16 August 2014

मदरसा और इश्लाम का सच: सामूहिक दुष्कर्म और धर्मातरण !

देश में एक बार फिर से इश्लामिक जेहाद का सच निकल कर सामने आया है। हर बार की तरह शासन और प्रसाशन पुरे मामले पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहा है। उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म और धर्मातरण का मसला सड़क से लेकर संसद तक में गूंजा। सपा, बसपा, कांग्रेस, टीएमसी, सबने आपने-अपने तरीके से इस मामले पर रोटी सेकते नज़र आये। मगर किसी ने पीड़िता के ज़िंदगी और उसके परिवार की आपबीती को टटोलने का प्रयास नहीं किया। यही कारण है की हम घटना की हकीकतों से पर्दा उठाने के लिए ये ब्लॉग लिख रहे हैं, ताकि समाज और देश सच जान सके। 27 जुलाई को मेरठ के खरखौंदा थाना क्षेत्र से एक हिन्दू लड़की का अपहरण हुआ, लेकिन पुलिस ने इस रिपोर्ट दर्ज नहीं की। 29 जुलाई को स्थानीय जन प्रतिनिधियों के दबाव में रिपोर्ट तो लिख ली गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। तीन अगस्त को लड़की किसी तरह उनके चंगुल से निकलकर भाग आई। लौटकर आई लड़की ने जो कुछ बताया, वह सिर्फ खौफनाक ही बल्कि दिल दहला देने वाली है। लड़की का अपहरण करके पास के एक गांव के प्रधान ने पांच दिन तक अपने घर में रखा। प्रधान की पत्नी और एक मदरसे के हाफिज की मदद से उसके साथ कई दिनों तक सामूहिक दुष्कर्म किया गया। लड़की के मुताबिक उसके जैसी 40-50 और लड़कियां वहां पर हैं। 

ये पूरा मामला लड़कियों के ट्रैफिकिंग लग रहा है। मगर उत्तर प्रदेश सरकार एक विशेष वर्ग को संतुष्ट करने के लिए उससे जुड़े अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में अब भी संकोच कर रही है। मदरसे में युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन का मामला पूरे देश में गूंजा। खरखौदा क्षेत्र के युवती के गांव में भी भाजपा नेताओं और हिन्दू संगठन के लोगों का जमावड़ा रहा। युवती को अदालत में पेश किया गया । साथ ही गढ़मुक्तेश्वर के मदरसे में छापा मारकर धर्म परिवर्तन कराने वाले गुल सनव्वर समेत दो को गिरफ्तार भी किया गया। पीड़ित परिवार के लोगों में अभी भी पुलिस की धीमी कार्रवाई को लेकर रोष है। सबसे चौकाने वाली बात यहां ये है के सामूहिक दुष्कर्म के बाद लड़की की हालत बिगड़ी तो मुजफ्फरनगर के एक नर्सिग होम में ऑपरेशन कर गर्भाशय की ट्यूब निकलवा दी गई। युवती के साथ हुई घिनौनी वारदात के बाद गांवों में बवाल मचता रहा मगर पुलिस पुरे मामले पर पर्दा डालने का प्रयास करती रही। मदरसों के अंदर दूसरी युवतियों को भी बंधक बनाकर विदेश भेजने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। पुलिस ने कड़ी सुरक्षा में युवती के अदालत में एक घंटे के बयान दर्ज कराए। मामले में पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर आरोपी को जेल तो भेज दिया है, मगर है सवाल अब भी बरकरार है की क्या आज मदरसा धर्मांतरण का अड्डा बन गया है?


दुष्कर्म पीड़िता को मदरसे में गाय का मांस खिलाने की कोशिश  

युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन के प्रकरण में पुलिस ने पीड़िता को अदालत में पेश किया। पीड़िता ने एक घंटे में एक माह की आपबीती को बयां किया किया। पीड़िता ने जो बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराया उसे सुन किसी का कलेजा कांप उठेगा। पीड़िता ने बताया कि तीन साल पहले वह इंटरमीडिएट में पढ़ रही थी, तभी पड़ोस में रहने वाले हसमत की बेटी निशात ने मुझसे दोस्ती की। निशात मेरे साथ बीए फाइनल तक साथ पढ़ी। उसने तभी से इस्लाम धर्म के बारे में बताना शुरू कर दिया था, जब मैं नौकरी तलाश रही थी। तभी निशात ने मेरी मदद की और मदरसे में 1500 रुपये प्रति माह में की नौकरी दिलाई। मदरसे में अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाने लगी थी। इसी बीच 29 जून को गांव के सनाउल्ला अपनी बीवी समरजहां के साथ मिलकर ग्राम प्रधान नवाब की मद्द से बुर्का पहना कर बाइक से उठा ले गए। पहले हापुड़ के मदरसे में रखा गया। इसके बाद गढ़ के दतोई स्थित मदरसे में ले जाकर नशे देकर चार लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया। इसके बाद मदरसे में रखकर बहला फुसलाकर धर्म परिवर्तन करा दिया। बाकायदा जो शपथ पत्र तैयार किया, उस पर जन्नत बुशरा नाम से हस्ताक्षर भी उन्होंने खुद ही कर दिए। उसके बाद घर लौट गई। 8 जुलाई को हालत बिगड़ने पर सनाउल्ला को मामले की जानकारी दी गई। सनाउल्ला 23 जुलाई को वहां से पहले मेरठ ले गया, जहां एक अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराया गया, जिसमें गर्भाशय की फेलोपियन ट्यूब में गर्भ धारण होने के कारण मुजफ्फरनगर ले गए। वहां ऑपरेशन कराने के बाद मुस्तफा कालोनी स्थित एक मदरसे में रखा गया। वहां से बाहर भेजने की तैयारी चल रही थी। पता चला की उससे पहले भी कुछ युवतियों को बाहर भेजा जा चुका है। इसी के डर से घबरा गई और वहां भाग आई। बाहर आकर इमरान नामक युवक ने सहायता देकर बस स्टैंड तक पहुंचा दिया, जहां से बस में सवार होकर मेरठ के भैसाली बस स्टैंड पहुंची और परिजनों को मामले की जानकारी दी। पीड़िता ने बताया कि, मदरसे में धर्म परिवर्तन से पहले मौलाना सिद्दीकी की लिखी हुई आपकी अमानत आपकी सेवा मेंकिताब को पढ़ाया गया, जिसमें लिखा था कि, इस्लाम धर्म में ही असली जन्नत है। बताया गया कि ईद के मौके पर धर्म कबूलना जन्नत में जाना होता है। इस्लाम धर्म कबूल नहीं करने पर भाई की हत्या करने की धमकी भी दी गई थी।

परदा डालने में जुटे शीर्ष अफसर

युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन के साथ गर्भाशय से फेलोपियन ट्यूब निकालने के सनसनीखेज मामले में प्रदेश सरकार के घिर जाने पर अफसर पर्देदारी की कोशिश में जुट गए। पुलिस महानिरीक्षक कानून-व्यवस्था अमरेंद्र कुमार सेंगर ने बेतुका बयान देकर सब को चौंका दिया । उनका कहना है कि पीड़िता के मेडिकल में दुष्कर्म का उल्लेख नहीं है, जबकि डीआइजी के. सत्यनारायण ने कैमरे के सामने सामूहिक दुष्कर्म और गर्भाशय से फेलोपियन ट्यूब निकालने की पुष्टि की। बाकायदा धर्म परिवर्तन कराने की बात भी स्वीकार की है। रिपोर्ट के आलावा पीड़िता ने अदालत में दिए अपने 164 के बयान में भी सामूहिक दुष्कर्म और धर्म परिवर्तन का जिक्र किया है। लेकिन लखनऊ में बैठकर पुलिस महानिरीक्षक कानून व्यवस्था का कहना है कि, युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ ही नहीं। तो सवाल खड़ा होता है की क्या ये बेशर्म अधिकारी मुलायम यादव के प्रवक्ता बन गए हैं?   जब लड़की की पेट पर आपरेशन के निशान की याद दिलाई गयी तो पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह नितांत व्यक्तिगत है और इस पर टिप्पणी उचित नहीं है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ये पुलिस अधिकारी अपने न्याय धर्म को भूल गए हैं जिसे वह हर हाल में निभाने का सपथ लेते हैं ।  

अदालत से 164 के तहद सीआरपीसी में बयान दर्ज कराने के बाद कड़ी सुरक्षा में पीड़िता को लेकर पुलिस गांव जा रही थी। तभी गांव के बाहरी छोर पर कमिश्नर ने रोक कर पीड़िता से करीब दस मिनट तक वार्ता की। पीड़िता के मुताबिक, उससे अदालत में दिए गए बयान के बारे में पूछा गया। तीन दिन बाद पीड़िता को अदालत में पेश करने के बाद करीब एक घंटे तक बयान दर्ज हुए। उसके बाद पीड़िता को पीछे के रास्ते से निकालकर पुलिस की टीम खरखौदा के गांव में ले गई। गांव के बाहर पहले से ही कमिश्नर, डीआइजी और एसपी देहात मौजूद थे। कमिश्नर ने युवती को गांव के बाहरी छोर पर रोक लिया। महिला एसओ समेत सभी को अलग करने के बाद पीड़िता का मुंह खुलवाया गया। इसके बाद उससे करीब दस मिनट तक वार्ता की गई। उस समय परिवार के सदस्यों को भी दूर कर दिया था। जबकि कानूनन महिला से महिला अफसर को ही पूछताछ करनी चाहिए। ऐसे में कमिश्नर की पूछताछ पर लोगों में गुस्सा भड़क गया। पीड़िता ने बताया कि, कमिश्नर भूपेंद्र सिंह ने अदालत में दिए गए बयानों के बारे में जानकारी मांगी थी।
 
खरखौदा क्षेत्र से युवती का अपहरण कर धर्म परिवर्तन कराकर सामूहिक दुष्कर्म के मामले में पुलिस ने गढ़ के गांव दौताई में स्थित एक मदरसे से गुल सनव्वर व फर्जी प्रमाण पत्र बनाने वाले कंप्यूटर सेंटर के संचालक राजा को गिरफ्तार किया है। युवती के धर्म परिवर्तन को लेकर पुलिस के हाथ लगे शपथ पत्र के आधार पर  मेरठ पुलिस की टीम ने गढ़ तहसील के सामने स्थित रजत कंप्यूटर सेंटर संचालक के स्वामी राजा को गिरफ्तार कर लिया। जबकि उसके बाद पुलिस ने धर्म परिवर्तन कराने वाले दौताई निवासी गुल सनव्वर को भी मदरसे से गिरफ्तार कर लिया। सूत्रों के अनुसार गुल सनव्वर ने स्वीकार कर लिया है कि तीस जुलाई को पीड़ित युवती, चार अन्य लोगों के साथ कार में सवार होकर मदरसे में आयी थी।

धर्म परिवर्तन के समय बेहोश थी युवती

पुलिस गिरफ्त में आए आरोपी के अनुसार तीस जुलाई की दोपहर को दौताई के मदरसे में जब युवती पहुंची तो उसे ठीक से होश भी नहीं था। उसे दो युवक गोद में उठाकर अन्दर ले गये थे। उसके बाद वे वहां से चले गये थे। सौ रुपये के शपथ पत्र के फर्जी प्रमाणपत्र बनाने वाले कम्प्यूटर संचालक युवक राजा ने बताया कि उसके साथ चार युवक व मदरसा संचालक गुल सनव्वर आया था। उस समय दुकान पर काफी भीड़ थी। उसने उनसे कुछ देर बाद आने को कहा तो वे लगभग एक घंटे बाद दोबारा उसकी दुकान पर पहुंचे तो उसने एक हजार रुपये लेकर उनका शपथ पत्र बना दिया। कंप्यूटर सेंटर का संचालक भी गिरफ्तार किया गया है।

नफा नुकसान की सुरंगों से पहुंचती रही सियासत

खरखौदा प्रकरण से राष्ट्रीय स्तर पर मचे भूचाल के बीच सियासत भी नफा नुकसान का चोला ओढ़कर पहुंची। पीड़िता के घर दिनभर सियासी दलों की गहमागहमी बनी रही। गांव की पगडंडियों पर वाहन मोड़ने से पहले सियासी समीकरणों का पूरा ख्याल किया गया। दर्द और अनहोनी की आशंका में डूबा परिवार दिनभर लोगों के प्रश्नों से छलनी होता रहा। प्रशासन भी सियासी बंधन से जकड़ा नजर आया, जबकि घटना के राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित होने के बावजूद सूबे का कोई भी जिम्मेदार नुमाइंदा पीड़िता का दर्द बांटने नहीं पहुंचा। एक भी लालबत्ती गांव में नजर नहीं आई। तीन दिन पहले जब लड़की ने घटनाक्रम से पर्दा उठाया तो यकीनन सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गए।

युवती को खाड़ी देशों में सप्लाई करने की थी तैयारी

पूरे मामले में मानव तस्करी का मामला साफ दिख रहा है। युवती का भी कहना है कि उसे विदेश भेजने की तैयारी की जा रही थी। युवती के अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे रिपोर्ट में गर्भाशय से फेलोपियन ट्यूब गायब होने से मानव तस्करी की आशंका पैदा कर दी है। माना जा रहा है कि फेलोपियन ट्यूब निकालकर युवती को खाड़ी देशों में सप्लाई करने की तैयारी थी। यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी बिहार, उड़ीसा और झारखंड की युवतियों की यहां तस्करी के मामले सामने आ चुके हैं। डाक्टरों की मानें तो युवती के अल्ट्रासाउंड और एक्स-रे में गर्भाशय को जोड़ने वाली दो फेलोपियन ट्यूब में से एक गायब है। यह ट्यूब उस स्थिति में निकाली जाती है तो ऐसे में सवाल खड़ा की क्या आज देश में मदरसा सामूहिक दुष्कर्म और धर्मातरण का  अड्डा बन गया है?

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बनाम किशोर अपराध !

हत्या के मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में उतने अधिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है जितनी बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और उसके पश्चात् हत्या करने के मामलों में| तेरह वर्ष की उम्र पूरी करते करते कोई भी किशोर ऐसी शारीरिक और मानसिक स्थिति में होता है कि सही-गलत, नैतिक-अनैतिक इत्यादि बातें अच्छी तरह से समझने लगता है यही कारण है कि उसे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में छिपा अपना हित और उसके द्वारा किया गया अपराध दोनों अच्छी तरह से पता होता है| हत्या जैसे मामले में किशोरावस्था का तूफानी मानसिक संवेग भी विचारणीय है लेकिन तब जबकि हत्या अचानक उत्पन्न हुए किसी मनोभाव के कारण की गई हो| परन्तु बलात्कार कभी भी अचानक उत्पन्न हुए किसी मनोभाव का कारण नहीं होता, ये एक ऐसी प्रताड़ना है जिसे बिना सोचे समझे, और बिना वयस्क शारीरिक और मानसिक स्थिति के किया ही नहीं जा सकता इसलिए इन मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का लाभ देकर आज तक न जाने कितनी लडकियों/महिलाओं को नारकीय कष्ट, जिल्लत की जिंदगी और क्षोभ से भरी मृत्यु भुगतने पर विवश किया है| आज एक मौका शासन और न्याय व्यवस्था को भी मिला है कि वे लम्बे समय से एक विवेकहीन और लैंगिक पक्षपात वाले कानून की आड़ में अपने द्वारा किये गए अन्याय का पश्चाताप करें और एक ऐसा सख्त कानून बनायें जिससे प्राकृतिक और सामाजिक न्याय की पुनर्स्थापना हो, एक बार फिर से न्याय और संसदीय व्यवस्था में लोगों की आस्था बलवती हो|

जुवेनाइल कानून एक अच्छी सोच की उत्पत्ति था लेकिन वो कानून तब बनाया गया था जब भारत जैसे देश पर न तो पाश्चात्य संस्कृति हावी थी और न ही मीडिया की नंगई| इसे लाने के पीछे एक मात्र कारण था उस समय सबसे बुरे किस्म के लोगों में भी अपने बच्चों को अच्छा बनाने की ललक जिससे लगभग 18 वर्ष की उम्र तक के लड़कों को शातिर अपराधी मस्तिष्क मिल पाना दुर्लभ संयोग या कुसंगति ही हो सकती थी| उस समय न तो समाचार के नाम पर स्त्री देह का व्यापार होता था और न ही मूवी इत्यादि में फूहड़ता की गुंजायश थी| ऐसे में किशोरों के द्वारा जो दुर्लभ अपराध होते थे वे सिर्फ इसलिए कि या तो उनके किसी सगे सम्बन्धी के साथ कोई अत्याचार होता था या फिर किसी प्रौढ़ व्यक्ति का सोचा समझा माइंड-वाश, और परिणाम अधिकतर हत्या और हत्या की कोशिश जैसे अपराध ही थे| लैंगिक अपराध तो गिनती की भी नहीं थे| प्रशंसा करनी होगी उन लोगों की जिन्होंने समय रहते उन किशोरों को एक अच्छा कानून देकर समाज में उनकी सार्थक वापसी का रास्ता खोला और साथ ही उन अपराधियों के विरुद्ध भावनात्मक सुरक्षा भी जो किशोरों को या उनके संबंधियों को लाचार मानकर अत्याचार करते थे|

परन्तु वर्तमान परिवेश में वह सुरक्षा छूट जो किशोरों को मिली थी, अब महिलाओं को चाहिए, क्योंकि अब भारतीय समझ संस्कृति-विहीन समाज के रूप में स्त्रियों के लिए चुनौती बना खड़ा है| एक ओर उन्हें बाजार का प्रोडक्ट बना कर खड़ा कर दिया गया है जिसमे उन्हें स्वयं अपने जिस्म की नुमाइश करके पैसा कमाना सबसे आसान लगता है तो दूसरी तरफ उस प्रोडक्ट का साइड इफ़ेक्ट समाज के हर तबके की महिलाओं को फब्तियों से लेकर सामूहिक बलात्कार तक झेलकर चुकाना है| हलाकि इसमें स्त्री स्वयं से कहीं भी किसी भी स्तर पर जरा सी भी जिम्मेदार नहीं है, ये पूरा खेल उन कुत्सित राजनीतिज्ञों, मीडिया, फिल्मकारों, छद्म दार्शनिको, समाज-शास्त्रियों और सफेदपोशों का है जो हर स्तर पर हर जगह पर स्त्री को सिर्फ और सिर्फ एक बाजारू प्रोडक्ट के रूप में देखते हैं और उसे आधुनिकता के या स्त्री सशक्तिकरण के लिफ़ाफ़े में लपेटकर इस तरह पेश करते हैं जैसे इससे बढ़कर स्त्री हित कोई दूसरा नहीं हो सकता|

स्पष्ट है कि हर एक रीति, रिवाज, कानून, सिद्धांत चाहे जितना भी अच्छा क्यों न हो एक नियत समय तक ही रहना चाहिए अन्यथा वह पूरी दुनिया को भ्रष्ट कर देगा| आज हमारे देश में जुवेनाइल क़ानून एक वाईल (सड़े हुए) कानून से ज्यादा कुछ नहीं है| इसका कारण भी स्पष्ट है कि समाजशास्त्रियों की अवधारणा (कि बालक की अवस्थाएं सिर्फ पांच होती होती हैं- शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था, और वृद्धावस्था) नवीन परिवेश में सही नही है| यदि आज हम विकास के इस प्रक्रम का सही-सही अवलोकन करें तो किशोरावस्था (जिसके कारण जुवेनाइल कानून का उद्भव हुआ) अब दो भागों में बंट चुकी है जिसे आप किशोरावस्था व् छिछोरावस्था (जैसा कि जीव-विज्ञान के मेरे एक शिक्षक मित्र ने इस अवस्था का नामांकन किया है) के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| इस अवस्था का जिक्र भले ही कुछ लोगों को अटपटा लगे लेकिन यही आज हमारे भारतीय समाज और पूरी स्त्री जाति के लिए चुनौती बन गई है| कानून का काम सिर्फ घिसे-पिटे कानून को लागू करना नहीं साथ ही साथ उनकी सार्थकता और प्रभाव का आंकलन करना भी होना चाहिए वर्ना हम बातें चाहे जितनी करें न्याय कभी नही दे पाएंगे| 

29 June 2014

हिंदी भाषी छात्रों के साथ भेद-भाव क्यों ?

देश में एक बार फिर से हिंदी बनाम अंग्रेजी कि लड़ाई जोरों पर है। विषय है संघ लोक सेवा आयोग कि परीक्षा में हिंदी भाषा की उपेक्षा का। बात सिर्फ संघ लोक सेवा आयोग तक ही सीमित नहीं है, मैं 29 जून 2014 को खुद विश्व विधालय अनुदान आयोग कि "राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा" देकर आया हूँ। प्रश्न पत्र में अग्रेजी के शब्दों का जो हिंदी अनुवाद होना चाहिए वह विल्कुल नहीं था।
भाषा के सवाल को लेकर एक बार फ़िर वही घमासान दिखाई देने लगा है जो कभी साठ के दशक मे दिखाई दिया था। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों की गुलामी  से मुक्त होने के बाद जब जब अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को सम्मान व गौरव देने की बात उठाई गई, तब-तब इस देश मे भाषाई राजनीति शुरू हो गई। विरोध के इन स्वरों का केन्द्र हमेशा दक्षिण भारत ही रहा है । आज भी तमिल राजनीति इसके विरोध मे खडी दिखाई दे रही है। इस राज्य की पहल पर फ़िर अन्य भाषाई राज्यों मे भी हिंदी के विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती व अन्य भाषाओं को लगने लगता है कि उनका वज़ूद खतरे में पड़ रहा है या उन्हें दूसरे दर्जे का स्थान देने का प्रयास किया जा रहा है।
यहां गौरतलब यह भी है कि विरोध का ये शोर कहीं से भी तार्किक प्रतीत नहीं होता। केन्द्र सरकार द्वारा जारी परिपत्र को अगर गंभीरता व ध्यान से, पूर्वाग़ृहों से मुक्त हो कर पढ़ा जाये तो उसमें हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करने की बात तो कही गई है परन्तु ऐसा कुछ नहीं है कि अन्य भाषाओं को बलपूर्वक पीछे धकेला जा रहा हो। ऐसे मे यह एक अनावश्यक विवाद ही जान पड़ता है। लोकतंत्र में भाषा के नाम पर अपनी क्षेत्रीय राजनीति चमकाने व अपने वोट बैंक को मजबूत करने का इससे अच्छा उदाहरण दूसरा नहीं मिल सकता।
एक तरफ हम देश के विकास की बात करते हैं और प्रत्येक क्षेत्र में अपने स्वयं के साधनों द्वारा और अपने प्रयासों से ही आगे बढ़ने की वकालत करते हैं। अपनी ‘पूरब की संस्कृति‘ धर्म, अध्यात्म व संस्कारों का बखान करते हुए यूरोपीय देशों को कमतर आंकते हैं परन्तु जब बात हिन्दुस्तान में हिंदी की आती है तो सारा राष्ट्रीय प्रेम उड़न छू होता दिखाई देने लगता है। और फिर भाषा को लेकर सभी अपनी-अपनी ढपली बजाने लगते हैं। यह कैसा देश प्रेम है, समझ से परे है।
यहां यह स्मरण करना भी जरूरी है कि यदि हम गांधी के सपनों का भारत बनाने का संकल्प बार-बार दोहराते हैं तो हमे भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को समझना होगा। 29 मार्च 1918 को इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन के आठवें अधिवेशन मे गांधी जी ने कहा था "भाषा हमारी मां की तरह है। पर हमारे अंदर मां के लिए जितना प्यार है उतना इसके लिए नहीं। दर-असल इस तरह के सम्मेलनों मे मुझे कुछ खास दिलचस्पी नहीं है। तीन दिन का यह तमाशा कर लेने के बाद हम अपनी-अपनी जगह वापस चले जायेंगे और यहां जो कुछ कहा और सुना गया है, सब भूल जायेंगे। जरूरत तो काम करने की, लगन और निश्चय की है। 
गौर करें यह बातें आज भी उतनी ही प्रांसगिक हैं जितनी उस समय थी। हिंदी के शुभचिंतक कहे जाने वाले कितने ही आज भी सम्मेल्नों व जलसों तक हिंदी को कैद रखे हुए हैं। गांधी जी ने हिंदी की वकालत की तो इसके पीछे उनकी अपनी विचारधारा थी। वे देश की, यहां के नागरिकों की जरूरत समझते थे। आज की तरह नहीं कि हिंदी भाषी इसलिए इसका समर्थन करता है क्योंकि वह हिंदी बोलता है। तमिल या कोई दूसरा इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह हिंदी नहीं बोलता। अंग्रेजी बोलने वाला इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह अंग्रेजी ही बोलता-लिखता है।
कलकत्ता (कोलकता) में 23 जनवरी,1929 में दिये गए भाषण मे गांधी जी ने कहा था “आपको और मुझको और हममें से किसी को भी, सच्ची शिक्षा नहीं मिलने पाई जो हमें अपने राष्ट्रीय विधायलयों में मिलनी चाहिए थी।  बंगाल के नौजवानों के लिए, गुजरात के नौजवानों के लिए, दक्षिण के नौजवानों के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह मध्यप्रदेश में जा सकें, सयुंक्त प्रांत में जा सकें जो सिर्फ हिन्दुस्तानी ही बोलते हैं। इसलिए मैं आपसे कहता हूं कि अपने फुरसत के घंटों में आप हिन्दुस्तानी सीखा करें। अगर आप सीखना शुरू कर दें तो दो महीने में सीख लेगें।  उसके बाद आपको पूरी छूट है अपने गांवों में जाने की, पूरी छूट है सिर्फ एक मद्रास को छोड़ बाकी सारे भारत में खुल कर विचरने की और हर जगह के आम लोगों से अपनी बात कह सकने की।  यह तो एक क्षण के लिए भी आप न समझ बैठें कि आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने की आम भाषा के रूप में आप अंग्रेजी का इस्तेमाल कर पाएंगे।
आज हमें यह सोचना है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्ष में दिए गए यह तर्क क्या प्रासंगिक नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि देश के एक बड़े हिस्से में आज भी हिंदी ही बोली जाती है।  अंग्रेजी की तरह अन्य प्रान्तीय भाषाओं का भी विरोध गांधी जी ने कभी नहीं किया बल्कि वे दक्षिण की सभी भाषाओं को संस्कृत की ही बेटियां मानते थे।  उनका मानना था कि इन्हें भी फलने-फूलने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। परन्तु सभी लोगों की संपर्क भाषा हिंदी हो इसका प्रयास वे हमेशा करते रहे। 
अब इसे इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाए कि गांधी के सपनों का भारत बनाने की वकालत करने वाले हिंदी के नाम पर एक अलग ही सुर अलापने लगते हैं।  क्या यह सच नहीं कि राष्ट्रभाषा के रूप मे हिंदी की जो कल्पना गांधी जी ने की थी, उससे अभी हम कोसों दूर हैं बल्कि अंग्रेजी व प्रान्तीय भाषाओं को लेकर आज भी उलझे हुए हैं।
दर-असल अब हिंदी के नाम पर राजनीति की जाने लगी है। मौजूदा विरोध का एकमात्र कारण भी यही है। अन्यथा इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही इस देश में अधिक प्रभावी है।  हमें इस बात को भी स्वीकार करना ही होगा कि यह देश सिर्फ अपनी ही भाषा और संस्कृति के बल पर ही आगे बढ़ सकता है। साथ ही अगर हम गांधी जी के सपनों के भारत की बात करते हैं तो हमें भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को पूरा करना ही होगा। राजनैतिक फायदों के लिए अनावश्यक भाषाई विवाद इस देश के हित में तो कतई नहीं है।

17 May 2014

पॉलिटिकल पंडितों का टूट गया मोदी मिथक !

जनादेश-2014 आक्रोश और आशा के मिलाप से जनमा वह तत्व है जो देश की दशा और दिशा बदल सकता है। नरेन्द्र मोदी की चुनौतियां यहीं से शुरू होती हैं। गुजरात के एक अनाम से कस्बे में जन्मे नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने सत्ता के जादुई दरवाजे खोलकर उस राजपथ पर कदम रख दिया है जिसके हर मील पर संभावनाओं की तमाम राहें फूटती हैं। इतिहास ने उन्हें यह अवसर दिया है और अब उसकी पारखी नजरें हर पल उनकी नाप-जोख करती रहेंगी। कहने की जरूरत नहीं कि उनके पास काम करने के जितने मौके हैं, उतनी ही दुश्वारियां भी। 

आज से एक साल पहले क्या किसी ने सोचा था कि भारतीय जनता पार्टी ऐसी फतह हासिल करेगी? आरोपशास्त्री कहते रहेंगे कि नरेन्द्र मोदी ने खुद को पार्टी से बड़ा कर लिया और यह भाजपा में वैयक्तिक एकाधिकारवाद की शुरुआत है। मैं मानता हूं, इतनी जल्दी किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाना खुद के साथ न्याय नहीं होगा। वे एक ऐसे संगठन के अगुआ के तौर पर उभरे हैं जिसकी जड़ें पूरे देश में हैं और अब उन्हें उनको खून-पसीने से सींचकर महाकाय बरगद के रूप में विकसित करना है। 30 बरस में भाजपा का ऐसा उभार और कांग्रेस की ऐसी अभूतपूर्व गिरावट क्या कहती है? यही न कि जो कहो उसे पूरा करो। मतदाता न भूलता है और न माफ़ करता है।


इन चुनावों की एक खासियत यह भी रही कि इसने तमाम पुराने मिथकों को तोड़ दिया है। कौन सोच सकता था कि अजीत सिंह चुनाव हार जाएंगे? राहुल गांधी और मुलायम सिंह जैसे कद्दावर नेताओं को जीतने के लिए अपना समूचा अस्तित्व दांव पर लगाना पड़ेगा? मायावती का वोट बैंकउनके लिए इतना तरल था कि वे उसे चाहे जैसा आकार दे लेती थीं, वे क्यों परिणामों की तली पर पहुंच जाएंगी? द्रमुक का तमिल तिलिस्म हवा में उड़ जाएगा और कमल यहां भी मुस्कुराता नज़र आएगा? बिहार और उत्तर प्रदेश में जाति-धर्म की घालमेल करने वालों की अकड़ ढीली पड़ जाएगी और आपअपने गढ़ दिल्ली में ही दिल के दौरे की शिकार हो जाएगी?

देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के लिए तो यह हार महासबक लेकर आई है। कांग्रेस को अब अपने तमाम क्षत्रपों और भय का व्यापार करने वाले सूबाई मित्रों से निजात पानी होगी। वह राष्ट्रीय पार्टी है पर उसकी बुनियाद में जो बलिदान और जन सरोकारिता की पालिश थी, उसे विलासिता की जंग चाट गई है। कांग्रेस को अपनी पुरानी आब को पाने के लिए फिर से संघर्ष और सरोकारों की राह पकड़नी होगी। आजाद भारत में उसे दो बार ऐसे झटके लग चुके हैं, पर वह उबर गई। इसमें कांग्रेसियों से ज्यादा विपक्षियों की अन्तर्कलह कारगर रही। इस बार उसके सामने बहुमत से सत्ता में आया सबल विपक्षी है। इसीलिए यह राहुकाल लम्बा और पहले से ज्यादा कठिन साबित हो सकता है।  


यहां भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के कमाल पर भी नजर डालनी होगी। आडवाणी ने उनके सत्तारोहण पर सरेआम उम्मीद जताई थी कि वे 2013 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में पार्टी का परचम फहराएंगे। सिंह ने समूचे सिंहत्व के साथ असम्भव को सम्भव कर दिखाया। इसीलिए इस बार मतदाता ने खुद के सारे बंधन तोड़ डाले हैं। इस बार वोट देश के लिए डाले गए, न कि सूबाई, साम्प्रदायिक, भाषाई या जातीय आग्रहों के लिए। नरेन्द्र मोदी ने भी शुरुआती रुझानों में जीत का रंग चोखा होता देख ट्वीट किया - भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।क्या वाकई? उन्हें और समूची भाजपा को इसके लिए शुभकामनाएं। उम्मीद है, वे याद रखेंगे कि देश-दुनिया की आशाभरी नजरें उन पर टिकी हुई हैं।

मोदी की महाविजय !

कांग्रेस का अंत सन्निकट है और क्षेत्रीय पार्टियां केन्द्रीय राजनीति में अपनी भूमिका तलाश रही हैं। तीसरा या चौथा मोर्चा गायब हो चुका है, मोदी और भाजपा की सुनामी को रोकने की कवायदजनता खारिज कर चुकी है। देश में परिवर्तन की मांग थी लेकिन कैसा परिवर्तन यह जानना शेष है।
                                
वस्तुतः  भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार आरएसएस की 90 साल की तपस्या का परिणाम है। यह कोई मीडिया द्वारा दिखाया गया भ्रम जाल नहीं, कॉरपोरेट कैम्पेन का परिणाम नहीं वरन् हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वह लहर है जिसकी पुकार देश ने सुन ली और युवाओं ने इसमें विशेष भूमिका अदा की। भारत भूमि के युवाओं को कमतर आंकने और उन्हें भेड़ों की तरह हांकने की प्रवृत्ति पर यह पूर्ण विराम है। यह विजय जन-जन की चेतना की पुकार है, जनमानस का राष्ट्रभूमि के प्रति स्वतः स्फूर्त प्रेम निदर्शन है, हिंदुत्व के उन्नायकों की हुंकार है। भारत भूमि पर सदाचार और सुशासन की आकांक्षा पाले जन-जन की वास्तविक अभीप्सा है यह निर्बाध विजय।

हिंदुस्तान की धरती को छद्म सेक्यूलरिज्म ने सर्वाधिक चोट पहुंचाई है. मुस्लिमों को वोट बैंक समझ कर उनका भयादोहन करने की कुमंशा पाले राजनैतिक दल दशकों से हिंदू बनाम मुस्लिम की राजनीति करते रहे हैं। बहुसंख्यकों का छद्म भय दिखाकर अल्पसंख्यक  समुदाय के मतों पर कब्जा करने की कुत्सित नीयत रखने वाले दल तोड़-फोड़ की मंशा से ग्रस्त हैं। इसी कारण कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सपना फलीभूत नहीं हो सका। भारतभूमि को बांट कर अंग्रेजों ने दो टुकड़े किए और काले अंग्रेज इस धरती को खण्ड-खण्ड कर देना चाहते हैं।

किंतु बहुत हो चुका अत्याचार, बहुत हो चुका छद्म धर्मनिरपेक्षता का आवरण, जनता जाग चुकी है, युवा समझदार और जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाले सिद्ध हो चुके हैं। अब युवाओं को गैर-जिम्मेदार का तमगा नहीं दिया जा सकेगा। राष्ट्रवाद अभिप्राणित हो जन-जन में प्रवाहमान हो रहा है। समान नागरिक संहिता को लागू करने का वक्त आ चुका है, धारा 370 की समाप्ति निकट है, जन-जन की आराध्य गो माता की हत्या पर पूर्ण विराम निश्चित है, वोट बैंक के नाम मुस्लिमों को बेवकूफ बनाने का समय चुक चुका है, उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल करने की कवायद जारी होगी, हिंदू आराध्य स्थलों की मुक्ति संभव होगी, सर्व धर्म समभाव की स्थापना का वक्त है यह जहां पर कोई भी नागरिक दोयम दर्जा नहीं रखेगा।

युवाओं की धमनियों में प्रवाहित होता रक्त इस बात का साक्षी है कि भारतभूमि को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न सांस्कृतिक राष्ट्र बनाने का संकल्प बस पूरा ही होने वाला है। हिंदूइज्म या हिंदुत्व का मार्क्सवादी कम्यूनिस्टों द्वारा चीरहरण अब बंद होगा, सार्वभौमिक नागरिक के अवतरण का स्वप्न साकार होगा। 

12 May 2014

आम आदमी का दर्द !

आज हम फ़िर समय के एक ऐसे मोड पर खडे हैं जहां एक तरफ़ हमारे बिखरे सपनों, टूटी उम्मीदों की दुनिया है और दूसरी तरफ़ बदले हालातों मे उम्मीद की एक हल्की किरण | आखिर क्यों हुए हम नाउम्मीद, आज यह समझना जरूरी है जिससे हम नाउम्मीदी के गहरे अंधेरे से उबर सकें | सच तो यह है कि हम यह कहते नही थकते कि गोरी चमडी वाले अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए वह सबकुछ किया जो उनके हित मे था | किसानों के शोषण से लेकर आम आदमी के शोषण तक जो भी उन्हें ठीक लगा | यही कारण है कि एक तरफ़ आम आदमी की जिंदगी बदहाल होती गई दूसरी तरफ़ अंग्रेजी साम्राज्य की समृध्दि दिन दूनी रात चौगुनी बढ्ती गई | लेकिन क्या आजादी के बाद ऐसा नही हुआ |

सच तो यह है कि शोषण की यह व्यवस्था आज भी कुछ दूसरे रूप मे बरकरार है, अंतर सिर्फ़ इतना है कि अब लंकाशायर, मैनचेस्टर का स्थान हमारे महानगरों ने ले लिया है | वरना क्या कारण है कि पशिचमी उत्तर प्रदेश का किसान गन्ने की सही कीमत के लिए हर साल गुहार लगाता है और उसका गन्ना खेतों मे ही सड्ता दिखाई देता है | तुर्रा यह कि देश मे चीनी के भाव आसमान छूते हैं |  महाराष्ट्र का किसान कपास की उचित कीमत के लिए जब-तब अपनी कमर कसता दिखाई देता है | परन्तु समय समय पर होने वाले संगठित आंदोलन भी बेअसर साबित होते दिखाई देते हैं | छोटे काश्तकारों का तो कोई पुरसाहाल नही | कुछ वर्ष पूर्व इंडियन कौंसिल आफ़ सोशल साइंस रिसर्च के तत्वाधान मे जो शोध उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिवर्तनों के संदर्भ मे किया गया था , उसमे बताया गया था कि खेती पर लोगों की निर्भरता कम होने की बजाय बढी है | गांवों मे सर्वहारों की संख्या निरन्तर बढ रही है | इसी शोध मे आगे कहा गया था कि महंगाई के कारण कीमतें कई गुना बढी हैं लेकिन किसान को उस हिसाब से उसकी फ़सल की उचित कीमत नही मिल पा रही है |

देखा जाए तो किसान ही नही बल्कि आम आदमी की स्थिती उत्तरोत्तर बदहाल हुई है | जो थोडी बहुत चमक-दमक दिखाई दे रही है, वह शहरी मध्यमवर्गीय समाज की है जिसने येनकेन अपने को ऐसी स्थिती मे ला खडा किया है कि विकास की बंदरबाट मे उसे भी कुछ मिलता रहे | दशकों के तथाकथित विकास की पड्ताल करें तो यह बात पूरी तरह से साफ़ हो जाती है कि स्वतंत्रता के बाद इस देश के हुक्मरानों ने आम आदमी के सपनों को छ्ला है |  जो उम्मीदें आम आदमी ने स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर आजाद भारत से लगाई थी, वह तिनकों की मानिंद बिखर कर रह गईं | आज उस पीढी को यह दुख कहीं गहरे सालता है कि क्या इन्हीं दिनों के लिए और ऐसे भारत के लिए उन्होने संघर्ष किया था |

गांधी जी के सपनों का क्या हुआ ? कहां गये समाजवाद और समतामूलक समाज के मूल्य ? आदर्श, नैतिकता और समर्पण की वह धारा क्यों सूख गई ? कहां से यकायक आ गया फ़रेब, भ्र्ष्टाचार, अनैतिकता और कुंठा का गहन अंधेरा | कहा गया था कि दस वर्षों के अंदर 14 वर्ष तक के सभी नौनिहालों को नि:शुल्क प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध करा कर शिक्षित कर दिया जायेगा, लेकिन क्या ऐसा हो सका | इस बीच न जाने कितने शिक्षा आयोग और शिक्षा सुधार के लिए समितियां गठित की गईं, लेकिन सपना अभी भी कोसों दूर है | बल्कि कुछ मामलों मे तो हालात और भी बदतर हुए हैं | बाल शोषण घटने की बजाय लगातार बढता ही जा रहा है |

न्याय आधारित व्यवस्था के स्थान पर हमने ऐसी कुव्यवस्था विकसित की कि आम आदमी न्याय की बात सोच भी नहीं सकता | धन बल और बाहुबल ने न्याय को उन इमारतों मे घुसने ही नही दिया जहां से न्याय का उजाला फ़ैलना था | न्याय का भ्रम जरूर बना हुआ है | शायद इसीलिए पुरानी पीढी के बचे खुचे बुजुर्ग यह कहने लगे हैं कि इस अंधेरे से कहीं अच्छा था अंग्रेजों का शासन | आखिर अपने स्वतंत्र राष्ट्र और अपनी ही बनाई प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति इतनी घोर निराशा क्यों ?

तमाम बुराइयों से जकडे इस विशाल लोकतंत्र का यह बदरंग चेहरा न होता अगर स्वतंत्रता के बाद सत्ता मे आए लोगों ने ईमानदार प्रयास किए होते | दर-असल हुआ यह कि जिन चेहरों को ससंद और विधानसभाओं मे पहुंचना था, वह तो अपना सब् कुछ न्योछावर कर, सत्ता के लोभ मे न पड, चुपचाप बैठ गये लेकिन जिन्हें सत्ता सुख का लोभ था, वह भला क्यों पीछे रह जाते |

इन स्वार्थी और धूर्त चेहरों ने बडी चालाकी से ईमानदार और राष्ट्रहित मे प्रतिबद्द लोगों को हाशिए पर डाल दिया | गौर करें तो पहले आम चुनाव से ही यह प्रकिया शुरू हो गई धी | धीरे-धीरे प्रत्येक चुनाव के साथ इनकी संख्या बढ्ती गई और फ़िर शासन की बागडोर पूरी तरह से इन्हीं धूर्त लोगों के हाथों मे आ गई | इन्होनें अपने निहित स्वार्थों के लिए जैसी व्यवस्था चाही, वह आज हमारे सामने है और यही कारण है कि इस व्यवस्था मे ऐसे ही चेहते फ़ूल फ़ल रहे हैं |

राजनैतिक घटनाचक्र को देखे तो नेहरू का प्रधानमंत्री बनना ही गरीब के सपनों के लिए पहला आघात था | दर-असल गांधी जी को इस देश की सही समझ थी और वही थे जो खेत-खलिहान, कल-कारखानों और ग्रामीण भारत की बुनियादी समस्याओं को जानते थे | नेहरू का गरीबी और गांवों से कोई रिश्ता था ही नही | इसीलिए गांधी जी ने एक बार नेहरू जी से कहा था कि कोई भी फ़ैसला करना तो आंखे बंद करके भारत के किसी गरीब आदमी की तस्वीर अपनी आंखों के सामने लाने की कोशिश करना फ़िर अपने आपसे पूछना कि यह जो निर्णय लिया जा रहा है उससे उसकी आंखों मे चमक आयेगी कि नही | लेकिन नेहरू जी ऐसा न कर सके | इसके फ़लस्वरूप विकास का जो ढांचा खडा हुआ उसके तहत गरीब का हिस्सा नदारत रहा | रही समाजवाद की बात, वह पानी के बुलबुले की तरह कब गुम हो गया, पता ही नही चला |

कुल मिला कर आज भी ऐसी व्यवस्था कायम है जिसमे अमीर और ज्यादा अमीर, गरीब और गरीब होता जा रहा है | आर्थिक उदारीकरण की हवा ने भी इन्हें खुशहाली की बजाय बदहाली ही दी है | यही कारण है कि तमाम उपलब्धियों के बाबजूद एक बडा वर्ग बुनियादी जरूरतों से आज भी वंचित है | अलबत्ता दूरदर्शन और सरकारी पोस्टर खुशहाली की रंगनियां बिखेर रहे हैं | आज हम फ़िर एक मोड पर खडे हैं | अपने सपनों की सरकार चुनने |फ़ैसला कुछ भी हो, दुआ करें कि देश की गाडी अब सही पटरी पर चले औरे आम आदमी के बिखरे सपने पूरे हो सकें |

06 May 2014

तो मोदी हीं बनेंगे भारत के प्रधानमंत्री !

मई में गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर सत्तासीन होंगे। मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने में किसी खास महिला का योगदान होगा। ऐसा योग सूर्य व शुक्र ग्रह से बन रहा है। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के ज्योतिषीय आकलन दृष्टिकोण से मप्र के प्रमुख भविष्यवक्ताओं व ज्योतिषियों से अबकी बार किसकी सरकार और कौन बनेगा प्रधानमंत्री के बारे में बात की। इन प्रकांड विद्वानों का कहना है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को सर्वाधिक सीटें हासिल होंगी और एनडीए की सरकार के मुखिया इस बार लालकृष्ण आडवाणी की बजाय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे। लोकसभा में एनडीए को 250 से 275 सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 80 से 110 सीटें ही मिल पाएंगी। 

इंदौर के लालकिताब विशेषज्ञ एवं भविष्यवक्ता पं. आशीष शुक्ला के अनुसार शनि शत्रु राशि में होकर चतुर्थ पर पूर्ण दृष्टि रखने से जनता के बीच प्रसिद्ध बना रहा है। भारत की अधिकांश जनता भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रही है। दशमेश बुध एकादशेश के साथ है। दशमेश सूर्य, केतु से भी युक्त है। सूर्य का महादशा में लग्नेश मंगल का अन्तर चल रहा है जो दशमेश होकर लाभ भाव में व मंगल स्वराशि का होकर लग्न में है। यह समय भाजपा को उत्थान की ओर लेजाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बन जाएंगे। पं. शुक्ल ने कहा कि लालकृष्ण आडवाणी का योग प्रधानमंत्री बनने का नहीं है। 

सागर के ज्योतिषाचार्य एवं अंक शास्त्री पं. पीएन भट्ट के अनुसार नरेन्द्र मोदी की जन्म राशि वृश्चिक है। शनि की साढ़े साती का प्रथम चरण चल रहा है। राजभवन में विराजे शुक्र में पराक्रमेश शनि की अन्तर्दशा में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। 02.12.2005 को शुक्र की महादशा के बाद राज्येश सूर्य की महादशा जो 03.02.2011 तक चली। तत्पश्चात् 03.02.2011 से भाग्येश चन्द्र की महादशा का शुभारम्भ हुआ। ज्योतिष ग्रंथों में वर्णित है कि एक तो भाग्येश की महादशा जीवन में आती नहीं है और यदि आ जाए तो जातक रंक से राजा तथा राजा से महाराजा बनता है।  मोदी भाग्येश की महादशा में मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बन सकते हैं, किन्तु चन्द्रमा में राहु की अन्र्तदशा ग्रहण योग बना रही है तथा 20 अप्रैल से 20 जुलाई 2014 के मध्य व्ययेश शुक्र की प्रत्यन्तर दशा कहीं प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के प्रबल योग को ण न कर दें? यद्यपि योगनी की महादशा संकटा में सिद्धा की अन्तर्दशा तथा वर्ष कुण्डली में वर्ष लग्न जन्म लग्न का मारक भवन (द्वितीय) होते हुए भी मुंथा पराक्रम भवन में बैठी है तथा मुंथेश शनि अपनी उच्च राशि का होकर लाभ भवन में विराजमान है। जो अपनी तेजस्वीयता से जातक को 7 रेसकोर्स तक पहुंचा सकता है। किन्तु एक अवरोध फिर भी शेष है और वह है सर्वाष्टक वर्ग के राज्य भवन में लालकृष्ण आडवानी और राहुल गांधी की तुलना में कम शुभ अंक अर्थात् 27.  साथ ही ''मूसल योग'' जातक को दुराग्रही बना रहा है तथा केमद्रुम योग, जो चन्द्रमा के द्वितीय और द्वादश में कोई ग्रह न होने के कारण बन रहा है। उसका फल भी शुभ कर्मों के फल प्राप्ति में बाधा। वर्तमान में भाग्येश चन्द्रमा की महादशा चल रही है, जो दिल्ली के तख्ते ताऊस पर  मोदी की ताजपोशी कर तो सकती है किन्तु केमद्रुम योग तथा ग्रहण योग इसमें संशय व्यक्त करता नजर आ रहा है?  

ग्वालियर के भविष्यवक्ता पं. एचसी जैन ने बताया कि नरेंद्र मोदी की कुंडली में केन्द्र का स्वामी केन्द्र में होकर त्रिकोण के साथ लक्ष्मीनारायण योग बना रहा है। यह योग कर्म क्षेत्र को धनवान बनाने में समर्थ है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की ख्याति विरोध के बावजूद लगातार बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि लोकसभा में एनडीए को 250 से 275 सीटें मिलेंगी जबकि यूपीए को 80 से 110 सीटें ही मिल पाएंगी। जैन ने बताया कि मोदी को प्रधानमंत्री बनवाने में किसी खास महिला का विशेष योगदान रहेगा।

21 February 2014

पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी की हत्या पर राजनीति कितनी सही ?

हमेशा की तरह एक बार फिर से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या पर सियासत तेज हो गई है। तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया है कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी न दी जाए। इस प्रस्ताव पर करुणानिधि की पार्टी डीएमके का भी समर्थन मिल चुका है। जो इस वक्त बाहर से केन्द्र सरकार को समर्थन दे रही है। ताज्जुब तो तब हुआ जब खुद कांग्रेस के विधानसभा सदस्यों ने इस प्रस्ताव का विरोध करने के बजाय इसका खुले रूप में समर्थन करना शुरु कर दिया।

ये पहला ऐसा कोई वाक्या नहीं है। इससे पहले भी राजीव गांधी की हत्या में सजा काट रही नलिनी को जेल से छोड़े जाने की अपिल सोनिया गांधी ने की थी। यहां तक कि सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी भी नलिनी से मिलने के लिए जेल गई थी। उस वक्त प्रियंका ने कहा कि वह क्रोध या हिंसा में विश्वास नहीं करती है।

ऐसे में सवाल ये उठने लगा है कि आखिर दोषियों को जेल से बाहर आने का मौका दिया किसने? सवाल ये भी है कि समय रहते सरकार ने हत्यारों की दयायाचिका पर कोई जल्दबाजी क्यों नहीं दिखाई? तो ऐसे में मतलब साफ है। सरकार अन्य मामलों कि तरह इसे भी सियासत की तराजू से तौलती रही है। मगर अब जयललिता की राजनीति ने कांग्रेस की उस सियासत की परत को उभार दिया है जो कलतक सब कुछ पर्दे के पीछे से चल रहा था।

बीते एक दशक तक राजीव गांधी की मौत पर कोई राय न रखने वाले राहुल गांधी को आज जब अपने पिता की हत्यों को छोड़ने की ख़बर मिली तो, बदले राजनीतिक माहौल वो भी नपे तुले ही बयान देकर अपने दर्द को सियासत से जोड़ दिया। राहुल गांधी का कहना है मैं खुद फांसी के खिलाफ हूं मेरे पिता अब वापस नहीं आएंगे।

तो सवाल यहा भी खड़ा होता है कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री के मौत के मायने एक आज के बदलते राजनीतिक नफा नुकसान में बेटा के लिए अलग, बेटी के लिए अलग और पत्नी के लिए अलग  है? या फिर एक ही दर्द को अलग- अलग राजनीति के खांचे में फिट करने की कोशिश ही आज राजीव के हत्यों को खुले में सांस लेने का मौका दे दिया है।

हत्यारों के तरफ से वर्ष 2000 में राष्ट्रपति के समक्ष दया अर्जी दी गई थी जिसे 11 साल बाद खारिज किया गया था। यही कारण है कि दोषियों को कानूनी तौर पर फांसी से बचने का आधार मिल गया। इन 10 वर्शो में कांग्रेस पार्टी की ओर कभी भी जल्दीबाजी नहीं दिखाई गई। मगर जब पूरा मामला हाथ से निकल चुका है तो अब सरकार और उसके मंत्री अपनी खडि़याली आंसू बहा रहे हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि पूर्व प्रधान मंत्री की हत्या पर राजनीति कितनी सही ?

20 February 2014

अंतरिम बजट कितना आम कितना ख़ास ?

उम्मीद की जा रही थी कि अंतरिम बजट या वित्तीय लेखानुदान में वित्त मंत्री श्री पी चिदंबरम कोई बड़ा कदम नहीं उठायेंगे, लेकिन उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दूसरे कार्यकाल के अंतिम बजट में देश की एक बड़ी आबादी को लुभाने के लिए अपनी चतुराई का भरपूर इस्तेमाल किया है। उनकी प्रमुख घोषणाओं में ईंधन पर सब्सिडी, सेना के लिए समान पद, समान पेंशन योजना को मंजूरी, कृषि कर्ज में ब्याज अनुदान को जारी रखना, शिक्षा ऋण में राहत, उर्वरक पर बढ़ी हुई सब्सिडी आदि हैं। श्री चिदंबरम का मानना है कि इन घोषणाओं का प्रभाव देश की तकरीबन 80 करोड़ आबादी पर पड़ेगा। 

बता दें कि अंतरिम बजट में आमतौर पर सरकार बड़े फैसले करने से परहेज करती है। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक वित्तीय लेखानुदान में सरकार कोई बड़ा निर्णय नहीं लेती है। सरकार महज तीन-चार महीने के व्यय के लिए धनराशि की मांग रखती है। चूंकि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस की स्थिति खस्ताहाल है। इसलिए लोकलुभावन वित्तीय लेखानुदान पेश करने के अलावा सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।

माना जा रहा है कि ईंधन सब्सिडी देने से 15 करोड़ एलपीजी ग्राहक, दो पहिया व चार पहिया वाहन मालिक, व्यापारी, किसान आदि को फायदा होगा। सेना के कर्मचारियों के लिए समान पद, समान पेंशन योजना को मंजूरी देकर वित्त मंत्री ने सेना में अलग-अलग पद से सेवानिवृत हुए लोगों के पेंशन में व्याप्त फर्क को खत्म करने की कोशिश की है, जिसका लाभ सेना से सेवानिवृत 25 लाख लोगों के परिवार को मिलेगा। कहा जा रहा है कि श्री चिदंबरम के इस सुधारात्मक कदम से एक परिवार में औसतन 4 सदस्यों के हिसाब से कुल एक करोड़ लोगों को फायदा पहुंचेगा। 

अपने इस अंतरिम बजट में श्री चिदंबरम ने कृषि कर्ज में ब्याज अनुदान को जारी रखने का  ऐलान किया है। इस क्रम में 1.80 लाख करोड़ रूपये के उर्वरक पर छूट की राशि किसानों में वितरित की जायेगी। यूपीए सरकार जानती है कि वर्ष 2008 में किसानों को बांटे गये कृषि कर्ज माफी की राशि की वजह से ही वह द्वारा सत्ता में आ पाई थी। इस बार फिर से वह अपना वही पुराना दांव आजमाना चाहती है। गौरतलब है कि हमारे देश की 65-70 करोड़ जनता अभी भी कृषि पर निर्भर है और उनका जीवनयापन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि कार्यों से ही चल रहा है।

आज भले ही हम दावा करें कि हमारा देश विकसित देशों की श्रेणी में आने वाला है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खेती-किसानी का काम कर्ज की मदद से ही कर रहे हैं। ब्याज में रियायत मिलने से किसान तबके को सीधे तौर पर फायदा मिलेगा। कहने के लिए भारत जरूर कल्याणकारी देश है, लेकिन यहाँ गरीबों का कल्याण सिर्फ वोट के लिए किया जाता है। सरकार जानती है कि बैंकों से जोड़कर ही समाज के इस वर्ग को अपने पक्ष में किया जा सकता है। वित्तीय समावेशन या ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों के विस्तार का मर्म वास्तव में यही है।

एक आकलन के मुताबिक तकरीबन नौ लाख पढ़े-लिखे युवाओं को शिक्षा ऋण दिया गया है। कुछ वर्षों से मंदी के कारण युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है, जिसके कारण शिक्षा ऋण बड़ी संख्या में एनपीए हो रहे हैं तथा ब्याज एवं किस्त जमा करने के लिए बैंककर्मी युवाओं पर लगातार दबाव बना रहे हैं। इसलिए इस वर्ग को राहत देने के लिए वित्त मंत्री ने 31 मार्च 2009 से पहले लिए गये शिक्षा ऋण पर प्रभारित ब्याज में रियायत देने के लिए 2600 करोड़ का प्रावधान किया है, जिसके तहत 31 मार्च 2009 से दिसंबर, 2013 के बीच प्रभारित ब्याज का भुगतान सरकार करेगी। जाहिर है युवाओं के परिवार को भी इसका लाभ मिलेगा। युवाओं पर डोरे डालने के लिए श्री वित्त मंत्री ने 10 करोड़ नौकरियाँ देने की बात भी कही है और कौशल विकास के लिये उन्होंने 1000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है।

वित्तीय लेखानुदान के पहले यह कयास लगाया जा था कि वित्त मंत्री अप्रत्यक्ष कर में कोई बदलाव नहीं करेंगे, लेकिन चुनावी रथ पर सवार श्री चिदंबरम ने मध्यम वर्ग को रिझाने   के लिए उत्पाद शुल्क में नाममात्र की कटौती की है। उत्पाद शुल्क कम करने से छोटी कार, दो पहिया वाहन, मोबाइल हैंडसैट, कम्प्युटर, प्रिंटर, स्कैनर, एयरकंडीशन, फ्रिज, माइक्रोबेव ओवन, डिजिटल कैमरा आदि सस्ते हो जायेंगे। श्री चिदंबरम इतने पर भी नहीं रुके, उन्होंने सीमा शुल्क के कुछ मदों में भी राहत दी, मसलन, साबुन बनाने वाले रसायन का आयात। साथ ही, कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए धान, चावल आदि के भंडारण, पैकिंग, ढुलाई आदि को सेवाकर से बाहर कर दिया। चूंकि प्रत्यक्ष कर में बदलाव करना एक अतिवादी कदम माना जाता, इसलिए बमुश्किल श्री चिदंबरम ने इस परिप्रेक्ष्य में अपने पर काबू रखा, अन्यथा आयकर में वे जरूर मध्यम वर्ग को रिझाने वाला फेरबदल करते। महिलाओं को खुश करने के लिए वित्त मंत्री ने निर्भया कोष में भी 1000 करोड़ रूपये का प्रावधान किया है।

अल्पसंख्यक, महिला व बाल विकास, दलित एवं पिछड़ों से जुड़े मंत्रालयों के बजट में इजाफा करके श्री चिदंबरम ने यह जताने की कोशिश की यूपीए सरकार हर वर्ग का ख्याल रखती है। दरअसल, यूपीए सरकार यह मानकर चल रही है भारत की जनता तोहफों की बारिश में सराबोर होकर उसके रंग में रंग जायेगी। इसलिए अंतरिम बजट पेश करने से पहले ही उसने सातवें वेतन आयोग के गठन का ऐलान कर दिया था। वह जानती है कि देश में केन्द्रीय कर्मचारियों की संख्या लगभग 40 लाख है। इस संबंध में कर्मचारियों के परिवार की औसत सदस्य संख्या यदि चार माना जाए तो 1.60 करोड़ लोगों को वेतनवृद्धि का फायदा मिलेगा। श्री चिदंबरम एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वे नफा-नुकसान का आकलन करके ही कोई कदम उठाते हैं। विदित हो कि सरकारी बैंक कर्मचारियों का वेतनवृद्धि होना नवंबर, 2012 से लंबित  है। यूनियन और सरकार के बीच बीते सालों में हुई अनेक वार्ता सरकार के अड़ियल रुख की वजह से विफल हो चुकी है। श्री चिदंबरम जानते हैं देश में सरकारी बैंक कर्मचारियों की संख्या तकरीबन आठ लाख है। स्पष्ट है अगर बैंक कर्मचारियों की मांग मानी जाती है तो वह सरकार के लिये फायदेमंद सौदा नहीं होगा, क्योंकि इस वर्ग के नाममात्र वोट से यूपीए सरकार को बहुत फायदा नहीं हो सकता है।   

मौजूदा समय में देश की अर्थव्यवस्था एक नाजुक दौर से गुजर रही है। बीते दिनों से  महंगाई के आंकड़ों में जरूर कुछ कमी आई है, पर रिजर्व बैंक का आकलन है कि महंगाई का दौर अभी जारी रहेगा। महंगाई एवं मुद्रास्फीति की वजह से बीते सालों से आम आदमी हलकान है। स्थिति पर काबू पाने के लिए रिजर्व बैंक लगातार कोशिश कर रहा है। इस आलोक में अंतरिम बजट की मदद से वित्त मंत्री वित्तीय मजबूती के लिए प्रयास कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। 17.63 करोड़ रुपए के इस अंतरिम बजट में सिर्फ चुनाव पर निशाना साधा गया है। अब चुनाव में महज 60 दिन बच गये हैं। ऐसे में शिक्षा ऋण में राहत, महिला सुरक्षा के नाम पर 1000 करोड़ रूपये देना, कृषि कर्ज में ब्याज अनुदान को जारी रखना, उर्वरक पर बढ़ी हुई सब्सिडी, समान पद, समान पेंशन योजना आदि घोषणाएँ चुनाव में कितना कारगर साबित होंगे, यह कहना फिलहाल मुनासिब नहीं होगा। फिर भी यह माना जा सकता है कि मौजूदा समय में जनता के बीच जागरूकता बढ़ी है। वह जानती है कि 10 सालों में 10 करोड़ नौकरियों देने की बात करना, सब्जबाग दिखाने के समान है। 4 महीनों के लेखानुदान में ऐसा करना संभव नहीं है। विकास दर भी वर्तमान में 4.8 प्रतिशत है। इस दर में इतनी नौकरियों का सृजन नहीं हो सकता है।

कौशल विकास के नाम पर कोष का प्रावधान करना भी केवल दिखावा है। विगत सालों में रोजगार के अवसर और भी कम हुए हैं। 2013 में बेरोजगारी दर 3.37 प्रतिशत थी, जो 2014 में बढ़कर 3.8 हो गई है। निर्भया कोष में 1000 करोड़ रूपये देना केवल रस्म अदायगी का हिस्सा है। इस कोष में पूर्व में आवंटित की गई राशि अभी तक खर्च नहीं की जा सकी है। सरकार इन घोषणाओं से साबित कर दिया है कि यह अंतरिम बजट पूरी तरह से लोकलुभावन है। वैसे देश के समग्र विकास के लिए राजनेताओं को इस तरह की ओछी रणनीति से बचना चाहिए।

18 February 2014

मेरे देश की संसद मौन है !

                                                              ‘एक आदमी रोटी बेलता है
                                                               एक आदमी रोटी खाता है
                                                               एक तीसरा आदमी भी है
                                                        जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।

                                                               वह सिर्फ रोटी से खेलता है
                                                                       मैं पूछता हूं-
                                                               यह तीसरा आदमी कौन है?
                                                               मेरे देश की संसद मौन है।’

धूमिल ने जब यह कविता लिखी थी तब शायद उन्हें एफडीआई शब्द का अर्थ भी नहीं मालूम रहा होगा। वह तथाकथित समाजवादी सोच का भारत था, जहां रह रहकर अत्यंत आध्यात्मिक तौर पर समझाया जाता था कि प्रजा ही राजा है, वही असली मालिक है और चीथड़ों से सजे लोग भक्तिभाव से नेताओं के इस प्रवचन को सुनते थे। तब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन नहीं, बैलट बॉक्स थे। उनमें अपनी पसंद के नेता के चुनाव-चिह्न् पर ठप्पा लगाकर बैलट ठूंस दिए जाते थे। चुनावी प्रक्रिया के अर्थ भी अलग होते थे। महिलाएं और दलित अक्सर वोट डालने नहीं जा पाते थे। उनकी जगह गांवों, कस्बों के दबंग इस नेक काम को पूरा कर देते थे। लोकतंत्र के उस शुरुआती दौर में भी अगर धूमिल को लगता था कि रोटी बनाने और उससे खेलने वाले में जमीन आसमान का अंतर है तो यह उनकी दृष्टि थी, जो छल को परत दर परत देख पाती थी।

सुदामा पांडे (धूमिल का स्कूली नाम) गांव से आते थे। वे जानते थे कि खेती कितना मुश्किल काम है। उनका आक्रोश संसद के मौन पर फूटता था। धूमिल को गुजरे हुए बरसों बीत गए पर हालात में फर्क कहां आया है? संसद आज भी मौन है। तब जमींदारों, जमाखोरों के जुल्म पर कोई सियासी एका नहीं था, आज किराने पर एफडीआई को लेकर जितने दल उतने वैचारिक दलदल हैं।

कमाल देखिए। जो लोग इन दिनों हो-हल्ला कर रहे हैं, वे जब सरकार में थे तब उन्होंने इसके पक्ष में तर्क दिए थे। आज का सत्तापक्ष तब विपक्ष में था, लिहाजा कांग्रेस के लोग हमलावर थे। एक और आनंद की बात। द्रमुक के नेता दयानिधि मारन ही वह मंत्री थे, जिन्होंने वाजपेयी की सरकार में इसका नोट बनाया था। मारन अब नहीं रहे, उनकी पार्टी पाला बदल कर कांग्रेस के साथ आ गई है। फिर भी द्रमुक सुप्रीमो भी इस फैसले पर नाखुशी जता चुके हैं। नेताओं का यही गिरगिटी चरित्र है।

देश के लोगों में सुगबुगाहट है कि एफडीआई पर यह बहस संसद के बाहर क्यों की जा रही है? हम सब जानते और मानते हैं कि संसद सर्वोच्च है और उसके सदस्य हमारी रीति-नीति के रखवाले हैं। गरीबों की भरमारवाले इस देश का काफी धन लोकसभा और राज्यसभा के अधिवेशन पर खर्च होता है। क्यों नहीं इसका सार्थक उपयोग किया जाता? क्यों नहीं वहां तर्क-वितर्क होते और उन्हें एक सम्मानजनक नतीजे पर पहुंचाया जाता? क्या वजह है कि पार्टियों के प्रमुख नेता सदन में बोलने की बजाय टीवी कैमरों पर अपनी राय जाहिर करना बेहतर समझते हैं? इन सवालों पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं, इसलिए सीधे एफडीआई के मुद्दे पर आते हैं।

एफडीआई के बहाने एक बार फिर बेहद पुराना और बेसुरा राग अलापा जा रहा है कि भारत गुलाम हो जाएगा। किसी को ईस्ट इंडिया कंपनी याद आ रही है, तो कोई मुगल बादशाह जहांगीर का स्मरण कर रहा है और किसी को देश की संप्रभुता का खतरा सता रहा है। क्या 121 करोड़ की विशाल आबादी वाला यह महान देश इतना कमजोर है कि वह फिर से गुलाम हो जाएगा? अजीब बात है! जिन कंपनियों का नाम लेकर कोसा जा रहा है, उनमें से कुछ के मुख्यालय अमेरिका में हैं।

इसी अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा अपने बच्चों को यह कहकर डराते हैं कि मन लगाकर पढ़ो नहीं तो तुम्हारी कुर्सियों पर भारत या चीन से आए नौजवान कब्जा कर लेंगे। हमारे जागृत और जोशीले नौजवानों का रास्ता रोकने के लिए वहां तरह-तरह के कानून बनाए जा रहे हैं। ऐसे नौनिहालों के रहते क्या कोई देश गुलाम हो सकता है? सवाल उठता है, हमारे नेता अपने स्वार्थ साधने के लिए कब तक अतीत के रिसते जख्मों में नमक-मिर्च झोंकते रहेंगे? यह समय उभरते हुए हिन्दुस्तान के लोगों का मनोबल बढ़ाने का है, डिगाने का नहीं।

आप भूले नहीं होंगे। 1991 में जब नरसिंह राव की अगुवाई में मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था की खिड़कियां खोली थीं तो कैसा जलजला आया था? तब भी ऐसी ही बातें की गई थीं। क्या उदारीकरण के इन बीस साल में हम गुलाम हो गए? हकीकत यह है कि उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति भारत का संज्ञान तक नहीं लेते थे, आज उन्हें हमारी युवा शक्ति से डर लगता है। अगर हम उसी पुराने रास्ते पर चल रहे होते, तो आज हमारा हाल भी उन देशों की तरह होता, जिन्होंने समय रहते अपनी खिड़कियां-दरवाजे नहीं खोले और अपनी ही वैचारिक सीलन का शिकार हो गए।

मैं खुद गांव से आता हूं। अपने बचपन में मैंने देखा था कि वहां का एकमात्र व्यापारी परिवार किस धूर्तता से लगभग समूचे गांववालों को अपना देनदार बनाए हुए था। हालात तब भी खराब थे। धरती पर अन्न उपजाने वाला किसान अपनी उगाई फसल की सही कीमत कभी भी नहीं पाता था। पहले तो लेनदार ही उस खलिहान से सब कुछ उठवा लेता था और बचे-खुचे की भी सही कीमत नहीं मिलती थी। अफसोस! गांवों में साहूकारी का यह जाल अभी भी बेहद मजबूत है।

इस वजह से भी हमारे गांव वीरान होते जा रहे हैं। महानगरों में नौकरी तलाशने वालों की बढ़ती तादाद ने अपने ही मुल्क में हर रोज विस्थापित होते लोगों की संख्या में जानलेवा बढ़ोतरी की है। यह क्रम जारी है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि किसान को उसकी उपज की सही कीमत मिलनी शुरू हो। यह तभी हो सकता है, जब बिचौलियों और दलालों से भरी मौजूदा व्यवस्था को तोड़ने के लिए एक समानांतर प्रणाली स्थापित की जाए। एफडीआई इसका एक विकल्प हो सकती है।

पर यह हो कैसे? साझे चूल्हे पर कोई भी पकवान आसानी से नहीं पकता। डॉक्टर मनमोहन सिंह के नसीब में राजयोग के साथ तमाम रुकावटें भी हैं। हुकूमत के पिछली पाली में जब वे अमेरिका से परमाणु समझौता कर रहे थे तब वामपंथियों ने अपनी बैसाखियां हटा ली थीं। मजबूरी में उन्हें मुलायम सिंह की शरण में जाना पड़ा था, जिसके दुष्परिणाम जगजाहिर हैं। इतिहास जैसे खुद को समूचे विद्रूप के साथ दोहरा रहा है। अब ममता बनर्जी रूठ गई हैं। उनका दावा है कि सरकार ने अपने फैसले को फिलहाल टाल दिया है। अंतिम फैसले की शक्ल क्या होगी, इसका इंतजार है पर कुछ विघ्नजीवी इस गठबंधन में पड़ी दरारों की लम्बाई-चौड़ाई मापने लग गए हैं। राजनीति की अंधी गली किस तरह बड़े उद्देश्यों का रास्ता रोक देती है, इसका यह त्रसद उदाहरण है।

मैं खोखले तर्कशास्त्रियों की तरह आपको आंकड़ों में नहीं उलझाना चाहता, पर यह सच है कि हम चीन के बाद सबसे ज्यादा सब्जियां उगाते हैं। ब्राजील के बाद सर्वाधिक फल हमारी धरती से ही उपजते हैं। फिर भी हमारे किसान गरीब हैं। न तो उन्हें उपज की कीमत मिलती है और न ही वे उसे बचा पाते हैं। इसे दुरुस्त करने के लिए भी एक नई व्यवस्था की जरूरत है। यह समय उससे खौफ खाने के बजाय सीखने का है। क्यों न हम उनकी कुछ बेहतर चीजें ग्रहण कर उनका सदुपयोग अपनी शक्ति बढ़ाने में करें?

हिन्दुस्तानियों की एक बड़ी दिक्कत है। हम इतिहास से सीखते कम हैं, उसे तोड़ते-मरोड़ते ज्यादा हैं। संसद को मौन रखकर खुद मुखर रहनेवाली नामचीन हस्तियों से आग्रह है कि वे खुद नया इतिहास गढ़ने की कोशिश करें। उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि काल उनका भी आंकलन कर रहा है।

17 February 2014

संसद में मिर्च कांड लोकतंत्र हुआ शर्मशार !

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दु:ख और बढ़ गया होगा। 12 फरवरी को लोकसभा में अंतरिम रेल बजट पेश होने के दौरान जिस तरह के दृश्य उपस्थित हुए उन्हें देख प्रधानमंत्री का मन अवसाद से भर गया था। रेलवे मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे को तेलंगाना विरोधी सांसदों ने बजट भाषण नहीं पढ़ने दिया, खूब हंगामा बरपा किया, सरकार के मंत्री के.एस.राव, चिरंजीवी, डी.पुरंदेश्वरी और सूर्यप्रकाश रेड्डी जोर-शोर से चिल्लाते रहे। और तो और चिरंजीवी और सूर्यप्रकाश रेड्डी तो लोकसभा स्पीकर के सामने वेल में कूद गए। भारी हंगामे और विरोध की वजह से रेलवे मंत्री केवल 20 मिनट भाषण पढ़ पाए। ऐसा पहली बार है जब हंगामे की वजह से किसी मंत्री को अपना बजटीय भाषण आधा-अधूरा छोड़ना पड़ा हो। प्रधानमंत्री का दु:खी होना स्वाभाविक था क्योंकि उनकी अपील का भी कोई असर नहीं हुआ। प्रधानमंत्री ने कहा- मंत्रियों की करतूत से लोकतंत्र शर्मसार हुआ है।

लेकिन संसदीय गरिमा की अगले ही दिन यानी 13 फरवरी को और धज्जियां उड़ गई। कल से कहीं ज्यादा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लोकसभा में केंद्र सरकार ने तेलंगाना विधेयक पेश किया। आंध्रप्रदेश को विभाजित कर अलग से तेलंगाना राज्य बनाने के सरकार के फैसले के पक्ष और विपक्ष में देश की राजनीति उसी दिन से गर्म है जिस दिन केन्द्र ने आंध्र के विभाजन की मांग आधिकारिक रूप से स्वीकार की। दरअसल इस मुद्दे पर वर्षों से आंध्र झुलस रहा है। इसकी चिंगारी आज लोकसभा में शोले के रूप में उस समय तब्दील हुई जब कांग्रेस से निष्कासित सांसद एल.राजगोपाल ने सदन में मिर्च पावडर का स्प्रे किया। टीडीपी सांसद वेणुगोपाल ने चाकू लहराया और शीशों को तोड़ने की कोशिश की। कुछ सांसद आपस में गुत्थम-गुत्था हुए और सदन बेइंतिहा शोर-शराबे और हंगामे में डूब गया। स्प्रे की वजह से भगदड़ की स्थिति पैदा हो गई तथा  भारी अफरा-तफरी मची। चीखते, चिल्लाते और आंखों से आंसू पोछते सांसद सदन से बाहर निकल गए। कुछ को अस्पताल में पहुंचाया गया है। कुल मिलाकर सदन में अजीबो-गरीब स्थिति पैदा हो गई जो बेहद दु:खद थी। लोकसभा में संसदीय मर्यादाओं का उल्लंघन यद्यपि पहले भी कई बार हुआ है, माइक तोड़े गए हैं, आस्तीने चढ़ाई गई हैं और अपशब्द कहे गए हैं लेकिन आज जैसा दृश्य अभूतपूर्व है। ऐसी घटना संसदीय इतिहास में पहले कभी घटित नहीं हुई। ऐसा आक्रोश जो लोकतंत्र को तार-तार कर दे, पहले कभी अभिव्यक्त नहीं हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने फौरी कार्रवाई के रूप में 18 सांसदों को निलंबित कर दिया है। तेलंगाना विधेयक अब शायद इस सत्र में पारित नहीं हो सकेगा।

राज्यों के पुनर्गठन को लेकर जनआंदोलन पहले भी होते रहे हैं। आंदोलनों के दौरान छिटपुट हिंसा भी हुई लेकिन संसद में या प्रभावित राज्यों की विधानसभाओं में पृथक राज्य विधेयक को लेकर ऐसी अभद्रता की नौबत कभी नहीं आई। 12 वर्ष पूर्व सन् 2000 में बिहार, उ.प्र. और म.प्र. के हिस्सों को काटकर तीन नए राज्य उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ बने जिनके पीछे आंदोलन का लंबा इतिहास रहा है लेकिन बिना किसी खून-खराबे के राज्यों की जनता ने तहेदिल से विभाजन को स्वीकार किया। आंध्रप्रदेश के विभाजन का मुद्दा भी काफी पुराना है। प्रदेश के गठन के 12 वर्ष बाद ही तेलंगाना के लिए चिंगारियां फूट पड़ी थी। सन् 1969 के दौरान तो आंदोलन इतना उग्र हुआ कि उसे कुचलने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें करीब 350 लोग मारे गए जिसमें अधिकांश छात्र थे। पृथक राज्य के लिए इतनी जानें किसी और आंदोलन में नहीं गई। बहरहाल तब से लेकर अब तक यानी 44 वर्षों में आग कभी बुझी नहीं। बीच-बीच में अंगारों पर राख जरूर पड़ती रही लेकिन वे भीतर ही भीतर धधकते रहे और आज अंतत: उसकी आंच से लोकतंत्र झुलस गया। आंध्र के विभाजन की यह आग कैसे बुझेगी, कहना मुश्किल है। फिलहाल तो यह मामला टल गया, लगता है।

लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस की दिक्कतें कम नहीं होंगी। सामने लोकसभा चुनाव है और आंध्र की 42 लोकसभा सीटें दांव पर लगी हुई हैं। प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता है लेकिन इस मुद्दे पर वह स्वयं विभाजित है। राज्य में किरण रेड्डी की सरकार विभाजन के खिलाफ है यानी केन्द्रीय नेतृत्व का फैसला उसे मंजूर नहीं है। दरअसल तेलंगाना मामले पर 30 जुलाई 2013 को कांग्रेस कार्यपरिषद के तेलंगाना बनाने के निर्णय के बाद पार्टी आंतरिक संकटों से जूझ रही है। यद्यपि उसने फैसला लिया है लेकिन उसकी हालत इधर खाई और उधर कुएं जैसी है। पार्टी को उम्मीद नहीं थी कि तेलंगाना के विरोध में इतना जबर्दस्त माहौल बनेगा और खुद उसके मुख्यमंत्री, मंत्री, केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक किसी भी हद तक जाने तैयार रहेंगे। देश में कई तरह की राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रही कांग्रेस के लिए इस मुद्दे को सुलझाना आसान नहीं है। वह मुख्यत: अपनों के ही निशाने पर है। अब उसकी बेहतरी तो इसी में है कि वह कम से कम लोकसभा चुनाव तक इस मुद्दे को लटकाए रखे। चूंकि विधेयक लोकसभा में पेश हो चुका है और मौजूदा संसद का यह अंतिम सत्र भी है लिहाजा विधेयक को लंबित रखना सहज है। जाहिर है लोकसभा चुनाव के बाद नई सरकार बनने तक इस मसले पर अगली कार्रवाई की संभावना नहीं है।

जहां तक लोकसभा में सांसदों के आचरण का प्रश्न है, उस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। लोकसभा में एक सदस्य चाकू तथा दूसरा मिर्ची पावडर लेकर पहुंच सकता है, तो और भी हथियार लेकर आने में क्या दिक्कत है? सुरक्षा के मौजूदा उपायों पर गौर करने एवं आवश्यकतानुसार नई व्यवस्था बनाने की जरूरत है। यद्यपि हंगामा करने वालों के खिलाफ निलंबन जैसी कार्रवाई की गई है लेकिन क्या वह काफी है? चूंकि लोकतंत्र कलंकित हुआ है अत: दोषियों की संसद सदस्यता खत्म करने एवं आपराधिक प्रकरण दर्ज करने से कम कोई बात नहीं होनी चाहिए ताकि औरों के लिए वह नज़ीर बने। यह भी उम्मीद की जाती है कि संबंधित पार्टियां अपने ऐसे लोगों के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई करे। दो दिन पूर्व कांग्रेस ने अपने 6 सांसदों को पार्टी से निष्कासित किया था। आंध्र प्रदेश के ये सांसद पृथक तेलंगाना राज्य के विरोध में लगातार संसद की कार्रवाई में बाधा डाल रहे थे तथा उन्होंने संप्रग सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। कांग्रेस को ऐसे ही सख्त कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि तेलंगाना का मुद्दा उसकी प्रतिष्ठा का प्रश्न है। लोकसभा में हुए हंगामे से उसकी भी किरकिरी हुई है।

16 February 2014

गौ माता को राष्ट्रमात का दर्जा क्यों नहीं ?

आज एक बार फिर से गौ रक्षा आंदोलन जोरो पर है। देश में पहली बार 7 नवम्बर 1966 में जब गौ भक्तों ने राष्ट्रीय स्तर पर आदोनल किया तो उसे बर्बर तरिके से कुचल दिया गया। गौ भक्तों पर लाठी और गोलियां बरसाई गई। जिसमे सैकड़ों लोग शहीद हुए थे। मगर इस बार गौ क्रांति के अग्रदूत परम पूज्य गोपाल मणि जी महाराज के नेतृत्व में 23 फरवरी को गौ राष्ट्रमाता को माता घोषित करवाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में गौ हुंकार रैली का आयोजन किया गया है।

इस एतिहासिक रैली में देश के अलग अलग राज्यों से लाखों की संख्या में लोग इकट्ठा होने वाले हैं। लोकसभा चुनाव से पहले होने वाले इस ऐतिसासिक को देखते हुए राजनीतिक हल्कों में भी सरगर्मियां तेज होगई है। अब तक के हुए गौ आंदोलनों में ये सबसे बड़ा आंदोलन होगा। परम पूज्य गोपाल मणि जी द्वारा स्थापित गौ महिमा प्रचार हेतु निष्काम संगठन भारतीय गौ क्रांति मंच के बैनर तले यह रैली होने जा रही है। 23 फरवरी को प्रातः 11 बजे से शुरू होने जा रही इस रैली को सफल बनाने के लिए देश भर के गौभक्त तैयारियों में जुट गए हैं । इस बाबत महामहिम राष्ट्रपति महोदय को एक ज्ञापन भी सौपने की योजना बनाई गई है। जिसकी सूचना राष्ट्रपति सचिवालय को दी गई है।

भारतीय हिंन्दू समाज में गाय को मां का दर्जा प्राप्त है। गाय को हम देवी मानकर पूजा करते हैं। गौ पूजन से हमारा जिवन धन्य हो जाता है। मगर भारत में जहाँ 80 करोड़ से ज्यादा हिन्दू रहतें हैं वहां आज गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा देने के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है। आज समाज कें कुछ वर्गो ने गौ हत्या को अपना व्यापार बना लिया है। आलम ये है कि आज भारत विश्व का सबसे बड़ा मांस निर्यातक बन बैठा है, और सरकार चुपचाप हाथ पर हाथ धरें बैठी है। आखिर कौन है इसका जिम्मेंवार और क्यों है सरकार चुप? क्यो नहीं गाय को राष्ट्रमाता घोशित किया जा रहा है? में खाद्यान्न उत्पादन आज भी गो वंश पर आधारित है। 1947 में एक हजार भारतीयों पर 430 गोवंश उपलब्ध थे। 2011 में यह आँकड़ा घटकर लगभग 20 गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो गया। ऐसे में गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित कर हीं इसे बचाया जा सकता है।

आज गाय बचेगी तो हमारा देश बचेगा, अन्न बचेगा, खेत बचेगा, धर्म और संस्कृति बचेगी। भारत की संस्कृतिक को भारतभूमि को, भारत की आत्मा को, जनता के स्वास्थ्य को, कृषि और किसान को, भारत की जलवायु और प्रकृति को, राष्ट्रीय स्वाभिमान को सुरक्षित रखने के लिए गौरक्षा हीं एकमात्र विकल्प है। गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा देकर ही आज हम सब  गौसेवा के संकल्प को पूरा कर सकते है। हम बड़े ही गर्व के साथ कहते है कि गावो-विश्वस्य मातरः गाय विश्व की माता है। तो ऐस में सवाल खड़ा होता है कि गौ माता को राष्ट्रमात का दर्जा क्यों नहीं ?

14 February 2014

कौन सच कौन झूठ ?

दिल्ली की एक अंग्रेज़ी पत्रिका कारवाँ ने जेल में बन्द स्वामी असीमानन्द के हवाले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर यह आरोप लगाया है कि संघ ने उन्हें हिंसात्मक गतिविधियों की अनुमति प्रदान की थी। यह पहला मौका नहीं है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चरित्र पर इस तरह से हमला किया गया है। संघ उन शक्तियों के निशाने पर अपने जन्म काल से ही रहा है, जो भारत को कमजोर करना चाहती है और इसको खंडित करने के स्वप्न देखती रही हैं या अभी भी देख रही हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि संघ ने शुरू से ही भारत के जिस सांस्कृतिक स्वरूप का समर्थन किया है, विदेशी शासकों और विदेशी ताकतों को वह कभी पसंद नहीं रहा है। उन्हें सदा खतरा रहता है कि इस सांस्कृतिक उर्जा से अनुप्राणित होकर भारत एक बार फिर विश्व में अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त कर सकता है। 

1947 से कुछ साल पहले तक मुस्लिम लीग संघ का इस लिए विरोध करती थी क्योंकि संघ मुस्लिम लीग के देशघाती विभाजन के सिद्धांत का विरोध कर रही थी और विभाजन के बाद कांग्रेस ने संघ पर इस लिए आक्रमण तेज किए क्योंकि देश विभाजन के राष्ट्रघाती फॉर्मूले को स्वीकार कर लेने के बाद कांग्रेस के भीतर जो अपराध बोध पल रहा था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आईने में वह उसे टीस देता रहता था इसलिए यह जरूरी था कि संघ के इस आईने को भी किसी प्रकार से तोड़ दिया जाए। मामला यहां तक बढ़ा कि नेहरू और उसकी टीम के मुख्य लोगों यथा मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद और रफ़ी अहमद किदवई ने भी महात्मा गांधी के मन में भी संघ के बारे में गलतफहमी पैदा करने की कोशिस की। यही कारण था कि महात्मा गांधी स्वयं संघ की शाखा में उसे समझने बुझने के लिए पधारे थे। नेहरू और उसकी टीम के लोग महात्मा गांधी के मन में मोटे तौर पर संघ की भूमिका को लेकर भ्रम पैदा करने में सफल नहीं हुए लेकिन जब नेहरू के मित्र और उस समय के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने, पाकिस्तान को 55 करोड़ दिए जाने के प्रश्न पर महात्मा गांधी को उपवास करने के लिए उकसाया, तो माउंटबेटन भी शायद इतना तो जानते ही थे की विभाजनोपरांत उत्पन्न हुए उत्तेजक वातावरण में इस उपवास से और उत्तेजना बढ़ सकती है और इसका परिणाम घातक भी हो सकता है। 

इसे भी माउंटबेटन की रणनीति का हिस्सा ही मानना चाहिए कि उन्होंने गांधी को मरणव्रत रखने के लिये उकसाते समय सरदार पटेल और अन्य राष्ट्रीय ताकतों को अंधेरे में रखा। महात्मा गांधी की हत्या पर जब सारा देश स्तब्ध और शोकाकुल था तो जवाहार लाल नेहरू  इस राष्ट्रीय शोक का इस्तेमाल केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निपटाने के लिए ही नहीं कर कर रहे थे बल्कि लगे हाथ यह चर्चा भी चला दी थी कि इसके लिये सरदार पटेल भी दोषी हैं । पटेल इससे बहुत आहत हुये थे । नेहरु ने गान्धी हत्या का बहाना लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को प्रतिबंधित ही नहीं किया बल्कि संघ के उस वक्त के सरसंघचालक गुरू गोलवलकर को गिरफ्तार भी कर लिया। ताज्जुब होता है कि भारत विभाजन के लिये काम कर रही मुस्लिम लीग को तो १९४७ के बाद भी काम करने दिया गया और संघ को स्वतंत्रता के तुरन्त बाद प्रतिबन्धित कर दिया गया । यह अलग बात है कि न्यायालयों ने नेहरू की इस चाल को तार-तार कर दिया और संघ को महात्मा गांधी की हत्या के आरोप से मुक्त किया,जिसके बाद सरकार को संघ से प्रतिबंध हटाना पड़ा।

बहुत से लोगों को यह जान कर हैरानी होगी कि जिन दिनों पंडित नेहरू जम्मू कश्मीर के प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए थें उन दिनों लेक सक्सेस में पाकिस्तान का प्रतिनिधि बार-बार इस बात पर जोर देता था कि जम्मू कश्मीर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सभी लोगों को निकाला जाए। उसका मुख्य कारण शायद यही था कि पाकिस्तान को विश्वास था कि नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ तो मजहब के आधार पर जम्मू कश्मीर के विभाजन की बात की जा सकती है लेकिन जब तक राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग हैं तब तक वे जम्मू कश्मीर के किसी भी हिस्से को पाकिस्तान को दिए जाने का विरोध करते रहेंगे।

विभाजन से पूर्व मुस्लिम लीग ने और विभाजन के बाद कांग्रेस ने संघ के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों को अपने निशाने पर बनाए रखा। लगता है सोनिया गांधी की पार्टी भी मुस्लिम लीग की उसी विरासत को लेकर एक बार फिर किसी गहरे षड्यंत्र को लेकर देश की राष्ट््वादी शक्तियों को निशाना बना कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के षड्यंत्र में जुट गई है। अंग्रेजी की एक पत्रिका की किसी पत्रकार को आगे करके संघ पर देश में हिंसात्मक गतिविधियों को सहमति देने को लेकर जो आरोप लगाया है वह उसी रणनीति का हिस्सा है। सोनिया गान्धी की पार्टी के क्रियाकलापों और उसकी रीति नीति को समझने के लिये मुसोलिनी की कार्यप्रणाली और मैकियावली की राज्य नीति को समझना बहुत जरुरी है। कारवाँ में प्रकाशित तथाकथित साक्षात्कारः को तभी ठीक से पकड़ा जा सकता है ।

कारवां अपने इस तथाकथित साक्षात्कार को लेकर किस प्रकार एक पूरी रणनीति के तहत काम कर रहा था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कारवां में प्रकाशित इस आलेख को जब किसी ने बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो पत्रिका की ओर से 5 फरवरी को बाकायदा एक प्रेस नोट जारी किया गया जिसमें संघ के सरसंघचालक पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने असीमानंद को देश में हिंसात्मक गतिविधि करने के लिए अपनी सहमति दी थी। यह प्रेस नोट दिल्ली प्रेस के मालिकों की सहमति या सहभागिता के बिना तैयार नहीं किया जा सकता था जो कारवाँ के मालिक हैं । रिकॉर्ड के लिए बता दिया जाए कि दिल्ली प्रेस नाम से मीडिया के धंघे में लगी यह कंपनी पिछले कई सालों से अंग्रेजी और हिंदी में अनेक पत्र-पत्रिकाएं छाप रही है। दिल्ली प्रेस के इस मीडिया हाउस का स्वर शत प्रतिशत हिंदू विरोधी रहता है। हिन्दू संस्कृति और उसके प्रतीकों को खासतौर पर निशाना बनाया जाता है। जो काम तरूण तेजपाल का मीडिया हाउस तथाकथित स्टिंग ऑपरेशनों के माध्यम से करता था वही काम दिल्ली प्रेस का मीडिया हाउस हिन्दू आस्थाओं पर प्रहार द्वारा करता है ।  कहना चाहिए कि दोनों मीडिया हाउस एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए अलग-अलग तरीकों से काम कर रहे हैं । इस उदेश्य की पूर्ति के लिए एक तीसरा समूह भी कार्यरत है। भारत में  चर्च के विभिन्न संस्थानों द्वारा प्रकाशित पत्र पत्रिकाओं को इस तीसरे समूह की संज्ञा दी जा सकती है। दिल्ली प्रेस की पत्र पत्रिकाओं और चर्च द्वारा भारत में मतांतरण आंदोलन को तेज करने के लिए प्रकाशित की जा रही पत्र पत्रिकाओं की भाषा का यदि गहराई से अध्ययन किया जाए तो लगभग एक समान दिखाई देती है।

सोनिया गांधी की पार्टी को लगता होगा कि यदि संघ पर ये आरोप तरूण तेजपाल के मीडिया हाउस तहलका के माध्यम से लगाए जाते हैं तो उस पर कोई विश्वास नहीं करेगा क्योंकि तेजपाल की कथित करतूतों का पर्दाफाश हो जाने के कारण उसकी विश्वसनीयता लगभग समाप्त हो गई है। शायद इसी मजबूरी में दिल्ली प्रेस को पर्दे के पीछे से निकाल कर यह खेल खेलने के लिए मैदान में उतारा गया। लेकिन दिल्ली प्रेस वालों ने शायद इस खेल में नए होने के कारण ऐसी भूलें कर दी जिससे उनका झूठ पकड़ा ही नहीं जा रहा बल्कि उसके भीतर के अंतरविरोध भी स्पष्ट नजर आ रहे हैं। कारवां के प्रेस वक्तव्य में अंतरविरोध इतने स्पष्ट थे कि उन्हें इस वक्तव्य के जारी हो जाने के तुरंत बाद भूल सुधार और स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।

पिछले चार पाँच साल से सोनिया गान्धी की पार्टी सरकारी जाँच एजेंसियों के साथ मिल कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम हिंसात्मक गतिविधियों से जोड़ कर, एक प्रकार से आतंकवादियों को कवरिंग रेंज प्रदान कर रही है। इस से होता यह है कि जाँच एजेंसियाँ यदि चाहें भी तो वे न तो इस्लामी आतंकवादियों की गतिविधियों की जाँच कर सकतीं हैं और न ही उन्हें रोक सकतीं हैं। सोनिया पार्टी को लगता है कि इस्लामी आतंकवाद के प्रति उसके इस रवैये से मुसलमान उसे एक मुश्ताक़ वोट दे देंगें। सरकार को अच्छी तरह पता होता है कि संघ को लेकर फैलाए जा रहे इस दुर्भावना पूर्ण इतालवी झूठ को सिद्ध करने के लिये उसके पास कोई प्रमाण नहीं है । इसलिये न्यायालय में किसी को आरोपित नहीं किया जा सकता है और न ही आज तक किया गया है। लेकिन सरकार की मंशा तो चुने गये मीडिया समूहों की सहायता से संघ और राष्ट्रवादियों को जनमानस में बदनाम करना है। दिल्ली प्रेस की सहायता से किया गया यह प्रयास भी उसी कोटि में आता है। कारवाँ के किसी  पत्रकार ने दावा किया है कि उसने जेल में असीमानन्द से दो साल में बार बार मुलाक़ात की है तो ज़ाहिर है यह सारी साज़िश सरकारी सहायता के बिना संभव नहीं हो सकती। दिल्ली प्रेस भी और सोनिया गान्धी की पार्टी और उसकी सरकार भी अच्छी तरह जानती है कि तथाकथित टेपों की जब तक जाँच होगी तब तक तो संघ पर लगे यह आरोप सब जगह चर्चित हो चुके होंगे।

कारवाँ के इस कारनामे को एक और पृष्ठभूमि में भी देखना होगा। पिछले एक दो साल से देश में यह चर्चा फिर से हो रही है कि सोनिया गान्धी की इतालवी पृष्ठभूमि और उनके राजीव गान्धी से शादी से पूर्व के जीवन के बारे में तहक़ीक़ात की जाये। सोनिया गान्धी इस समय देश की सत्ता के केन्द्र बिन्दु में है और देश सुरक्षा के लिहाज़ से एक प्रकार से संक्रमण काल से ही गुज़र रहा है । वैश्विक इस्लामी आतंकवादियों के निशाने पर भारत भी है, यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है। ऐसे समय में सोनिया गान्धी की सरकार आतंकवादियों के प्रति नर्म रवैया ही नहीं अपना रही बल्कि देश की जनता का ध्यान भी इस ओर से हटाने के लिये संघ पर दोषीरोपण कर रही है। पार्टी के एक महामंत्री तो खुलेआम आतंकवादियों का समर्थन करते नज़र आते हैं। आख़िर आतंकवादियों के प्रति सरकार की इस नर्म नीति के पीछे कौन है ? ये प्रश्न और भी तेज़ होकर चारों ओर गूँजने लगें , उससे पहले ही देश की राष्ट्रवादी ताक़तों पर दोषारोपण कर उन्हें रक्षात्मक रुख़ अख़्तियार करने के लिये विवश किया जाये,लगता है संघ पर दोषारोपण के पीछे यही सरकारी नीति काम कर रही है।

क्या कारण है कि आज अमेरिका भी संघ को निशाना बना रहा है , पाकिस्तान भी और सोनिया गान्धी की पार्टी भी ? हरिशंकर परसाई ने एक बार लिखा था कि यदि दुकानदार किसी ग्राहक की बुराई करें तो समझ लेना चाहिये कि ग्राहक ने उस दुकानदार के हाथों चुपचाप लुटने से इन्कार कर दिया है । इसी प्रकार अमेरिका भारत में जब किसी संगठन को गालियाँ देना शुरु कर दे तो मान लेना चाहिये कि वह संगठन भारत में अमेरिकी हितों के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। लेकिन क्या सोनिया गान्धी और उसकी पार्टी इस बात का ख़ुलासा करेगी कि वह संघ को बदनाम करने के काम में किसके हितों की रक्षा में लगी हुई है? रही बात कारवाँ की, इस लड़ाई में अभी पता नहीं कितने छिपे हुए कारवाँ लोकसभा के चुनावों तक प्रकट होते रहेंगे। तरुण तेज़पाल के जेल जाने से कारवाँ ख़त्म थोड़ा हो गया है।