17 November 2015

सेवा निवृति और समय ?

देश में सेवा निवृति को लेकर एक नयी बहस छिड़ी हुयी है. सेवा निवृत्ति  अर्थात जब व्यक्ति अपनी आयु के साठ वर्ष पार करता है तो जिस संस्थान में अपनी सेवा देता है. उसे उस की सेवा से मुक्त कर दिया जाता है. वह स्वयं मुक्त नही होता और न ही होना चाहता है. यह मुक्त होने की प्रणाली कोई नई प्रणाली नही है. पुरातन काल से चली आ रही आश्रम अवस्था का एक विकृत रूप है. आश्र्मावस्था में इसे वानप्रस्थ आश्रम की संज्ञा दी जाती है. इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने के बाद अथवा बेटे का बेटा होने के बाद बेटे को पारिवारिक सामाजिक अधिकार सौप कर स्वेच्छा से वानप्रस्थी बन वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान कर जाता था. परिवार के संकुचित क्षेत्र से निकल कर समाज के विस्तृत क्षेत्र में सेवा कर समय का सदोपयोग करता था. एक छोटे परिवार से निवृत हो जाता और समाज के बड़े परिवार में प्रवृत हो जाता था धीर-धीरे परिस्थितियों बदल रही हैं. सेवा निवृति के बाद समय का कैसे उपयोग हो एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न बनता जा रहा है.

न सेवा निवृति से पूर्व अधिकांश लोग कोई भी योजना नहीं बना पाते हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न क्लबों में व किटटी पार्टियों में ताश व पीने -पिलाने में मस्त रहने का प्रयास करते हैं, जो आर्थिक रूप से सम्पन्न नही हैं वे पार्कों में अथवा चौपालों में या फिर जहाँ भी बैठने को स्थान मिल गया बैठ कर ताश खेल लेते है. कई वरिष्ठ नागरिक पार्कों में अलग-अलग समूह बना कर बैठे मिलते हैं. उन की चर्चा के विषय भी अलग -अलग ही होते हैं -राजनीति से लेकर पारिवारिक उलझनों में उलझे रहते हैं. कई सेवा निवृत जिन की बहुएँ नौकरी करती हैं वे उनके बच्चो की बेबी -सिटिंग करते है. एक वर्ग अपनी संतान से उपेक्षित होकर वृद -आश्रम में शरण लेने को विवश हो कर जीवन की संध्या को वहाँ गुजार लेते हैं, खैर यह तो मेरा विषय नही है, मेरा विषय है कि जब हम सेवा निवृत हों तो ऐसी प्रवृति अपनाएं जिस से  समय का सदोपयोग हो.

सेवा निवृति के पश्चात हम ने समय का सदोपयोग हो, इसी भावना के साथ कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया है. ये बच्चे व इन के माता-पिता झुग्गी-झोपडी में रहते हैं. पिता दिहाड़ी करता है. माँ कोठियों में काम करती है और कोठियों में रहने वाले बच्चों के पुराने कपड़े जो मिलते हैं, उन्हें ये बच्चे पहनते हैं. सरकारी स्कूलों में इन बच्चों को प्रवेश करा दिया है. ये बच्चे हैं वहां क्या पढ़ते हैं व क्या इन्हें पढ़ाया जाता है, इन बच्चों को मालूम नहीं है, न ही अनपढ़ माता -पिता जानते हैं. जिस प्रकार के वातावरण में रहते हैं वह शिक्षा का वातावरण नहीं है. बच्चों का बुद्धि-स्तर भी विकसित नहीं है. एक-दो बच्चों को छोड़ बाकी बच्चों को पढाई का भी कोई विशेष शौक नहीं है.

स्कूल का पाठ्यक्रम देख कर मै घबरा गई. प्रथम कक्षा में हिन्दी, गणित व्  इंग्लिश पढाई जाती है. हिंदी तो ठीक ढंग से बोल नहीं पाते तो इंग्लिश कैसे समझेगे व बोलेगे. चलना तो  पाठ्यक्रम के अनुसार है ताकि अपनी परीक्षा पास कर सकें और अपने दैनिक जीवन की आवश्कतायों को सहजता से पूरा कर सकें, स्वयं को सामाजिक एवं राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ सकें, साक्षरता तथा संस्कारों का आपस में  अभिन्न संबंध है. हम इन्हें अक्षर ज्ञान के साथ -साथ नैतिक शिक्षा की बातें बताते हैं. शिष्टाचार सम्बन्धी जैसे सब को नमस्ते से अभिवादन करना व  माता -पिता व बड़ो का आदर करना तथा उनका कहना मानना साथ ही ईश्वर संबंधी चर्चा करते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक, सब जगह पर है. वह हमे देख, सुन और जान रहा है. ईश्वर क्या -क्या करता है? उस के साथ हमारे क्या-क्या संबंध हैं और गलत काम करते हैं तो ईश्वर हमें  सजा भी देता है और. अच्छे काम करने पर इनाम भी देता है. बड़ा अच्छा लगता है जब बच्चे ध्यान से सुनते हैं व सुनाते हैं.

यह क्रियात्मक प्रयोग जो हम कर रहे हैं, इस की उपलबिध केवल बच्चों को ही नहीं हो रही है. अब तक तो स्वाध्याय करते व प्रवचन सुन लेते थे परन्तु अब जीवन में व्यवहार में लाने का अवसर मिला है. इस वर्ग के बच्चों के साथ जो स्वयं सफाई से वंचित रहते हैं, जहाँ रहते हैं वहाँ पानी का अभाव है और जब इन बच्चो के शरीर से विशेष करके ग्रीष्म ऋतु में पसीने की दुर्गन्ध आ रही होती है तो सहजता व धैर्य से लेने का अभ्यास बना रहे हैं. जब कभी इन पर गुस्सा भी आता तो स्वयं पर नियन्त्रण करने का अभ्यास करते हैं. यह सोच कर कि सब पवित्र आत्माएं हैं, इन्हें हमारी सहानुभूति की आवश्यकता है. इन्हें भरपूर प्यार दें जिस से इन की रूचि बनी रहे. हमें इस बात का भी संतोष होता है कि ये बच्चे हमारे पास स्वस्थ वातावरण में अपना समय गुज़ार जाते हैं. ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज के नौवें नियम –”-सब को अपनी उन्नति में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए” .इस नियम का रहस्य व तथ्य भी समझ में आ रहा है. बच्चे उन्नत हो रहे हैं तो उन के साथ हम भी उन्नत हो रहे हैं.

24 September 2015

जंगल राज के रास्ते पर बिहार..!

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, जो पहले दोस्त थे आज दुश्मन बन बैठे हैं और दुश्मन दोस्त। बिहार विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव इस बार गजब के वातावरण में हो रहे हैं। वर्तमान में सत्ता पर काबिज पार्टी जनता दल (यू) के नेता इन चुनावों में केन्द्र की डेढ़ साल पुरानी मोदी सरकार से जवाब मांग रहे हैं। चुनावों में किसी भी पार्टी के बदहवास होने का यह पहला लक्षण है क्योंकि चुनाव बिहार में राज्य सरकार गठित करने के लिए हो रहे हैं न कि लोकसभा के लिए। दूसरी तरफ राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा लगातार सत्तारूढ़ पार्टी के गठबन्धन में शामिल दलों के एक-दूसरे के विरोधी होने के प्रमाण प्रस्तुत कर रही है। जो लोग बिहार की राजनीति के तेवर और कलेवर को समझते हैं और जिन्होंने पटना का गांधी मैदान को देखा है, वे भलीभांति अनुमान लगा सकते हैं कि राज्य के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार के हाथ से सत्ता खिसकती नजर आ रही है और वह एक जमाने के अपने प्रबल प्रतिद्वन्द्वी लालू प्रसाद यादव के समक्ष हथियार डालते नजर आ रहे हैं। गांधी मैदान में जो सभा दो दिन पहले की गई थी, उसमें कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और लालू प्रसाद समेत नीतीश कुमार व शरद यादव चुनावों का एजेंडा तय करने से पूरी तरह चूक गये और भाजपा के दिग्गज प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इस गफलत का पूरा लाभ उठाते हुए उसे अपनी भागलपुर रैली में बहुत चतुराई के साथ तय कर डाला और चुनौती दी कि राज्य के चुनाव में राज्य के विकास और इसके लोगों की समस्याओं और उनके निवारण की बात होनी चाहिए और सत्ता पर काबिज लोगों से उनकी हुकूमत का 'हिसाब-किताब' लिया जाना चाहिए। अब बिहार के चुनावों में नीतीश एंड पार्टी के पास सिवाय जातिवाद का कार्ड चलाने के अलावा और कुछ नहीं बचा है। बिहारी अस्मिता का मुद्दा नीतीश कुमार बहुत जोश-ओ-खरोश से उठा रहे थे मगर उसकी हवा स्वयं लालू प्रसाद उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर निकाल रहे हैं और सरेआम ऐलान कर रहे हैं कि उनका एकमात्र अजेंडा 'यदुवंश' है। 


बिहार के लोगों के बारे में लालू प्रसाद यह कहते हैं कि 'वे उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने में माहिर होते हैं', यदि ऐसा है तो फिर चुनावों से पहले ही इसके नतीजे आ चुके हैं! भागलपुर की रैली से पूरे बिहार में जो सन्देश गया है वह बिहार की अस्मिता को पुन: राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने का है और इसे मोदी ने इस रैली में बखूबी लोगों को बताने में काफी हद तक सफल भी रहे हैं। इस तथ्य को नीतीश कुमार जैसा अनुभवी राजनीतिज्ञ न पहचान पाये, इसे कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता मगर अब वह ऐसे भंवर में फंस चुके हैं जिससे निकलना उनके वश में नहीं रहा है क्योंकि लालू यादव ने उनके चारों तरफ जो घेरा बांधा है वह उनके ही जनाधार को निगल जायेगा। बिहार में जंगलराज का उदाहरण लालू यादव के शासनकाल में सबने देखा है। हमें याद है जब शाम के 6 बजते ही घरवाले अपनों के सकुशल घर वापसी के लिए ब्याकुल हो उठते थे। इस बात का डर रहता था की कोई बाज़ार से लौटते समय लूट-पाट न कर ले। कोई अपनी पुरानी दुश्मनी इस जंगलराज के रास्ते से न चुका ले। लोगों में न्याय की उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी क्योंकी थानेदार की कुर्सी पर 'यदुवंश' का बोलबाला था। इसी  जंगलराज को ख़त्म करने के नाम पर नीतीश कुमार भाजपा से हाथ मिलाया था और बिहार विकास के रास्ते पर चल पड़ा था। मगर आज नीतीश कुमार अपने राजनीतिक लाभ के लिए जंगलराज के राजदार से हाथ मिलाया है। ऐसे में सवाल वाजिब हो चला है की क्या बिहार एक बार फिर से जंगलराज के रास्ते पर है ? यही नीतीश कुमार सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। मगर इस बार बिहार की जनता नीतीश कुमार को किस रुप में पुकारती है ये सब कुछ 8 नवम्बर को साफ हो जायेगा। पटना की रैली में लालू यादव द्वारा केवल अपने जातिगत वोट बैंक को लामबन्द करने की कोशिश ने उनकी हालत अपने ही दरबारियों की कैद में पड़े किसी लुटे नवाब की मानिन्द बना दी है जिसे सत्ता से बाहर होने के बावजूद कहीं अनाम जगह अपने 'खजाने' के गड़े होने पर भरोसा है मगर अफसोस यह खजाना भी अब लुट चुका है क्योंकि स्वयं नीतीश कुमार ने ही उस जगह को तलाश कर वहां 'धान' की खेती बो दी थी। 


क्या ये बताना पड़ेगा कि वर्ष 2000 में किस तरह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्हें लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी के साथ मिलकर किस तरह बेइज्जत किया था और हफ्ते भर बाद ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनी पड़ी थी। मगर भागलपुर की सभा में प्रधानमन्त्री ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया कि जिन लोगों ने जीवन भर कांग्रेस विरोध की राजनीति की और जो डा. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण व कर्पूरी ठाकुर के खुद को सैद्धान्तिक वारिस बताते हैं वे किस तरह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें लालू प्रसाद को मैं अपवाद मानता हूं क्योंकि उनका न तो इन सभी नेताओं से कोई खास लेना-देना था और न सिद्धान्तों से। वह बिहार में स्व. देवीलाल द्वारा भेजे गये ऐसे 'गुमाश्ते' थे जो अपने दबंगई व्यवहार से बिहार की राष्ट्रवादी व समाजवादी सोच को जातिवाद की दलदल में फंसा सकता था। लालू प्रसाद इस अपेक्षा पर खरे उतरे मगर 2005 में नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर इस दलदल में कमल खिला दिया और 2010 में तो पूरी दलदल को कमल के फूलों से पाट डाला और 243 सदस्यीय विधानसभा में लालू यादव  की पार्टी राजद के कुल 24 विधायक ही जीत पाये।


एक तरफ लालू यादव और नीतीश कुमार इसे यदुवंश-दलित की लड़ाई बता रहे हैं तो वहीँ दुसरी तरफ प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इसे बिहार की अस्मिता को पुनस्र्थापित करने का चुनाव बता रहे हैं। कभी डॉ. लोहिया के विचारों की प्रयोगशाला बने इस राज्य के लोगों को विकास से दूर रखने की कोशिशें हो रही हैं और इसी वजह से उन्होंने पटना की सभा को 'तिलांजलि सभा' कहा। क्या गजब है कि जिस गांधी मैदान में कांग्रेसी मुख्यमन्त्री स्व. अब्दुल गफूर ने 'जय प्रकाश नारायण से लेकर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु पर लाठियां बरसाईं हों आज उसी गांधी मैदान से कांग्रेस को भी वोट देने की अपीलें हो रही हैं? लालू यादव तो अर्से से कांग्रेस के साथ हैं और उन्होंने बीड़ा उठाया हुआ है कि वह इस पार्टी का बिहार में 'जनाजा' उठाने में अपना कन्धा जरूर देंगे। इससे ज्यादा भाजपा को और क्या चाहिए!



जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है तो उन्होंने भी अपने गुरुओं को 'तिलांजलि' दे डाली है और अब सब रास्ते बन्द होने पर उन्हें अपने डीएनए का ख्याल आ रहा है। बिना शक यह बिहार का डीएनए नहीं है क्योंकि इस राज्य का डीएनए ठीक वही है जो धनाढ्य समझे जाने वाले पंजाब राज्य का है। ठीक वही भौगोलिक स्थिति, कल-कल करती नदियां, वैविध्यपूर्ण उपजाऊ जमीन, राष्ट्रीय गौरव को महिमामंडित करती ऐतिहासिक धरोहर समेटे महान संस्कृति। और तो और पंजाब के तक्षशिला विश्वविद्यालय से चलकर पाटिलीपुत्र पहुंचे महान दार्शनिक आचार्य चाणक्य, क्या नहीं है बिहार में जो पंजाब में है। खुदा रहमत बख्शे, पंजाब में बस लालू प्रसाद नहीं है! श्री गुरु ग्रन्थ साहब में भी इसी बिहार की मिथिला भूमि के 'राजा जनक' को पहला 'बैरागी' राजा बताया गया है मगर क्या सितम हुआ कि ऐसे राज्य को पूरे भारत में इन्ही राजनीतिज्ञों ने 'जंगलराज' का पर्याय बना कर छोड़ दिया।


बिहार विधानसभा के होने वाले चुनावों को यदि किसी एक नाम से पहचाना जा सकता है तो वह यह है कि यह विरोधाभासों का महासंग्राम है। संभवत: पहली बार बिहार ऐसा तमाशा देख रहा है। यह चुनाव 'विरोधाभासों' का चुनाव है। इसके साथ ही यह चुनाव बिहार के मूल चरित्र के विरुद्ध विषमताओं के जमघट का चुनाव है। यह विकट स्थिति इन चुनावों में बन रही है जिसमें जातिवादी ताकतें राष्ट्रीय चिन्तन की ताकतों को अपने शिकंजे में कस रही हैं। पटना के गांधी मैदान में हुई भाजपा विरोधी दलों के महागठबंधन दलों की रैली को बिहार के लिए सबसे शर्मनाक दिन रहा। कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की उपस्थिति में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव प्रत्यक्ष तौर पर जातिवाद के नाम पर वोट मांगते नजर आए और उन्होंने यादवों की संगठित शक्ति का आह्वान तक कर डाला। बिहार के लिए इससे बड़ी शर्म की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती और इससे भी ऊपर कांग्रेस पार्टी के लिए शोचनीय स्थिति कोई दूसरी नहीं हो सकती। इसे बिहार के सम्मान की रैली के नाम पर आयोजित किया गया था मगर वास्तव में यह बिहार के 'अपमान' की रैली ही निकली। इस महागठबंधन रैली के मंच पर अजीब किस्म का नजारा पेश हो रहा था जिसमें शामिल हर दल अपनी ढपली अलग-अलग बजा रहा था और बाद में संगठित होकर भाजपा से मुकाबला करने का दम्भ भर रहा था। जरा सोचिये क्या बिहार का विकास जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने से हो सकता है?


क्या सामाजिक समता की लड़ाई जातिवाद के आधार पर लड़ी जाएगी? बेशक समाजवादी नेता स्व. डा. राम मनोहर लोहिया ने अलख जगाई थी कि 'संसोपा ने बांधी गांठ-पिछड़ों को हो सौ में साठ' मगर इसी के साथ डा. लोहिया ने यह भी अलख जगाई थी कि 'जाति तोड़ो-दाम बांधो' अर्थात सामाजिक न्याय की लड़ाई की पहली शर्त जातिवाद दरकिनार करके केवल आर्थिक आधार पर होनी चाहिए तभी पिछड़ों के साथ न्याय हो सकेगा मगर महागठबंधन के लोग अपने ही जाल में बुरी तरह फंस गए हैं क्योंकि आज देश का प्रधानमंत्री स्वयं एक पिछड़ी जाति से है और गरीबी की घनघोर व्यवस्था से संघर्ष करते हुए इस मुकाम तक पहुंचा है। ऐसा कैसे संभव है कि बिहार की राजनीति में शुरू से ही उद्दंडता और शालीनता के दो प्रतीक क्रमश: लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक ही मंच पर बैठ कर दोस्ती की पींगें बढ़ाते हुए लोगों को विश्वास दिला सकें कि दोनों ने अपने रास्ते बदल दिए हैं। लालू यादव ने तो नीतीश कुमार की उपस्थिति में ही स्पष्ट कर दिया कि उनका रास्ता केवल यादववाद ही है। यह तथ्य तो एक औसत आदमी के सामने भी प्रकट हो गया। ऐसी विसंगति और विषमता के साए में बिहार के विकास की जो लोग कल्पना भी करते हैं वे स्वयं को ही छलावे में रखते हैं। 


बिहार की आज की राजनीति के तेवर को देख कर 1971 के लोकसभा चुनावों की याद आ रही है जब देश के सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने स्व. इंदिरा गांधी की नई कांग्रेस के खिलाफ 'चौगुटा' मोर्चा बना कर चुनाव लड़ा था और जबर्दस्त तरीके से मुंह की खाई थी। इसकी वजह केवल एक थी कि इस चौगुटे के निशाने पर नई कांग्रेस नहीं बल्कि केवल इंदिरा गांधी थीं। इन्दिरा जी ने उस समय सरकार की नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव किया था। विपक्षी दल इन नीतियों की जगह इन्दिरा गांधी की आलोचना करके ही चुनावी चौसर बिछा रहे थे। ठीक यही स्थिति आज बिहार में बनी हुई है। इस महागठबंधन के दलों में नरेन्द्र मोदी सरकार की जनधन योजना या सामाजिक सुरक्षा योजना की आलोचना करने की ताकत नहीं है। इनका लक्ष्य अकेले श्री नरेन्द्र मोदी बने हुए हैं। इस महागठबंधन की चुम्बकीय शक्ति नीतीश कुमार में भाजपा की आलोचना करने की हिम्मत नहीं है क्योंकि स्वयं आठ साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वह भाजपा के बूते पर ही बैठे रहे हैं। लालू यादव के लिए भाजपा जब 'भारत जलाओ पार्टी' है तो नीतीश कुमार पिछले 14 साल से इसी पार्टी की छत्रछाया में केन्द्र व राज्य की सत्ता किस तरह भोग रहे थे? 


इस महागठबंधन के बनने से केवल एक व्यक्ति को लाभ होने जा रहा है जिसका नाम लालू प्रसाद है। यह उनके अस्तित्व की लड़ाई का सवाल है। इन चुनावों में यदि लालू प्रसाद अलग-थलग पड़ जाते तो उनकी पार्टी का वजूद ही खत्म हो जाता मगर 'उस्ताद' लालू ने बड़ी ही चतुराई से कांग्रेस पार्टी के बिहार में वजूद को खत्म करने का पुख्ता इंतजाम बांध दिया है। जिस रैली में खुले तौर पर समाज के केवल एक जाति के लोगों के लामबन्द होने की अपील की जा रही हो उसमें कांग्रेस अध्यक्ष के साथ राज्यसभा में इस पार्टी के विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद का शामिल होना क्या यह नहीं बताता कि जिस कांग्रेस के आंदोलन को महात्मा गांधी ने इसी राज्य के चम्पारण जिले से शुरू करके उसे आजादी का आंदोलन बना दिया हो अब उसी से आजादी लेने का इस मुल्क में अभियान शुरू हो गया है? क्या गजब का 'सीन' पटना के गांधी मैदान में पेश हुआ कि बिहार के सम्मान के नाम पर आज उसी बिहार के लोगों का अपमान किया जा रहा है जिन्होंने गरीब और भूखे रह कर भी स्वयं को राष्ट्रीय चेतना के केन्द्र में सदा ही बनाए रख कर संदेश दिया कि राजनीति में सिद्धान्तों से ऊपर कुछ नहीं होता। बिहारी अस्मिता की पहचान तो इसके लोगों की राजनीतिक सजगता है। क्या नीतीश कुमार को 2014 के लोकसभा और 2010 के विधानसभा चुनावों की याद नहीं है। मगर आज तो ऐसा लग रहा कि आज बिहार एक बार फिर से जंगलराज के रास्ते पर है...!

19 September 2015

भारत में बोतल बन्द पानी का गोरख धन्धा !

पानी मनुष्य की बुनियादी ज़रूरतों में से एक है। यह मानव जीवन का आधार है। प्रकृति ने हमें शुद्ध पानी के स्रोतों से नवाज़ा है, पर आज पूरे विश्व में पूँजीपतियों ने इस पर भी अपने मुनाफ़े के लिए क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया है। मगर अब ये पानी एक बड़ा व्यापर का माध्यम बन गया है। पानी आज एक माल बन चुका है और मुनाफ़े का बड़ा स्रोत बनता जा रहा है। विश्व के पैमाने पर बोतलबन्द पानी का 10 बिलियन डॉलर से अधिक का कारोबार है जो लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है। आज हर गली-मुहल्ले, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, स्कूल-कॉलेज व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बोतलों में बिकता पानी दिखायी दे जाता है। इसका उपभोग दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। पानी का यह निजीकरण पूँजीवाद के बर्बर होते जाने की निशानी है। इस धोखेबाज़ी और लूट का ख़ामियाज़ा भी आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है।

                           
                        

बोतलबन्द पानी की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में लगभग 1845 में अमेरिका में रिक्कर नाम के एक परिवार ने की जो अपने पानी में औषधीय गुण होने का दावा करता था। यही कम्पनी बाद में पोलैण्ड स्प्रिंग नाम से मशहूर हुई। इसी का अनुकरण करते हुए 1905 में ओज़ारक स्प्रिंग वाटर कम्पनी बनी। पर इनका विस्तार उतना नहीं हुआ। विश्व स्तर पर इस उद्योग का तेज़ी से फैलाव 1970 के बाद ही शुरू हुआ जब सचेतन रूप से इसको फैलाने की कोशिशें की गई। नतीजतन, कई कम्पनियाँ इस खेल में उतर आयीं! पोलेण्ड स्प्रिंग व ओज़ारक स्प्रिंग को नेसले द्वारा ख़रीद लिया गया। आज नेसले इस क्षेत्र का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। इसके बोतलबन्द पानी के 9 अन्तरराष्ट्रीय और 71 राष्ट्रीय ब्राण्ड हैं। इसके अलावा कुछ और भी बड़े खिलाड़ी हैं – डैनने, कोकाकोला, पेप्सी, फीजी, एवियन, माउण्टेन वैली, वोलविक, पारले, ब्रीवरेज व हिल्डन आदि। छोटी-मोटी कम्पनियों की तो संख्या सैकड़ों में है। अकेले भारत में इस समय 200 से भी ज़्यादा कम्पनियाँ इस क्षेत्र में हैं। पिछले तीन दशकों में नव-उदारवादी नीतियों की शुरुआत के बाद इसमें और ज़्यादा तेज़ी आयी है। पहले-पहले लोग पानी के बिकाऊ होने की बात सुनकर हँसते थे, पर अब इसे लोगों की स्वाभाविक ज़रूरत बना दिया गया है। पूँजीवाद के एक मुख्य स्तम्भ मीडिया का इसमें बड़ा योगदान रहा है। मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हाथों में खेलते हुए यह लोगों में आम राय बनाने का काम करता है। लोगों की पसन्द, नापसन्द, शौक़, व्यस्तता आदि तय करने में यह बड़ी भूमिका अदा करता है। यही हमें बताता है कि हमें क्या खाना चाहिए और क्या पीना चाहिए। स्पष्ट ही है कि जो कुछ मीडिया पेश करता है, उसमें इन लोगों के मुनाफ़े का ध्यान रखा जाता है, न कि सच्चाई और वैज्ञानिकता का। हैरानी की बात नहीं है कि यही मीडिया हमें लेज़ चिप्स, कुरकुरे, बर्गर, पिज़्ज़ा, कोल्डड्रिंक जैसी घटिया और नुक़सानदेह चीज़ों को खाने-पीने के लिए प्रेरित करता है। आकर्षक विज्ञापनों, कार्यक्रमों, अख़बारों, पत्रिकाओं और सड़क किनारे लगे बैनरों द्वारा लोगों को डराया और भरमाया जाता है – ‘ख़बरदार! आप अशुद्ध पानी पी कर अपनी सेहत का नुक़सान कर रहे हैं, साफ़ पानी ख़रीदकर पीजिये, हमारे पास झरनों का शुद्ध पानी है या हमारा पानी पूरी तरह शुद्ध किया हुआ है, आदि-आदि’। इस तरह बोतलबन्द पानी को हमारी ज़रूरत बना दिया गया है। इसके लिए विज्ञापनों में अन्धाधुन्ध पैसा बहाया गया। कोकाकोला ने साल 2004 के दौरान डासानी नामक अपने बोतलबन्द पानी के ब्राण्ड पर 1.7 करोड़ डॉलर ख़र्च किये वहीं पेप्सी ने अपने ब्राण्ड एक्वाफिना पर इसी दौरान 2.1 करोड़ डॉलर ख़र्च किये। कुल मिलाकर 2004 में 7 करोड़ डॉलर से ज़्यादा राशि सिर्फ़ बोतलबन्द पानी के विज्ञापनों पर ख़र्च कर दी गयी। उस समय इन ख़र्चों की विस्तार दर 15 प्रतिशत थी। इन विज्ञापनों की बदौलत बोतलबन्द पानी के व्यापार में उस समय 47 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी।




बोतलबन्द पानी का उपभोग साल 2000 में 108.5 बिलियन लीटर था, जो 2002 में 128.8 बिलियन लीटर, 2005 में 164.5 बिलियन लीटर और 2007 में 188.2 बिलियन लीटर हो गया। आज पूरे विश्व में इसका उपभोग 200 बिलियन लीटर से ज़्यादा है। अमेरिका में इसका सबसे अधिक उपभोग है। वहाँ हर साल लगभग 50 बिलियन पानी की बोतलें बिकती हैं। प्रति व्यक्ति उपभोग में इटली का प्रथम स्थान है, जहाँ 2010 में प्रति व्यक्ति बोतलबन्द पानी की खपत 184 लीटर थी। इसके बाद मैक्सिको में यह 169 लीटर प्रति व्यक्ति व संयुक्त अरब अमीरात में 153 लीटर प्रति व्यक्ति है। इसी तरह सर्वोच्च 10 देशों में यह उपभोग प्रति 100 लीटर सालाना से अधिक ही है। भारत में बोतलबन्द पानी का कारोबार लगभग 1,000 करोड़ रुपये का है जो 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। भारत में इस क्षेत्र में 200 से अधिक कम्पनियाँ व 1200 के करीब कारख़ाने हैं। इस तरह पूरे विश्व में आज इसका कारोबार 10 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुँच गया है। नेस्ले इस कारोबार के 12 प्रतिशत हिस्से पर काबिज़ है, इसका बोतलबन्द पानी का कारोबार 3500 करोड़ डॉलर का है। इसके बाद डैनने 10 प्रतिशत, कोकाकोला 7 प्रतिशत व पेप्सी 5 प्रतिशत हिस्से पर काबिज़ है। इस तरह चार पूँजीपति घराने कुल कारोबार के तीसरे हिस्से के मालिक हैं।

अब किसी को यह लग सकता है कि अगर पैसे देकर शुद्ध पानी मिल रहा है तो क्या बुरा है? परन्तु सच्चाई यह है कि यह पानी भी शुद्ध नहीं होता है, इसमें बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती है। पानी की बोतलों और सम्बन्धित विज्ञापनों में कल-कल करते झरने व बर्फ़ के पहाड़ दिखाये जाते हैं, परन्तु इनमें से ज़्यादातर के पानी का स्रोत नगर निगम की तरफ़ से आपूर्ति किये जाने वाले पानी के नल हैं। एक अध्ययन में यह पता लगा कि लगभग आधी बोतलों में यह नल का पानी ही था। इनमें कोका-कोला का डासानी व पेप्सी का ऐक्वाफिना ब्राण्ड भी शामिल था। इसी तरह के एक और अध्ययन से यह बात सामने आयी कि एक तिहाई बोतलों में पानी में घुले तत्वों की मात्रा ज़रूरत से अधिक थी जो बेहद हानिकारक है। इसके अलावा कई बोतलों में ग़ैर-ज़रूरी रसायन, बैक्टीरिया और कृत्रिम यौगिक भी मिले हैं। ज़्यादातर कम्पनियाँ, जिनमें सभी प्रसिद्ध कम्पनियाँ भी शामिल हैं, ये नहीं बतातीं कि उनके पानी का स्रोत क्या है? इसको कैसे शुद्ध किया जाता है और इसमें क्या अशुद्धियाँ मौजूद हैं? बोतलबन्द पानी के इस कारोबार को क़ानूनी घेरे में लाने और बेचे जा रहे पानी की जाँच के लिए कई संस्थाएँ भी बनी हुई हैं, परन्तु इस कारोबार के ज़्यादा फैलाव व कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण इन पर अपेक्षित नियन्त्रण नहीं रह पाता। कहा जा सकता है कि आपके नल में आने वाला पानी ज़्यादा भरोसे के लायक़ है क्योंकि वो ज़्यादा जाँच के घेरे में है और वहाँ जवाबदेही भी है। एक ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि ये आँकड़े यूरोप और विकसित देशों के हैं। सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर विकसित देशों में हर दूसरी बोतल में नल का पानी है तो भारत समेत अन्य पिछड़े देशों में क्या हाल होगा? यहाँ आप “रेल नीर” और बसों-रेलों में बिकती ऐसे ही अन्य बोतलों पर कितना भरोसा कर सकते हैं? इसके अलावा बोतलबन्द पानी को ख़रीदने के लिए आपको आम पानी से 2000 गुणा ख़र्च करना पड़ता है।




अब ज़रा देखते हैं कि कुछ मुनाफ़ाख़ोरों के मुनाफ़े के लिए पूरी मानवता को क्या क़ीमत चुकानी पड़ रही है? दुनियाभर में इन कम्पनियों द्वारा साफ़ पानी के क़ुदरती स्रोतों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है व उनको दूषित भी किया जा रहा है, जिसका नुक़सान आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। बोतलबन्द पानी तैयार करने के लिए ये कम्पनियाँ कई गुणा पानी बर्बाद कर देती हैं, बहुत सारा पानी प्रदूषित कर दिया जाता है जिसे बाद में पानी के क़ुदरती स्रोतों – झीलों, नदियों आदि में बहा दिया जाता है। जहाँ कहीं भी इन कम्पनियों के बॉटलिंग प्लाण्ट लगे हैं, वहाँ रोज़ाना लाखों लीटर भूमिगत पानी निकाला जाता है जिस कारण इन इलाक़ों में पानी का स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। वहाँ के लोगों को पानी मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है व किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। हैरानी की बात है कि ये कम्पनियाँ पानी के इन स्रोतों पर लगभग मुफ़्त में क़ब्ज़ा कर रही हैं और सरकारें इस लूट में कम्पनियों का पूरा साथ दे रही हैं। भारत में इसके कुछ उदाहरण देखते हैं। राजस्थान में जयपुर के निकट अकालग्रस्त काला डेरा में कोकाकोला का बॉटलिंग प्लाण्ट है। यहाँ हर रोज़ 5 लाख लीटर पानी धरती के नीचे से निकाला जाता है। एक लीटर बोतलबन्द पानी के लिए दो या तीन लीटर सादे पानी की ज़रूरत होती है। इस पानी को निकालने का ख़र्च कुछ ही पैसे आता है जिसको ये कम्पनियाँ बोतलों में भरकर 10 से 20 रुपये में बेचकर असीमित लाभ कमा रही हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कई प्रोजेक्ट हैं – राजगढ़ में कीलो और खरिकर नदियों पर, जगजीर में मण्ड पर, रायपुर में खैरों नदी पर, दन्तेवाड़ा में सावरी नदी पर। इसी तरह मध्यप्रदेश सरकार ने सन 2000 में रेडियस वाटर लिमिटेड को शिवनाथ नदी का 23.6 किलोमीटर का हिस्सा 22 सालों के लिए लीज़ पर दे दिया। कम्पनी को पानी आपूर्ति करने का एकाधिकार दिया गया। सरकार द्वारा इस कम्पनी को इस्तेमाल के लिए ज़मीन बिना किसी क़ीमत के सौंपी गयी। इस कम्पनी के साथ समझौते के मुताबिक़ सरकार हर रोज़ कम से कम 40 लाख लीटर पानी इस कम्पनी से ख़रीदेगी। कम पानी ख़रीदने पर भी 40 लाख लीटर के ही पैसे देने होंगे वहीं ज़्यादा पानी लेने पर वास्तविक मूल्य लगाया जायेगा। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही हाल है। कुछ साल पहले ही नेस्ले ने कोलोराडो में अरकानसस नदी का एक हिस्सा कौड़ियों के भाव ख़रीद लिया। 10 साल के लिए हुए इस सौदे के मुताबिक़ कम्पनी हर साल 2.45 बिलियन लीटर पानी निकाल सकती है जिसके लिए सिर्फ़ 1.6 लाख डॉलर सालाना का भुगतान करना होगा। इसी तरह 2003 में अकेले अमेरिका में नेस्ले की तरफ़ से 7 बिलियन लीटर पानी निकाला गया। दुनियाभर में इन कम्पनियों की तरफ़ से प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है और पानी बर्बाद किया जा रहा है।


बोतलबन्द पानी का यह गोरखधन्धा क़ुदरती स्रोतों को प्रदूषित करने के अलावा और भी कई तरीक़ों से पर्यावरण को नुक़सान पहुँचा रहा है। पहली बड़ी समस्या इससे पैदा होने वाला प्लास्टिक कचरा है। अकेले अमेरिका में एक महीने में 500 मिलियन बोतलें पैदा होती हैं, जिनसे धरती को पाँच बार ढँका जा सकता है। 2001 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल 89 बिलियन बोतलों के रूप में 15 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इसका सिर्फ़ 10 से 15 प्रतिशत ही पुनःचक्रित होता है, बाक़ी कचरे में जाता है। लैण्डफिल (कचरा भराव क्षेत्र) ऊपर तक भर चुके हैं और इस कचरे को समाने लायक नहीं बचे। इसलिए बड़े स्तर पर यह कचरा समुद्रों में फेंक दिया जाता है और इसका एक हिस्सा जलाया जाता है जिससे वातावरण में ख़तरनाक गैसें फैल जाती हैं। दूसरी बड़ी समस्या तेल के नुक़सान की है। पानी को धरती में से निकालने, बोतलें बनाने के लिए प्लास्टिक तैयार करने, तैयार बोतलों की ढुलाई व फिर ख़ाली बोतलों के निपटारे पर बहुत ज़्यादा तेल की खपत होती है। एक सर्वे के मुताबिक़ अकेले अमेरिका में बोतलबन्द पानी का उद्योग 1.5 बिलियन बैरल तेल का उपभोग करता है जो कि एक साल में 1 लाख कारों के लिए काफ़ी है। इस तरह सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में कितना तेल बर्बाद होता होगा।


प्राकृतिक संसाधनों की इस अन्धाधुन्ध लूट के दम पर ही इन मुनाफ़ाख़ोरों ने अरबों की कमाई की है। बोतलबन्द पानी का कारोबार संसार के सबसे अधिक मुनाफ़े वाले क्षेत्रों में से एक है जिसके कारण यह तेज़ी से बढ़ रहे धन्धों में से भी एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ इस कारोबार में 1 डॉलर निवेश के पीछे 45 डॉलर का लाभ है। पर इस क्षेत्र में लगे मुनाफ़ाख़ोरों के लिए यह भी कम है, ये इस क्षेत्र में और ज़्यादा लूट चाहते हैं और ये इसको बिल्कुल भी ग़लत नहीं मानते। नेस्ले के चेयरमैन पीटर बरबैक लटमेथ का कहना है कि “धरती पर पानी की एक-एक बूँद पर पूँजीपतियों का क़ब्ज़ा होना चाहिए और आपको बिना पैसे दिये एक भी बूँद नहीं मिलनी चाहिए।” पेप्सी के उपाध्यक्ष रॉबर्ट मौरीसन का कहना है – “नल का पानी सबसे बड़ा दुश्मन है।” यहाँ उनका मतलब मुनाफ़े से है कि नल का पानी उनके मुनाफ़े का सबसे बड़ा दुश्मन है। ये लोगों को किसी भी तरह मुफ़्त मिलता पानी बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसी तरह अमेरिका की कुआकर ओट्स कम्पनी की प्रधान सूजन वेलिंगटन के मुताबिक़ – “जब हम अपना काम कर चुके होंगे, तब नल का पानी नहाने-धोने के लायक ही रह जायेगा।” कोका कोला ने भी लोगों को होटलों, रेस्तराओं आदि में नल का पानी पीने से “बचाने” की योजना बनायी है जिसके अन्तर्गत लोगों को नल के पानी की जगह बोतलबन्द पानी, कोल्ड-ड्रिंक व अन्य बिकने वाले पेय पदार्थ पीने के लिए प्रेरित किया जायेगा।


जहाँ एक तरफ़ कुछ पूँजीपति घराने पानी के स्रोतों पर क़ब्ज़ा किये बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ करोड़ों लोगों को साफ़ पानी हासिल करना मुश्किल हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया की एक तिहाई आबादी पानी की कमी से जूझ रही है। पानी के प्राकृतिक स्रोत ख़राब हो रहे हैं जिसमें उद्योगों का बहुत बड़ा हाथ है और बोतलबन्द पानी का उद्योग भी इन्ही में से एक है। 80 प्रतिशत बीमारियों का कारण ख़राब पानी है। रोज़ाना पूरी दुनिया में 25,000 लोग ख़राब पानी के कारण मर जाते हैं। भारत में 18.2 प्रतिशत लोग पानी के क़ुदरती स्रोतों से पानी हासिल करते हैं और 5.6 प्रतिशत जनसंख्या कुँए के पानी पर निर्भर करती है। 3.77 करोड़ भारतीय पानी सम्बन्धी बीमारियों के शिकार हैं। देश में 12 बड़ी, 46 मँझोली और 55 छोटी नदियों के बेसिन हैं जो गँदले हो चुके हैं।

सरकारें सरेआम इस लूट में भागीदार हैं, उनकी तरफ़ से लोगों को साफ़ पानी उपलब्ध करवाने की जगह पूँजीपतियों के लिए सब्सिडियाँ और करों में छूट दी जा रही है, ताकि वे लोगों को “शुद्ध पानी” पिलाकर “पुण्य” कमा सकें! अमेरिका में 24 बिलियन डॉलर की फ़ण्डिंग सरकार द्वारा दी जाती है, जिससे ये कम्पनियाँ लोगों को “शुद्ध पानी” मुहैया करवायें। एक और बात ध्यान देने योग्य है कि पानी की इस कमी का शिकार आम मेहनतकश जनता ही होती है। दुनियाभर में अमीरजादों के घरों, मुहल्लों, वाटर पार्कों और ऐसी ही मनोरंजन की अन्य जगहों पर पानी के हो रहे दुरुपयोग के बावजूद उनके लिए पानी की कोई कमी नहीं होती है।



आइये, अब जल स्रोतों की कमी और पानी की तंगी के पूँजीवादी प्रचार पर एक नज़र डालें। सिर्फ़ भारत की बात करें तो नदियों के बड़े जाल और लम्बे समुद्री तट के बावजूद अगर कोई कहे कि यहाँ पानी की कमी है तो यह पूँजीवादी लूट और लोगों पर किये जा रहे जुल्मों पर पर्दा डालना होगा। बारिश का पानी और हिमपात भारत में जल के प्रमुख स्रोत हैं। लगभग 4,200 अरब घन मीटर पानी हर वर्ष बरसात से हासिल होता है। औसतन सालाना बरसात 1,170 मिलिमीटर है। ख़राब जल प्रबन्धन के कारण बरसाती पानी का अधिकतर हिस्सा बहकर समुद्र में मिल जाता है। भारत में प्रयोग योग्य पानी की उपलब्धता 1,122 अरब घन मीटर है जिसका केवल 1.9 प्रतिशत हिस्सा ही आज प्रयोग हो पा रहा है। केन्द्रीय जल कमीशन के आँकड़ों के अनुसार नदियों का सालाना बहाव 186.9 घन किलोमीटर है। देश में उपलब्ध भूजल की कुल मात्र 431.88 अरब घन मीटर है जिसमें से 360.80 घन मीटर सिंचाई और 70.93 अरब घन मीटर औद्योगिक कामों में प्रयोग होता है। इण्डियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एण्ड कल्चर हेरिटेज के अनुसार 980 बिलियन लीटर जल बरसाती पानी का संग्रह करके प्राप्त किया जा सकता है। आज यदि पूरे देश के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध करवाना है तो प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 150-200 लीटर पानी की ज़रूरत होगी। यह मात्रा बड़े शहरों के लिए है, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में यह पैमाना कम है। अब यदि 200 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के अनुसार देश की 121 करोड़ जनसंख्या के लिए एक वर्ष तक पानी की ज़रूरत का आकलन किया जाये तो वह 88.33 अरब घन मीटर होगा। जबकि प्रयोग योग्य उपलब्ध पानी 1,122 अरब घन मीटर है। यह मात्रा तो पूरी दुनिया की ज़रूरतों से भी ज़्यादा है। अगर पूरी दुनिया में पानी के स्रोतों को देखें तो यह मात्रा और भी नगण्य लगेगी।




असल संकट पीने के पानी समेत अन्य ज़रूरतों के लिए पानी की कमी का संकट है ही नहीं। ज़रूरत है पानी के स्रोतों का निजीकरण और इसे मुनाफ़े का उद्योग बनाना बन्द करके सभी लोगों की साझा सम्पत्ति बनाने की, हर व्यक्ति तक पानी पहुँचाने के उत्तम प्रबन्ध करने की। परन्तु मौजूदा लुटेरे ढाँचे व इसकी लुटेरी सरकारों से ऐसा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए तो मेहनतकश जनता को ही उठ खड़ा होना होगा।

13 September 2015

क्या इस देश से मुगलों का नामोनिशान मिटाने का वक्त आ गया है ?

भारत की मजबूत बुनियाद और इसकी सांस्कृतिक विरासत को हिलाने के लिए मुगलों के शासनकाल में सबसे बड़ी हिमाकत की गई। सभी मुगल बादशाह यहां के हिन्दुओं के प्रति आक्रामक रहे और धार्मिक स्थानों पर अपना झंडा बुलंद करने ने लगे रहे। अकबर ने तो इस मुल्क को धर्मान्तरण की अग्निकुण्ड में धकेल कर तथाकथिक इश्लाम के झंडाबरदार तैयार करने में लगा रहा। मगर इन सभी को पीछे छोड़ते हुए मुगल बादशाह औरंगजेब ने लगातार भारत पर अपने मजहब हुक्म से हिन्दुओं पर अत्याचार की सारी सीमाएं लाँघ दिया। शाहजहां, जिसे मोहब्बत का पैगाम देने वाला मसीहा माना जाता है, के शासन में भी धर्म परिवर्तन का सिलसिला नहीं रुका। अबोध बालक वीर हकीकत राय खन्ना का कत्ल उसी के काजियों के हुक्म से तब किया गया था जब उसने इस्लाम कबूल करने से इन्कार कर दिया था। 


शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने तो सरेआम हिन्दुओं के खिलाफ जंग छेड़ी और पूरे देश में हिन्दू धर्म स्थलों को अपना निशाना बनाया और सरेआम इन्हें काफिर घोषित किया। यह ऐतिहासिक सत्य है कि सभी मुगल बादशाहों में औरंगजेब के शासन में चलने वाले भारत की भौगोलिक सीमाएं सबसे बड़ी थीं और उसके शाही खजाने की राजस्व वसूली भी सबसे ज्यादा थी। औरंगजेब ने ही दक्षिण में पहली बार पूरी फतह पाने में सफलता प्राप्त की थी मगर उसके शाही खजाने में उस जजिया टैक्स का योगदान काफी ज्यादा था जो वह हिन्दू तीर्थ यात्रियों व व्यापारियों आदि पर लगाया करता था। भारत में शाही आतंकवाद का यह पहला नमूना था मगर उसे मराठा महाराज शिवाजी ने खुली चुनौती दी थी और कहा था कि भारत पर विदेशियों को शासन करने का कोई अधिकार नहीं है, उनसे सत्ता छीनना हर भारतवासी का कर्तव्य है। 




औरंगजेब की मृत्यु सन् 1707 में हो गई और उसके बाद मुगलिया सल्तनत ने भारत की बुनियाद में जो चूना लगाना शुरू किया था वह अपना रंग दिखाने लगा। रोजाना सवा मन हिन्दुओं के जनेऊओं को जला कर नमाज अता करने वाले औरंगजेब के औरंग (सिंहासन) के परखचे उड़ने शुरू हो गये। मराठा पेशवाओं और दूसरी हिन्दू रियासतों ने अपने हलके कब्जाने शुरू किये और 1833 आते-आते पूरा उत्तरी भारत आगरा से लेकर काबुल तक पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की शान में सिर झुकाने लगा लेकिन तब तक अंग्रेजों ने भारत में अपने पैर जमा लिये थे और वे इस मुल्क की बुनियाद में रखे गये चूने से पूरी तरह वाकिफ हो चुके थे। अत: उन्होंने इसी चूने को बारूद बना कर इस मुल्क की बुनियाद हिला डाली और औरंगजेब के काम को आधुनिक तरीके से आगे बढ़ाया तथा 1947 के आते-आते मुगलों की बनाई गई बुनियाद को अमलीजामा पाकिस्तान बनवा कर पूरा कर डाला।     


           


जो सपना औरंगजेब ने हिन्दू रियाया पर जुल्म ढहाते हुए देखा तक नहीं था उसे अंग्रेजों ने पूरा कर डाला। औरंगजेब ने मजहब के आधार पर राष्ट्रीयता तय करने की जो बुनियाद अपने कट्टरपन में डाली थी उसे अंग्रेजों ने बहुत ही आसानी के साथ नये जमाने के फलसफे गढ़ कर लागू कर डाला मगर आजाद भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि हमने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होते हुए भी इस वजह को बरकरार रखा और मुसलमानों के लिए अलग नागरिक आचार संहिता को लागू कर दिया। इसकी सारी जिम्मेदारी भारत के पहले प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर ही डालनी होगी क्योंकि भारत का संविधान लिखने वाले बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर इसके हक में नहीं थे मगर संविधान सभा में जिस प्रकार कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं का दबदबा था उन्होंने नेहरू को मुसलमानों को पृथक नागरिकता के दायरे में लाने के लिए प्रेरित किया। बस यहीं से मुस्लिम वोट बैंक की आजाद भारत में नींव पड़ी और मुसलमानों के पिछड़े रहने का फार्मूला सुनिश्चित हो गया। 



नेहरू की यह भूल कश्मीर की भूल से भी बड़ी है क्योंकि पाकिस्तान का निर्माण सिर्फ मुसलमानों के लिए महफूज जगह मुहैया कराने के नाम पर अंग्रेजों ने किया था मगर स्वतंत्र भारत में भी उन्हें अलग से धर्म के नाम पर रियायत देकर नेहरू ने एक ऐसी समस्या पैदा कर डाली जिसका लाभ अगर आज कोई उठाने की सबसे ज्यादा कोशिश करता है तो वह पाकिस्तान ही है। अत: आज हिन्दोस्तान में यदि औरंगजेब के भक्त पैदा हो रहे हैं तो उनका भारतीयता से किसी भी प्रकार से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है।



मगर आज इसी औरंगजेब के नाम पर दिल्ली में मौजूद एक सड़क का नाम पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल के नाम पर किया गया तो इस देश में एक बार फिर से औरंगजेब के औलाद सड़क उतर कर कोहराम मचाने लगे क्या ये मिसाइल मैन कलाम का अपमान नहीं है? तो ऐसे सवाल खड़ा होता है की क्यों न इस मुल्क से मुगलिया सल्तनत और औरंगजेब के हर निशान को मिटा दिया जाय ? 

04 September 2015

क्या खतरे में है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ..?

हर लोकतान्त्रिक देश की तरह भारत भी देश के तमाम पत्रकारों के पूर्ण रूप से आजाद होकर ख़बरें लिखने व छापने का दम्भ भरता है। लेकिन बीते कुछेक हफ़्तों से चल रहे भारतीय खबरनवीसों पर हमलों से इस दम्भ पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। विगत एक महीनें में कई भारतीय पत्रकारों पर हुए हमले से पूरे विश्व में भारतीय पत्रकारों की आजादी के साथ-साथ सुरक्षा पर भी चर्चाओं के साथ ऊँगली उठने लगी है। इसके साथ ही भारत के तमाम स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किये जाने लगे हैं।


जून माह की पहली तारीख को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में बतौर स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गयी थी। ठीक इसके कुछ दिनों बाद ही ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकार संदीप कोठारी के साथ भी घटी। स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले दोनों ही पत्रकारों की हत्याओं में दो समानता पहली ही नज़र में दिखाई पड़ती है। जहाँ एक ओर दोनों ही पत्रकारों की हत्याएं प्रदेश के माफियाओं के खिलाफ खबर लिखने व उससे समबन्धित सच को उजागर करने पर हुई थी तो वहीँ संदीप व जगेंद्र दोनों को जला कर बेहद बेदर्दी से से मार डाला।




बेहद बेदर्दी से की गयी दोनों पत्रकारों की हत्याओं के बाद देश के भीतर कई जगह इसका विरोध भी शुरू हो गया है। पत्रकार समूह के साथ-साथ देश के तमाम नेता, आम जनता आदि पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ कमोबेश खड़े होते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। बहरहाल, संदीप की हत्या पर काफी बवाल मचने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जगेंद्र सिंह के परिवार वालों को तीस लाख रुपये, दोनों बेटों को भविष्य में सरकारी नौकरी के साथ साथ जांच को पूर्णतः निष्पक्षता के साथ कराने का आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। दोनों पत्रकारों के परिवारों को सरकारों की तरफ से मिले आश्वासन के बाद अब भी देश के तमाम पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

अगर हम मौजूदा वक़्त में हो रहे पत्रकारों पर हमले की संख्या के बारे में बात करें तो बीते कुछेक वर्षों में पत्रकारों की हत्याओं के मामले में काफी तेज़ी आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जगेंद्र सिंह व संदीप कोठारी को मिलाकर बीते 22 सालों में 58 भारतीय खबरनवीसों की जान जा चुकी है। सौम्या विश्वनाथन, जे. डे. आदि जैसे कुछेक नाम हैं जिनकी हत्या के बाद भारतीय पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर नए तरीके से बात शुरू हुई लेकिन कई सालों के बीत जाने के बाद भी अभी तक सुरक्षा से सम्बंधित किसी भी प्रकार का कोई निर्णय केंद्र सरकार के द्वारा नहीं लिया गया है। निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में कई पत्रकारों पर भी हत्याओं के द्वारा रोक लगायी जा चुकी है। पूरे विश्व में हाल ही में हुए पत्रकारों की हत्यों पर एक नज़र डाले


तो पाएंगे कि पिछले दो वर्ष में लगभग 150 खबरनवीसों की आजादी पर हत्या के जरिये रोक लगाई गयी है। इस आंकड़े में एक दिलचस्प व् अचंभित करने वाला सच यह है कि मारे गए इन लगभग 150 पत्रकारों में से लगभग 60 के आस पास ऐसे खबरनवीस हैं जिनकी हत्या आतंकी गढ़ में रिपोर्टिंग करते हुए की गयी है। सच को उजागर करने व जनता से सीधे सरोकार की भावना की ही वजह से अब कहीं न कहीं देश, विदेश के तमाम पत्रकारों के ऊपर अपनी जान से हाथ धोने का संकट मंडराता हुआ प्रतीत हो रहा है। मौजूदा वक़्त में महज सीरिया, इराक, अफगानिस्तान जैसे पश्चिम एशियाई देशों के साथ-साथ सूडान, सोमालिया जैसे अफ्रीकी देश भी युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। इसी कारणवश वहां पत्रकारिता करने गए खबरनवीसों की कई बार हत्या की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त एशिया के प्रमुख देशों में आने वाले पाकिस्तान में भी पत्रकारों के लिए हालात बदतर हैं। ऐसे में मौजूदा दौर में निष्पक्ष एवं विश्वसनीय पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने वाले खबरनवीसों के लिए खतरे पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गए हैं।



निष्पक्षता पत्रकारिता का पहला नियम होने की वजह से तमाम पत्रकारों को न सिर्फ खबरों के प्रति निष्पक्षता बनाए रखनी होती है बल्कि जनता के समक्ष सच को उजागर करने की नीति भी कई बार उनकी जान जोखिम में डाल देती है। इसी कारणवश यह आवश्यक हो गया है कि सभी देशों की सरकारें मिलकर पत्रकारों के हित में ऐसे नियम व् कानून बनाये जिससे खबरनवीसों की जान को किसी प्रकार का कोई जोखिम न हो और वे खुलकर पाठकों तथा जनता के प्रति अपने कर्तव्य का सही रूप से निर्वहन कर सकें। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या खतरे में है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ?

04 July 2015

जब जीरो दिया मेरे भारत ने....!

आज हमारे देश के युवाओं में तकनीकी कौशल और प्रतिभा की कमी नहीं है, विश्व में हमारे देश की प्रतिभा सर चढ़ कर बोल रहा है। हम आपको कुछ ऐसे चुनिन्दा आकड़े बताना चाहेंगे जिसे सुनने के बाद आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जायेगा। विनोद धाम जिसने पेन्टियम चिप का अविष्कार कर पूरे विश्व की कंप्यूटर तकनीक में क्रांति लाने का काम किया। आज 90 प्रतिशत कंप्यूटर में इसी चिप का इस्तेमाल होता है। सबीर भाटिया जिसने हॉट मेल बना कर सबको चौका दिया। इतना हीं नहीं आज पूरी दुनिया जिस यू ट्यूब पर अपनी वीडियो अपलोड करती है या डाउनलोड करती है उसे भी बनाने वाला भारतीय छात्र हीं है। जब पूरी दुनिया कंप्यूटर पर सिर्फ डाटा रीड करती थी उस वक्त एक भारतीय माँ के सपूत ने विंडोज की खोज कर इतिहास रच दिया। इस खोज ने संसार की कंप्यूटर तकनीक को जीवंत बना दिया। जिससे वीडियो देखना और सुनना इतना आसान हो गया की आज बच्चा- बच्चा हजारों मिल दूर बैठे अपनों से लाइव बात करता है। ये सब भारतीय युवाओं कि तकनीकी कौशल के कारण संभव हो पाया है।  

एक बार बिल गेट्स से एक भारतीय छात्र ने पूछा की पूरी दुनिया में बड़े- बड़े इंजीनियरिंग और कम्पुटर साइंस की कॉलेज है जिसकी तुलना में भारतीय  कॉलेज काफी पीछे है, फिर भी आप भारतीय छात्रों को करोड़ो- अरबों रुपये के पैकेज पर क्यों प्लेसमेंट करते हैं? इस पर  बिल गेट्स ने कहा की जिस दिन हम इन भारतीय छात्रों को अपने यहाँ नौकरी के रखना छोड़ देंगे उसी दिन हमारे सामने दूसरा माइक्रोसॉफ्ट खड़ा हो जायेगा! ये ताकत है हमारे देश के युवा छात्रों की। आज अमेरिका के 38 प्रतिशत डॉक्टर, 12 प्रतिशत वैज्ञानिक भारतीय हैं। जबकि नासा के 36 प्रतिशत, इंटेल के 17 प्रतिशत वैज्ञानिक, आई. बी. एम. के 28 प्रतिशत और  जिराक्स के 13 प्रतिशत कर्मचारी भारतीय हैं। ये तो हमारे आधुनिक भारत के कुछ चुनिन्दा आकड़े और उदाहरण है। हमारा देश सदियों से दुनिया को आईना दिखाता रहा है।

 जब जीरो दिया मेरे भारत ने....!
 
आज दुनिया भले ही एडवांस रिसर्च की रॉकेट पर सवार हो, लेकिन इसका ईंधन भारतीय धर्मग्रंथों से ही आया है। भारत ने जिस जीरो की खोज की आज वह पूरी दुनिया पर भारी है। दुनिया भर में सभ्यताओं के विकास के साथ ही गिनने, जोड़ने-घटाने के तरीकों ने विकास किया। बस दिक्कत यह थी कि संख्या 9 के बाद दहाई, सैकड़ा आदि के लिए अलग से चिन्ह बनाए गए थे। मगर भारतीय गणितज्ञ भास्कर प्रथम ने 600 ईसवी में एक छोटे से गोले को नंबर सिस्टम में जोड़ा और देखते ही देखते संख्याओं ने नई शक्ल लेनी शुरू की और भारत का डंका पूरे विश्व में बजने लगा। आज दुनिया में जितने भी बड़े से बड़े कंप्यूटर, रॉकेट, सैटेलाइट, और न जाने अभी आगे क्या-क्या बनेगा, ये सब भारत की वजह से हीं संभव हो पाया है।

वही एक और चमत्कारी खोज जिसे हम गणित में पाई के नाम से जानते हैं जिसके आगे आज भी दुनिया भर के वैज्ञानिक दातों तले उंगलियां दबाते हैं। पाई वह नियत (कंस्टेंट) वैल्यू है, जिससे किसी सर्कल के सर्कम्फ्रेंस और उसके डायमीटर का अनुपात ज्ञात किया जाता है। आर्यभट्ट ने इसकी सटीक वैल्यू निकालने के लिए 500 वीं सदी में अपने ग्रंथ आर्यभट्टीयम के गणितपद के दसवें श्लोक में लिखा:
 
                                                      चतुर्दिकम शतमस्तगुणम द्वासास्तिस्थात सहस्रनाम।
                                                              आयुतद्वयाविस्काभस्यासनौ वृपरिन्हा।।
 
इसका मतलब है : 100 में चार जोड़ें, 8 से गुणा करें और फिर 62000 जोड़ें। इस नियम से 20000 परिधि (सर्कम्फ्रेंस) के एक वृत्त (सर्कल) का व्यास (डायमीटर) पता किया जा सकता है। मतलब ((4 + 100) x 8 + 6200) / 20000 = 3.1416

आज भी दुनिया भर में पाई की यही वैल्यू मान्य है। पिंगल जैसे भारतीय ग्रंथों  में 300-200 ई. पू. गणितीय सूत्र और खोज की जानकारी मिलती है। ऐसे में आज हम सब को अपनी हूनर और ताकत को पहचानने की जरुरत है।

लार्ड मैकाले की दमनकारी नीति....!

इस देश में अफगानी आक्रमणकारियों के अत्याचार से लेकर अंग्रेजों के गुलामी तक भारत की अध्यात्मिक और धार्मिक आस्था इस कदर लोगों के मन- मानस में प्रगाढ़ थी कि अंग्रेज भी इसे ध्वस्त करने से पहले सौ बार सोचते थे।

आखिर इसका कारण क्या था इसे जानने के लिए हमें लार्ड मैकाले का सबसे प्रचलित कूटनीति को समझना होगा। देखिए ये ब्रिटिश प्रतिनिधि किस प्रकार हमारे अध्यात्मिक और संस्कृतिक बिरासत से भयभित है।

लार्ड मैकाले ने 1835 में ब्रिटेन की संसद को एक प्रस्ताव भेजता है और कहता है कि मैं भारत के कोने-कोने में घूमा हूं। मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी या चोर हो।  इस देश में मैने इतनी धन-दौलत देखी है, इतने परित्रवान और आदर्शवान मनुष्य देखे हैं, जिसे मैं शब्दों में कल्पना नहीं कर सकता। इसलिए मैं नहीं समझता कि हम सब इस देश को कभी जीत पायेगें, जबतक की हम इसकी रिढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते। और वो है इसकी अध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत।

ऐसे में मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी अध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्परा को बदल डालें। क्योंकि अगर भारतीय ये सोचने लगें कि जो भी विदेशी है, और अंग्रेज हैं वह अच्छे हैं और उनकी हर चीज हम से बेहतर है, तो वो (भारतीय) अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृती को भुलाने लगेंगे और वे वैसे ही बन जाएंगे जैसे हम चाहते है। यानि की अक्ल से अंग्रेज़ मगर शक्ल से भारतीय। फिर भारत एक पूरी तरह से दमनकारी देश बन जायेगा। ये प्रस्ताव लार्ड मैकाले द्वारा 1835 को ब्रिटिश संसद के समक्ष पेश किया गया।

17 March 2015

राजनीति या राष्ट्रनीति ?

यह कहना कहीं से भी अनुचित नही है कि स्वंतत्र के होने के बाद पिछले सढ़सठ वर्षों में देश ने केवल राजनीति को ही प्रभावी होते देखा है क्योंकि सभी राजनीतिज्ञों का मन, मस्तिष्क और ह्रदय देश के आर्थिक बौद्धिक एवं सामाजिक विकास की ओर केंद्रित न होकर बल्कि येन केन प्रकारेण सत्ता पर अपना आधिपत्य जमाये रखने पर ही केंद्रित था और इस सत्ता अधिग्रहण के लिए उन्होंने सबसे पहले देश को जाति संप्रदाय धर्म में बाँटना शुरू किया और उसके बाद कभी रूस तो कभी अमेरिका के आगे देश को समर्पित कर दिया। जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुई यह भ्रष्ट ओछी घृणित राजनीतिक यात्रा मन मोहन सिंह पर आकर थमी और 26 मई 2914 को राजनीति को राष्ट्रनीति में बदलने का विधिवत कार्यक्रम शुरू हुआ। राष्ट्र किसी भूखंड का नाम नही बल्कि राष्ट्र की भूमि सतह ,नभ और भूगर्भ ये तीनों मिलकर राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं लेकिन राष्ट्र की संस्कृति सभ्यता और मर्यादा स्थापित करने का दायित्व राष्ट्र में रह रहे प्रत्येक जीवधारी का कर्त्तव्य है। पशु ,पक्षी,बनस्पति और वनसंपदा के साथ साथ मानवदेह धारी भी राष्ट्र की पहचान बनते हैं।

भारत ही विश्व का एक मात्र ऐसा देश है जहाँ सारे मौसम ,सारी ऋतुएँ और सभी प्रकार के कटिबन्ध मिलते हैं। यहाँ रेगिस्तान भी है तो तराई क्षेत्र भी है ,यहाँ किसी स्थान पर सबसे कम वर्षा होती है तो कोई स्थान सबसे अधिक वर्षा होने के लिए इतिहास में दर्ज है। भारत भाषा में भी अपने आप में एक ऐसा अनूठा देश है जहाँ से संस्कृत भाषा का उदय हुआ और इसको वेदवाणी भी कहा जाता है और जितनी ही भाषाएँ विश्व में प्रचलित हैं उन सबका जन्म संस्कृत से ही हुआ है। मक्का में पवित्र काबा के पास भी दो शिलाओं पर संस्कृत भाषा में लिखी कुछ लिपियाँ मिलीं लेकिन देश का दुर्भाग्य यही रहा कि देश के स्वतंत्र होने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर मन मोहन सिंह तक सारे ही प्रधानमंत्रियों ने कभी भी अपने राष्ट्र की सांस्कृति और बौद्धिक सम्पदा के बारे में विश्व को बताया ही नही। 

इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देश तक में भगवान लक्ष्मी गणेश के चित्र इंडोनेशियाई मुद्रा पर अंकित हैं लेकिन कांग्रेस सरकार ने वेदों के मन्त्र ” सत्यमेव जयते ” तक को मुद्रा से हटा दिया ,यहाँ तक कि इंडोनेशिया में हवाई सेवाओं को गरुड़ नाम दिया गया और आज जिओग्राफिक और डिस्कवरी चैनलों पर दिखाया जाता है कि समुद्र के भीतर भी चार पांच हजार वर्ष पुराने मंदिर निकले हैं जिनमें स्थापित भगवान शंकर और गणेश की प्रतिमाएं अभी तक सुरक्षित हैं।  विश्व की सबसे पुरानी अंग प्रत्यारोपण सर्जरी का उदाहरण तो स्वयं भगवान गणेश हैं यानि मनुष्य के सिर पर हाथी के सिर का सफल प्रत्यारोपण लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी इस उपलब्धि को कोरी कल्पना मानते हैं।  पूरा देश रामनवमी मनाता है लेकिन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम के ही अस्तित्व को न केवल झुठलाया बल्कि रामसेतु तोड़ने के लिए दुनिया भर के प्रपंच रचे। 

गुजरात में सोमनाथ और ओडिशा में कोणार्क सूर्य मंदिर चुंबकीय शक्ति का अनूठा प्रयोग था लेकिन किसी भी सरकार ने इन मंदिरों की भव्यता के बारे में विश्व को अवगत ही नही कराया ? यूपी के मथुरा जिले में पवित्र गोवर्धन पर्वत की शिलाओं को तोड़कर पीसकर बेचा जा रहा है और धीरे धीरे गिरिराजजी के अस्तित्व पर ही ग्रहण लगाने की साजिश रची जा रही ताकि देश से आध्यात्मिक इतिहास मिटाया जा सके। यूपी के एक स्थान ओरछा में भगवान राम का मंदिर है जहाँ पाषाण विग्रह में ही बाल बढ़ते हैं लेकिन मंदिर तोड़कर बनायीं गयी कब्रगाह ताजमहल को तो विश्व का आठवां अजूबा मान लिया लेकिन जीते जागते प्रत्यक्ष प्रमाण ओरछा मंदिर को कोई स्थान नही। देश को जातियों में इतना बाँट दिया कि अब इनका समन्वय आसान नही क्योंकि आरक्षण देकर इनको तो सुरक्षित किया गया लेकिन इनके आरक्षण के पीछे उचित सुपात्रों और सुयोग्यों का अधिकार वंचित कर दिया गया जबकि आरक्षण के बजाय उनको समान स्तर पर लाने के अन्य विकल्प भी आजमाये जा सकते थे लेकिन इससे वोट बैंक प्रगाढ़ जो करना था और अब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसमें रत्ती भर भी फेरबदल नही कर सकती और पूर्ववर्ती सरकारों ने देश में एक धर्मसंगत आरक्षण की नयी प्रथा शुरू कर दी ताकि अब देश में कभी भी सांप्रदायिक और धार्मिक सोहार्द्य स्थापित ही नही हो सकता।

 राजनीति अब एक व्यवसाय हो चुकी है जहाँ बाप दादा पोता सभी एक साथ मिलकर राजनीति को अपना पैतृक व्यवसाय बनाकर चल रहे हैं ताकि परिवार का एक न एक सदस्य किसी न किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनकर सत्ता सुख भोगता रहे। लालू यादव बड़ी चतुराई से अपनी पुत्रियों का विवाह अन्य प्रदेशों के राजनीतिक घरानों में तय कर रहे हैं ताकि इनकी पुत्री को किसी भी प्रकार का संकट भविष्य में झेलना न पड़े। बड़े बड़े राजनीतिज्ञ अपनी संतानों के विवाह प्रशासनिक अधिकारीयों से करने में लालायित रहते हैं ताकि इससे दो फायदे रहें पहला तो सरकार बदलने के बाद भी अपराधिक इतिहास पर पर्दा पड़ा रहता है और दुसरे संतान भी सरकारी सुविधा मौजमस्ती का आजीवन लाभ लेती रहे।

 भारत में केवल हिन्दू ही नही बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के भी अनुयायी रहते हैं जिनको अल्पसंख्यक होने का आरक्षण लाभ दिया गया है लेकिन इन दोनों के अहिंसा और सत्य मूलोपर्मोधर्म है उसके बाबजूद भारत आज विश्व का सबसे बड़ा पशुमांस निर्यातक देश का गौरव प्राप्त देश हो गया है ,अब पशुमांस निर्यातक देश होने का यह गौरव है या शर्म कि जिस राष्ट्र में कभी दूध घी तेल की नदियां बहती थीं वहां देश के हर शहर के हर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में नालियों में दुधारू पशुओं का रक्त बह रहा है और उनका मांस निर्यात हो रहा है यानि घर घर में खुले ये वैध या अवैध कमेले भारत राष्ट्र की संस्कृति है या संस्कृति का अपमान यह विचारणीय प्रश्न है? पूर्णतः व्यवसायिक आर्थिक लाभ के उद्देश्य से व्यापक निर्मम पशु हत्या को मांस उत्पादन का नाम देना क्या भारत की संस्कृति और मर्यादा का पर्याय है ? और निर्मम पशु हत्या को न केवल मांस उत्पादन कहा जा रहा है अपितु इसको कृषि कोष्ठ में रखकर पशुहत्या से होने वाली आय को आयकर मुक्त करके मांस ट्रांसपोर्ट पर सब्सिडी अलग से दी जा रही है लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग उदासीन होकर सत्ता सुख भोगने वाले राजनेताओं के षड्यंत्र को सहन कर रहा है और देश में स्थिति यह हो गयी है कि भारत अब नकली दूध, नकली घी, और नकली मावा की सबसे बड़ी मंडी बन चूका है। 

कोई भी सामान खरीदते समय हर क्रेता को यह संशय बना रहता है कि खरीदा हुआ सामान असली भी है कि नही ? बौद्धिक दिवालियेपन का शिकार होता आज हर भारतीय ग्राहक यह भली भांति जानता है कि दवाईयों से लेकर खाने पीने और इलेक्ट्रॉनिक सभी सामान चीन से आ रहे हैं लेकिन फिर भी इनके मेनुफेक्चरर होने का दावा किया जाता है। भारत में बाजार में बिकने वाली सारी एलोपेथिक और अन्य पैथियों की दवाईयां के रॉ यानि कच्चा माल चीन से ही आयात होता है यहाँ कि मैनुफैक्चरिंग यूनिटें केवल उनको टेबलेट कैप्सूल या सिरप का आकर देती हैं। सुई से लेकर बड़े बड़े कलपुर्जे तक चीन से आयात होते हैं, घरों में लगे बिजली के मीटर भी चायनीज हैं और कम्प्यूटर मोबाईल आदि तो क्या कहें यानि देश की भ्रष्ट राजनीति ही इन सबके लिए जिम्मेदार है और यह सब कोई एक दिन में नही हुआ बल्कि पिछले सढ़सठ वर्षों की भ्रष्ट मौकापरस्त अवसरवादी राजनीति का प्रसाद है और अगर इस भ्रष्ट राजनीतिक को राष्ट्रनीति में बदलना है तो राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर में राजनीतिज्ञों के चयन में आमचूल् परिवर्तन नितांत आवश्यक है वर्ना देश कभी भी पुनः परतंत्र हो सकता है क्योंकि आज भारत के विकास हेतु विदेशी निवेश और विदेशी तकनीकी के साथ साथ विदेशी तकनीकि विशेषज्ञों की मजबूरी है और जो भारत की प्रतिभा योग्यता दक्षता भ्रष्ट राजतन्त्र और भ्रष्ट आरक्षण व्यवस्था से तंग होकर विदेश पलायन कर गयी वह किसी भी सूरत में घरवापसी को तैयार नही क्योंकि उनकी दृष्टी में अपना देश भारत अब एक गन्दा बीमार पिछड़ा अशिक्षिक गरीब राष्ट्र है और एक प्रश्न यह भी है कि वे यहाँ आकर करेंगे भी क्या क्योंकि भारत के किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई भी काम बिना रिश्वत के होता ही नही है। उदाहरण के तौर पर यदि पासपोर्ट भी बनवाना हो तो भले ही नियम कानून कुछ भी हों लेकिन एलआईयू और सम्बंधित थाने की जाँच आंख्या तब तक पासपोर्ट कार्यालय तक नही पहुंचेगी जब तक दोनों कार्यालयों के प्रतिनिधियों को न्यूनतम पांच सौ रूपया सुविधा शुल्क न मिल जाय। 

कहने को तो देश के हर शहर के व्यस्ततम चौराहों पर यातायात पुलिस वाले वाहन स्वामियों और वाहनों की चेकिंग अभियान चलाते देखे सकते हैं लेकिन कभी इन्ही पुलिस कर्मियों की जेब की चेकिंग की जाय तो इनकी जेब से ही उस समय उतना पैसा निकलेगा जितना कि इनका मासिक वेतन भी नही होता अब यही सब भ्रष्ट राजनीतिक प्रसाद भारतीय मिलजुलकर खा रहे हैं और जब तक निस्वार्थ राष्ट्रवाद सत्ता पर आसीन नही होगा तब तक राजनीति राष्ट्रनीति में परिवर्तित नही हो सकता और यह परिवर्तन फ़िलहाल तो होता दिखता नही क्योंकि सरकारें बदलती हैं सिस्टम नही बदलता। खादी पहनने वाले कुर्सियां कुर्सियां और दल तो बदल लेते हैं लेकिन इनकी मानसिकता नही बदलती ?

30 November 2014

हिमायत से हिमाकत तक !

देश में एक बार फिर से क्षत्रप बनाम राष्ट्रीय दल की आंधी में जनता की तस्वीर धुंधली नज़र आरही है। कोई हिमायती बता कर हिमाकत दिखा रहा है, तो कोई हितैशी बता कर निजी हित साधने में लगा है। चौदहवीं लोकसभा के चुनाव के बाद बने राजनीतिक परिदृश्य में मोदी की एक छत्र हुकूमत कायम होती जा रही है। मोदी के पीछे संघ की विचारधारा है और एक मजबूत वैचारिक एजेंडा पर काम करने वाली राजनीतिक शक्तियां निरंकुश शासन चाहती हैं। भले ही वे शक्तियां दक्षिण पंथी हो या वामपंथी। यही वजह है कि मोदी ने लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने के तकाजे पर कोई कान न देते हुए निर्धारित संख्या की तकनीकी आड़ में कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा देना कबूल नहीं किया। भले ही देश में लोकतंत्र चौसठ-पैंसठ वर्ष की प्रौढ़ अवस्था प्राप्त कर चुका हो लेकिन लोगों में अभी लोकतांत्रिक संस्कारों की पैठ बनने में समय लगेगा। भारत के लोग आज भी निरंकुश नेतृत्व के प्रति आकर्षित रहते हैं। इंदिरा जी ने अपने समय में इसका लाभ उठाया। मोदी वर्तमान में इसका लाभ उठा रहे हैं। सामाजिक बदलाव के क्षितिज पर व्यापक योगदान करने वाले वीपी सिंह की विफलता की मुख्य वजह यही रही कि वे अपने नेतृत्व को सर्व सत्ता संपन्न बनाने का कौशल नहीं रखते थे। उन्होंने पश्चिम के लोकतंत्र की तर्ज पर उदार नेतृत्व के जरिए आगे बढऩे की कोशिश की और मात खा गए। देश इंदिरा गांधी के बाद जैसे उन जैसा ही नेता तलाश रहा था। केेंद्रीय स्तर पर जब उसने शून्य देखा तो वह राज्यों में ऐसे नेताओं पर फिदा हुआ। मुलायम सिंह, मायावती, जयललिता, ममता बनर्जी की गर्वनेंस की काबलियत निश्चित रूप से संदिग्ध है लेकिन फिर भी वे इसलिए कामयाब हैं कि एकतंत्रीय शासन चलाते हैं।

 केेंद्र में राजीव गांधी में भी वह बात नहीं थी। शायद संजय गांधी जीवित रहते तो मतदाताओं को इंदिरा गांधी का विकल्प मिल सकता था। नरसिंहा राव से तो खैर क्या उम्मीद मतदाता करते। चंद्रशेखर में तानाशाही का गुण था लेकिन उनके पास जनाधार नहीं था। अटल बिहारी वाजपेई में कुछ मात्रा में तो अधिनायक वाद का तत्व था जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने तब की जब लालकृष्ण आडवाणी अपनी महत्वाकांक्षा की वजह से उनके लिए समस्या बन रहे थे। सही मायने में न टायर न रिटायर का हुंकारी अंदाज में बयान करके उन्होंने ही लालकृष्ण आडवाणी की राह में ऐसे कांटे रोपे जिसकी वजह से प्रधानमंत्री बनने की उनकी हसरत अंत तक परवान चढ़ ही नहीं पाई। फिर भी अटल बिहारी वाजपेई के अंदर कहीं न कहीं सुकुमारता थी। मोदी के रूप में मतदाताओं को इंदिरा गांधी का परफेक्ट विकल्प मिल गया है। यह बात दूसरी है कि इंदिरा गांधी जवाहर लाल नेहरू की पुत्री थीं और कांग्रेस की उस परंपरा की नेता थीं जो भारत के बहुलतावादी समाज में सभी वर्गों को विश्वास में लेकर शासन चलाने में विश्वास रखती थीं। मोदी का लक्ष्य और तौरतरीके अलग हैं। संघ का एजेंडा उन्हें पूरा करना है जिसकी वजह से मोदी अपने अल्टीमेट में देश के लिए खतरनाक साबित होंगे। फिर विकल्प की खोज तो कांग्रेस और इंदिरा गांधी की भी होती रही। विपक्ष के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता। भले ही मोदी बिना विपक्ष के चलना चाहते हों इसलिए विकल्प की जद्दोजहद तो होगी ही साथ में सच यह भी है कि कांग्रेस सहित किसी दल में यह कुव्वत नहीं रह गई कि वह मोदी का अकेले दम पर मुकाबला कर सके बल्कि कांग्रेस तो अपनी शक्ति में न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी है। अगर यही स्थिति जारी रही तो कहीं उसकी राष्ट्रीय स्तर की हैसियत पर ही प्रश्नचिह्नï न लग जाए इसलिए सब मिलकर मोदी पर भारी पडऩा चाहते हैं।

मोदी अपनी अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं को मीडिया में इस तरह प्रोजेक्ट करवा रहे हैं जैसे वे सबसे बड़े विश्व नेता के रूप में मान्य हो चुके हों। मोदी भारत के लोगों की इस मानसिकता से परिचित हैं कि यहां अगर किसी को विदेशों में मान्यता मिलती है तो वह अपने आप देश के आंतरिक समाज में बढ़त पा लेता है इसलिए मोदी एक रणनीति के तहत विभिन्न देशों की अपनी यात्रा की उपलब्धियों को बढ़-चढ़कर प्रचारित करवा रहे हैं। कांग्रेस के एक नेता ने कहा है कि मोदी प्रधानमंत्री पद का दुरुपयोग करके अपनी विदेश यात्राओं में प्रवासी भारतीयों से अपने पक्ष में नारेबाजी कराते हैं। यह बात सही भी हो सकती है। बहरहाल मोदी अपने उद्देश्य में इतने कामयाब हैं कि उन्होंने महाराष्ट्र और हरियाणा में जहां कभी पहले भाजपा ने अपनी दम पर सरकार नहीं बना पाई थी अपना मुख्यमंत्री बनवा लिया है लेकिन लगने यह लगा है कि कहीं जम्मू कश्मीर में भी वे भाजपा की सरकार बनवाने का चमत्कार करने में सफल न हो जाएं। जिस तरह से पृथकतावादी नेता मरहूम अब्दुल गनी लोन के बेटे ने उनकी तारीफ की है और यासीन मलिक ने भी उनके प्रति झुकाव दिखाया है उससे लगता है कि भले भी भाजपा को अपने लक्ष्य के अनुरूप जम्मू कश्मीर विधान सभा की पचास सीटों पर सफलता हासिल न हो लेकिन इतनी सीटें तो मिलने के आसार बनने लगे हैं कि भाजपा गठजोड़ करके स्वयं उक्त राज्य में सरकार बना ले। अगर यह चमत्कार घटित होता है तो मोदी का ग्राफ और ज्यादा ऊंचा चला जाएगा। साथ ही विपक्ष का बौनापन और ज्यादा बढ़ जाएगा।

इस कारण विपक्ष एकजुट होने को बेचैन है लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। ममता बनर्जी ने कहा कि क्षेत्रीय दलों का मिलाजुला वोट भाजपा की मत प्राप्ति से काफी ज्यादा हो सकता है लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह गठजोड़ विचारधारा पर आधारित होना चाहिए। समाजवादी पार्टी, अन्ना डीएमके, राजद, जनता दल (एस) और चौटाला की पार्टियां विशुद्ध रूप से प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां हैं जिनको सत्ता मिल जाए तो गर्वनेंस से वे कोई ताल्लुक नहीं रखना चाहतीं। इनके नेता पूरी सत्ता का दोहन अपने परिवार का वैभव ऐश्वर्य बढ़ाने के लिए करने में हया की सारी सीमाएं तोड़ देते हैं। इनके साथ ममता बनर्जी मोदी के विरोध के नाम पर भी बहुत दूर तक नहीं चल सकतीं। ममता बनर्जी अडिय़ल नेता की अपनी छवि के बावजूद सादगी पसंद कमोवेश ईमानदार और परिवारवाद से असंपृक्त नेता के बतौर पहचानी जाती हैं। मुलायम सिंह हों लालू हों या चौटाला अपने लिए वे इस तरह की सीमाओं को कैसे स्वीकार कर सकते हैं। वामपंथी दलों में मुलायम सिंह के लिए मोह तो बहुत है लेकिन वे भी जनता दल परिवार का न्यूनतम एजेंडा देखकर उनके साथ कोई रिश्ता बनाने की बात कह रहे हैं। 

मुलायम सिंह का शासन करने का जो ढर्रा है उसमें वे किसी जनवादी एजेंडे पर तैयार हो सकेें यह असंभव दिखता है इसलिए इच्छा रखने के बावजूद वामपंथी खेमे को मुलायम सिंह के साथ कोई गठजोड़ बनाने के पहले लाख बार सोचना है। रही कांग्रेस की बात तो उसके लिए डूबते को तिनके के सहारे की खोज है। इस कारण वह मर्यादाहीन राजनीति से भी समझौता कर सकती है लेकिन ऐसे विकल्प से जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित नहीं कराया जा सकता। वामपंथियों का एक पुराना स्लोगन है कि संघर्षों से विकल्प तैयार किया जाना चाहिए। यह आज के समय में सर्वाधिक प्रासंगिक है। जिन राजनीतिक शक्तियों में संघर्ष के जरिए विकल्प खड़ा करने का जज्बा है उन्हें जल्दबाजी दिखाने की बजाय इसी नीति पर अमल करने की सोचना चाहिए। एक बात साफ है कि मोदी का विकल्प अब तभी तैयार होगा जब प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक शक्तियों में व्यक्तिगत स्तर पर उन्हीं की तरह साफ-सुथरा पन हो। साथ ही जनभावनाएं गठजोड़ की राजनीति के विरुद्ध हो चुकी हैं। जनमानस की यह ग्रंथि विपक्ष में अंधाधुंध गठजोड़ के लिए हो रहे प्रयास के प्रतिकूल है। जाहिर है कि ऐसा गठजोड़ बहुत टिकाऊ नहीं हो सकता।

 सत्ता मिलने के बाद ऐसे गठजोड़ में व्यक्तिगत स्वार्थों और व्यक्तित्वों के बीच टकराव की वजह से बहुत जल्दी बिखराव शुरू हो जाता है। लोग राजनीतिक अस्थिरता के नुकसान देख चुके हैं। इस कारण वे अब ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते। इस कारण गठजोड़ न्यूनतम कार्यक्रम पर आधारित होगा तभी विश्वसनीय होगा। इस मामले में पश्चिम बंगाल का वाम गठजोड़ मिशाल है जिसके कारण पच्चीस वर्षों तक उसे बराबर जनादेश प्राप्त होता रहा। क्या मोदी के विरुद्ध गठजोड़ बनाने में ऐसा आधार तैयार करना फिलहाल संभव है।

18 October 2014

क्या आबादी बढ़ाने से हीं बढ़ेगी लोकतंत्र में भागीदारी ?

आज देश के सांसद और विधायक एवं अन्य राजनेता अपने अपने भविष्य को लेकर भयभीत है। यह भय किसी आतंकवादी हमला अथवा महामारी को लेकर नही है अपितु यह भय भारत सरकार द्वारा बनाया गया ‘डीलिमिटेशन कमीशन‘ द्वारा दी गयी रिपोर्ट से व्यापत हो गया है। इससे एक नया सिस्टम आरक्षण के लिए बना है, जिस कारण भारत में देश की संसद एवं विधायिकाओं में आरक्षित सीटों की संख्या में स्वतः ही भारी वृद्धि हो जाती है।

इसका साफ अर्थ यह हुआ कि आने वाले समय में देश की लोकसभा एवं विधान सभा और अधिक आरक्षित होगी और भविष्य में देश में जातिवादी विभाजन को और ज्यादा ताकत मिलने वाली है। कमीशन को यह कार्य एवं अधिकार दिया गया है कि देश राज्यों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों में देश की जनसंख्या की संरचना के ढांचे का जातिगत अध्ययन करें और उसके आधार पर अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए नयी आरक्षित सीटों का चयन करें।

भारत सरकार के द्वारा जस्टिस कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में बने इस आयोग के सुझावों पर अगर अमल होता है तो बड़ी संख्या में देश के वर्तमान नेताओं के चुनाव क्षेत्र आरक्षित हो जायेंगें। उन्हें या तो राजनीति से अवकाश लेना पड़ेगा या फिर उन्हें किसी नये चुनाव क्षेत्र का चयन करना पड़ेगा। इसके साथ ही साथ देशभर में जातिवादी एवं साम्प्रदायिक राजनेताओं की एक नयी फौज को सामने आने का रास्ता साफ होगा।

धर्म निरपेक्षता एवं सामाजिक न्याय का ये नायब उदहारण है। इस नये आकलन का सबसे ज्यादा प्रभाव हिन्दु बहुल क्षेत्रों पर ही पड़ेगा क्यांकि एक तो पिछले कुछ दशकों में देश में मुस्लिम आबादी एवं उनके क्षेत्र में काफी फैलाव हुआ है। दूसरे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से गैर मुस्लिमों का लगभग सफाया हो चुका है। इस कारण मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की जनसंख्या लगभग खत्म हो चुकी है। इस कारण वहां आरक्षित सीटों की संख्या बढने के स्थान पर घट रही है। जैसे कश्मीर घाट़ी से गैर मुस्लिम लगभग साफ हो चुके हैं इस कारण वहां आरक्षित सीटों की संख्या खत्म होने की सम्भावना हो चली है।

आयोग को आरक्षित सीटों की संख्या सुनिश्चित करने के लिए सन 2001 की जनगणना के आंकड़ो को आधार बनाने के लिए निर्देश दिये गया था । इस आधार पर आरक्षित सीटों की संख्या बढना तय है। दूसरे शहरी क्षेत्रों की सीटों की संख्या का बढना तथा ग्रामीण क्षेत्रों की सीटों की संख्या का कम होना तय है क्योंकि पिछले लगभग दो दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों में जर्बजस्त पलायन हुआ हैं इसी प्रकार आरक्षित वर्ग की जनसंख्या में भी भारी वृद्धि हुई है जबकि गैर आरक्षित वर्ग के हिन्दुओं की जनसंख्या घट रही है। यह तथ्य आने वाले समय में देश में भारी राजनीतिक बदलाव के होंगें। यही कारण है कि बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम माझी यहां तक कह दिए की दूसरे धर्मो में शादी कर दे पीछड़े वर्ग के लोगों को अपनी जनसँख्या बढ़ानी चाहिए। 

लोक सभा में सांसदों की संख्या का निर्धारण अनुच्छेद 81 के आधार पर किया जाता है जिसके आधार पर विभिन्न राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर सीटों का बटवारा किया जाता है। इसी प्रकार देश में अनुच्छेद 82 के आधार पर संख्या निर्धारण आयोग अथवा डिलिमिटेशन कमीशन का गठन किया जा सकता है जिसके आधार पर लोक सभा एवं विधान सभाओं में विभिन्न वर्गो के लिए सीटों का निर्धारण अथवा अरक्षण होता है।

अब यह दोनों संवैधानिक अनुच्छेद देश में विघटनकारी मानसिकता बढाने के लिए उत्तरदायी हैं। जिन राज्यों अथवा वर्गो की जनसंख्या घट रही है उनको यह दंड होगा कि उनका प्रतिनिधित्व भी कम होगा इसके विपरीत जिन राज्यों एवं वर्गो की जनसंख्या अधिक होगी उनका प्रतिनिधत्व उतना ही ज्यादा होगा। इसका सीधा मतलब यह होगा कि जो राज्य एवं वर्ग जनसंख्या बढ़ा कर देश एवं यहां के संसाधनों को बर्बाद कर रहे हैं उन्हें पुरस्कृत किया जायेगा जबकि जो राज्य एवं वर्ग जनसंख्या घटा कर राष्ट्र एवं राष्ट्र के संसाधनों की रक्षा कर रहे हैं उन्हें दण्ड दिया जायेगा।

यह भारत के महान संविधान की बड़ी विशेषताऐं हैं। इन्हीं बातों के मददेनजर दक्षिण भारत के राज्य इस तरह सीटो के निर्धारण का विरोध करते रहे है क्योंकि कुछ बीमार राज्य जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान, बंगाल, उड़ीसा, आबादी बढाने में बहुत आगे हैं जबकि दक्षिण के राज्य तथा पश्चिम के राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की दर बहुत कम है। इसी प्रकार हिन्दुओं के गैर आरक्षित वर्गो की जनसंख्या वृद्धि की दर भी बहुत कम है।

इस सत्य को ध्यान में रखते हुऐ तथा दक्षिण भारत के राज्यों के विरोध के कारण संसद ने 1976 में एक संशोधन पास किया था जिसके अन्‍​र्तगत लोकसभ में सीटों की संख्या में सन 2000 तक कोई भी वृद्धि नहीं होगी। इसके बाद यह समय सीमा 2026 तक बढा दी गई है।

अगर 1981-1991 के दशक की जनसंख्या बढोत्तरी पर निगाह डाली जाये तो उत्तर भारत एवं उत्तर पूर्व के राज्यों में यह वृद्धि 22 से 28 प्रतिशत थी जब कि दक्षिण के राज्यो में 15 प्रतिशत से भी कम रही। 1991-2001 की जनगणना में यह अन्तर और बढ गया। जनसंख्या वृद्धि दर उत्तर प्रदेश में 25.74, मध्यप्रदेश में 24.34, राजस्थान में 28.33, हरियाणा में 28.06 तथा बिहार में 28.43 रही। जनसंख्या वृ​ि़द्ध की दर आसाम एवं बंगाम में तीस से भी आगे रही।

इसके विपरीत इसी दशक में केरल में सिर्फ 9.42, तमिलनाडु में 11.19, कर्णाटका मेें 17.25, आंध्रपेदश में 13.86 तथा गोवा में 14.89 रही। इससे स्पष्ट होता है कि अगर डिलिमिटेशन कमीशन के सुझावों पर अमल किया जाता है तो आने वाले वर्षो में देश में असफल राज्यों एवं असफल वर्गो का शासन होगा।

इस सत्यता को दरकिनार करते हुए सन 1998 में तत्कालीन एन डी ए सरकार ने, लोक सभा सीटों का पुर्नवितरण एवं उनकी संख्या में 50 प्रतिशत वृद्धि करने की कोशिश की थी परन्तु दक्षिण में बड़े नेताअें जैसे करूणा निधी एवं चन्द्रबाबू नायडू के कड़े विरोध के कारण वाजपेयी सरकार को अपनी कोशिश ठंड़े बस्ते में डालनी पड़ी थी।

अब एक बार पुन: केन्द्र की गठबन्धन सरकार इस योजना को लागू करने का प्रयत्न कर रहे थे । क्योंकि उसमें शामिल दो बड़े दल कांग्रेस एवं वाम परिवार को यह उम्मीद थी कि उसके लागू होने के बाद आरक्षित वर्गो की सीटों में बढोत्तरी होगी इसी के साथ इस नये सीमाकरण के बाद मुस्लिम वर्ग के सदस्यों की संख्या में भरी बढ़ोतरी होगी और यह दोनों दल अपने को देश में आरक्षण एवं इस्लाम के सबसे बड़े कोतवाल मानते हैं। इससे देश की राजनीति पर उनकी पकड़ मजबूत होगी।

सीटों के इस नये आवंटन से दक्षिण के दल, भारतीय जनता पार्टी तथा गैर आरक्षित वर्गो की राजनीति में पकड़ कम हो जायेगी। क्योंकि इनकी सीट एवं इनके क्षेत्रों में सीटों का घटना तय है। इससे स्पष्ट होता है कि सीटो का जनसंख्या के आधार पर बढवारे का वर्तमान फार्मूला अत्यन्त दोषपूर्ण है तथा यह राष्ट्र एवं समाज के हित में जरा भी नहीं है। राष्ट्र हित में यह होगा कि संविधान में संशोधन करके ऐसी व्यवस्थाओं को ही खत्म कर दिया जाये जिससे कि देश में जातिवादी एवं साम्प्रदायिक ताकतों को शक्ति मिलती हो।

 अगर ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में देश एक जातीय गणराज्य बन जायेगा। तथा हम दो और हमारे दो वाले मूर्ख माने जायेंगें। हम दो हमारे दस वाले सम्मानित होगें। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या अाबादी बढ़ाने से हीं बढ़ेगी लोकतंत्र में भागीदारी ?

08 October 2014

कांग्रेस की पतन और मोदी राष्ट्रवाद का उदय में आज का भारत !

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को यह कैसी पराजय का सामना करना पड़ा। पार्टी की इतनी फजीहत 1977 में भी नहीं हुई थी जब इमरजेंसी के कथित अत्याचारों व जबरिया नसबंदी कार्यक्रम की वजह से पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस के खिलाफ घृणा की लहर चल रही थी। कांग्रेस को हालिया उपचुनाव मेंं इतनी कम सीटें मिली हैं कि उसे मान्यता प्राप्त प्रतिपक्ष का दर्जा तक नसीब नहीं हो सका। हालांकि पार्टी ने इसके लिए फिर भी दावेदारी ठोकी लेकिन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने बेआबरू करने के अंदाज में उसकी अर्जी ठुकरा दी। कांग्रेस नेतृत्व से अपेक्षा थी कि इन हालातों में पार्टी को बचाए रखने के लिए हार के कारणों का पारदर्शी मंथन कर वह भविष्य के लिए कोई आक्रामक और तेजतर्रार रणनीति बनाएगी पर इसकी कवायद नदारद है। पार्टी इस मामले में चुनाव के चार महीने गुजर जाने के बाद भी दिग्भ्रम की स्थिति में है।

कांग्रेस ने आजादी के बाद से नेहरू वंश को चमत्कारिक ब्रांड के रूप में राजनीतिक क्षितिज पर स्थापित कर उसके सहारे अपना वर्चस्व बनाए रखने का सफल प्रयास किया है। यही कारण है कि जब राजीव गांधी की अचानक हत्या के बाद सोनिया गांधी पार्टी और सरकार की जिम्मेदारी संभालने को तैयार नहीं हुईं तो कांग्रेस अनाथ हालत में पहुंच गई थी। नरसिंहा राव ने अंततोगत्वा जिम्मेदारी संभाली लेकिन उन्हें अंत तक पार्टी के प्रमुख लोगों की स्वीकृति नहीं मिल सकी। पार्टी में उनके समय जबरदस्त बिखराव हुआ। बाद में जब तक सोनिया गांधी ने पार्टी का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी संभालना कबूल नहीं किया तब तक कांग्रेस की नैया डंवाडोल ही बनी रही। सोनिया गांधी के संघर्ष से 2004 में जब आठ वर्ष बाद कांग्रेस को केेंद्र की सत्ता में वापसी का मौका मिला तो पार्टी के आम से लेकर खास लोगों तक के इस यकीन की पुष्टि हो गई कि नेहरू वंश का नेतृत्व उसके लिए खरा सिक्का है और उसकी अगुवाई में पार्टी सत्ता में अपना अविरल प्रवाह बनाए रखने में हमेशा सफल रह सकती है।

बहरहाल नेहरू वंश की चौथी पीढ़ी के चिराग राहुल गांधी को इसी कारण कांग्रेस का भविष्य सौंपने का पार्टी जनों ने बड़े गाजेबाजे के साथ स्वागत किया था। वैसे तो 2009 के चुनाव के बाद ही मनमोहन सिंह की जगह राहुल गांधी द्वारा लिए जाने का विश्वास कांग्रेसी संजोए थे लेकिन खुद राहुल ऐन मौके पर इससे पीछे हट गए लेकिन अबकी बार चुनाव के पहले मनमोहन सिंह ने सरकार की जिम्मेदारी फिर न संभालने की सार्वजनिक घोषणा कर दी थी जिससे यह तय माना जाने लगा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में वापस आती है तो सरकार की बागडोर राहुल गांधी ही संभालेंगे। इसके बावजूद कांग्रेस चुनाव में बुरी तरह मात खा गई। पार्टी के लिए यह जबरदस्त सदमा है। नेहरू परिवार का तिलिस्म इससे टूटा। जाहिर है कि उसकी जादुई ताकत पर अटूट विश्वास करने वाली पार्टी इससे हतप्रभ होकर किंकर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति में पहुंच गई।

चुनाव के हार के कारणों को जानने के लिए पार्टी ने एके एंटोनी कमेटी का गठन किया था। इसके आधार पर पार्टी की कमियां दूर कर नए ढंग से राजनीतिक संघर्ष का सफर शुरू करने का इरादा बनाया गया था लेकिन एंटोनी कमेटी की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाली जा चुकी है। पार्टी नेतृत्व को कोई फैसला लेते न देख हताशा में डूबे कांग्रेसी अब बेचैन होने लगे हैं। यहां तक कि राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर सवाल मुखर हो उठे हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि राहुल गांधी के सलाहकार की भूमिका अदा करते रहे दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने भी राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर परोक्ष में संदेह जताने में कसर नहीं छोड़ी। स्वाभाविक है कि राहुल के समर्थकों में इससे जबरदस्त बौखलाहट पैदा हुई। पार्टी के युवा सचिवों ने संयुक्त रूप से राहुल के नेतृत्व पर उंगली उठाने वालों के खिलाफ ज्ञापन बाजी शुरू कर दी। इस अंर्तद्वंद्व के बढऩे से पार्टी को और ज्यादा नुकसान संभावित था। जल्द ही जब पार्टी नेतृत्व को इसका आभास हो गया तो सचिवों को आगाह किया गया कि वह अपनी शिकायत मीडिया तक ले जाने से बाज आएं लेकिन सचिवों की इस गोलबंदी ने एक उद्देश्य पूरा कर दिया। इससे दिग्विजय सिंह व पार्टी के अन्य क्षुब्ध नेताओं की बोलती फिलहाल बंद हो गई है।

बावजूद इसके यह नहीं माना जा सकता कि कांग्रेस का संकट टल गया है। राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर पार्टी के लोगों में ही नहीं आम जनों में भी पर्याप्त अविश्वास पनप चुका है। राहुल को केेंद्र बिंदु बनाकर नेहरू वंश के करिश्मे का लाभ उठाने की अब बहुत कम उम्मीद रह गई है। हद तो यह है कि इसके बावजूद राहुल निर्णायक मौके पर रणछोर देसाई बनने की अपनी कमजोरी से उबर नहीं पा रहे। सोनिया गांधी प्रियंका कार्ड खेलने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस का पुर्नउत्थान हो तो कैसे हो। कांग्रेस पार्टी ईमानदारी से इस पर चिंतन करने से डर रही है। कांग्रेस को यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा। नेहरू जी के समय और आज के समय में बहुत अंतर आ चुका है। तब देश के नेताओं को लेकर लोगों के मन में रूमानी आकर्षण रहता था। आज भारतीय लोकतंत्र बहुत परिपक्व हो चुका है और आज का मतदाता किसी फंतासी में नहीं जीता। इस कारण आज सर्वोच्च नेता की आलोचना के प्रति इंदिरा युग जैसी असहिष्णुता से काम नहीं चल सकता। जब इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा जैसे नारे ईजाद किए जाते थे और लोगों का समर्थन उन्हें मिलता था। आज मतदाता किसी नेता के प्रति अंध आस्था नहीं रखता इसलिए राहुल के ऊपर हमला होता है तो बहुत कटु प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस को जीवंतता बनाए रखने के लिए अब नेतृत्व की कार्यशैली की समालोचना सुनने और करने की आदत डालनी पड़ेगी। पार्टी के नेताओं की नेतृत्व के प्रति शिकायत में अगर जनभावना का प्रतिविंब है तो नेतृत्व को अपनी कार्यशैली में बदलाव लाकर इसमें सुधार करके सफलताओं का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

राहुल गांधी में सबसे बड़ी कमी यह है कि वह जब जोश में होते हैं तो बहुत क्रांतिकारी भाषण करते हैं लेकिन जैसे ही भावनाओं का उफान शांत हो जाता है वे मांद में चले जाते हैं। क्रांतिकारी विचारों को अमली रूप देना ही नेता को प्रमाणिक बना सकता है अन्यथा उसकी गिनती लफ्फाजों में होना तय है। राहुल गांधी के समर्थक पार्टी में उनके विरोध में मुखर हो रहे सीनियर नेताओं को निशाने पर लेने के लिए इस अंदरूनी उठापटक को घाघों और मासूम युवाओं के बीच के संघर्ष के रूप में पेश करने की रणनीति पर अमल कर रहे हैं लेकिन इस मामले में व्यवहारिक स्तर पर राहुल इतने लचर हैं कि युवा इस रणनीति से बिल्कुल भी संवेदित नहीं हो रहे।

युवाओं को जो चीजें अपील करती हैं राहुल और उनके समर्थकों को उसका ज्ञान नहीं है। युवाओं को या तो उदंडता अपील करती है जैसे कि वीर भोग्या वसुंधरा के सिद्धांत पर विश्वास करने वाली उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के प्रति युवाओं का आकर्षण। दूसरी रेडिकल विचारधारा जिसमें हिंदुत्व और राष्ट्रवाद जैसे जज्बाती मुद्दे भी शामिल हैं और जिसका फायदा मोदी ने उठाया। इसके पहले दुनिया भर के रक्तिम वामपंथी तख्ता पलटों की वजह से कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति युवाओं में जबरदस्त समर्पण देखने को मिलता था लेकिन राहुल के दर्शन में युवाओं के लिए इन दोनों जरूरी तत्वों में से एक भी नहीं हैं। वे सुविधाभोगी और बड़े घरों के युवाओं की टोली का प्रतिनिधित्व करते हैं। आम युवा की निगाह में यह खलनायक हैं। राहुल का युवा किसी ऊर्जा का विस्फोट करने वाला युवा नहीं है। राहुल गांधी को आमूल व्यवस्था परिवर्तन का ऐसा नक्शा पेश करना पड़ेगा जो आदर्शवादी युवाओं में उन्माद की स्थिति उत्पन्न कर सके। यही मोदी और आरएसएस का कारगर जवाब हो सकता है लेकिन फिलहाल राहुल गांधी ऐसा कर पाने की कल्पना से कोसों दूर हैं। ऐसे में अब देखना ये है की कांग्रेस की पतन और मोदी राष्ट्रवाद का उदय में आज का भारत किस ओर जाता है!