07 February 2014

क्या आरक्षण राजनीति का हथियार बन गया है ?

जाति बनाम आरक्षण का मुद्दा एक बार से सियासी सुर्खियों में है। जात पात के आधार पर आरक्षण होना चाहिए या नहीं ये एक बार फिर से बहस काविषय बन गया है। सोशल मीडिया से लेकर सत्ता की गलियारों तक हर कोई बयानबाजी कर सुर्खियां बटोरने में लगा है। कोई आरक्षण हटाओ का नारा देरहा है तो कोई आरक्षण बचाओं का। कांग्रेस पार्टी जनार्दन द्विवेदी के बयानों से इतर आरक्षण का जन्मदाता बता रही है, तो वहीं सोनिया गांधी इसे पीछड़े वर्गों की आस्था से जोड़ कर देख रहीं हैं। ऐसे में सवाल ये है कि आरक्षण की आड़ में वोट का बयापार आखिर कब तक जारी रहेगा?

कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने हाल में जब जाति के आधार पर आरक्षण को खत्म करने की मांग की तो राजनीतिक दल उन पर टूट पड़े। उनकी अपनी हीं पार्टी ने उनके बयानों से किनारा कर लिया। भारतीय राजनीति में आरक्षण शुरू से ही एक विवादास्पद का मुद्दा रहा है। इसको जारी रखने या फिर हटाने को लेकर आम सहमति कभी नहीं बन पाई।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने जब 1932 में भारत के दलित वर्ग और दूसरे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा तो गांधी जी ने इसका कड़ा विरोध किया था। उनका मानना था कि इससे हिन्दू समुदाय विभाजित हो जाएगा। मगर ब्रिटिश हुकूमत  इसे लागू करने में सफल रही। मगर देश आजाद होने के बाद डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर ने इसे संविधान में विशेष रूप से स्थान दिया। 

जैसे जैसे समय बदलते गया वैसे वेसे आरक्षण का स्वरूप भी बदला। दिसंबर 1978 में मंडल कमीशन ने ओबीसी के लिए आरक्षण की सिफारिश की। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने सत्ता में आने के बाद इसे लागू किया। मगर इनकी सरकार गिर गई। बाद में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद मंडल कमीशन की सिफारिशों को एक बार फिर से 1991 में अमली जामा पहनाया गया। जिसके बाद पिछड़े वर्गों के छात्रों को केन्द्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण मिलने लगे। यही आरक्षण आज सत्ता की चाशनी बन गई है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड ने कहा था कि आरक्षण नीति की सफलता की कसौटी यही होगी कि कितनी जल्दी आरक्षण की आवश्यकता को समाप्त किया जाय। मगर इसके विपरीत आज राजनीतिक दल ये कोशिश कर रहे हैं कि इसे कैसे जारी रखा जाय।

1949 में भारतीय संविधान की धारा 335 में प्रारूप समिति के अध्यक्ष भीमराव अम्बेडकर ने स्पष्ट कर दिया था कि अनुसूचित जाति तथा जनजाति के आरक्षण का यह प्रावधान केवल दस वर्षों तक के लिए हीं होगा। मगर आज 65 साल बाद जब धारा 335 को हटाने के लिए किसी ने आवाज उठाई तो है तो अब हर दल को इसमें वोट बैंक दिखाई देने लगा है। अम्बेडकर ने आरक्षण देते समय ये भी कहा था कि आरक्षण एक बैसाखी है और लंबे दौर में वह दलितों को पंगु बना डालेगी। तो सवाल आज अंबेडकर के दिए आरक्षण का पैरोकारों से भी है कि क्या ये दलितों के साथ न्याय है या वोट के लिए बांधने की रस्सी। एक ओर आज समाज में जात पात की भेदभाव को खत्म करने की बात होरही है तो वहीं दुसरी इसी के आसरे समाज को जातीगत चैकठ लाकर बांध दिया जाता है। ऐसे सवाल ये है कि आज के बदले राजनीतिक दौर में क्या आरक्षण राजनीति का हथियार बन गया है?

                                भारत में आरक्षण

·     1882 - हंटर आयोग की नियुक्ति हुई.
·         ज्योतिराव फुले ने शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण की मांग  रखी.  

·         1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया.
·         सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से लागू थे.

·         1908- अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में, आरक्षण शुरू किया गया.
·         1909 - भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया.

·         1921 - मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया.
·         1935 - कांग्रेस ने दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किया.

·         1942 - भीम राव अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित   वर्ग महासंघ की स्थापना की.

·         अम्बेडकर ने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की.

·    1953 - सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग को स्थापित किया गया.

·         1990 मंडल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया.

·         छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया.

·         दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की.

·         1991- नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10% आरक्षण शुरू किया.

·        2005- निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया.

·        2007- केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन दिया.

·    2008- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 10 अप्रैल 2008 को सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27% ओबीसी कोटा को सही ठहराया

02 February 2014

पंचायत या जातिवादी न्यालय ?

न्याय सार्वभौमिक अवधारणा है। अतः संसार के प्रत्येक देश में इसके संबंध में बहुत विपुल कार्य किया गया। पश्चिम में अरस्तु-प्लेटो जैसे आदर्शवादियों से लेकर मैकियावेली जैसे कूटनीतिज्ञों व लॉक-हॉब्स जैसे सामाजिक समझौतावादियों से लेकर मार्क्स जैसे क्रांतिवादियों तक सभी ने न्याय को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया। अपने देश में भी प्राचीनकाल लेकर अर्वाचीन समय तक बहुत से विद्वानों ने इस विषय पर गहनता से विचार किया। मनु, शुक्र व चाणक्य जैसे राजनीतिशास्त्रियों ने न्याय की प्रतिष्ठापना का दायित्व शासकों पर डाला है। उन्होंने न्याय को गतिशील व विकेंद्रित करने के लिए कई प्रकार की संस्थाए व संगठन बनाने का सुझाव दिया। साथ ही उन्हें प्रभावी अधिकार देने की वकालात भी की। 

ऐसी संस्थाओं को विकसित करने के लिए उन्होंने कुछ पद्धतियां भी बनाई। उन्हीं पद्धतियों के अन्तर्गत ग्रामीण स्तर पर लोक न्याय के विकेन्द्रित स्वरूप के लिए ग्राम पंचायतों का सृजन किया गया। तत्कालीन समय में इनका स्वरूप बडा ही मजेदार था। उस समय में इसके सम्बंध में एक कहावत प्रचलित हुई-‘‘ पंच परमेश्वर’’। विनोबा भावे ने लोकनीति संबंधी अपने साहित्य में इस कहावत का बहुधा प्रयोग किया है। कहावत बहुत ही छोटी है लेकिन यह अपने में बहुत ही गहरा भावार्थ समेटे हुए है। इसका पहला भाव तो यह है कि तत्कालीन भारत में समाज में परस्पर विश्वास की भावना ज्यादा थी। न्याय का इच्छुक व्यक्ति पंचों पर पूर्ण विश्वास रखता था। यानी पंच जो निर्णय देंगे वह बिल्कुल सही होगा। क्योंकि उनके द्वारा दिया गया निर्णय ईश्वर की वाणी माना जाता था। पंच परमेश्वर वाली न्याय प्रणाली की दूसरी विशेषता यह है कि समाज के कुछ वृद्धजन प्रबुद्धजन यदि कोई निर्णय ले लेते थे तो वह सभी के लिए ईश्वर की वाणी के समान माना जाता था। विचारणीय तथ्य यह है कि निर्णय लेने वाले वे वृद्ध अनुभवी होने के साथ ही आचरण में पवित्र होते थे। अतः उनके द्वारा दिया गया निर्णय कभी गलत नहीं होता था। समाज में पंचो व पंचायतों के प्रति बहुत ही सम्मान होता था।

न्याय की यह प्रकिया पहले सम्पूर्ण गांव के लिए एक ही होती थी, विनोबा जी ने इसका कारण यह बतलाया है कि उस समय जाति वर्ग श्रेणी आदि का चलन समाज में नही थे। मेरे विचार में शायद जाति वर्ग आदि तो अस्तित्व में होंगे लेकिन न्याय की व्यवस्था पूरे गांव के लिए एक ही रही होंगी। धीरे-धीरे देश की अर्थनीति व समाज व्यवस्था में बदलाव होने लगा, जातीय स्वाभिमान व रक्त शुद्धता की भावना जोर पकड़ने लगी। जाति के सदस्य अपनी जाति के लिए पृथक नियमों व रिवाजों की वकालात करने लगे। यह विचार ही भविष्य में जातीय पंचायतों की मजबूती व दृढिकरण का आधार बना। तत्कालीन समय इनके विकास के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। तब राजव्यवस्था का देश में प्रभाव अधिक था, बाहरी आक्रमणों से त्रस्त लोग अपने सांस्कृतिक अभिमान को बचाने की कोशिशों में लगे हुए थे। उनके सामने एक खतरा भयंकर रूप से विद्यमान था, ‘वर्ण संकरता उत्पन्न होने का‘ ऐसी परिस्थिति में खापों के द्वारा अपने स्वयं में कठोरता लाना लाजिमी था। उन्होनें इसका हल कुछ इस प्रकार निकाला कि खांप की निर्णयकारी संस्था पंचायत न केवल अपनी खांप की नीति निर्धारक बन गई बल्कि नियति निर्धारक भी बन गई। उन्हें जाति की सुरक्षा के लिए व्यवस्थाएं लागू करने का अधिकार अवष्य दिया गया लेकिन तब भी पद्धति वही थी ‘पंच बोले परमेष्वर‘। चाहे समाज से बहिष्कार का डर हो चाहे समाज के साथ चलने की सदस्यों की नीति, लेकिन व्यक्ति पंचायत के निर्णयों को शिरोधार्य करता अवष्य था। पचांयत के नियमों के संबंध में कुछ भी कहने की आवष्यकता नहीं, आज भी समाज के नियम इतने कठोर है तो तत्कालीन समय में इनकी कठोरता कितनी रही होंगी यह हम सभी जानते है।

जाति-पंचायतों के अस्तित्व को मिटाना आज लगभग असंभव है क्योंकि इनका आधार जाति है और जाति आज राजनीति का आधार बन चुकी है लेकिन इन पर नियंत्रण तो किया जा ही सकता है। सरकार यदि सभी खाप पंचायतो में समानता लाने का प्रयास करे तो ये नियंत्रित हो सकती है, अन्यथा इनका कहर दिन प्रतिदिन बढता ही जायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं। 

विचारणीय बिंदु यह है कि पंचायतों ने समय के साथ अपनी शक्ति में वृद्धि तो बड़े जोर-शोर से किया लेकिन जिस प्रकार की गतिशीलता की मांग समय के साथ उठी वह गतिशीलता ये अपने में स्थापित करने में उतने सफल नहीं हो सकी। अपने तंत्र में युगानूकूल परिवर्तन करने में ये पूर्णतया असमर्थ रहीं। तब वक्त दूसरा था, जब न तो किसी प्रकार के उन्नत साधन थे न ही न्याय की कोई समर्थ संस्थाएं। समाज के लिए खाप की पंचायते ही ‘माई-बाप‘ थी। मध्यकालीन समाज व्यवस्था के लिए खाप पंचायते बिल्कुल सही संस्था थी। काल के प्रवाह में उठा-पटक के कई दौर चले मुगलों का शासन समाप्त हुआ अंग्रेजों का काला शासन देश में जड़ें जमाने लगा। उन्होने अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए जातियों में एक अलग प्रकार की भावना को जागृत किया। उन्होने जातियों को ‘वाद‘ के दायरे में बिठाकर उनके व्यवहारों को अलगाव के अंधे भंवर में डालने का घिनौना प्रयास किया। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग प्रकार के नियम-कायदों को स्थापित करके उनकी व्यवस्था में असामाजिकता का प्रवेश उन्होनें करवाया, उन्होने जाति-बिरादरी के प्रमुख लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर किया कि किस प्रकार अपनी जाति की सदस्य संख्या को बढाया जाय? जाति आधारित जनगणना करवाने के पीछे अंग्रेजों का अहम उदेश्य यही था। आज जातियों में आपसी वैमनस्य की भावना इतनी बलवती हो रही है उसका अंकुरण करने में प्रमुख हाथ अंग्रेजों का ही है।

सन् 1947 को अपना देश आजाद हो गया। 15 अगस्त की पहली किरण के साथ ही देश में स्वराज का बिगुल बजा, दिल्ली में लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया गया और शुरू हो गई लोकतंत्र को साकार करने की मुहिम, महात्मा गांधी के ग्राम आधारित स्वराज के स्वप्न को मूर्त रूप देने का जिम्मा सरकार ने अपने ऊपर लिया। तत्कालीन प्रधानमत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर कस्बे से देश में ग्राम स्वराज की आधारषिला रखते हुए पंचायतीराज की स्थापना की। प्राचीन व्यवस्था को सरकार द्वारा सर्वथा नवीन अर्थ प्रदान किया गया। नेहरू जी ने उसे गांधी जी का स्वप्न घोषित किया। पंचायतीराज को लोकतंत्र की प्राथमिक कडी के रूप में ‘प्रोड्यूज‘ किया गया तथा पंचायतों को बहुत से अधिकार भी दिये गये। लेकिन जातीय पंचायतो पर किसी भी प्रकार का प्रभावी नियंत्रण करने की कोशिश आज तक नहीं की गयी। महात्मा गांधी ने जिस प्रकार के जाति विहिन वर्गविहिन समाज (या यूं कहिए देश) का सपना देखा था उसको सरकार यदि वास्तव में पूर्ण करना चाहती तो सर्वप्रथम खाप पंचायतो पर प्रभावी अंकुश करने का कार्य करती, किंतु देश की राजनीति में जिस गति से मूल्यों की गिरावट आयी व राजनीति का रूप जातिवाद के भंवर में जितनी तीव्रता से फंसा उससे दोगुनी मात्रा में जाति पंचायतो की तानाशाही बढी। 

आज स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि चुनाव में खड़े हुए किसी जाति विशेष के उम्मीदवार को उसकी जाति पंचायत स्वयं का प्रतिनिधि मानने लग जाती है और उसे विजयी बनाने के लिए जाति  के सदस्यों को उसके पक्ष में अनिवार्य रूप से मत देने का दबाव बनाने लग जाती है। यदि व्यक्ति ऐसा नहीं करता तो वहीं समाज से बहिष्कृत कर देने का डर, कुछ मामले ऐसे देखे गये है जिसमें विपरीत विचार रखने वाले जाति सदस्य चुनाव के दौरान बिल्कुल मौन रहे उनके सामने दो रास्ते थे। पार्टी के प्रति निष्ठा रखे। आखिर में उन्होनें दूसरा रास्ता ही अपनाया क्योंकि जाति से बहिष्कार एक नर्क माना जाता है। क्या यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल है? शायद नहीं! फिर प्रश्न उठता है कि इस प्रकार हम किस लोकतंत्र को मजबूत कर रहे है?

उपरोक्त उदाहरण एक तथ्य स्पष्ट करता है कि आज जिस रूप में जातीय पंचायते हमारे सामने है वह रूप किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र के अनुकूल नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि कोई भी राजनीतिक दल यहां तक कि सरकार भी इस समस्या के हल के लिए आगे आने को तैयार नहीं, सभी  इसे और अधिक बढाने का तरिका खोजने में ज्यादा व्यस्त दिखाई दे रहे है क्योंकि जातीयों का बढना उनकी जीत को पक्का करता है। इसका एक प्रमाण गत जनगणना में हम सभी ने देखा कि किस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा जाति आधारित गणना करवाकर जातिगत अंतर्विरोध को गड़े मुर्दो की भांति उखाडने का प्रयास किया। जो काम कभी अंग्रेजों ने अपनी गंदी नीति के तहत किया था वह काम केंद्र सरकार द्वारा अपनी वोट बैंक की नीति के तहत किया गया। इसलिए हम कह सकते हैं कि जाति-पंचायतों के अस्तित्व को मिटाना आज लगभग असंभव है क्योंकि इनका आधार जाति है और जाति आज राजनीति का आधार बन चुकी है लेकिन इन पर नियंत्रण तो किया जा ही सकता है। सरकार यदि सभी खाप पंचायतो में समानता लाने का प्रयास करे तो ये नियंत्रित हो सकती है, अन्यथा इनका कहर दिन प्रतिदिन बढता ही जायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं।

बीमा, जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और दुर्घटना !

हम सबको मालूम ही है कि देश में बीमा कंपनियाँ हैं, जो एक निश्चित प्रीमियम के भुगतान पर जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और दुर्घटना बीमा करती हैं और इसमें से किसी तरह का संकट आने पे जोखिम का निवारण करती हैं। सरकार ने जितनी तत्परता बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश के लिए दिखाई उतनी तत्परता अगर उसने सरकारी कर ढांचे को अनिवार्य बीमा से जोड़के दिखाती तो ज्यादा अच्छा था। सरकार चाहे तो हमें हमारे ही पैसे से हमारा बीमा करा सकती है और हर नागरिक को उसके द्वारा दिये जानेवाले कर से ही अनिवार्य बीमा सुरक्षा दे सकती है।

हम सभी को मालूम है कि चाहे उत्पाद शुल्क हो, वैट हो या आय कर हो किसी न किसी रूप में सरकार को हम करों का भुगतान करते हैं, बदले में कभी हमने सोचा है कि जितना कर हम देते हैं, क्या सरकार उतना लौटा पाती है? मेरी तो राय है कि हमें हिसाब मांगनी चाहिए और हिसाब के साथ साथ कर को अनिवार्य बीमा के प्रीमियम से जोड़ देना चाहिए। कभी आपने सोचा है क्या कि एजुकेशन सेस के नाम पर सरकार आपसे बड़े अधिकार से पैसा तो ले लेती है लेकिन लेकिन क्या उसी अधिकार के साथ आप अपने बच्चे के किसी भी तरह के शिक्षा के अधिकार की बात कर सकते हैं? वो भी इस सरकारी तंत्र में?

इसकी एक योजना सरकार बना सकती है। आइये हम बात करते हैं कि सरकार अगर चाहे तो अनिवार्य कर बीमा को कैसे लागू कर सकती है। आप आयकर का उदाहरण लीजिये। आपका आयकर अगर 10,000 है तो सेस लेकर यह बनता है 10,300 रुपये। सरकार को इस 10,300 रुपये के इस प्रकार अनिवार्य बीमा के प्रीमियम के रूप मे वितरण करना चाहिए। 10,300 रुपये का 0.20% शिक्षा बीमा प्रीमियम राशि, 0.10% दुर्घटना बीमा प्रीमियम राशि, 0.40% स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि और 0.30% जीवन टर्म बीमा प्रीमियम राशि और कुल करों मे से इस प्रकार 1% राशि प्रीमियम के रूप मे जाएगी, चाहे तो सरकार 1% की जगह 2% से 3% तक का वितरण कर सकती है वर्तमान मे लिए जाने वाले उपकर का इसके लिए इस्तेमाल कर सकती है।

इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान करभार के साथ ही उसका बीमा हो जाएगा और किसी तरह का शिक्षा, स्वास्थ्य, दुर्घटना या मृत्यु होने पर देश को कर के रूप मे दिये गए लगान के बदले सम्मान की बीमा राशि प्राप्त होगी बगैर किसी अहसान के मुआवजे के रूप मे। नागरिकों द्वारा दिये गए कर के अनुपात और राशि के हिसाब से बीमा कंपनियाँ बीमा सुरक्षा प्रदान करेंगी। इसके लिए सरकार को विभिन्न बीमा कंपनियों से साझेदारी करनी पड़ेंगी और साथ ही साथ सरकार विदेशी बीमा कंपनियों को इस योजना मे भाग लेना अनिवार्य कर सकती है।

ये तो रही आयकर की बात जहां कर देने वाले व्यक्ति की पहचान होती है जिसके द्वारा सरकार चिन्हित व्यक्ति का और उसके परिवार को बीमा सुरक्षा दे सकती है। लेकिन अप्रत्यक्ष कर के रूप मे सरकार एक बड़ा हिस्सा पाती है जो अमूमन आयकर की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा होता है। ऐसे कर के साथ सरकार चाहे तो अनिवार्य समूह बीमा का प्रयोग कर सकती है। उदाहरण के तौर पे अनुमानतः अप्रत्यक्ष कर के रूप मे सरकार 8 लाख करोड़ की वसूली करती है, वो भी सेस के साथ। और अगर सरकार इसे समूह बीमा योजना के साथ जोड़ दे, तथा बीमा कंपनियों के साथ मिल के पंचायत स्तर के ढांचे के सहयोग के साथ हर उस व्यक्ति को सामाजिक समूह सुरक्षा बीमा देवे तो सामाजिक बीमा के रूप मे एक क्रांति आ जाएगी और सरकार पे अतिरिक्त भार भी नहीं आएगा।

8 लाख करोड़ के हिसाब से प्रति हिंदुस्तानी 6666 अप्रत्यक्ष कर दे रहा है और अगर एक पंचायत यूनिट मे औसतन 5000 लोग रहते हैं तो उस पंचायत से सरकार को सालाना 3.33 करोड़ का कर प्राप्त हो रहा है और सरकार चाहे तो उस पंचायत कर की राशि अनिवार्य समूह बीमा प्रीमियम मे इस प्रकार बाँट सकती है। 3.33 करोड़ रुपये का 0.33% समूह स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि, 0.33% समूह दुर्घटना बीमा प्रीमियम राशि, 0.34% समूह जीवन टर्म बीमा प्रीमियम राशि और कुल करों मे से इस प्रकार 1% राशि प्रीमियम के रूप मे जाएगी, चाहे तो सरकार 1% की जगह 2% से 3 % तक का वितरण कर सकती है वर्तमान मे लिए जाने वाले उपकर का इसके लिए इस्तेमाल कर सकती है।

सरकार उपरोक्त प्रकार से अनिवार्य कर बीमा के मार्फत बीमा सुरक्षा प्रदान कर सकती है जो सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र मे पूरे विश्व मे एक उदाहरण होगा  और बिना किसी अतिरिक्त करभार के नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, दुर्घटना, जीवन एवं समूह बीमा का लाभ दे सकती है। वर्तमान बीमा कंपनियों के साथ साथ नयी आने वाली देसी और विदेशी बीमा कंपनियों की अनिवार्य सहभागिता की नियम भी सरकार लगा सकती है। और साथ ही साथ करों के भुगतान के प्रति नागरिकों मे प्रोत्साहन बढ़ेगा।

यौन शोषण का अड्डा बना वेटिकन !

जिनेवा स्थित एक संयुक्त राष्ट्र पैनल ने रोमन कैथोलिक पादरियों द्वारा हजारों बच्चों के यौन शोषण पर वेटिकन अधिकारियों की एक रिपोर्ट पर सुनवाई शुरु कर दी है। इसके पहले वेटिकन इस तरह की कोई जानकारी संयुक्त राष्ट्र के साथ साझा करने से इनकार करता रहा है। वेटिकन का शुरु से ही यह मत रहा है कि इन मामलों की जिम्मेदारी उन देशों की न्यायपालिकाओं की है जहां यह यौन शोषण हुए है। पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों में सही प्रतिक्रिया नहीं देने के लिए वेटिकन की आलोचना की गई।

संयुक्त राष्ट्र में सुनवाई को लेकर पीड़ितों को उम्मीद है कि इस सुनवाई से चर्च की ‘‘गोपनीयता’’ की नीति का अंत होगा। पोप फ्रांसिस ने अपना पद सभालने के बाद कहा था कि यौन शोषण के मामलों को निपटाना चर्च की विश्रसनीयता बनाए रखने के लिए जरुरी है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दी होल सी, वेटिकन सिटी के सदस्यों को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की समिति के समक्ष इस मामले पर सफाई देनी होगी। वेटिकन की विधाई संस्था दी होली सी ने ‘संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते’ पर दस्तखत किए है जिसके तहत वो बच्चों को संरक्षण और सही देखभाल के लिए कानूनी रुप में बाध्य है।

ऐसा पहली बार होगा जब संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति (यूएनसीआरसी) विस्तृत सवाल-जवाब करेगी और होल सी सार्वजनिक मंच पर अपना बचाव करेगा। वेटिकन पर आरोप है कि उसने पीड़ितों के बजाय बच्चों का शोषण करने वाले पादरियों का बचाव किया जिसकी वजह से हजारों बच्चों को यौन शोषण का शिकार होना पड़ा। पिछले साल जुलाई में संयुक्त राष्ट्र समिति ने वेटिकन से अनुरोध किया था कि वो साल 1995 के बाद से सामने आए यौन शोषण के सभी मामलों की विस्तृत जानकारी दे। दी होली सी से यह भी पूछा जा सकता है कि क्या अपराधों के दोषी पादरी, नन और साधुओं को दोषी पाए जाने के बाद भी बच्चों के संपर्क में रहने दिया गया, ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की गई और क्या शिकायत करने वालों की आवाज दबाई गई?

पोप बेनेडिक्ट सौहलवें ने जब 19 अप्रैल 2005 को कैथोलिक चर्च की कमान संभाली थी तो उस समय कैथोलिक ईसाइयों को उनसे काफी उम्मीदें थी कि वह चर्च के कायदे-कानूनों में बदलाव लाएगें, सबसे विवादास्पपद मामला पादरियों द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़ा था जिसे लेकर मुकदमें तक हुए और कई देशों में पीड़ितों को चर्च द्वारा भारी मुआवजा भी देना पड़ा। सबसे दुखद यह कि पोप के आलोचकों ने उन पर ऐसे मामलों की लीपापोती करने में सहभागी होने के आरोप भी लगाए। दरअसल वेटिकन हजारों सालों से पूरे संसार पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। पोप जॉन पॉल द्वितीय ने साल 1999 के अपने भारत दौरे के दौरान इस तरह का साफ ऐलान ही कर दिया था।

पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि किस तरह ईसा की पहली सहस्राब्दी में यूरोपीय महाद्वीप को कैथोलिक चर्च ने पाया और दूसरी सहस्राब्दी आते आते उत्तर और दक्षिणी महाद्वीपों व अफ्रीका पर चर्च का वर्चस्व स्थापित हो गया और अब तीसरी सहस्राब्दी एशिया महाद्वीप की है। वेटिकन दावा कर रहा है कि चर्च की शरण में आने पर ही मानव जाति को अपने पापों से मुक्ति तथा स्वर्ग का साम्राज्य मिल सकता है। पूरे संसार को चर्च की शरण में लाने की योजना में लगे हुए चर्च के पास अपने अनुयायियों की पुकार को सुनने का समय ही नहीं है।

डेड हजार साल पहले कैथोलिक चर्च की शरण में आए अमेरिका और यूरोप के धर्मांतरित कैथलिकों के वंशज विगत कई दशकों से पोप के पास दुहोई दे रहे थे कि उन्हें चर्च के शोषण से बचाओं। वो चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे कि तुम्हारा पूरा सिस्टम ऊपर से नीचे तक पाप में डूबा हुआ है, परन्मु वेटिकन सुनने को ही तैयार नही था। ईसाई धर्म में अनेक चर्च एवं डिनोमिनेशन है पर इन सबमें रोमन कैथोलिक चर्च संख्या, बल और प्रभाव में सबसे अग्रणी भी है और सबसे ज्यादा पापाचार में लिप्त भी। इस चर्च के भीतर यह पापाचार कब से फैला हुआ है कहना कठिन है। भारत समेत अधिक्तर देशों में सधारण विश्वासियों के साथ साथ चर्च की नने (धर्म-बहने) भी यौन शोषण का शिकार रही है। हालही में इटली की एक नन ने एक बच्चे को जन्म दिया है और उसका नाम पोप फ्रंासिस के नाम पर रखा है। चर्च का दावा है कि नन को मालूम ही नही था कि वह गर्भवती है। लेकिन पाप का घड़ा तो भरता ही है और भर कर फूटता भी है।

अमेरिका और यूरोप में पचास साल पहले ही चर्च के प्रति विद्रोह के स्वर उठने लगे थे। साल 1963 में अमरीका के न्यू मैक्सिको स्थित ‘सर्वेन्ट्स आफ दि होली पोर्सलीट’ के प्रमुख ने पोप जॉन पाल छठ्म से मुलाकात करके चर्च के अंदर फैले अनाचार को खत्म करने की मांग की थी। वेटिकन ने फादर फिट्ज गेराल्ड की शिकायत को चर्च के हित की दुहाई देते हुए खारिज कर दिया। तब से अब तक वेटिकन में चार नये चेहरे आ चुके हैं-पोप जॉन पाल छट्म, पोप जॉन पाल द्वितीय, पोप बेनेडिक्ट सोहलवें और अब पोप फ्रांसिस। पिछले पचास सालो में न जाने कितनी शिकायते वेटिकन के पास पंहुची और प्रत्येक परमपिता पोप इस पर चुप्पी साधे बैठा रहा।

वेटिकन की चुप्पी को देखते हुए अमेरिका और यूरोप के विश्वासियों ने इसके विरुद्ध अनेक मंच गठित किए और उनकी सार्वजनिक अपील पर हजारों भुक्तभोगी, जो कल तक चुप थे, खुलकर सामने आ गए। नीदरलैंड में ‘हेल्प एण्ड लॉ लाइन’ और अमेरिका में ‘सर्वाइवर्स नेटवर्क फार एब्यूज्ड बाई चर्च’ के कारण पीड़ितों में साहस आया और जो पहले अपने को अकेला समझ कर या दूसरे दबावों के कारण चुप थे खुल कर सामने आने लगे है।

सोचने वाली बात यह है कि पापाचार को रोकने से अधिक महत्वपूर्ण वेटिकन का हित क्या हो सकता है? चर्च मत के अनुसार मनुष्य जन्म से ही पापी है और इस पाप कर्म से बाहर निकलने पर ही उसका उद्वार संभव है। ऐसे में चर्च को ऐसे पापाचारी पादरियों से मुक्त करना उसकी पहली चिन्ता होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में चर्च का लक्ष्य कुछ और ही है। वेटिकन ने एक बड़ा ही असान रास्ता पकड़ लिया है कि जिस पादरी के विरुद्व शिकायत मिले, उसका तुंरत तबादला कर दो या फिर उसका दायित्व बदल दो। तांकि चर्च के काम में कोई रुकावट न आए।

यूरोप और अमेरिका के कैथोलिक विश्वासियों के दिलो में सैकड़ों सालों से समाया वेटिकन का गौरव मंद होने लगा है। यूरोप और अमेरिका के विश्वासियों के बीच अपनी मंद पड़ती छवि को लेकर चिंतित चर्च ने नए क्षेत्रों में अपने पांव फैलाने शुरु कर दिए है। इस कार्य के लिए वह राज्यशक्ति का भी उपयोग कर रहा है। भारत में तेज रफतार से नए चर्च और नए डायसिस बनाए जा रहे है। यह काम कितनी तेजी से हो रहा है इसे केवल इस बात से ही समझा जा सकता है कि भारत में कार्यरत वेटिकन के राजदूत द्वारा तीन सालों के अंदर ही 25 बिशप बनाए गए है। हालाकि भारत के धर्मांतरित ईसाइयों की समस्याओं पर वेटिकन अपने कान बंद किए हुए है।

2005 से पहले छपा करंसी नोट वैध मुद्रा बना रहेगा !

भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में जारी अपने दिशा-निर्देश में 2005 से पहले जारी करंसी नोटों को चलन से बाहर करने की बात कही है। दिशा-निर्देश के मुताबिक 31 मार्च 2014 तक 2005 से पहले छपे करंसी नोटों का सर्कुलेशन बंद कर दिया जायेगा, लेकिन उक्त करंसी नोटों को बदलने की प्रक्रिया जारी रहेगी। साथ ही, उसकी वैधता अगले दिशा-निर्देश के जारी होने तक बनी रहेगी। हाँ, इस तरह के करंसी नोटों को बदलने के लिये लोगों को 1 अप्रैल 2014 से बैंक की शरण में जाना होगा। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक ने यह भी साफ किया है कि 31 मार्च 2014 के बाद भी 2005 से पहले छपा करंसी नोट वैध मुद्रा बना रहेगा। 

इसके आलोक में बैंकों को हिदायत दी गई है कि वे ग्राहकों एवं गैर ग्राहकों से 2005 से पहले जारी करंसी नोटों को बदलने का काम करेंगे, लेकिन 1 जुलाई 2014 के बाद से 500 रूपये और 1000 रूपये के 10 से अधिक नोट बदलने के लिए गैर ग्राहकों को करंसी नोट बदलने वाली शाखा में पहचान प्रमाणपत्र और आवास प्रमाणपत्र जमा करना होगा। 2005 से पहले जारी की गई मुद्रा, वैसे करंसी नोटों को माना गया है, जिसके पिछले भाग में छपाई का साल अंकित नहीं है। लिहाजा कौन सा करंसी नोट सर्कुलेशन से बाहर किया जायेगा, इसकी पहचान करना बहुत-ही सरल है।

पिछले अनुभव के आधार पर इस बार रिजर्व बैंक ने आम जनता से नहीं डरने की अपील की है। रिज़र्व बैंक के द्वारा जारी दिशा-निर्देश में कहा गया है कि लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। लोग सहजता एवं बिना डर-भय के इस बदलाव की प्रक्रिया को सफल बनाने में सरकार की मदद करें। जाहिर है सरकार को भय है कि रिजर्व बैंक के इस कदम से जनता के बीच भय एवं आतंक का माहौल कायम हो सकता है, जिससे देश में अराजकता फैलने की संभावना है।

यहाँ बताना समीचीन होगा कि रिजर्व बैंक पहली बार इसतरह का कदम नहीं उठाने जा रहा है। इसके पहले 1978 में जनता पार्टी की सरकार के समय 1000, 5000 और 10000 रूपये के करंसी नोटों को रिजर्व बैंक ने चलन से से बाहर किया था। उल्लेखनीय है कि 1949 में 5000 और 10000 रूपये के करंसी नोट जारी किये गये थे। उस कालखंड में देश में कालेधन की व्यापकता में जबर्दस्त इजाफा हुआ था। अस्तु यह कदम विशेष तौर पर कालाधन पर नियंत्रण कायम करने के लिए उठाया गया था। बता दें कि रिज़र्व बैंक के निर्णय को अमलीजामा पहनाने के क्रम में तब बैंकों में करंसी नोट वापस करने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। लोगों के बीच डर, आशंका और अफवाह का बाजार गर्म था।     

बीते सालों देश में नकली करेंसी नोटों के चलन में गुणात्मक वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार की वजह से भी कालेधन में अकूत बढ़ोतरी हुई है। इस आलोक में कहा जा सकता है कि सरकार अपने प्रस्तावित कदम की मदद से नकली करेंसी नोटों और कालेधन पर अंकुश लगाना चाहती है। एक अनुमान के अनुसार 2011-12 के दौरान देश में 69.38 करोड़ रूपये के जाली करेंसी नोट चलन में थे। जानकारों की मानें तो 27 अरब के जाली करेंसी नोट 100 और 500 रूपये के हैं। यह महज एक अनुमान है, जो हकीकत से बहुत ही कम है। वास्तविकता में यह आंकड़ा बहुत ही डरावना है। इसलिए इसकी कोई परिकल्पना भी नहीं करना चाहता है। नकली करेंसी नोटों की पहचान जरूर थोड़ी मुश्किल है, लेकिन इस दिशा में उम्मीद की किरण यह है कि 2005 के बाद प्रकाशित करेंसी नोटों में सुरक्षा के कई नये मानकों, मसलन, मशीन से पढे जा सकने वाले सिक्योरिटी थ्रेड, इलेक्ट्रोटाइप वाटर मार्क, प्रकाशन का वर्ष आदि को जोड़ा गया है, जिसकी पहचान से नकली करेंसी नोटों को चलन से बाहर किया जा सकता है।  

अपने ताजा फैसले के माध्यम से इस बार भी रिजर्व बैंक कालेधन पर नियंत्रण करना चाहता है। इस क्रम में 1978 की तरह 2005 के पहले के करेंसी नोट को बदलने के क्रम में अफरातफरी की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है। उम्मीद है कि कालांतर में बड़ी संख्या में बड़े करेंसी नोटों के रूप में नकदी का खुलासा होगा। सीएमएस के रिपोर्ट के अनुसार 2009 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 10000 करोड़ रूपये खर्च किये गये थे, जिसमें से 2500 करोड़ रूपये की राशि कालाधन थी।  

भारत की 70 प्रतिशत आबादी अभी भी गावों में रहती है। इस आबादी में निरक्षर लोगों की संख्या ज्यादा है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। मौजूदा समय में बैंकिंग सुविधाओं से एक बड़ी आबादी महरूम है। लिहाजा 2005 से पहले प्रकाशित करेंसी नोटों को चलन से बाहर करने से ग्रामीणों की एक बड़ी आबादी भी प्रभावित होगी। यह कल्पना करना सरासर गलत होगा कि इस वर्ग के पास 2005 के पहले के करेंसी नोट नहीं होंगे। इसलिए ग्रामीणों को इस दिशा में जागरूक करने की जरूरत होगी, जो आसान कार्य नहीं है। भले ही देश में आज भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। फिर भी ईमानदार लोगों की इस देश में कमी नहीं है। सच कहा जाये तो ईमानदार लोगों की वजह से ही यह देश चल रहा है।

जाहिर है ईमानदार लोगों के पास भी 2005 से पहले के प्रकाशित करेंसी नोट होंगे और अनजाने में या जानकारी के अभाव में उनके पास रखे करेंसी नोट भी बेकार हो सकते हैं, जिनकी भरपाई करना उनके लिए आसान नहीं होगा। जहाँ तक नकली करेंसी नोटों के देश में चलन की बात है तो उसका एक अहम हिस्सा पड़ोसी देशों से आता है, जिसके देश में आने की प्रक्रिया एक लंबे अरसे से चल रही है। बावजूद इसके सरकार इसपर काबू पाने में नाकाम रही है। इस बाबत दूसरा पहलू यह है कि 2005 के बाद के करेंसी नोट भी बड़ी संख्या में नकली हैं, लेकिन उसपर अंकुश लगाने के संबंध में सरकार  चुप्पी साधे हुए हैं। लिहाजा 2005 के पहले के करेंसी नोट और उसके बाद के करेंसी नोट के बीच सीमारेखा खींचना औचित्य से परे है। सच कहा जाये तो नकली करेंसी नोटों से निजात पाने के लिए सरकार को अपने खुफिया तंत्र को मजबूत बनाना होगा। रिजर्व बैंक के प्रस्तावित उपाय से देश में अफरातफरी का माहौल उत्पन्न हो सकता है। पूर्व में भी रिजर्व बैंक ने इस तरह का निर्णय लिया था, जिसका परिणाम संतोषजनक नहीं रहा है। तब गेहूं के साथ घुन पिसाने वाली कहावत ग्रामीण इलाकों में खूब चरितार्थ हुई थी। उनके साथ अन्य दूसरे लोग भी अपनी नकदी को बदलने में असफल रहे थे।

2005 के पहले जारी करेंसी नोटों को सर्कुलेशन से वापस लेने वाले रिजर्व बैंक के इस निर्णय को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसे त्रुटिहीन भी नहीं कहा जा सकता। भारत एक विविधतापूर्ण देश है। इस देश के मंदिरों में अरबों-खरबों की नकदी दान में दी जाती है। भारतीय समाज का तानाबाना इसतरह का है कि लोग अभी भी बैंक की जगह घर में नकदी रखने में विश्वास करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की एक बड़ी आबादी आज भी बैंक सुविधा से महरूम है। इस संबंध में ग्रामीण क्षेत्रों की हालत बहुत ही दयनीय है। भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है तथा वे बैंक के महत्व से अंजान हैं।

देश में नकली करंसी नोट का चलन और कालाधान जरूर एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन इसपर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक के द्वारा करंसी नोट को चलन से बाहर करना तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। इसके लिये प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सीमारेखा पर चौकसी बढ़ाने, पुलिस को चुस्त-दुरुस्त करने, खुफिया तंत्र को चौकस व काबिल बनाने आदि की कवायद से स्थिति में सुधार आ सकता है.

बलात्कारी अमेरिका की जय हो !

अमेरिका की केंद्रीय कैबिनेट की बैठक से पहले व्हाइट हाउस ने एक रिपोर्ट जारी की है, इसके अनुसार करीब 2 करोड़ 20 लाख अमेरिकी महिलाओं और 16 लाख पुरुषों को अपनी जिंदगी में बलात्कार का शिकार होना पड़ा है। इनमें आधी से अधिक अमेरिकी महिलाएं 18 साल की उम्र से पहले ही रेप की शिकार हो चुकी होती हैं। रिपोर्ट का सबसे भयानक पहलू यह है हर 5 में से एक छात्रा यौन शोषण का शिकार होती है जबकि हर 8 यौन अपराधों में से एक मामला ही दर्ज हो पाता है।

रिपोर्ट बताता है कि 33.5 फीसदी बहुनस्लीय महिलाओं से बलात्कार किया गया जबकि अमेरिकी-भारतीय मूल और अलास्का नेटिव 27 फीसदी महिलाओं को हवस का शिकार बनाया गया। इसके अतिरिक्त 15 फीसदी हिस्पैनिक, 22 फीसदी अश्वेत और 19 फीसदी श्वेत औरतें इस प्रकार के यौन हमलों की शिकार हुईं।

एक अन्य अध्ययन रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि कॉलेज के 7 फीसदी पुरुषों ने रेप की कोशिश करने को स्वीकार किया और उनमें से 63 फीसदी ने माना कि उन्होंने औसतन 6 बार ऐसा करने की पुरजोर कोशिश की। यह विश्व में सबसे विकसित होने का असली चेहरा है? मानवाधिकारों के स्वयंभू वैश्विक दरोगा ने अपनी महिलाओं को कैसा मानवाधिकार दिया है? 2010 के दशक में सुरक्षा परिषद को ताक पर रखकर अफगानिस्तान और इराक को तहस-नहस कर दिया।

2010 के दशक में एक और काम अमेरिकी एनएसए ने किया है, जिसका पूरा नाम नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी है। इस एजेंसी ने अपने खुफिया निगरानी कार्यक्रम 'प्रिज्म' को क्रियान्वित करते हुए विश्व के 35 प्रमुख देशों के शासकों की जासूसी सफलतापूर्वक की है। लोकतंत्र के स्वयंभू दरोगा ने यह काम किस आधार पर किया है, बताने के लिए अमेरिका को कोई ठोस शब्द नहीं मिल रहा है। एडवर्ड स्नोडेन ने मार्च 2013 में चौंकाने के साथ-साथ चिंतित करने वाले तथ्य भी बताए। स्नोडेन ने बताया कि एनएसए ने अमेरिका में जिन 38 दूतावासों की जासूसी की है उनमें भारतीय दूतावास भी शामिल है। एनएसए ने भारतीयों की 6.3 अरब गोपनीय जानकारियां प्राप्त की हैं।

विश्व की अकेली, अजेय महाशक्ति अमेरिका, अपने नागरिकों को आत्महत्या करने से नहीं रोक पा रही है। किस काम की है ये महाताकत? 2005 के बाद से अमेरिका में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। केवल 2010 में 38,364 अमेरिकियों ने खुदकुशी की। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्था के अनुसार आत्महत्या करने वाले 90 फीसदी लोग मानसिक बीमारी से पीड़ित थे। पूरे अमेरिका में 24 घंटे चलने वाले राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम लाइफ लाइन नेटवर्क के 161 काल सेंटर बनाए गए हैं। इन लाइफ लाइनों में हर साल 15 प्रतिशत काल बढ़ रहे हैं। 2010 के दशक में 35-64 आयु के लोगों में आत्महत्या करने की दर 28.4 प्रतिशत बढ़ गई है।

‘अमेरिकी समाज, बंदूक संस्कृति से संस्कारित समाज है।’ परिवार संस्था को मिटाकर अमेरिका ने व्यक्ति संस्था वाला समाज बनाया है, जहां हर एक व्यक्ति अकेला है, कोई किसी का परिवारीजन नहीं है। अमेरिकी किसी पर भी विश्वास नहीं करते, चाहे वह दोस्त हो या दुश्मन, ऐसा क्यों? क्योंकि उसके समाज में कोई किसी पर विश्वास नहीं करता। अमेरिका को देखकर लगता है कि अति विकास से उत्पन्न समृद्धि में, व्यक्ति अपने आप को अकेला और असुरक्षित महसूस करता है। इसी कारण हर अमेरिकी अपने आप को इतना असुरक्षित महसूस करता है कि वह सबसे पहले अपने बैग में बंदूक रखता है। अमेरिका की जनसंख्या महज 30 करोड़ है, जबकि 31 करोड़ लोगों के पास बंदूकों के लाइसेंस हैं। इसका कारण यह है कि 18 वर्ष के हर अमेरिकी को दो संवैधानिक अधिकार मिलते हैं, एक वोट डालने का और दूसरा राइफल-शाटगन खरीदने का। जेल में बंद या पैरोल पर रिहा लोगों को वोट डालने का अधिकार नहीं होता है। पति से मामूली झगड़ा होने पर भी पत्नियां अपने पास बंदूक रखकर सोती हैं। भारत के एकल परिवारों का भविष्य भी यही हो सकता है।

भारतीय मूल की नीना दावूलुरी ने जब 50 से अधिक प्रतिद्वंद्वियों को हराकर ‘मिस अमेरिका’ का खिताब जीता, तो अमेरिकियों ने सोशल मीडिया पर जमकर नस्लीय टिप्पणियां कीं। अमेरिकियों ने ‘क्या हम 9/11 भूल गए हैं’, ‘मिस टेररिस्ट’, ‘मिस अल कायदा’, ‘अरब ने जीता मिस अमेरिका का ताज’ सहित नीना को काले रंग का तक कहा। जबकि अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियन थे। जिनका शताब्दियों पहले नरसंहार कर दिया गया था, बचे लोगों का जबर्दस्ती यूरोपीयकरण कर दिया गया था। शेष रेड इंडियन आज अमेरिका में आदिवासी हैं। नीना जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं, जैसे राहुल गांधी भारतीय नागरिक। क्योंकि नीना का जन्म अप्रैल 1989 को न्यू यॉर्क में हुआ था। डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता ने भारतीय मूल के निक्की हैली के गवर्नर बनने पर भी नस्ली टिप्पणी की थी।

दुनिया के हर देश के लोगों ने मिलकर आज के अमेरिका को बनाया है। जैसे राष्ट्रपति बराक ओबामा और डांसर माइकल जैक्शन अफ्रीकी मूल के हैं। जॉर्ज बुश ब्रिटानी मूल के हैं। यह वह अमेरिकी समाज है, जो अपने आप को नस्लवाद से मुक्त, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति, विविधता, मानवाधिकार आदि का संरक्षक, होने का विश्व में ढ़िढ़ोंरा पिटता रहता है। वैश्वीकरण एक अमेरिकी अवधारणा है जो कहती है कि तकनीक और पूंजी में इतनी ताकत होती है कि वो देश, धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र आदि के भेद को मिटा देता है। लेकिन पूरे विश्व को पूंजी और तकनीक से ‘ग्लोबल विलेज’ बनाने वाले अमेरिकी समाज का, खुदा का असली चेहरा नस्लवादी है। 

अमेरिका ने सबसे पहले हिरोशिमा एवं नागासाकी पर अणु-बम बरसाये, फिर वियतनाम में मुंह की खायी। धन के बल पर अपने दुश्मन नम्बर एक रहे सोवियत संघ को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंकने के लिए जिस तालिबान नामक दैत्य-संघ को खड़ा किया, उसी ने अमेरिका के गुरूर ‘वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर’ को जमींदोज किया। परमाणु बम बनाने के झूठे आरोप में इराक पर हमला करके उसे तहस-नहस किया। सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध का खात्मा होने पर भी अमेरिका चैन से नहीं बैठा। एकध्रुवीय विश्व के अजेय, एकलौते थानेदार एवं भाई बनने के चक्कर में अमेरिका ने अपना रक्षा व्यय कुल बजट का 36 प्रतिशत तक पहुंचा दिया, जो 698 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। अमेरिका ने वर्ष 2001 के बाद से अपने रक्षा व्यय में 81 फीसदी की वृद्धि की है। यह जानकर किसी को भी ताज्जुब हो सकता है कि अमेरिकी सैन्य खर्च, वैश्विक सैन्य व्यय का लगभग 43 फीसदी है। आश्चर्यजनक है कि अमेरिका पूरे विश्व में 800 सैन्य बेस चला रहा है। भारत से नजदीकी सैन्य बेस अरब सागर के डियागोगॉर्सिया नामक द्वीप पर है।

जून 1996 में अमरीकी विद्वान नोआन चोम्स्की ने सही कहा था कि, “यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा है। विशेषकर इंग्लैंड और अमरीका तो पिछले 500 बरसों से पूरी तरह से हिंसक स्वभाव के रहे हैं। वे दूसरों का अस्तित्व या आगे बढ़ना सह नहीं पाते। सबको अपने अधीन ही रखना चाहते हैं।” मानवाधिकारों के वैश्विक दरोगा अंकल सैम ने जूलियन असांजे और एडवर्ड स्नोडेन से कौन सा मानवाधिकार सम्मत व्यवहार किया। जूलियन असांजे को अमेरिका ने हरसंभव तरीके से परेशान किया। स्नोडेन के प्रत्यर्पण के लिए अमेरिका ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

एनएसए, सीआईए को पीछे छोड़ते हुए आज के युग की प्रमुख अमेरिकी खुफिया एजेंसी बन गई है। इसका प्रमाण यह है कि एनएसए के कर्मचारी सीआईए से लगभग दूगने 40 हजार हैं। एनएसए को 2013 में 10.8 अरब डॉलर का बजट मिला जबकि सीआईए को लगभग ढाई गुना कम केवल 4.2 अरब डॉलर का बजट मिला। इस कुख्यात एजेंसी ने 'प्रिज्म' नामक गोपनीय अभियान चलाकर जर्मन चांसलर अंगेला मर्केल की फोन कॉल्स को 2002 से 'सुना', जबकि जर्मनी अमेरिका का खास दोस्त है। हद तो यह है कि अमेरिका ने नॉटो के सदस्य देशों जर्मनी, फ्रांस और स्पेन तक के राष्ट्राध्यक्षों की भी जासूसी की है।

95 वर्षों के बाद 2011 में शीर्ष वैश्विक क्रेडिट रेटिंग संस्था ‘स्टैंडर्ड एण्ड पुअर’ (एस एण्ड पी) ने अमेरिका की क्रेडिट (साख) रेटिंग ‘एएए’ से घटाकर ‘एए प्लस’ करके अमेरिकी गुरूर को तोड़ दिया। अमेरिका अपना 40 फीसद खर्च कर्ज से चलाता है और 1962 से अब तक कर्ज की सीमा 75 बार बढ़ाई जा चुकी है। अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसका डॉलर है, जो विश्व अर्थव्यवस्था में सोने से भी विश्वसनीय माना जाता रहा है। ‘ट्रिपल ए’ रेटिंग से अमेरिका को सबसे सस्ता कर्ज मिल जाता था, इसी कारण अमेरिका ने इतना अधिक कर्ज ले लिया कि केवल चीन का कर्ज लौटाने से उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।

स्थिति यह हो गयी है कि 99 फीसदी साक्षरता जिसमें अधिकतर व्यावसायिक रूप से कुशल हैं, के बावजूद बेरोजगारी की दर अमेरिका में भारत से ज्यादा 11 प्रतिशत हो गयी है। टाइम पत्रिका के अनुसार यदि केवल चीन अमेरिका से कर्ज वापस ले तो इससे उसकी अर्थव्यवस्था में प्रलय की स्थिति निर्मित हो सकती है। अब विश्व अर्थव्यवस्था को डॉलर की स्थानापन्न मुद्रा की खोज तेजी से करनी होगी। यह अमेरिकी वर्चस्व के एक छत्र राज के अवसान का आरंभ हो सकता है। क्योंकि अमेरिका विश्व का सबसे अधिक ऋणी देश बन गया है। उस पर 16 ट्रिलियन डालर का कर्ज है और चीन के बाद जापान, अमेरिका को ऋण देने वाला विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है।

अमेरिकी सर्वर चलाने वाली कंपनियां, फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट (फीसा) जैसे अमेरिकी कानूनों के तहत अपने सर्वरों पर रखा डेटा एनएसए को देने के लिए बाध्य हैं। वैश्विक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, याहू, यू-ट्यूब, स्काइप और ऐपल जैसी कंपनियां अपने डेटा, फीसा कानून के कारण अमेरिकी सरकार को देने के लिए बाध्य हैं। अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) का मुख्य काम इंटरनेट और मोबाइल फोन पर कड़ी निगरानी रखना है। निगरानी की रिपोर्ट व्हाइट हाउस, अमेरिकी खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को देनी होती है। भारत में एक भी ऐसी भारतीय कंपनी नहीं है, जो फेसबुक, गूगल और याहू का मुकाबला कर सके। चीन के प्रखर राष्ट्रवाद ने क्यूक्यू, अलीबाबा, बाइदू, रेनरेन, जैसी विशालकाय स्वदेशी इंटरनेट कंपनियों का गौरवशाली विकास किया है। जबकि भारत में कथित धर्मनिरपेक्षता से उत्पन्न चरित्रनिरपेक्षता ने एक ऐसा भीमकाय दानव पैदा किया है, जिसने भारत के राष्ट्रवाद को उभरने से पहले ही निगल लिया।

सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक महाशक्ति होने के बाद भी अमेरिका हर समय दूसरे देशों को कमजोर करने में लगा रहता है। वह अपने खास दोस्तों और दुश्मनों; दोनों पर जरा भी भरोसा नहीं करता है, इसलिए दोनों की जासूसी करता है। दरअसल दोष अमेरिका का नहीं है, बल्कि उसका समाज ही ऐसा है। अमेरिकी समाज बंदूकची समाज है। माल्कम फोर्ब्स का कथन है कि ‘हार का स्वाद मालूम हो तो जीत हमेशा मीठी लगती है’। अमेरिका को हार का स्वाद पता नहीं है, इसलिए हर निकृष्ट तरीके को अपनाकर वह जीतने की फिराक में लगा रहता है।