05 January 2014

दलहन और तिलहन की फसलों में कमी के कारण !

विकास की रफ्तार में खेती के दरकिनार होने का मुद्दा गाहे-बगाहे सतह पर आता है। मुद्दे में इतनी गर्मी नहीं होती है कि उस पर सरकार कुछ ठोस निर्णय ले। लिहाजा, अन्नादाता पर हमदर्दी के बादल तो खुब गरजते हैं। पर हकीकत में जो होता है, वह उनके लिए संतोषजनक नहीं होता है। इस तरह के ढेरों झंझावातों के बावजूद किसानों ने अपने पसीने से देश का पेट भरने लायक अनाज उगाया है। धान और गेहूं के बाद दलहन और तिलहन जरूरी अनाजों में है। लेकिन करीब एक दशक से दहलन और तिलहन का उत्पादन पर भारी नकारात्मक असर पड़ा है। 

दशक भर पहले देश में दलहन और तिलहन उत्पादन को लेकर हम दंभ भरते थे। इसे पीली क्रांति की संज्ञा दिया था। लेकिन कब इस क्रांति पर ग्रहण लग गया किसी ने सुध ही नहीं ली। हालात तो यह हैं कि देश में दलहन और तिलहन का आयात बढ़ता जा रहा है। कृषि उत्पादों के आयात शुल्क में कमी देश के किसानों के साथ के साथ मजाक से कम नहीं है। पटरी से उतरी दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए सुझाए गए उपायों पर अमल तो दूर उन्हें फाइलों के झुरमुटों में ही अटका दिया गया है। लिहाजा, हकीकत के उपाय खेतों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। 

संसद के शीत सत्र में ही एक संसदीय समिति ने इसको लेकर सरकार की आलोचना की है। समिति ने अपनी 46 की रिपोर्ट में दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए दिए सुझाव पर पहल करने की सिफारिश भी की है। कृषि विभाग ने तिलहन और पाम तेल पर राष्ट्रीय मिशन एनएमओ ओपी के संबंध में भी निर्णय नहीं लिया है, जो चिंता का विषय है। सोयाबीन, मुंगफली, मुंग, उड़द और अरहर की खेती के बढ़ावा देकर दलहन और तिलहन के को आकर्षित करने समर्थन मूल्य में वृद्धि कर उन्नत बीज के साथ आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध करने की जरूरत है। किंतु अफसोस समिति की सिफारिशों पर गौर नहीं किया जा रहा है। दलहन और तिलहन पर यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो आयात में और वृद्धि स्वाभाविक है।

फिलहाल देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। किसानों को तकनीक और बीज के मामले में प्रोत्साहन नहीं मिलने से उत्पादन में गिरावट चली आई। दूसरी और आयात शुल्क में 75 प्रतिशत तक छूट दी जाने लगी, जिससे किसान पिछड़े उत्पादन गिरा और हमारी आत्म निर्भरता धराशाई हो गई है। इसके बाद भी दलहन और तिलहन के मामले अनुदार रवैया अपनाया जा रहा है। यह खतरे की घंटी है। आयात शुल्क घटाने से विदेशी विनिमय का लाभ इंडोनेशिया, मलेशिया, अमरीका और ब्राजील के किसानों को मिल रहा है। यदि दलहन-तिलहन के समर्थन मूल्य पर इजाफा किया जाता है तो आयात घटेगा और देश के किसान लाभान्वित होंगे।

राजीव गांधी के शासन काल 1985 में कमोबेश यही स्थिति बनी थी। तब संसद में बहस हुई। बहस का सार था हम पेट्रोल डीजल क्यों खरीदते हैं? तर्क आया दोनों वस्तुओं का उत्पादन देश में नहीं होता है। पर दहलन तिलहन हमारे श्रम का नतीजा है। फौरन कृषि नीति पर बदलाव किया गया। यात्र एक दो वर्ष के अंतराल में हमारी आयात निर्भरता घटने लगी। किंतु डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अनिवार्य मामले में उपेक्षा मिली। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के इस उत्पादन में उतरोत्तर तरक्की कर रहे हैं। बस दलहल तिलहन पिछड़ रहा है। इस सूरत में दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए ठोस पहल किया जाना चाहिए।

आयल सीड्स टेक्नालाजी मिशन को हासिल करना आज के दौर में बेहद सरल कार्य है। इस मामले में एक और विसंगति सामने आई है। सोयाबीन के उत्पादन के लिए जेनेटिकल मोडिफाइड कृत्रिम रूप से संवर्धित यानी जीएम सोसाबीन के उत्पादन बढ़ावा दिया जा रहा है। इस प्रजाति के बीज का उत्पादन सामान्य सोयाबीन से 4 से 20 प्रतिशत कम होता है। इस बीज को बढ़ावा देने देश को क्या लाभ होगा इसका खुलासा नहीं किया गया है। आश्चर्य की बा है कि कृत्रिम रूप से संवर्धित बीजों के अन्य उत्पादों का कम विरोध कर चुके है। उसके बाद सोयाबीन को बढ़ावा देना जांच का विषय हो सकता है।

सिफारिशी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि दलहन तिलहन के उत्पादन में आवश्यकता अनुसार उत्पादन के लिए देश में 30 प्रतिशत कृषि रकबे की आवश्यकता पड़ेगी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र की परंपरागत खेती के साथ अलसी, सोयाबीन, सरसो और तिल की फसल आसानी से उगाई जा सकता है। दलहन और तिलहन के उत्पादन रकबे में वृद्धि से धान और गेहूं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी। किंतु इससे हमारी आर्थिक व्यवस्था पर बल आने की संभावना नहीं के बराबर होगी। पाम यानी ताड़ बुनियादी तौर से मुरस्थली उपज है। इसके लिए भारत की भूमि को ज्यादा उपयुक्त नहीं माना जाता है। पाम से 10 प्रतिशत अतिरिक्त कार्बन डिस्चार्ज होता है। जो बेहद हानिकारक है। इसलिए खाद तेल के विकल्प के रूप में पाम की जगह सोयाबीन आदि को बढ़ावा देना चाहिए। रिक्त भूमि का उपयोग दलहन और लिए परंपरागत रूप में किया जाता रहा है। इस प्रचलन में लाने के लिए कठिन प्रयास के आवश्यकता ही नहीं है।

04 January 2014

मोदी को विनाशकारी कहना कितना सही ?

                                            हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी।
                                           न जाने कितने सवालों की आबरू रखली।।

कलतक ख़ामोशी में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी तो मानो सियासी भूचाल आगया। सत्ता से सन्यास की ओर जाने की तैयारी करने वाले मनमोहन ने ऐसे शब्द बाड़ छोडे़ जैसे प्रधानमंत्री अपनी सारा मर्यादा ही भूल बैठे। मनमोहन सिंह बुझते दिए की फड़फड़ाती लौ के समान मोदी पर हमला बोला रहे थे। राजनैतिक हल्कों में मनमोहन सिंह के शाँत स्वभाव का सम्मान भी किया जाता है और उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है। राजनीतिक विरोधियों पर शाब्दिक बाण चलाने के लिए उन्हे कभी नहीं जाना गया। संसद में भी जब कभी कभार नोकझोंक के मौके आते हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले भी हो रहे होते हैं तब भी वह चुप रहना ही पसंद करते हैं।

मगर शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाजपा के पीएम पद के उमीदवार नरेन्द्र मोदी को देश  के लिए विनाशकारी बता डाला। मनमोहन सिंह ने आगे ये भी कहा कि जिसके सत्ता में रहते अहमदाबाद में कत्लेआम हुआ हो, वो मजबूत नेता कैसे हो सकता है। मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए घातक होगा। यह देश के हित में ठीक नहीं होगा। तो ऐसे में सवाल ये है कि क्या मनमोहन सिंह अपनी नकामी और असफलता के आगे इतना बेबस और लचार होचले है कि देश के भावी पीएम उन्हें विनाशकारी दिखाई देने लगे है। या फिर पीएम की ये खींझ कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके सहारे अक्सर कांग्रेस और उसके नेताओं को जाना जाता है। तो सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या मोदी देश के लिए विनाशकारी है या फिर कांग्रेस के लिए।

रोबोटनुमा चाल और किसी मुद्दे पर कोई राय न रखने वाले प्रधानमंत्री जब एकाएक "खिसियाई बिल्ली, खम्भा नौचे"के समान सियासत करने लगे तो सवाल और भी गंभिर हो जाता है। आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवी को भष्टाचार और घोटालों को बर्दाश्त करने और प्रतिभावान लोगों को आगे न ला पाने की कमजोरी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। सोनिया गाँधी के साथ सत्ता में भागीदार होने की मजबूरी ने न सिर्फ उनके हाथ बाँध दिए हैं बल्कि कहीं-कहीं यह आभास भी दिया है कि पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जाने की न तो उनमें इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता। 

ऐसे में प्रधानमंत्री को अब ये अहसास होचला है कि आज के बदलते राजनीति दौर में मोदी न सिर्फ दश जनपथ के राह में रोड़ा बनने वाले है बल्कि उनके राजनीतिक वविष्य के लिए चुनौती भी मोदी ही होंगे। बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैलियां इन दिनों चर्चा में है, उनके विकास के मॉडल को भारत का भविष्य बताने का अभियान जोरों पर है। जतना का जनाधार खोने का भय सत्ता से दूरी का दंश का आभाश इस बात का गवाह है कि कांग्रेस की हर ख्वाहिशें टुटती नज़र आ रही है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि मनमोहन का मोदी को विनाशकारी कहना कितना सही ? नकामी की खींझ और सत्ता की ख्वाहिशों पर तो कोई भी यही कह सकता है कि,,,,,,,,,

                                         हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
                                         बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।।

01 January 2014

क्या "आप" पार्टी मोदी को चुनौती दे रही है ?

राजनीति में मुख्य रूप से दो प्रकार के गणित होते हैं। एक वास्तविक गणित और दूसरा अवधारणात्मक गणित। राजनीतिक जानकार इन दोनों ही आधार पर किसी पार्टी या नेता की लोकप्रियता का मूल्याँकन करते रहते हैं। ज़रूरी नहीं कि जो अवधारणा हो वैसा ही नतीजा हो और जैसा नतीजा हुआ है उसके आधार पर नई अवधारणा के लिए कोई गुज़ाइश न हो। कई प्रकार के अपवाद हैं। 

अरविंद केजरीवाल के उदय से और आम आदमी पार्टी के लोक सभा चुनाव में उतरने के एलान से अवधारणात्मक गणित में एफ नया फ़ैक्टर आ गया है । दिल्ली से संचालित मीडिया स्पेस में मोदी के बराबर अरविंद को जगह मिलने लगी है। बीजेपी हो सकता है कि अपना ध्यान क्षेत्रीय मीडिया स्पेस पर लगाये लेकिन अरविंद वहाँ भी पहुँच सकते हैं । इसलिए दोनों के लिए इस वक्त नया मीडिया स्पेस तलाशने से कोई फायदा नहीं है । स्पेस के लिहाज़ से अवधारणात्मक गणित बनाने का मंच राष्ट्रीय मीडिया ही है। अख़बारों के ज़िला संस्करण अवधारणा बनाने के सशक्त उपकरण नहीं हैं । वे भी राष्ट्रीय मीडिया के विस्तार हैं । उनकी भूमिका से इंकार नहीं कर रहा लेकिन ज़िला संस्करण भी भाषणों से राष्ट्रीय तत्वों का ही चयन करता है।

तो क्या आम आदमी पार्टी मोदी को चुनौती देगी? इसका सरल जवाब है। चुनौती तो देगी मगर दे नहीं पायेगी। कारण यह है कि अवधारणात्मक गणित में मोदी काफी आगे निकल चुके हैं। आप दिल्ली की तरह हर जगह कांग्रेस का ही विकल्प बनेगी। वह यूपी में सिर्फ मोदी से नहीं लड़ पायेगी। उसे अखिलेश यादव और मायावती से भी लड़ना होगा। दिल्ली में एक ही टारगेट था। आप को मिलने वाला हर वोट मोदी की जीत को पक्का करेगा। दिल्ली के नतीजे यही बताते हैं। दिल्ली में बीजेपी भले नहीं जीत पाई मगर वो हारने से इसलिए बच गई क्योंकि मोदी ने बचा लिया। वर्ना आम आदमी पार्टी के सामने कांग्रेस की तरह बीजेपी भी पंद्रह बीस सीटों वाली बन कर रह जाती। दिल्ली के उदाहरण से बीजेपी को बौखलाना नहीं चाहिए। आप भले ही मोदी को निशाना बनाएगी क्योंकि पहले के लेख में भी कह चुका हूँ कि अवधारणात्मक ज़मीन पर मोदी ही नंबर वन हैं। वहाँ आप दूसरे या तीसरे नंबर के मनमोहन सिंह या कांग्रेस को टारगेट कर उसे लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन क्या बीजेपी को भी आप को नम्बर वन टारगेट समझना चाहिए? क्या बीजेपी आप को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकेगी? जीत के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद।

यह सही है कि आप की कामयाबी ने राजनीतिक चर्चा को बदल दिया है। यह भी सही है कि आप की टीम तीन सौ ज़िलों में मौजूद है। लेकिन वे तीन सौ ज़िले दिल्ली नहीं हैं। उनमें से कई ज़िले ज़रूर हो सकते हैं । कई शहर हो सकते हैं। दिल्ली में ही आप के लिए देश भर से वोलिंटियर काम करने आ गए थे। क्या आप यही रणनीति हर जगह पर दोहरा पाएगी? इंडियन एक्सप्रेस में योगेंद्र यादव का इंटरव्यू दिलचस्प है। आख़िर में योगेंद्र ने कहा है कि काश हम चुनाव आयोग से कह पाते कि लोक सभा चुनाव एक साल के लिए टाल दीजिये।

हाँ यह ज़रूर है कि आप ने अवधारणात्मक ज़मीन पर की जाने वाली गणित में मोदी का खेल बिगाड़ दिया है। मोदी पर अरविंद का हमला ज़्यादा आक्रामक और विश्वसनीय सा लगेगा। कांग्रेस आज दिल्ली में एंटी करप्शन यात्रा कर रही है। किसी चैनल पर यह फ़्लैश देखा है। यह महज़ नौटंकी है। आप की तरह रंग बदल कर कांग्रेस बीजेपी आप नहीं हो सकती । इससे लाभ आप को ही मिलेगा। लेकिन कांग्रेस से ज़्यादा फायदा बीजेपी को मिल सकता है। कांग्रेस जितना भ्रष्टाचार के विरोध को लेकर मुखर होगी आप की डुप्लीकेट लगेगी। इससे उसका वोटर आप में बँटेगा और कई शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की तरफ़ जायेगा। तो जैसा मैं कह रहा था कि अवधारणात्मक गणित में अरविंद को नंबर तो मिलेंगे क्योंकि जानकार दिल्ली की तरह छह सीटें देने की ग़लती दोबारा नहीं करेंगे। आप को इस बार ज़्यादा सीटें देंगे। जिसके कारण अरविंद मोदी की दावेदारी को अपने सवालों से अवधारणात्मक चुनौती देने लगेंगे। कुमार विश्वास का यह बयान तुकबंदी नहीं है कि अगर मोदी वैचारिक रूप से वंशवाद के इतने ही ख़िलाफ़ हैं तो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ क्यों नहीं लड़ते। यह चुनौती कांग्रेस या लेफ़्ट की तरफ़ से नहीं आ सकता। मोदी भले ही चुप हो जाएँ मगर पब्लिक को तर्क के लिए ही सही एक नया मसाला तो मिल ही गया।

इसीलिए नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा कि वे आप को नज़रअंदाज़ करें। आप के खाते में गए लोग कांग्रेस और बीजेपी स़े निकले हुए हैं। मोदी ने शुरू से ही पहली बार मतदाता बने युवाओं को ज़्यादा टारगेट किया है और उनमें अपनी पकड़ ज़रूर बनाई है। मोदी ने उन्हें इसलिए टारगेट किया कि ये नए लोग हैं। इनकी निष्ठाएँ नईं हैं। यो बीजेपी की कमज़ोरियों से कम वास्ता रखते हैं इसलिए नेतृत्व की मज़बूत दावेदारी को फिर से उभारा गया जिसे दो दो बार आडवाणी जी सामने लाकर कमज़ोर मनमोहन से हार गए। मोदी ने इस पिटे हुए फ़ार्मूले को युवाओं के बीच ले जाकर लोकप्रिय बना दिया। अब अरविंद के आने से पहली बार मतदाता बने युवाओं के बीच मोदी और अरविंद में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा होने जा रही है। पार्टियों की निगाह में यह पहली बार मतदाता ज़्यादातर शहरी और पब्लिक स्कूल वाला है। इनके बीच से एक वोटर का भी मोदी से अरविंद की ओर जाना नुक़सान तो होगा ही। फिर भी यह बात अवधारणात्मक स्तर पर ही ज़्यादा प्रबल लगती है। वास्तविक गणित के धरातल पर कमज़ोर।

अगर टीवी और सोशल मीडिया को यह श्रेय दिया जा रहा है कि आप इनकी पैदाइश है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी काल्पनिक मीडिया के असर के कारण बीजेपी में मोदी की दावेदारी प्रखर हुई थी। मोदी की टीम ने भी इसे काफी प्रचारित किया था कि टीवी वालों को टीआरपी आती है इसलिए मोदी को दिखाते हैं क्योंकि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। इस तरह की बातें बीजेपी के कई नेताओं ने डिबेट शो में कहीं हैं। वे यह भूल गए कि टीवी को सनसनी, स्पीड न्यूज़ और क्रिकेट से भी टीआरपी मिलती है। अरविंद के कारण भी मिल रही होगी ! इसलिए अब इस चरण पर आकर आप मीडिया के प्रभाव (विवादास्पद) को ख़ारिज नहीं कर सकते।

ज़ाहिर है मोदी आगे हैं। उनके पास संगठन है। आप के पास वोलिंटियर की ताक़त तो है मगर हर जगह समान सघनता नहीं है। लेकिन जिस तरह से कई जगहों पर लोग आप की तरफ़ देख रहे हैं, बीजेपी आगे होते हुए भी इस नए फ़ैक्टर को अनदेखा नहीं कर सकती हैं। शहरीकरण के प्रसार को मोदी की कामयाबी से जोड़ा जा रहा था। इसमें एक और दावेदार आ गया है जो नया और आकर्षक है। दिल्ली की सात सीटों के अलावा आस पास की कुछ सीटों पर आप की मौजूदगी दस बीस तो हो ही जाती है। आगरा, कानपुर, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, पुणे, फ़रीदाबाद, गुड़गाँव, भिवानी, बंगलुरू जैसी सीटें। क्या बीजेपी ऐसी पंद्रह सीटों को अनदेखा करने का जोखिम उठा सकती है? हाँ अगर गडकरी अरविंद पर हमला करते हैं तो ज़रूर फ़ायदा आप को होगा। देखते हैं नरेंद्र मोदी कब तक आप या अरविंद को नज़रअंदाज़ करते हैं। मोदी के लिए मिशन 272 के लिए एक एक सीट ज़रूरी है। पहले तो उन्हें वाजपेयी के 186 सीटों का रिकार्ड तोड़ना है फिर मनमोहन सिंह से बड़ा नेता (२००९ के अनुसार) बनने के लिए 206 से ज़्यादा सीटें लानी हैं इसलिए वास्तविक गणित का वक्त आने से पहले अवधारणात्मक गणित की कापी पर काट पीट और बढ़ जाएगी।

केजरीवाल की खैरात की सौगात का राज़ !

रामलीला मैदान पर अरविंद केजरीवाल एंड नौटंकी कंपनी के शपथग्रहण के साथ बीते एक पखवाड़े से जारी बुद्धू बक्से के तमाशे का एक चरण पूरा हुआ। अब घोषणापत्र के घोषणा को बारी बारी से पूरा करने के दावे के साथ आम आदमी पार्टी अपने तमाशे का दूसरा चरण पूरा कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केजरीवाल एण्ड कंपनी सचमुच लोकतंत्र को मजबूत कर रही है या फिर सस्ती लोकप्रियता के लिए वह नागरिकों को दिग्भ्रमित कर रही है। 

आंदोलन की अवैध उपज

समाप्तप्राय वर्ष 2013 दुनिया के तमाम देशों में जनांदोलन का वर्ष रहा। इजिप्त, ब्राजील, ट्यूनीशिया जैसे देशों में जनांदोलनों का दौर २०११ में ही प्रारंभ हो गया था। ब्राजील, रूस और चीन में भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के बगलबच्चे एनजीओ 2011 से ही जनांदोलनों को हवा दे रहे हैं। 2013 आते-आते इजिप्त की जनतांत्रिक क्रांति मजहबी रक्तपात में तब्दील हो गई। इजिप्त के तहरीर स्क्वेयर से दिल्ली के जंतर-मंतर की तुलना हो रही थी। जिस तरह इजिप्त की क्रांति से मोहम्मद मोरसी जन्मे उसी तरह जंतर-मंतर आंदोलन की अवैध औलाद का नाम है केजरीवाल। मोहम्मद मोरसी ने जनक्रांति को अराजक मजहबी तानाशाही में तब्दील किया तो केजरीवाल खैराती चुनावी वादों से सत्ता में पहुंच कर जनतंत्र को खैराततंत्र में बदलने का नया अध्याय शुरू कर चुके हैं। वह दिल्ली का चुनाव भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बजाय दिल्लीवासियों को मुफ्त पानी, सस्ती बिजली और अवैध झुग्गी-झोपड़ियों को नियमित किए जाने के वादे के बल जीतने में कामयाब हुए हैं।

चुनावी वादों का पोस्टमॉर्टम

अग्रणी वित्तीय सूचना कंपनी जायफिन के वरिष्ठ सलाहकार सुरजीत एस. भल्ला ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) के चुनावी वादों का बेहतरीन पोस्टमॉर्टम किया है। श्री भल्ला ने जो पोस्टपार्टम किया था वह सही साबित हुआ। अरविन्द केजरीवाल की घोषणा के अनुसार ‘आप’ पार्टी दिल्ली के हर परिवार को प्रति दिन करीब पौने सात सौ लीटर पानी मुफ्त देगी। इस तरह हर परिवार को 20 किलोलीटर पानी प्रति माह मुफ्त प्राप्त होगा। परंतु कोई परिवार यदि 22 हजार लीटर से एक भी लीटर पानी अतिरिक्त उपभोग करता है तो उसे पूरे 21 हजार लीटर पानी का बिल अदा करना पड़ेगा। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रति दिन लगभग 150 लीटर पानी उपभोग करता है। दिल्ली में हर परिवार के सदस्यों की औसत संख्या 4 है। ‘आप’ मुफ्त में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 175 लीटर पानी का वादा कर चुकी है। पानी के उपभोग का यह परिमाण उन्नत देशों जर्मनी और डेनमार्क के औसत से कहीं ज्यादा है। रहस्य इस बात का भी है कि ‘आप’ ने यह सूत्र कहां से हासिल किया? एक दशक पहले दक्षिण अफ्रीका में थाबो म्बेकी ने गरीब अफ्रीकियों के लिए प्रति माह 6 हजार लीटर पानी मुफ्त उपलब्ध कराने का वादा कर चुनाव जीता था। इससे अधिक मासिक पानी उपभोग करने पर दक्षिण अफ्रीका में भी पूरा बिल वसूलने का प्रावधान था। दक्षिण अफ्रीका में पाया गया कि मुफ्त पानी योजना का लाभ गरीबों की बजाय पानी के बिल का भुगतान करने में समर्थ मध्यमवर्गीयों को मिला। दिल्ली में भी मुफ्त जल योजना का यही हाल होना है।’ भल्ला के शोधपूर्ण दावे का जवाब शायद ही ‘आप’ के किसी नीतिकार के पास हो। हवा पानी मुफ्त होना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती लेकिन वहां जहां हवा और पानी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो। जब पानी कहीं और से ढोकर कहीं और लाया जाएगा तब वह मुफ्त कैसे रह पायेगा?

केजरीवाल का खैरात तंत्र

झुग्गी-झोपड़ियों को पक्के मकान और सस्ती बिजली का वादा भी कुछ इसी तरह का है। तमाम विद्युतविशेषज्ञ ‘आप’ के दावों को हवाई करार देते हैं। यदि जिद वश ‘आप’ इन वादों को पूरा भी कर दे तो इस खैरात के लिए राजस्व कहां से आएगा? इस सवाल का जवाब अब तक किसी के पास नहीं। यदि खैराततंत्र ही लोकतंत्र का उत्तम तंत्र मान लिया जाए तो फिर केजरीवाल के वैचारिक काका तमिलनाडु के एम. करुणानिधि को मानना पड़ेगा। उन्होंने तो तमाम घरों में रंगीन टेलीविजन पहुंचा दिया। अखिलेश सिंह यादव आज भी मुफ्त के लैपटॉप बांट रहे हैं। फिर छत्तीसगढ़ के रमण सिंह और मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान केजरीवाल के तो अग्रज हुए। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे 2004 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो चुनाव जीतने के लिए उन्होंने किसानों को मुफ्त में बिजली देने का वादा किया। चुनाव कांग्रेस जीत गई। पर साल भर बीतते-बीतते मुफ्त की बिजली तो दूर बिल भुगतान करने की तैयारी दिखाने पर भी बिजली अनुपलब्ध हो गई। कांग्रेसी खैरात तंत्र ने सरप्लस बिजलीवाले महाराष्ट्र को आज दिन तक लोडशेडिंग के लिए मजबूर कर रखा है। दिल्ली जलबोर्ड को वित्त वर्ष 2012-13 में 466 करोड़ रुपयों का मुनाफा हुआ। ‘आप’ का दावा है कि हम यह मुनाफा जनता में बांट देंगे। योगेंद्र यादव और अरविंद केजरीवाल के फौरी दावे इस आधार पर विश्वसनीय लगते हैं। दिल्ली में 7 लाख घरों को अब तक पाइप लाइन से पानी उपलब्ध कराना बाकी है। ७ लाख घरों को पाइपलाइन से जोड़ने के खर्च का जुगाड़ ‘आप’ वाले कहां से करेंगे? शायद यह आंकड़ा अभी तक उनके विश्व बैंक के ‘हैंडलर्स’ ने उपलब्ध नहीं कराया है।

केजरी से सभी के हुए संबंध विच्छेद

‘आप’ के कर्ताधर्ता केजरीवाल 2011 से 2013 के ढाई वर्षों के सार्वजनिक जीवन में लगातार संबंध विच्छेदों के कारण जाने जाते हैं। पहले उन्होंने जन लोकपाल आंदोलन से स्वामी अग्निवेश को काटा, फिर एन. संतोष हेगड़े दूर हो लिए, मौलाना काजमी धकिया कर हटा दिए गए। अण्णा हजारे से उन्होंने किनारा कर लिया। किरण बेदी खारिज कर दी गर्इं। अब उनके पास पुरानी चौकड़ी में केवल प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, संजय सिंह और योगेंद्र यादव ही बचे हैं। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण चुनाव के समय जितने सक्रिय थे, सरकार संस्थापना में उतने ही निष्क्रिय नजर आए। बचे हुए कुमार विश्वास और संजय सिंह साख विहीन होने के चलते केजरीवाल की दुम बने रहने को मजबूर हैं। सो, जिस कांग्रेस को बीते 36 महीनों से केजरीवाल भ्रष्ट कहते आए हैं उसी के वंâधों पर सवार होकर सरकार में जा बैठे हैं। देखना है उनकी यह खैराती सियासत कितने माह चलती है? जिनको लगता है कि ‘आप’ पार्टी किसी चमत्कारी जनांदोलन की उपज है, उन्हें एक बार दिल्ली के सियासी दड़बे से बाहर वैश्विक परिदृश्य पर नजर घुमानी चाहिए। सिर्फ 2013 के जनांदोलनों को देख लें तो यूव्रेâन से थाईलैंड तक तमाम जनांदोलन नजर तो आते हैं, पर कोई सफलता चूमता नजर नहीं आता।

जनांदोलनों का फायदा जनता को नहीं

ब्राजील, टर्की, यूव्रेâन, इटली, रूस, इजिप्त, सिंगापुर और थाईलैंड की सड़कों ने जनप्रदर्शनों का दीदार किया। हर आंदोलन में सोशल मीडिया का प्रभाव, नागरिकों का अपेक्षाभंग, सत्तातंत्र का अनिर्णय और भ्रष्टाचार ‘कॉमन फैक्टर’ रहा। इनके परिणामों में भी कोई विशेष अंतर नहीं नजर आता। उदाहरण के तौर पर टर्की को देखें। टर्की में एनजीओ प्रेरित आंदोलनों की परिणति तानाशाही के शिकंजे में कसाव के रूप में हुई। सड़कों पर व्यापक प्रदर्शन हुए तो टर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तय्यिप एर्डोगन ने अधिकारों को अपने पास केन्द्रीकृत कर लिया। यूक्रेन के जनांदोलन ने वहां की सरकार को यूरोपियन यूनियन के साथ समझौते को तो मजबूर किया। पर यूव्रेâन के प्रदर्शनकारियों के लिए लोकतंत्र अभी बहुत दूर नजर आ रहा है। इजिप्त में मोहम्मद मोर्शी के समर्थकों और सेना के बीच आए दिन हिंसक वारदात हो रही है। ब्राजील के साओ पावलो शहर में मेट्रो के किराए में वृद्धि को लेकर जून 2013 में जनांदोलन खड़ा हुआ। जून में हिंदुस्तानी मुद्रा रुपया डॉलर के मुकाबले गत्र्त में जा रहा था, पर ब्राजील की मुद्रा स्थिर थी। ब्राजील ने 2 वर्ष पहले ‘ब्रिक’ देशों की अपनी मुद्रा की बात की थी और विश्व बैंक की तर्ज पर ‘ब्रिक’ देशों के बैंक अथवा इंटरनेशनल मोनेटरी फंड में ‘ब्रिक’ के ‘वोटिंग पॉवर’ को बढ़ाने की मांग रखी थी। मेट्रो जनांदोलन के बाद ब्राजील की राष्ट्राध्यक्ष दिल्मा रौसेफ को पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर औचक 50 बिलियन रियाल खर्च करने का पैâसला लेना पड़ा। परिणामस्वरूप ब्राजील के चालू खाते का घाटा बढ़ा और ब्राजील रियाल के मूल्य में 10 प्रतिशत की गिरावट आ गई। फायदा किसे हुआ? ब्राजील की जनता को नहीं बल्कि आईएमएफ और वल्र्ड बैंक को।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के पीछे कौन?

रूस की राजधानी मॉस्को में ‘एंटी ऑरेंज प्रोटेस्ट’ का प्रभाव सरकारी दमनशाही के बावजूद जारी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन खुद आरोप लगा चुके हैं कि रूसी जनांदोलन अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने प्रायोजित किए। रूसी जनांदोलन का नेतृत्व करनेवाले थैलीशाह मिखाइल खोद्रोवस्की को महीनों की कैद के बाद अब जाकर रिहा किया गया है। थाईलैंड में 4 नवंबर से प्रस्तावित ‘एमनेस्टी बिल’ के खिलाफ जो जनांदोलन छिड़ा तो वह अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमाम सरकारी इमारतें आंदोलनकारियों के कब्जे में हैं। थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री ठकसिन शिनावात्रा के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को माफ न किया जाए की मांग से जारी आंदोलन अब वर्तमान प्रधानमंत्री यिंगलुक शिनावात्रा की कुर्सी के लिए खतरा बन गया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शुरू में चीन में जारी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों पर नरम रहे। अब उन्होंने लिइयु पिंग, वी झोंगपिंग और ली सिहुआ जैसे आंदोलनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश दे दिया है। शी जिनपिंग का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर विदेशी ताकतें चीन में आंतरिक हस्तक्षेप करना चाहती हैं। ब्राजील हो, रूस, टर्की या चीन हर देश भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को विश्व बैंक/ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा पोषित एनजीओ का कुचक्र करार देता है। फिर भी हम केजरीवाल को माथे पर बैठाए नाच रहे हैं। यह बिसार कर कि केजरीवाल का उद्भव और हिंदुस्तान के अर्थतंत्र-सत्तातंत्र का नीतिगत लकवा समानांतर परिघटना है। ब्राजील की मुद्रा की गिरावट और रुपए के अवमूल्यन का लाभ अंतत: किसको हुआ? क्या इस तथ्य को हम आमजनों तक पहुंचा पाएंगे? जब तक लोग सयाने होंगे तब तक खजाना लुट चुका होगा।

31 December 2013

आम चुनाव 2014 की चुनौती !

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को आगे करके भाजपा ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव को एक अहम मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। यूं तो हर चुनाव में मुसलिम वोटर अहम होते रहे हैं, लेकिन मोदी के आने की वजह से उनके अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई है। कांग्रेस समेत सभी धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों का लगता है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से दूर रखने के लिए मुसलमान उनके इर्दगिर्द ही सिमटा रहेगा, जिससे उनकी राह आसान हो जाएगी। 

इस बात को इससे भी बल मिलता है कि जब भी कोई मुसलिम नेता या उलेमा नरेंद्र मोदी के पक्ष में झुकता दिखाई दिया है, मुसलमानों ने उसके खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया की है। वस्तानवी से लेकर महमूद मदनी तो यही देखा गया है। मुसलमानों की समस्या यह है कि धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की सरकारों ने भले ही उन्हें कुछ न दिया हो, लेकिन वे भाजपा को किसी सूरत बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है।

यूं भी उन्होंने राजग के छह साल के शासनकाल में देख लिया है कि उसने भी मुसलमानों के लिए ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे वे भाजपा की तरफ जाएं। 2002 के गुजरात दंगों का कलंक ढो रहे नरेंद्र मोदी आज तक उस कलंक धोने में नाकाम रहे हैं। सच तो यह है कि उसे वह धोना भी नहीं चाहते, क्योंकि धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए मुसलमान अहम हैं, मोदी के लिए भी मुसलमानों की उतनी ही अहमियत है। यह अलग बात है कि वह उनके विरोध में खड़े होकर हिंदु वोटों को धु्रवीकरण अपने पक्ष में करना चाहते हैं। 

मोदी मुसलिम विरोध में किस हद तक जा सकते हैं, इसका उदाहरण है केंद्र सरकार द्वारा सच्चर समिति की सिफरिश के तहत मुसलिम छात्रों के लिए छात्रवृत्ति को गुजरात में लागू न करना। इस छात्रवृत्ति का 75 प्रतिशत केंद्र सरकार तो 25 प्रतिशत राज्यों सरकारों को देना था। हद यह है कि गुजरात सरकार इसके विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट चली गई। इतना ही नहीं, उसने सच्चर समिति की वैधता पर ही सवाल खड़े कर दिए। संसद के शीतकालीन में लाया जाने वाले सांप्रदायिकता विरोधी बिल को भी नरेंद्र मोदी चुनौती दे रहे हैं। इस तरह देखें, तो मोदी भी मुसलमानों को अपनी राजनीति के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस बीच अहम सवाल यह है कि मुसलमान कब तक धर्मनिरपेक्ष दलों और भाजपा की राजनीति के चलते फुटबाल बनता रहेगा? 66 साल बाद अब यह तय हो जाना चाहिए कि आखिर भारत में मुसलमानों की क्या हैसियत है? मुसलमानों की बदहाली का रोना रोने वाले कांग्रेस सहित सभी धर्मनिरपेक्ष  राजनीतिक दलों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि आखिर जब उन्हें मुसलमानों की बदहाली की इतनी ही फिक्र है, तो उन्होंने अब तक उनके लिए क्या किया है? सच तो यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों ने मुसलमानों के लिए जो कुछ करने की कवायद की, वह महज सांकेतिक रूप ही की। वह मुसलमानों के लिए कुछ करते रहने भर दिखना चाहती हैं बस! वे यह जानते हुए भी कि ऐसा नहीं हो सकता, मुसलमानों को 18 प्रतिशत, तो कोई 4 प्रतिशत आरक्षण देने बात करता है। आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण दिया, लेकिन अदालत ने उसे रद्द कर दिया। आंध्र प्रदेश सरकार जानती थी कि ऐसा ही होगा, लेकिन उसे यह कहने मौका तो मिल ही गया कि हमने तो दिया, अदालत ने रद्द कर दिया तो हम क्या कर सकते हैं यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। 

जब सरकारें सांकेतिक रूप से मुसलमानों का भला करने का दिखावा करती हैं, तो उससे बहुसंख्यकों के एक वर्ग में यह संदेश भी जाता है कि मुसलिमों का तुष्किरण किया जा रहा है। भाजपा जैसे सांप्रदायिक पार्टी को मुसलमानों पर हमलावर होने का बहाना दे दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार को बहुमत दिलाने में मुसलमानों ही अहम भूमिका रही है, लेकिन उसे दंगों के सिवा क्या मिला? उत्तर प्रदेश सरकार यह कहकर नहीं बच सकती कि भाजपा ने दंगा कराया। हो सकता है कि यह सच हो कि सपा सरकार को अस्थिर करने के लिए ऐसा भाजपा ने किया हो, लेकिन इससे यह सच नहीं बदल जाता कि सपा सरकार दंगों को काबू में करने के लिए नाकाम रही।

ऐसा भी नहीं है कि सरकारें मुसलमानों का भला नहीं करना चाहतीं। चाहती हैं, लेकिन मुसलमानों के लिए जो योजनाएं लाई जाती हैं, उन पर अमल ठीक ढंग से नहीं किया जाता। यह कड़वा सच है कि नौकरशाही का सांप्रदायिक वर्ग उन पर अमल करना नहीं चाहता। दूसरे, अशिक्षा की वजह से मुसलमान उनका फायदा भी नहीं उठा पाते। यही वजह है कि योजनाओं का बहुत पैसा इस्तेमाल नहीं होता और वह वापस हो जाता है। मुसलिम रहनुमा भी कम काहिल और मौकापरस्त नहीं हैं। ऐसे मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री बहुत कम हैं, जो मुसलमानों की बुनियादी जरूरतें भी पूरी करा पाते हैं। उनका काम महज अपनेऔर अपने परिवार का भला करने का होता है। देश के किसी भी शहर के मुसलिम बाहुल्य क्षेत्रों को देख लीजिए, सब बदहाल मिलेंगे। सरकारी स्कूल और अस्पताल तो वहां देखने को भी नहीं मिलते। सार्वजनिक बैंक अपनी कोई शाखा मुसलिम क्षेत्रों में खोलने के लिए तैयार नहीं है। 

इसके विपरीत मुसलिम विधायक, सांसद या मंत्री की संपत्ति में बेहतहाशा बढ़ोतरी होती जाती है। वे अपने क्षेत्र के विकास कराने में भी अक्षम हैं। मुसलमानों की सबसे बड़ी समस्या उनका नेतृत्वहीन होना है। बंटवारे की मार को आज तक झेल रहे मुसलमानों के सामने नेतृत्व का संकट भी है। उन्होंने कभी नेहरू को अपना कायद माना, तो कभी इंदिरा गांधी को और कभी विश्वप्रताप सिंह को। लेकिन उनकी बदहाली नहीं बदली। ऐसे अगले साल का लोकसभा चुनाव भारतीय मुसलमानों के लिए कड़ी चुनौती है। एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं, जिन्हें मुसलमान किसी सूरत अपनाने तैयार नहीं हैं, तो दूसरी और वे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल हैं, जिन्होंने कभी उन्हें वोटबैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा। यह बड़ी अजीब विडंबना है कि देश की 100 से ज्यादा लोकसभा सीटों को प्रभावित करने वाले मुसलमान दोराहे पर खड़े हैं। उन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है।

30 December 2013

आम आदमी की सियासत !

कांग्रेस और भाजपा की पारंपरिक राजनीति से उकताई हुई जनता की बदलाव की आकांक्षा के दम पर आखिरकार अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए हैं। एक अलग किस्म की राजनीति करके एक अलग किस्म का इंसान राजनीति की सीढ़ी पर चढ़ता चला गया और सबको भौंचक्का करते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच गया। ऐसा इंसान भले ही खुद को 'आम आदमी' कहता रहे, साधारण आदमी तो वह नहीं है। एक व्यक्ति जिसके राजनैतिक दल का पंजीकरण हुए अभी महज एक साल हुआ है, 125 वर्ष से भी अधिक पुरानी पार्टी के उपाध्यक्ष को यह कहने पर मजबूर कर देता है कि हमें उनके (केजरीवाल) तौरतरीकों से सीखने की जरूरत है।

क्या यह अविश्वसनीय नहीं लगता? रातोंरात एक व्यक्ति अपनी छोटी सी टीम, राजनैतिक चातुरी और संकल्प के दम पर युवा वर्ग के साथ तालमेल बिठाने और दूसरे नागरिकों के मन में उम्मीद जगाने में सफल रहता है। धनबल, बाहुबल, पेड न्यूज और चुनावी अनियमितताओं की पारंपरिक चुनौतियों को वह जन-समर्थन के बल पर धराशायी करता है। न बड़े-बड़े प्रतिद्वंद्वियों के हमलों से विचलित होता है और न उमड़ते जन-समर्थन के उन्माद में आता है। वह लगातार जमीन से जुड़ा रहता है और सकारात्मक बात करता रहता है। राजनीति की चालों का जवाब उसी अंदाज में देते हुए आखिरकार वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुँच जाता है। क्या यह कहानी बच्चों की किसी पत्रिका में छपने वाली परीकथा जैसी प्रतीत नहीं होती? अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों की कहानी कुछ-कुछ इसी अंदाज में घटित हुई है- राजनैतिक दिग्गजों, मीडिया के विश्लेषकों और चुनाव विशेषज्ञों को किसी नींद से जगाती हुई।

दिल्ली के नए मुख्यमंत्री सादगी से जीवन बिताना चाहते हैं। चर्चा गरम है कि यह उनका नया शिगूफा है। लेकिन वास्तविकता क्या है, क्या नहीं, इसका फैसला कोई और कैसे कर सकता है। सिर्फ अरविंद ही जान सकते हैं कि जो राजयोग लगभग हर व्यक्ति का सपना है, उसके प्राप्त होने पर वे उस ऐश्वर्य से दूर क्यों रहना चाहते हैं जो उनका स्वाभाविक अधिकार है? क्या वे इससे कहीं बड़ी कुर्सी पर निगाह लगाए हुए हैं? जितने मुँह, उतनी बातें। अरविंद केजरीवाल के मन में क्या है, इसका अनुमान मुझ जैसे वे लोग नहीं लगा सकते जो 'राजनेता' की एक खास किस्म की छवि, एक खास किस्म के खाँचे को देखते रहने के आदी हो चुके हैं। भारतीय राजनीति में ऐसा कब होता है जब किसी पार्टी का प्रमुख चुनाव से पहले यह कह दे कि अगर उसके खिलाफ आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो पार्टी अपने सारे उम्मीदवार हटा लेगी? और यह भी कि अगर मैं भ्रष्ट सिद्ध होता हूँ तो मुझे उससे दोगुनी सजा दी जाए जो कानून के तहत बनती है। राजनीति के पारंपरिक विश्लेषण का स्वाभाविक निष्कर्ष यह माना गया कि अरविंद दिल्ली में सरकार नहीं बनाएंगे और दोबारा चुनाव के हालात बनाना पसंद करेंगे ताकि उनकी पार्टी साफ बहुमत लेकर सत्ता में लौट आए। लेकिन राजनीति की चालें चलने में माहिर हो चुके अरविंद केजरीवाल ने मतदाताओं के साथ संपर्क अभियान चलाने के बाद सरकार बनाने की घोषणा करके हमें फिर चौंकाया। इसे देखकर इतना तो तय है कि इस इंसान को खोने का डर नहीं है। और जिस चुनौती से बच निकलने का आरोप उन पर प्रतिद्वंद्वी लगा रहे थे, उसे स्वीकार करने के लिए वह मानसिक रूप से तैयार है।

आम धारणाओं से अलग

अब जो धारणा बन रही है, वह यह कि अरविंद कुछ ही दिन में ऐसे फैसले करेंगे जिनसे कांग्रेस नाराज होगी और अपना समर्थन वापस ले लेगी। नतीजा? सरकार गिरने की तोहमत कांग्रेस पर आएगी और चुनावों में लाभ आम आदमी पार्टी को होगा। बहरहाल, शायद ऐसा सोचकर हम अरविंद केजरीवाल नाम की इस अनूठी राजनैतिक परिघटना का सामान्यीकरण कर रहे हों। शायद वे इस अपेक्षित घटनाक्रम से एकदम अलग कोई कदम उठाएँ! आखिर यह विश्वास कर लेने में क्या बुराई है कि अरविंद केजरीवाल संजीगदी के साथ दिल्ली की सरकार चलाना चाहते हैं। व्यावहारिक या अव्यावहारिक, जितने भी चुनावी वायदे उन्होंने किए, उनके क्रियान्वयन का सिलसिला वे शुरू करना चाहते हैं। अगर वे ऐसा कर सके तो आम आदमी पार्टी की साख और मजबूत होगी, जिसकी उसे जरूरत है अपनी राष्ट्रीय उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए। आखिरकार यहाँ एक ऐसी पार्टी है, जिसका इतिहास महज सवा साल पुराना है और इतने से वक्त में वह एक राज्य में सत्ता में आ चुकी है तथा अब अपना प्रसार दूसरे राज्यों तक करना विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी और इस दौरान उनकी साख पर सवाल उठेंगे। दिल्ली की सरकार के अच्छे, सकारात्मक काम यह साख पैदा करने में यकीनन मदद करेंगे।

दिल्ली की सरकार चलाना कोई छोटी चुनौती नहीं है- और वह भी एक ऐसी पार्टी के लिए जो आमूलचूल बदलाव की बात करती है, जो भ्रष्टाचार के समापन की बात करती है। अच्छा-खासा सरकारी अनुभव पा चुके अरविंद इस बात से कतई अनजान नहीं होंगे कि उनके सामने मौजूद चुनौतियाँ छोटी नहीं हैं और किसी एक दिशा से नहीं आतीं। केंद्र सरकार ने जिस तरह उनके शपथ ग्रहण के दो दिन पहले एलएनजी (गैस) के दाम बढ़ाए, उससे इन चुनौतियों का अनुमान लग जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री को केंद्र सरकार के आर्थिक, प्रशासनिक और राजनैतिक सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह पूर्ण राज्य नहीं है। यहाँ मुख्यमंत्री के अधिकार बहुत सीमित हैं। लेकिन जनता की उम्मीदों का कोई पारावार नहीं। क्या कांग्रेस का बाहरी समर्थन केंद्र सरकार द्वारा मिलने वाले सहयोग में भी परिणित होगा? उम्मीद बहुत कम है।

बाधाएँ कई दिशाओं से

केंद्र का रवैया नई सरकार के लिए एक बड़ी बाधा सिद्ध होने वाला है। लेकिन उससे भी बड़ी समस्या उस अफसरशाही की तरफ से आएगी, जिसका श्री केजरीवाल को खासा अनुभव है। वे निरंतर कहते रहे हैं कि यह वर्ग आम आदमी के दिए करों पर पलता है लेकिन इस पर आम आदमी का कोई नियंत्रण नहीं है। यह वर्ग उसके साथ मालिक के रूप में पेश आता है जबकि वास्तव में इस वर्ग की नौकरी और आमदनी आम आदमी की बदौलत आ रही है। भारत की अफसरशाही एक बेहद सुरक्षित लौह-आवरण में लिपटी है और सरकार भले ही किसी भी दल की आए, वास्तविक शासक यही अधिकारी वर्ग है। जरा सा छूने पर वह बिफर उठती है। एकजुट हो जाती है और असहयोग करने लगती है। श्री केजरीवाल किस चतुराई से इस वर्ग से निपटते हैं और भ्रष्ट तत्वों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए भी अपने जरूरी एजेंडा का पालन करवाने में कामयाब होते हैं, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। देवयानी खोबरागड़े का मामला देखिए। इससे पहले कितने छोटे-बड़े व्यक्तित्वों के साथ अमेरिका में बदसलूकी हुई लेकिन जब एक आईएफएस पर आँच आई तो हमारा राजनयिक समुदाय किस कदर एकजुट तथा आक्रामक हो गया? बात दो देशों के बीच गंभीर मतभेदों के स्तर तक आ पहुंची है। इस बात से कोई इंकार नहीं कि देवयानी के साथ अमेरिका में जो भी हुआ, गलत हुआ। लेकिन फ़र्ज कीजिए कि अगर देवयानी की जगह कोई आम आदमी या फिर कोई गैर-आईएफएस खास आदमी भी होता तो क्या बात इतनी आगे बढ़ती?

कांग्रेस और भाजपा के लिए आम आदमी पार्टी की सरकार को पचाना आसान नहीं होगा। अरविंद केजरीवाल को मानकर चलना चाहिए कि उन्हें दोनों तरफ से भरपूर चुनौती मिलेगी। विधायी कार्यवाहियाँ आसान नहीं सिद्ध होने वाली। आखिरकार दोनों तरफ लक्ष्य स्पष्ट है। दिल्ली पुलिस राज्य सरकार के अधीन नहीं है। अगर दिल्ली में फिर कोई गड़बड़ी होती है तो तोहमत नई सरकार पर आएगी, भले ही कानून-व्यवस्था पर उसका नियंत्रण न हो। उसी तरह, जैसे शीला दीक्षित सरकार पर आती थी। लेकिन पहले स्थिति अलग थी, अब स्थिति अलग है। दिल्ली में विकास कार्यों पर प्रदेश सरकार का एकाधिकार नहीं है। शहर की देखरेख और विकास का जिम्मा पाँच तरह के स्थानीय निकायों के हाथ में है। उसके बाद आती है दिल्ली सरकार। लेकिन तीनों दिल्ली नगर निगमों का नियंत्रण भाजपा के अधीन है। दिल्ली के नागरिक के सामने यह स्पष्ट नहीं है कि कौनसा काम नगर निगम का है और कौनसा प्रदेश सरकार के जिम्मे आता है। नई सरकार को न सिर्फ काम करना है बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि नगर निगमों के प्रति उभरने वाले आक्रोश का परिणाम कहीं आम आदमी पार्टी को न झेलना पड़े। एक शक्तिहीन सरकार को चलाना आसान नहीं है। वह भी जब जनता की अपेक्षाएँ आसमान छू रही हों और आपकी टीम के पास अनुभव नहीं हो। टीम केजरीवाल के इरादों पर शक नहीं किया जा सकता। उसने नतीजे सामने लाकर रख दिए हैं। संकल्प भी साफ दिखाई देता है और महत्वाकांक्षा भी। लेकिन उन्हें प्रशासनिक अनुभव की कसौटी पर कसा जाना बाकी है। ईश्वर करे, सपने जैसे इस घटनाक्रम का दुखान्त न हो। इसके साथ दिल्ली और भारत के सकारात्मक सोच वाले नागरिकों की उम्मीदें जुड़ी हैं।

आम आदमी पार्टी की अग्नि परीक्षा !

सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीतिक बने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है। चूंकि वे सिर्फ दिल्ली ही नहीं देश की जनता की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लिहाजा वे तलवार की धार पर हैं। अब दिल्ली की राजनीति में घटित होने वाली छोटी से छोटी घटनाओं पर भी देश की निगाहें रहेंगी तथा सवाल उठते रहेंगे। पहला सवाल है क्या अरविंद केजरीवाल जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति की अवधारणा को राजनीति में पुनर्स्थापित कर पाएंगे? 

इसका थोड़ा-बहुत जवाब अगले वर्ष मई-जून में होने वाले लोकसभा चुनाव से मिल सकेगा जब केजरीवाल की आम आदमी पार्टी मुम्बई, दिल्ली, एनसीआर और हरियाणा में जोर-आजमाईश करेगी। पूरा जवाब पाने के लिए हमें कुछ और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनावों का इंतजार करना पड़ेगा। क्योंकि आप की राजनीतिक शक्ति का सही-सही आकलन तभी हो पाएगा लेकिन यदि दिल्ली राज्य विधानसभा के चुनावों को आधार मानकर कोई राय कायम करने की जरूरत महसूस होती हो तो यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि आप ने देश में नई राजनीतिक क्रांति की आधारशिला रख दी है। दिल्ली चुनावों में चमत्कार की उम्मीद तो ‘आप’ को थी लेकिन चमत्कार इतना विराट होगा, उसकी कल्पना न तो पार्टी के प्रबुद्धजनों को थी और न ही देश की जनता को। लेकिन चमत्कार हुआ, जबर्दस्त हुआ। ‘आप’ ने बरसों से चली आ रही मठाधीशी राजनीति की चूलें हिला दीं। एक वर्ष के अल्प समय में कोई पार्टी एक राज्य की सत्ता पर काबिज हो जाए, देश के राजनीतिक इतिहास की अनहोनी और हैरतअंगेज घटना है। प्रादेशिक परिदृश्य से उभरने वाली अनेक राजनीतिक पार्टियां दशकों से अपने देशव्यापी अस्तित्व के लिए छटपटा रही हैं लेकिन अब तक किसी को भी यह मकाम हासिल नहीं हुआ।

बीते तीन दशक को देखें तो केवल कांशीराम ही ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने दम पर बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया और उसे एक राज्य में सत्ता की दहलीज तक पहुंचाया लेकिन दिल्ली फिर भी दूर रही। कांशीराम की राजनीति और केजरीवाल की राजनीति में कोई तुलना नहीं हो सकती। कांशीराम ने जातीयता का विष फैलाकर अपनी राजनीतिक जड़ें कुछ राज्यों विशेषकर उ.प्र. में मजबूत की जबकि केजरीवाल ने जाति और धर्म से परे आम आदमी की पीड़ा को देखा-समझा और उनकी आवाज बनने की कोशिश की। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टियों की तथाकथित लोकशक्ति को लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती दी और साबित कर दिया कि उनकी राजनीति, जन-आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरती। स्वार्थपरक एवं आत्मकेन्द्रित राजनीति से जनता ऊब चुकी है और अब इन पाटिर्यों से उसका भरोसा टूटता जा रहा है। ‘आप’ ने जनता को इसी असंतोष को समर्थन और विश्वास का बाना पहनाकर अपने कंधे पर बैठा लिया है। दिल्ली के नतीजे इसका प्रमाण हैं।

आम आदमी पार्टी परंपरागत राजनीति के चरित्र और प्रकृति से हटकर है। वह अपने नए और अद्भुत राजनीतिक प्रयोगों के लिए मशहूर है। दिल्ली में सरकार बनाने के पूर्व उसने जनता से रायशुमारी की। यह अनूठी घटना है क्योंकि इसके पूर्व सरकार बनाने के लिए ऐसी पहल किसी पार्टी ने नहीं की और न ही इस बारे में कभी सोचा जबकि केन्द्र एवं राज्यों में अल्पसंख्यक सरकारें बनी-बिगड़ी हैं। ‘आप’ ने राजनीति में स्थापित मान्यताओं को न केवल ध्वस्त किया वरन् नई राह बनाई जो सीधे आम आदमी के दरवाजे तक जाती है। उसने आम आदमी की वे समस्याएं उठाई जिनसे उनका रोजाना साबका पड़ता है यानी सड़क, नाली, बिजली, पानी और स्थानीय प्रशासन से जुड़े अन्य काम। वस्तुत: ये समस्याएं समूचे देश की समस्याएं हैं तथा आमतौर पर इन्हें नगरीय संस्थाओं के चुनाव से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यदि कोई राजनीतिक पार्टी इन्हीं मुद्दों पर राज्य विधानसभा का चुनाव जीत जाए तो यकीनन अनहोनी घटना है। हालांकि दिल्ली में आप की जीत के पीछे अन्य कई कारण हैं। राजनीति की विद्रूपताओं से तंगहाल जनता बदलाव चाहती थी, उसे बेहतर विकल्प की तलाश थी जो ‘आप’ के रूप में पूरी हुई। उसे ‘आप’ में अपना अक्स नज़र आया। ‘आप’ की सफलता का यही सबसे बड़ा कारण बना। चूंकि ‘आप’ ने अब लोकसभा चुनाव लड़ने का भी इरादा जाहिर कर लिया है तब यह सवाल उठता है कि क्या आम चुनाव में भी उसे ‘दिल्ली’ जैसी सफलता मिल पाएगी? लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में क्या स्थानीय मुद्दे इतने प्रभावी होंगे कि उसे चुनाव जीता दें? क्या राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक मुद्दे परिदृश्य से बाहर चले जाएंगे या गौण हो जाएंगे? देश की जनता क्या सोचकर ‘आप’ को वोट करेगी? इन सवालों का लोकसभा चुनावों में जवाब तो मिल जाएगा लेकिन क्या अभी इस बारे में कोई दावा किया जा सकता है कि ‘आप’ देश की राजनीति को पूरी तरह से बदल देगी? हां और ना के बीच देश की राजनीति में यह सवाल गूंजने लगा है।

बहरहाल ‘आप’ ने बड़ा कारनामा कर दिखाया है। उसके नेता आम बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। केजरीवाल का सरकारी आवास एवं विशेष सुरक्षा को ठुकराना व अन्य सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार करना एक आम आदमी की सोच को दर्शाता है। उनका सहज, सरल व्यक्तित्व तथा ईमानदार राजनीति पर चलने का संकल्प यद्यपि देश की जनता को लुभाता है लेकिन यह देखने की बात है कि ‘आप’ के प्रयासों से राजनीति का शुद्धिकरण कितना हो पाएगा? बड़े ओहदों पर रहने के बावजूद आमजनों के बीच घुल-मिलकर रहने वाले सादगी पसंद नेताओं की देश में कमी नहीं है। कई नाम गिनाए जा सकते हैं। मसलन त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार, प.बंगाल की ममता बेनर्जी, गोवा के मनोहर पर्रिकर, प.बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, केन्द्रीय मंत्री ए.के.एंटनी आदि। लेकिन ये नेता राजनीति की धारा को नहीं बदल पाए। गंदगी साफ नहीं कर पाए। अब केजरीवाल कितना कुछ कर पाते हैं, यह दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से स्पष्ट हो जाएगा।

आम आदमी की जीत के मायने !

मौजूदा राजनीतिक हालात में आम आदमी पार्टी का उभार एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। यह सच है कि इस देश के अधिसंख्य लोग सत्ता और दल की यथास्थितिवादी, बाँझ और भ्रष्ट राजनीति से आजिज़ आ चुके हैं। इसलिए लोगों को अगर कोई विकल्प नज़र आता है, तो उसे चुनावों में वे वोट देना और जिताना पसंद करते हैं। अब तक का अनुभव यह भी रहा है कि विकल्प ज़्यादातर आभासी वर्चुअल रहे हैं और कई मामलों में वे उनसे भी बदतर साबित हुए हैं जिनके विकल्प के रूप में लोगों ने उन्हें चुना था। 

पिछले वर्षों में दो आंदोलन चले थे- एक बाबा रामदेव का आंदोलन जो विदेशों में जमा काला धन वापस लाने की बात कर रहा था और दूसरा अण्णा का आंदोलन जो सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ जन लोकपाल बनवाने के लिए अड़ा था। पहला आंदोलन पूरी तरह ख़त्म हो गया और उसके अगुआ  स्वामी रामदेव अब भाजपा द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के पैरोकार बन गये हैं। दूसरा आंदोलन (इंडिया अगेंस्ट करप्शन) सिविल सोसाइटी समूहों यानी गै़र सरकारी संगठनों द्वारा खड़ा किया गया था। इनकी फंडिंग विदेशी एजेंसियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जा रही थी। आंदोलन के एक धडे़ ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में एक राजनीतिक दल की शक्ल अख़्तियार किया और आदमी पार्टी अस्तित्व में आ गयी।

हाल ही में संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से उसका नेतृत्व करने वाले अत्यंत उत्साहित हैं और उन्होंने यह ऐलान कर दिया है कि अब कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक झाड़ू चलेगी। कह़ने का मतलब यह है कि आने वाले लोकसभा चुनावों और उसके साथ होने वाले विधानसभा चुनावों में वे मतदाताओं के बीच जायेंगे। उन्होंने समाज के हर वर्ग के ‘अच्छे लोगों’ से अपील की है कि वे ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) में शामिल हों और यहाँ तक कि उन्होंने उद्योग यानी कॉरपोरेट जगत् के लोगों को भी पार्टी में आने का न्यौता दिया है। समाजकर्म, आंदोलन, एनजीओ, राजनीतिक दल, कॉरपोरेट समूह या किसी पेशे से जुड़े अच्छे और ईमानदार ‘आम आदमियों’ के लिए ‘आप’ के दरवाजे खुले हैं।

स्वराज और सुशासन दो अलग-अलग चीजें हैं। स्वराज के लिए बुनियादी शर्त है कि मौजूदा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन हो। पूर्ण स्वराज का जो संकल्प 26 जनवरी, 1930 को रावी नदी के तट पर हमारे पुरखे स्वाधीनता सेनानियों ने तत्कालीन काँग्रेस के बैनर तले पारित किया था वह आज भी प्रासंगिक है। उस समय वे ब्रितानी साम्राज्य द्वारा प्रवर्तित उपनिवेशवाद के खि़लाफ़ लड़ रहे थे और आज हमारे सामने चुनौती है कॉरपोरेट-नीत भूमण्डलीकरण की। भूमण्डलीकरण की ताक़तें सुशासन का नारा ज़ोर-शोर से लगा रही हैं। 

सुशासन यानी गुड गवर्नेंस पर तो सबसे ज़्यादा ज़ोर विश्व बैंक ही दे रहा है। वह यह चाहता है कि भूमण्डलीकरण का अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो। हाँ! भूमण्डलीकृत व्यवस्था के अन्तर्गत हर देश में ऐसे लोग सत्तारूढ़ हों जो लोगों को तथाकथित सुशासन दे सकें! शासन-व्यवस्था बेहतर ढंग से चले, इसका आशय यह है कि विदेशी पूँजी निवेश के लिए अच्छा माहौल बने, कॉरपोरेट-संचालित विकास के मॉडल का रोड रोलर लोगों को रौंदता हुआ निर्बाध चलता रहे, निवेशकों के लिए कारगर एकल खिड़की निस्तारण व्यवस्था हो जो पारदर्शी रूप में तेज़ी के साथ चले और जिसमें बंदिशों के लिए कोई गुंजाइश न हो यानी कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सब तरफ़ से पूरी तरह खुला हो। हाँ! गरीबों, कमज़ोर तबके के लोगों और वंचित जनों के लिए थोड़ी-बहुत राहत का काम मुस्तैदी के साथ चलाया जाय जिससे भूमण्डलीकरण का चेहरा मानवीय दिखे। जिन देशों में हर संभव कोशिश के बाद भूमण्डलीकरण की ताक़तें ऐसा सुशासन नहीं ला पातीं उन्हें ‘विफल राज्य’ या ‘दुष्ट राज्य’ घोषित कर दिया जाता है और वहाँ हुकूमत-बदली या तख़्ता पलट की कार्यवाहियाँ की जाती हैं। इसलिए तथाकथित सुशासन यथास्थितिवाद से टक्कर नहीं ले पाता।

आम आदमी पार्टी के एजेंडे में स्वराज्य की स्थापना का संकल्प या सपना बिल्कुल भी नहीं है। हाँ! उसमें स्वराज्य लाने का स्वाँग भर ज़रूर दिख रहा है। दरअसल उसका सारा ज़ोर सुशासन लाने पर ही है। इधर भूमंडलीकरण की ताक़तों का मोहभंग राजनीतिक दलों और उनके द्वारा नियंत्रित या संचालित सरकारी ढाँचों से होता गया है। उन्होंने अब दलतंत्र के स्थान पर सिविल सोसाइटी को तरजीह देना शुरू कर दिया है।

उनकी कोशिश है कि सिविल सोसाइटी समूह यानी गै़र सरकारी संगठन राजनीतिक पटल या स्पेस में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करें। ऐसा चलन आम हो गया है कि भूमण्डलीकरण के दबाव में सरकारें सिविल सोसाइटी समूहों को अपनी सलाहकार परिषदों में मनोनीत करने पर मज़बूर हो गयी हैं जिससे राहत के कार्यक्रमों का स्वाँग भलीभाँति किया जा सके यानी अनर्थकारी नीतियाँ लागू होती रहें लेकिन मानवीय चेहरे के साथ। ‘विष रस भरा कनक घट जैसे’ वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है।

देश की संसद में जाने के लिए कटिबद्ध आम आदमी पार्टी का रुख़ किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर एकदम साफ़ नहीं है। भूमि अधिग्रहण, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, कॉरपोरेट समूह/घराने, एफडीआई/एफआई आई, खनन, नाभिकीय संयंत्र, मेगा औद्योगिक या व्यावसायिक व इन्फ्रास्ट्रक्चरल परियोजनाएँ, जनविरोधी आर्थिक नीतियाँ, किसानो व बुनकरों की आत्महत्या, रोज़गार सृजन जैसे अहम सवालों पर मुखर रूप में यानी स्पष्ट तौर पर आम आदमी पार्टी कुछ भी कहने से परहेज़ करती है। इन बुनियादी बिंदुओं को केंद्र में रखकर जगह-जगह तृणमूल स्तर पर जो जन आंदोलन चल रहे हैं, उनके साथ ‘आप’ की पक्षधरता संदिग्ध है। हाँ! उन आंदोलनों से जुड़े समाजकर्मियों को सत्ता की लालच दिखाकर उन्हें अपनी ओर मोड़ने की कोशिश ज़रुर जारी है।

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ‘आप’ विकल्प बिल्कुल नहीं है। हाँ! अभी वह कमतर बुराई ज़रूर है। यह बात ध्यान में रखने की है कि बुराई की प्रवृत्ति हमेशा अधिकतम की ओर उन्मुख होने की दिशा में होती है। ठंडा लोहा पीटने से विकल्प नहीं तैयार होगा। वह खड़ा होगा स्वतः स्फूर्त जन आंदोलनों के ताप से। आंदोलनों के सामने चुनौती है कि वे कैसे धारा के विपरीत खड़े होकर राजनीतिक विकल्प निर्माण की दिशा में संघर्षरत रह सकते हैं। आंदोलनों के ताप से ही विकल्प गढ़ा जा सकता है। विकल्प का मूल आधार लोकशक्ति होगा। नया नेतृत्व भी आंदोलनों के जरिये तैयार होगा।

29 December 2013

भारत में बिजली संकट !

आओं जलाये दीप वहां जहां अभी भी अंधेरा है। इस अभियान में आप भी जुड़ कर कम से कम एक परिवार को अंधेरे से निकाल कर रौशनी की ओर लाने में भागीदार बन सकते हैं। आज भारत की स्वतंत्रता के 66 साल बीत गए हैं। इसके बाद भी देश की एक अरब 20 लाख आबादी के आधे से ज्यादा लोगों को अभी बिजली नहीं मिल सकी है। असम, बिहार, पूर्वोतर, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश में देश की 40 प्रतिशत जनसंख्या रहती है। मगर आज तक इन राज्यों के गा्रमिण क्षेत्रों में लाखों लोगों ने रातों में उजाले की सफेदी नहीं देखी। 

मगर आज सौर्य उर्जा से लोगों में एक नई उम्मीद की किरण जगी है। बिजली संकट इतना गंभीर है कि गाँव तो क्या शहरों में भी भारी कटौती हो रही है। हालत ये है कि शहरों में गगनचुंबी मॉल्स भी अपनी बिजली का इंतजाम करने के लिए सौर्य उर्जा की ओर अपना कदम आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में हालत अब भी बदतर है। कई राज्यों की स्थिति यह है कि अभी गाँवों तक बिजली ही नहीं पहुँची है। जहाँ बिजली पहुँच भी गई है वहाँ कभी कुछ घंटों के लिए ही बिजली आती है। कई इलाके में तो बिजली के खंभे तो जरूर लगे हैं लेकिन वहां बिजली की गारंटी कोई नहीं दे सकता। तो कई जगह ऐसे भी हैं जहा बिजली के खंभे तो दिखाई देते हैं मगर उसके उपर आज तक तार नहीं पहुंची। मगर खंभे पर तार के इंतजार में एक नई पीढ़ी जवान हो गई।

तो सवाल ये है कि बिजली की ऐसी विकट समस्या के रहते हुए क्या भारत वास्तव में महाशक्ति बन सकता है? 21वीं सदी में बिजली के बिना विकास भी नामुमकिन है। भारत में फि लहाल 170,000 मेगावॉट से ज्यादा बिजली की उत्पादन क्षमता है और बिजली की वार्षिक मांग चार फीसदी दर से बढ़ रही है। ऐसे में इसे पूरा करना टेढ़ी खीर के समान है। ऐसे में अगर देश से अज्ञानता, असमानता और बेरोजगारी को मिटाना है तो गाँव और शहरों में सौर उर्जा ही एक मात्र स्थायी विकल्प नज़र आरहा है। 

देश में आज कई गांव ऐसे भी है जहा पर बिजली नहीं आने से गांव में दुल्हन के पांव पड़ने बंद हो गए हैं। बिजली नहीं होने के कारण लोग इन गांवों में अपने बिटिया की ब्याह तक नहीं करते हैं। देश में आज सरकार भोजन और रोजगार गारंटी की बात तो करती है मगर नई पीढ़ी को रौशनी के बिना सिक्षा कैसे मिलेगी अभी तक इसके बारे में कोई सोचने को तैयार नहीं हैं। गांव-गांव बिजली पहुंचाने के लिए सरकार ने 80 के दशक में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना कार्यक्रम शुरू किया था। लेकिन भ्रष्टाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण यह योजना खटाई में पड़ गई। मगर सरकार गांवों में झुठी ढोल पीट कर वोट लेने में जरूर सफल रही।

आज एक लीटर पेट्रोल के इस्तेमाल से वातावरण में चार किलो कार्बन डाइऑक्साइड पहुंचती है। ऐसे में 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में चार फीसदी की कमी करने की जरूरत होगी। ताकी वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बनी रहे। आज भारत विश्व में छठा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता राष्ट्र बन चुका है। तो ऐसे में आईये हम सब मिल कर जलाये दीप वहां जहां अभी भी अंधेरा है।

भारत में बिजली संकट

  • देश में एक लाख से अधिक गांवों में रहने वाले करीब साढ़े तीन करोड़ लोग आज भी लालटेन युग में जी रहे हैं।
  • केन्द्र सरकार की राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना भ्रष्टाचार और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ठप पड़ा है।
  • भारत में इस समय 101,153 मेगावाट बिजली पैदा होरही है। जोकि जरूरत से 13,000 मेगावाट कम है।
  • एक लीटर पेट्रोल के इस्तेमाल से वातावरण में चार किलो कार्बन डाइऑक्साइड पहुंचती है।
  • 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में चार फीसदी की कमी करने की जरूरत है।
  • 2050 तक अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 64 प्रतिशत करने की जरूरत है।
  • वैकल्पिक उर्जा प्रणालियों में निजी और सरकारी स्तर पर 2050 तक 6,10,000 करोड़ रूपये सालाना निवेश करने की जरूरत है।
  • इससे भारत को जीवाश्म ईंधन पर खर्च किये जाने वाले सालाना एक ट्रिलियन रूपये की बचत होगी।
  • इससे भारत रोजगार के 24 लाख नये अवसर भी पैदा कर सकेगा।
  • 2050 तक भारत की कुल उर्जा जरूरतों का 92 प्रतिशत प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त किये जा सकते हैं।
  • प्राकृतिक स्रोत से प्राप्त बिजली की कीमत 2050 में 3.70 रूपये प्रति यूनिट होगी।
  • देश में हर वर्ष लगभग एक अरब पैंतीस करोड़ मीट्रिक टन गोबर एवं पशु अपशिष्ट प्राप्त किया जा रहा है।
  • इसके माध्यम से बायोगैस उत्पन्न कर 75 फीसद से अधिक बिजली की पूर्ति की जा सकती है।
  • एशिया में चीन और जापान के बाद भारत तेल और गैस का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।
  • भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का कोयले से 33 .2 प्रतिशत, जल ऊर्जा से 1.2 प्रतिशत, गैस से 4.2 प्रतिशत, तेल से 22.4 प्रतिशत, परमाणु ऊर्जा से 0.8 प्रतिशत और सौर बायोमॉस व अन्य स्रोतों से 0.1 प्रतिशत उर्जा प्राप्त करता है।
  • प्रति व्यक्ति बिजली की खपत के मामले में कनाडा पहले नंबर पर है।
  • कनाडा में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 18541 है।
  • स्वीडन में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 16996 है।
  • अमेरिका प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में 13456 यूनिट है।
  • एशियाई देशों मे भी बिजली की खपत का औसत 1470 युनिट प्रति व्यक्ति है।
  • भारत में बिजली की खपत प्रति व्यक्ति सिर्फ 569 यूनिट है।
  • ग्यारहवीं योजना में बिजली के उत्पादन का लक्ष्य 80,000 मेगावाट रखा गया है।
  • 1994-95 में स्थापित क्षमता का 60 फीसदी ही उपयोग हो रहा था।
  • 2009-10 में यह बढ़कर 78 फीसदी हो गया है।

2013 को किस लिए याद किया जाएगा ? अलविदा 2013 !

साल 2013 का अंत होने जा रहा है। इस साल में अच्छे और बुरे दोनों तरह की घटनाए देखने को मिली मगर 2013 को किस रूप में याद किया जाएगा ये एक बड़ा सवाल है। तो आइये एक नज़र डालते है इन घटनाओं पर। राजनाथ सिंह निर्विरोध रूप से भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष चुन गये तो वहीं कांग्रेस ने अपने युवराज राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया। मगर कुछ ही दिन बाद कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2013 में कांग्रेस ने बीजेपी को राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया। तत्कालीन रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे पर 90 लाख रिश्वत लेने का आरोप लगा। जिसके बाद रेलवे रिश्वतकांड में फंसे रेलमंत्री पवन बंसल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। साथ ही कोयला घोटाले की आंच ने कानून मंत्री अश्विनी कुमार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। कांग्रेस नेता रशीद मसूद को 22 साल पुराने मेडिकल भर्ती घोटाले में दिल्ली की एक अदालत ने चार साल की सजा सुनाई। लालू प्रसाद को रांची स्थित सीबीआई अदालत ने चारा घोटाला मामले में पांच साल कारावास की सजा सुनाई। फिलहाल लालू यादव जमानत पर बाहर हैं।

नरेंद्र मोदी को बीजेपी की चुनाव समिति का प्रमुख बनाने पर जेडीयू भाजपा का 17 साल का रिश्ता टूट गया। मगर सितंबर में बीजेपी ने 2014 लोकसभा चुनावों के लिए नरेंद्र मोदी को अपना पीएम कैंडिडेट घोषित कर दिया। तो वहीं दुसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने दो साल से ज्यादा सजा पा चुके सांसद और विधायकों को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य और सदस्यता भी रद्द होने की फैसला सुना कर राजनीतिक हलकों में हड़कंप मचा दिया। इन सब उठा पटक बिच देश में पांच राज्यों के लिए हुए विधानसभा चुनावों में चार राज्यों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। वहीं दिल्ली में पहली बार चुनावी मैदान में उतरी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन कर कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाने में सफल रही। वहीं लोकपाल का इंतजार भी खत्म हो गया। आखिरकार नौ दिनों से चला आरहा अन्ना का अनशन रंग लाया और करीब 45 साल से लटका लोकपाल बिल संसद में 18 दिसंबर को पास हो गया।

2013 महज एक साल नहीं था ये वो वक्त था जो एक युग के गुजरने और दूसरे की शुरुआत का गवाह बना। क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से संन्यास ले लिया। मगर सबसे दुखद घटनाओं में से एक केदारनाथ में मची तबाही कभी ना मिटने वाले जख्म छोड़ गई। इस सब के अलावा साल 2013 कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का गवाह रहा। यूरोपीय देशों ने पाकिस्तानी किशोरी मलाला को सलाम किया। मलाला यूसुफजई को इस साल नोबेल पुरस्कार के लिए नॉंमिनेट किया गया। साथ ही सत्ता से बेदखल किए जाने के करीब 14 साल बाद नवाज शरीफ ने चुनाव जीता और तीसरी बार मुल्क के प्रधानमंत्री बने वहीं। वहीं पूर्व सीआईए कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन ने अमेरिका के इंटरनेट और टेलीफोन निगरानी कार्यक्रम का खुलासा करके दुनिया भर में तहलका मचा दिया। साथ ही रंगभेद के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष करने वाले पूर्व दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला इस साल दुनिया को अलविदा कह गए।

साल 2013 बिजनेस की दुनिया में भारी उथल-पुथल का साल रहा। इस साल जहां महंगाई ने रुलाया, वहीं सोने की कीमतों ने लोगों को खुश भी किया। मगर डॉलर के मुकाबले रुपये में भारी गिरावट आई। प्याज और टमाटर की कीमतों ने सबको रुलाया। प्याज के दाम 100 रुपये किलो तक पहुंच गए। वहीं फिल्मों कि दुनिया में कृष 3 ने 240 करोड़ रूपये की कमाई कर धूम मचा दिया। तो वहीं चेन्नई एक्सप्रेस ने रिलीज होने के चार दिन के अंदर ही 100 करोड़ रुपये की कमाई किए लिए थे। साथ ही हिंदी सिनेमा ने अपने 100 साल पूरे किए। वसंत विहार गैंगरेप कांड के चार दरिंदों को साकेत अदालत ने फांसी की सजा सुनाई। साथ ही बहुचर्चित मर्डर मिस्ट्री के मुख्य आरोपी और आरुषि के माता-पिता नूपुर तलवार और राजेश तलवार को दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट ने दो व्यस्कों के बीच सहमति से बने समलैंगिक रिश्ते को अपराध करार दिया। साथ ही लिव इन रिलेषनषीप को बैध ठहराया। सुप्रिम कोर्ट ने लाल बत्ती पर सख्ती बरतते हुए आदेश दिया कि इसका इस्तेमाल सिर्फ संवैधानिक पद पर बैठे लोग कर सकते हैं।

मोबाईल कि दुनिया में इस साल एप्पल व सैमसंग के स्मार्टफोन ने मोबाइल के बाजार में धूम मचा दी और अधिकतम मुनाफा इन्हीं दोनों की झोली में गिरा। 2013 में कई कारें भी लॉन्च हुई। छोटे पर्दे की दुनिया में धारावाहिक महाभारत खुब सुर्खिया बटोरी वहीं जोधा अकबर बिवादों में रहा। जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सैनिकों की मदद से उग्रवादियों द्वारा भारतीय जवान का सिर काटने की घटना और धन देने के पूर्व सेना प्रमुख के आरोप जहां सुर्खियां बने। वहीं संसद पर हमले के दोषी मोहम्मद अफजल गुरु को फांसी दी गई। ऐसे में सवाल ये खड़ा होता है कि 2013 को किस लिए याद किया जाएगा ?

27 December 2013

हिन्दुओं का हिन्दुस्तान में प्रवेश बंद कैसे ?

हिन्दुस्तानी हिन्दू सावधान! हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित! जमात कौंसिल का फतवा जारी!  अपने ही देश में हिन्दू हुए पराए! जी हां, तमिलनाडु के एक गाँव में जारी हुए फतवे में हिन्दुओं के लिए प्रवेश बंद कर दिया गया है। रामेश्वरम मंदिर के लिए प्रसिद्ध तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के कई मुस्लिम बहुल गाँवों में जमात कौंसिल ने फतवा जारी करके बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश निषेध का बोर्ड लगा दिया है। रामनाथपुरम महान संत श्री पम्बन स्वामी का भी क्षेत्र है जिन्होंने भाईचारे और प्रेम के साथ यहा पर सनातन परंपरा को जन जन तक पहुँचाया था।

अथियुत्हू, पुतुवालासी, पनईकुलम, सिथरकोटी जैसे कई मुस्लिम बहुल गाँवों में मुस्लिम जमात ताजुल इस्लाम संघ द्वारा नोटिस लगाया गया है। इतना ही नहीं इस गाँव में किसी भी प्रकार का पोस्टर-बैनर पंचायत की इजाज़त के बिना नहीं लगाए जा सकेंगे। पोस्टर पर साफ अक्षरों में लिखा है, यहा पर किसी भी प्रकार के कोई भी गैर-इस्लामिक गतिविधि स्वीकार नहीं है कि जाएगी।

ये उस अजाद मुल्क की दास्तान है जहा पर गंगा जमुनी तहजीब की गाथा सुनाई जाती है। जहां पर सर्वधर्म संप्रदाय एकता की बात होती है। मगर अब तो इस फतवे से लोग उस अकबरी सल्तनत से तुलना करने लगें हैं जहा पर न तो हिन्दूओं को मंदिरों में पूजा करने दी जाती थी और नहीं अकबरी हुकूमद बहुल्य क्षेत्र में हिन्दुओं को प्रवेश करने दिया जाता था।

रामनाथपुरम जिले की स्थानीय निवासी बताते हैं कि इस इलाके से पंचायत स्तर पर भी आज तक कभी कोई हिन्दू उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता है। मुस्लिम मुनेत्र कजगम के सांसद जवाहिरुल्लाह पर आरोप है कि वे भी इस फतवे का समर्थन कर रहे हैं। जवाहिरुल्लाह DMK और AIDMK को एक- एक बार समर्थन दे चुके है। मगर अपने आप को सेक्युलर बताने वाली दोनों पार्टिया इस घटना पर मौन है।

इस गाँव में हद तो तब हो जाती है जब हिन्दुओं को कोई व्यवसाय आरम्भ करने के लिए यहां के स्थानीय मुस्लमानों से अनुमति लेनी होती है। इस पूरे घटना क्रम को लेकर न तो प्रषाशन कोई कदम उठा रहा है और नहीं राज्य सरकार। सरकार चाहे DMK की हो या फिर AIDMK ये दोनों पार्टीयां मुस्लिम वोटों के लालच के चलते आँखें बंद की हुई है। तो सवाल ये है कि क्या वोट बैंक के लिए अपने ही देश में हिन्दुओं को पराये की तरह व्यवहार करना कट्टरवाद को बढ़ावा देना नहीं है।

2008 में द्रमुक जब सत्ता आया उस वक्त इस गांव में मुस्लिम युवकों ने राष्ट्र ध्वज के उपर चप्पल बांध कर तिरंगा फहराया था। ये घटना एक बार नहीं बल्कि कई बार दोहराई गई। राष्ट्र विरोधी कार्य करने बावजुज न तो इन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और नहीं किसी को जेल हुई। कांग्रेस विधायक हसन अली ने इस पूरे मामले को एक आम बात कह कर पल्ला झाड़ लिया था। वहीं मुख्यमंत्री जयललिता ने इस कट्टरवाद पर अब तक चुप है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि हिन्दुओं का हिन्दुस्तान में प्रवेश बंद कैसे ?

24 December 2013

गन्ना किसानों का दर्द !

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के गन्ना किसान सत्यपाल सिंह ने कुछ हजार रुपये के उधार के चलते आत्महत्या कर ली। गन्ना मिल के पास सत्यपाल का करीब 40 हजार रुपये बकाए थे, जो मिल ने नहीं चुकाए और उसने तंगहाली में आत्महत्या कर ली। इसके बाद मिलों के साथ हुए समझौते में केंद्र सरकार करीब 7200 करोड़ रुपये मिलों को दे रही है और वो भी बिना किसी ब्याज के और उत्तर प्रदेश सरकार ने भी 879 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मिलों को दी है, लेकिन सत्यपाल के परिवार को बेहद गरीबी की हालत से निकालने के लिए 20 लाख रुपये देने की मांग पर अभी तक यूपी सरकार खामोश है। साफ है कि मिल मालिकों के हितों की रक्षा ज्यादा जरुरी है, किसान मरता है तो मरता रहे।

पर ऐसा नही कि सिर्फ उत्तर प्रदेश में किसानों के हितैषी होने का दम भरने वाली राज्य सरकार ही ऐसी है, बल्कि पूरे देश में किसानों, खासकर करीब साढ़े चार करोड़ गन्ना किसानों की हालत दयनीय है। अभी तक उत्तर प्रदेश में दो गन्ना किसान और कर्नाटक में एक किसान आत्महत्या कर चुकें हैं और दो किसानों ने आत्मदाह का प्रयास किया है। यूपी ही नहीं कर्नाटक और महाराष्ट्र का गन्ना किसान भी आंदोलित है।

कर्नाटक में राज्य सरकार नया कानून लाने जा रही है जिसके तहत किसानों को 14 दिनों में उनका पैसा मिल जाएगा। लेकिन वहां का किसान भी आंदोलन कर रहा है, क्यों? क्योंकि नए कर्नाटक गन्ना अधिनियम 2013 के तहत किसानों के गन्ने का मूल्य फैक्टरी या मिल की हालत के अनुसार मिलेगा। यानी अगर किसी मिल में मशीने पुरानी हैं तो उसकी उत्पादन लागत अधिक हो सकती है तो उसी हिसाब से किसानों को गन्ने की कीमत मिलेगी। कर्नाटक का गन्ना किसान आंदोलन इसलिए कर रहा है क्योंकि मिलें अपने खातों में घालमेल करके नुकसान दिखाने में माहिर होती हैं और इस कारण किसान को गन्ने के अच्छे दाम मिलेंगे इस पर शंका है। और रही बात 14 दिनों में गन्ने के भुगतान करने की तो ऐसा न कर पाने की सूरत में मिल मालिकों को सजा का प्रावधान था, जिसे सरकार ने हटा लिया है। अब पूरी आशंका है कि समय पर भुगतान नहीं होगा।

यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझने की है कि अधिकतर राज्य सरकारें कांट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके की खेती को किसानों की सभी समस्याओं का हल मानती हैं। और कई राज्यों में कांट्रैक्ट फार्मिंग शुरू भी की गई है। पंजाब जैसे राज्य में कांट्रैक्ट फार्मिंग के बुरे परिणाम सामने आने लगे हैं लेकिन देश में सबसे पुरानी कांट्रैक्ट फार्मिंग की व्यवस्था, गन्ना किसानों के साथ मिलों की है और उसके विफल होने से कांट्रैक्ट फार्मिंग की पूरी अवधारण पर ही बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।

पूरे देश में ही देखें जहां-जहां गन्ना किसान है वहां- वहां कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर या अन्य मांगों को लेकर आंदोलन अभी भी थमा नहीं है। सरकार तो आम जनता की आवाज होती है। गरीब दबे-कुचले लोगों का सहारा होती है लेकिन सरकार का रुख तो उस मां कि तरह हो गया है जो अपने बच्चे को रुलाने वाले को ही दुलार रही है। देश में हर नीति कंपनियों, उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर ही बन रही है। असल में केंद्र सरकार एक रोचक खेल खेल रही है, चार साल तक कारपोरट्स की सेवा करो और अंतिम साल कभी मनरेगा या कभी खाद्य सुरक्षा बिल का चारा थोड़ा गरीबों के आगे भी डाल दो। और मध्यम वर्ग तो अपने संघर्षों में ही उलझा है उसे इसी में उलझाए रखो, कभी गैस सिलेंडर के दाम बढ़ा दो, कभी डीजल की मार और महंगाई का रोना तो अब आउट आॅफ फैशन हो गया है।

लेकिन सोचने वाली बात है कि देश जिसे अन्नदाता कहता है, और अब तो टीवी पर भी सदी के महानायक हमें अन्नदाता से मिलवाते हैं, वो अन्नदाता आज गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों में सबसे अधिक है। ऐसा क्यों है? क्यों गन्ना किसान जिसे कभी समृद्ध समझा जाता था आज आत्महत्या कर रहा है और उसका शोषण करने वाली शुगर मिलों के मालिक करोड़ोंपति से अब अरबपति बनने की ओर अग्रसर हैं। कई कारण हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है आधुनिक युग की ‘इकोनोमिक थ्योरी‘ यानी आर्थिक सिद्धांत। असल में कहा जाता है कि दुनिया की ‘इकोनोमिक थ्योरी‘ का आधार ‘ट्रिकल डाउन इफैक्ट‘ है यानी साहब लोगों का प्याला छलकेगा तो हम गरीबों को भी कुछ मिल जाएगा। लेकिन इन साहब लोगों का प्याला भरता ही नहीं तो छलकेगा कैसे। इस इकोनोमिक थ्योरी को लेकर दुनियाभर में सवाल उठने लगे हैं। जब आप अपनी नीतियां इस ‘ट्रिकल डाउन इफैक्ट‘ के आधार पर बनाते हैं तो फिर ये तो तय है कि आपकी हर नीति उस ‘ऊपर वाले‘ को ध्यान में रखकर बनेगी, जिसका प्याला भरने का हम बरसों से इंतजार कर रहे हैं और ऐसी नीति देश के गरीबों और किसानों का भला नहीं कर पाएगी। गन्ना किसानों के मामले में भी सरकार ने मिलों के बारे में ही सोचा।

उत्तर प्रदेश में क्या हुआ, गन्ने का पेराई सीजन 2013-14 शुरू हुए करीब दो महीने बीतने के बाद सरकार ने मिलों को तमाम रियायतें देने का वायदा किया और गन्ना किसान सत्यपाल सिंह की आत्महत्या के बाद चार दिसंबर के आसपास मिलें चालू की गईं। मिलों से कहा गया कि आपके नुकसान को देखते हुए गन्ने के दाम वहीं रहेंगे जो पिछले साल थे यानी 280 रुपये प्रति क्विंटल, जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार गन्ना उत्पादन की लागत 251 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है यानी लागत पिछले साल से 27 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ गई है। लेकिन इसे भी मिलें एकमुश्त नहीं चुकाएंगी, बल्कि शुरूआत में भुगतान 260 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से किया जाएगा और पेराई सीजन खत्म होने के बाद बाकी के 20 रुपये दिए जाएंगे।

गन्ना की फसल देर से काटने का प्रभाव भी गन्ना किसानों पर पड़ रहा है, उन्हे अगली फसल गेहूं के लिए खेत तैयार करने हैं इसलिए किसानों को मजबूरी में गन्ने को 110 से 140 रुपये प्रति क्विंटल के दामों पर कोल्हू में बेचना पड़ा। अगर राज्य सरकार भी समय पर एसएपी तय कर देती तो किसानों को कोल्हू वाले से ही 50 से 60 रुपये प्रति क्विंटल भाव अधिक मिल जाते, लेकिन किसानों के हित का दम भरने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार ने ऐसा नहीं किया। राज्य सरकार और मिल मालिकों की मिलीभगत पर इसके बाद कोई शंका नहीं रह जाती।

लेकिन केंद्र सरकार इसमें किसानों की मदद कर सकती थी और उसके लिए 1978 के एक द सुगर अंडरटेकिंग एक्ट कानून का सहारा लिया जा सकता था। 1978 में बने इस अधिनियम के तहत किसानों की मदद के लिए और मिल मालिकों की मनमर्जी पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार प्रबंधन को अपने कब्जे में ले सकती हैं, हालांकि राज्य सरकार भी 1971 में बने अधिनियम एक्ट नंबर 23 के तहत मिलों के अधिग्रहण की प्रक्रिया चालू कर सकती है, लेकिन शायद ऐसी उम्मीद उत्तर प्रदेश की सरकार और केंद्र सरकार से करना बेमानी होगा।

मजेदार बात है कि मिल चालू न करने के पीछे सबसे बड़ी वजह मिलों को हो रहे आर्थिक नुकसान की बताई जा रही है। मिलों का कहना है कि चीनी का भाव पिछले साल के 35 रुपये प्रति किलोग्राम से घटकर 30 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है, इसलिए उन्हे लगभग तीन हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। लेकिन अगर गहराई में देखें तो मौजूदा स्थिति में भी चीनी मिलों को नुकसान नहीं हो रहा है। अगर चीनी का भाव चीनी मिलों को 30 रुपये किलोग्राम भी मिलता है तब भी एक क्विंटल गन्ने से मिलों को उत्तर प्रदेश में नौ किलोग्राम चीनी, खोई, शीरा और मैली प्राप्त होते है। यानी कुल मिलाकर आमदनी करीब 400 रुपये की होती है। इसमें मिलें 50 रुपये प्रति क्विंटल खर्च निकाल भी दें, तब भी 350 रुपये गन्ने का भाव किसानों को दिया जा सकता है।

एक और उदाहरण से मिलों का झूठ सामने आ जाता है, बजाज चीनी मिल और धामपुर चीनी मिल के पास उत्तर प्रदेश में करीब 28 मिलें हैं, उनकी बैलेंस शीट के अनुसार लाभांश देने के बावजूद उनके कैश रिजर्व में क्रमशः 4,000 करोड़ रुपये व 1,100 करोड़ रुपये हैं, और बजाज मिल ने करीब 1,735 करोड़ रुपये और धामपुर ने लगभग 300 करोड़ रुपये अपनी निजी कंपनियों को ऋण दिया है।  मिल मालिकों का तो यह हाल है कि उच्च न्यायालय के 4 जुलाई 2013 के आदेश के बावजूद पिछले सीजन का किसानों का बकाया करीब 2,300 करोड़ रुपये भी वे नहीं चुका रही हैं।


इन मिल मालिकों की मनमानी पर तुरंत लगाम लगाते हुए सरकार को सख्त कदम उठाने चाहिए थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं और वो भी तमाम कानून होते हुए भी। मिलों के पास औसतन करीब 20 से 25 करोड़ रुपये तक बकाया है, अब सोचिए अगर सरकार कानून का लाभ लेकर करीब 500 करोड़ रुपये की मिल का अधिकरण करने की बात भी करती तो अगले दिन ही किसानों का बकाया भुगतान हो गया होता और पेराई चालू हो गई होती और सत्यपाल सिंह को जान न गंवानी पड़ती।

मिल मालिकों के हित की सरकारी सोच सी. रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट में भी नजर आती है जिसमें रंगराजन का भी झुकाव मिलों की तरफ ही दिखा था जैसे लेवी चीनी का कोटा समाप्त करने की सिफारिश आदि। और मिल मालिक रंगराजन कमेटी के सुझावों को लागू करवाने के लिए किसानों की बांह मरोड़ रहें हैं और अपने हित में सरकार से फैसले भी करा रहे हैं। अगर देश में चीनी का भंडार, खपत से अधिक है तो इसमें किसान का क्या दोष? किसान ने इस बार गन्ना कम लगाया है, फिर भी चीनी का उत्पादन करीब 250 लाख टन होने की उम्मीद है जबकि देश में खपत करीब 220 लाख टन चीनी की है। यानी इस बार भी चीनी का स्टॉक अधिक रहेगा और किसानों की मुसीबत आने वाले समय में और बढ़ेगी।

असल में देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी के केंद्र में किसान नहीं है। उत्तर प्रदेश के एक बड़े और तथाकथित किसान नेता ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मिल मालिकों की परेशानियों से अवगत कराया था। पत्र में कहा गया था कि चीनी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 40 से 60 फीसदी किया जाए, साथ ही चीनी मिलों को 4 से 5 वर्ष के लिए आसान शर्तों पर ऋण दिया जाए, जिसका ब्याज सरकार चुकाएगी। अब ऐसे किसान नेताओं के बारे में क्या कहना जो जमीनी हकीकत से कटे हुए हैं और मिल मालिकों के हितैषी है और साथ ही सरकार को गुमराह करके अपना उल्लू सीधा करते हैं। हालांकि सरकार ने भी उनकी थोड़ी बहुत सुनकर ‘बेचारे‘ मिल मालिकों को लाभ तो दे दिया लेकिन किसान का क्या?

साफ है कि, सभी राजनीतिक दलों की प्राथमिकता अब किसान नहीं हैं और किसान संगठन भी सिर्फ रस्म अदायगी ही कर रहे हैं। किसानों को अपनी लड़ाई अपने हाथों में लेनी होगी और गन्ना के विकल्प के बारे में भी सोचना होगा। हर साल गन्ना किसानों की यही दुर्दशा होती है और पता नहीं वे किस से आस लगाए बैठें रहते हैं। किसानों को पूरी तरह एकजुट होना होगा और नीतियों में बदलाव के लिए लंबा संघर्ष करना होगा और मौजूदा आर्थिक नीति को उलट देना होगा, अपने लिए देश के लिए !

देवयानी की कहानी !

देवयानी खोब्रागडे के मामले में जिस तरह से हिन्दुस्तानी राजनयिक बिरादरी ने अमेरिका विरोधी ताल ठोंकी है, उससे क्या यह माना जा सकता है कि हिन्दुस्तान अमेरिकी रिश्तों का एकतरफा हनीमून खत्म हो गया है? एकतरफा हनीमून इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि अमेरिकी हिंदुस्तान की ओर अपनी कनखियों से भी प्यार भरी नजर डाल देते हैं तो अब तक हिन्दुस्तानी बिछ-बिछ जाया करते हैं। अब अमेरिकी हिंदुस्तानी संप्रभुता का चीरहरण कर रहे हैं तो कुछ चीख-पुकार तो मची है, पर अमेरिकी दूतावास के वीसा डिपार्टमेंट के कड़े तेवर देख विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के तेवर तरल होने लगे हैं। 

रूस से सख्ती क्यों नहीं दिखाता अमेरिका

लेकिन देवयानी मामले की पड़ताल करने से पहले हम जरा यह समझ लें कि दो देशों के रिश्तों की बुनियाद शिष्टाचार पर निर्भर हुआ करती है। राजनय की अनिवार्यता है कि शत्रु देश के साथ भी शिष्टाचार का समुचित पालन होना चाहिए। किंतु अमेरिका अपनी विश्व चौधराहट में आवश्यकतानुकूल शिष्टाचार को परिवर्तित करता रहा है। देवयानी प्रकरण में अमेरिकी नीतियों के बारे में विश्लेषित करते समय उसे सिर्फ वियना कन्वेंशन के आधार पर कसने से सही परिदृष्टि को नहीं समझा जा सकता। अमेरिका की विदेश नीति हमेशा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बुनियाद पर संचालित होती है। जिस देश में इन संस्थाओं को संभावनाएं नजर आती हैं उसके प्रति अमेरिकी शिष्टाचार में उदारता बरतने में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती जाती। किन्तु जिन देशों से उसे व्यापारिक लाभ, सामरिक हित या संबंधित देश की राजनयिक शक्ति का एहसास नहीं होता, उसे अमेरिकी हमेशा तुच्छ नजर से देखा करते हैं। देवयानी खोब्रागडे के साथ अमेरिकी मार्शल विभाग द्वारा की गई कार्रवाई के ठीक पहले रूसी दूतावास के खिलाफ भी मामले दर्ज हुए। चूंकि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोब हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की तरह राष्ट्रहित की बजाय व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता नहीं देते इसलिए रूसी राजनयिकों के मामले में अमेरिकी अभियोजक प्रीत भरारा भी उद्दंडता दिखाने का साहस नहीं जुटा पाए। रूसी राजनयिकों में से ४९ लोगों के खिलाफ मेडिकल इंश्योरेंस में फ्रॉड का मामला अन्वेषित हुआ। इन ४९ राजनयिक कर्मियों में से ११ न्यूयॉर्क के मिशन में नियुक्त थे। जिस तरह से वीसा फ्रॉड के मामले में देवयानी खोब्रागडे के साथ बदतमीजी की गई, उन्हें हथकड़ी पहनाई गई, उनके अंतर्वस्त्रों को उतारकर उनके शरीर में मौजूद सारे केविटी (गड्ढों) को जांचा गया, उस तरह की हरकत करने की हिम्मत न प्रीत भरारा कर सके न अमेरिका का मार्शल डिपार्टमेंट।

हथकड़ी का जवाब हथकड़ी से देता रूस

कारण बहुत साफ है। अमेरिका जानता है कि यदि रूसी राजनयिकों के साथ हथकड़ी पहनाकर घुमाने की बदतमीजी की गई तो रूस के राष्ट्रपति कॉमरेड व्लादिमिर पुतिन अमेरिका के राजनयिकों को हथकड़ी ठोंकने में रंचमात्र भी संकोच नहीं करेंगे। अमेरिकी भगोड़ा स्नोडेन हिंदुस्तान की ओर आने का रुख कर रहा था तो डॉ. मनमोहन सिंह और सलमान खुर्शीद पहले ही उसके खिलाफ कार्रवाई की घुड़कियां दे रहे थे। उन्हें डर लग रहा था कि स्नोडेन यदि नई दिल्ली उतर गया तो वह अमेरिका को क्या मुंह दिखाएंगे! जबकि मॉस्को विमानतल पर स्नोडेन को व्लादिमिर पुतिन ने हरसंभव सहयोग किया वह भी विश्व चौधरी अमेरिका को आंखें दिखाते हुए। स्नोडेन के पास जो जानकारियां थीं उसमें हिंदुस्तानी सत्ता संस्थान की टेलीफोन सर्वेलेंस का भी दावा था। जर्मनी और रूस के लिए स्नोडेन की सूचनाएं जितनी महत्वपूर्ण थी उससे कम महत्वपूर्ण सूचनाएं हिंदुस्तान के संदर्भ में नहीं थीं। किंतु भारत तो अमेरिका की ओर बाअदब देखने का आदी है।

कब तक देवयानी को मिलेगा राजनयिक संरक्षण?

देवयानी खोब्रागडे के मामले में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि उसने जो वीसा फ्रॉड किया है, उस अपराध से वह बच पाएगी या नहीं। अब तक जो दिखाई दे रहा है, उसके अनुसार देवयानी खोब्रागडे को तमाम राजनयिक प्रयास के बावजूद अमेरिकी कानूनों के अनुसार १५ वर्षों के कारागार की सजा सुनाई जा सकती है। यह सजा हिंदुस्तान में आम चुनावों के पहले न सुनाई जा सके इसलिए हिंदुस्तान की सरकार ने फौरी उपचार के तहत उसे संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में तैनात कर दिया है। अमेरिका हिंदुस्तान की सरकार को अधिकतम रियायत दे भी देगा तो वह फिलवक्त संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में देवयानी खोब्रागडे की नियुक्ति को अनापत्ति दे दे। जब देवयानी संयुक्त राष्ट्र के मिशन से स्थानांतरित की जाएंगी, तब क्या उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल होगा? क्या उन्हें न्यूयॉर्क में दर्ज वीसा फ्रॉड के मामले से मुक्त कर दिया जाएगा? अभी तक के संकेत यही बता रहे हैं कि जैसे ही देवयानी खोब्रागडे संयुक्त राष्ट्र के स्थायी मिशन में नियुक्ति के चलते प्राप्त राजनयिक संरक्षण से मुक्त होंगी, उन्हें न्यूयॉर्क में दर्ज मुकद्दमे को झेलना पड़ेगा। अमेरिकी नीतिज्ञों ने देवयानी के रूप में हिंदुस्तान के कान उमेठने की एक कड़ी हासिल कर ली है।

अमेरिका को हिंदुस्तान की फिक्र नहीं

देवयानी निश्चित तौर पर हिंदुस्तान के राजनय की दृष्टि से कमजोर उम्मीदवार थीं। वास्तव में उन्हें अमेरिका में तैनात ही नहीं किया जाना चाहिए था। उनकी पृष्ठभूमि में कई बार जालसाजी के आरोप हैं। इस तरह की कच्ची कड़ी को महत्वपूर्ण मिशन में तैनात करना हिंदुस्तान की राजनय की बिरादरी को संदिग्ध साबित करने का एक अवसर है। अमेरिका ने इस अवसर को बखूबी उपयोग में लाया। न्यूयॉर्क में देवयानी के खिलाफ जिन लोगों ने मामले को आगे बढ़ाया है, संयोगवश या जानबूझकर वे दोनों अधिकारी हिंदुस्तानी मूल के हैं। प्रीत भरारा इस मामले के अभियोजक हैं जबकि निशा देसाई बिस्वाल स्टेट डिपार्टमेंट की असिस्टेंट सेक्रेटरी हैं। जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के जमाने में हिंदुस्तान के प्रति उदारता का दौर शुरू हुआ था। ओबामा जबसे सत्ता में आए हैं उनका स्वाभाविक झुकाव पाकिस्तान के प्रति है। हिंदुस्तानी राजनयिक चाहे जो दावे करते रहे हैं ‘अफ-पाक’ मामले में अमेरिका ने हमेशा हिंदुस्तान को चार हाथ दूर रहने के लिए ही बाध्य किया है। फिलहाल अमेरिका को ‘नाटो’ फौजों की सुरक्षित वापसी के लिए पाकिस्तान से दोस्ती की दरकार है। इसलिए नवाज शरीफ वॉशिंगटन यात्रा से लौटते ही कश्मीर में आखिरी सांस तक लड़ने का सुर छेड़ देते हैं। चूंकि अफगानिस्तान में हिंदुस्तान की कोई विशेष भूमिका बनती नजर नहीं आती या अमेरिका बनने नहीं देता ताकि पाकिस्तान प्रसन्न रहे इसलिए उसका हिंदुस्तानी प्यार का अगला मापदंड है व्यापारिक अनुबंध।

परमाणु समझौते का हमें क्या लाभ हुआ?

हिंदुस्थानी प्रतिरक्षा मंत्री ए.के. एंटनी को अमेरिकी विमानन कंपनियां लड़ाकू विमान बेचने के लिए एक अर्से से दबाव डाल रही थी। बराक ओबामा और डॉ. मनमोहन सिंह के बीच परमाणु समझौते के बाद भी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदुस्तान से खासा व्यावसायिक लाभ कमाने की अपेक्षा पाल रही थीं। परमाणु समझौते को पांच वर्ष बीत चुके। किसी बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी को अब तक परमाणु समझौते का कोई लाभ नहीं मिला। ए.के. एंटनी अमेरिकी लड़ाकू विमान खरीदने से इंकार कर चुके हैं। हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था जिस दौर में पहुंची है, उसमें अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ खींचने का कोई अवसर नहीं दिखाई दे रहा। फिर अमेरिका हिंदुस्थान को क्यों झेले? अब अमेरिका की एशिया नीति में हिंदुस्तान की बजाय चीन, अफगानिस्तान और ईरान का त्रिकोण ज्यादा महत्वपूर्ण नजर आ रहा है। चीन से उसे डॉलर को मजबूत रखने में मदद मिलती है। सस्ता श्रम और सस्ते उत्पाद प्राप्त होते हैं। चीन के प्रभाव से वह जापान को रोके रख सकता है। पाकिस्तान के किसी भी फैसले को बदलवा सकता है। दक्षिण कोरिया को अपने दरवाजे पर खड़ा रख सकता है। अफगानिस्तान अमेरिकी नीतियों के मध्य-पूर्व पर नियंत्रण का एक केन्द्र है। ईरान को अपना साथ देकर वह सऊदी अरब के नेतृत्ववाले मध्य एशिया की कमान पर पकड़ बनाए रखेगा। इस पूरे खेल में हिंदुस्तान कहीं मौजूद नहीं। इसलिए हिंदुस्तान की चीख-पुकार पर भले ही अमेरिकी विदेश सचिव जॉन केरी खेद प्रकट करते हैं किन्तु देवयानी खोब्रागडे के मामले में किसी भी प्रकार की रियायत बरतने से वह साफ इंकार करते हैं।

देवयानी को आरोपी साबित करना आसान

अब हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि क्या देवयानी खोब्रागडे के मामले में हिंदुस्तान को शोर मचाना चाहिए था? २०११ में न्यूयॉर्क में नियुक्त हिंदुस्तान के उच्चायुक्त प्रभु दयाल के खिलाफ उनके घरेलू नौकर की शिकायत पर कानूनी कार्रवाई हुई थी। उस समय यह बात सुर्खियों में भी नहीं आई। मामले का निपटारा अदालत के बाहर कर लिया गया। इसी तरह न्यूयॉर्क में २०१२ में तत्कालीन सांस्कृतिक एवं प्रचार प्रतिनिधि नीना मल्होत्रा के खिलाफ भी कार्रवाई हुई थी। नीना मल्होत्रा पर उनकी घरेलू नौकरानी शांति गुरुंग ने बर्बर बर्ताव करने का आरोप लगाया था। शांति गुरुंग को अमेरिकी अदालत में नीना मल्होत्रा के खिलाफ १.५ मिलियन डॉलर की भरपाई का आदेश भी प्राप्त हुआ। तब हिंदुस्तान में इस मामले पर इतनी चर्चा क्यों नहीं हुई? शांति गुरुंग के खिलाफ भी जो कार्रवाई की गई थी, उसमें हिंदुस्तानी मूल के लूना रंजीत सक्रिय थे। लूना रंजीत न्यूयॉर्क से संचालित एनजीओ ‘अधिकार’ के सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं। ‘अधिकार’ हिंदुस्तान से आए अमेरिका में मौजूद तमाम घरेलू कर्मचारियों के उत्पीड़न के खिलाफ संघर्षरत है। देवयानी खोब्रागडे मौजूदा मामले में संगीता रिचर्ड नामक हिंदुस्तानी घरेलू नौकरानी को प्रतिमाह ३० हजार रुपए के वेतन पर अमेरिका ले गई थीं। हिंदुस्तानी मानदंडों के आधार पर ३० हजार रुपए प्रतिमाह की रकम बहुत बड़ी रकम लग सकती है। परंतु अमेरिका में यह रकम सप्ताह में ४० घंटे काम करने पर प्रति घंटे लगभग ३.३१ डॉलर बैठती है। संगीता रिचर्ड के वीसा आवेदन में यह नहीं बताया गया था कि संगीता को प्रतिमाह सिर्फ ५७३.०७ डॉलर की रकम प्राप्त होगी। वहां ४५०० डॉलर प्रतिमाह उसे वेतन दिए जाने का जिक्र किया गया था। अमेरिका में प्रति घंटे घरेलू नौकरानी को दिए जानेवाले न्यूनतम वेतन का सातवां हिस्सा ही संगीता पा रही थीं। इस आधार पर तो कोई भी अमेरिकी अभियोजक संगीता रिचर्ड को देवयानी के हाथों शोषित घोषित करेगा और इसके लिए उसे १५ वर्षों के कारागार की सजा दी जा सकती है।

और भी हैं देवयानी के फर्जीवाड़े

सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस अल्तमस कबीर, जस्टिस जे.एम. पांचाल और जस्टिस सेरियक जोसेफ की खंडपीठ एक मामले में देवयानी खोब्रागडे पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप मान चुका है। यह याचिका महावीर वी. सिंघवी नामक आईएफएस अधिकारी ने दायर की थी। १९९९ के बैच के अधिकारी हुआ करती हैं देवयानी। १९९९ बैच के अधिकारियों के मामले में नियमों में बदलाव कर देवयानी को लाभ पहुंचाया गया था। इसी के चलते सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भारत सरकार पर २५ हजार रुपयों का दंड भी ठोंका था। आईएफएस अधिकारी ने देवयानी को राजनीतिक रूप से लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे सही पाया था। इस आधार पर देवयानी की अमेरिका की नियुक्ति के मामले को नकारा जाना चाहिए था। तिस पर देवयानी अमेरिका में नियुक्त होतीं उसके पहले ही मुंबई की घोटालों से खड़ी ‘आदर्श’ इमारत में उनके फ्लैट के कागजात में हेराफेरी का आरोप लगा था। ‘आदर्श’ में फ्लैट पाने के लिए देवयानी ने फर्जी हलफनामा दायर किया था। अमेरिकी अभियोजक प्रीत भरारा रहें या कोई और वैश्विक स्तर पर वह यह साबित करने में संकोच नहीं करेगा कि देवयानी खोब्रागडे फर्जीवाड़ा करने की अभ्यस्त हैं। इसलिए देवयानी को दंडित होना सहज स्वाभाविक है।

 हिंदुस्तान जो चीख-पुकार कर रहा है, उसका प्रभाव अमेरिका पर पड़नेवाला नहीं हैं। अमेरिका रूसी राजनयिकों को हथकड़ी ठोंकने से डरता है जबकि पाकिस्तान में उनका अपना अधिकारी डेविस जब पाकिस्तानियों को मार गिराता है तो उसके बदले में वह पाकिस्तान को ‘ब्लड मनी’ देकर चुप रहने के लिए बाध्य करता है। हिंदुस्तान की औकात अमेरिका की निगाह में पाकिस्तान से बड़ी नहीं है। हम संप्रभुता, अर्थव्यवस्था, विशालता के चाहे जितने दावे कर लें, अमेरिका हमें श्रेष्ठ शिष्टाचार योग्य नहीं मानता। इस सच्चाई को सलमान खुर्शीद समझते हैं इसलिए उनके तेवर तरल हो रहे हैं। देवयानी के मामले में चिल्ल-पों करके उल्टे हिंदुस्तान ने दुनिया के सामने अपनी ही कमजोरी का इजहार किया है।

"आप" की अग्नि परीक्षा !

दिल्ली में अन्य दलों के सहयोग से आम आदमी पार्टी को सरकार बनानी चाहिए या नहीं इसी सवाल का जवाब जानने के लिए आप दिल्ली में सर्वे करवा रही है। सर्वे के नतीजे तो अगले सप्ताह तक आएंगे लेकिन आप के सर्वे को दिल्लीवासियों का भरपूर समर्थन हासिल हो रहा है। ये शायद भारतीय लोकतंत्र में अपनी तरह का पहला मामला होगा जब कोई राजनीतिक दल जनता से पूछा रहा हो कि हमें किसी अन्य दल के सहयोग से सरकार बनानी चाहिए या नहीं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनाव मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी ने 28 सीटें जीतकर एक नया रिकार्ड तो बनाया ही है वहीं देश की राजनीति में एक नयी बयार भी बहाई है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। आजादी के बाद शायद ये ऐसा दूसरा मौका होगा जब किसी आंदोलन की कोख से किसी राजनीतिक दल का जन्म हुआ और उसने पहली बार में ही सत्ता के स्थापित किलों को ढहाने का कारनामा कर दिखाया।

लेकिन हालात यह हैं कि दिल्ली की जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत की नहीं दिया है। खंडित जनादेश सरकार बनाने की राह में बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है। भाजपा, आप और कांग्र्रेस किसी भी दल के पास सरकार बनाने के पर्याप्त संख्या नहीं है। भाजपा और आप दोनों दल सरकार बनाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर चुके हैं। ऐसे में यक्ष प्रश्न यह है कि दिल्ली में सरकार बनेंगी या फिर से उसे चुनाव का मुंह देखना होगा। भाजपा ने खुद को नैतिकता, आदर्श और सिद्वांतों की चादर से ढक लिया है। कांग्रेस की स्थिति इतनी दयनीय है कि वो बिना शर्त समर्थन के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकती है। ऐसे माहौल में जनता के एक छोटे समूह, कुछ सामाजिक संगठनों, बुद्विजीवियों, मीडिया और अपरोक्ष रूप से राजनीतिक दलों द्वारा आम आदमी पार्टी पर नैतिक तरीके से यह दबाव बनाया जा रहा है कि आप को कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाकर जनता से किये वायदे पूरे करने चाहिए।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सारी नैतिकता और आदर्ष आप के लिये ही हैं क्या। क्या आप को जनता का समर्थन मिलना गुनाह है। क्या जनता ने आप को समर्थन देकर कोई एहसान किया है। क्या आप पर नैतिकता के नियम लागू होते हैं भाजपा पर नहीं। आप संख्या बल के हिसाब से नंबर दो की पार्टी है नम्बर एक की पार्टी भाजपा की ओर कोई संगठन, राजनीतिक दल या मीडिया उंगुली क्यों नही उठा रहा है। क्या दिल्ली को दोबारा चुनाव के और धकेलने की गुनाहगार अकेली आप ही क्यों है। क्या लोकतंत्र का बचाने, उसकी मर्यादा की रक्षा करने और जनता की सारी उम्मीदों को उठाने का बीड़ा आप ने उठा रखा है। क्या कांग्रेस या भाजपा किसी भी दृष्टिकोण से गुनाहगार नहीं है। क्या ये उचित है कि 14 महीने पुरानी पार्टी की तुलना सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस और 33 साल पुरानी भाजपा से की जाए। आखिरकर क्या आप ने चुनाव लड़कर और सीटें जीतकर कोई अपराध कर दिया है। क्यों जनता, मीडिया और सामाजिक संगठनों को आप से इतनी उम्मीदें हैं।

 क्या मीडिया, सामाजिक संगठनों, जनता और राजनीतिक संगठनों का आप पर सरकार बनाने और अपनी विचारधारा से विपरित दल के साथ मिलकर सरकार बनाने का दबाव बनाना उचित और न्यायोचित है। क्या कांग्रेस की मदद से सरकार बनाकर आप भी उस जमात में शामिल नहीं हो जाएगी जिस पर कांग्रेस, भाजपा और देश के दूसरे दल अब तक चलते आए हैं। आखिरकर सारी उम्मीदें आप से ही क्यों। आप को नैतिकता के कटघरे में खड़ा करना आखिकर कहां तक उचित है।

आप की ऐतिहासिक जीत, भाजपा का सत्ता के मुहाने पर ब्रेक लग जाना और दिल्ली में कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन का बोरिया बिस्तर गोल हो जाना तमाम सवाल के साथ देश के बदलते राजनीतिक मिजाज की ओर इशारा भी करता है। भाजपा को सर्वाधिक सीटें हासिल हुई हैं। सरकार बनाने के लिए उसे मात्र चार विधायकों की दरकार है। बीजेपी वोटरों और देश की जनता के बची ये मैसेज देना चाहती है कि वो जोड़-तोड़ की रजानीति में यकीन नहीं करती है। आप ने भाजपा पर उसके विधायकों को खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया था। बीजेपी ऐसे व्यवहार कर रही है मानो उसने कभी जोड़तोड़ और खरीद फरोख्त की ही न हो। भाजपा का हाल नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली वाला है। खरीद फरोख्त में माहिर उस्ताद कांग्रेस तो दिल्ली में तो आईसीयू में है। वो तो बिना शर्त समर्थन देते घूम रही है और कोई लेने वाला मिल नहीं रहा है। चूंकि भाजपा सरकार बनाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर चुकी है ऐसे में सारी उम्मीदें आप से ही है। आप को सरकार बनाने के लिए 8 विधायकों की जरूरत है।

आप ने पहले ही दिन न समर्थन देंगे और न समर्थन लेंगे की घोषणा की थी। ऐसे में सरकार बनाने के बढ़ते दबाव को कम करने के लिए आप ने कांग्रेस और भाजपा को पत्र भेजकर 18 बिंदुओं पर उनकी राय जाननी मांगी थी। भाजपा ने तो पत्र का जवाब देना जरूरी नहीं समझा। लेकिन कांग्रेस ने आप के उठाए सभी मुद्दों पर सहमति जता कर गेंद अरविंद केजरीवाल के पाले में डाल दी। आम आदमी पार्टी को भेजी गई चिट्ठी में कांग्रेस ने कहा है कि आम आदमी पार्टी ने जिन 18 मुद्दों पर समर्थन मांगा था उसमें 16 प्रशासनिक हैं। प्रशासनिक मुद्दों पर आम आदमी पार्टी सरकार बनाने के बाद खुद फैसला ले सकती है। उन 16 मुद्दों पर कांग्रेस की सहमति है। रही बात बचे हुए दो मुद्दों की, तो उन पर भी कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया है। यह दो मुद्दे हैं- दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना और दिल्ली में लोकायुक्त को मजबूत करना। आम आदमी पार्टी की शर्तों को समर्थन के कांग्रेस के खत के बाद बीजेपी ने आम आदमी पार्टी के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है। बीजेपी ने साफ कहा कि वो अरविंद केजरीवाल की चिट्ठी का जवाब नहीं देगी। यही नहीं पार्टी ने आरोप लगाया कि अपने घोषणा पत्र में आम आदमी पार्टी ने ना पूरा हो सकने वाले वायदे किए हैं। यही वजह है कि वो लोकसभा चुनाव को देखते हुए दिल्ली में सरकार बनाने से कतरा रही है। दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग ने केंद्र सरकार को अपनी सिफारिश भेज दी है।

जनता को केजरीवाल में एक समाज सेवक ज्यादा नजर आता है और नेता बहुत कम। आप की सफलता से धबराई भाजपा और कांग्रेस चंद तथाकथित मीडिया संस्थानों  के सहारे स्वयं को उच्च आदर्श और सिद्धांत वाले दल प्रचारित करने और साजिशन आप को खिलाफ ऐसा माहौल बनाने में जुटे हैं कि अगर आप ने सरकार नहीं बनाई तो वो दिल्ली की जनता से धोखा और वादाखिलाफी करेंगे। आप को सरकार बनानी चाहिए। मान लीजिए कल अगर आप कांग्रेस या किसी अन्य की मदद से सरकार बना लेती है तो यहीं दल कहेंगे कि आप और हमारे क्या फर्क है। आप कोई नयी या अनोखी नहीं बल्कि राजनीति की पुरानी घिसी-पिटी लकीर पर ही तो चल रही है। इससे पहले भी देश की संसद और राज्यों में ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुई हैं जब सरकार बनाने की संख्या राजनीतिक दलों के पास नहीं थी। आज जो दल आप पर सरकार बनाने और दोबारा चुनाव में पैसा खर्च होने और आम आदमी पर उसकी मार पड़ने की पहाड़े पढ़ रहे हैं उन्हें याद होना चाहिए कि उन्होंने दर्जनों दफा नैतिकता और जनभावनाओं को ताक पर रखकर और पांवों तले रौंदकर मौकापरस्ती का चोला ओढ़कर सत्ता का सुख भोगा है। एक साल में दो बार लोकसभा चुनाव का भार भी इस देष की जनता ने झेला है। चूंकि अब राजनीति के स्थापित किले को किसी नये खिलाड़ी ने जड़ से हिला दिया है तो पक्के पकाए षैतानी दलों के दिमाग नैतिकता, आदर्ष, सिंद्वांत, पारदर्षिता और राजनीतिक षुचिता का चालीसा जोर-जोर से गाने लगे हैं।

भाजपा और कांग्रेस मिलकर ऐसा माहौल बनाने में जुटे हुए हैं कि जिस जनता ने आप को सिर माथे पर बिठाया है वहीं जनता आप की दुश्मन बन जाए और जनता विकल्पहीनता की स्थिति में कांग्रेस और भाजपा को वोट देने और उनकी नकारा सरकारों को झेलने को मजबूर हो। जो माहौल भाजपा, कांग्रेस और तथाकथित मीडिया संस्थान मिलकर बना रहे हैं उससे से जनता को सावधान और सचेत रहने की जरूरत है। असली परीक्षा तो दिल्ली और देष की जनता की होने वाली है। जनता को राजनीतिक दलों के दुष्प्रचार से सावधान रहना होगा। और अगर दिल्ली में दोबार चुनाव की स्थिति पैदा होती है तो आप को पूर्ण बहुमत दिलवाना चाहिए ताकि राजनीति की जीम जमायी दुकानों के समाने जमी गंदगी और नकली चेहरों को बेनकाब किया जा सके। वहीं आम आदमी पार्टी को उसी स्थिति में पूरी तरह परखा जा सकेगा जब उसके पास पूर्ण बहुमत होगा। कई कसौटियों पर कईयों को कसा जाना है लेकिन इस सब को दारोमदार देश की जनता पर है। आने वाले समय में असली परीक्षा जनता की होने वाली है, किसी राजनीतिक दल की नहीं।

कांग्रेस की हार क्या चापलूस हैं जिम्मेदार ?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद एक बार फिर कांग्रेस पार्टी की संस्कृति पर सवाल उठने लगे हैं। आलोचकों का मानना है कि इसके पीछे पार्टी के अंदर चरणवंदना संस्कृति जिम्मेदार है। जब तक कांग्रेस इससे नहीं उबरेगी, तब तक जनता में उसकी छवि सुधरने वाली नहीं है। कांग्रेस पार्टी अपनी संस्कृति सुधारने के लिए क्या कदम उठाती है? इस पर देश भर की निगाहें टिकी हुई हैं। क्या कांग्रेस हार से सबक लेकर अपना सुधार करेगी? या फिर चापलूस संस्कृति को जिंदा रखेगी? 

हालिया विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार को राजनीतिक दलों से लेकर राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक चाहे जिस तरह से परिभाषित कर रहे हों, लेकिन इतना तो साफ है कि कांग्रेस को इस हाल तक पहुंचाने में चाटुकार और दलाल टाइप के नेताओं की भूमिका सबसे ज्यादा रही है। यूपीए की सहयोगी पार्टी एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने जिस तरह बिना लाग-लपेट के कांग्रेस को झोलाछाप नेताओं की मंडली कहा है, वह कांग्रेस को सचेत करने के लिए काफी है। इसके साथ ही शरद पवार की यह बात उन सभी दलों के लिए भी सबक है, जो राजनीति तो करते हैं, लेकिन जनता से कोसों दूर रहकर देश-दुनिया के बदलते मिजाज को नहीं पहचान रहे हैं।

कांग्रेस में आज ऐसे चाटुकारों की भीड़ जमा है, जो खुद तो कहीं से चुनाव नहीं जीत सकते, लेकिन दूसरों की सीट तय करते नजर आते हैं। कांग्रेस में ऐसे दलालों और गांधी परिवार के प्रति झूठी आस्था दिखाने वाले लोगों की पूरी फौज खड़ी है, जो खुद नहीं लड़ती, लेकिन दूसरों को लड़वाकर अपनी रोटी सेंकती रही है। कांग्रेस की कार्यसमिति से लेकर तमाम कमेटियों की सूची को देख परख लीजिए, तो एक दर्जन से ज्यादा ऐसे लोग नहीं मिलेंगे, जो जनता के बीच रहते हों, देश की नई पीढ़ी से कोई मतलब रखते हों और जो गांव, समाज और देश की समस्या से कोई सरोकार रखते हों। ऐसा ही हाल कांग्रेस की प्रदेश कमेटियों का है। कांग्रेस के उन प्रभारियों का तो हाल देखिए, जो प्रदेश की राजनीति को अपनी अंगुली पर नचाते फिरते हैं। इन नेताओं में अधिकतर वही लोग मिलेंगे, जो कभी चुनाव जीतकर नहीं आए। केवल चाटुकारिता के दम पर कांग्रेस के ऑफिस में विराजमान रहते हैं और टीवी से लेकर अखबारों में झूठे बयान देकर लोगों को बरगलाते नजर आते हैं।

इस पूरे खेल में इन चाटुकारों की नीति होती है कि सोनिया और राहुल पर कुछ न बोलें। ये तमाम बातें इसलिए कही जा रही हैं कि चार राज्यों में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के भीतर इस बात पर मंथन हो रहा है कि क्यों न राज्य के प्रभारियों से लेकर अध्यक्षों को पद से हटा दिया जाए? संभव है कि कांग्रेस में ऐसा हो भी, लेकिन इससे भला क्या होगा? क्या जमीनी नेताओं को तरजीह मिलेगी? क्या कांग्रेस के लोग आम जनता के बीच होंगे? क्या कांग्रेस की नीतियां बदलेंगी? क्या कांग्रेस के हवाई नेता बाहर होंगे? क्या सोनिया और राहुल की चरणवंदना बंद होगी? क्या कांग्रेस अमीरों की पार्टी से विमुख होकर गरीबों और आमजनों की पार्टी बनेगी? कांग्रेस को इन तमाम बातों पर गौर करना है और याद रखिए कांग्रेस ऐसा नहीं करती है, तो उसका मर्सिया भी जल्द ही पढ़ दिया जाएगा।

हद तो यह देखिए कि हिंदी पट्टी के चार राज्यों में कांग्रेस के जमींदोज हो जाने के बावजूद चाटुकार और दलाल नेताओं ने अब यह कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस जब-जब हारती है, तब-तब अगले चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आती है। चाटुकारों के इस बयान में दम भी है, लेकिन असली सवाल है कि क्या देश की जनता का मूड और मिजाज अब वही है, जो पहले हुआ करती थी। बदलते परिवेश, बदलती राजनीति और देश में नए जमाने के 40 करोड़ से ज्यादा युवाओं को आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाली कांग्रेस जैसी पार्टी से अब कोई लेना-देना नहीं रह गया है। इस युवा पीढ़ी को न तो देश की आजादी की लड़ाई से कोई मतलब है और न ही वंशवादी राजनीति से कोई सरोकार। इस पीढ़ी में उस जमींदारी प्रथा वाली राजनीति, एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति, जनता से विमुख होते नेता, जनता को बेचारी समझने वाले लोगों के प्रति बेतहाशा आक्रोश है और इस पूरे खेल को वह पीढ़ी एक राजनीतिक गुलामी के तौर पर देख रही है। आजाद देश में आजादी की दूसरी लड़ाई इंदिरा शासन के विरोध में जब 1977 में संपूर्ण क्रांति के रूप में लड़ी गई, तब भी आज जैसे ही हालात थे। 1947 में देश आजाद हुआ और उसके 30 साल बाद 1977 में कांग्रेस के कुशासन और इंदिरा गांधी की जनविरोधी करतूतों से आजीज आ चुकी जनता ने सत्ता पलटने में देर नहीं लगाई।

याद रखिए इंदिरा की सत्ता को भी इसी युवा वर्ग ने पलट दिया था। ये वही युवा वर्ग था, जिसने आजादी की लड़ाई तो नहीं देखी थी, लेकिन आजादी के 30 सालों को या तो जिया था या फिर आजादी के बाद के सालों में जन्म लिया था। इसी नई पीढ़ी ने सब कुछ बदलने का संकल्प लिया और बदल भी दिया। तब केवल कांग्रेस के खिलाफ माहौल था और इंदिरा के विरुद्घ लहर। इस लहर में कांग्रेस पराजित हो गई और इंदिरा की भारी हार हुई। अब 77 के आंदोलन के 36 साल बाद फिर जनता के राडार पर कांग्रेस आ गई है। इसे आप केंद्र सरकार विरोधी लहर कहें या फिर सोनिया विरोधी, लेकिन इतना तय है कि कांग्रेस विरोधी यह लहर आगामी लोकसभा चुनाव तक चलती रहेगी। इसे कोई रोक नहीं सकता। एक बात और है कि जनता का यह विरोध अब केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है। अब विरोध की धार पर वह भाजपा भी है, जिसकी आयु अब 30 साल की हो गई है। तय मानिए, जिस तरह से आजादी के 30 साल बाद 77 में कांग्रेसी सरकार को जनता ने उखाड़ फेंका था, लगभग वही हाल अब भाजपा का भी होना तय है। राष्ट्रीय स्तर पर संभव है कि आगामी चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर का फायदा भाजपा को मिलता दिखे, लेकिन जिस तरह से ‘आप’ जैसी ताकतें देश के कोने- कोने से उभरेंगी। वंशवाद, लूट और भ्रष्टाचार पर टिकी पार्टियां जनता का निवाला बनती रहेंगी। कांग्रेस के भविष्य की राजनीति पर और भी बातें करेंगे, लेकिन यहां कुछ उन चाटुकारों की चर्चा की ली जाए, जो कांग्रेस को रसातल में ले जाने के लिए बेताब हैं। 

राजनीति करना और बयान देना दोनों अलग-अलग बातें हैं। राजनीति, रणनीति और कूटनीति से की जाती है और बयान राजनीति का मात्र एक हथकंडा भर होता है। बयान सच भी हो सकता है और राजनीति से प्रेरित भी। आप देश की राजनीति के इतिहास में चले जाइए, तो पता चलेगा कि देश में सत्ता की राजनीति करने वाले लोग कभी बयानों की राजनीति नहीं करते। बयानों की राजनीति असली राजनीति के सामने ठहर भी नहीं पाती। बयानों की राजनीति असली राजनीति की साया भर होती है और संभव है कि इसे समझना सबके बूते की बात भी नहीं हो। यह सवाल आज इसलिए उठ रहा है कि पिछले दिनों कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक बयान सोनिया गांधी को देश की मां तक कह डाला। हालांकि इस बयान में किसी की इज्जत नहीं उछाली गई है और न ही किसी का अपमान ही किया गया है। संभव है कि खुर्शीद के इस बयान से देश की जनता का कोई सरोकार न हो, लेकिन इस बयान ने खुर्शीद की चाटुकारिता को सामने ला दिया है। इसी खुर्शीद ने कुछ महीने पहले अपने एक साक्षात्कार में कांग्रेस को दिशाहीन कहने की गलती कर दी थी। इस बयान का कांग्रेस के अन्य चाटुकारों ने विरोध किया और अंत में खुर्शीद को अपने कहे के लिए माफी तक मांगनी पड़ी थी। लेकिन याद रखिए, कांग्रेस की चाटुकारिता करने वाले खुर्शीद कोई पहले आदमी नहीं हैं। जब इंदिरा गांधी का राज था, तब भी कांग्रेस में चाटुकारों की बड़ी फौज खड़ी थी। उस समय भी देवकांत बरुआ जैसे लोग थे, जो ‘इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’ कहकर चाटुकारिता करते फिर रहे थे और कांग्रेस रसातल की ओर जा रही थी। आज फिर वही इंदिरा वाली संस्कृति सोनिया के सामने है। चार राज्यों में कांग्रेस की हार को लेकर कांग्रेस के भीतर मंथन जारी है। लेकिन मंथन फिर वही जड़विहीन लोग कर रहे हैं, जिनका जनसरोकार से कोई वास्ता नहीं है।

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इस नाकामी का श्रेय लेने को कोई भी तैयार नहीं है, बल्कि सभी एक-दूसरे के माथे ठीकरा फोड़ने में लगे हैं। जरा मणिशंकर अय्यर और सत्यव्रत चतुर्वेदी सरीखे नेता की बातों पर गौर कीजिए। 2009 का लोकसभा चुनाव मणिशंकर अय्यर हार चुके हैं और अभी वे मनोनीत कोटे से राज्यसभा के सदस्य हैं। रही बात सत्यव्रत चतुर्वेदी की, तो वे भी मध्य-प्रदेश कोटे से राज्यसभा सदस्य ही हैं। कहने का तात्पर्य है कि दोनों ही जनाधारविहीन नेता हैं। न तो ये अपनी सीट जीत सकते हैं और न ही पार्टी की जीत में योगदान दे सकते हैं। कांग्रेस की विडंबना यही है कि सत्ता में दस जनपथ के आस-पास ऐसे ही लोगों का वर्चस्व रहा है, जो बिना रीढ़ के नेता हैं। जो जितना कमजोर और जड़विहीन, कांग्रेस के गलियारों में वह उतना ही मजबूत। मिसाल के तौर पर अहमद पटेल को ही लिया जाए। अहमद भाई उसी गुजरात से आते हैं, जहां के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी आज कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। सोनिया के राजनीतिक सलाहकार के गृह-प्रदेश गुजरात में कांग्रेस काफी दयनीय हालात में है। चाणक्य कहे जाने वाले अहमद भाई अपने ही राज्य में लगातार मात खाते जा रहे हैं। अहमद पटेल कांग्रेस की लगातार हार के लिए अपने को दंड दे सकते हैं? जो अहमद पटेल आज तक लोकसभा से लेकर विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सके, वह भला चुनाव की राजनीति कैसे कर सकते हैं? और राजनीति करते भी हैं, तो अपनी राजनीतिक हार की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते? इसी अहमद पटेल से एक और सवाल है कि क्या वे अपनी ही पार्टी के नेताओं से मिल पाते हैं? कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का राजनीतिक सचिव होने के नाते उनका पहला काम तो यही था कि वे देश के राजनीतिक मिजाज को पहचानते और सोनिया गांधी तक देश की असली तस्वीर रखते, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए?

उस दिग्विजय सिंह को क्या कहेंगे? अजीत जोगी को क्या कहेंगे? उस शकील अहमद को आप किस श्रेणी में रखेंगे? उस गुरुदास कामत की राजनीति को आप क्या कहेंगे? इन्हें नेता कहा जाए या फिर दलाल या चाटुकार? प्रदेश के तमाम अध्यक्षों को आप क्या कहेंगे, जो अपने अपने प्रदेशों में कांग्रेस को जीत दिलाने में असफल हैं। आज की हालत यह है कि इस देश में डंके की चोट पर दस आदमी भी कांग्रेस के पक्ष में बोलने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस के नेताओं से कार्यकर्ता की मुलाकात और बात नहीं होती। कार्यकर्ता से जनता की मुलाकात और बात नहीं हो रही है। गौर करके देखिए, कांग्रेस में आज अधिकतर नेता 60 से 70 बरस के हो गए हैं, जो वोट की राजनीति पुराने ढर्रे पर कर रहे हैं, जबकि आज की पीढ़ी तमाम पुराने नेताओं से अलग सोच रख रही है। राहुल गांधी युवाओं की राजनीति करने की बात तो करते हैं, लेकिन चुनाव के समय इन्हीं बूढ़े नेताओं के खेल के सामने नतमस्तक हो जाते हैं ।

125 साल पुरानी इस पार्टी को पीवी नरसिम्हा राव सहित अगर मनमोहन सिंह ने कमजोर किया है, तो दस जनपथ का भी कम योगदान नहीं रहा है। दस जनपथ ने कभी एक मजबूत नेतृत्व आस-पास पनपने नहीं दिया। यदि किसी नेता का कद दस जनपथ से ज्यादा बढ़ा, तो उसके पर तुरंत कतर दिए जाते हैं। आंध्र प्रदेश जीता-जागता मिसाल है। आखिर जगनमोहन रेड्डी कांग्रेस के मुख्यमंत्री ही, तो बनना चाहते थे। आज उन्हें नकार कर कांग्रेस वहां बदतर हालात में पहुंच गई है। कहने की जरूरत नहीं कि दस जनपथ के इर्द-गिर्द आज चाटुकारों का जमावड़ा है। और जो लोग आज राहुल गांधी को नकार रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि कभी स्वर्गीय इदिरा गांधी को भी लोहियावादियों ने ‘गूंगी गुड़िया’ की उपाधि दी थी। उसी गूंगी गुड़िया ने लोहिया समेत तमाम नेताओं की बोलती बंद कर दी थी।