23 October 2013

आजाद मुल्क की शर्मनाक दास्ताँ जहा सेक्स खानदानी धंधा है !

बैठेगा क्या? भरतपुर के बाहर जयपुर हाइवे पर दो किलोमीटर के एक हिस्से में ये दो शब्द साफ सुने जा सकते हैं. इसका सीधा-सा अर्थ 'सेक्स के लिए बुलावा' है. इशारा करती आंखें और अर्थपूर्ण अंदाज में हिलते हुए सिर वहां से गुजर रहे पुरुषों को सीधे-सीधे न्यौता देती हैं.

तीस साल की मंजु ठाकुर इस कमाऊ पेशे का बचाव करते हुए कहती हैं, ''सेक्स हमारा खानदानी धंधा है. '' छोटे कद की लेकिन खासे दमखम वाली मंजु, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पाई जाने वाली बेडिय़ा नाम की एक जाति से ताल्लुक रखती है. इस तबके में लड़कियां अकसर किशोरावस्था में ही समाज की सहमति से वेश्यावृत्ति के धंधे में उतार दी जाती हैं.

भरतपुर के मलाहा गांव के पास कचरे से अटी सड़क के किनारे अपना धंधा चलाने वाली मंजु खासी अनुभवी हो चली हैं. उन्हें यही एक धंधा आता है. वे बताती हैं, ''मैं उस वक्त 10 या 11 साल की थी, जब मेरे बाप ने मुझे धौलपुर के एक बहुत बड़े कारोबारी के यहां भेजा था. '' जीवन के उस पहले सहवास की एवज में परिवार को 10,000 रु. मिलने की बात को वे याद करती दिखती हैं. 

''बीसेक साल पहले यहां किसी लड़की को कौमार्य भंग की एवज में मिलने वाली यह सबसे ज्यादा रकम थी. '' वे फख्र के साथ यह भी बताती हैं कि आज भी किस तरह ''जयपुर के धनी-मानी कस्टमर'' उसे खोजते हुए आते हैं.

पंछी का नगला नाम से पहचाने जाने वाले मलाहा गांव में आज 100 से ज्यादा बेडिय़ा स्त्रियां देह व्यापार के धंधे में हैं. कपड़ों से झांकते अंग, चेहरे पर पाउडर की परतें, गहरे लाल या बैंगनी रंग की लिपिस्टक लगाए इन महिलाओं की बेचैन निगाहें आते-जाते लोगों में अपने ग्राहक की तलाश करती दिखती हैं.

2005 में यहां बने फ्लाइओवर से बेडिय़ाओं की बस्ती दोफाड़ हो जाने के बावजूद उनके पुश्तैनी धंधे पर कोई असर नहीं पड़ा. शायद यह राजस्थान में एकमात्र ऐसी जगह होगी जहां गाड़ी वाले फ्लाइओवर का इस्तेमाल करने की बजाए नीचे वाली ऊबडख़ाबड़ सड़क से जाना पसंद करते हैं— 'दिलकश नजारा' देखने के लिए.

एक दूसरे संभावित ग्राहक की आस में, गहरी लिपिस्टक लगाती मंजु कहती हैं, ''धंधा चोखा है. '' मंजु, उसकी बहनें 25 वर्षीया निशा, 24 वर्षीया रेशमा और उनकी 20 वर्षीया बुआ चांदनी मिलकर 40 लोगों का परिवार चलाती हैं. इस परिवार में उनके पांच भाई, उनकी बीवियां, बच्चे और इस धंधे से पैदा इनकी खुद की एक संतान शामिल है. मंजु की 50 वर्षीया मां सरोज कहती हैं, ''बहुत कोशिश की कि ये शादी कर लें मगर इन लड़कियों ने इस ओर कान तक न दिया. ''

इस गांव के मर्द यहां की औरतों को जबरन इस पेशे में धकेले जाने के आरोप को सिरे से खारिज करते हैं. छह बहनों और दो बुआओं की कमाई पर पल रहे 37 साल के विजेंद्र साफ-साफ कहते हैं, ''जबर्दस्ती का नहीं, राजी का सौदा है ये. '' थुलथुले बदन के विजेंद्र का दावा है कि उनकी हर बहन से पहले पूछा गया था: ''धंधा करोगी या शादी?''

मंजु और निशा के 39 वर्षीय भाई लाखन भी इसमें हामी भरते हैं. एक चमचमाती मोटरसाइकिल और स्कार्पियो के मालिक लाखन कहते हैं, ''सरकार मुझे कोई ठीकठाक नौकरी दे दे तो मैं बहनों को देह व्यापार में जाने से रोक लूंगा. '' उन्हीं के पीछे खड़ी दोनों बहनों के रंगे-पुते होठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट दौड़ जाती है.
निशा मर्दों वाली एक कहावत दोहराती हैं 'शादी तो बर्बादी है'. बेडिय़ा मर्दों की बीवियां अमूमन इस पुश्तैनी धंधे में हिस्सा नहीं लेतीं. वे खाना पकाने, सफाई और अपनी कमाऊ 'ननदों' के बच्चों की देखभाल जैसे घरेलू कामों में वक्त बिताती हैं. निशा रूखे स्वर में बोलती हैं,''गृहस्थी का काम खच्चर का."

'' निशा ने अपनी 'कामकाजी' बुआओं की कमाने और खर्चने की आजादी और घर के कामों में खटती मां को देखा है. थोड़ा हिचकते हुए वह बताती है कि वह 14 साल की उम्र में पूरी तरह से इस धंधे में उतर गई थी. 10 साल बाद अब वह एक दिन में 1,200 रु. से 2,000 रु. तक कमा लेती है.

यानी रोज की सरकारी दिहाड़ी 149 रु. से दस से बीस गुना ज्यादा. एक दिन में उसे 6 से 10 पुरुषों के साथ सेक्स करना होता है. उसके मुताबिक, त्यौहारों के आसपास या फिर मजदूरों को तनख्वाह की तारीखों के आसपास यह कमाई दोगुनी तक हो जाती है.

यहां लड़कियों के लिए इस 'व्यापार के गुर' सीखने में वक्त नहीं लगता. बचपन से वे देखती आ रही हैं कि सड़क किनारे चादर बांध उसके पीछे 10 मिनट में सेक्स करके बुआएं कपड़े दुरुस्त कर बाहर आ जाती हैं. मंजु बताती हैं, ''एक दफा एक ग्राहक जब टेढ़ेपन से पेश आने लगा तो उसने भाई को आवाज लगा दी. यही मेरा असली सबक था, बाकी तो देखा-सुना था.''

लेकिन हर बेडिय़ा यौनकर्मी मंजु जितनी किस्मत वाली नहीं होती. मंजु और निशा के घर से बमुश्किल 50 फुट दूर एक झोंपड़ी में रह रही 30 वर्षीया काली (बदला हुआ नाम) की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं लेतीं. दो साल पहले एचआइवी ग्रस्त होने की बात पता चलने के बावजूद वह धंधा कर रही है. काली कहती है, ''मुझे और कोई काम ही नहीं आता. भाई अभी इतने छोटे हैं कि कमाने नहीं जा सकते. '' वह तुरंत जोड़ती है कि अब वह बिना कंडोम सेक्स नहीं करती.

बैंकॉक स्थित संगठन ग्लोबल एलांयस अगेंस्ट ट्रैफिकिंग इन वूमैन की संस्थापक सदस्य 57 वर्षीय ज्योति संघेरा कहती हैं, ''गरीब महिलाओं के काम और उनके चयन के संबंध को समझना जरा टेढ़ी खीर है. वास्तव में हाशिये पर जी रही एक महिला के लिए 'बलात' और 'स्वैच्छिक' यौन कर्म में अंतर करना बेमानी होता है. ''

पक्षी विहार के लिए मशहूर भरतपुर जिले में दूसरी बार कलेक्टर बनकर आए 34 वर्षीय नीरज कुमार पवन इन बेडिय़ा परिवारों के लिए रॉबिनहुड बनकर उभरे हैं. उनका मानना है कि सदियों पुरानी परंपरा को पुलिस डंडे के जोर पर खत्म नहीं करा सकती.

आठेक साल पहले जिला प्रशासन ने बेडिय़ा बस्ती में आग लगवाकर उन्हें वहां से खदेडऩे की कोशिश की थी. एक कुप्रथा को खत्म करने की यह अमानवीय कोशिश थी. अब वहां स्कूल खोलने की इजाजत ले आए हैं. हालांकि पक्षीविहार का इलाका होने की वजह से यहां स्कूल जैसे पक्के निर्माण पर आपत्तियां उठाई गईं.

खैर, यौनकर्मी 35 वर्षीया रिया को अब लगता है कि उनकी ''बेटी की जिंदगी अलग होगी. '' 11 साल की इकलौती बेटी अर्चना को रोज स्कूल भेजना अब उनकी दिनचर्या में शामिल है. रिया के लिए 'धंधा' छोडऩा आसान नहीं पर वह कहती है कि ''मेरी बिटिया वही करेगी जो वह चाहेगी. ''

भरतपुर कलेक्टर की लगातार कोशिशों का नतीजा है कि मलाहा और पास के बगदारी गांव—जहां कुछ बेडिय़ा परिवार 2005 में हाइवे बनने पर चले गए थे—में बदलाव की सुगबुगाहट है. पवन का दावा है कि ''18 साल से कम उम्र की कोई लड़की यौनकर्म में शामिल नहीं. उधर अफवाह है कि दो किशोरियों के कौमार्य की कीमत डेढ़ से दो लाख रु. लग रही है. एक बेडिय़ा लड़की के विवाह करने पर इसकी आधी रकम मिलती है.

बगदारी के बाहर करीब 15 बीघे में फैली झुग्गियों में रह रहे बेडिय़ाओं के लिए जिंदगी सचमुच बेहद दुश्वार है. वे बिजली-पानी के बगैर जीने को विवश हैं. गांव के स्कूल में उनके बच्चों को अलग कर दिया जाता है. ऊंची जाति के सरपंच की उन्हें वोटर या आधार कार्ड मुहैया कराने में कोई दिलचस्पी नहीं. बस्ती के शुरू में ही लोहे की दुकान चलाकर गुजर-बसर करने वाले 29 वर्षीय रवि कुमार कहते हैं, ''अपने ही वतन में हमें पराया बनाकर छोड़ दिया गया है. ''

कुमार और उनकी 60 वर्षीय मां लीलावती इस बात की ताकीद करते हैं कि जब तक उनकी बिरादारी की खूबसूरत लड़कियों को सेक्स से बढिय़ा आमदनी हो रही है, तभी तक यह गाड़ी चलेगी. रवि को गहरी शिकायत भी है, ''गांव के (ऊंची जाति के) लोग जान-बूझकर हमारे बच्चों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं और हमारी ही बिरादरी की लड़कियों के साथ सोने के लिए लाइन लगाते हैं. गांव का आदमी होने की बात कहकर पूरे पैसे भी नहीं देते.

महाला गांव के फ्लाइओवर के नीचे से जा रहे 20 फुट लंबे अंडरपास की कंक्रीट की दीवार पर लिखा है, ''प्यार का अनमोल तोहफा—फ्रीडम 5. पांच साल तक प्रेग्नेंसी से टेंशन फ्री. '' बेडिय़ा औरतें इस पर हंसते हुए कहती हैं, ''बच्चे तो अच्छे होते हैं. लड़कियां होगीं तो ज्यादा कमाएंगी और लड़के उनकी हिफाजत करने के काम आएंगे. ''

हिंडाल्को बनाम मनमोहन कितना सच कितना झूठ !

कुमारमंगलम बिड़ला और उनकी कंपनी हिंडाल्को इंडस्ट्रीज पर कोयला ब्लॉक आवंटन में सीबीआई की तरफ से आपराधिक साजिश की एफआईआर दर्ज कराने के बाद पूरा कॉरपोरेट जगत तो कौआ-रोर कर ही रहा है। अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ को क्लीनचिट दे दी है। कमाल की बात तो यह है कि प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी इस मामले में प्रधानमंत्री के पक्ष में खड़ा है। लेकिन जांच के दायरे में आए इस मामले को किनारे रख दें तो हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ की बैलेंसशीट दिखाती है कि वहां दाल में बहुत कुछ काला है और कंपनी शेयरधारकों की आंखों में धूल झोंक रही है।

कैसे? हाल ही में इसका ब्योरेवार खुलासा किया रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की स्थापना में शामिल रहे स्वतंत्र विश्लेषक आर बालाकृष्णन ने मनीलाइफ फाउंडेशन की तरफ से आयोजित एक सेमिनार में।  बालाकृष्णन डीएसपी मेरिल लिंच से लेकर फर्स्ट इंडिया म्यूचुअल फंड व एडेलवाइस तक से जुड़े रहे हैं। उन्होंने बड़े बेबाक अंदाज़ में कहा, “कभी-कभी फ्रॉड इतना छिपा होता है कि उसे पकड़ना मुश्किल होता है। लेकिन (बैलेसशीट के) आंकड़ों की असंगति (कंपनी) प्रबंधन के स्तर का भेद खोल देती है। कंपनी पर ऋण का भारी बोझ हो और वो बढ़ता जाए तो मुझे चिंता होती है। मैंने ऐसी कंपनियां देखी हैं जिनका ऋण बिक्री से कहीं ज्यादा रफ्तार से बढ़ता जाता है। यकीनन, यह बड़े संकट का संकेत है।”

इसके बाद उन्होंने हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ की 2012-13 की अद्यन बैलेंसशीट का विश्लेषण शुरू किया और फ्रेम रखा दस साल का, यानी 2003-04 से लेकर मार्च 2013 तक का। इन दस सालों में कंपनी की बिक्री 8223 करोड़ रुपए से बढ़कर 80,193 करोड़ रुपए पर पहुंच गई। लेकिन इस दौरान उसकी बिक्री 2007-08 में कई गुना उछलकर 2006-07 के 19316 करोड़ रुपए से 60,013 करोड़ रुपए पर पहुंच गई, क्योंकि मई 2007 में उसने अपने से कई गुना बड़ी अमेरिकी कंपनी नोवेलिस का अधिग्रहण कर लिया था। यह अधिग्रहण उसने 600 करोड़ डॉलर में किया था। यह अधिग्रहण कंपनी की बैलेंसशीट में बड़ा छेद साबित हुआ है।

यहां से आगे 2007-08 से 2012-13 तक की अवधि को देखें तो बीते पांच सालों में उसकी बिक्री की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) मात्र 5.97 फीसदी रही है। अगर हम इन सालों में औसत मुद्रास्फीति की दर को 10 फीसदी मानें तो कंपनी की बिक्री बढ़ने की दर दरअसल ऋणात्मक है। इन सालों में अन्य आय के 9.06 फीसदी की दर से बढ़ने के बावजूद उसका शुद्ध लाभ 6.66 फीसदी की दर से बढ़ा है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि कंपनी ने लगातार कम टैक्स दिया। 2007-08 में उसने 40.25 फीसदी टैक्स दिया था, जबकि 2011-12 में 18.87 फीसदी और 2012-13 में 23.10 फीसदी। टैक्स की कारगर दर (effective tax rate) का घटना यह भी दिखाता है कि उसका असली लाभ उतना नहीं है जितना कि वो बैलेंसशीट में दिखा रही है।

हम सबसे नीचे दिए गए बैलेंसशीट के हिस्से से देख सकते हैं कि इस दौरान कंपनी ने पूंजी बाज़ार से लगातार धन उठाया है, कभी जीडीआर से तो कभी प्राइवेट प्लेसमेंट से। 2008-09 में उसकी फिक्स्ड एस्सेट में 27,841 करोड़ रुपए की भारी वृद्धि हुई क्योंकि साल भर ही पहले उसने अमेरिकी कंपनी नोवेलिस का अधिग्रहण किया था। वर्क इन प्रोग्रेस उसका 2012-13 में 33,831 करोड़ रुपए है। ऐसा करना कैश फ्लो के लिए जरूरी हो सकता है। लेकिन सवाल उठता है कि इसके लिए आप कितनी पूंजी को लॉक कर रहे हैं?

कंपनी के ऊपर मार्च 2013 के अंत तक 56,299 करोड़ रुपए का ऋण है। कंपनी की औसत कैश प्राप्ति पिछले पांच सालों में छह-सात हज़ार करोड़ रुपए के आसपासस है। आप खुद हिसाब लगा लीजिए कि अगर बिना ब्याज के भी कंपनी को यह ऋण उतारना हो तो उसे कम से कम आठ साल लग जाएंगे। कंपनी कहेगी कि उसने 33,831 करोड़ रुपए काम पर लगा रखे हैं जिससे उसकी कैश प्राप्ति आनेवाले सालों में बढ़ सकती है। लेकिन कंपनी का पिछला रिकॉर्ड इस बाबत संदेह पैदा करता है।

इसलिए आगे या तो उसे ज्यादा धन बाज़ार से उठाना पड़ेगा या ऋण को इक्विटी में बदलना पड़ेगा। कंपनी ने विदेश से भी काफी उधार ले रखा है जो पिछले कुछ महीनों में डॉलर के 62 रुपए हो जाने से करीब 20 फीसदी बढ़ गया होगा। कंपनी की बैलेंसशीट दिखाती है कि उसने हर साल भारी ऋण उठाया है। वहीं उसने जो भी निवेश किया है, वो दुनिया भर में फैली उसकी 48 सब्सिडियरी इकाइयों में फंसा हुआ है।

अब हम देखते हैं कि कंपनी अपने कामकाज से कितना कैश पैदा कर रही है। कैश प्राप्ति में से नेट करेंट एस्सेट्स में बदलाव को घटाकर तो यह रकम निकाली जाती है। यह रकम 2012-13 में 2767 करोड़ रुपए रही है। इसमें से अगर डेप्रिसिएशन या मूल्यह्रास को घटा दें तो उसका फ्री कैश फ्लो ऋणात्मक 94 करोड़ रुपए हो जाता है। पिछले पांच सालों में से दो साल उसका फ्री कैश फ्लो ऋणात्मक रहा है। डेप्रिसिएशन को घटाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वह एक तरह का खर्च है जो मशीनरी वगैरह को दुरुस्त रखने के लिए करना जरूरी होता है। यह बात भी नोट करने लायक है कि अच्छी कंपनी का फ्री कैश फ्लो उसके शुद्ध लाभ का कम से कम 70 फीसदी होना चाहिए। हिंडाल्को के मामले में यह ऋणात्मक है।

कमाल की बात यह है कि कंपनी इसके बावजूद शेयरधारकों को लाभांश (डिविडेंड) देती रही है। एक रुपए के शेयर पर कभी 1.35 रुपए तो कभी 1.55 रुपए। जाहिर है कि यह लाभांश वो अपनी कमाई से नहीं, बल्कि बाज़ार से उठाई गई पूंजी या ऋण दे रही है। एक और चौंकानेवाली बात यह है कि उसने जो ऋण उठाया है उस पर ब्याज की लागत 4-5 फीसदी दिखाई गई है। नोट करने की बात यह है कि विदेश से भी इतने सस्ती दर पर कर्ज नहीं मिलता। असल में बैलेंसशीट के नोट्स से पता चलता है कि वह ब्याज को कैपिटलाइज़ करती है और उसे एस्सेट कॉस्ट में जोड़ देती है। यह मामला ऐसा है कि मान लीजिए कि मैंने 100 रुपए की कोई चीज़ 10 फीसदी ब्याज पर खरीदी तो उसकी लागत में मैं 110 रुपए दर्ज कर देता हूं।

दूसरी तरफ कंपनी खुद जो निवेश कर रही है, उस पर उसने 8.74 फीसदी तक की कमाई दिखाई है, जबकि वो इसे लिक्विड फंड वगैरह में ही लगाती है। इसलिए इतनी कमाई का आंकड़ा भी संदेह पैदा करता है। इस तरह हासिल कमाई से वो आसानी से अपने ऋण की ब्याज लागत घटा सकती थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसने अपनी इनकम या आय को खुलकर दिखाया और खर्च बढ़ा रहने दिया। पिछले दस सालों के दौरान बिजनेस से कंपनी की नेटवर्थ में 19,349 करोड़ रुपए जुटे हैं, जबकि नेटवर्थ में कुल इजाफा 28,299 करोड़ रुपए का है। इसका मतलब कि नेटवर्थ में से बाकी 8950 करोड़ रुपए नए इश्यू या इक्विटी से आए हैं।

अंत में कंपनी के धंधे से जुड़े कुछ अनुपातों पर नज़र। कंपनी का परिचालन लाभ मार्जिन विदेशी कंपनी नोवेलिस के अधिग्रहण के बावजूद पिछले दस सालों में 24.05 फीसदी से घटकर 9.77 फीसदी पर आ चुका है। शुद्ध लाभ मार्जिन 3.77 फीसदी पर पहुंच चुका है जो किसी मैन्यूफैक्चरिंग नहीं, बल्कि व्यापारिक फर्म के बराबर है। सकल ब्याज कवर उसने 2.04 गुना और शुद्ध ब्याज कवर 4.26 गुना दिखाया है। लेकिन यह गलत है क्योंकि हकीकत में वह ब्याज का आधे से ज्यादा हिस्सा कैपिटलाइज कर चुकी है। इसलिए उसका ब्याज कवर जो दिखाया गया है, उसका लगभग आधा होना चाहिए।

अब दो अनुपात जो किसी की भी आखें खोलने के लिए काफी हैं। नियोजित पूंजी पर रिटर्न का मतलब होता है कि कंपनी शेयर पूंजी + रिजर्व + लिए गए सारे ऋण पर कुल कितना रिटर्न कमा रही है। इसे हम कर-पूर्व लाभ + ब्याज को नियोजित पूंजी से भाग देकर निकालते हैं। हम बैंक की एफडी लेते हैं तो 8 से 9 फीसदी ब्याज मिलता है। सीनियर सिटीजन को पांच साल के डिपॉजिट पर 10.5 फीसदी तक सालाना ब्याज मिलता है। लेकिन हिंडाल्को इंडस्ट्रीज साल भर में महज 6 से 8 फीसदी कमा रही है, जबकि अच्छी कंपनी के लिए यह अनुपात 15 फीसदी से ऊपर माना जाता है। क्या इसे हिंडाल्को का अच्छा बिजनेस माना जा सकता है?

फिर क्या कोई प्रवर्तक इतने कम रिटर्न पर कंपनी चलाना चाहेगा? जाहिर है कि नहीं। इसलिए इससे एक बात और जाहिर होती है कि प्रवर्तक यानी, आदित्य बिड़ला समूह और उसके मुखिया कुमारमंगलम ने हिंडाल्को से अपने रिटर्न के लिए कोई दूसरा ज़रिया बना रखा होगा। हो सकता है कि जो नया कैपेक्स (कैपिटल इक्पेन्डेचर) दिखाया जा रहा है, उसका अच्छा-खासा हिस्सा सीधे उनके पास पहुंचता हो। या, कुमारमंगलम बिड़ला चक्रीय बिजनेस से गुजरनेवाली इस साठ साल से ज्यादा पुरानी कंपनी को लेकर ऐसा कोई ख्बाव देख रहे होंगे कि अभी का दबाव कल का उछाल बन सकता है।

अगर हम कंपनी के रिटर्न ऑन इक्विटी या रिटर्न ऑन नेटवर्थ की बात करें तो यह 20.67 फीसदी से घटते-घटते 8.57 फीसदी पर चुका है। यह अनुपात शेयरधारकों के धन पर हासिल रिटर्न को दिखाता है और इसे कंपनी के शुद्ध लाभ को उसकी नेटवर्थ (शेयर पूंजी + रिजर्व) से भाग देकर निकाला जाता है। रिटर्न ऑन इक्विटी की आदर्श स्थिति 20 फीसदी से ऊपर की मानी जाती है। लेकिन हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ का यह अनुपात 2012-13 में मात्र 8.57 फीसदी रहा है। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कंपनी शेयरधारकों के धन का क्या हाल कर रही है।

इन सबसे ऊपर कंपनी का ऋण-इक्विटी अनुपात 2007-08 में 1.87 था और अभी 2012-13 में भी 1.59 है। इन अनुपात का एक के ऊपर होना खतरे की घंटी माना जाता है। हिंडाल्को के बारे में थोड़े संतोष की बात यह है कि प्रवर्तकों ने अपनी इक्विटी का कोई हिस्सा गिरवी नहीं रखा है। कंपनी की कुल इक्विटी में प्रवर्तकों का हिस्सा अभी 37 फीसदी है। जून 2013 तक यह 32.06 फीसदी था। इसके बाद प्रवर्तकों ने खुद को जारी वारंटों को 15 करोड़ शेयरों में बदला है जिससे उनकी हिस्सेदारी बढ़ गई।

गौरतलब है कि हिंडाल्को इंडस्ट्रीज़ कॉपर व एल्यूमीनियम के साथ अपने लिए बिजली भी बनाती है। इसी बिजली के लिए वो कोयला खदानों को लेने की कोशिश की है जिसमें उसके खिलाफ सीबीआई ने आपराधिक साजिश का मामला दर्ज किया है। बालाकृष्णन ने हिंडाल्को की बैलेसशीट के तमाम पहलुओं पर गौर करने के बाद बताया है कि कंपनी ने 184.53 रुपए की बुक वैल्यू बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है। कंपनी ने अपनी नेटवर्थ 35,330 करोड़ रुपए दिखायै है। लेकिन इसमें 15,428.91 करोड़ रुपए गुडविल या इनटैजिबल एस्सेट्स के हैं। इसे घटाने के बाद समायोजित नेटवर्थ 19,901.09 करोड़ रुपए निकलती है और बुक वैल्यू घटकर 103.94 रुपए पर आ जाती है।

यह कंपनी देश को विदेशी मुद्रा का नुकसान भी कर रही है। जैसे 2012-13 में उसने 18,555.60 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा खर्च की, जबकि 7552 करोड़ रुपए की ही विदेशी मुद्रा कमाई। कहानी लंबी है। सार की बात यह है कि 2007-08 में विदेशी कंपनी का अधिग्रहण हिंडाल्को के लिए बहुत भारी पड़ा है और कंपनी की हालत लगातार खराब होती जा रही है। इसलिए आदित्य बिड़ला समूह के नाम पर इस कंपनी में छोटे या लंबे समय के लिए निवेश करना घातक हो सकता है।

22 October 2013

भूदान की जमीन पर माफियाओं का कब्ज़ा !

आजद देश के रहनुमाओं ने इस देश को किस किस तरह से लूटा है इसकी कहानी हमें बार बार टुकड़ों टुकड़ों में देखने सुनने को मिल रही है। लेकिन आजाद भारत में गांधी के सच्चे अनुयायी और सर्वोदयी नेता विनोवा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए मिली दान की लाखों एकड़ जमीन की खोजबीन की जाए तो इस देश का सबसे बडा घोटाला सामने आएगा। जमीन से जुड़े इस घोटाले में मंत्री से लेकर संतरी तक, नौरशाह से लेकर देश के बड़े बड़े गैर सरकारी संस्थाएं और विल्डरों की संलिप्तता दिखेगी। इस खेजी रपट के जरिए भूदान आंदोलन की जमीनों की लूट के बारे में कुछ जानकारियां लेने की कोशिश की गई है ताकि हमारी सरकार इस दिशा में कोई कारगर कदम उठाकर भावे के सपने को साकार करने की कोशिश कर सके।

अगर देश में नक्सनवाद फैला तो उसका एक बहुत ही बड़ा कारण लोगों का भूमिहीन होना और कुछ लोगों के पास अधिक जमीन होना है। गांधी के लोगों ने आने वाले समय की कल्पना की थी। इसिलिए गांधी के सच्चे आदमी विनोबा भावे ने भूमिहीनों को जमीन देने के लिए गांव गांव जाकर जमींदारों से भूमि मांगने की शुरूआत की। इसके लिए सबसे पहले  विनोबा जी 1951 में अपने पनवार  आश्रम से चलकर हैदराबाद के दक्षिण में शिवरामपल्ली गांव पहुंचे ।वहां तीसरे सर्वोदय सम्मेलन का आयोजन था। 18 अप्रैल 1951 को विनोबा जी नांगलोंड पहुंचे। यह इलाका तब भी लाल सलाम के नारों से गूंजता था ।विनोबा जी पोचमपल्ली गांव में ठहरे। 700 की आवादी वाले इस गांव में दो तिहाई लोग भूमिहीन थे ।भूमिहीनों ने विनोबा जी से 80 एकड़ जमीन की मांग की। विनोबा जी के आग्रह पर गांव के जमींदार रामचंद्र रेउ्डी 100 एकड़ जमीन देने की घोषणा की। इसके बादी विनोबा जी ने इसे आंदोलन का रूप् देकर पूरे देश से अपने जीवन में 47 लाख एकड़ जमीन दान में ली। ये जमीने बांटने का काम राज्य और जिला भूदान समिति को दी गई। चूकि भूमि राज्य का मामला है इसलिए राज्य सरकार का सहयोग जरूरी है। लेकिन देखा जा रहा है कि भूदान की जमीने लूट की शिकार होती गई हैं। आगे बढे इससे पहले एक नजर भूदानी जमीनो पर।

देश भर में स्थापित भूदान यज्ञ समिति के अनुसार सर्वोदयी नेता विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत कुल 47 लाख, 63 हजार, 676 एकड़ जमीन भूमिहीनों के लिए दान में मिली थी। यहां पेश है कुछ राज्यों में पिछले 2 साल तक भूदानी जमीनों के आंकड़े (एकड़ में) -
  • राज्य                दान की जमीन         बांटी गई जमीन       बची जमीन
    बिहार               6,48,593                    2,78,320               3,40,273
    आंध्र                 2,52,119                   1,8,770                  1,43,349
    झारखंड            14,69,280                 4,88,735               9,80,545
    उड़ीसा              6,38,706                   5,79,984               58,722
    राजस्थान        5,46,965                   1,42,699               4,04,266
    उत्तरप्रदेश      4,36,362                    4,18,958              17,404
    दिल्ली             300                           180                       120
    मध्यप्रदेश       4,10,151                   2,37,629              1,72,522
    महाराष्ट्         1,58,160                   1,13,230               44,930
    जम्मू कश्मीर 211                            5                          206
    असम            877                            877                      0
    पंजाब            5168                         1026                    4,152
    तामिलनाडू     27677                      22837                  4,840
    केरल             26,293                     5,774                    20,519
    कर्नाटक        15,864                      5017                    10,847
    हिमाचल        5,240                       2,531                   2,709
    गुजरात         1,03,530                  50,984                  52,546

आपको बता दें कि संयुक्त बिहार से सबसे ज्यादा जमीनें भूदान आंदोलन को दान की गई थी। कोई 22 लाख एकड़ जमीने संयुक्त बिहार से मिली थी। इनमें से बिहार के जमींदारों ने 6,48,593 एकड़ और झारखंड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीने विनोबा जी को दी थी। 45 सालों के बद भी ये जमीनें आज तक भूमिहीनों को नही दी गई है। बिहार और झारखंड में 2 लाख 32 हजार लोगों ने ये जमीने दान दी थी। बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीने ही आज तक बंट पायी है जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीने ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई है। इनमें भी जिन भूमिहीनों को जमीने दे भी दी गई है उसका मालिकाना पट्टा आज तक अधिकतर लोगों को नही मिली है। राजस्व विभाग सारे कागजात अपने पास रखे हुए है और कागज देने के नाम पर मोटी रकम की मोग कर रहे है। बिहार और झारखंड से मिली लगभग 22 लाख एकड़ जमीनों में से अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोगों ने अनफिट और बेकार की जमीन घोषित किए हुए है। नदी नाला और पहाड़ी जमीन के नाम पर ये जमीने लूट की शिकार हो रही है।

इसके अलावा बहुत सारी जमीने तो ऐसी भी है जिसे दानदाताओं ने नाम कमाने के लिए दान तो दे दिया किन्तु आज भी उन जमीनों पर कब्जा उन्हीं का बना हुआ है। झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता  ठाकुर प्रसाद  कहते हैं कि -‘आदिवासियों ,गरीबों और भूमिहीनों की बात करने वाली बिहार और झारखंड सरकार से कौन पूछने जाए कि भूदानी जमीन कहां है और उन जमीनों को सही तरीके से भूमिहीनो के बीच क्यों नही बांटा जा रहा है । जो सरकार इतना भी काम नहीं कर सकती भला उससे उम्मीद क्या की जाएगी। सही बात तो यह है कि भूदानी अधिकतर जमीनों पर बिल्उरों ने हड़प लिया है और इसमें राज्य सरकार के लोग सदा से मिले रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि पूरे देश में नकली सरकार की भरमार सी हो गई है।’ ठाकुर प्रसाद की बातों में दम है। राज्य बने 10 साल हो गए हैं और भूदानी जमीनों को लेकर आज तक किसी मुख्यमंत्री ने अपनी सक्रियता नहीं दिखाई। राज्य के भू राजस्व मंत्री हैं मथुरा महतो। जमीनी आदमी हैं और लोकप्रिय भी । लेकिन भूदान  से संबंधित जमीन वितरण के बारे में जब इस संवाददाता ने सवाल किया तो महतो साहब चुप हो गए । कहने लगे कि- ‘कुछ जमीनें पहले भूमिहीनों को बांटी गई थी अभी इस पर फिर से काम किया जाना हैं जमीन की मानिटरिंग की जा रही है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां  का भूदान समिति डिफंक्ट है। वह ठीक से काम नहीं कर रहा है। एक अन्य  सवाल  पर महतो साहब भड़क गए। कहने लगे कि आप लोग केवल निगेटिव सवाल ही करते हैं । राज्य में अच्छा काम भी हो रहा है उसे आप लोग नहीं दिखाते।’

अब आप को ले चलते हैं नीतीश जी राज्य बिहार में। कहा जा रहा है कि वहां सब कुछ हरा भरा हो गया है। लेकिन भूदानी जमीन के मामले में बिहार में भी लूट पाट कम नहीं हुई है। बिहार में भूमि सुधार के नाम पर  डी बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 11 जून 2007 को राज्य सरकार को सौप दी। आयोग का कहना है कि एक, सरकार के पास भूदानी जमीन के अलावा किसी भी जमीन की सही जानकारी नही है और न ही उसका हिसाब किताब है। दो, भूदान की जमीन में भारी गड़बड़ी हुई है। भूदान यज्ञ समिति और राजस्व विभाग के जमीन संबंधी आंकड़ों में काफी अंतर है। तीन, 1961 में भू हदबंदी कानून बनाया गया लेकिन आज तक लागू नहीं हुआ। चार, 500 एकड़ से ऊपर जमीन रखने वाले भूस्वामियों की नई नई सूचियां तैयार होती रही है। इस प्रकार की सूची 1070.76 एवं 1982.83 और 29 जून 1990 को बिहार विधानसभा के अंदर 500 एकड़ से उपर जमीन रखने वाले 35 भूस्वामियों की सूची प्रस्तुत की गईथी लेकिन मामला वहीं दब कर रह गया।

बिहार में कई मामले तो चैंकाने वाले हैं। उपरोक्त कमीशन की रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि भूदान की 11130 एकड़ जमीन 59 संस्थाओं को दे दी गई जो भूदान कानून के विरूद्ध. है।औसत एक संस्था को 189 एकड़ जमीने दी गई है। चूकि यह मसला राज्य सरकार से संबंधित है इसलिए कहा जा सकता है कि सरकार के बाबूओं और भूदान समिति के लोगों ने मिलकर यह सारा खेल किया है। बिहार में भूदानी जमीनों की कैसे लूट की गई है इसकी कुछ बानगी आप देख सकते हैं ।बिहार के पूर्णिया जिला में भूदान कार्यालय मंत्री हैं मुस्तफा रजा आलम। आलम ने अपनी पत्नी रेहाना खातुन के नाम 4 एकड़ जमीन खाता नंबर 444 ,खेसरा नंबर 405  के नाम 23 जुलाई 2008 को  करवा दी हैं। यह जमीन पूर्णिया जिले के रूपौली थाना के मउआ परबल गांव में दी गई है। इसका प्रमाण पत्र संख्या है 778549। इसी महिला के नाम पूणिर्या जिले के गोपालपुर थाना के जहांगीरपुर बैसी में 2 एकड़ की एक और जमीन दी गई है ।

इस जमीन का खाता नंबर 866 और खेसरा नंबर है 101। इसका प्रमाणपत्र संख्या है 768166। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का इस मसले में साफ आदेश है कि भूमिहीनों को जमीन दी जाएगी और नह भी स्थानीय भूमिहीनों को। लेकिन यहां तो एक ही आदमी को दो जगह जमीन दी गई है और वह भी स्थानीय आधार पर नही। इसे लूट नही तो और क्या कहा जाए? इसी परिवार से जुडा एक और केस है पटना का। पूर्णिया के मुस्तफा रजा का सगा भाई मो0 इसराफिल पटना भूदान आफिस में काम करते हैं। इन्होने अपनी पत्नी रजिया खातून के नाम 4 एकड़ जमीन पूर्णिया के ही भउआ परबल गांव में करबा दी है। इस जमीन का प्रमाण संख्या है 778530 । यह जमीन 23 जुलाई 2008 को रजिया खातुन के नाम की गई है। इसी महिला के नाम एक एकड़ जमीन जहांगीर पुर बैसी में  भी  की गई है  जिसका प्रमाण संख्या 768211 है। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को लिखी गई है।  

इस परिवार के लोगों ने सरकार के लोगों से मिलकर या फिर राजनीति के तहत जमक र भूदानी जमीनों की लूट की है। एक 2 एकड़ की तीसरी जमीन भी इसी रजिया खातून के नाम जहांगीरपुर बैसी में की गई है जिसका खाता नंबर है 896 और खसरा नंबर है 101। इस जमीन का प्रमाण पत्र देने वालों में विजय कुमार शर्मा, कार्यालय मंत्री, भागलपुर भूदान कार्यालय के हस्ताक्षर हैं। आपको यह भी बता दें कि ये सारी जमीने नीतीश कुमार के शासन में बांटी गई है। बंटी यह जमीन जाएज है या नाजायज यह जांच का विषय हो सकता है।  बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष शूभमूर्ति उपरोक्त मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं कि  ‘जिस मामले की आप चर्चा कर रहे हैं वह सही है। लेकिन सही ये भी है कि मुस्तफा रजा और और इसराफिल की पत्नी के नाम से जो जमीने दी गई थी उसे वापस ले ली गई है। गलती हुई थी लेकिन उसे सुधार दिया गया है। अब उस जमीन के कागजात रद्द हो गए हैं और उसके प्रमाणपत्र भी वापस कर लिए गए हैं। आपको बता दें कि हमारे कुछ विरोधी हैं जो हमें बदनाम करने की चाल खेल रहे हैं। 

गलती राज्य सरकार करती है और बदनाम भूदान कमेटी को किया जाता है।’ जैविक खेती अभियान के संयोजक क्रांति प्रकाश कहते हैं कि ‘विनोबा जी ने देश में घूम घूम कर जमीने हासिल की ताकि गरीब और भूमिहीनों को जमीन दी जस सके। लेकिन इस देश की राजनीति ने विनोबा भावे के सपनों को भी तोड दिया। कुछ जमीने बांटी गई जबकि अधिकतर जमीने लालफीताशाही के चककर में फंसी है। इसके अलावा कुछ जमीने तो अभी भी लठैतों के कब्जें में हैं। या तो जमीन बंटनी चाहिए या फिर उस जमीन को वापस कर देनी चाहिए।’

बिहार भूदान कमेटी के अध्यक्ष हैं शुभमूर्ति लंबे समय से भूदान आंदोलन से जुड़े रहे हैं।  इन पर आरोप लगाया जा रहा है कि इनको हर महीने 43801 रूपए बेतन के रूप में मिल रहे हैं। इनको महंगाई भत्ता के रूप में 4320 रूपए, अतिथि भत्ता के रूप् में 14 हजार रूपए, क्षेत्रीय भतता के रूप में12 हजार रूप्ए और उ्ाइबर भत्ता के रूप में 5481 रूप्ए भी मिल रहे हैं। सवाल है कि क्या अवैतनिक लोगों को महंगाई भत्ते दिए जाते है? आपको बता दें कि बिहार भूदान समिति से जुड़े सैकडों कार्यकर्ता 27 माह से बेतन न मिलने की शिकायत कर रहे हैं जबकि हर साल राज्य सरकार भूदानी लोगों के लिए 60 से 70 लाख रूपए देती हैं। शुभमूर्ति कहते हैं कि ‘ इसे मैं कहता हूं कि मुझे बदनाम किया जा रहा है। दरअसल अध्यक्ष का पद राज्य मंत्री का होता हैं । आज की तिथि में एक राज्य मंत्री को 60-70 हजार बेतन के रूप में मिलते हैं ,उपर से घर और गाड़ी अलग से ।चूकि मैं भूदान कमेटी से जुड़ा हूं इसलिए मैं आधा वेतन ही ले रहा हूं। लेकिन भाइयों को यह पसंद नहीं।’

भूदानी जमीन की लूट केवल बिहार या गुजरात में ही नहीं की गई है। जहां जहां से जमीने मिली है ,जमीने लूट की शिकार हुई है। आंध्र में कुल 2,52,119 एकड़ जमीने दान में मिली थी। इनमें से 1,08,770 एकड़ जमीन अनियमितता पूर्वक बंट तो गई है बाकि लगभग एक लाख जमीन बिल्डरों और संस्थाओं के हाथ में चली गई है। बिल्डरों के कई मामले अभी अदालत में चल रहे हैं। तामिलनाडू में तो भूदानी जमीन को लूटने के लिए भूदान एक्ट में ही संशोध कर दिया गया।  तामिलनाडू में कुल 27677 एकड़ जमीन दान में मिली थी । इनमें से 22837 एकड़ जमीन किसी तरह तो बंट गई है वाकि के 4840 एकड़ जमीन संस्थाएं और विल्डरों के चुगुल में है। राज्य सरकार ने भूदान कानून में बदलाव करके कानून बना रखा है कि अगर भूदानी जमीन का उपयोग सार्वजनिक काम के लिए होता है तो इसे बाजार दर से दोगुनी दर पर ली जा सकती है।  उडीसा में भी भूदानी जमीन को लूटा गया हैं । 

उड़ीसा में  भूदान आंदोलन के तहत कुल 6,38,706 एकड़ जमीने दान में मिली थी। इसमें से 5,79,984 एकड़ जमीनें बांट दी गई है। इनमें भी कई जमीनें ऐसे लोगों को दे दी गई हैं जो भूमिहीन बर्ग में नहीं आते हैं। इसके अलावा खुर्दा जिले के पीपली तहसील में 171 एकड़ जमीन बिल्डर के हाथों बेच दी गई है। बिल्डरों ने इस पर निर्माण भी कर लिया था जिसे एफआईआर के बाद खुर्दा के कलेक्टर ने तोड़ दिया है। लेकिन अभी तक जमीन बेचने वाले और खरीदने वाले पुलिस के हाथ नहीं लग पाए हैं। राज्य के राजस्व और आपदा मंत्री सूर्य नारायण पात्रों कहते हैं कि ‘दोषी चाहे जो भी हो हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। भूदानी जमीन किसी को नहीं दी जा सकती। यह भूमिहीनों के लिए है। जिन लोगों ने जमीन की लूट की है हम उसे तलास रहे हैं।’

विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए देश भर से दान में मिली जमीनों की पहली शर्त ये है कि स्थानीय भूमिहीनों के अलावा किसी और को न तो दी जा सकती है और न हीं किसी भी सुरत में किसी को भी ये जमीने बेची जा सकती हैं। भूदानी कानून के अलावा माननीय सुप्रीम कोर्ट का भी यही आदेश है। लेकिन इस आदेश की धज्जियां सबसे ज्यादा गुजरात सरकार और राज्य भूदान समिति से जुड़े लोगों ने उड़ाई है। हालाकि ऐसा नही है कि गुजरात के अलावा अन्य राज्यों में भी  भूदानी जमीन की लूट नहीं  की गई है। हम उस पर भी चर्चा करेंगे। लेकिन सबसे पहले आइए नजर  डालते हैं गुजरात में  भूदानी जमीनों पर । सरकार के लोगों और राज्य भूदान समिति के लोगों ने मिलकर पैसे की लालच में भूदानी जमीनों को विल्डरों के हाथ बेच दी है। ऐसा कोई एक मामला नहीं है। जरा इन मामलों पर आप भी गौर कर ले।

गुजरात का ब्लाक नंबर 542। गांव भदज। इस इलाके को आधुनिक समय में साइंस सिटी के नाम से जाना जाता है। राज्य सरकार और भूदानी समिति से जुड़े लोगों ने यहां की लगभग 12 एकड़  भूदानी जमीन एक बिल्डर रश्मिकांत छगान भाई पटेल को मात्र एक करोड़ 18 लाख में बेच दिया। बर्तमान समय में यहां एक एकड़ जमीन की कीमत 2 करोड़ के आसपास है। यानि 24 करोड़ की जमीन लगभग सवा करोड़ में बिल्डर लोगों को खिलापिला कर  ले उड़े। आज तक किसी की इस पर नजर नहीं गई है।

गुजरात के ही खेड़ा जिला के राधु गांव की ही भूदानी 5 एकड़ जमीन भूदान समिति और राज्य सरकार के लोगों ने सभी नियमों को ताख पर रखकर मात्र 3 लाख में बिल्डर दिनेश भाई रमण भाई पटेल को बेच दी है । इस जमीन का सर्वे नं0 है 1662 और 1664। आपको बता दें कि भूदान के तहत पहले यह जमीन अलेफ खान और गुलाब खान पठान को दी गई थी। बाद में इन खानों से जमीन छीन कर बिल्डर के हवाले कर दिया गया। अहमदाबाद शहर में ही सावरमती आश्रम के पास ग्राम स्वराज आश्रम स्थित है। यहां की लगभग आधा एकड़ जमीन 3 नवंबर 2009 को एक ब्यापारी के हाथ  मात्र 39 लाख रूपए में  बेच दी गई है। बेची गई जमीन पर आश्रम की पांच कमरे थी, एक बड़ा हाल था और खुली जमीन थी। अभी अहमदाबाद में 40-45 लाख में एक कमरा मिलना भी मुश्किल है। चूकि ब्यापारी के हाथ में सीधे जमीन बेचने में दिक्कत आ सकती थी इसलिए दलालों ने पहले एक संस्था बनाई फिर इस जमीन को बेच दी।

गुजरात के ही बड़ोदरा शहर में भी दलालों और भूदान समिति से जुड़े लोगों ने भूदानी जमीन को बेचने में कोई कोताही नही बरती हैं बाघोरिया रोड पर पापोद मुहल्ला की 1.4 हेक्टेयार  भूदानी जमीन प्रणव पंचाल,बैकुंठ नाथ बिल्डर को 2004 में बेच दी गई है।  अहमदाबाद के ही नरोदा में एक और भूदानी जमीन को बिल्डर के हवाले किया जा चुका है। 0.43.43 हेक्टेयर जमीन 2008 में प्रवीण भाई मणि भाई पटेल के हाथ बेच दी गई है। इस जमीन का रजिस्ट्री नं0 है 5160/2008।

जरा दिल्ली का हाल देखें। भूदान यज्ञ में दिल्ली के लोगों ने विनोबा भावे को 300 एकड़ जमीन दान में दी थी। इन जमीनों में से 180 एकड़ जमनों का वितरण दिल्ली सरकार कर देने का दावा कर रही है। बाकि 120 एकड़ जमीन कहां है और किसके कब्जे में इसका कोई रिकार्ड किसी के पास नहीं है। आपको बता दें कि यहां कि अधिकतर भूदानी जमीनों पर माफियाओं का कब्जा हो चुका है। फरीदाबाद और नोएडा की भूदानी जमीनों को विल्डरों ने कब्जा रखा है। डिफेंस हाउसिंग के नाम पर माफियाओं ने सहां की 30 एकड़ जमीन लूट ली है। यह मामला अदालत में है। कहा जा रहा है कि दिल्ली और हरियाणा के तीन नेताओं ने मिलकर यह धंधा किया था और करोड़पति बन गए थें। इसी तरह महाराष्ट्र से भूदान के तहत 1,58,160 एकड़ जमीन मिली थी। इसमें से 1,13,230 एकड़ जमीन बंट चुकी है। 

बाकि की 44,930 एकड़ जमीन अभी विवादों में फंसी हुई है। विनोबा भावे ने सबसे पहले भूदान आंदोलन की शुरूआत बर्धा से की थी। लेकिन बाद के दिनो में बर्धा और थाने इलाके में भूदानी जमीन की जमकर लूट की गई। बर्धा में सबसे ज्यादा विल्डरों ने भूदानी जमीन को कब्जा कर रखा है और थाने इलाके में भूदान समिति औा सरकार से मिलकर विल्डरों और कई संस्थाओं ने सैकडों एकड़ जमीन कम भाव में ले रखी है।

क्या शिवशेना मनोहर जोशी की पर कतर रही है ?

मितभाषी मनोहर जोशी के कंधे पर किसकी बंदूक है? महाराष्ट्र की राजनीतिक जिज्ञासा के पिपासु परेशान है। बंदूक से दनादन गोलियों की बौछार हो रही है और उद्धव ठाकरे चाहकर भी नहीं बच पा रहे हैं। दशहरा रैली के रंग में भंग करने के बाद अब 75 साल के बुजुर्ग ने चिंघाड़ मारी है कि वो शिवसैनिक है। शिवसेना के पहले मुख्यमंत्री को आखिर गुर्राते हुए क्यों परिचय देना पड़ रहा है? जिसे शिवसेना ने भारतीय लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ कुर्सी यानी लोकसभा के स्पीकर के तख्त पर पहुंचा दिया, उसे अधेड़पन में बताने की जरूरत क्यों पड़ रही है कि वो शिवसैनिक है। इसका राजनीतिक मायने यही है कि यह सब शिवसेना के कर्णधार को बिदकाने के लिए किया जा रहा है।

पकी पकाई कहानी आ रही है कि मनोहर जोशी दादर से लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। शिवसेना ने मना कर दिया। वो बिफरकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार से मिल आए। पवार से मिलने से पहले मिर्ची लगाने वाला बयान दिया कि उद्धव कमजोर नेता साबित हो रहे हैं। यह सब सरेआम किया गया। इस पर उद्धव समर्थकों का भड़कना लाजिमी था। ऊपर से उद्धव के पहले बड़े शो दशहरा रैली में पहुंचकर भांग भर आए। जोशी को देखते ही उद्धव के इशारे पर सैनिक इस कदर भड़क उठे जैसे सांड को लाल कपड़ा दिखा दिया गया हो। मनोहर जोशी की परिपक्वता का बखान करने वालों ने ही धक्का मुक्की कर इस बुजुर्ग नेता को मंच से भागने पर मजबूर कर दिया। अपने ही पार्टी कैडर का खौफ इस कदर छाया रहा कि पांच दिन बाद मुंबई के कोहिनूर कंप्लेक्स में प्रकट हुए। मनोहर जोशी की सफाई है कि पवार से मुलाकात पहले से तय थी। उनका यह कहना वैसा ही असहज भरोसे लायक है जैसे बालीबुड का प्रतिस्पर्धी अभिनेता फिल्म रिलीज के मौके पर दूसरे को घर जाकर शुभकामना दे आए।

महाराष्ट्र की राजनीति का ट्रेक रिकार्ड रहा है कि शिवसेना की पेड़ से गिरे हर बड़े आम को शरद पवार की डलिया मिलती रही है। पवार ने पूर्व शिवसैनिकों को अपने रंग में ढलने का ईनाम देने में कभी कंजूसी नहीं की। नारायण राणे जैसे की पवार से नहीं बनी तो कांग्रेस का आसरा थाम लिया। तो, मान लिया जाए कि मनोहर जोशी ने छगन भुजबल की राह पकड़ ली है। नहीं, शायद ऐसा नहीं है। इतने सीमित आयाम में राजनीति नहीं देखी जाती है। एक तो राजनीति की लिहाज से जलालत झेलने के बाद अब मनोहर जोशी शिवसेना छोड़ने के बजाय अंदर रहकर कमजोर नेतृत्व को और कमजोर करने की रणनीति में लगे रहना ज्यादा पसंद करेंगे। फिर ज्यादा बात बिगडी और पार्टी से निकालने की मजबूरी बनी तो उनकी पसंद पवार के बजाय राज ठाकरे हो सकते हैं।

यह सार्वजनिक सच है कि जब तक राज ठाकरे शिवसैनिक थे तो उनके सिपहसलार में नंबर एक पर नारायण राणे थे। नारायण राणे ने पार्टी में राज को दरकिनार किए जाने से पहले ही शिवसेना से कन्नी काट ली। शिवसेना को अलविदा कहना मुनासिब समझा और बालासाहेब ठाकरे को भला बुरा कहते हुए कांग्रेस में ठौर पा लिया। कांग्रेस में मुसीबत में फंसते हैं, तो इशारे से संभावित घर का पता बताकर कांग्रेसियों में दहशत पैदा कर देते हैं। नारायण राणे के बाद राज के शिवसेना छोड़ते वक्त पार्टी में मनोहर जोशी उनके सबसे करीबी थे। इतने करीबी कि दोनों ने साझा बिजनेस खड़ा करने का काम किया। ठोस व्यवसायिक पार्टनरशिप का रिश्ता कायम कर लिया। आखिरी पल तक उद्धव को स्थापित करने की इच्छा रखने वाले बालासाहेब ठाकरे के लिए यह समझना आसान नहीं रहा होगा कि मनोहर जोशी खुद को शिवसेना प्रमुख का सेवक बता रहे हैं और पुख्ता बिजनेस रिश्ता पारिवारिक शत्रु से बढा रहे हैं। इस पहलू के राजनीतिक ताकत का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मनोहर जोशी और राज ठाकरे के बीच के प्रगाढ रिश्ते पर बालासाहेब ठाकरे का कभी कोई बयान नहीं आया। नई पार्टी चलाने के लिए व्यक्तिगत आर्थिक सुरक्षा जरूरत होती है। जाहिर तौर पर राज की इस जरूरत को पूरा करने में बिजनेस पार्टनर से मदद मिली होगी। यह उद्धव ठाकरे को अखरना लाजिमी है।

राज ठाकरे की नरेंद्र मोदी से नजदीकी ने शांतचित उद्धव को पहले से परेशान कर रखा है। राज के रिश्ते को लेकर अभी भी शिवसेना मोदी को दिल से नहीं अपना पाई है। यही वजह है कि जेडी(यू) की तर्ज पर कभी आडवाणी पसंद तो कभी सबसे ज्यादा सुषमा पसंद का राग सामना के जरिए अलापा जाता रहा है। कहते है कि उल्टा तो उस रोज भी लिखा जा रहा था, जब बीजेपी मोदी को प्रधानमंत्री पद का विधिवत उम्मीद्वार घोषित करने वाली थी। भनक लगने पर मोदी ने मातोश्री फोन कर शुभकामना लेने की चतुराई कर ली। बिदके उद्धव को अब मनोहर जोशी के बेसुरे अलाप ने आपा खोने पर विवश कर दिया। हैरतअंगेज तरीके से यह भी हुआ कि "सामना" में मनोहर जोशी के खिलाफ और बाचाल शिवसैनिकों के हक में कार्यकारी प्रमुख ने लिख मारा। पार्टी में मौजूदा नेता के खिलाफ पार्टी के मुखपत्र में बयान देना मनोहर जोशी के कद को बढाता है या कम करता है, यह सतही राजनीतिक ज्ञान से वाकिफ व्यक्ति भी समझता है। गलती का अहसास कराए जाने के बाद उद्धव कह रहे हैं कि वो मनोहर जोशी पर बयान को सार्वजनिक तवज्जो देना जरूरी नहीं मानते।

दरअसल विशाल कद के मनोहर जोशी के खिलाफ शिवसेना में बयान देने की हैसियत उद्धव के सिवा शायद ही किसी के पास है। इस वक्त सबको मनोहर जोशी से सद्भावना है लेकिन उद्धव के हक में खड़ा होकर मनोहर जोशी से कोई नहीं पूछ रहा कि शिवसैनिक हैं, तो फिर शिवसेना के सर्वेसर्वा को चिकोटी क्यों काट रहे? उनकी नेतृत्व हैसियत पर सरेआम सवाल क्यों कर रहे हैं? सामना में छपने के बाद भी मर्यादा का ख्याल करना जरूरी क्यों नहीं समझते और ढीठता से गुस्साए शिवसैनिकों को भड़काने के लिए दशहरा रैली में मंच पर चढ़ना और फिर चढ़कर उतरना जरूरी क्यों समझते हैं?

क्या पूरी होगी तीसरे मोर्चे की अधूरी सपना ?

भारतीय राजनीति में अगर तीसरे मोर्चे का राजनीतिक इतिहास खंगाले तो जो बात सामने उभरकर आती है वह यह कि भारत में भाजपा का राष्ट्रीय पटल पर उभार और तीसरे मोर्चे की पुकार दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. लेकिन भारतीय राजनीति उस पड़ाव से भी गुजरी है जिसमें भाजपा ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया है. तीसरे मोर्चे के गठन की बांग एक बार फिर लगाई जा चुकी है और इस बार मोर्चे के निशाने पर अकेले भाजपा नहीं बल्कि कांग्रेस भी है. लेकिन तीसरे मोर्चे के लिए खुद तीसरी दुनिया के ये दल कितने तैयार हैं? क्या गैर भाजपा और गैर कांग्रेसवाद उनकी आपसी गैर बराबरी को खत्म कर देगा? दशकों से जारी तीसरे मोर्चे की अधूरी प्रेम कहानी कब पूरी होगी? कभी पूरी होगी भी या नहीं?

भारत के संसदीय इतिहास में गठबंधन की राजनीति की शुरुआत राज्यों में पहले ही हो चुकी है. मसलन 1967-71 में युनाइटेड फ्रंट के तहत बंगाल में दो बार सरकारे बन चुकी है लेकिन जब राष्ट्रीय राजनीति की चर्चा होती है तो तीसरे मोर्चे का सबसे अहम केन्द्रबिदुं 1989-90 की संसदीय राजनीति है जब राष्ट्रीय मोर्चा के तहत देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी. इस राष्ट्रीय मोर्चा के संयोजक तात्कालीक प्रधानमंत्री वी.पी सिंह थे..राष्ट्रीय मोर्चा के अध्यक्ष एन.टी रामाराव थे. राष्ट्रीय मोर्चा के इस गठबंधन में जनता पार्टी, डीएमके -तमिलनाडू, तेलगू देशम पार्टी -आन्ध्र प्रदेश के साथ-साथ असम गण परिषद और इंडियन कांग्रेस(सोशलिस्ट) में शामिल थी. वहीं भाजपा सहित लेफ्ट फ्रंट ने इस सरकार को बाहर से समर्थन दिया था. 

 पी.उपेन्द्र इस नेशनल फ्रंट के महासचिव थे. हालांकि 1991 में झारखंड मुक्ति मोर्चा भी गठबंधन में शामिल हुआ फिर भी गठबंधन की कहानी अधूरी रह गई. ये तो महज एक पहला एपीसोड है जबकि वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े रणनीतिकार और पैरोकार रहे माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत थे जिन्होंने देश में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के लिए और सांप्रदायिकता की प्रतीक भाजपा को रोकने के लिए तीसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन की तलाश किया था. नरसिहराव के बाद के डगमगाती कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने की नाकाम कोशिश रही  लेकिन सुरजीत को उन दिनों 1990 में अयोध्या में गोली चलवा चुके मुलायम सिंह यादव से धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की सबसे ज्यादा उम्मीद थी.

लिहाजा उन्होंने अपने करीबी रहे सैफुद्दीन चौधरी के सुझाव को गुस्ताखी माना और 1996 में लोकसभा चुनाव का टिकट उन्हें नहीं दिया लेकिन सुरजीत मुलायम को भी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाने में नाकाम रहे क्योंकि तब तीसरे मोर्चे के सबसे बड़े दल जनता दल को मुलायम की पांच साल पुरानी दगाबाजी याद थी मुलायम ने 1991 में जनता पार्टी से अलग होकर अपनी अलग समाजवादी पार्टी बनाकर ठेंगा दिखा दिया था जिसका दर्द जनता पार्टी को सता रहा था. गठबंधन के इस मुहब्बत में दागाबाजी का दौर शुरु हो चुका था. इतिहास रोचक होता है..लेकिन उससे राजनीतिक दलों को सीख लेने की जरुरत थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फिर सवाल उठना लाजमी है कि जिस प्रकार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर तीसरे मोर्चे को लेकर उथल-पूथल मचा है. क्या कोई नई जमीन तलाशने की कवायद शुरु हो चुकी है. ये भी सच है कि मुख्यधारा की मीडिया किसी भी प्रकार की थ्रर्ड फ्रंट को नकार रहा है.

 इसमें मीडिया के अपनी आर्थिक हित छुपे हुए हैं. जिसका विस्तार से विश्लेषण यहां पर नहीं किया जा सकता है खैर किसी भी संभवनाओं के अटकलों पर कयास लगाने से पहले एकबार फिर हमें 1996 के दिलचस्प लोकसभा चुनाव का अवलोकन करना पड़ेगा. उल्लेखनीय है कि 1996 लोकसभा चुनाव से पहले ही समाजवादी पार्टी की गठन ने गठबंधन को और बौना कर दिया था. चुनाव से पहले ही गठबंधन की नैया डगमगाने लगी. दक्षिण भारत से सबसे अहम सदस्य डीएमके और एआईडीएमके ने एक दूसरे का बहिष्कार किया. 1995 में टीडीपी ने भी एन.टी.रामाराव के अल्पसंख्यकों के साथ पक्षपात का आरोप मढ़कर अलग हो गई. 

राजनीति के इस रंग में अल्पसंख्यक चन्द्रबाबू नायडू के साथ खड़े होने लगे लेकिन गठबंधन के अध्यक्ष एन.टी रमाराव के हार्ट अटैक हो जाने के बाद जनता दल उनकी विधवा लक्ष्मी पार्वती के साथ खड़ा होने में संकोच नहीं किया जबकि दुसरी तरफ वामदलों ने चन्द्रबाबू नायडू के साथ मिलकर नया जमीन तलाशने कोशिश की. 1996 के लोकसभा चुनाव में खंडित जनादेश मिलने से राजनीतिक संकट तो थी फिर भी 161 सींटो वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रण भेजा गया. हालांकि अटल बिहारी सरकार 13 दिनों में चल बसी. वाजपेयी सरकार आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सकी. एक बार फिर तीसरे मोर्चे (युनाईटेड फ्रंट) का धागा बांधने की कोशिश शुरु हो गई. 

140 सीटों वाली कांग्रेस पार्टी सीताराम केसरी के नेतृत्व में बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हुई क्योंकि वामदलों के साथ कांग्रेस सरकार बनाने से मना कर दिया. फिर तीसरे मोर्चे की अधूरी प्रेम कहानी की रुपरेखा तैयार की गई. उल्लेखनीय है कि तीसरे मोर्चे की सबसे रोमाचंक एपीसोड 1996 लोकसभा का चुनाव जिसमें 13 पार्टियों ने मिलकर युनाईटेड फ्रंट के तहत अपने प्रेम का इजहार तो किया था..लेकिन इस मुहब्बत में ऐसा क्या था कि वी.पी सिंह के साथ-साथ ज्योति बसू प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर दिया था..मार्क्सवादी विचारधारा का आपसी कलह उसी समय उभर कर सबके सामने आया..था...क्या इसे महज मार्क्सवादियों के लिए काला अध्याय ही मान लिया जाए लेकिन इतना तो तय है ये वही समय था भारत में मार्क्सवादी देश के प्रधानमंत्री बनकर पूरी दुनिया को नया संदेश दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

बहरहाल युनाईटेड फ्रंट के एच. डी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने लेकिन बाद में कांग्रेस देव गौड़ा से असंतुष्ठी की बात कहकर समर्थन वापस लेने की रट लगाने लगी..जिसके बाद आई.के गुजराल प्रधानमंत्री बनाना पड़ा था..चन्द्रबाबू नायडू इस युनाईटेड फ्रंट के संयोजक थे. लेकिन एक बार फिर गठबंधन आपसी कलह का भेंट चढ़ गया....राजनीति की जमीनी विसात पर कांग्रेस ने गठबंधन को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई.

गौरतलब है कि पिछले सभी घटनाओं को ताजा करते हुए कई अहम पल याद आ जाते हैं जिससे वर्तमान में तीसरे मोर्चे की रट को बल मिलता है..जिससे मीडिया सामने लाने की कोशिश नहीं कर रही है. इसे मीडिया की आर्थिक मजबूरी कहे या फिर जनता को अंधेरे में रखने की एक घिनौनी साजिश..बहरहाल यहां पर ये भी देखना होगा कि क्या तीसरे मोर्चे के सभी खिलाड़ी एक साथ आने के लिए तैयार हैं. इस प्रकार तमाम ऐसे सवाल हैं जिसका जबाब ढ़ुढ़ना मुश्किल मालुम होता है. तीसरे मोर्चे को माहिर कभी पहलवान रहे मुलायम सिंह सभी को शुरु से ही पटकनिया देने में लगे है. उन्होंने हमेशा विश्वासघात किया है. माकपा सहित सभी वामपंथी दलों ने मुलायम को धर्मनिरपेक्षता की धूरी माना..लेकिन मुलायम हमेशा धूरी को डगमगाते रहे..मसलन युपीए पार्ट-1 में वामपंथी दलों को विश्वास था कि परमाणु समझौते के खिलाफ मुलायम उनका साथ देंगे लेकिन उल्टे मुलायम ने कांग्रेस की युपीए सरकार की डुबती हुई नैया को बचा लिया. दूसरी तरफ युपीए पार्ट-2 में मुलायम ने अप्रत्यक्षरुप से संसद का बायकट किया है. 

वोटिंग में उनका साथ नहीं दिया. लेफ्ट फ्रंट को एक बार जोर का झटका धीरे से लगा. .कुल मिलाकर कहें, तो ऐसे कई मौके आए हैं, जब मुलायम ने उन्हीं दलों को ठेंगा दिखाया, जिन दलों ने उनमें तीसरा मोर्चा के हीरो की तस्वीर देखी थी. दूसरी तऱफ नीतीश कुमार मन ही मन प्रधानमंत्री पद के लिए चवन्नी मुस्कान लेते रहते हैं..दरअसल उनका राजनीति दांव 2014 लोकसभा चुनाव के बाद चलने के कयास लगाए जा रहे हैं. लेकिन इन सभी संभवनाओं पर पानी तब फिर गया..जब वे अपने को घोषित सेकूलर जमात में शामिल होकर कांग्रेस से नजदीकीयां बढ़ाने में लग गए. वही उनके धूर विरोधी लालू से कांग्रेस किनारा करने में जुट गई हैं. बिहार में ब्रहामणवादी राजनीति की चंगुल से उबारने वाले लालू चारा घोटाला मामलें में रांची के सेंट्रल जेल में बंद है. यानि तीसरे मोर्चे की हवा देने वालों का लागातार विकेट गिरता जा रहा है..हलांकि लालू ने किसी भी मोर्चे को नकारा था..लेकिन लालू की राजनीतिक महत्वकांक्षा किसी से छुपी हुई नहीं हैं.

इधर दक्षिण भारत की सियासत में तेलंगाना को लेकर तुफान थमा नहीं हैं. तीसरे मोर्चे के बड़े दल के रूप में तेलुगू देशम पार्टी की भी पहचान रही है. 2004 से आंध्र की सत्ता से दूर चंद्रबाबू नायडू को लगता है कि भाजपा का साथ ही उनकी वापसी करा सकता है लिहाजा वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की तरफ अपना कदम बढ़ा चुके हैं. ऐआईडीएमके की प्रमुख जयललिता नमो-नमो की भजन-कीर्तन में जूट गई है..वहीं वाम दलों के प्रमुख घटक दल सीपीआई के डी राजा, जयललिता के कोटे से राज्यसभा में पहुंचे हैं. अब चुनाव भी दस सीटों पर साथ-साथ लड़ना चाहते हैं जबकि जयललिता को नमो-नमो का जाप करने फूर्सत नहीं है. मामला गोलमाल है. यानि वामपंथ किस बिमारी से ग्रसित है इसका अंदाजा खुद उसको भी नहीं है. लिहाजा तीसरे मोर्चे की संभवानाओं पर सवाल उठना लाजमी है.

 वर्ष 1996 में तीसरे मोर्चे के प्रमुख दल के तौर पर द्रमुक और अकाली दल की भी भूमिका थी, लेकिन द्रमुक अभी कांग्रेस के खोल से बाहर निकलता नजर नहीं आ रहा और अकाली दल को भाजपा से कोई परहेज नहीं है. इस पूरे खेल में ममता बनर्जी को नजरअंदाज करना नुकसान दायक साबित हो सकता है. लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ममता वामदलों के साथ जाने के लिए कभी तैयार होगी? हालांकि कोलकता में सपा की बैठक में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम की इच्छा ममता के साथ जाहिर की थी. 30 अक्टूबर को होनेवाली बैठक में ममता को मनाने की लगातार कोशिश जारी है. इधर विशेष राज्य के दर्जे के लिए नवीन पटनाइक युपीए में शामिल होते हुए भी दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ पहले ही गरजते हुए जंग छेड़ चुके हैं. मायावती की महत्वकांक्षा किसी से कम नहीं है लेकिन सत्ता से दूर मायावती फिलहाल भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी बार-बार कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की बात कर रही है. दूसरी तरफ 2004 में 64 सींटों पर कब्जा करने वाली वाम मोर्चा 2009 के लोकसभा चुनाव में 24 सीटों पर आकर सिमट गया है. लेकिन उनके अंदर अभी भी जोश उबल रहा है भले ही अपने प्रभावक्षेत्र वाले राज्यों में वाम मोर्चा सिमटकर बौना हो गया है.


लिहाजा तीसरा मोर्चा कैसे बनेगा, इस सवाल का जवाब शायद 30 अक्टूबर को होने वाली बैठक में निकालने की नाकाम कोशिश ही की जाएगी क्योंकि अब तक बने तीसरे मोर्चे का कोई स्प्ष्ट विजन नहीं रहा रहा है. लिहाजा आपसी फायदे-नुकसान के लिए गठबंधन की नींव रखी जाने लगी जिसमें सभी घटक दलों का आपसी हित की टकराहट होना स्वभाविक है. इसलिए अब तक दो बार तीसरे मोर्चे का गठन तो हुआ लेकिन किसी ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया. बहरहाल 30 अक्टूबर को होने वाली वामदलों का मुलायम के साथ बैठक में तीसरे मोर्चे के प्रधानमंत्री पद पर एक राय बनाने में एड़ी–चोटी एक करना पड़ेगा. फिलहाल बैठक से जुड़ी किसी भी बात पर महज अटकलों का आकलन किया जा सकता है. लेकिन वास्तविकता तो बैठक के बाद ही उभर कर सामने आ सकता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि तीसरे मोर्चे की थोड़ी भी संभवना बनती है तो सबसे बड़ा सवाल होगा कि उस मोर्चे की स्क्रीप्ट कौन लिखेगा? कहीं गठबंधन की प्रेम कहानी एक बार फिर अधूरी तो नहीं रह जाएगी.

क्या विजय गोयल और हर्षवर्धन ही भाजपा की नैया डूबायेंगे ?

दिल्ली में विजय गोयल का नाम आता है तो चांदनी चौक का नाम अपने आप ही आ जाता है। पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक और सदर लोकसभा सीटों से वे लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं और आज भी उनकी कर्मभूमि चांदनी चौक और सदर के बीच ही ज्यादा रहती है। लेकिन उस समय 2009 के आम चुनाव में अचानक ही विजय गोयल ने सदर या चांदनी चौक सीट से टिकट मांगने की बजाय नई दिल्ली सीट से टिकट मांग लिया था। उस वक्त भी पार्टी उन्हें चांदनी चौक से ही चुनाव लड़ाने के मूड में थी लेकिन विजय गोयल अड़ गये तो अड़ गये। उन्हें नई दिल्ली से टिकट मिला और वे चुनाव हार गये। तो क्या उन्होंने हारने के लिए नई दिल्ली से लोकसभा टिकट हासिल किया था? 

विजय गोयल ने हारने के लिए तो टिकट नहीं लिया था लेकिन उनका दांव उलटा पड़ गया। उस वक्त नई दिल्ली सीट से कांग्रेस ने अजय माकन को टिकट दिया था। दिल्ली की राजनीति में अजय माकन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के विरोधियों में गिने जाते हैं। चुनाव के दौरान ही यह चर्चा आम हो गयी थी कि शीला दीक्षित और विजय गोयल में एक गुप्त समझौता हुआ था जिसके तहत शीला दीक्षित ने विजय गोयल से वादा किया था कि वे नई दिल्ली सीट से टिकट लेकर मैदान में उतरें वे उन्हें जितवाने में पूरी मदद करेंगी। नई दिल्ली लोकसभा सीट के तहत आनेवाली गोल मार्केट विधानसभा सीट से ही शीला दीक्षित चुनाव जीतकर आती रही हैं। शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित ने भी उसी साल लोकसभा चुनाव लड़ा था और शीला ने उनके लिए ईस्ट दिल्ली की जिस सेफ सीट का इंतजाम किया था, बदले में विजय गोयल ने अपनी ओर से हर संभव मदद करने का भरोसा दिया था।

लोकसभा चुनाव हुए और दिल्ली में कांग्रेस सात की सात सीट जीत गई। संदीप दीक्षित तो जीते ही, अजय माकन भी जीत गये। अगर कोई हारा तो वह सिर्फ विजय गोयल नहीं थे, बल्कि दिल्ली में पहली बार भाजपा बुरी तरह हार गई थी। हालांकि उस वक्त भी विजय गोयल ने नई दिल्ली से टिकट मांगने के पीछे तर्क दिया था कि परिसीमन के कारण सदर लोकसभा सीट का एक बड़ा हिस्सा नई दिल्ली में समाहित हो गया है इसलिए उनका नई दिल्ली से टिकट मांगना बिल्कुल गलत नहीं था। उधर चांदनी चौक पहुंचे विजेन्दर गुप्ता को चांदनी चौक ने नकार दिया और कपिल सिब्बल को हिन्दू मुस्लिम एकता का फायदा मिल गया। हो सकता है विजेन्दर गुप्ता की हार में माननीय गोयल साहब का भी कोई रोल रहा है लेकिन ओवरआल उस चुनाव में भाजपा का भट्टा बैठ गया।

2009 में विजय गोयल के कारण भले ही भाजपा का भट्टा बैठ गया हो लेकिन विजय गोयल अपने संपर्कों के कारण मजबूत होते गये। दिल्ली में विजेन्द्र गुप्ता की जगह गोयल को जगह मिल गई और वे चुनावी मौसम में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बन गये। उन्होंने काम कुछ किया न किया लेकिन उनकी सक्रियता से अखबार हर रोज दो चार होते रहे हैं। विजय गोयल नीति और नीयत विहीन नेता हैं इसलिए उनसे यह उम्मीद करना बेकार ही था कि वे पार्टी को शीला दीक्षित के शासन के खिलाफ लामबंद कर पायेंगे। और जल्द ही उन्होंने यह बात साबित भी कर दिया। दिल्ली में विजय गोयल की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी अरविन्द केजरीवाल की बी टीम बनकर रह गई। अरविन्द ने बिजली का मुद्दा उठाया तो विजय गोयल भी बिजली की बत्ती जलाने लगे। दिल्ली में एक फ्लाप शो तक आयोजित कर दिया। अरविन्द केजरीवाल ने पोस्टरों बैनरों के जरिए दिल्ली में प्रचार अभियान शुरू किया तो विजय गोयल ने भी फोटोकॉपी कर लिया। अपनी काम काज की शैली के कारण उन्होंने दिल्ली में भाजपा को जाने अनजाने अरविन्द केजरीवाल की बी टीम बना दिया जो शीला दीक्षित से लड़ने की बजाय दिन रात यह देखता रहता कि अरविन्द केजरीवाल कल क्या करनेवाले हैं। हम भी वही करेंगे।

आम आदमी पार्टी के भीतर भी विजय गोयल के इस रुख से हंसी के फव्वारे छूट रहे थे। वे जानते थे कि वे जितना उन मुद्दों को उठायेंगे जिसे अरविन्द पहले ही उठा चुके हैं उतना ही अरविन्द केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को फायदा पहुंचेगा। और संभवत: इसका फायदा पहुंचा भी है। कांग्रेस और शीला दीक्षित जो जितना नुकसान कल दिख रहा था, उससे कम फायदा आज नहीं हो रहा है। कमोबेश दिल्ली में कांग्रेस जस की तस वाली मनस्थिति में बनी हुई है। लेकिन विजय गोयल के कारण एक बात जरूर हुई कि जिस भाजपा को कांग्रेस से भिड़ना था, वह अरविन्द केजरीवाल से भिड़ गई। वह भी उन्हीं की बी टीम बनकर।

जाहिर है, यह स्थिति दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए अच्छी साबित नहीं होगी। दिल्ली में अभी तक तो ऐसी अफवाह सुनाई नहीं दी है कि शीला दीक्षित की कोशिशों के कारण ही विजय गोयल को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया है लेकिन जो परिस्थितियां हैं वह दिल्ली में एक बार फिर भाजपा को हार के कगार पर पहुंचा सकती है। हो सकता है भाजपा के आलाकमान लोग इस स्थिति को समझकर हर्षवर्धन का नाम आगे कर रहे हों ताकि वे अरविन्द केजरीवाल के मुकाबले एक साफ सुथरे नाम को सामने रख सकें लेकिन विजय गोयल के कारण वे भी सफल नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने एक तरफ विजय गोयल के 'कुशल नेतृत्व' में हार के आसार है तो दूसरी तरफ हर्षवर्धन। भाजपा के सामने सचमुच विकट स्थिति है। उन्हें हार और हर्षवर्धन में किसी एक को चुनना है।

क्या भाजपा की आपसी कलह से शिवराज को नुकसान होगा ?

मध्य प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक का ख्वाब देख रही भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की खटिया खड़ी करने में उनके मंत्री और विधायक कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहते हैं। पिछले पांच साल से भाजपा के मंत्री-विधायकों के बोल और कृत्यों से परेशान रही पार्टी की परेशान चुनावी मौके पर भी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। प्रदेश के मंत्रियों के बड़बोलेपन को चुनाव आयोग भी गंभीरता से ले रहा है।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने आचार संहिता को ठोकर मारने की बात कह डाली। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार के खनिज विभाग के काम पर आपत्ति जताते हुए खदान आवंटन के मामलों को यथावत रखने के आदेश दे दिए। मंत्री-विधायकों के खिलाफ भी नए-नए मामले सामने आ रहे हैं। इससे पार्टी की छवि खराब हो रही है और आने वाले चुनाव में पार्टी को नुकसान हो सकता है। पार्टी भी इन मामलों को गंभीरता से लेकर इन्हें कांग्रेस की साजिश बता रही है और कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रहने की हिदायत दे रही है।

प्रदेश में आचार संहिता लगने के साथ ही पांच ऐसे मामले सामने आए हैं जो भाजपा की छवि को तार-तार करने के लिए काफी है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप है। उन्होंने कहा था कि आचार संहिता कहती है कि युवतियों को भेंट मत दो, सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का हिस्सा मत बनो। ऐसी आचार संहिता को मैं ठोकर मारता हूं। इससे पहले महू में चुनरी यात्रा के दौरान कैलाश ने ढोल वालों को सौ-सौ रूपए बांटे थे। आयोग ने इस मामले में कैलाश को नोटिस जारी किया है। हालांकि विजयवर्गीय ने आयोग को पत्र लिखकर अपना शब्द वापस लेने की बात कही है।

एक अन्य मामले में प्रदेश के खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल और उनके महकमे ने महज तीन दिन में 1100 खदान आवेदन निपटाने की कोशिश की थी, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है। जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आवंटन पर रोक लगाते हुए यथास्थिति के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने मप्र शासन, खनिज मंत्री, सीबीआई और मुख्य चुनाव आयोग को नोटिस देते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है। हालांकि, खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल का कहना है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। वहीं सोहागपुर की महिला रजनी चौहान ने आरोप लगाया है कि उसके ससुर दयाचंद पिछले दस साल से गायब है। उनकी भजियाढाना में चार एकड़ जमीन पर कुछ दबंगों ने कब्जा कर लिया है।

 इन आरोपियों को सोहागपुर विधायक विजयपाल सिंह का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही। बाबूजी पटेल का आरोप है कि विधायक प्रतिनिधि चुन्नीलाल के खिलाफ पुलिस मामला दर्ज नहीं कर रही है। इसके अलावा राज्यमंत्री मनोहर ऊंटवाल के खिलाफ पुलिस ने मारपीट का प्रकरण दर्ज किया। उन पर आलोट शहर कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश बाफना के भाई से मारपीट का आरोप है। ऊंटवाल ने कहा कि बाफना धार्मिक मंच से साडियां बांट रहे थे। आचार संहिता का उल्लंघन देख हमने पुलिस को बुलाया, तो बाफना ने झूठा आरोप लगा दिया।

इससे पहले भी भाजपा सरकार के मंत्री पूरे पांच साल तक अपने बड़बोलपन के कारण पार्टी को पलीता लगाते रहे। राज्य के एक मंत्री तुकोजीराव पवार ने विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में महिलाओं के खिलाफ सार्वजनिक रुप से आपत्तिजनक टिप्पणी कर लोगों को हैरत में डाल दिया था। भोपाल के जहांनुमा होटल में आयोजित समारोह में पवार ने पहली पंक्ति में बैठी महिलाओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि उस ओर 'कांग्रेस' बाघिन बैठी हैं जबकि स्वंय की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि इस ओर टाइगर खड़ा है। समारोह में पवार से की गयी उक्त टिप्पणी के बाद सन्नाटा छा गया और समारोह के बाद भी पवार अपनी टिप्पणी से पीछे हटते नजर नहीं आये और नही उन्होंने अपनी टिप्पणी को लेकर किसी प्रकार का खेद व्यक्त किया।

 पवार के लिये यह पहला मौका नहीं है जब उनकी टिप्पणियों के चलते विवाद उठा हो. इससे पहले भी वह कई बार विवादों में घिर चुके हैं। राज्य सरकार में पवार अकेले मंत्री नहीं हैं जिनकी टिप्पणियों के चलते विवाद उठा हो। प्रदेश के किसान कल्याण मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया भी पिछले साल ओला पाला प्रभावित किसानों से बडी संख्या में की गयीं आत्महत्या के बीच यह कहकर विवादों में फंस गये थे कि किसान अपने पापों के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। स्थानीय शासन मंत्री बाबूलाल गौर भ्रष्टाचार को लेकर अपनी ही सरकार को कटघरे में खडा कर चुके हैं जबकि पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री राई नृत्य को लेकर की गयी टिप्पणी से विवादों में आ चुके हैं।

इसी साल अप्रैल के महीने में झाबुआ में एक कार्यक्रम के दौरान महिलाओं और भाजपा नेत्री के साथ ही मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की पत्नी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने के चलते अपनी कुर्सी गंवाने वाले आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह का बड़बोलापन किसी से छुपा नहीं है। अभी तक मंत्री जो भी बोलते थे उसे पार्टी किसी न किसी तरह संभाल लेती थी,लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं। अब चुनाव आयोग के साथ ही जनता के फसले की घड़ी भी आ गई है। अगर भाजपा नेता नहीं संभले तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

20 October 2013

तो क्या कांग्रेस इस बार कमजोर पड़ जायेगी ?

आगामी आठ दिसंबर को जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आयेंगे तो इसे सिंहासन के सेमीफाइनल के रूप में देखा जाएगा। जिन पांच राज्यों में चुनाव हैं उनमें राजनीतिक महत्व के चार राज्यों में से दो में कांग्रेस की सरकार है तो दो में भाजपा की। दोनों ही बड़े राष्ट्रीय दल हैं और दोनों ही दल अपना अपना पलड़ा भारी रखने के लिए पूरी शिद्दत से मैदान में उतर चुके हैं। बीते कुछ हफ्तों पहले तक चार राज्यों में जहां मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जहां यथास्थितिवाद की भविष्यवाणी की जा रही थी वहीं राजस्थान और दिल्ली में भी कांग्रेस के सफाये का संकेत दिया जा रहा था। शेष नारायण सिंह मानते हैं कि अब ऐसा नहीं है। इन चारों राज्यों में कांग्रेस कमजोर नहीं है और उम्मीद के उलट नतीजे आ जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं। 

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे ८ दिसंबर को आ जायेगें। यह चुनाव भारत की राजनीति में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जर्मनी में हुआ १९३३ का चुनाव था। दोनों बड़ी पार्टियों में से कोई भी इस चुनाव को सेमीफाइनल मानने को तैयार नहीं है लेकिन सच्चाई यह है कि विधानसभा चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। मिजोरम का राजनीतिक महत्त्व उतना नहीं है जितना मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और राजस्थान का है। दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है जबकि छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सरकारें हैं। इन चार राज्यों में से जो पार्टी चार राज्यों में जीत जातेगी, उसका चुनाव के लिए ऐसा माहौल बन जाएगा जिसे मई तक खिलाफ पार्टी वाले रोक नहीं पायेगें। अगर इन राज्यों में कोई पार्टी तीन राज्यों में जीत गयी तो उसके कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद हो जायेगें और उनकी पार्टी को लोकसभा २०१४ में लाभ मिलेगा। अगर दोनों ही बड़ी पार्टियां दो-दो राज्यों का हिस्सा पाकर सरकार बनाने में कामयाब हो गईं तो इन चुनावों से साफ़ सन्देश आयेगा की खेल यथास्थिति की तरफ बढ़ रहा है और २०१४ में भी बहुत परिवर्तन की उम्मीद नहीं रहेगी। इसलिए इन चार राज्यों के चुनावों पर दुनिया भर के उन लोगों की नज़र है जो भारत के चुनाव को महत्वपूर्ण मानते हैं।

कांग्रेस का चुनाव प्रबंधन नकारात्मक सोच के साथ शुरू हुआ है। बताया गया था कि राजस्थान में अशोक गहलौत के खिलाफ सभी कांग्रेसी थे. गिरिजा व्यास, सीपी जोशी, सीसराम ओला, सचिन पायलट, सभी उनको हटवाना चाहते थे और उनकी हर योजना के अन्दर के असली भ्रष्टाचार को सार्वजनिक कर रहे थे। उनके खिलाफ माहौल इतना बिगाड़ दिया गया था की जब पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अभियान शुरू किया तो उनकी  सभाओं में लोग उमड़कर आ रहे थे। लोगों को लग गया कि अशोक गहलौत से जान छुडा लेना ही सही रहेगा और कांग्रेसियों ने भी अपने आलाकमान को डराने के लिए वसुंधरा राजे की सभाओं में गुप्त रूप से मदद करना शुरू कर दिया। उधर बीजेपी की तरफ से वसुंधरा राजे के समर्थन में सभी बीजेपी नज़र आ रहे थे. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह और वसुंधरा राजे के बीच सही मायनों में सुलह हो गयी हालांकि पिछले कार्यकाल में राजनाथ सिंह को वसुंधरा राजे ने बहुत ही परेशान किया था।  

लेकिन पार्टी के हित को सर्वोच्च मानते हुए दोनों ही नेताओं ने उसे भुलाकर एकजुटता का सबूत दिया और बीजेपी राजस्थान में अजेय लगने लगी। राजस्थान के बीजेपी के बड़े नेताओं, घनश्याम तिवाडी और गुलाबचंद कटारिया भी वसुंधरा राजे के साथ एकजुट नज़र आने लगे। जहां वसुंधरा राजे की सभाओं में लोगों का मेला दिखता था वहीं अशोक गहलौत की सभाओं में उतनी भीड़ नहीं होती थी। लेकिन उसके बाद अशोक गहलौत ने आम आदमी के लिए सरकार का खजाना खोल दिया और तरह तरह की स्कीमें राज्य की जनता के लिए लेकर आ गये। आजकल माहौल उनके पक्ष में  मुड़ता नज़र आ रहा है लेकिन इसका मतलब यह  नहीं है की वे भारी पड़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी, ने ऐसा माहौल बना रखा था कि साफ़ नज़र आ रहा था की इस बार भी उनकी राजनीति का लाभ शुद्ध रूप से रमण सिंह को ही मिलेगा और कांग्रेस का अजीत जोगी फैक्टर राज्य में एक बार बीजेपी को सत्ता सौंप देगा। ऐसा मानने के बहुत सारे कारण भी थे। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के प्रभारी महासचिव बी के हरिप्रसाद हैं। उनको कुछ महीने पहले सार्वजनिक मंच पर अजीत जोगी ने अपमानित कर दिया था।  माहौल ऐसा बन गया था कि लगता था की अजीत जोगी कांग्रेस का खेल बिगाड़ देगें। उन्होंने राज्य के कांग्रेस के नेतृत्व की अनदेखी करके अपनी तरफ से अखबारों में बयान देना शुरू कर दिया था। 

किसी भी कांग्रेसी को कुछ नहीं समझते थे और साफ़ लग रहा था की वे कम से कम १५ सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवारों को हरा देगें। ज़ाहिर है बीजेपी और कांग्रेस के बीच बराबर की राजनीति के दौर में इतनी बड़ी संख्या में सीटों की हार के बाद कांग्रेस को रसातल में  ही जाना था. लेकिन अब माहौल बदल गया है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का काम देख रहे, सी पी जोशी ने अजीत जोगी को राहुल गांधी के सामने पेश करके यह भरोसा दिलवा दिया है कि उनकी पत्नी और बेटे को टिकट दिया जा सकता है और राज्य में कांग्रेस का बहुमत आने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी पर भी विचार किया जा सकता है। 

बताते हैं कि राहुल गांधी ने उनको साफ़ बता दिया की अगर पिछली बार की तरह कांग्रेस की आपसी सर फुटव्वल से रमण सिंह को फायदा पंहुचा तो अजीत जोगी को कोई लाभ नहीं होगा लेकिन अगर कांग्रेस की बनाने स्थिति  आयी तो उनकी संभावना बढ़ जायेगी। बताया गया है की इसके बाद अजीत जोगी कांग्रेस के उम्मीदवारों को जिताने के लिए तैयार हो गए हैं। उनको यह भी बता दिया गया है की उनके अपने परिवार के टिकटों के अलावा उनको और किसी को टिकट दिलाने के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि इस बार टिकट एक फार्मूले के तहत दिए जा रहे हैं। उस हालत में किसी सिफारिशी का चांस अपने आप कम हो जायेगा.  पहली खेप में कांग्रेस ने बस्तर और आस पास  के इलाकों के लिए जो टिकट दिया है उस से इस तर्क को  बल मिल रहा है।

लेकिन मुकाबला भी रमन सिंह से है। और वे बीजेपी के सबसे काबिल मुख्यमंत्री हैं।  बीजेपी वालों को उम्मीद है कि नेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने के बाद  पार्टी को बहुत फायदा होगा लेकिन छत्तीसगढ़ में नरेन्द्र मोदी का असर ऐसा नहीं है कि  चुनावी राजनीति पर कोई फायदा हो।  नरेन्द्र मोदी समाज के जिन वर्गों  को प्रभावित कर सकते हैं , रमन  सिंह का प्रभाव उन वर्गों पर मोदी से ज़्यादा है। इसलिए छत्तीसगढ़ में नरेन्द्र मोदी का अगर कोई असर हुआ भी तो वह उन्हीं वोटों पर होगा जो पहले से ही रमण सिंह के कारण बीजेपी के साथ हैं। 

छत्तीसगढ़ में  अजीत जोगी के कांग्रेस अभियान में सही मन से शामिल होने के बाद बहुत कुछ बदल रहा है। उनका प्रभाव आदिवासी इलाकों में बहुत ज़्यादा है। उनके रिश्ते माओवादियो से भी बहुत अच्छे हैं। पिछली बार उन्होने घोषित कर दिया था की वे कुछ कांग्रेसी उम्मीदवारों को हरायेगें। रमण सिंह ने भी माओवादियों को साध लिया था। नतीजा यह हुआ की अजीत जोगी और रमण सिंह की नाराज़गी के कारण कांग्रेस पार्टी बस्तर  की १२ सीटों में केवल एक सीट जीत पायी। वह भी ऐसी सीट है जिसपर जोगी का ख़ास आदमी लखमा कवासी उम्मीदवार था। इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वह माओवादियों को अपने साथ ले पायेगी और उनकी कृपा से बस्तर  में अपनी सीट संख्या बढायेगी। अजीत जोगी भी इस बार कांग्रेसी उम्मीदवारों को हराने  से परहेज़ करेगें तो बस्तर में चुनावी राजनीति बदल सकती है। गौर करने की बात है की बस्तर में ग्यारह सीटें जीतकर बीजेपी ने सरकार बना ली थी वरना बाकी राज्य में तो कांग्रेस और बीजेपी बराबरी पर ही थे। इसलिए छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन की दस्तक साफ़ नज़र आ रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले कुछ हफ़्तों में दोनों ही राजीतिक पार्टियां कितनी और कैसी गलतियां करती हैं।

जब इन पंक्तियों के लेखक ने  अगस्त के महीने में राजस्थान की हालात का जायजा लिया था तो वहां कांग्रेस की हालत अच्छी नहीं थी. अशोक गहलौत मुख्यमंत्री तो थे लेकिन दिल्ली में कांग्रेस के जितने भी बड़े नेता हैं सब उनके खिलाफ थे। सीपी जोशी, गिरिजा व्यास, सीसराम ओला और सचिन पाइलट सभी अशोक गहलौत को हटवाना चाहते थे। दिल्ली वाले कांग्रेसियों के गुस्से को कम करने के लिए गिरिजा व्यास और सीसराम ओला को केन्द्र में मंत्री बना दिया गया, सी पी जोशी को संगठन में बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे दी गयी लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ था। कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वसुंधरा राजे ने ज़बरदस्त अभियान चला रखा था। वे राजस्थान सरकार को नाकारा साबित करने में जुटी हुयी थीं  जहां भी जा रही थीं, उनका स्वागत हो रहा था। वसुंधरा राजे जाति के गणित में भी वे जाटों और राजपूतों में अपनी नेता के रूप में पहचानी जा रही हैं। राजनाथ सिंह के कारण पूरे उत्तर भारत में राजपूतों का झुकाव बीजेपी की तरफ है उसका फायदा भी उनको मिल रहा था। अब भी जाटों का पूरा समर्थन बीजेपी को ही मिल रहा है। मुज़फ्फरनगर में नरेन्द्र मोदी के साथी  और बीजेपी के महामंत्री अमित शाह की जाटों में हुई लोकप्रियता का लाभ राजस्थान में बीजेपी को मिल रहा है।

लेकिन अब राजस्थान में हालात बदल रहे हैं। कांग्रेस के दिल्ली वाले नेताओं को राहुल गांधी ने समझा दिया है। सी पी जोशी, गिरिजा व्यास, सीसराम ओला, सचिन पायलट सबको बता दिया गया है कि उनकी सिफारिश पर किसी को टिकट नहीं दिया जायेगा। राहुल गांधी का दावा है कि वे राजस्थान की राजनीति अच्छी तरह समझ गए हैं और वे ही टिकट का फाइनल फैसला लेगें। इसके बाद किसी कांग्रेसी की हिम्मत नहीं है की वह अशोक गहलौत का विरोध कर सके। आज अशोक गहलौत ही कांग्रेस आलाकमान की नाव के खेवनहार हैं और बाकी सब नेताओं को औकातबोध करा दिया गया है। अशोक गहलुत की मुफ्त दवा वाली योजना बहुत ही प्रभावकारी है। खबर है कि कुछ विदेशी दवा कम्पनियों ने कुछ राजनेताओं की मदद से दवा वाली योजना का खात्मा कराने के लिए अभियान चला दिया है लेकिन अशोक गहलौत भी आक्रामक मुद्रा में अपनी नीतियों को चला रहे हैं। अब तो यह बात भी सामने आ रही है कि  घनश्याम तिवाडी और गुलाब चंद कटारिया भी पूरे मन से वसुंधरा राजे के साथ नहीं हैं। 

मैंने अगस्त में राजस्थान में कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब देखी थी लेकिन अब मैं भी राय बदलने पर मजबूर हूँ।  मैं अब यह पक्के तौर पर कहने की स्थिति में नहीं हूँ कि अशोक गहलौत हार जायेगें या वसुंधरा राजे जीत जायेगीं क्योंकि पिछले तीन महीने में राजनीतिक समीकरण बहुत तेज़ी से बदल गए हैं। अब राजस्थान के कांग्रेसियों ने अशोक गहलौत को हराने की अपनी योजना को तर्क कर दिया है। राजस्थान की ऊंची जातियों में बीजेपी के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का असर भी पड़  रहा है लेकिन अशोक गहलौत बीजेपी को वाक्ओवर देने को तैयार नहीं है।  अब लगने लगा है की किरोड़ी लाल बैंसला और  किरोड़ी लाल मीना आदि के सारे  राजनीतिक फैक्टर ऐसी हालात पैदा कर सकते हैं कि राजस्थान में वसुंधरा राजे का सपना पेंडिंग हो जाए।

इस साल विधानसभा चुनाव वाले दो अन्य राज्य हैं मध्य प्रदेश और दिल्ली। दिल्ली में कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने विकास का काम किया है। लेकिन कांग्रेस ने उनको कमज़ोर कर दिया और उनके विरोधी अजय माकन को मज़बूत कर दिया। इसके बावजूद भी दिल्ली में कांग्रेस कमज़ोर नहीं है। सबसे बड़ा फैक्टर तो अन्ना हजारे के आन्दोलन वालों का कांग्रेस विरोधी वोटों को बाँट देने का फैसला है जब अन्ना हजारे की रामलीला मैदान वाली लीला चल रही थी तो बीजेपी समेत सबको उम्मीद थी की कांग्रेस के खिलाफ माहौल बन गया था जिसका चुनावी लाभ बीजेपी को होगा. बीजेपी प्रवक्ता लोग अन्ना हजारे के सद्गुण गिनाते नहीं थकते थे।  लेकिन अब बात बदल गयी है। 

बीजेपी का आरोप है कि अन्ना हजारे के मुख्य शिष्य अरविन्द केजरीवाल की पार्टी वास्तव में कांग्रेस की बी टीम है और वह बीजेपी के हितों के खिलाफ काम कर रही है। जबकि अरविन्द केजरीवाल की पार्टी वाले कहते हैं कि वे भ्रष्टाचार को समूल उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध हैं। बहरहाल सच्चाई यह है कि अन्ना हजारे के चेलो की पार्टी की कृपा से आज शीला दीक्षित बहुत मज़े में हैं और बीजेपी में चिंता है।  उस चिंता को दिल्ली प्रदेश के स्तर पर जारी आपसी दुश्मनी ने बहुत बढ़ा दिया है। विजय गोयल और हर्षवर्धन के झगड़े ने बीजेपी को भारी नुक्सान पंहुचाया है और शीला दीक्षित का रास्ता आसान कर दिया है।

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति सबसे ज़्यादा खराब थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं।  वहां अब ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी का चेहरा बनाकर पेश कर दिया गया है। बताया गया है कि राहुल गांधी के आग्रह पर दिग्विजय सिंह और कमलनाथ सिंधिया को पूरा समर्थन दे रहे हैं। कमलनाथ को सारा आर्थिक प्रबंध संभालना है। दिग्विजय सिंह का दिमाग काम कर रहा है और ज्योतिरादित्य सिंधिया की साफ़ छवि को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।  मध्य प्रदश में कांग्रेस ही चाहती है कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बना दिया जाए क्योंकि वहां भ्रष्टाचार के सारे किस्से बीजेपी को कमज़ोर करते हैं। बताया जाता है कि एमबीबीएस के कोर्स में प्रवेश की हेराफेरी में पकडे गए डॉ पंकज त्रिवेदी के काल डिटेल से पता चला है की वे दिन में कम से कम  बीस बार मुख्यमंत्री के घर फोन करते थे. ऐसे ही बहुत सारे लोगों की लिस्ट केंद्र सरकार के पास है जिनके कारण  राज्य की बीजेपी सरकार पर भ्रष्टाचार के बैज आसानी से चस्पा किया जा सकता है।

 मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह अपने को नरेन्द्र मोदी से ज्यादा काबिल मानते हैं। इसलिए मोदी के समर्थक भी आजकल शिवराज सिंह चौहान को बहुत भाव नहीं दे रहे हैं। जब अगस्त में मैंने इन चार राज्यों की राजनीतिक सम्भावना का आकलन किया था तो मैंने साफ़ कह दिया था की चारों ही राज्यों में कांग्रेस की हालत खराब थी लेकिन आज हालात बदल गए हैं। बीजेपी और कांग्रेस में कोई भी किसी पर भारी नहीं है। आने वाले कुछ हफ्ते बहुत दिलचस्प होंगें और ८ दिसंबर को अपने आकलन का नतीजा देखने का मौक़ा सबको मिलेगा।

आप का सर्वे आप की सरकार बाकी सब बेकार !

सिसरो एसोसिएट भी किसी नयी बला का ही नाम है जो भारत में लोकतंत्र को सुधारने की दिशा में काम करने के लिए नयी नयी मैदान में आई है। पिछले दो आम चुनावों से कारपोरेट अंदाज में पूंजीखोरी के लिए लोकतंत्र का भला करने का जो चलन शुरू हुआ यह उसी कड़ी में एक और नाम लगता है। इधर दो चुनावों से जब से यह जुमला ज्यादा प्रचलित हो चला है कि राजनीति सबसे बड़ा व्यापार है, कारपोरेट घरानों को नाना प्रकार के लोकतांत्रिक हित समझ में आने लगे हैं। सर्वे, ओपिनियन पोल, सोशल मीडिया पर ब्रांडिंग, कैम्पेन के नाना रूपों और रंगों को रंग रोगन करने जैसे कामों को लोकतंत्र और ओपिनियन मेकिंग के लिए जरूरी मानकर कारपोरेट कंपनियों की पहल पर लोकतंत्र का भला करने के लिए कुकुरमुत्तों की तरह सैकड़ों चुनावी दुकानें खुल गई हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता अब सिर्फ नारा लगाने के काम में शेष रह गये हैं। बाकी सारा काम धीरे धीरे इलेक्शन मैनेजमेन्ट के जिम्मे होता जा रहा है। लोकतंत्र को मजबूत करने का यह नया प्रयास लोकतंत्र को कितना कमजोर करेगा इसका अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है लेकिन अभी तो सिर्फ सिसरो एसोसिएट के जरिए उस आप की चर्चा जिसने अपने ही सर्वे में अपने आपको दिल्ली का सरताज घोषित कर दिया है। 

सामान्य परिस्थिति में अगर यह सर्वे सामने आता तो खबर बनाने की बजाय शायद हम इस सर्वे की खबर लेते कि भला कौन सी ऐसी पार्टी है जो अपना सर्वे सार्वजनिक करे और यह न कहे कि उसकी सरकार नहीं बन रही है? अरविन्द केजरीवाल जिस सर्वे के हवाले से अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं वह उन्हीं की पार्टी द्वारा उन्हीं की चहेती कंपनी ने करवाया है जिसका नाम सिसरो एसोसिएट है। सिसरो एसोसिएट से कौन कौन जुड़ा है यह जानने जब हम उसकी वेबसाइट पर पहुंचे तो "प्रोफाइल" पेज अंडर कंस्ट्रक्शन था लेकिन योगेन्दर यादव खुद आगे आये हैं इसलिए इस बात की पूरी संभावना जताई जा सकती है कि सिसरो का कुछ न कुछ योगेन्दर कनेक्शन जरूर होना चाहिए। योगेन्दर सर्वे सिंडिकेट के बेताज सरताज हैं। सीएसडीएस में रहते हुए उन्होंने अपने सर्वेक्षणों के जरिए अभी तक कमोबेश सटीक नतीजे ही दिये हैं और सरताज के सर्वे नतीजों पर सबको कमोबेश भरोसा होता रहा है।

लेकिन सरताज के कहने पर भी सिसको के सर्वे पर एकबारगी भरोसा इसलिए नहीं हो रहा है कि यह उन्हीं के लिए उन्हीं के द्वारा उन्हीं का सर्वे है। सिसको के धनंजय जोशी या सुनीत माथुर वैसे भी इतने जाने पहचाने नाम नहीं है कि मनमानी रिजल्ट देने से पहले बहुत सोच विचार करें। इसे जनमत इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इसमें थर्ड पार्टी इंटरवेन्शन (तीसरे पक्ष की सहभागिता) कहीं नहीं है। पार्टियों द्वारा जो आंतरिक सर्वे होते हैं उसके नतीजे तब भी सार्वजनिक नहीं किये जाते जबकि वे अपने ही द्वारा करवाये गये सर्वे में जीत रहे होते हैं। (विजय गोयल जैसे लोगों द्वारा प्रायोजित सर्वे की बात दूसरी है।) वैसी परिस्थिति में भी जीत जाने का दावा किया जाता है अपने ही द्वारा किये गये सर्वे का हवाला नहीं दिया जाता। क्योंकि यह लोकतंत्र के लिए सामान्य परिस्थिति नहीं है इसलिए अब हम सवाल उठाने की बजाय सवाल दबा रहे हैं। मामला मोदी और अरविन्द केजरीवाल से जुड़ा हो तो वैसे भी हमारे सारे सवाल बेमतलब और बेमानी हो जाते हैं।

जैसे प्रचार कंपनियों के जरिए मोदी पूरे देश में छा जाने की कोशिश कर रहे हैं कुछ कुछ उसी तर्ज पर अरविन्द केजरीवाल ने दिल्ली में अपने आपको स्थापित करने की कोशिश की है। कितने स्थापित हुए हैं यह तो वक्त बताएगा लेकिन उनकी ओर से कोशिश में कोई कमी नहीं है। यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने पार्टी सबसे बाद में बनाई लेकिन दिल्ली में टिकट का बंटवारा सबसे पहले शुरू किया। यह अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने दिल्ली के आटोरिक्शावालों के पिछवाड़े शीला दीक्षित को गाली देते हुए से पोस्टर लगवाये। उनके प्रचार अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह बना कि उन्होंने अपनी अच्छाइयों का प्रचार करने की बजाय शीला दीक्षित की बुराइयों का घोषित प्रचार शुरू किया। पोस्टर बैनर लगाकर। दिल्ली की राजनीति में अरविन्द केजरीवाल के कुछ दुस्साहसिक प्रयोगों में एक प्रयोग यह भी था कि दिल्ली में किसी सर्वे के हवाले से उन्होंने यह घोषणा भी कर दी थी कि वे दिल्ली के सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बन चुके हैं।

यानी आप आगे क्या सोचेंगे इसका निर्धारण अरविन्द केजरीवाल अपने विज्ञापनों से पहले ही सुनिश्चित कर देते हैं। वे कितनी सीट पायेंगे यह तो उनके सर्वे बता ही देते हैं, वे मुख्यमंत्री के बतौर शपथ कहां लेंगे इसकी भी जानकारी वे तब दे देते हैं जबकि बाकी दलों ने अपने अपने प्रत्याशियों तक की घोषणा न की हो। अरविन्द की इसी आक्रामकता के कारण उन्होंने पिछले तीन सालों में वह मुकाम हासिल कर लिया है जो उनके विरोधियों को सिर्फ उनकी आलोचना करने का मौका देता है, वे उनको कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। ऐसी आक्रामकता हमेशा तब आती है जब आप बहुत गहरे आत्मविश्वास से भरे हों। लेकिन यही गहरा आत्मविश्वास कभी कभी आपको बहुत सूक्ष्म में अहंकार से भरना शुरू कर देती है जो धीरे धीरे आत्मविश्वास को घोर अहंकार में तब्दील कर देती है। हमारे दौर के नरेन्द्र मोदी हों कि अरविन्द केजरीवाल दोनों ही इसी सूक्ष्म अहंकार से पीड़ित प्राणी नजर आते हैं।

अगर ऐसा नहीं होता तो अरविन्द केजरीवाल एकबार को ही सही अपनी ही पार्टी द्वारा करवाये गये सर्वे में अपनी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा दिलवाने से खुद को बचाते। हो सकता है उनका सर्वे सही भी हो लेकिन क्योंकि अपनी जीत का दावा किसी ऐसे माध्यम के जरिए वे खुद कर रहे हैं जो माध्यम कभी भी दलों के दायरे में नहीं हुआ करता तो उनका दावा आत्मविश्वास से ज्यादा अहंकारी दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम इस हकीकत को नहीं जानती होगी लेकिन वे सब कुछ जानते हुए भी अगला एजेण्डा सेट कर रहे हैं। अगर आप सर्वे देखेंगे तो पायेंगे कि अरविन्द ने बड़ी चालाकी से अपने आपको दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी घोषित कर दिया है। कुछ कुछ उसी तरह जिस तरह से अपने सर्वे के सहारे विजय गोयल ने अपने आपको दिल्ली का सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री घोषित कर दिया है। खबर में उनकी ओर से यह प्रचारित किया गया कि उनकी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर रही है, लेकिन उनके सर्वे में ही साफ साफ कहा गया है कि वे सीधे तौर पर 21 सीटें सीधे तौर पर जीत रहे हैं जबकि 12 सीटों पर उन्हें मार्जिनल विक्ट्री मिल रही है। 21 सीटों पर उन्हें न्यूनतम रूप से हार का सामना करना पड़ रहा है। यानी अगर टोपीवालों ने मेहनत किया तो पार्टी की टीआरपी इतनी हाई हो जाएगी कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के अलावा और बाकी दलों की जमानत जब्त हो जाएगी।

क्या सचमुच ऐसा हो जाएगा? लगता इसलिए नहीं है कि जिस दिन आप पार्टी का अपना सर्वे सामने आया है उसी दिन बाप पार्टी (भाजपा) का भी एक सर्वे सामने आया है। इस सर्वे में नतीजा निकाला गया है कि दिल्ली में विजय गोयल सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री बन गये हैं। दिल्ली की 20 प्रतिशत जनता चाहती है कि विजय गोयल मुख्यमंत्री बनें जबकि 12 प्रतिशत जनता अरविन्द केजरीवाल के पक्ष में है। विजय गोयल द्वारा प्रायोजित भाजपा का सर्वे यह भी कह रहा है कि उसे दिल्ली में 39 सीटें मिल रही हैं जबकि आम आदमी पार्टी को महज 2 सीटें मिल रही हैं। वह दिल्ली में भाजपा के नहीं बल्कि बसपा के बराबर बैठ रही है। और मजेदार बात यह है कि अरविन्द के 34 हजार सैंपल सर्वे के मुकाबले विजय गोयल ने 71 हजार लोगों के सैंपल सर्वे के जरिए ये नतीजे निकाले हैं। तो क्या भाजपा के इस सर्वे को दिल्ली में आनेवाले जनादेश का रुख मान लिया जाए? अगर विजय गोयल अरविन्द केजरीवाल से मीलों आगे जाकर दिल्ली की जनता की पसंद हो सकते हैं तो निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी भाजपा से भी बड़े दल के रूप में उभर सकती है। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो वैसा भी नहीं है जैसा कि अरविन्द केजरीवाल एण्ड कंपनी दावा कर रही है। आप का सर्वे है, आप जो चाहें वह नतीजा निकाल सकते हैं। कोई क्या कर सकता है?

अगर अरविन्द का यह सर्वे बिल्कुल सही और सटीक है, योगेन्दर यादव की मौजूदगी के कारण तो उस सर्वे का क्या जो भाजपा ने करवाया है। विजय गोयल के सर्वे में तो वे दिल्ली के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री बनकर उभर रहे हैं और उनके काबिल नेतृत्व के कारण दिल्ली में भाजपा को 37 फीसदी मत मिल रहा है। दूसरे नंबर पर कांग्रेस है जिसे 34 फीसदी मत मिल रहा है। विजय गोयल के सर्वे में अरविन्द की पार्टी को दिल्ली में महज 6 प्रतिशत मत मिल रहा है। जबकि अरविन्द के अपने सर्वे में वे अपनी पार्टी को 32 फीसदी वोट दे रहे हैं। तो इस सर्वे युद्ध में कौन सही बोल रहा है? या फिर कोई सही नहीं बोल रहा है?

योग के महायोगी बने स्वामी सत्यानंद सरस्वती !

इस शताव्दी के महानतम संतों में स्वामी सत्यानंद सरस्वती हैं, जिन्होंने समाज के हर क्षेत्र में योग को समाविष्ट कर, सभी वर्गों, राष्ट्रों और धर्मों के लोगों का आध्यात्मिक उत्थान सुनिश्चित कर दिया। 2013 एक अविस्मरणीय वर्ष साबित होगा। यह वर्ष बिहार योग विद्यालय तथा स्वामी सत्यानंद के योग क्षेत्र के अभूतपूर्व की स्वर्ण जयंती है। योग का तात्पर्य होता है जोड़ना। और परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग का संसार में जिस वैज्ञानिक रूप में पुनर्जीवन किया उस योग ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में जोड़ कर रखा है। आज पूरब से लेकर पश्चिम तक जिस योगलहर योगस्नान कर रहा है उसके मूल में स्वामी सत्यानंद सरस्वती का कर्म और उनके गुरू स्वामी शिवानंद सरस्वती का वह आदेश है जो उन्होंने सत्यानंद को दिया था। 

जन्म से ही उनमें अभूतपूर्व आध्यात्मिक प्रतिभा परिलक्षित हुई। युवावस्था आते-आते उनकी आघ्यात्मिक आकांक्षा अत्यंत तीव्र हो गयी, और सन् 1943 में गुरू की तलाश में अपना घर-परिवार त्याग दिया। इसकी खोज ऋषिकेष में जाकर समाप्त हुई, जहां उन्होंने महान संत स्वामी शिवानंद को गुरू के रूप में वरण किया। उनके गुरू स्वामी शिवानंद सरस्वती ने 1956 में उनसे कहा कि ‘सत्यानंद जाओ और दुनिया को योग सिखाओ।’’ स्वामी सत्यानंद गुरू आश्रम त्यागकर परमहंस परिव्राजक सन्यासी हो गये। गुरू के आदेशानुसार उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था- योगविद्या का प्रचार-प्रसार, द्वारे-द्वारे तीरे-तीरे। गुरू के इस आदेश के बाद वेदान्त का एक विद्यार्थी दुनिया को आसन-प्राणायाम सिखाने निकल पड़ता है। जब वे आश्रम से निकले तो उनके तन के वस्त्र के अलावा उनके पास कुछ नहीं था।

परिव्राजक जीवन की दो धाराएं होती है- एक साधना का पुष्टिकरण और दूसरा ज्ञान का विवरण। ये कार्य अकेले ही करने पड़ते हैं। इस दौरान नंदग्राम, गंगोत्री, बद्री-केदार, मथुरा-वृंदावन, अमरकण्टक की यात्रा की। परिव्राजक के रूप में बिहार यात्रा के क्रम में छपरा के बाद मुंगेर आए। पहले वे लाल दरवाजा में रूकते थे। अब राय बहादुर केदारनाथ गोयनका के आनंद भवन में रहते थे। यहाँ की प्राकृतिक छटा उन्हें आकर्षित करती थी। यहां उन्होंने चातुर्मास भी व्यतीत किया। जब वे यहां रहते तो कर्णचैरा अवश्य जाते। कभी ध्यान करते तो कभी सो जाते। यहां उन्हें विशेष अनुभूति होती थी। आनंद भवन में रहकर उन्होंने सिद्ध भजन पुस्तिका तैयार की। 1961 में अंतर्राष्ट्रीय योग मित्र मंडल की स्थापना की तब तक योग निंद्रा और प्राणायाम विज्ञान, पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी। ‘लेशन आन योग’ का अनुवाद योग साधना भाग-एक, दो आ चुके थे।

1962 मतें इंटरनेशनल योग फलोशिप का रजिस्ट्रेशन हुआ। साथ ही पुस्तकें सत्यानंद पब्लिकेशन सोसायटी नंदग्राम से प्रकाशित हुई। सत्यम स्पीक्स, वर्डस ऑफ सत्यम, प्रैक्टिस ऑफ त्राटक, योग चूड़ामणि उपनिषद, योगाशक्ति स्पीक्स, स्पेट्स टू योगा, योगा इनिसिएशन पेपर्स, पवनमुक्त आसन (अंग्रेजी)में, अमरसंगीत, सूर्य नमस्कार, योगासन मुद्रावंध प्रमुख है। जगह-जगह शिविर लगाते कार्य योजना को अंजाम देना शुरू किया। 1963 से अंग्रेजी में योगा और योगविद्या निकालना आरंभ किया। 16 जुलाई 1963 को स्वामी शिवानंद ने महासमाधि ली। गुरूदेव का आदेश था कि परिव्राजक जीवन समाप्त हो चुका है और योग को जन-जीवन में वितरित करना है।

परिव्राजक जीवन की समाप्ति के बाद वसंत पंचमी के दिन 19 जनवरी 1964 को बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। योग की प्रकाशन क्षमता के प्रतीक के रूप में स्वामी शिवानंद की अखंड ज्योति प्रज्जवलित की। साथ ही सत्यानंद योग रिसर्च लाइब्रेरी भी शुरू किया गया। यह तय किया गया कि मुंगेर आश्रम में तीन वर्ष रहकर 15-15 दिनों सत्रों में योग कथाएं लेंगे तथा सत्संग करेंगे। इस कार्यक्रम के तहत सुबह आसन-प्राणायाम, फिर दलिया का मीठा पेय, उपनिषद गीता पाठ, 10 बजे भोजन, एक बजे से लिखित जप, नाद योग, योग निंद्रा, कर्मयोग, भोजन, भजन, कीर्तन सत्संग, प्रवचन, आठ बजे विश्राम, चैथे दिन शंख प्रक्षालन, तेरहवें दिन मौनव्रत, चौदहवें दिन नियमित कार्यक्रम, दो बजे से रामायण पाठ, आरती, प्रसाद, भोजन और पंद्रहवें दिन विदाई कार्यक्रम होते थे। इस तरह से लोगों की संख्या बढ़ने लगी।

1964 में मुंगेर प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन हुए, जिसका उद्घाटन बिहार के तात्कालीन राज्यपाल अनंत शयनम् आयंगर ने किया। इसी प्रकार 1966 में दूसरा और उसके बाद तीसरा योग सम्मेलन अंतर्राष्ट्रीय स्तर का हुआ। बिहार योग विद्यालय, मुंगेर की गुरू परंपरा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी मठ से सम्बद्ध है। 1967 में रायगढ़ में योग विद्यालय की स्थापना की। इसी वर्ष मुंगेर में नौ माह का योग प्रशिक्षण सत्र हुआ। इसकी यह खासियत थी कि इस अवधि में बाहर की दुनिया से सम्पर्क नहीं रहेगा। आज भी यहां के लोगों का बाहरी परिवेश से कोई ताल्लुक नहीं होता है। गोंदिया में चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन में शिक्षा के क्षेत्र में योग के समावेश पर गहन चर्चा हुई। बाद में आश्रम बनाकर समर्पित किया गया।

19 October 2013

सहकारिता पर नया संकट !

प्राथमिक कृषि सहकारी समिति (पैक्स) पर राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की वक्रदृष्टी से हडकंप मचा है। नाबार्ड ने अध्यादेश में पैक्स की संपदा जिला सहकारी बैंक में जमा कराने और पैक्स सदस्यों को कमीशन एजेंट बनाने का निर्देश है। अध्यादेश के असर से बचने के लिए राज्य सरकार बगलें झांक रही हैं। उच्च न्यायालयों में इसकी वैधानिकता को चुनौती दी जा रही है।

पहली नजर में यह अध्यादेश ग्रामीण आधारित अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने के दूरगामी साजिश का हिस्सा लग रहा है। अध्यादेश पर विवाद पैदा होने के बाद नाबार्ड की ओर से सफाई दी जा रही है कि राज्य सरकारों के लिए अध्यादेश पर अमल करने की अनिवार्यता नहीं है। सवाल उठता है कि अगर अनिवार्यता नहीं है, तो अध्यादेश को गलत मानते हुए वापस क्यों नहीं लिया जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सहकारिता क्षेत्र से इसके विरोध की आवाज मंद पड़ते ही पूर्ण रूप से इसे लागू करने का आधार तैयार किया जा रहा है।

तथ्य बताते हैं कि नाबार्ड ने यह अध्यादेश विदेशी एंजेंसी के सलाह पर जारी किया है। पैक्स गांव के किसानों की समिति है जो सहकारिता के सिद्धांत से चल रही हैं। यह कृषि आधारित ग्रामीण सहकारिता की नींव है। पैक्स जैसी संरचना की वजह से ही भारत का सहकारिता आंदोलन दुनिया के विशालतम आंदोलन में शुमार है। देश के 97प्रतिशत गांवों तक सहकारिता की पहुंच बनी है। पैक्स की पकड़ कमजोर पड़ते ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए देश के कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के आधारभूत ढांचे प्रवेश करने का रास्ता तैयार हो जाएगा। तकरीबन छह लाख सदस्यों की मदद से देश भर की गांव-पंचायतों में 93 हजार पैक्स काम कर रहे हैं। यह रोजगार साधन का बड़ा उपक्रम है।

खेत खलिहान में लगे किसान ही लोकतांत्रिक तरीके से पैक्स के सदस्य निर्वाचित करते हैं। कई राज्यों ने पैक्स के निर्वाचन को वैधानिकता देने के लिए निर्वाचन आयोग सरीखा व्यवस्था विकसित कर लिया है। जिन राज्यों ने सहकारी संस्थाओं के निर्वाचन प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आयोग नहीं बनाया है, उनको 97 वें संविधान संशोधन को अमलीजामा पहनाने के लिए निकट भविष्य में बना लेना है। सहकारिता क्षेत्र की पुरानी मांग को पूरा करते हुए संविधान संशोधन के जरिए सहकारिता को आम भारतीयों का मौलिक अधिकार बना दिया गया है।

पैक्स के जरिए किसान अपने ही सहकर्मियों के बीच खेती के वक्त बीज, खाद, कीटनाशक आदि के लिए अल्पकालिक ऋण बांटते-वसूलते हैं। इनसे राज्य सरकार अनाज भंडारण व कृषि संबंधी अन्य जरूरी काम लिया करती हैं। कई पैक्स महिला और ग्रामीणों के बीच रोजगारन्मुखी सहकारी काम कर रही हैं। लेकिन नाबार्ड के एक अध्यादेश से खलबली मची है। पैक्स के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है।

नाबार्ड की यह युक्ति राज्य सरकारों के भी समझ से परे है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ की ओर से नाबार्ड के अध्यादेश पर हुई कार्यशाला में मध्य प्रदेश सहकारिता विभाग के उप रजिस्ट्रार के के दूबे कहते हैं,समझ में नहीं आ रहा कि आखिर नाबार्ड के अध्यादेश को लागू कैसे किया जाए? एक तो सहकारिता राज्य का विषय है, केंद्रीय एजेंसी को इसमें बदलाव कराने का हक नहीं है। दूसरा, अध्यादेश जारी करने से पहले राज्य सरकारों को विश्वास में लिया ही नहीं गया। नाबार्ड के अध्यादेश को लोक कल्याण से जुड़ी सहकारिता पर नौकरशाही का गैरजरूरी हस्तक्षेप बताया जा रहा है। इसे तुगलकी फरमान बताया जा रहा है। नाबार्ड के अध्यादेश के विरोध में कहा जा रहा है कि जिस विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर अध्यादेश जारी किया है उस समिति के सात में छह सदस्यों ने समिति की आखिरी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था।

केंद्रीय एजेंसी नाबार्ड के अध्यादेश से सहकारिता को राज्य का विषय बताने की संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन होता है। दूसरा, इससे सौ साल से ज्यादा पुरानी स्वशासी सहकारी व्यवस्था के धराशायी होने की नौबत पैदा हो जाएगी। सहकारिता से जुड़े नेता बताते हैं कि नाबार्ड ने पहले भी जिला ग्रामीण सहकारी बैंक को खत्म करने का विवादास्पद सलाह दे चुकी है। अब पैक्स पर नाबार्ड की वक्रदृष्टि से लगता है कि वह पूरी सहकारी व्यवस्था को ही स्वाहा करने के हक में है। अगर ऐसा होता है, तो किसका हित सधेगा यह गंभीर चिंता का विषय है। राज्य सरकार को केंद्रीय एजेंसी नाबार्ड के अध्यादेश को अमल में लाने के लिए राज्य सहकारिता अधिनियम में व्यापक बदलाव लाना होगा। इससे बचने के लिए पैक्स व राज्य सरकार संबंधित उच्च अदालतों का दरवाजा खटखटा रही हैं।

पैक्स 1904 में सहकारिता की शुरूआत के साथ ही यह अस्तित्व में आया। तब से तमाम आर्थिक झंझावातों के बीच उदारीकरण के थपेड़ों को झेलता हुआ न सिर्फ बचा पड़ा है बल्कि इससे सहारे किसान तक सुगमता से ऋण सुविधा पहुंचती रही है। राज्य सरकारें इसके जरिए फसल का समुचित प्रबंधन कराने के साथ कृषि संबंधी जरूरतो को पूरा भी करवाते हैं। सरकारी भंडारण तक पहुंचवाने का ते हैं। पैक्स के सदस्य खुन पसीने की मैहनत अब एक सौ दस साल पुरानी इस आधारभूत संरचना  यह खेती बारी में लगे किसानों की सदस्यता वाली समिति हैं और सहकारिता आंदोलन की आधारभूत संरचना।

बेरोजगारों की लंबी होती कतार को देखकर आने वाली मुसीबतों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। पैक्स को खत्म करने की मंशा वाले अध्यादेश से साफ होता है कि नौकरशाहों का ताकतवर समूह सरकार को अब जय किसान की भावना से मुंह मोड़ने को मजबूर कर रही है।

डौंडिया खेड़ा लाइव !

ये सच है कि एक जमाने में पुरातत्वशास्त्रियों और सेंधमारों के बीच का अंतर बहुत अधिक नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वशास्त्री के भेष में घूमने वाले लोगों को कुछ खास चीजों की तलाश थी। बगैर किसी खास योजना के ये उन जगहों पर जाते जहाँ उन्हें उसके मिलने की आशंका होती या जिसके बारे में उन्होंने स्थानीय लोगों से कुछ सुना होता। फिर शुरु होता बेतरतीब खुदाई का दौर जिसमें पूरा ध्यान उन चीजों की तरफ रहता जिनकी तलाश में वे खुदाई कर रहे होते। असंबद्ध या मामूली दीख पड़ने वाली चीजों को यूँ ही फेंक दिया जाता था। मनमाफ़िक चीजें मिलीं तो ठीक वरना आगे कहीं और कूच कर जाते। 

पीछे छोड़ जाते बुरी तरह से तितर-बितर हो चुका पुरास्थल जिसके स्तर-विन्यास का पता लगा पाना भी कई बार मुश्किल होता। खुदाई में मिली ‘चीजें’ या तो तथाकथित खुदाई अभियान के लिए धन देने वाले रईसों के घरों की शोभा बनतीं या तस्करों की मार्फ़त निजी या राष्ट्रीय संग्राहालयों तक पहुँचती। मौका लगने पर ऐसे पुरातत्वशास्त्री अपनी सरकारों के लिए जासूसी भी कर लेते थे। पुरास्थल या उससे प्राप्त चीजों के साथ जुड़ी स्थानीय भावनाओं से उन्हें अधिक लेना-देना नहीं था। 

बेशक आज जमाना बदला है। पुरातत्व अब सेंधमारों और कब्र-चोरों के हाथ से निकल कर विज्ञान का दर्जा प्राप्त कर चुका है। आजकल मनमाफिक ‘चीजों’ की तलाश के लिए नहीं बल्कि एक शोध-समस्या को सामने रखकर खुदाई अभियानों की योजना बनाई जाती है। मामूली लगने वाली चीज की भी उतनी ही अहमियत होती है जितनी किसी कलात्मक वस्तु या मूल्यवान धातु से बनी चीज की। स्तर-विन्यास का ध्यान दिया जाता है और प्राप्त चीजों का ‘3-डी’ लेखा-जोखा रखा जाता है। पुरातत्व अब पुरानी वस्तुओं के संग्रह का शग़ल न रहकर मानव इतिहास के विभिन्न चरणों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करने का माध्यम बन चुका है।

लेकिन डौंडिया खेड़ा के घटनाक्रम ने ये साबित कर दिया है कि न सिर्फ वहाँ जमा हुए अनपढ़ तमाशबीन बल्कि तमाम पढ़े-लिखे लोग भी पुरातत्व को ख़जाना खोजने की कयावद ही समझते हैं। समस्यापरक पुरातत्व इनके लिए कोई मानो है ही नहीं। आखिर कौन लोग है जिन्होंने पुरातत्व विभाग को एक बाबा के वचन की सत्यता को परखने के काम पर लगा दिया है? कहीं ये वही लोग तो नहीं जिन्होंने इस विभाग को “बताओ! मंदिर या मस्जिद?” के काम में जुटा दिया था। इस मामले में नेतानगरी और बाबानगरी के बीच का संबंध कुछ-कुछ खुलने लगा है। चरणदास महंत नाम के एक प्राणी की भूमिका काफ़ी संदिग्ध मानी जा रही है। कौन हैं ये चरणदास महंत ? 

वही जिन्होंने एक बार कहा था कि अगर सोनिया गाँधी मुझे छत्तीसगढ़ के प्रदेश काग्रेस कार्यालय में झाड़ू लगाने के लिए कहें तो वे ऐसा करेंगे। जी हाँ वही चरणदास महंत जो केंद्र में कृषि और खाद्य-प्रसंस्करण राज्यमंत्री हैं । इस इलाके में मंत्रीवर के 22 सितम्बर और फिर 7 अक्तूबर के दौरे से ये सारा खेल शुरु हुआ। इससे पहले शोभन सरकार के सपने के बारे में कोई भी नहीं जानता था। कानपुर के किसी पंडज्जी ने मंत्रीजी को बताया और मंत्रीजी ने फिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और जिओलॉजिकल सर्वे के लोगों को लपेटे में लिया और यहीं से शुरु हो गया एक नया कार्यक्रम – डौंडिया लाइव !