलगाव स्थापित कर चुकी होती है। अथवा वे खुद ही बदनामी के भय से वापस नहीं जा पाते।

टिहरी गढ़वाल के नरेंद्र नगर ब्लॉक के शिवलाल का कहना है कि ईसाई मिशनरी के पादरी ने उन्हें एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की बात कही थी, लेकिन ईसाई धर्म में आने के 6 माह बाद भी उनके एक धेला तक नहीं दिया गया। शिवलाल लाचारगी भरे स्वर में कहता है कि मिशनरी वालों ने चंबा के राजेश सिंह मसीह को तो बहुत शानदार अस्पताल बनाकर दिया और वह खूब पैसे कमा रहा है, लेकिन वह अपने जैसे एक दर्जन लोगों के नाम गिनाना नहीं भूलता, जिन्हें धर्मांतरण के एवज में धन देने की बात की गई थी, लेकिन किसी को भी फूटी कौड़ी तक नहीं मिली।

रुद्रप्रयाग जिले अगस्त्यमुनि, विजयनगर और चंद्रापुरी जैसे कस्बों में भी आपदा के बाद ईसाई मिशनरियों की गश्त बढ़ गई है। मिशनरी से जुड़े लोग आपदा पीडि़तों के पास जा-जाकर उन्हें आपदा में गंवाई हुई दुकान, वर्कशॉप और तमाम मशीनों की क्षतिपूर्ति में सहायता करने का प्रलोभन दे रहे हैं। दो माह से स्थानीय लोग मिशनरियों के चक्कर काटने में लगे हुए हैं, लेकिन अभी तक उन्हें फूटी कौड़ी तक नहीं मिली। एक स्थानीय व्यक्ति ने नाम न लिखने के अनुरोध के साथ बताया कि ये लोग सिर्फ उन्हीं लोगों को सहायता देंगे, जो बाद में इनके धर्म के प्रति प्रेरित होगा।

बीमारों पर चमत्कार का मरहम

आर्थिक प्रलोभनों के अलावा क्रिश्चियन मिशनरी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की आड़ में भी अपनी पैठ बना रही हैं। इसमें क्रिश्चियन मिशनरी यह प्रचार भी कर रही हैं कि प्रभु ईशु की शरण मात्र में ही उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। कई लोग मनोवैज्ञानिक रूप से इस बात से सहमत भी हो जाते हैं।

नानकमत्ता के ग्राम फिरौजा के दलवीर सिंह की बेटी के गुर्दे में पथरी थी, वह कई वर्षों से पीडि़त थी। अनेकों जगह दिखाया, इलाज करवाया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। दलवीर के पास आपरेशन के लिए पैसा नहीं था। दलवीर कहते हैं, कि मिशनरी के लोग आए, उन्होंने इलाज का भरोसा दिलाया, हम प्रार्थना सभा में गए, मेरी बेटी निर्मल कौर ने ‘पवित्र जल’ नियमित रूप से ग्रहण करना शुरू किया। कुछ दिनों में उसकी हालत में सुधार होने लगा, वह बिल्कुल स्वस्थ हो गई।

दलवीर सिंह इतना प्रभावित हुआ कि उसने मिशनरी को प्रार्थना सभा हेतु एक बीघा जमीन दे दी। जिस पर गांव व बिरादरी के लोगों ने बवाल भी किया था, लेकिन अब कुछ लोग नियमित रूप से प्रार्थना सभा में आते हैं। सत्संग करते हैं। पवित्र जल ग्रहण कराते व करते हैं। नानकमत्ता तहसील के पसैनी गांव निवासी हरदेव सिंह मिशनरी के लोगों पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि यह लोग गरीब, बीमारी से तंग, दलित समुदाय अथवा समाज के दबे कुचले उपेक्षित परिवारों से संपर्क स्थापित करते हैं तथा उन्हें इलाज, नौकरी, दवाइयां, आर्थिक सहायता आदि का प्रलोभन देते हैं।

जनपद उत्तरकाशी के विकासखण्ड मोरी के बगाण पट्टी के आराकोट के ग्राम थुनारा निवासी भजन दास का कहना है कि 2 वर्ष पूर्व उनका 5 वर्षीय पुत्र राहुल बहुत बीमार रहता था, लेकिन जब से हर रविवार आराकोट में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लिया, शरीर का सारा कष्ट दूर हो गया। उत्तराखंड के विभिन्न कस्बों में अपनी पैठ बनाने के लिए मिशनरीज अपने चिकित्सालय खोल रही हैं और मुफ्त इलाज की बात कहकर स्थानीय लोगों को प्रभावित कर रही हैं।

चमोली जिले के गंगोल गांव में अमला इसाई मिशनरी ने लगभग सौ नाली जमीन खरीदी है। उसमें इन्होंने एक चर्च और अस्पताल खोल रखा है। ये जनपद के कई इलाकों मे यहीं से मिशन का प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। यहां मिशनरी ने नेपाली मूल का इसाई अपने धर्म के प्रचार के लिए रखा था। जो धर्मांतरण के लिए गरीब परिवार वालों पर दबाव डाला करता था, परंतु स्थानीय जनप्रतिरोधों के कारण उन्हें उसको वहां से हटाना पड़ा। टिहरी गढ़वाल के चंबा और घनसाली कस्बों में खुले चिकित्सालयों में काम कर रहे मिशनरी के प्रतिनिधियों से आसपास के लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

शिक्षा की आड़ में धर्मांतरण

स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के अलावा मिशनरीज शिक्षा के माध्यम से भी स्थानीय लोगों का विश्वास हासिल करते हैं। टिहरी गढ़वाल में वासर पट्टी के छोटे-बड़े 32 गांवों के एकमात्र इंटर कालेज (राजकीय इंटर कालेज नौल बासर) में अध्ययनरत धर्मांतरित अनुसूचित जाति छात्र-छात्राओं के खिलाफ स्वयं के गांव के लोगों ने विवाद खड़ा किया। विवाद खड़ा करने वालों का तर्क धर्मांतरित छात्र-छात्राओं के बारे में यह था कि उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

बासर की कक्षा 11 में अध्ययनरत एक छात्रा कु. भागीरथी को भी बपतिस्मा देकर न केवल ईसाई बनाया गया, बल्कि चर्च की परंपरा के अनुसार सफेद चोगा पहनाकर न्यू टेस्टामेंट के नियमों का वाचन कर दिल्ली के एक क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित एक विद्यालय के वाहन चालक से उसका विवाह कर दिया गया। इसका क्षेत्रवासियों ने कड़ा विरोध किया। परिणामस्वरूप केपार्स गांव की अन्य छात्राएं इस प्रकार की शादियों की चपेट में आने से बच गई। जिनमें एक-दो का रिश्ता भी तय कराया जा चुका था।

जनपद रुद्रप्रयाग के ग्राम बड़ेथ में एक ईसाई मिशनरी सक्रिय रूप से कार्यरत है। इसका संचालन ग्राम बड़ेथ के ही बचन सिंह भण्डारी द्वारा किया जा रहा है। इस संस्था का नाम अगापे चिल्ड्रन एकेडमी है। भण्डारी ईसाई मिशनरी की तरफ से उत्तराखंड के डायरेक्टर भी हैं। वर्तमान में इनकी संस्था के माध्यम से प्रत्येक रविवार को गोष्ठी आयोजित की जाती है तथा ईसाई धर्म की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है।

सामाजिक समानता का लालच

धर्मान्तरण के लिए ईसाई मिशनरीज सामाजिक भेदभाव को भी अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। उत्तराखंड में दलित समुदाय अभी भी छुआछूत और भेदभाव का शिकार है। ग्रामीण इलाकों में दलितों की सामाजिक स्थिति बेहद चिंताजनक है। ईसाई धर्म प्रचारक इन बस्तियों में जाकर बताते हैं कि ईसाई धर्म में किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जाता। सामाजिक समानता हासिल करने के लिए अनुसूचित जाति के लोग बड़े पैमाने पर अपना धर्म परिवर्तन करा रहे हैं। कलीच गांव के अव्वल का आक्रोश है कि हम देवता का सामान तो उठा सकते हैं, किंतु देवडोली को न तो छू सकते हैं और न ही पालकी में भेंट चढ़ा सकते हैं। प्रार्थना सभा में जाने से उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिला। यहां भेदभाव नहीं होता।

आजादी के 66 वर्ष बाद भी अनुसूचित जाति समुदाय के लोग सामाजिक एवं आर्थिक गुलामी का बोझ ढो रहे हैं। आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक व मानसिक रूप से पिछडऩे तथा सामाजिक प्रतिबंधों के चलते ये लोग गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। यही वजह है कि अब ये लोग अपनी सामाजिक व आर्थिक आजादी के विकल्प तलाश रही है। समाज में छुआछूत एवं भेदभाव के चलते जहां समानता का अहसास होता है, उस ओर रुख कर देते हैं। ईसाई मिशनरी इनकी आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़ेपन का खूब लाभ उठा रहे हैं तथा इनके उत्थान एवं सम्मान के नाम पर धर्म परिवर्तन का पासा फेंक रहे हैं।

जनपद उत्तरकाशी के विकासखंड मोरी के अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव कलीच, थुनारा, डैलून, बागी, मोरा, देवल, खन्यासणी, भितरी के दर्जनों परिवार प्रभु ईशु पर विश्वास करते हैं तथा प्रति रविवार को होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लेते हैं। सूत्रों के मुताबिक देहरादून के त्यूनी शहर में भी तीन स्थानों पर रविवार को प्रार्थना सभा का आयोजन होता है। जो अभी स्थान के  अभाव में विभिन्न जगहों पर कमरे में पादरी या टे्रनी द्वारा करवाई जाती है।

छत्तीसगढ़ में एक बार फिर रमन राज की आहट !

कांग्रेस और भाजपा की राजनीति चाहे जैसी भी रही हो और रमन सिंह की सरकार चाहे जिस तरह से भी चली हो, अब इसके कोई मायने नहीं रह गए हैं। सच तो यह है कि 11 नवंबर को होने वाले छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जिस पार्टी के पक्ष में जनता अपना मत देगी, उसी की सरकार बनेगी। इस तरह की सोच स्थानीय जनता की भी है और राजनीतिक दलों की भी। रमन सिंह की राजनीति और सरकार के प्रदेश में क्या किया या नहीं किया और कांग्रेस की राजनीति कितनी धारदार रही, इस पर अब प्रदेश की जनता अपना मोहर लगाने की तैयारी कर ली है। 11 नवंबर को पहले चरण के तहत 36 सीटों के लिए मतदान होने हैं और चुनाव आयोग की तरफ से इसकी पूरी तैयारी कर ली गई है, लेकिन केंद्र सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन और चुनाव कवरेज करने वाली मीडिया की नजरें बस्तर संभाग पर टिकी हुई हैं। 

बस्तर सम्भाग यानी नक्सलियों का ठिकाना। पिछले दो चुनावों से नक्सलियों ने यहां चुनाव का बहिष्कार किया और जीत भाजपा की हुई। इस बार क्या होगा? कहा नहीं जा सकता। कांग्रेस और भाजपा की सेनाएं बाजी मारने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन नक्सलियों की हुंकार से दोनों सेनाओं के पसीने भी छूट रहे हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में चुनाव चिह्नों के आवंटन के साथ ही सभी सीटों पर अब चुनावी तस्वीर साफ होने लगी है। बस्तर संभाग की सभी 12 सीटों में से 10 पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना तय है। बाकी के दो सीटों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ त्रिकोणीय संघर्ष के आसार हैं। इस विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तीनों दल अंतर्कलह से जूझते नजर आ रहे हैं। दोनों पार्टियों में रूठे लोगों के मान-मनौवल का दौर जारी है। राजनीतिक रूप से देखें, तो बस्तर की चार सीटों पर तो कांग्रेस अपने बागियों से परेशान है, तो वहीं आधा दर्जन सीटों पर भाजपा को भी भीतरघात की चिंता सता रही है। एक सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी दलीय असंतोष का सामना कर रही है।

नाम वापसी के अंतिम दिन भाजपा अपने अधिकांश बागियों को मनाने में सफल रही, जिसके चलते भाजपा के आधा दर्जन बागी चुनाव मैदान से बाहर हो गए। कांग्रेस भी दो बागियों को मनाने में सफल रही, लेकिन बीजापुर, चित्रकोट, कोंडागांव और केशकाल विधानसभा के बागियों ने नाम वापस लेने से इनकार कर दिया, जिसके चलते इन विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को भाजपा के साथ-साथ इन बागियों से भी जूझना पड़ेगा। यहां कांग्रेस प्रत्याशी की राह आसान नहीं मानी जा रही है। बस्तर टाइगर के नाम से चर्चित दिवंगत महेंद्र कर्मा की दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पूर्व विधायक नंदाराम सोरी का टिकट काटकर बोमड़ाराम को प्रत्याशी बनाया है। इस वजह से यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कई पदाधिकारी नाराज हैं, जबकि गत विधानसभा चुनाव में दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर थी।

दंतेवाड़ा विधानसभा सीट पर पर कांग्रेस ने दिवंगत महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को प्रत्याशी बनाया है, तो वहीं भाजपा ने भी अपने वर्तमान विधायक भीमाराम मंडावी को प्रत्याशी बनाकर कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को कड़ी चुनौती पेश की है। यहां मुकाबला रोचक होगा। कांग्रेस नेता महेंद्र छाबड़ा की मानें, तो कांग्रेस इस बार बस्तर में पिछले चुनाव की अपेक्षा अपनी सीटें निश्चित तौर पर बढ़ाएगी। कांग्रेस की सबसे बड़ी परेशानी बीजापुर और कोंडागांव विधानसभा क्षेत्र को लेकर है। बीजापुर में जिला पंचायत अध्यक्ष नीना रावतिया को मनाने का कांग्रेस ने काफी प्रयास किया, लेकिन वह अंत तक नहीं मानीं और निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं। वहीं कोंडागांव में पूर्व मंत्री शंकर सोढ़ी के निर्दलीय चुनाव लड़ने के कारण यहां कांग्रेस की संभावनाएं प्रभावित होने लगी हैं।

केशकाल में दानीराम मरकाम और चित्रकोट में शंकर ठाकुर ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस को परेशानी में डाल दिया है। वहीं दूसरी ओर भाजपा में बागियों के नाम वापसी के बावजूद अब भी मन नहीं मिल हैं। कांकेर, भानुप्रतापपुर और अंतागढ़ तीनों सीटों पर असंतुष्ट लामबंद होकर अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ जुटे हुए हैं। इसी तरह केशकाल, बस्तर, कोंडागांव और जगदलपुर सीटों पर भी असंतुष्ट घात लगाए बैठे हैं। भाजपाप्रवक्ता संजय श्रीवास्तव की मानें, तो बस्तर में किसी प्रकार कि असंतुष्टि नहीं है, जो नाराज हैं, उन्हें भी मना लिया गया है और वहां भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। कुछ दिनों पूर्व केसरिया हुआ बस्तर के राजमहल पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस प्रत्याशी की राजमहल में हुई बैठकों के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में असंतोष गहराने लगा है। बस्तर महाराजा की हत्या का आरोप कांग्रेस पर लगने के बाद कतिपय कांग्रेसियों के महल प्रेम पर दल में ही विरोध के सुर सुनाई देने लगे हैं।

बहरहाल बस्तर में चुनावी बिगुल फूंका जा चुका है। प्रत्याशी चुनाव मैदान में कूद गए हैं, बीहड़ों में प्रचार प्रसार भी प्रारंभ है। भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद नेता लोग खुलकर प्रचार नहीं कर रहे हैं । जनता को नक्सलियों ने फरमान के जरिये कह दिया है कि जो वोट डालेगा, उसकी खैर नहीं। लेकिन इस तरह के फरमान यहां के लोग हर चुनाव में सुनते हैं और वोट भी डालते हैं। राइट टू रिजेक्ट कानून बनने के बाद बस्तर की तस्वीर क्या होगी? इस पर भी लोगों की नजरें टिकी हुई हैं । नक्सली लोकतंत्र में यकीन नहीं करते और न ही सरकार के कामों को विकास मानते हैं। कहा जा रहा है कि जिस पार्टी की जीत बस्तार संभाग से होगी, उसी कि सरकार बनेगी। जाहिर है कि बस्तर को जीतने के लिए राजनितिक दलों में होड़ लग गई है।

06 November 2013

पढ़िए छठ पूजा की पौराणिक ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व

छठ पर्व का महत्व सिर्फ अघ्यात्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक और एतिहासिक स्तर पर भी उतना ही महत्वपूण है। छठ पूजा के समय हम ब्रह्म मुहूर्त में बिस्तर छोड़ देते हैं। यह विलासिता का त्याग है। इसके साथ ही सूर्य की असंख्य किरणें ऊर्जा के रूप में हमारे अंदर समाहित होती हैं। सूर्य पूजा की परम्परा आदित्य कुल के भार्गवो ने शुरु करायी। 
 

हिस्टोरियन हिस्ट्री ऑन दी वल्ड एवं मिश्र के पिरामिडो से मिले प्रमाणों के अनुसार महर्षि भृगु के वंशज भार्गवो ने इस महाद्वीप पर हिस्त्री खूफू मनस नामो से जाना गया। भार्गवो ने यहां सूर्य पूजा की परम्परा हजारो साल चलायी। इस बात की पुष्टीअलमरना मे हुई खुदाई से मिले पुरातात्विक साक्ष्यो और अमेरिकी विद्वान कर्नल अल्काट और प्रो0 ब्रुग्सवे के शोध ग्रंथो से साबित हो चुकी है।


यही कारण है की यह पर्व सिर्फ भारत ही नहीं अमेरिका सहीत पूरे विष्व भर में धूम धाम से मनाया जाता है। अमेरिका महाद्वीप पर 12 अक्टूबर 1492 तक यह परम्परा कायम रही है। 12 अक्टूबर 1492 को जब क्रिस्टोफर कोलम्बस नाम के पुर्तगाली नाविक जब यहां पहुंचे, तो उस समय इस महाद्वीप पर 10 लाख सूर्य पूजक भार्गव के वंशज मौजूद थे। इस महाद्वीपपर कब्ज़ा करने के लिए सूर्य भक्तों की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई जिसके चलते ये परम्परा वहा पर समाप्त हो गयी !


प्राचीन इतिहासकार रांगेय राघव अपनी पुस्तक महागाथा मे लिखते है कि आदीकाल में लोग मानते थे कि ये देवता महासागर मे रहते है। महाप्रलय के बाद माता अदिति के सबसे छोटे पुत्र आदित्य के नाम पर रोज उजाला लेकर आने वाले इस चमकीले तारे का नाम आदित्य रख दिया गया। वैज्ञानिकों ने इस नकक्षत्र की चाल गति उष्मा, प्रकाश, ऊर्जा का अध्ययन किया। इसके बाद इसका नाम सूर्य रखा । 

 
छठ पर्वकी परंपरामें बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि यानी की छठ एक विशेष खगौलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। सूर्य के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। 

 
 
सूर्य को अर्घ्य स्वास्थ्य और मानसिक शक्ति के लिए लाभदायक माना जाता है। किंतु छठ पूजा के विशेष अवसर पर सूर्य को अर्घ्य बहुत ही शुभ प्रभाव देता है। इस व्रत का वैदिक और पौराणिक महत्व है। पौराणिक मान्यता है कि द्रौपदी के छठ पूजा के फल से ही पांडवों को युद्ध में विजय और राज्य प्राप्त हुआ।


पौराणिक मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। 
 

छठ पूजा में मिट्टी के बने हाथी चढ़ाए जाते हैं, जो इस पर्व के माध्यम से प्रकृति की अद्भुत जीव के संरक्षण का संदेश देती है।

भूख हड़ताल के तेरह साल !

साल दो हजार तेरह चल रहा है। देश में दीपावली की चमक दमक है। रोशनी की जा रही है। दीप जल रहे हैं। मोमबत्तियां जलाई जा रही हैं। ऐसे में हमसे बहुत दूर उत्तर पूर्व के राज्य मणिपुर में मानवाधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री इरोम चानू शर्मिला इस लोकतंत्र के अंधेरे से संघर्ष कर रही है, अपने संघर्ष की मशाल जलाए हुए है। वह न सिर्फ हमारे ‘लोकतंत्र’ की नौकरशाही और सैनिक तंत्र का मुकाबला कर रही हैं बल्कि अपनी मृत्यु से भी पंजे लड़ा रही हैं। क्या हम इस दीवाली में अपने घरों, कस्बों और शहर में दीप व मोमबत्यिां जलाकर उनके साथ नहीं खड़े हो सकते हैं ? वह आज संघर्ष की जिस कठिन राह पर हैं, हमारे लिए जरूरी है कि हम उनके साथ अपनी एकजुटता जाहिर करें, उन्हें यह संदेश दें कि वह अकेली नहीं हैं। इस साल चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के तेरह साल पूरे हो गये। इतनी लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता।

इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई। आज वह एकतालीस साल की हो चुकी हैं। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख हड़ताल आज भी जारी है। भले ही इन वर्षों में इरोम शर्मिला का कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ हो पर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छा.शक्ति बढ़ी है। इसीलिए इसे मात्र भावुकता नहीं कहा जा सकता है बल्कि यह पूर्वोŸार भारत खासतौर से मणिपुर के ठोस यथार्थ की आँच में पका उनका विचार व दृढ इच्छा शक्ति है जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो.उत्पीडि़तों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है। इरोम शर्मिला  के संघर्ष में हमें इसी दावेदारी की अभिव्यक्ति मिलती है। इसके अन्तर में स्वतंत्रता की छटपटाहट और अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज इरोम शर्मिला इस्पात की तरह न झुकने, न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं।

बात दो नवम्बर 2000 की है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। मारे गये लोगों में 62 वर्षीया वृद्ध महिला लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि शामिल थीं। यह सब इरोम शर्मिला को आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढ़ाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम के लिए शान्ति रैली निकाल कर सत्ता की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने एलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्थी जनता के विरुद्ध सत्ता का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम ;आफ्सपाद्ध हटाया जाय। इस एक सूत्री माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया। तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवम्बर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी।

इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहाँ उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है। इस तरह इरोम शर्मिला को जिन्दा रखने का ‘लोकतांत्रिक’ नाटक पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हे रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से तरल पदार्थ देने का सिलसिला चलाया जाता है।

दरअसल, इरोम शर्मिला जिस ‘आफ्सपा’ को हटाये जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं, उस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाती है जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘आफ्सपा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में जनतंत्र शिथिल हुआ है और सैन्यीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा नागरिकों में अलगाव की भावना बढ़ी है। हालत यह है कि आज देश के पाचवें हिस्से में ‘आफ्सपा’ लागू है।

इसी का चरम रूप हमे मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में देखने को मिलता है जहाँ ‘आफ्सपा’ शासन के 55 वर्षों में बीस हजार से ज्यादा नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी है। इसी की देन एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या है तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट है। इस संदर्भ में 2004 में मणिपुर की महिलाओं द्वारा किये संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। उनके आक्रोश और चेतना का विस्फोट हमें देखने को मिला जब असम राइफल्स के जवानों द्वारा  थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’। इरोम शर्मिला इसी यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति है! 
 
इरोम शर्मिला कोई आतंकवादी नहीं है। उसके प्रतिरोध का रास्ता शांतिपूर्ण व अहिंसक है। यही कारण है कि दुनिया में शांति व मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों को इरोम शर्मिला के संघर्ष ने आकर्षित किया है। इस संघर्ष को सम्मानित किया गया है। 2005 में इरोम को नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। वहीं, 2007 में मानवाधिकारों के लिए ग्वांजु सम्मान, 2010 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर शांति पुरस्कार जैसे अनगिनत पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भले ही इरोम शर्मिला के संघर्ष को सम्मानित किया जा रहा हो लेकिन भारतीय राज्य उन्हें कोई स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है। उसकी नजर में वह कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं बल्कि अपराधी है।

हालत तो यह है कि उन्हें सामान्य बंदियों की सुविधाओं और अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया है। पिछले साल अक्टूबर में उन्हें जब अदालत में पेश किया गया था, इरोम ने प्रेस कांफ्रेंस करने की इजाजत चाही थी लेकिन इरोम को अपनी बात प्रेस को कहने की स्वतंत्रता भी नहीं दी गई। वह ऐसी कैदी है जिससे मिलने जुलने की इजाजत भी नहीं है। उसे अकेलेपन में जीने के लिए बाध्य किया जा रहा है। बीते सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दो सदस्यीय दल ने मणिपुर का दौरा किया। इस दल ने मणिपुर सरकार की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की है कि वह इरोम को जिन्दा रखने के लिए जरूरी न्यूट्रिशियन नाक के रास्ते पहुंचा रही है लेकिन उसे अधिकारों से वंचित किये हुए है। उन्होंने राज्य सरकार के इस व्यवहार को अमानवीय और कानून विरुद्ध माना है। इसीलिए उन्होंने कहा कि इरोम के वो सारी स्वतंत्रता दी जाय जो किसी भी आंदोलनकारी को न्यायिक हिरासत में दी जाती है।  

हमारी आजादी के संघर्ष के दो बड़े नायक रहे हैं - शहीद भगत सिंह और महात्मा गांधी। इन दोनों नायकों की जो छवियां रही हैं, उसकी अनूठी एकता हमें इरोम शर्मिला के व्यक्तित्व और उनके आंदोलन में देखने को मिलती है।  जहां इरोम शर्मिला के अन्दर अपने उद्देश्य के लिए शहीद भगत सिंह सा आत्मोत्सर्ग का जज़्बा मिलता है, वहीं उनके आंदोलन की प्रेरणा गांधी हैं। यह प्रतिरोध संघर्ष की ऐसी राह है जिसमें रक्त का एक बूंद भी नहीं बहता लेकिन इसकी मारक क्षमता असीमित है। यह शांति के लिए अहिंसा का ऐसा मार्ग है जहां राज्य और उसकी शक्तियां लगातार बेनकाब हो रही हैं, वे आतंक व हिंसा का पर्याय बनती जा रही हैं।

हकीकत तो यह है कि इरोम शर्मिला का यह संघर्ष हमारे लोकतंत्र के खंडित चेहरे को सामने लाता है। यह राज्य व्यवस्था से लेकर हमारी न्याय व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है। इस साल मार्च में जब दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में इरोम को पेश किया गया, बार बार न्यायालय द्वारा इस बात पर जोर दिया जाता रहा कि वह अपने जीवन को खत्म करना चाहती है, वह आत्महत्या की राह पर है। इस अदालत में दिया उसका बयान गौरतलब है। उसने जोर देकर कहा कि मैं सामाजिक कार्यकर्ता हूं और मैं आत्महत्या के विरुद्ध हूं। मैं जिन्दगी से बेहद प्यार करती हूं। मैं शांति और इंसाफ चाहती हूं। मेरा आंदोलन अहिंसात्मक है तथा आफ्सफा को खत्म करने के लिए है। आफ्सफा जैसे कानून को खत्म कर दिया जाय, मैं अपना आंदोलन समाप्त कर दूंगी। इरोम अपनी इस भावना को अपनी कविता में भी अभिव्यक्त करती है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ ३ण्ण्काँटों की बेडि़याँ खोल दो/होने दो मुझे अंधियार का उजाला’।

02 November 2013

सोमनाथ की जमीन पर सरकारी कॉलोनी कितना सही ?

एक ओर जहां गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी सोमनाथ मंदिर के बहाने सरदार पटेल को राष्ट्रवादी बताकर उनके सम्मान में 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' बनवा रहे हैं वहीं दूसरी ओर उन्हीं की सरकार उन्हीं सरदार द्वारा सोमनाथ मंदिर को 999 साल के लीज पर दी गई जमीन का एक हिस्सा वापस मांग रही है। जहां मोदी सरकार अब सरकारी कर्मचारियों के दफ्तर और आवासीय कालोनी बनाना चाहती है।

1957 में सोमनाथ ट्रस्ट को 999 सालों से जो जमीन लीज पर दी गई थी अब मोदी सरकार ने 15 अगस्त 2013 को नये जिले गीर-सोमनाथ की घोषणा के बाद 24 हेक्टेयर जमीन वापिस लेने का फरमान जारी कर दिया है। गीर-सोमनाथ के कलेक्टर सीपी पटेल ने सोमनाथ ट्रस्ट के सचिव पी.के लहरी को 8 अक्टूबर 2013 को एक पत्र लिखकर 24 हेक्टयर जमीन वापिस लेने की मांग की है।

गौरतलब है कि सरदार पटेल ने गुजरात को दो अनमोल भेंट दी थी, पहला जूनागढ़ राज्य जिसका विलय गुजरात में किया गया और दूसरा सोमनाथ का जीर्णोद्धार. जूनागढ़ को भारत में मिलाने के बाद जब वे सोमनाथ मंदिर  दर्शन करने गए थे तब उनके साथ मंत्रिमंडल के सदस्य वी.एन.गाडगिल भी थे. सरदार पटेल ने जिस प्राचीन सोमनाथ मंदिर का गौरव वापिस दिलाने के लिए मंदिर के पुनर्निमाण का संकल्प किया था और सोमनाथ ट्र्स्ट बनाकर खर्च के लिए शामलदास गांधी आदि लोगों की भागीदारी से फंड की व्यवस्था करने की घोषणा की थी और सरकार की ओर से कोई भी विरोध ना करने का भरोसा दिलाया था. तब तीन साल में कन्हैयालाल मुंशी की निगरानी में भव्य सोमनाथ मंदिर का निर्माण कार्य हुआ था.

उल्लेखनीय है कि मोदी ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर नए जिले गीर-सोमनाथ की घोषणा तो कर दी लेकिन इस जिले का कामकाज वेरावल के डिप्टी कलेक्टर कार्यालय से किया जाता रहा है। ऐसे में वेरावल के कलेक्टर सीपी पटेल ने अपने पत्र क्रमांक नं. 10/2013 में बताया है कि गीर-सोमनाथ जिले के लिए पुलिस जिला सेवा सदन, बहुमंजिला इमारत, स्टाफ क्वाटर, पार्किंग, अन्य सुविधाओं, गार्डनिंग, जिला खेल कूद भवन, नगरपालिका कार्यालय, टाउन हॉल, आफिसर्स बिल्डिंग आदि का निर्माण करना है, उसके लिए सरकारी खाली जगह नहीं है इसीलिए सोमनाथ ट्रस्ट की जमीन के लीज को खारिज करके ट्रस्ट से जमीन को वापस मांग रही है।

ताज्जुब तो इस बात का है कि सोमनाथ ट्र्स्ट के प्रमुख लालकृष्ण अडवानी और सोमनाथ के प्रमुख केशूभाई पटेल इस बात पर मौन हैं। भाजपा के नेता भले ही इस मसले पर चुप हों लेकिन इस मुद्दे को गुजरात कांग्रेस के भूतपूर्व अध्यक्ष सिद्धार्थ पटेल ने उठाया है।

01 November 2013

क्या पटेल के साथ अन्याय हुआ ?

भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी अन्याय आज देश में ज्वालामुखी की तरह जवां होकर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों और नेताओं को ललकार रही है। नवीन भारत के निर्माता, एकता के शिल्पी और भारतीय जनमानस में किसान की आत्मा कहे जाने वाले पटेल के साथ हुए नाइंसाफी को लेकर आज देश ये सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या पटेल के साथ अन्याय हुआ है?

सवाल इसलिए भी जायज है कि क्योंकि आजादी के 66 साल बाद देश में एक बार फिर से धर्मनिरपेक्षता बनाम संप्रदायिकता की जंग अपने चरम सिमा पर है। साथ ही देश को तोड़ने वाली ताकतें आग में घी डाल राष्ट्रीय एकता और अखंडता को चुनौती दे रही है। ऐसे में पटेल की भूमीका आज के दौर में पहले से कही जयादा उपयोगी नजर आने लगी है। गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल की पलही प्राथमीकता थी 562 देसी रियासतों को भारत में मिलाना। इस चुनौति को उन्होने बखूबी निभाया। बिना कोई खून बहाये। मगर इनमे से सिर्फ एक राज्य को मिलाने का कार्य पंडीत नेहरू ने अपने हाथों में लिया जिसमें वे असफल रहे। केवल जम्मू एवं काश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद के राजाओं ने बिलय करने से इंकार कर दिया। जूनागढ के नवाब को जब पटेल ने हड़काया तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की। सरदार पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि क्या मर्जी है? राजा कांप उठा, और बिलय पर राजी हो गया। 

किन्तु नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह रियासत एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है। पटेल की यही काबिलियत और दूरदृश्टि नेहरू के आगे पटेल की छबी लौहरूश के रूप में प्रतीत होती है। विश्व के इतिहास में पटेल जैसा एक भी व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो। यही करण है की मोदी इस दूरदृश्टा की उचाईयों को पूरे विश्व में सबसे उंचा स्थान देने चाहते है। पिछले चार सालों के दौरान यूपीए सरकार ने पटेल की जयंती पर 8.5 करोड़ रुपए खर्च किए हैं मगर एक भी मूर्ति कही पे नहीं लगवाये गये। दिल्ली में सिर्फ एक सड़क पटेल के नाम पर है जबकी गांधी नेहरू परिवार के नाम पर हजारों संस्थान और लाखों प्रतिमाएं देश भर में मौजूद है।

प्रांतिय चुनाव में प्रधानमंत्री बनाने के लिए सबसे जयादा वोट पटेल को मिले थे। खुद महात्मा गांधी सरदार पटेल को भारत के प्रधान मंत्री बनाने के लिए तैयार थे, साथ ही चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भी पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के लिए प्रस्ताव रखा था। फिर भी इनसब बातों को नजर अंदाज करके नेहरू को प्रधान मंत्री बनाया गया। भारत के रक्तहीन क्रांति के योध्दा और हिन्दू ह्मदय के कूटनीतिज्ञ सरदार पटेल के साथ जिस प्रकार अन्याय हुआ उसको लेकरदेशवाशियों का ह्मदय दर्द और गुस्से में बार बार मन और दिल को कचोटता है। इस कचोट से निकली आवाज, आज ये सवाल खड़ा करता है कि पटेल के साथ वाकई अन्याय हुआ है?

1947 में दंगों के दौरान, पटेल ने सैकड़ों मुस्लिमों को लालकिले में रखा और वे उनकी रक्षा के लिए पुणे और मद्रास प्रांत से सेना को बुलाकर उनकी जान बचाई। मगर आज तथाकथित सेकुलर धर्मनिरपेक्षता की चोला ओढ़ कर पटेल को नजर अंदाज करने से नहीं चुक रहे है। नब्बे के दशक में कुर्मी समुदाय की हर रैली में सरदार पटेल का पोस्टर होता था। मगर आज उसी समुदाय के प्रतिनिधित्व करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आज पटेल संप्रदायिक दिखने लगे है। मतलब साफ है चाहे इतिहास हो या वर्तमान सब ने पटेल को प्यादा बनाया, और जब जरूरत पुरा हुआ तो इतिहास बता कर भूल गये। ऐसे में आज ये सवाल जायज हो चला है कि क्या पटेल के साथ अन्याय हुआ ?

नेहरू बनाम पटेल

जुना गढ़ और कश्मीर को भारत में मिलाने पर नेहरू ने विरोध किया था, जबकी पटेल ने समर्थन किया था। सोमनाथ मंदिर निर्माण प्रस्ताव को नेहरू ने संसद में विरोध किया था, जबकी पटेल ने समर्थन किया था। पटेल ने बिना किसी समस्या के 561 रियासतों को सफलता पूर्वक एक साथ मिलाया जबकी नेहरू सिर्फ कश्मीर को मिलाने का जिम्मा लिया मगर फिर भी उसे पूर्ण रूप से कामयाबि नहीं मिली। दिल्ली में सिर्फ एक सड़क का नाम पटेल के नाम पर है, जबकी नेहरू के नाम पर सैकड़ो संस्थान के नाम और मुर्ति मौजूद है। नेहरू कोई भी काम नियम षर्तो को नजर अंदाज कर फैसला लेना चाहते थे, जबकी पटेल हमेशा कानून के साथ नेहरू को चलने के लिए बाध्य करते थे।

अजमेर दंगा में नेहरू राजनीतिक हस्तक्षेप करना चाहते थे, जबकी पटले ऐसा करने से नेहरू को मना कर दिया। 1947 से लेकर 1950 तक लगातार नेहरू को मुस्लिम बिरोधी बताने का कांग्रेस पार्टी की ओर से होता रहा, जबकी नेहरू को मुस्लिमों का हितैषी! पटेल ने संविधान की धारा 294 और 292 में आरक्षण का विरोध किया था जबकी, नेहरू ने इसका समर्थन किया था। नेहरू ने दिल्ली के दंगा में पटेल को दोशी ठहराने की कोशिस की मगर, जबकी गलती नेहरू और दिल्ली पुलिस की थी।

नेहरू ने सिंध्द पाकिस्तान को देने के लिए तैयार थे मगर पटेल ने संसद में इसका विरोध्द किया था।  बटवारे के समय नेहरू ने पाकिज्ञतान को को 55 हजार करोड़ रूपये देने की बात स्वीकार किए, जबकी पटेल ने इसका विरोध किया। चक्रचर्ती राजगोपालाचारी ने पटेल को प्रधान मंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा जबकी नेहरू इसे नजरअंदाज कर खुद प्रधान मंत्री बन गए।

1950 में पंडित नेहरू को पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था जबकी नेहरू ने इसे नजर अंदाज किया था। मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना की तरफ से पाकिस्तान की मांग को नेहरू ने समर्थन किया था, जबकी सरदार पटेल ने उसका विरोध किया था। नेहरू की गलतनीतियों से देश 343 हजार करोड़ के विदेशी कर्ज से दब गया। सरदार पटेल चाहते थे कि हमारा देश कर्ज से मुक्त हो।