02 February 2014

पंचायत या जातिवादी न्यालय ?

न्याय सार्वभौमिक अवधारणा है। अतः संसार के प्रत्येक देश में इसके संबंध में बहुत विपुल कार्य किया गया। पश्चिम में अरस्तु-प्लेटो जैसे आदर्शवादियों से लेकर मैकियावेली जैसे कूटनीतिज्ञों व लॉक-हॉब्स जैसे सामाजिक समझौतावादियों से लेकर मार्क्स जैसे क्रांतिवादियों तक सभी ने न्याय को अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया। अपने देश में भी प्राचीनकाल लेकर अर्वाचीन समय तक बहुत से विद्वानों ने इस विषय पर गहनता से विचार किया। मनु, शुक्र व चाणक्य जैसे राजनीतिशास्त्रियों ने न्याय की प्रतिष्ठापना का दायित्व शासकों पर डाला है। उन्होंने न्याय को गतिशील व विकेंद्रित करने के लिए कई प्रकार की संस्थाए व संगठन बनाने का सुझाव दिया। साथ ही उन्हें प्रभावी अधिकार देने की वकालात भी की। 

ऐसी संस्थाओं को विकसित करने के लिए उन्होंने कुछ पद्धतियां भी बनाई। उन्हीं पद्धतियों के अन्तर्गत ग्रामीण स्तर पर लोक न्याय के विकेन्द्रित स्वरूप के लिए ग्राम पंचायतों का सृजन किया गया। तत्कालीन समय में इनका स्वरूप बडा ही मजेदार था। उस समय में इसके सम्बंध में एक कहावत प्रचलित हुई-‘‘ पंच परमेश्वर’’। विनोबा भावे ने लोकनीति संबंधी अपने साहित्य में इस कहावत का बहुधा प्रयोग किया है। कहावत बहुत ही छोटी है लेकिन यह अपने में बहुत ही गहरा भावार्थ समेटे हुए है। इसका पहला भाव तो यह है कि तत्कालीन भारत में समाज में परस्पर विश्वास की भावना ज्यादा थी। न्याय का इच्छुक व्यक्ति पंचों पर पूर्ण विश्वास रखता था। यानी पंच जो निर्णय देंगे वह बिल्कुल सही होगा। क्योंकि उनके द्वारा दिया गया निर्णय ईश्वर की वाणी माना जाता था। पंच परमेश्वर वाली न्याय प्रणाली की दूसरी विशेषता यह है कि समाज के कुछ वृद्धजन प्रबुद्धजन यदि कोई निर्णय ले लेते थे तो वह सभी के लिए ईश्वर की वाणी के समान माना जाता था। विचारणीय तथ्य यह है कि निर्णय लेने वाले वे वृद्ध अनुभवी होने के साथ ही आचरण में पवित्र होते थे। अतः उनके द्वारा दिया गया निर्णय कभी गलत नहीं होता था। समाज में पंचो व पंचायतों के प्रति बहुत ही सम्मान होता था।

न्याय की यह प्रकिया पहले सम्पूर्ण गांव के लिए एक ही होती थी, विनोबा जी ने इसका कारण यह बतलाया है कि उस समय जाति वर्ग श्रेणी आदि का चलन समाज में नही थे। मेरे विचार में शायद जाति वर्ग आदि तो अस्तित्व में होंगे लेकिन न्याय की व्यवस्था पूरे गांव के लिए एक ही रही होंगी। धीरे-धीरे देश की अर्थनीति व समाज व्यवस्था में बदलाव होने लगा, जातीय स्वाभिमान व रक्त शुद्धता की भावना जोर पकड़ने लगी। जाति के सदस्य अपनी जाति के लिए पृथक नियमों व रिवाजों की वकालात करने लगे। यह विचार ही भविष्य में जातीय पंचायतों की मजबूती व दृढिकरण का आधार बना। तत्कालीन समय इनके विकास के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। तब राजव्यवस्था का देश में प्रभाव अधिक था, बाहरी आक्रमणों से त्रस्त लोग अपने सांस्कृतिक अभिमान को बचाने की कोशिशों में लगे हुए थे। उनके सामने एक खतरा भयंकर रूप से विद्यमान था, ‘वर्ण संकरता उत्पन्न होने का‘ ऐसी परिस्थिति में खापों के द्वारा अपने स्वयं में कठोरता लाना लाजिमी था। उन्होनें इसका हल कुछ इस प्रकार निकाला कि खांप की निर्णयकारी संस्था पंचायत न केवल अपनी खांप की नीति निर्धारक बन गई बल्कि नियति निर्धारक भी बन गई। उन्हें जाति की सुरक्षा के लिए व्यवस्थाएं लागू करने का अधिकार अवष्य दिया गया लेकिन तब भी पद्धति वही थी ‘पंच बोले परमेष्वर‘। चाहे समाज से बहिष्कार का डर हो चाहे समाज के साथ चलने की सदस्यों की नीति, लेकिन व्यक्ति पंचायत के निर्णयों को शिरोधार्य करता अवष्य था। पचांयत के नियमों के संबंध में कुछ भी कहने की आवष्यकता नहीं, आज भी समाज के नियम इतने कठोर है तो तत्कालीन समय में इनकी कठोरता कितनी रही होंगी यह हम सभी जानते है।

जाति-पंचायतों के अस्तित्व को मिटाना आज लगभग असंभव है क्योंकि इनका आधार जाति है और जाति आज राजनीति का आधार बन चुकी है लेकिन इन पर नियंत्रण तो किया जा ही सकता है। सरकार यदि सभी खाप पंचायतो में समानता लाने का प्रयास करे तो ये नियंत्रित हो सकती है, अन्यथा इनका कहर दिन प्रतिदिन बढता ही जायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं। 

विचारणीय बिंदु यह है कि पंचायतों ने समय के साथ अपनी शक्ति में वृद्धि तो बड़े जोर-शोर से किया लेकिन जिस प्रकार की गतिशीलता की मांग समय के साथ उठी वह गतिशीलता ये अपने में स्थापित करने में उतने सफल नहीं हो सकी। अपने तंत्र में युगानूकूल परिवर्तन करने में ये पूर्णतया असमर्थ रहीं। तब वक्त दूसरा था, जब न तो किसी प्रकार के उन्नत साधन थे न ही न्याय की कोई समर्थ संस्थाएं। समाज के लिए खाप की पंचायते ही ‘माई-बाप‘ थी। मध्यकालीन समाज व्यवस्था के लिए खाप पंचायते बिल्कुल सही संस्था थी। काल के प्रवाह में उठा-पटक के कई दौर चले मुगलों का शासन समाप्त हुआ अंग्रेजों का काला शासन देश में जड़ें जमाने लगा। उन्होने अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए जातियों में एक अलग प्रकार की भावना को जागृत किया। उन्होने जातियों को ‘वाद‘ के दायरे में बिठाकर उनके व्यवहारों को अलगाव के अंधे भंवर में डालने का घिनौना प्रयास किया। प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग प्रकार के नियम-कायदों को स्थापित करके उनकी व्यवस्था में असामाजिकता का प्रवेश उन्होनें करवाया, उन्होने जाति-बिरादरी के प्रमुख लोगों को यह सोचने के लिए मजबूर किया कि किस प्रकार अपनी जाति की सदस्य संख्या को बढाया जाय? जाति आधारित जनगणना करवाने के पीछे अंग्रेजों का अहम उदेश्य यही था। आज जातियों में आपसी वैमनस्य की भावना इतनी बलवती हो रही है उसका अंकुरण करने में प्रमुख हाथ अंग्रेजों का ही है।

सन् 1947 को अपना देश आजाद हो गया। 15 अगस्त की पहली किरण के साथ ही देश में स्वराज का बिगुल बजा, दिल्ली में लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराया गया और शुरू हो गई लोकतंत्र को साकार करने की मुहिम, महात्मा गांधी के ग्राम आधारित स्वराज के स्वप्न को मूर्त रूप देने का जिम्मा सरकार ने अपने ऊपर लिया। तत्कालीन प्रधानमत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर कस्बे से देश में ग्राम स्वराज की आधारषिला रखते हुए पंचायतीराज की स्थापना की। प्राचीन व्यवस्था को सरकार द्वारा सर्वथा नवीन अर्थ प्रदान किया गया। नेहरू जी ने उसे गांधी जी का स्वप्न घोषित किया। पंचायतीराज को लोकतंत्र की प्राथमिक कडी के रूप में ‘प्रोड्यूज‘ किया गया तथा पंचायतों को बहुत से अधिकार भी दिये गये। लेकिन जातीय पंचायतो पर किसी भी प्रकार का प्रभावी नियंत्रण करने की कोशिश आज तक नहीं की गयी। महात्मा गांधी ने जिस प्रकार के जाति विहिन वर्गविहिन समाज (या यूं कहिए देश) का सपना देखा था उसको सरकार यदि वास्तव में पूर्ण करना चाहती तो सर्वप्रथम खाप पंचायतो पर प्रभावी अंकुश करने का कार्य करती, किंतु देश की राजनीति में जिस गति से मूल्यों की गिरावट आयी व राजनीति का रूप जातिवाद के भंवर में जितनी तीव्रता से फंसा उससे दोगुनी मात्रा में जाति पंचायतो की तानाशाही बढी। 

आज स्थिति इतनी खराब हो गयी है कि चुनाव में खड़े हुए किसी जाति विशेष के उम्मीदवार को उसकी जाति पंचायत स्वयं का प्रतिनिधि मानने लग जाती है और उसे विजयी बनाने के लिए जाति  के सदस्यों को उसके पक्ष में अनिवार्य रूप से मत देने का दबाव बनाने लग जाती है। यदि व्यक्ति ऐसा नहीं करता तो वहीं समाज से बहिष्कृत कर देने का डर, कुछ मामले ऐसे देखे गये है जिसमें विपरीत विचार रखने वाले जाति सदस्य चुनाव के दौरान बिल्कुल मौन रहे उनके सामने दो रास्ते थे। पार्टी के प्रति निष्ठा रखे। आखिर में उन्होनें दूसरा रास्ता ही अपनाया क्योंकि जाति से बहिष्कार एक नर्क माना जाता है। क्या यह लोकतंत्र की भावना के अनुकूल है? शायद नहीं! फिर प्रश्न उठता है कि इस प्रकार हम किस लोकतंत्र को मजबूत कर रहे है?

उपरोक्त उदाहरण एक तथ्य स्पष्ट करता है कि आज जिस रूप में जातीय पंचायते हमारे सामने है वह रूप किसी भी दृष्टि से लोकतंत्र के अनुकूल नहीं। लेकिन विडंबना यह है कि कोई भी राजनीतिक दल यहां तक कि सरकार भी इस समस्या के हल के लिए आगे आने को तैयार नहीं, सभी  इसे और अधिक बढाने का तरिका खोजने में ज्यादा व्यस्त दिखाई दे रहे है क्योंकि जातीयों का बढना उनकी जीत को पक्का करता है। इसका एक प्रमाण गत जनगणना में हम सभी ने देखा कि किस प्रकार केंद्र सरकार द्वारा जाति आधारित गणना करवाकर जातिगत अंतर्विरोध को गड़े मुर्दो की भांति उखाडने का प्रयास किया। जो काम कभी अंग्रेजों ने अपनी गंदी नीति के तहत किया था वह काम केंद्र सरकार द्वारा अपनी वोट बैंक की नीति के तहत किया गया। इसलिए हम कह सकते हैं कि जाति-पंचायतों के अस्तित्व को मिटाना आज लगभग असंभव है क्योंकि इनका आधार जाति है और जाति आज राजनीति का आधार बन चुकी है लेकिन इन पर नियंत्रण तो किया जा ही सकता है। सरकार यदि सभी खाप पंचायतो में समानता लाने का प्रयास करे तो ये नियंत्रित हो सकती है, अन्यथा इनका कहर दिन प्रतिदिन बढता ही जायेगा। इसमें कोई संदेह नहीं।

बीमा, जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और दुर्घटना !

हम सबको मालूम ही है कि देश में बीमा कंपनियाँ हैं, जो एक निश्चित प्रीमियम के भुगतान पर जीवन, स्वास्थ्य, शिक्षा और दुर्घटना बीमा करती हैं और इसमें से किसी तरह का संकट आने पे जोखिम का निवारण करती हैं। सरकार ने जितनी तत्परता बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश के लिए दिखाई उतनी तत्परता अगर उसने सरकारी कर ढांचे को अनिवार्य बीमा से जोड़के दिखाती तो ज्यादा अच्छा था। सरकार चाहे तो हमें हमारे ही पैसे से हमारा बीमा करा सकती है और हर नागरिक को उसके द्वारा दिये जानेवाले कर से ही अनिवार्य बीमा सुरक्षा दे सकती है।

हम सभी को मालूम है कि चाहे उत्पाद शुल्क हो, वैट हो या आय कर हो किसी न किसी रूप में सरकार को हम करों का भुगतान करते हैं, बदले में कभी हमने सोचा है कि जितना कर हम देते हैं, क्या सरकार उतना लौटा पाती है? मेरी तो राय है कि हमें हिसाब मांगनी चाहिए और हिसाब के साथ साथ कर को अनिवार्य बीमा के प्रीमियम से जोड़ देना चाहिए। कभी आपने सोचा है क्या कि एजुकेशन सेस के नाम पर सरकार आपसे बड़े अधिकार से पैसा तो ले लेती है लेकिन लेकिन क्या उसी अधिकार के साथ आप अपने बच्चे के किसी भी तरह के शिक्षा के अधिकार की बात कर सकते हैं? वो भी इस सरकारी तंत्र में?

इसकी एक योजना सरकार बना सकती है। आइये हम बात करते हैं कि सरकार अगर चाहे तो अनिवार्य कर बीमा को कैसे लागू कर सकती है। आप आयकर का उदाहरण लीजिये। आपका आयकर अगर 10,000 है तो सेस लेकर यह बनता है 10,300 रुपये। सरकार को इस 10,300 रुपये के इस प्रकार अनिवार्य बीमा के प्रीमियम के रूप मे वितरण करना चाहिए। 10,300 रुपये का 0.20% शिक्षा बीमा प्रीमियम राशि, 0.10% दुर्घटना बीमा प्रीमियम राशि, 0.40% स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि और 0.30% जीवन टर्म बीमा प्रीमियम राशि और कुल करों मे से इस प्रकार 1% राशि प्रीमियम के रूप मे जाएगी, चाहे तो सरकार 1% की जगह 2% से 3% तक का वितरण कर सकती है वर्तमान मे लिए जाने वाले उपकर का इसके लिए इस्तेमाल कर सकती है।

इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान करभार के साथ ही उसका बीमा हो जाएगा और किसी तरह का शिक्षा, स्वास्थ्य, दुर्घटना या मृत्यु होने पर देश को कर के रूप मे दिये गए लगान के बदले सम्मान की बीमा राशि प्राप्त होगी बगैर किसी अहसान के मुआवजे के रूप मे। नागरिकों द्वारा दिये गए कर के अनुपात और राशि के हिसाब से बीमा कंपनियाँ बीमा सुरक्षा प्रदान करेंगी। इसके लिए सरकार को विभिन्न बीमा कंपनियों से साझेदारी करनी पड़ेंगी और साथ ही साथ सरकार विदेशी बीमा कंपनियों को इस योजना मे भाग लेना अनिवार्य कर सकती है।

ये तो रही आयकर की बात जहां कर देने वाले व्यक्ति की पहचान होती है जिसके द्वारा सरकार चिन्हित व्यक्ति का और उसके परिवार को बीमा सुरक्षा दे सकती है। लेकिन अप्रत्यक्ष कर के रूप मे सरकार एक बड़ा हिस्सा पाती है जो अमूमन आयकर की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा होता है। ऐसे कर के साथ सरकार चाहे तो अनिवार्य समूह बीमा का प्रयोग कर सकती है। उदाहरण के तौर पे अनुमानतः अप्रत्यक्ष कर के रूप मे सरकार 8 लाख करोड़ की वसूली करती है, वो भी सेस के साथ। और अगर सरकार इसे समूह बीमा योजना के साथ जोड़ दे, तथा बीमा कंपनियों के साथ मिल के पंचायत स्तर के ढांचे के सहयोग के साथ हर उस व्यक्ति को सामाजिक समूह सुरक्षा बीमा देवे तो सामाजिक बीमा के रूप मे एक क्रांति आ जाएगी और सरकार पे अतिरिक्त भार भी नहीं आएगा।

8 लाख करोड़ के हिसाब से प्रति हिंदुस्तानी 6666 अप्रत्यक्ष कर दे रहा है और अगर एक पंचायत यूनिट मे औसतन 5000 लोग रहते हैं तो उस पंचायत से सरकार को सालाना 3.33 करोड़ का कर प्राप्त हो रहा है और सरकार चाहे तो उस पंचायत कर की राशि अनिवार्य समूह बीमा प्रीमियम मे इस प्रकार बाँट सकती है। 3.33 करोड़ रुपये का 0.33% समूह स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम राशि, 0.33% समूह दुर्घटना बीमा प्रीमियम राशि, 0.34% समूह जीवन टर्म बीमा प्रीमियम राशि और कुल करों मे से इस प्रकार 1% राशि प्रीमियम के रूप मे जाएगी, चाहे तो सरकार 1% की जगह 2% से 3 % तक का वितरण कर सकती है वर्तमान मे लिए जाने वाले उपकर का इसके लिए इस्तेमाल कर सकती है।

सरकार उपरोक्त प्रकार से अनिवार्य कर बीमा के मार्फत बीमा सुरक्षा प्रदान कर सकती है जो सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र मे पूरे विश्व मे एक उदाहरण होगा  और बिना किसी अतिरिक्त करभार के नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, दुर्घटना, जीवन एवं समूह बीमा का लाभ दे सकती है। वर्तमान बीमा कंपनियों के साथ साथ नयी आने वाली देसी और विदेशी बीमा कंपनियों की अनिवार्य सहभागिता की नियम भी सरकार लगा सकती है। और साथ ही साथ करों के भुगतान के प्रति नागरिकों मे प्रोत्साहन बढ़ेगा।

यौन शोषण का अड्डा बना वेटिकन !

जिनेवा स्थित एक संयुक्त राष्ट्र पैनल ने रोमन कैथोलिक पादरियों द्वारा हजारों बच्चों के यौन शोषण पर वेटिकन अधिकारियों की एक रिपोर्ट पर सुनवाई शुरु कर दी है। इसके पहले वेटिकन इस तरह की कोई जानकारी संयुक्त राष्ट्र के साथ साझा करने से इनकार करता रहा है। वेटिकन का शुरु से ही यह मत रहा है कि इन मामलों की जिम्मेदारी उन देशों की न्यायपालिकाओं की है जहां यह यौन शोषण हुए है। पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों में सही प्रतिक्रिया नहीं देने के लिए वेटिकन की आलोचना की गई।

संयुक्त राष्ट्र में सुनवाई को लेकर पीड़ितों को उम्मीद है कि इस सुनवाई से चर्च की ‘‘गोपनीयता’’ की नीति का अंत होगा। पोप फ्रांसिस ने अपना पद सभालने के बाद कहा था कि यौन शोषण के मामलों को निपटाना चर्च की विश्रसनीयता बनाए रखने के लिए जरुरी है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक दी होल सी, वेटिकन सिटी के सदस्यों को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की समिति के समक्ष इस मामले पर सफाई देनी होगी। वेटिकन की विधाई संस्था दी होली सी ने ‘संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते’ पर दस्तखत किए है जिसके तहत वो बच्चों को संरक्षण और सही देखभाल के लिए कानूनी रुप में बाध्य है।

ऐसा पहली बार होगा जब संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समिति (यूएनसीआरसी) विस्तृत सवाल-जवाब करेगी और होल सी सार्वजनिक मंच पर अपना बचाव करेगा। वेटिकन पर आरोप है कि उसने पीड़ितों के बजाय बच्चों का शोषण करने वाले पादरियों का बचाव किया जिसकी वजह से हजारों बच्चों को यौन शोषण का शिकार होना पड़ा। पिछले साल जुलाई में संयुक्त राष्ट्र समिति ने वेटिकन से अनुरोध किया था कि वो साल 1995 के बाद से सामने आए यौन शोषण के सभी मामलों की विस्तृत जानकारी दे। दी होली सी से यह भी पूछा जा सकता है कि क्या अपराधों के दोषी पादरी, नन और साधुओं को दोषी पाए जाने के बाद भी बच्चों के संपर्क में रहने दिया गया, ऐसे लोगों के खिलाफ क्या कानूनी कार्रवाई की गई और क्या शिकायत करने वालों की आवाज दबाई गई?

पोप बेनेडिक्ट सौहलवें ने जब 19 अप्रैल 2005 को कैथोलिक चर्च की कमान संभाली थी तो उस समय कैथोलिक ईसाइयों को उनसे काफी उम्मीदें थी कि वह चर्च के कायदे-कानूनों में बदलाव लाएगें, सबसे विवादास्पपद मामला पादरियों द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़ा था जिसे लेकर मुकदमें तक हुए और कई देशों में पीड़ितों को चर्च द्वारा भारी मुआवजा भी देना पड़ा। सबसे दुखद यह कि पोप के आलोचकों ने उन पर ऐसे मामलों की लीपापोती करने में सहभागी होने के आरोप भी लगाए। दरअसल वेटिकन हजारों सालों से पूरे संसार पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। पोप जॉन पॉल द्वितीय ने साल 1999 के अपने भारत दौरे के दौरान इस तरह का साफ ऐलान ही कर दिया था।

पोप जॉन पॉल द्वितीय ने कहा था कि किस तरह ईसा की पहली सहस्राब्दी में यूरोपीय महाद्वीप को कैथोलिक चर्च ने पाया और दूसरी सहस्राब्दी आते आते उत्तर और दक्षिणी महाद्वीपों व अफ्रीका पर चर्च का वर्चस्व स्थापित हो गया और अब तीसरी सहस्राब्दी एशिया महाद्वीप की है। वेटिकन दावा कर रहा है कि चर्च की शरण में आने पर ही मानव जाति को अपने पापों से मुक्ति तथा स्वर्ग का साम्राज्य मिल सकता है। पूरे संसार को चर्च की शरण में लाने की योजना में लगे हुए चर्च के पास अपने अनुयायियों की पुकार को सुनने का समय ही नहीं है।

डेड हजार साल पहले कैथोलिक चर्च की शरण में आए अमेरिका और यूरोप के धर्मांतरित कैथलिकों के वंशज विगत कई दशकों से पोप के पास दुहोई दे रहे थे कि उन्हें चर्च के शोषण से बचाओं। वो चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे कि तुम्हारा पूरा सिस्टम ऊपर से नीचे तक पाप में डूबा हुआ है, परन्मु वेटिकन सुनने को ही तैयार नही था। ईसाई धर्म में अनेक चर्च एवं डिनोमिनेशन है पर इन सबमें रोमन कैथोलिक चर्च संख्या, बल और प्रभाव में सबसे अग्रणी भी है और सबसे ज्यादा पापाचार में लिप्त भी। इस चर्च के भीतर यह पापाचार कब से फैला हुआ है कहना कठिन है। भारत समेत अधिक्तर देशों में सधारण विश्वासियों के साथ साथ चर्च की नने (धर्म-बहने) भी यौन शोषण का शिकार रही है। हालही में इटली की एक नन ने एक बच्चे को जन्म दिया है और उसका नाम पोप फ्रंासिस के नाम पर रखा है। चर्च का दावा है कि नन को मालूम ही नही था कि वह गर्भवती है। लेकिन पाप का घड़ा तो भरता ही है और भर कर फूटता भी है।

अमेरिका और यूरोप में पचास साल पहले ही चर्च के प्रति विद्रोह के स्वर उठने लगे थे। साल 1963 में अमरीका के न्यू मैक्सिको स्थित ‘सर्वेन्ट्स आफ दि होली पोर्सलीट’ के प्रमुख ने पोप जॉन पाल छठ्म से मुलाकात करके चर्च के अंदर फैले अनाचार को खत्म करने की मांग की थी। वेटिकन ने फादर फिट्ज गेराल्ड की शिकायत को चर्च के हित की दुहाई देते हुए खारिज कर दिया। तब से अब तक वेटिकन में चार नये चेहरे आ चुके हैं-पोप जॉन पाल छट्म, पोप जॉन पाल द्वितीय, पोप बेनेडिक्ट सोहलवें और अब पोप फ्रांसिस। पिछले पचास सालो में न जाने कितनी शिकायते वेटिकन के पास पंहुची और प्रत्येक परमपिता पोप इस पर चुप्पी साधे बैठा रहा।

वेटिकन की चुप्पी को देखते हुए अमेरिका और यूरोप के विश्वासियों ने इसके विरुद्ध अनेक मंच गठित किए और उनकी सार्वजनिक अपील पर हजारों भुक्तभोगी, जो कल तक चुप थे, खुलकर सामने आ गए। नीदरलैंड में ‘हेल्प एण्ड लॉ लाइन’ और अमेरिका में ‘सर्वाइवर्स नेटवर्क फार एब्यूज्ड बाई चर्च’ के कारण पीड़ितों में साहस आया और जो पहले अपने को अकेला समझ कर या दूसरे दबावों के कारण चुप थे खुल कर सामने आने लगे है।

सोचने वाली बात यह है कि पापाचार को रोकने से अधिक महत्वपूर्ण वेटिकन का हित क्या हो सकता है? चर्च मत के अनुसार मनुष्य जन्म से ही पापी है और इस पाप कर्म से बाहर निकलने पर ही उसका उद्वार संभव है। ऐसे में चर्च को ऐसे पापाचारी पादरियों से मुक्त करना उसकी पहली चिन्ता होनी चाहिए। लेकिन वर्तमान समय में चर्च का लक्ष्य कुछ और ही है। वेटिकन ने एक बड़ा ही असान रास्ता पकड़ लिया है कि जिस पादरी के विरुद्व शिकायत मिले, उसका तुंरत तबादला कर दो या फिर उसका दायित्व बदल दो। तांकि चर्च के काम में कोई रुकावट न आए।

यूरोप और अमेरिका के कैथोलिक विश्वासियों के दिलो में सैकड़ों सालों से समाया वेटिकन का गौरव मंद होने लगा है। यूरोप और अमेरिका के विश्वासियों के बीच अपनी मंद पड़ती छवि को लेकर चिंतित चर्च ने नए क्षेत्रों में अपने पांव फैलाने शुरु कर दिए है। इस कार्य के लिए वह राज्यशक्ति का भी उपयोग कर रहा है। भारत में तेज रफतार से नए चर्च और नए डायसिस बनाए जा रहे है। यह काम कितनी तेजी से हो रहा है इसे केवल इस बात से ही समझा जा सकता है कि भारत में कार्यरत वेटिकन के राजदूत द्वारा तीन सालों के अंदर ही 25 बिशप बनाए गए है। हालाकि भारत के धर्मांतरित ईसाइयों की समस्याओं पर वेटिकन अपने कान बंद किए हुए है।

2005 से पहले छपा करंसी नोट वैध मुद्रा बना रहेगा !

भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में जारी अपने दिशा-निर्देश में 2005 से पहले जारी करंसी नोटों को चलन से बाहर करने की बात कही है। दिशा-निर्देश के मुताबिक 31 मार्च 2014 तक 2005 से पहले छपे करंसी नोटों का सर्कुलेशन बंद कर दिया जायेगा, लेकिन उक्त करंसी नोटों को बदलने की प्रक्रिया जारी रहेगी। साथ ही, उसकी वैधता अगले दिशा-निर्देश के जारी होने तक बनी रहेगी। हाँ, इस तरह के करंसी नोटों को बदलने के लिये लोगों को 1 अप्रैल 2014 से बैंक की शरण में जाना होगा। इस संदर्भ में रिजर्व बैंक ने यह भी साफ किया है कि 31 मार्च 2014 के बाद भी 2005 से पहले छपा करंसी नोट वैध मुद्रा बना रहेगा। 

इसके आलोक में बैंकों को हिदायत दी गई है कि वे ग्राहकों एवं गैर ग्राहकों से 2005 से पहले जारी करंसी नोटों को बदलने का काम करेंगे, लेकिन 1 जुलाई 2014 के बाद से 500 रूपये और 1000 रूपये के 10 से अधिक नोट बदलने के लिए गैर ग्राहकों को करंसी नोट बदलने वाली शाखा में पहचान प्रमाणपत्र और आवास प्रमाणपत्र जमा करना होगा। 2005 से पहले जारी की गई मुद्रा, वैसे करंसी नोटों को माना गया है, जिसके पिछले भाग में छपाई का साल अंकित नहीं है। लिहाजा कौन सा करंसी नोट सर्कुलेशन से बाहर किया जायेगा, इसकी पहचान करना बहुत-ही सरल है।

पिछले अनुभव के आधार पर इस बार रिजर्व बैंक ने आम जनता से नहीं डरने की अपील की है। रिज़र्व बैंक के द्वारा जारी दिशा-निर्देश में कहा गया है कि लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। लोग सहजता एवं बिना डर-भय के इस बदलाव की प्रक्रिया को सफल बनाने में सरकार की मदद करें। जाहिर है सरकार को भय है कि रिजर्व बैंक के इस कदम से जनता के बीच भय एवं आतंक का माहौल कायम हो सकता है, जिससे देश में अराजकता फैलने की संभावना है।

यहाँ बताना समीचीन होगा कि रिजर्व बैंक पहली बार इसतरह का कदम नहीं उठाने जा रहा है। इसके पहले 1978 में जनता पार्टी की सरकार के समय 1000, 5000 और 10000 रूपये के करंसी नोटों को रिजर्व बैंक ने चलन से से बाहर किया था। उल्लेखनीय है कि 1949 में 5000 और 10000 रूपये के करंसी नोट जारी किये गये थे। उस कालखंड में देश में कालेधन की व्यापकता में जबर्दस्त इजाफा हुआ था। अस्तु यह कदम विशेष तौर पर कालाधन पर नियंत्रण कायम करने के लिए उठाया गया था। बता दें कि रिज़र्व बैंक के निर्णय को अमलीजामा पहनाने के क्रम में तब बैंकों में करंसी नोट वापस करने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। लोगों के बीच डर, आशंका और अफवाह का बाजार गर्म था।     

बीते सालों देश में नकली करेंसी नोटों के चलन में गुणात्मक वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार की वजह से भी कालेधन में अकूत बढ़ोतरी हुई है। इस आलोक में कहा जा सकता है कि सरकार अपने प्रस्तावित कदम की मदद से नकली करेंसी नोटों और कालेधन पर अंकुश लगाना चाहती है। एक अनुमान के अनुसार 2011-12 के दौरान देश में 69.38 करोड़ रूपये के जाली करेंसी नोट चलन में थे। जानकारों की मानें तो 27 अरब के जाली करेंसी नोट 100 और 500 रूपये के हैं। यह महज एक अनुमान है, जो हकीकत से बहुत ही कम है। वास्तविकता में यह आंकड़ा बहुत ही डरावना है। इसलिए इसकी कोई परिकल्पना भी नहीं करना चाहता है। नकली करेंसी नोटों की पहचान जरूर थोड़ी मुश्किल है, लेकिन इस दिशा में उम्मीद की किरण यह है कि 2005 के बाद प्रकाशित करेंसी नोटों में सुरक्षा के कई नये मानकों, मसलन, मशीन से पढे जा सकने वाले सिक्योरिटी थ्रेड, इलेक्ट्रोटाइप वाटर मार्क, प्रकाशन का वर्ष आदि को जोड़ा गया है, जिसकी पहचान से नकली करेंसी नोटों को चलन से बाहर किया जा सकता है।  

अपने ताजा फैसले के माध्यम से इस बार भी रिजर्व बैंक कालेधन पर नियंत्रण करना चाहता है। इस क्रम में 1978 की तरह 2005 के पहले के करेंसी नोट को बदलने के क्रम में अफरातफरी की स्थिति बनने से इंकार नहीं किया जा सकता है। उम्मीद है कि कालांतर में बड़ी संख्या में बड़े करेंसी नोटों के रूप में नकदी का खुलासा होगा। सीएमएस के रिपोर्ट के अनुसार 2009 के लोकसभा चुनाव में तकरीबन 10000 करोड़ रूपये खर्च किये गये थे, जिसमें से 2500 करोड़ रूपये की राशि कालाधन थी।  

भारत की 70 प्रतिशत आबादी अभी भी गावों में रहती है। इस आबादी में निरक्षर लोगों की संख्या ज्यादा है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। मौजूदा समय में बैंकिंग सुविधाओं से एक बड़ी आबादी महरूम है। लिहाजा 2005 से पहले प्रकाशित करेंसी नोटों को चलन से बाहर करने से ग्रामीणों की एक बड़ी आबादी भी प्रभावित होगी। यह कल्पना करना सरासर गलत होगा कि इस वर्ग के पास 2005 के पहले के करेंसी नोट नहीं होंगे। इसलिए ग्रामीणों को इस दिशा में जागरूक करने की जरूरत होगी, जो आसान कार्य नहीं है। भले ही देश में आज भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। फिर भी ईमानदार लोगों की इस देश में कमी नहीं है। सच कहा जाये तो ईमानदार लोगों की वजह से ही यह देश चल रहा है।

जाहिर है ईमानदार लोगों के पास भी 2005 से पहले के प्रकाशित करेंसी नोट होंगे और अनजाने में या जानकारी के अभाव में उनके पास रखे करेंसी नोट भी बेकार हो सकते हैं, जिनकी भरपाई करना उनके लिए आसान नहीं होगा। जहाँ तक नकली करेंसी नोटों के देश में चलन की बात है तो उसका एक अहम हिस्सा पड़ोसी देशों से आता है, जिसके देश में आने की प्रक्रिया एक लंबे अरसे से चल रही है। बावजूद इसके सरकार इसपर काबू पाने में नाकाम रही है। इस बाबत दूसरा पहलू यह है कि 2005 के बाद के करेंसी नोट भी बड़ी संख्या में नकली हैं, लेकिन उसपर अंकुश लगाने के संबंध में सरकार  चुप्पी साधे हुए हैं। लिहाजा 2005 के पहले के करेंसी नोट और उसके बाद के करेंसी नोट के बीच सीमारेखा खींचना औचित्य से परे है। सच कहा जाये तो नकली करेंसी नोटों से निजात पाने के लिए सरकार को अपने खुफिया तंत्र को मजबूत बनाना होगा। रिजर्व बैंक के प्रस्तावित उपाय से देश में अफरातफरी का माहौल उत्पन्न हो सकता है। पूर्व में भी रिजर्व बैंक ने इस तरह का निर्णय लिया था, जिसका परिणाम संतोषजनक नहीं रहा है। तब गेहूं के साथ घुन पिसाने वाली कहावत ग्रामीण इलाकों में खूब चरितार्थ हुई थी। उनके साथ अन्य दूसरे लोग भी अपनी नकदी को बदलने में असफल रहे थे।

2005 के पहले जारी करेंसी नोटों को सर्कुलेशन से वापस लेने वाले रिजर्व बैंक के इस निर्णय को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसे त्रुटिहीन भी नहीं कहा जा सकता। भारत एक विविधतापूर्ण देश है। इस देश के मंदिरों में अरबों-खरबों की नकदी दान में दी जाती है। भारतीय समाज का तानाबाना इसतरह का है कि लोग अभी भी बैंक की जगह घर में नकदी रखने में विश्वास करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की एक बड़ी आबादी आज भी बैंक सुविधा से महरूम है। इस संबंध में ग्रामीण क्षेत्रों की हालत बहुत ही दयनीय है। भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है तथा वे बैंक के महत्व से अंजान हैं।

देश में नकली करंसी नोट का चलन और कालाधान जरूर एक गंभीर मुद्दा है, लेकिन इसपर लगाम लगाने के लिए रिजर्व बैंक के द्वारा करंसी नोट को चलन से बाहर करना तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। इसके लिये प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाने की जरूरत है। सीमारेखा पर चौकसी बढ़ाने, पुलिस को चुस्त-दुरुस्त करने, खुफिया तंत्र को चौकस व काबिल बनाने आदि की कवायद से स्थिति में सुधार आ सकता है.

बलात्कारी अमेरिका की जय हो !

अमेरिका की केंद्रीय कैबिनेट की बैठक से पहले व्हाइट हाउस ने एक रिपोर्ट जारी की है, इसके अनुसार करीब 2 करोड़ 20 लाख अमेरिकी महिलाओं और 16 लाख पुरुषों को अपनी जिंदगी में बलात्कार का शिकार होना पड़ा है। इनमें आधी से अधिक अमेरिकी महिलाएं 18 साल की उम्र से पहले ही रेप की शिकार हो चुकी होती हैं। रिपोर्ट का सबसे भयानक पहलू यह है हर 5 में से एक छात्रा यौन शोषण का शिकार होती है जबकि हर 8 यौन अपराधों में से एक मामला ही दर्ज हो पाता है।

रिपोर्ट बताता है कि 33.5 फीसदी बहुनस्लीय महिलाओं से बलात्कार किया गया जबकि अमेरिकी-भारतीय मूल और अलास्का नेटिव 27 फीसदी महिलाओं को हवस का शिकार बनाया गया। इसके अतिरिक्त 15 फीसदी हिस्पैनिक, 22 फीसदी अश्वेत और 19 फीसदी श्वेत औरतें इस प्रकार के यौन हमलों की शिकार हुईं।

एक अन्य अध्ययन रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि कॉलेज के 7 फीसदी पुरुषों ने रेप की कोशिश करने को स्वीकार किया और उनमें से 63 फीसदी ने माना कि उन्होंने औसतन 6 बार ऐसा करने की पुरजोर कोशिश की। यह विश्व में सबसे विकसित होने का असली चेहरा है? मानवाधिकारों के स्वयंभू वैश्विक दरोगा ने अपनी महिलाओं को कैसा मानवाधिकार दिया है? 2010 के दशक में सुरक्षा परिषद को ताक पर रखकर अफगानिस्तान और इराक को तहस-नहस कर दिया।

2010 के दशक में एक और काम अमेरिकी एनएसए ने किया है, जिसका पूरा नाम नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी है। इस एजेंसी ने अपने खुफिया निगरानी कार्यक्रम 'प्रिज्म' को क्रियान्वित करते हुए विश्व के 35 प्रमुख देशों के शासकों की जासूसी सफलतापूर्वक की है। लोकतंत्र के स्वयंभू दरोगा ने यह काम किस आधार पर किया है, बताने के लिए अमेरिका को कोई ठोस शब्द नहीं मिल रहा है। एडवर्ड स्नोडेन ने मार्च 2013 में चौंकाने के साथ-साथ चिंतित करने वाले तथ्य भी बताए। स्नोडेन ने बताया कि एनएसए ने अमेरिका में जिन 38 दूतावासों की जासूसी की है उनमें भारतीय दूतावास भी शामिल है। एनएसए ने भारतीयों की 6.3 अरब गोपनीय जानकारियां प्राप्त की हैं।

विश्व की अकेली, अजेय महाशक्ति अमेरिका, अपने नागरिकों को आत्महत्या करने से नहीं रोक पा रही है। किस काम की है ये महाताकत? 2005 के बाद से अमेरिका में आत्महत्या करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। केवल 2010 में 38,364 अमेरिकियों ने खुदकुशी की। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्था के अनुसार आत्महत्या करने वाले 90 फीसदी लोग मानसिक बीमारी से पीड़ित थे। पूरे अमेरिका में 24 घंटे चलने वाले राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम लाइफ लाइन नेटवर्क के 161 काल सेंटर बनाए गए हैं। इन लाइफ लाइनों में हर साल 15 प्रतिशत काल बढ़ रहे हैं। 2010 के दशक में 35-64 आयु के लोगों में आत्महत्या करने की दर 28.4 प्रतिशत बढ़ गई है।

‘अमेरिकी समाज, बंदूक संस्कृति से संस्कारित समाज है।’ परिवार संस्था को मिटाकर अमेरिका ने व्यक्ति संस्था वाला समाज बनाया है, जहां हर एक व्यक्ति अकेला है, कोई किसी का परिवारीजन नहीं है। अमेरिकी किसी पर भी विश्वास नहीं करते, चाहे वह दोस्त हो या दुश्मन, ऐसा क्यों? क्योंकि उसके समाज में कोई किसी पर विश्वास नहीं करता। अमेरिका को देखकर लगता है कि अति विकास से उत्पन्न समृद्धि में, व्यक्ति अपने आप को अकेला और असुरक्षित महसूस करता है। इसी कारण हर अमेरिकी अपने आप को इतना असुरक्षित महसूस करता है कि वह सबसे पहले अपने बैग में बंदूक रखता है। अमेरिका की जनसंख्या महज 30 करोड़ है, जबकि 31 करोड़ लोगों के पास बंदूकों के लाइसेंस हैं। इसका कारण यह है कि 18 वर्ष के हर अमेरिकी को दो संवैधानिक अधिकार मिलते हैं, एक वोट डालने का और दूसरा राइफल-शाटगन खरीदने का। जेल में बंद या पैरोल पर रिहा लोगों को वोट डालने का अधिकार नहीं होता है। पति से मामूली झगड़ा होने पर भी पत्नियां अपने पास बंदूक रखकर सोती हैं। भारत के एकल परिवारों का भविष्य भी यही हो सकता है।

भारतीय मूल की नीना दावूलुरी ने जब 50 से अधिक प्रतिद्वंद्वियों को हराकर ‘मिस अमेरिका’ का खिताब जीता, तो अमेरिकियों ने सोशल मीडिया पर जमकर नस्लीय टिप्पणियां कीं। अमेरिकियों ने ‘क्या हम 9/11 भूल गए हैं’, ‘मिस टेररिस्ट’, ‘मिस अल कायदा’, ‘अरब ने जीता मिस अमेरिका का ताज’ सहित नीना को काले रंग का तक कहा। जबकि अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियन थे। जिनका शताब्दियों पहले नरसंहार कर दिया गया था, बचे लोगों का जबर्दस्ती यूरोपीयकरण कर दिया गया था। शेष रेड इंडियन आज अमेरिका में आदिवासी हैं। नीना जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं, जैसे राहुल गांधी भारतीय नागरिक। क्योंकि नीना का जन्म अप्रैल 1989 को न्यू यॉर्क में हुआ था। डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ नेता ने भारतीय मूल के निक्की हैली के गवर्नर बनने पर भी नस्ली टिप्पणी की थी।

दुनिया के हर देश के लोगों ने मिलकर आज के अमेरिका को बनाया है। जैसे राष्ट्रपति बराक ओबामा और डांसर माइकल जैक्शन अफ्रीकी मूल के हैं। जॉर्ज बुश ब्रिटानी मूल के हैं। यह वह अमेरिकी समाज है, जो अपने आप को नस्लवाद से मुक्त, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति, विविधता, मानवाधिकार आदि का संरक्षक, होने का विश्व में ढ़िढ़ोंरा पिटता रहता है। वैश्वीकरण एक अमेरिकी अवधारणा है जो कहती है कि तकनीक और पूंजी में इतनी ताकत होती है कि वो देश, धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र आदि के भेद को मिटा देता है। लेकिन पूरे विश्व को पूंजी और तकनीक से ‘ग्लोबल विलेज’ बनाने वाले अमेरिकी समाज का, खुदा का असली चेहरा नस्लवादी है। 

अमेरिका ने सबसे पहले हिरोशिमा एवं नागासाकी पर अणु-बम बरसाये, फिर वियतनाम में मुंह की खायी। धन के बल पर अपने दुश्मन नम्बर एक रहे सोवियत संघ को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंकने के लिए जिस तालिबान नामक दैत्य-संघ को खड़ा किया, उसी ने अमेरिका के गुरूर ‘वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर’ को जमींदोज किया। परमाणु बम बनाने के झूठे आरोप में इराक पर हमला करके उसे तहस-नहस किया। सोवियत संघ के विघटन से शीत युद्ध का खात्मा होने पर भी अमेरिका चैन से नहीं बैठा। एकध्रुवीय विश्व के अजेय, एकलौते थानेदार एवं भाई बनने के चक्कर में अमेरिका ने अपना रक्षा व्यय कुल बजट का 36 प्रतिशत तक पहुंचा दिया, जो 698 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। अमेरिका ने वर्ष 2001 के बाद से अपने रक्षा व्यय में 81 फीसदी की वृद्धि की है। यह जानकर किसी को भी ताज्जुब हो सकता है कि अमेरिकी सैन्य खर्च, वैश्विक सैन्य व्यय का लगभग 43 फीसदी है। आश्चर्यजनक है कि अमेरिका पूरे विश्व में 800 सैन्य बेस चला रहा है। भारत से नजदीकी सैन्य बेस अरब सागर के डियागोगॉर्सिया नामक द्वीप पर है।

जून 1996 में अमरीकी विद्वान नोआन चोम्स्की ने सही कहा था कि, “यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा है। विशेषकर इंग्लैंड और अमरीका तो पिछले 500 बरसों से पूरी तरह से हिंसक स्वभाव के रहे हैं। वे दूसरों का अस्तित्व या आगे बढ़ना सह नहीं पाते। सबको अपने अधीन ही रखना चाहते हैं।” मानवाधिकारों के वैश्विक दरोगा अंकल सैम ने जूलियन असांजे और एडवर्ड स्नोडेन से कौन सा मानवाधिकार सम्मत व्यवहार किया। जूलियन असांजे को अमेरिका ने हरसंभव तरीके से परेशान किया। स्नोडेन के प्रत्यर्पण के लिए अमेरिका ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।

एनएसए, सीआईए को पीछे छोड़ते हुए आज के युग की प्रमुख अमेरिकी खुफिया एजेंसी बन गई है। इसका प्रमाण यह है कि एनएसए के कर्मचारी सीआईए से लगभग दूगने 40 हजार हैं। एनएसए को 2013 में 10.8 अरब डॉलर का बजट मिला जबकि सीआईए को लगभग ढाई गुना कम केवल 4.2 अरब डॉलर का बजट मिला। इस कुख्यात एजेंसी ने 'प्रिज्म' नामक गोपनीय अभियान चलाकर जर्मन चांसलर अंगेला मर्केल की फोन कॉल्स को 2002 से 'सुना', जबकि जर्मनी अमेरिका का खास दोस्त है। हद तो यह है कि अमेरिका ने नॉटो के सदस्य देशों जर्मनी, फ्रांस और स्पेन तक के राष्ट्राध्यक्षों की भी जासूसी की है।

95 वर्षों के बाद 2011 में शीर्ष वैश्विक क्रेडिट रेटिंग संस्था ‘स्टैंडर्ड एण्ड पुअर’ (एस एण्ड पी) ने अमेरिका की क्रेडिट (साख) रेटिंग ‘एएए’ से घटाकर ‘एए प्लस’ करके अमेरिकी गुरूर को तोड़ दिया। अमेरिका अपना 40 फीसद खर्च कर्ज से चलाता है और 1962 से अब तक कर्ज की सीमा 75 बार बढ़ाई जा चुकी है। अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसका डॉलर है, जो विश्व अर्थव्यवस्था में सोने से भी विश्वसनीय माना जाता रहा है। ‘ट्रिपल ए’ रेटिंग से अमेरिका को सबसे सस्ता कर्ज मिल जाता था, इसी कारण अमेरिका ने इतना अधिक कर्ज ले लिया कि केवल चीन का कर्ज लौटाने से उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लग सकता है।

स्थिति यह हो गयी है कि 99 फीसदी साक्षरता जिसमें अधिकतर व्यावसायिक रूप से कुशल हैं, के बावजूद बेरोजगारी की दर अमेरिका में भारत से ज्यादा 11 प्रतिशत हो गयी है। टाइम पत्रिका के अनुसार यदि केवल चीन अमेरिका से कर्ज वापस ले तो इससे उसकी अर्थव्यवस्था में प्रलय की स्थिति निर्मित हो सकती है। अब विश्व अर्थव्यवस्था को डॉलर की स्थानापन्न मुद्रा की खोज तेजी से करनी होगी। यह अमेरिकी वर्चस्व के एक छत्र राज के अवसान का आरंभ हो सकता है। क्योंकि अमेरिका विश्व का सबसे अधिक ऋणी देश बन गया है। उस पर 16 ट्रिलियन डालर का कर्ज है और चीन के बाद जापान, अमेरिका को ऋण देने वाला विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है।

अमेरिकी सर्वर चलाने वाली कंपनियां, फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विलांस एक्ट (फीसा) जैसे अमेरिकी कानूनों के तहत अपने सर्वरों पर रखा डेटा एनएसए को देने के लिए बाध्य हैं। वैश्विक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, याहू, यू-ट्यूब, स्काइप और ऐपल जैसी कंपनियां अपने डेटा, फीसा कानून के कारण अमेरिकी सरकार को देने के लिए बाध्य हैं। अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी (एनएसए) का मुख्य काम इंटरनेट और मोबाइल फोन पर कड़ी निगरानी रखना है। निगरानी की रिपोर्ट व्हाइट हाउस, अमेरिकी खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को देनी होती है। भारत में एक भी ऐसी भारतीय कंपनी नहीं है, जो फेसबुक, गूगल और याहू का मुकाबला कर सके। चीन के प्रखर राष्ट्रवाद ने क्यूक्यू, अलीबाबा, बाइदू, रेनरेन, जैसी विशालकाय स्वदेशी इंटरनेट कंपनियों का गौरवशाली विकास किया है। जबकि भारत में कथित धर्मनिरपेक्षता से उत्पन्न चरित्रनिरपेक्षता ने एक ऐसा भीमकाय दानव पैदा किया है, जिसने भारत के राष्ट्रवाद को उभरने से पहले ही निगल लिया।

सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक महाशक्ति होने के बाद भी अमेरिका हर समय दूसरे देशों को कमजोर करने में लगा रहता है। वह अपने खास दोस्तों और दुश्मनों; दोनों पर जरा भी भरोसा नहीं करता है, इसलिए दोनों की जासूसी करता है। दरअसल दोष अमेरिका का नहीं है, बल्कि उसका समाज ही ऐसा है। अमेरिकी समाज बंदूकची समाज है। माल्कम फोर्ब्स का कथन है कि ‘हार का स्वाद मालूम हो तो जीत हमेशा मीठी लगती है’। अमेरिका को हार का स्वाद पता नहीं है, इसलिए हर निकृष्ट तरीके को अपनाकर वह जीतने की फिराक में लगा रहता है।

31 January 2014

देश अक्लमंदी की गुलामी से कब आजाद होगा ?

देश में शिक्षा व्यवस्था की पोल एक बार फिर से खुलकर सामने आई है। "एजुकेशन फॉर ऑल" के तहत यूनेस्को की ग्लोबल मॉनिटरिंग रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में चार साल तक स्कूल जाने के बावजूद 90 फीसदी गरीब बच्चे कुछ नहीं सीख पाते। 30 फीसदी बच्चे पांच-छह साल की स्कूली पढ़ाई के बावजूद सामान्य जोड़-घटाना नहीं जानते। अगर पूरे रिपोर्ट पर नजर डालें तो  ग्रामीण महिलाओं को साक्षर करने में अभी 66 बरस और लग सकते हैं।

सवाल यहां ये है कि देश का जो मध्यवर्ग अपने बच्चों को सेंट्रल बोर्ड स्कूलों में पढ़ाकर संतुष्ट है, वे पूरी तरह निजी हाथों में हैं, लिहाजा देश के 85 फीसदी बच्चों के लिए उनकी कोई उपयोगिता नहीं है। सरकारी नियंत्रण में चलने वाली प्राइमरी शिक्षा की गुणवत्ता देश के लिए गहरी चिंता का विषय होनी चाहिए, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों की खींचतान के बीच इसे अब अजेंडा से बाहर ही मान लिया गया है। केंद्र द्वारा राइट टु एजुकेशन का एलान करने के बाद तो बुनियादी शिक्षा पूरी तरह से चरमरा गई है। केंद्र सरकार को सिर्फ स्कूलों में भर्ती के आंकड़ों से मतलब है और राज्य सरकारें सोचती हैं कि इस मामले में ज्यादा मशक्कत करने से उनका वोट बैंक तो बढ़ने वाला नहीं है, उल्टे शिक्षक यूनियनों के नाराज हो जाने का खतरा अलग है। ऐसे में देश का भविष्य आज अंधेरे में नजर आरहा है। 

तो वहीं दुसरी ओर बचपन से ही रोजी-रोटी के काम में मां-बाप का हाथ बंटाने को मजबूर गरीब बच्चों को स्कूल तक खींच कर लाने के लिए बनाई गई मिड डे मील योजना खुद में एक राष्ट्रव्यापी स्कैंडल बनकर रह गई है। तो वहीं शिक्षक पढ़ाई-लिखाई का स्तर गिरने का ठीकरा, खाना पकाने और परोसने की काम को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। 

इनसभी समस्यों और सवालों से इतर एक बात और है कि “जिसे हम आजकल ‘शिक्षा’ कहते हैं, वह एक उपभोक्ता माल बन चुका है। यानी जैसी हैसियत वैसी शिक्षा। यही कारण है कि आज देष में लाख दावे और वायदों के बावजूद ऐसी असामानता दिखाई देरही है। 

आज हमारा देश लार्ड मैकाले द्वारा बनाया गया 1858 का भारतीय शिक्षा अधिनियम के तहद ही शिक्षा ग्रहण कर रहा है। जिसका मकसद था भारतीय परपरागत शिक्षा व्यवस्था को तोड़ कर अपनी कुरीतियों को थोपना। अपनी शिक्षा में सुधार लाने के लिए आज हमें मैकाले द्वारा लिखित 1835 का उसपत्र की साजिश को याद करना होगा जिसमे लार्ड मैकाले ने लिखा था.......

"मैं भारत में काफी घुमा हूँ। दाएँ- बाएँ, इधर उधर मैंने यह देश छान मारा। मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी, चोर या गरीब हो। इस देश में मैंने इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे। जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पौराणिक और पुरातन शिक्षा व्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डालें। जिससे इस देश का प्रत्येक व्यक्ति शक्ल से भारतीय मगर से अक्ल से ब्रिटीश का मुलाम होगा" तो सवाल आज इस अक्लमंदी की गुलामी को लेकर खड़ा होता है कि आज  देश इससे कब आजाद होगा?

देश में बेरोजगारी दर: 
  •  दुनिया में सबसे अधिक बेरोजगार युवा हमारे देश में हैं।
  •  15 से 29 वर्ष आयु वर्ग में ग्रामीण इलाकों में स्नातक बेरोजगारी का दर 36.6 प्रतिशत है।
  • जबकि शहरी इलाकों में बेरोजगारी का दर 26.5 प्रतिशत है।
  • श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसारए वर्ष 2012.13 में 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के बीच बेरोजगारी का दर 18.1 प्रतिशत है।
  •  18 से 29 वर्ष आयु वर्ग के बीच बेरोजगारी का दर 13 प्रतिशत है।
  •  15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के बीच के लोगों में ज्यादातर स्वरोजगार से जुड़े हैं।
  •  भारत में बेरोजगारी 3.8 प्रतिशतए गुजरातए दमन एवं दीव में सबसे कम है।
  •  सबसे ज्यादा बेरोजगारी हिमाचल प्रदेश में है जो 17.7 प्रतिशत है।

26 January 2014

राष्ट्रीय त्योहारों पर राजनीति क्यों ?

                                               पावन है गणतंत्र यह, करो खूब गुणगान।
                                              भाषण-बरसाकर बनो, वक्ता चतुर सुजान॥

जी हां, कुछ इसी अंदाज में आज गड़तंत्र दिवस की गुणगान राजनीति हलकों में होने लगी है। गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि लोकलुभावन अराजकता शासन का विकल्प नहीं हो सकती। झूठे वादों की परिणीति मोहभंग में होती हैं। जिससे गुस्सा पैदा होता है और गुस्से का एक ही लक्ष्य होता है, वो जो सत्ता में हैं। जनता का गुस्सा तभी कम होगा जब सरकारें वो करेंगी जो करने के लिए उन्हें चुना गया है। बड़बोले लोग जो हमारी रक्षा सेनाओं पर शक करते हों गैरजिम्मेदार हैं और उनका सार्वजनिक जीवन में कोई स्थान नहीं है। प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा चुनावों को लेकर कहा कि खिचड़ी सरकार विनाशकारी हो सकती है।

राष्ट्रपति के इस तीखे बयान पर भला आम आदमी पार्टी कहां चुप रहने वाली थी। झट से जवाब भी आगया। आप पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि राष्ट्रपति के भाषण में इसतरह की बातें उत्तर प्रदेश और गुजरात के बारे में कही गई है। राष्ट्रपति त्योहारों पर राजनीति कोई नई बात नहीं है। इससे पहले 2011 में भाजपा नेताओं को सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया गया था, क्योंकि ये लोग श्रीनगर के लाल चैक पर तिरंगा फहराना चाहते थ। इस घटना के बाद उमर अब्दुल्ला सरकार की जमकर आलोचना हुई थी। जिसके बाद भाजपा नेता नितिन गडकरी ने कहा था कि तिरंगा फहराने पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

आज इस राष्ट्रीय पर्व पर अरविंद केजरीवाल भी राजनीति करने में आगे दिखे। केजरीवाल एक मुख्यमंत्री होते हुए भी हमेशा की तरह सादे कपड़े में मफलर बांधे राजपथ पर गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शामिल हुए। जबकी इस मौके पर एक मुख्यमंत्री को सफेद कपड़ा पहनना चाहिए। साथ ही केजरीवाल ने गणतंत्र दिवस परेड को लेकर पहले हीं अपना विरोध जताया था। केजरीवाल ने कहा था कि कुछ वीआईपी लोगों को देखने के लिए निकलने वाली झांकियों से आम आदमी को कोई सरोकार नहीं है। तो ऐसे सवाल केजरीवाल के दावे को लेकर उठता है कि अपने आप का आम अदमी बताने वाले केजरीवाल वीआईपी लोगों के समूह में क्यों शामिल हुए?

इस मौके पर एक राजनीति और देखने को मिली। कर्नाटक राज्य की झांकी में टीपू सुल्तान को हाथ में तलवार लिए दिखाया गया। ये वही टीपू सुल्तान है जिसने बारह हजार से अधिक हिन्दुओं को इ्रस्लाम से धर्मान्तरित किया। तथा लाखों कि संख्या में बन्दी बना कर वध करने का हुक्म दिया था। साथ ही 20 वर्ष से कम आयु के एक खास समुदाय को जेल में रखा और पेड़ से लटकाकर मार डाला। ऐसे में टीपू सुल्तान हमारे राष्ट्रीय पर्व का हिस्सा कैसे हो सकता है। क्या ये एक खास समुदाय को लुभाने की राजनीति नहीं है? तो सवाल खड़ा होता है राष्ट्रीय त्योहारों पर राजनीति क्यों?

जंगल में अमंगल !

आजादी के बाद बनी भारतीय वननीति की समीक्षा सन 1988 में की गई थी। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेर-फेर किए बिना फिर से उसे यथावत लागू कर दिया गया, जबकि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई वननीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है। किंतु छत्तीस साल व्यतीत हो जाने पर भी भारतीय वनों पर पड़ रहे कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस वननीति नहीं तैयार की गई है। जबकि भारत-नेपाल सीमावर्ती भारतीय वनों पर बढ़ रहे नेपालियों के दबाव को रोकने, वन संपदा व जैव-विविधता की सुरक्षा के लिये वर्तमान वननीति में बदलाव किया जाना अतिआवश्यक हो गया है।

भारत के सभी राष्ट्रीय उद्यानों एवं वंयजीव विहारों में दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत के हिमालय की तराई में आबाद राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यपशु बिहार सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं। देश के वनों की सुरक्षा के लिये आजादी के बाद 1952 में पहली ‘वननीति’ बनी थी। इसके बाद बदलते परिवेश तथा समय की मांग के अनुरूप वर्ष 1978 में दूसरी वननीति बनी, जो अद्यतन अभी यही लागू है। हालांकि वन्यजीवों के अवैध शिकार को रोकने के लिए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1976 भी बनाया जा चुका है। विडम्बना यह कही जाएगी कि भारत की वननीति में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण जैव विविधता के संरक्षण एवं वनों की सुरक्षा को नजरन्दाज किया गया है। जबकि मित्र राष्ट्र नेपाल से भारत की लगभग 1400 किमी लम्बी सीमा सटी हुई है। सन् 1975 से पूर्व भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर घने और विशाल वनक्षेत्र स्थित थे, सीमा पर समृद्ध वनक्षेत्र होने के कारण वन्य-पशुओं का आवागमन निर्बाध रूप से होता था। 

उत्तर भारत में हिमालय की तराई में फैले अधिकांश वनक्षेत्र की सीमा पूर्व में पश्चिम बंगाल, दार्जलिंग जिले से लेकर पष्चिम में उत्तरांचल में पिथौरागढ़ तक स्थित है। पिथौरागढ़ में काली नदी के दोनों तरफ नेपाल राष्ट्र का इलाका एवं भारत का धारचूला कस्बा आबाद है। आवागमन की दृष्टि से दुर्गम होने के बाद भी यह क्षेत्र तिब्बत में पाए जाने वाले ‘चीरू’ नामक हिरन के बालो से बने ‘शाहतूष शालों’ की तस्करी के लिये विश्व विख्यात है। अपनी अति विशेष खासियत के कारण उच्च वर्ग में इस शाहतूस शालों की खासी मांग बनी रहती है। यही कारण है कि अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय वन्यजीव तस्कर बाघ, तेदुंआ आदि विलुप्तप्राय वन्यजीवों के अंगों के बदले शाहतूस शाल प्राप्त करके उसकी तस्करी करते हैं।

सन् 1975 में नेपाल सरकार द्वारा अपनाई गई ‘सरपट वन कटान नीति’ के कारण हिमालय की तराई के वनाच्छादित भू-भाग से नेपाल के इलाकों से वनों का सफाया हो गया। नेपाल सरकार ने अपनी सुनियोजित नीति के तहत सीमा पर वनकटान के बाद खाली हुए क्षेत्रों में सेवानिवृत्त नेपाली सैनिकों को बसा दिया। जिसका प्रमुख उदेश्य भारतीय सीमा पर मजबूत नेपाली नागरिकों की ‘सामाजिक फौज‘ की स्थापना था। खाली हुई वनभूमि पर आबाद हुए पूर्व नेपाली फौजियों को नेपाल सरकार द्वारा प्राथमिकता से असलहों के लाईसेंस भी प्रदान किए गए। हालांकि कालान्तर में नेपाल की लोकतात्रिंक सरकारों की स्थिति आयाराम-गयाराम की रही इसके कारण इन क्षेत्रों में आबाद हुए गांव माओवादियों के गुप्त शरणगाह बन गए थे, जो अब भी नेपाल सरकार के लिये समस्या का प्रमुख कारण बने हुए हैं।

नेपाल की सरपट वन कटान नीति का भारतीय वनों पर अच्छा-खासा प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों से भारी विपरीत प्रभाव पड़ा है। नेपाल की ओर से वनों  के कट जाने के कारण भारतीय क्षेत्र में स्थित प्रमुख जैवविविधता से परिपूर्ण  क्षेत्रों में जलप्लावन के साथ मिट्टी एवं बालू आदि की गाद (सिल्टिंग) जमा होने की समस्या बढ़ी है। पिछले आधा दशक से नेपाल से सटे भारतीय क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला का कहर लगातार जारी है। इसके परिणाम में सीमावर्ती वनक्षेत्रों का हरा-भरा जंगल सूख गया है साथ ही जंगल के अंदर भी घास के मैदानों पर भी इसका भारी कुप्रभाव पड़ा है। इससे चारा की पैदा हुई विकट परिस्थियों के कारण वनस्पति आहारी वन्यजीव जंगल के बाहर आने को विबश हैं, इनके पीछे बाघों के बाहर आने लगे हैं, वन्यपशु फसलों का खासा नुकसान पहुंचाते हैं। जिससे अब जंगल के सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में वन्यजीव और मानव के बीच संघर्ष का नया अध्याय शुरू हो गया है। जबकि मानवजनित कारणों से आबादी का दबाव जंगलों पर लगातार बढ़ रहा है और साथ ही वनों की सुरक्षा भी प्रभावित हुई है।

यह भी सर्वविदित है कि नेपाल, चीन, कोरिया, ताईवान आदि कई देश वंयजीव-जंतु उत्पाद के प्रमुख व्यवसायिक केंद्र हैं। जिसमें भारी मात्रा में ऊँचे दामों पर वंयजीव उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती है। जिनके लिये कच्चा माल हिमालय एवं हिमालय की तराई में बसे जैव-विविधता क्षेत्रों में उलब्ध है। ये राष्ट्र वंयजीव एवं उससे निर्मित सामग्री का आयात-निर्यात करने वाले देषों की भूमिका अदा करते हैं। इन्ही क्षेत्रों में सारा सामान विश्व बाजार में प्रवेश करता है। जहां प्रतिवर्ष 2-5 बिलियन अमेरिकी डालर का व्यापार होता है। वयंजीवों के अंगो का यह अवैध कारोबार नारकोटिक्स के बाद दूसरे नम्बर पर आता है। यह भी जगजाहिर हो चुका है कि वन्यजीवों के अंगों की तस्करी के अवैध कारोबार का चीन सबसे बड़ा खुला बाजार है। जहां वंयजीवों के अंगों के उत्पादों की खरीद-फरोख्त और बिक्री खुलेआम होती है।

इस स्थिति की गंभीरता का अनुमान नेपाल सरकार ने पहले ही समझ लिया था। शायद इसी का परिणाम है कि नेपाल सरकार ने अपने प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों के वंयजीवों की सुरक्षा का दायित्व नेपाल आर्मी को सौंप दिया था। इसका परिणाम यह निकला कि नेपाली सैनिकांे के दबाव के कारण वंयजीव तस्कर भारत, श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया जैसे देशों में सक्रिय हो गए। हाल ही में यहां पकड़े गए वंयजीव अंगो के तस्कर भी अपने बयानों में स्वीकार कर चुके हैं कि नेपाल के प्रमुख बाजारों में निर्बाध वंयजीवों के उत्पादों की तस्करी जारी है तथा नेपाल में एकत्र होने के बाद वंयजीवों के अंग तिब्बत, चीन, कोरिया पहुंचकर ऊँचे दामों पर बिकते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है अपनी वनसंपदा एवं वयंजीवों की सुरक्षा के लिये नेपाल सरकार ने यथोचित प्रबंध कर रखा है लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी के मार्गो पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है।

नेपाल द्वारा ‘सरपट वन कटान नीति’ के अन्तर्गत बृहद पैमाने पर किए गए वन कटान का भारतीय क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या प्रभाव पड़ा अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं उपरोक्त नीति के कारण भारतीय वन क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रतिप्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिये भी कोई नीति भारत सरकार द्वारा नहीं अपनाई गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गंभीर स्थिति का मूल्यांकन किए बगैर इसे राज्यों के ऊपर छोड़ दिया गया है। यदि पूर्व में पश्चिम बंगाल से पश्चिमम में उत्तराखंड तक फैले महानंदा वंयजीव बिहार, मानस वंयजीव बिहार, बुक्सा टाइगर रिजर्व, बाल्मीकी टाइगर रिजर्व, सोहागीबरवा वन्यजीव प्रभाग, सुहेलदेव वंयजीव प्रभाग, कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग, दुधवा टाइगर रिजर्व, किशनपुर वंयजीव बिहार, पीलीभीत का लग्गा-भग्गा वनक्षेत्र और उत्तराखंड के जंगलों की स्थिति को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि भारतीय सीमा की ओर नियंत्रण एवं संरक्षण की यथोचित व्यवस्था है, परंतु नेपाल की तरफ इन क्षेत्रों में पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिये वनकर्मी अपने को असहज महसूस करते हैं।

भारतीय वनों पर लगातार नेपाली नागरिकों का दबाब बढ़ता जा रहा है। जिससे वंयजीवों का अवैध शिकार हो अथवा पेड़ों को काटना हो, इसमें नेपाल नागरिक जरा भी कोताही नहीं बरतते हैं। स्थानीय स्तर के प्रंबध को यदि नजरन्दाज कर दिया जाए तो छत्तीस वर्ष बाद भी हमारे देश की वननीति में उपरोक्त कुप्रभावों को समाप्त करने के लिये अभी तक न तो कोई मूल्याकंन किया गया है और न ही नई वननीति तैयार की गई है, तथा भविष्य में भी ऐसी कोई आशा दिखाई नही पड़ती है। परंतु बदलते परिवेश में अब यह आवश्यक हो गया है कि हिमालय एवं हिमालय की तराई में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में बसे जैव-विविधता क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु एक व्यवहारिक ठोस ‘वननीति‘ बनाई जाए, अन्यथा की स्थिति में भारतीय वनों पर नेपाल की तरफ से पड़ रहे दुष्प्रभावों के भविष्य में और भी घातक परिणाम निकल सकते हैं, इस बात से भी कतई इंकार नही किया जा सकता है।

25 January 2014

क्या मतदान अनिवार्य किया जाय ?

आज देश भर में राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाया जा रहा है। कहीं पर कार्यक्रम की तैयारियां हो रही है, तो कहीं पर रंगीन मतदाता पहचानपत्र बांटे जा रहे हैं। मगर इनसब से इतर सवाल कई है। सवाल ये है कि रंगारंग कार्यक्रम और रंगीन कार्ड बांटने से क्या हम लोकतंत्र की उस शक्ति को हासिल कर सकते हैं जिसका मुख्य अधार पूर्ण मतदान में ही समाहीत है ?

हम भारत के नागरिक उच्चारण के साथ शुरू होने वाला संविधान का अध्याय आजके बदलते राजनीतिक स्वरूप में अब बेमानी लगने लगा है। सवाल भी खड़ा होता है कि क्योंन इस देश में अनिवार्य मतदान करने की कानून लागू किया जाय?

आज वोट देने की परंपरा जाति, धर्म की बेडि़यों में जकड़ी हुई है। ऐसे में आज हम सब को ये सपथ लेना होगा कि अपने देश की लोकतांत्रिक परंपराओं की मर्यादा को बनाए रखेंगे तथा स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं शांतिपूर्ण निर्वाचन की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए निर्भीक होकर धर्म, वर्ग, जाति, समुदाय, भाषा अथवा अन्य किसी भी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना सभी निर्वाचनों में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।

गुजरात में स्थानीय निकायों और पंचायत संस्थाओं में मतदान अनिवार्य करने संबंधी विधेयक गुजरात विधान सभा पहले हीं पारित कर चुका है। गुजरात देश में इस तरह का विधेयक पारित करने वाला पहला राज्य बन गया है। ऐसे में आज देश की संसद को भी अनिवार्य मदतादान करने संबंधि कानून बनाने कि जरूरत है। भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने मतदान को अनिवार्य किए जाने की पैरवी पहले हीं कर चुके हैं।

आज देश में एक प्रत्याशी अपने निर्वाचन क्षेत्र में डाले गए कुल मतों के मात्र 25 फीसदी मत पाकर जीत हासिल कर लेता है। जबकि जीतने वाला उमीवार 75 फिसदी जनता के उमीदों के विपरीत कार्य करने के लिय योग्य होजाता है। तो ऐसे सवाल ये है कि क्या आज हम लोकतांत्रिक व्यवस्था का पूर्ण रूप से सहभागी बन पाये हैं?

किसी भी देश के लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब शत-प्रतिशत मतदान से जनप्रतिनिधि चुने जाएं। पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यह आकड़ा 20 प्रतिशत तक भी रहा है। आज दुनिया के 32 लोकतांत्रिक देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू है।

 अनिवार्य मतदान से देश के अंदर मतदाताओं के किसी एक समुदाय को लामबंद करने के लिए जाति या संप्रदाय का कार्ड खेलने से भी बचाया जा सकता है। आज देश में 18 से 25 वर्ष की उम्र के मतदाताओं में से 70 फीसदी ने अपने आप को मतदाता सूचियों में नाम दर्ज ही नहीं करवाया जाये हैं। ऐसे में हम एक स्वच्छ लोकतंत्र की कल्पना कैसे कर सकते हैं। तो फिर सवाल खड़ा होता है कि क्या मतदान अनिवार्य किया जाय?

क्या नेताजी सुभाशचंद्र बोस को हम भूल गये हैं ?

देश के स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’  का उद्घोष कर देशवासियो में मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का प्रबल जज्बा पैदा करने वाले महान राष्ट्र नेता सुभाषचंद्र बोस को आज के हमारे राजनेताओं को फुर्सत नहीं है। मौका था 23 जनवरी का यानी कि राष्ट्र के महान सपूत का जन्म दिवस। मगर इस मौके पर जिस प्रकार से हमारे माननीय सांसदों ने अपनी बेरूखी दिखाई उससे साफ जाहीर होता है कि अब उन्हें कोई याद नहीं करना चाहता है।

सरकारी कैलेंडर में जन्म दिवस का उल्लेख होने के कारण खानापूर्ति के नाम पर मात्र औपचारिकता ही निभाई। लोकतंत्र के मंदिर कहेजाने वाला संसद भवन परिसर में इसे मनाने की जहमत तो जरूर उठाई गई, मगर वर्तमान लोकसभा और राज्य सभा के 775 संसद सदस्यों में से केवल एक बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी उपस्थित हुए। संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित इस समारोह में आडवाणी के अलावा तीन पूर्व सांसद भी इस अवसर पर मौजूद थे।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या हम वाकई नेताजी को भूल गये हैं? या फिर हमारी सरकार और माननीय जानबूझकर इसे नज़र अंदाज कर रहे है? या फिर आज के राजनैतिक दौर में राजनेताओं को सुभाशचंद्र बोस भी संप्रदायिक दिखने लगे हैं? सवाल कई है जिसे लेकर आज हरकोई जानना चाहता है। नेता और सांसदों को तो आपने देखलिया मगर इसमौके पर देश के अधिकारी भी इनसे कम नहीं है। दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों में से भी कोई भी इस मौके पर नहीं आया। परंपरा के अनुसार आम तौर पर संसद भवन के ऐसे कार्यक्रमों की अगुवाई पीठासीन अधिकारियों की अगुवाई में होती है।

यूपीए सरकार ने एक साल में भारत के जानेमाने व्यक्तित्वों के जन्म दिवस की सुभकामना देने और श्रधांजलि अर्पित करने के नाम पर पीछले साल विज्ञापनों में करीब 200 करोड़ रुपया खर्च किया। मगर यहां गौर करने वाली बात यह कि इसमें से एक रुपया भी नेताजी ने नाम पर खर्च नहीं किया गया। आजादी हासिल करने से करीबन 3 साल पहले भारत की जमीन पर भारत का झंडा बुलंद करने का श्रेय नेताजी की इंडियन नैशलन आर्मी को दिया जाता है। यही कारण है कि कुछदिन पहले नेताजी को देष के पहले कमांडर इन चीफ का दर्जा देने की मांग उठी थी। मगर सरकार ने नेताजी को देश के पहले कमांडर इन चीफ का दर्जा देने से इनकार दिया। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या नेताजी सुभाशचंद्र बोस को हम भूल गये हैं?

सड़क से सियासत तक !

आशा है तुम जहाँ कहीं भी होगी सफ़र में होगी । आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। तुम कब से मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हो मगर कभी तुमसे बात नहीं की । पता है लोग तुमसे नफ़रत करने लगे हैं । नफ़रत करने वाले वे लोग नहीं हैं जो सड़क पर रहते हैं बल्कि वे लोग हैं जो कभी कभार सड़क पर उतरते हैं मगर कितनी बार कोई उतरे उसे लेकर भ्रमित और क्रोधित हैं ।

धूमिल की एक कविता की किताब का नाम ही है संसद से सड़क तक। दो चार दिनों से अख़बारों और टीवी में कई बयान आ रहे हैं जिनमें सड़क को ग़ैर वाजिब और ग़ैर लोकतांत्रिक जगह के रूप में बताया जा रहा है । लोगों को आपत्ति है कि कोई बार बार सड़क पर उतर आता है। सरकार सड़क पर आ गई है। तुम जानती ही होगी कि सड़क पर आने का एक मतलब यह भी होता है कि किसी का घर बार सब चला गया है। वो बेघर और बेकार हो गया है। कई अंग्रेज़ी अख़बारों में तुम्हें स्ट्रीट लिखा जा रहा है। इस भाव से कि स्ट्रीट होना किसी जाति या वर्ग व्यवस्था में सबसे नीचले और अपमानित पायदान पर होना है। क्या राजनीति में भी सड़क पर आना हमेशा से ऐसा ही रहा है या आजकल हो रहा है।

सड़क, तुम्हें याद है न कि इससे पहले तुम्हारे सीने पर कितने नेता कितने दल और कितने आंदोलन उतरते रहे हैं। ख़ुद को पहले से ज़्यादा लोकतांत्रिक होने के लिए दफ़्तर घर छोड़ सड़क पर आते रहे हैं। सड़क पर उतरना ही एक बेहतर व्यवस्था के लिए व्यवस्था से बाहर आना होता है ताकि एक नये यात्री की नई ऊर्जा के साथ लौटा जा सके। सड़क तुम न होती तो क्या ये व्यवस्था निरंकुश न हो गई होती। पिछले दो दिनों में सड़क पर आने का मक़सद और हासिल के लिए तुम्हें ख़त नहीं लिख रहा हूँ। यह एक अलग विषय है। जो राजनीतिक दल अपनी क़िस्मत का हर फ़ैसला बेहतर करने के लिए सड़क पर उतरते रहे वही कह रहे हैं कि हर फ़ैसला सड़क पर नहीं हो सकता। क्या सड़क ने कभी सरकार नहीं चलाई। महँगाई के विरोध में रेल रोक देने या ट्रैफ़िक जाम कर देने से कब महँगाई कम हुई है। हर वक्त इस देश में कहीं न कहीं कोई तुम्हारा सहारा लेकर राजनीति चमकाता रहता है। तुम तो यह सब देखती ही आ रही हो।

प्यारी सड़क, तुम्हें कमतर बताने वाले ये कौन लोग हैं। उनकी ज़ात क्या है। कौन हैं जिन्हें किसी के बार बार सड़क पर उतर आने को लेकर तकलीफ़ हो रही है। क्या वे कभी सड़क पर नहीं उतरे। लेकिन सड़क पर उतरना अमर्यादित कब से हो गया। कब से ग़ैर लोकतांत्रिक हो गया। सत्ता की हर राजनीति का रास्ता सड़क से ही जाता है। तो फिर कोई सड़क पर रहता है तो उसमें तुम्हारा क्या दोष। रहने वाले का क्या दोष। दोष तो उसकी सोच में निकाला जाना चाहिए न। तुम्हें लोग क्यों अनादरित कर रहे हैं। तुम तो जानती ही होगी कि कितने नेता तुम पर उतरे और पानी के फ़व्वारे से भीग कर नेता बन गये। संघर्ष कहाँ होता है कोई बताता ही नहीं। संघर्ष कमरे में होता है या सड़क पर। क्या तुम पर उतरना उस विराट का नाटकीय या वास्तविक साक्षात्कार नहीं है जिसकी कल्पना में नेता सोने की कुर्सी देखते हैं।

प्यारी सड़क समझ नहीं आता लोग तुमसे क्या चाहते हैं। तुमसे क्यों किसी को घिन आ रही है। तुमने तो किसी को रोका नहीं उतरने से फिर ये बौखलाहट क्यों। तुम तो अपने रास्ते चलने वाली हो लेकिन कोई तुम पर आकर भटक गया तो इसमें तुम्हारा क्या क़सूर। तुमसे लोगों को क्यों नफ़रत हो रही है ख़ासकर उन लोगों को जो सड़क पर उतरना नहीं चाहते या नहीं जानते । तुम इन तमाम मूर्खों को माफ़ कर देना। कोई नेता मिले तो कहना यार बहुत हो गया कुर्सी कमरा अब ज़रा सड़क पर तो उतरो। सड़क पर उतरना सीखना होता है। सड़क पर उतरना नकारा होना नहीं होता है।

कश्मीर की भाषा पर सियासत !

जम्मू कश्मीर में इन दिनों एक अलग तरह का विरोध दिखाई दे रहा है। यह विरोध है अपनी भाषा की उपेक्षा का विरोध। बिल्कुल अंग्रेजियत अंदाज में जम्मू कश्मीर सरकार इन दिनों राशनकार्ड का फार्म भरवा रही है। फार्म स्थानीय कश्मीर की भाषाओं में न होकर अंग्रेजी में हैं। जिसे लेकर जम्मू कश्मीर राज्य के अलग अलग हिस्सों में मांग उठ रही है कि राशनकार्ड का फार्म उनकी भाषा में होना चाहिए। मसलन जम्मू संभाग में यह डोगरी में, लद्दाख में भोटी में, कारगिल में बल्ती में और कश्मीर संभाग में कश्मीरी भाषा में प्रकाशित किया जाना चाहिये। लेकिन हुर्रियत कान्फ्रेंस का वह धड़ा जिसकी अगुवाई सैयद अली शाह गिलानी करते हैं, शायद कश्मीरियों द्वारा कश्मीरी भाषा को लेकर दिखाये जा रहे इस भावनात्मक लगाव को बर्दाश्त नहीं कर पाये हैं और अपनी भाषा से मोहब्बत को नापाक करार दे दिया है। 

पिछले दिनों ख़ुद गिलानी ने बाक़ायदा अख़बारों को एक बयान जारी कर अपनी और उनकी जैसी सोच रखने वाले अपने दूसरे साथियों की कश्मीर विरोधी जहनियत का ख़ुलासा कर दिया है। गिलानी का कहना है कि राशन कार्ड के ये फ़ार्म उर्दू भाषा में प्रकाशित किये जाने चाहिये। उनका कहना है कि उर्दू एशिया के लोगों के लिये अरबी ज़ुबान के बाद सबसे ज़्यादा पवित्र ज़ुबान है। अब कोई गिलानी से पूछे कि मलेशिया, इंडोनेशिया, वियतनाम, थाईलैंड और जापान इत्यादि देशों के मुसलमानों का उर्दू भाषा से क्या लेना देना है? सैयद साहिब का कहना है कि इस्लाम की पवित्र किताबों का तरजुमा उर्दू ज़ुबान में हो चुका है, इसलिये मुसलमानों की नज़र में यह ज़बान भी अब उनकी मज़हबी ज़ुबान का पाक दर्जा अख़्तियार कर गई है। अब इनको कौन समझाए कि वह तो दुनिया की हर ज़ुबान में हो चुका है। केवल तरजुमा होने मात्र से उर्दू मुसलमानों की मज़हबी ज़ुबान कैसे हो गई? गिलानी यह ज्ञान भी देते हैं कि उस पार के कश्मीर (यानि जो पाकिस्तान के क़ब्ज़े में है, लेकिन वे इसके लिये इन शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। उनकी नज़र में इन शब्दों का प्रयोग नापाक है) के लोग भी उर्दू जानते हैं। लोगों को राशनकार्ड श्रीनगर, बारामुला, कुपवाडा ,शोपियां और अनन्तनाग में बनवाने हैं, लेकिन गिलानी साहिब उस पार के कश्मीरियों के भाषा ज्ञान पर तफसरा कर रहे हैं। वैसे गिलानी इतना तो जानते ही होंगे कि पाकिस्तान द्वारा क़ब्ज़ा किये गये उस पार के हिस्से में कोई कश्मीरी नहीं है, क्योंकि क़ब्ज़ा किया गया वह हिस्सा जम्मू का है जहाँ पंजाबी और डोगरी बोलने वाले लोग हैं या फिर मुज्जफराबाद है यहाँ केवल पंजाबी बोलने बाले लोग हैं। गिलगित और बाल्तीस्थान की अपनी अलग भाषा है, इसका पता भी गिलानी साहिब को इस उम्र तक आते आते पता चल ही गया होगा।

राशन कार्ड का आवेदन पत्र अंग्रेज़ी में नहीं होना चाहिये, इसको लेकर तो कोई बहस नहीं है, लेकिन कश्मीर घाटी में वह कश्मीरी भाषा में होना चाहिये, इसको कहते हुये सैयदों की ज़ुबान बन्द क्यों हो जाती है ? जो ज़ुबान कश्मीर का बच्चा बच्चा बोलता है, उसे ये सैयद पवित्र ज़ुबान मानने को तैयार क्यों नहीं हैं? जिस ज़ुबान में हब्बा खातून ने अपने दर्द का इज़हार किया, जिस में नुंद रिषी ने भाईचारे के गीत गाये , जिस में लल द्यद ने अपने वाखों की रचना की, ये सैयद उस ज़ुबान को मुक़द्दस मानने से मुनकिर क्यों हैं? आज कश्मीर की युवा पीढ़ी में अपनी ज़ुबान कौशुर को लेकर एक नई चेतना का इज़हार हो रहा है। पहचान के संकट के समय हर आदमी अपनी मादरी ज़ुबान में अपनी पहचान की तलाश करता है। कश्मीर विश्वविद्यालय में कश्मीरी ज़ुबान के पक्ष में माहौल है। इस भाषा में नये साहित्य की रचना ही नहीं हो रही बल्कि पाठकों की संख्या भी बढ़ रही है। कश्मीरी ज़ुबान में रोज़ाना अख़बार छप रहे हैं। कश्मीरी ज़ुबान को इतने लम्बे अरसे बाद एक बार फिर तमाम कश्मीरियों की ओर से बिना किसी मज़हबी नज़रिए से इज़्ज़त मिल रही है। चाहिये तो यह था कि हुर्रियत कान्फ्रेंस के नाम पर इक्कठे हुये ये बुज़ुर्ग लोग नौजवान पीढ़ी के इस आन्दोलन का खैरमकदम करते , लेकिन इसके उलट इन सैयदों ने कश्मीरी को दरकिनार करते हुये कश्मीर की वादियों में अरबी उर्दू के तराने गाने शुरु कर दिये हैं।

दरअसल कश्मीरियों की और सैयदों की यह जंग आज की नहीं कई सौ साल पुरानी है। यह एक प्रकार से उसी दिन शुरु हो गई थी जब शम्सुद्दीन शाहमीर ने कश्मीरी शासकों की हत्या कर इस प्रदेश पर क़ब्ज़ा कर लिया था। शाहमीर द्वारा स्थापित वह सुल्तान वंश कई सौ साल चला। उस काल में शासन की रीति नीति पर असल क़ब्ज़ा सैयदों का ही रहा, जिन्होंने कश्मीरियों पर बेहिसाब अत्याचार किये। यही कारण है कि कुछ इतिहासकार इस काल को विदेशी सैयद शासन काल भी कहते हैं। कश्मीरी भाषा को समाप्त कर उसके स्थान पर अरबी फ़ारसी थोपने के प्रयास तभी से शुरु हो गये थे। लेकिन क्योंकि कश्मीरी आम जनता की भाषा थी, उस जनता की भी जिसने इस्लाम मज़हब को तो चाहे अपना लिया था, लेकिन अपनी मातृ भाषा कश्मीरी को नहीं त्यागा था, इसलिये यह भाषा आज तक भी ज़िन्दा ही नहीं रही बल्कि साहित्य और बोलबाला की भाषा भी बनी रही। बहुत से लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि जनगणना में दिये गये आँकड़ों के अनुसार कश्मीर संभाग में केवल 3830 लोगों ने उर्दू को अपनी भाषा स्वीकार किया। 28,06,441 कश्मीरियों ने कश्मीरी को अपनी भाषा बताया। यह भी सभी जानते हैं कश्मीरी को अपनी भाषा बताने वाले कश्मीरियों में से 95 प्रतिशत लोग मज़हब के लिहाज़ से मुसलमान ही हैं। लेकिन इसके बावजूद आज २०१४ में सैयद अली शाह गिलानी ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि कश्मीरी ज़ुबान के ख़िलाफ़ उनकी यह लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है। उर्दू और अरबी के नाम पर कश्मीरियों का मज़हबी जुनून उभारने की कोशिश कर , सैयद गिलानी कश्मीरी ज़ुबान को हाशिए पर धकेलने की पुरानी चालें चल रहे हैं, लेकिन आशा करनी चाहिये इस बार कश्मीरियों की सामूहिक चेतना के आगे वे यक़ीनन हार जायेंगे। हैरानी इस बात की है कि जम्मू कश्मीर रियासत के पाँचों संभागों में से किसी की भी भाषा उर्दू नहीं है।

जम्मू की डोगरी, कश्मीर की कश्मीरी, लद्दाख की भोटी, बाल्तीसतान की बल्ती और गिलगित की अपनी जनजाति भाषा है, लेकिन फिर भी राज्य के संविधान में उर्दू को राजभाषा का दर्जा दिया हुआ है। कश्मीर घाटी में कश्मीर के हितों के लिये लड़ने का दावा करने वाले, कश्मीरी भाषा को उसका उचित स्थान दिलवाने के प्रश्न पर रहस्यमय चुप्पी साध लेते हैं। नेशनल कान्फ्रेंस और पी डी पी बाक़ी हर प्रश्न पर लड़ते हैं लेकिन जब कश्मीरी भाषा को ठिकाने लगाने का प्रश्न आता है तो आगा सैयद रुहुल्लाह से लेकर सैयद मुफ़्ती मोहम्मद तक सभी सैयद शाह गिलानी के साथ खड़े दिखाई देते हैं। ध्यान रहे बाहरवीं शताब्दी के आसपास अरब और ईरान से आने वाले इन सैयदों की मातृभाषा अरबी या फ़ारसी थी। लेकिन इतनी शताब्दियाँ कश्मीर घाटी में गुज़ार देने के बाद भी ये कश्मीरी भाषा को अपनी नहीं मान सके। यदि ऐसा होता तो आज सैयद अली शाह गिलानी अपनी आवाज़ कश्मीरी भाषा के हक़ में उठाते न कि उर्दू के हक़ में। वैसे यह देखना भी रुचिकर रहेगा कि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, जो ख़ुद कश्मीरी हैं, राशन कार्ड का आवेदन पत्र कश्मीरी भाषा में छपवा कर कश्मीरियों का साथ देते हैं या फिर उसे अंग्रेज़ी या उर्दू में ही रखकर परोक्ष रुप से इन सैयदों की ही सहायता करते हैं?

वोट फॉर मोदी के मायने !

अब बात साफ साफ है। सीधे सीधे। लोकतंत्र की दुहाई और आदर्श राष्ट्रवादी विचारधारा जैसी कोई बात नहीं है। पार्टी भी शायद किनारे कर दी गई है। बात सीधे सीधे जनता और मोदी के बीच है। दिल्ली के रामलीला मैदान से मोदी ने अपना रुख पूरी तरह बदल दिया है। अभी तक पार्टी के नाम पर मोदी वोट मांग रहे थे और मोदी के नाम पर पार्टी। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब मोदी सीधे सीधे अपने नाम पर अपने लिए वोट मांग रहे हैं। उस दिन रामलीला मैदान में भी जब भाजपा की राष्ट्रीय परिषद में मोदी ने साठ साल बनाम साठ महीने की मांग की थी तब उनका हाथ अपने आप उनके सीने की तरफ चला गया था। उसी सीने की तरफ जो अब गोरखपुर पहुंचकर 56 इंच का हो चला है। 

बात साफ है। साठ महीने चाहिए। किसी और के लिए नहीं चाहिए। नरेन्द्र भाई मोदी को अपने लिए चाहिए। मोदी मॉडल पर देश के विकास के लिए चाहिए। वह विकास जिसमें सुख चैन और आराम के अलावा दूसरा कोई काम नहीं है। नरेन्द्र मोदी के पास न सिर्फ विकास का कोई बेहतरीन फार्मूला है बल्कि उस फार्मूले पर काम करने का मजबूत माद्दा है। बीते कुछ महीनों से मोदी का प्रचारतंत्र विकास के उसी फार्मूले को दुनिया के सामने रख रहा है जिसे दस साल में मोदी गुजरात में लागू कर चुके हैं। उनका गुजरात देश का ही नहीं दुनिया का सबसे विकसित राज्य बन चुका है। अब वे देश को गुजरात बनाना चाहते हैं। इसलिए उन्हें सिर्फ साठ महीने चाहिए। सिर्फ पांच साल का सवाल है।

जनता को घेरने की बारी तो अब आ रही है। इससे पहले मोदी प्रचारतंत्र के इसी गिरोह ने मोदी की अगुवाई में भाजपा को घेरने का काम किया था। जिन दिनों भाजपा को घेरने के लिए मोदी गिरोह सोशल मीडिया पर सक्रिय हो रहा था उस वक्त एक प्रचार जमकर किया गया था। कमल निशान और मोदी की पहचान (उनका चेहरा) एक साथ जोड़कर सोशल मीडिया पर जमकर प्रचार करवाया गया था कि अगर बीजेपी को वोट चाहिए तो वह तत्काल "गुजरात के शेर'' को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करे। सोशल मीडिया पर भी उस वक्त अघोषित रूप से गुजरात के इस शेर को विकास पुरुष ही घोषित किया गया था। गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद जब यह प्रचार अभियान चलाया जा रहा था उस वक्त तक केन्द्र में गुजरात के शासन के नाम पर गुजरात की जनता से तीसरी पारी हासिल कर चुके थे। गुजरात की जनता से किया गया वादा किसी भी कीमत पर पूरा करना ही था। इसलिए मोदी गिरोह ने बहुत सुनियोजित तरीके से सोशल मीडिया और फिर मुख्यधारा की मीडिया के जरिए यह साबित करने में सफलता हासिल कर ली कि बीजेपी के भीतर अगर सबसे लोकप्रिय नेता कोई है तो वह सिर्फ नरेन्द्र भाई दामोदार दास मोदी हैं।

अब कौन सी ऐसी पार्टी होगी जो अपने सबसे लोकप्रिय नेता को सबसे आगे नहीं कर देगी? विभिन्न टीवी चैनलों के सर्वे, सोशल मीडिया के शोर में सब तरफ एक ही आवाज सुनाई दे रही थी कि नरेन्द्र मोदी ही बीजेपी के सबसे लोकप्रिय चेहरे हैं। और जब ऐसा हो चला था तब चेहरे को मोहरा बनाने में क्या हर्ज था? चेहरे ने चाल चली और बीजेपी का मोहरा बन गया।

जिन दिनों नरेन्द्र मोदी और उनका प्रचार तंत्र यह स्थापित कर रहा था कि वे ही बीजेपी के सबसे लोकप्रिय चेहरे हैं उन दिनों बीजेपी लोकसभा चुनावों को लेकर बिल्कुल भी तैयार नहीं दिख रही थी। कांग्रेस के घोटालों पर संसद के भीतर लड़ने के लिए आमादा बीजेपी के लीडर्स यह भांप ही नहीं पा रहे थे कि 2014 की तैयारी का समय आ गया है। यह काम नरेन्द्र मोदी ने कर रखा था। और जैसे ही नरेन्द्र मोदी को बीजेपी ने पीएम इन वेटिंग घोषित किया मोदी का वह प्रचारतंत्र सक्रिय हो गया जिसका नेतृत्व अमित शाह कर रहे हैं। उसी प्रचारतंत्र ने मोदी को हिन्दुत्व के मुद्दे से अलग होने की रणनीति अख्तियार की और उनको बतौर विकास पुरुष स्थापित करने की योजना बनाई। हो सकता है इस योजना का अहम हिस्सा यही रहा हो जिस हिस्से पर अब नरेन्द्र मोदी बोलते हुए दिखाई दे रहे हैं। रामलीला मैदान में अपने भाषण के बाद अब गोरखपुर में नरेन्द्र मोदी ने बीजेपी के लिए वोट मांगने की बजाय खुद अपने लिए वोट मांगना शुरू कर दिया है। यह बहुत सूक्ष्म बदलाव है लेकिन है बहुत अहम।

इसलिए मुलायम सिंह यादव को अगर नरेन्द्र मोदी यह समझाते हैं कि गुजरात होने का मतलब क्या होता है तो मुलायम के बहाने ही वे पूरे देश को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी होने का मतलब क्या होता है? मोदी होने का मतलब होता है चौबीसों घण्टे बिजली। दिन रात बिजली। गांव गांव बिजली। और फिर ऊपर से ताना यह कि नेताजी आप यूपी को गुजरात नहीं बना सकते क्योंकि इसके लिए तो छप्पन इंच का सीना लगता है। मोदी ने मुलायम को याद दिलाया कि कैसे बीते दस सालों में गुजरात सुख चैन का जीवन जी रहा है और शांति, एकता सद्भावना लेकर आगे बढ़ रहा है। अन्य विपक्षी दलों का नरेन्द्र मोदी पर जो सबसे बड़ा आरोप है वह यही है कि अगर नरेन्द्र मोदी देश के शीर्ष पर पहुंचते हैं तो वे देश को गुजरात बना देंगे। विपक्षी दल या फिर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब यह कहते हैं तो उनका सीधा सा मतलब गुजरात के उस नरसंहार से होता है जिसके बूते नरेन्द्र मोदी ने गुजरात पर अपनी पकड़ मजबूत की थी।

नरेन्द्र मोदी गुजरात होने का मतलब न समझते हों, ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन जानते हुए भी उन्हें एकसाथ दो काम करने हैं। पहला, जिस गुजरात को दूसरे दल उन्हें याद दिलाना चाहते हैं उस गुजरात का नाम जुबान पर लाये बिना उस ब्रांड गुजरात को पेश कर देना है जो इतना विकसित है कि वहां आने के लिए इंद्रदेव भी तरसते हैं। गुजरात कभी बहुत पिछड़ा राज्य तो रहा नहीं है। बिजली, उद्योग और प्रशासनिक सक्रियता के नाम पर गुजरात मोदी के आने से पहले ही शिखर पर विराजमान राज्यों में मौजूद था। नब्बे के दशक के आखिर तक औद्योगिक विकास के मामले में महाराष्ट्र और गुजरात दो ही राज्यों का नाम आता था। इसलिए दस सालों में नरेन्द्र मोदी ने कोई बहुत तीर मार दिया हो ऐसा नहीं है, हां जो किया है वह यह कि औद्योगिक राज्य में बड़े पूंजीपतियों की बड़ी परियोजनाओं को बड़ी संख्या में बढ़ावा दिया है जिसके कारण बड़ी पूंजी का शोर गुजरात से सुनाई देता है। हालांकि यह सब करते हुए उनकी महत्कांक्षी वाइब्रंट गुजरात परियोजना फ्लाप शो ही साबित हुई और पर्यावरण की खराब दशा तथा कुपोषित बच्चों की कालिख मिटाये नहीं मिट रही है। लेकिन मोदी का प्रचारतंत्र इतना सशक्त है कि उन्होंने वह प्रचार हासिल कर लिया जो ब्रांड गुजरात के साथ साथ ब्रांड मोदी को स्थापित कर सकता है। और वही हो रहा है।

यहां यह सवाल बेमानी है कि अब बीजेपी कहां है? उसके बाकी नेताओं की क्या भूमिका है? भाजपा की वैचारिक विरासत का क्या होगा? जिस हिन्दू राष्ट्रवाद के नाम पर मोदी ने संघ समर्थन हासिल किया था, उस हिन्दू राष्ट्रवाद का क्या होगा? उन्हीं के विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने किसी एकात्म मानववाद की कोई विचारधारा सामने रखी थी, जो कि जनसंघ के बाद भाजपा के लिए आर्थिक दिशानिर्देश का काम करती रही है। वे दीनदयाल और उनकी विचारधारा कहां चली गयी? दूसरों को छोड़िये कोई संघ, बीजेपीवाला भी इस वक्त इन सवालों पर सन्नाटे में है। गोरखपुर के मंच से जब बीजेपी नेता कलराज मिश्र को भी अगर दीनदयाल का एकमात्म मानवाद नहीं बल्कि मोदी का विकसित गुजरात दिखाई देता है इस पार्टी तंत्र के वैचारिक दिवालियेपन पर किसी मोदी का भारी पड़ जाना असहज और अस्वाभाविक नहीं रह जाता है। भाजपा के पास अब जो कुछ है, नरेन्द्र मोदी है। गुजरात है। इसलिए अगर लोग मोदी को वोट देते हैं, तो बदले में मोदी लोगों को 'गुजरात' देंगे। लेकिन कौन सा 'गुजरात'? वह गुजरात जिसे विपक्षी पार्टियां 'मोदी का गुजरात' कहती हैं या फिर वह जिसे मोदी और उनका प्रचारतंत्र 'मेरा गुजरात' बताता है?

23 January 2014

एक था मुजफ्फरनगर !

पिछले महीनों में उन्होंने अपने घर छोड़े, गांव छोड़ा और अपनी पुस्तैनी जमीनों से ज़िंदगी का नाता भी छूट गया. हर रोज उनके लिए मुश्किलें हैं, शहर की, सरकार की, मौसम की, बाज़ार की. इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल है कि साम्प्रदायिक दंगों के बाद किसी शहर की सूरत में कोई बदलाव आता है? शायद वक्त के साथ लोगों के चेहरों से खौफ थोड़ा उतर जाता है. शायद वह खौफ कहीं बहुत भीतर गुजर जाता है. कहना यह भी मुश्किल है कि चार महीने पहले हुए मुजफ्फर नगर दंगे के वक्त स्टेशन के बाहर टंगी यह बड़ी वाली होर्डिंग थी या नहीं. जो फिलहाल नई-नई सी दिख रही है और जिस पर लिखा है- हर-हर मोदी, घर-घर मोदी. 

बहुत कम समय में यह भी कहना मुश्किल है कि होर्डिंग पर लिखा यह सिर्फ तुकबंदी है या हर घर में मोदी को पैदा किए जाने की कवायद. हर शहर अपनी छोटी-छोटी चीजों के जरिए सवाल पैदा करता है और अपने छोटे-छोटे प्रतीकों में जवाब देता है. शहरों के मोड़ पर लगी होर्डिंगें शहर की कलाई पर बधी घड़ियां होती हैं जो शहर की संस्कृति और राजनीति के मिजाज का समय बताती हैं. ऐसा क्यों होता है कि जिन शहरों में दंगे होते हैं वहां मोदी की होर्डिंग का कद बढ़ जाता है. ऐसा क्यों होता है कि ऑटो के स्टीयरिंग पर चिपका किसी मस्जिद का फोटो उधड़ जाता है. हमशक्ल दिखते लोगों के बीच वह कौन सा संतुलन है जो कुछ दिनों के भीतर इतना बिगड़ जाता है कि वे अपने पड़ोसी का कत्ल कर देते हैं. हाजिरा खातून जिन पडोसियों के घर रोटियां खाती थी वे इतने उन्मादी कैसे हो गए कि खा़तून को अपना गांव खेड़ी छोड़ना पड़ गया. इन सवालों के जवाब संसद के दरवाजे खोलकर आते हैं. जहां देश का हर नागरिक, धर्म और जाति में बांटकर वोट बन जाता है. जो संसद जाने की तैयारी में जुटी पार्टियों के लिए एक ‘ओट’ का काम करता है.

पिछले चार महीने से मुजफ्फर नगर, दंगे होने और दंगे गुजर जाने के बाद का शहर बना हुआ है. दंगाईयों के उन्माद कुछ दिनों के थे अब उन्माद के बाद का भय है, असुरक्षा है और कहीं पनाह न मिल पाने की बेबसी और एकजुट रहने का साहस है. दंगे में पीड़ित ज्यादातर मुस्लिम समुदाय के लोग अपना गांव छोड़कर कई किलोमीटर दूर चले आए हैं. उनके घर छूट चुके हैं, जानवर भी छूट चुके हैं. कई लोगों से बात करते हुए ऐसा लगा कि वे खुद को भी छोड़ आए हैं, उनके साथ बस एक मुसलमान चला आया है. शिविरों में मौलवियों का भाषण जिसे और मजबूत बना रहा है. उनके बच्चे, उनका परिवार है और उन सबके साथ उनके गांवों का भुगता हुआ का डर है. किन्हीं सड़क के किनारे उन्होंने झुग्गियां बना ली हैं. कई-कई गांव एक साथ हो गए हैं. हजार झुग्गियों वाले गांव, जिसने आसमान और जमीन के बीच लाल-नीली पालीथीन से खुद को ढक लिया है. एक साथ और एकजुट होना शायद उनके भय को थोड़ा कम करता है. हिन्दू उन्मादियों जो मुजफ्फर नगर की स्थानीयता में जाट हैं, उनसे खुद को उन्होंने बचा लिया है. सरकारों के लिए उनका जीवन-मौत, भय-आक्रोश, उजड़ना-बसना २०१४ के चुनाव में किन्हीं तारीखों का सवाल है. सभी पार्टियां इस सवाल को ठीक ढंग से हल कर लेना चाहती है.            

अलग-अलग पार्टियों के काफिले यहां घूम रहे हैं. सब यहां रोटियां सेंकना चाहते हैं और राहत शिविरों के लोग अपने चूल्हे पर रोटी छोड़कर यह देखने के लिए जुट रहे हैं कि बात-बेबात से रोटियां कैसे सेंकी जाती हैं. थोड़ी देर बाद भूख उन्हें फिर से उनकी झुग्गियों की तरफ लेकर चली जाती है. इस बीच मौत की संभावनाएं और बढ़ती गई है. कई बच्चों को निमोनिया ने जकड़ रखा है. इन मौतों को ठीक-ठीक सरकार के द्वारा की गई हत्या नहीं कहा जाता क्योंकि ऐसी हत्याएं ईश्वर की मंजूरी के बिनाह पर होती हैं. जबकि इतनी सारी हत्याओं के बाद ईश्वर को भी हत्यारा कहना मुमकिन नहीं. वोट की राजनैतिक विद्रूपताओं ने पिछले कुछ वषों में प्राकृतिक आपदाओं और मौसमों के बदलाओं को अपने सियासती संभावनाओं में तब्दील करने की प्रवृत्ति अपनाई है. साम्प्रदायिक दंगे में हुई हत्याओं से उपजी जन असुरक्षा, सरकारों और पार्टियों के लिए राजनैतिक रूप से सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराती है. यह अखबारों के लिए ख़बर, गैर-सरकारी संगठनों के लिए ‘समाज-सेवा’, राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं के लिए जन ‘पक्षधर’ होने का समय है. वे सब व्यस्त हैं और एक मामूली हो चुकी सड़क की अहमियत बढ़ गई है. कई सफेद गाड़ियां उन पर घूम रही हैं. 
  
४ जनवरी वह आखिरी तारीख थी जब मुजफ्फर नगर के दंगा पीड़ितों को अपने कैम्प खाली कर देने का आदेश सरकार ने दिया था. एक कैम्प की कुछ झुग्गियां उठकर सांझक के कब्रिस्तान में जा चुकी हैं. यह अखबार की खबर है जिसने सरकार की भाषा में लोगों के शिविरों में बसने पर आपत्ति सी दर्ज की है. अमर उजाला अहमियत देते हुए अपनी पहली ख़बर में शिइर में बसे पीड़ित लोगों फटकार रहा है. उसका ऐसा मानना है कि मुख्यमंत्री यह तय करेगा कि राज्य में कौन कहां रहे, कहां न रहे, जिए या मर जाए. जनता ने उसे पांच साल के लिए यह अधिकार दे रखा है. झुग्गियों में बसने की बेबसी को दुसाहस की तरह दर्ज किया गया है. मौत और हत्याओं के पहले कब्रिस्तान में बसना एक प्रतीक सरीखे है. जैसे दफ्न होने से पहले अपनी कब्र का मुआयना कर लेना, जैसे कब्र में जाने की पूरी तैयारी खुद करना, जैसे दंगे में बचकर सरकारी आदेश से मर जाना. कई कैम्प के लोगों ने कैम्प छोड़ने से मना कर दिया है. लगातार पुलिस की गाड़ियां आकर झुग्गियां हटाने का दबाव बना रही हैं. प्रदेश का मुख्यमंत्री झुग्गियों में बसे लोगों को भाजपा और कांग्रेस के लोग कह रहा है. क्योंकि सरकार ने दंगे में हुई हत्याओं के मुआवजे दे दिए हैं. पर हत्याओं और मौतों की संभावनाओं से उपजे व्यापक भय का कोई मुआवजा किसी सरकार के पास नही है. किन्ही और हत्याओं के बाद सरकार फिर से उनकी मौत के मुआवजे दे सकती है. सरकारों का यही चलन है वह जिंदा लोगों के लिए कुछ नहीं करती. मुआवजे देकर वह लोगों के लाशों की कीमत अदा कर देती है. अलग-अलग हत्याओं में मारे गए लाशों की दरें तय कर दी जाती हैं. जो दो लाख से पांच लाख तक हो सकती है.

मलकपुर कैम्प दंगा पीड़ितों का सबसे बड़ा कैम्प है. कुल छः वार्डों का कैम्प और हजार से ज्यादा झुग्गियों वाला कैम्प. दोनों किनारों पर अस्थाई रूप से दो मस्जिदें भी बनाई जा चुकी हैं. इसलिए अस्थाई रूप से अल्लाह को भी यहां रहने की मजबूरी सी है और उसकी गवाही में ३२ लोगों की मौतें इस ठंड में यहां हो चुकी हैं. लोगों की जिंदगियां बचाने में जैसे वह असफल सा रहा हो. बोराखुर्द, कैथल, सिसोली अलग-अलग गांवों के लोग अब पड़ोसी हो चुके हैं. ये सब के सब पीड़ित हैं और सब के सब मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. यह कहते हुए मोदी, आडवानी और भाजपा के नेताओं का वह वाक्य याद आता है जिसे आतंकवाद और मुस्लिम के लिए वे अक्सर अपनी जन सभाओं में दुहराते रहते हैं. जिस समुदाय के आतंक में ये मुसलमान, झुग्गियों में रहने पर विवश हैं वे सब के सब हिन्दू हैं और शायद हिन्दू होने का उन्हें गर्व भी है. कैम्प छोड़ने के सरकारी आदेश पर बाते करते हुए अयूब, यासीन और सादिक खुद को अलाव से गर्म कर रहे हैं. कुछ झुग्गियों में चाय बन रही है और कुछ चूल्हों पर रोटियां सेंकी जा रही है. इन अस्थाई कैम्पों से जो बच्चे पढ़ने के लिए बगल के स्कूलों में जाते थे वे आज नहीं गए हैं. नजदीकी कस्बे में जो कुछ लोग मजदूरी के लिए जाते थे उनका काम आज बंद है. सरकार के आदेश को न मानने के लिए एक साथ और एकजुट रहना जरूरी है. सरकार उन्हें उनके घर लौटने का दबाव बना रही है. अनवर बताते हैं कि दंगे के कुछ दिन बाद उनका भाई काशिम घर के हालात देखने के लिए गांव की तरफ गया और दो महीने से नहीं लौटा. फिलहाल अनवर अपने भाई के न लौटने की आशंकाओं से घिरे हैं पर पड़ोसी उनकी आशंका को यकीन की तरह मान रहे हैं. उन्हें यकीन है कि अब वह कभी नहीं लौटेगा. यह उनकी असुरक्षा के प्रमाण हैं और यही वजहे हैं कि वे अपने गांव नहीं लौटना चाहते. कैम्पों में रहना मुश्किल है, अस्थायी जिंदगियां बसर करना दुरूह भी पर यह सब जीवन बच जाने के बाद की बातें हैं.

शम्सुद्दीन, मलकपुर कैम्प के पांच नम्बर वार्ड में रहते हैं. वे कहते हैं कि वे सभी वार्डों में रहते हैं, वे घूमते रहते हैं और अपनी स्थितियों के साथ शिविर के और परिवारों का जायज़ा लेते रहते हैं. वे नज़्म लिखते हैं और शिविर के बच्चों को नजदीक के मदरसे में भेजने के लिए कहते हैं. एक अस्थायी जिंदगी में यह स्थायीत्व सा प्रयास है. वे हमे स्थानीय और उर्दू भाषा में मिश्रित अपनी लिखी एक नज्म सुनाते हैं. जिसके मायने हैं कि लफंगे, चौधरी हो गए हैं. चुनाव और वोट की राजनीति गुंडों का त्योहार बन गई है. जब इनका काम निकल जाता है तो नेता अपनी नज़र घुमा लेते हैं और ओड़ी-सोड़ी बात करते हैं. शमसुद्दीन कहते हैं कि हमे कोई सरकार नहीं बचाएगी. जब हमे कैम्पों से हटा दिया जाएगा तो हर जगह ऊपर आसमान है और नीचे जमीन हम इसी के बीच कहीं ठहर जाएंगे. यह एक बड़ा दायरा है और इसके बीच ठहरना नाउम्मीदी की हद तक गुजर जाने की बयानी है. कैम्प से कुछ लोग आज आसपास के गांवों की तरफ गए हैं. ताकि समर्थन जुटाया जा सके. ताकि कैम्प हटाने से बचाया जा सके. ज्यादातर महिलाएं चूल्हे पर कुछ न कुछ पका रही हैं, जैसे वे पकाती आई हैं. थोड़ी आग और थोड़ा धुआं हर झुग्गी पर दिख रहा है. 

नूरपुर खुरगान कैम्प में राहुल गांधी के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हुए हैं. किसी दिन की गुनगुनी धूप में यहां आकर राहुल गांधी ने अपना ‘फर्ज अदा’ कर दिया है. बच्चों को कपड़े बांटे गए हैं जिस पर ‘कांग्रेस’ लिखा हुआ है. इसी ‘कांग्रेस’ को पहनकर वे दिनभर झुग्गियों और सड़कों पर घूमते हैं. बच्चों के लिए यह ठंड से बचने की मजबूरी है और उनकी पीठ कांग्रेस के प्रचार के लिए जरूरी है. २०१४ के गर्मियों तक सभी पार्टियों को इस तरह के पीठ की जरूरत है. भाजपा कुछ पीठों को नंगा करती है और कुछ पार्टियां उसे ढक देती हैं. इस तरह से नंगा करने वाला भाजपा का और नंगा होने वाला ढंकने वाले का हो जाता है. साइस्ता इस कैम्प के पहले छोर पर रहती है, वे बागपत के तिलवाड़ा गांव से हैं. वे मानती हैं कि सब गड़बड़ हैं, कांग्रेस थोड़ी ठीक है. उसने ही हमारी थोड़ी मदद की है. उनके पति मोहसिन पेंटर का काम करते थे. पिछले तीन महीने से वे इसी कैम्प में रह रही हैं. यहां से उनके नातेदारों के घर नजदीक हैं. गांव में कुल दस घर मुस्लिमों के थे. दंगे के भय से सब चले आए. सब के सब अब नूरपुर कैम्प की झुग्गियों में रह रहे हैं. वे गांव जाने के बजाय यहां मरने को बेहतर मानती हैं. वे कहती हैं कि यहां अपने लोग हैं. कम से कम मरने के बाद वे दफन तो कर देंगे. कम से कम हमारी इज्जत तो बची रहेगी. उनके पड़ोस की झुग्गी डूंगर गांव मुजफ्फर नगर की है.

 दंगे के वक्त जब रात में वे लोग भागे तो अपने साथ एक बूढ़े को न ला सके. बाद में उन्हें पता चला कि मेरू नाम के उस बूढ़े को फासी लटकाकर मार दिया गया. दंगाई उनके जानवर अपने घर लेकर चले गए. इन सबके पास गांव में जमीने नहीं थी. जितना बड़ा इनका घर था उतनी ही बड़ी कुल जमीन थी. पर वह जमीन इन झुग्गियों से बड़ी थी और स्थाई भी. मौत और हत्याओं के भय से अपने घर को फिर से पाने की उम्मीद उन्होंने छोड़ दी है. ज़ाकिर कहते हैं कि आने वाले चुनावों के चलते यह सब और ज्यादा बढ़ सकता है. वे बेहद गरीब लोग है, बहुत कम पढ़े-लिखे, मुसलमानों की स्थिति के लिए बरसों पहले बनाई गई सच्चर कमेटी की फाइलों में दर्ज ये वे लोग हैं जिनके हालात पिछले कई सालों से सरकारें सुधारने का वायदा कर रही थी और कर रही हैं. अपने जीवन के अनुभवों से उन्होंने चुनाव, हिंसा और भय को पढ़ लिया है. इस बार ये समाजवादी पार्टी से नाराज है और कांग्रेस को ठीक मान रहे हैं, इसके पहले नाराज हुए थे तो बहुजन समाज पार्टी की तरफ गए थे. वे अपनी हालातों और प्रायोजित दुर्घटनाओं के चलते पार्टियां बदल देते हैं पर इस सब के बीच जो स्थायी बचा रह जाता है वह है उनके हालात.

इसके अगले पड़ाव में कुछ ही दूरी पर एक मदरसा है. जिसके बगल में बनाए गए कैम्प को मदरसा कैम्प कहा जाता है. यह पिछले कैम्पों से छोटा है. शाहीन, फातिमा, ज़ोया ये बच्चियां है जिनकी ठंड और बीमारी से मौत हो चुकी है. इसके अलावा भी और कई बच्चे मर चुके हैं. जुवैदा और अनवरी खा़तून सरकारी आदेश से क्रोधित हैं. वे कहती हैं कि इस मौसम में कैम्पों में रहना हमारी चाहत नही है, यह हमारी मजबूरी है. यहां हम सब एक साथ हैं. अगर सरकार ने हमे यहां से भी हटाया तो हम कहां जाएंगे पर उनमे निराशा या हताशा के भाव नहीं हैं. वे एक मोटा सा डंडा उठाती हैं और कहती हैं कि हमने तय कर लिया है कि अगर हमे हटाया गया तो हम कहीं नहीं जाएंगे. हम सरकार को मार देंगे या मर जाएंगे. मर्दों से यह न होगा, हम ही लड़ेंगे उनसे, हम यहीं पर रहेंगे.

22 January 2014

क्या सुनंदा की 'सौतन' ने लेली जान !

कभी एक टीवी शो पर बात करते हुए केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर ने थरूर की मौजूदगी में कहा था कि "इनका ट्विटर मेरी सौतन है।" जिस वक्त सुनंदा ने यह बात कही थी, यह कहते वक्त उन्हें भी अंदाज नहीं रहा होगा कि सोशल मीडिया की यही 'सौतन' एक दिन उनके जान की दुश्मन बन जाएगी। शुक्रवार की दोपहर बाद दिल्ली के पॉश इलाके चाणक्यपुरी के होटल लीला के कमरा नंबर 345 में सुनंदा की जान कैसे चली गई, यह तो अब विधिवत जांच पड़ताल के बाद ही पता चलेगा लेकिन शुरूआती तौर पर मनोचिकित्सक मान रहे हैं, भावनात्मक उद्वेग के गहरे आवेग ने उनकी जान ले ली। उनके ऊपर भावनात्मक उद्वेग का यह गहरा आवेग उसी ट्विटर के रास्ते आया था जिसे कभी उन्होंने अपनी सौतन कहा था। 

इसी हफ्ते पहली बार ट्विटर पर ही यह बात सबके सामने आई कि शशि थरूर की पत्नी सुनंदा थरूर ने अपने ही पति का ट्विटर एकाउण्ट हैक करके उल्टा सीधा बहुत कुछ लिख दिया था। यह सब इसलिए क्योंकि उन्हें लग रहा था कि उनके और उनके पति के बीच कोई तीसरा आ रहा है। यह तीसरा कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तान की एक अधेड़ पत्रकार मेहर तरार हैं जो कि लाहौर में रहती हैं। सुनंदा और शशि के बीच यह मेहर तरार भी ट्विटर के रास्ते ही उनकी दुनिया में दाखिल हुई थीं।

बात बिगड़ी, ट्विटरबाजी हुई, सुनंदा और मेहर दोनों ने मोर्चा संभाला और शशि पर अपना अपना दावा किया लेकिन जिस तरह से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुनंदा के शरीर पर नीले घाव के निशान बताये जा रहे हैं उससे लगता है कि कहीं न कहीं सुनंदा को लग रहा था कि प्यार के इस त्रिकोण में वे बाजी हार रही थीं। तो क्या शशि थरूर और सुनंदा के बीच हल्की झड़प, हाथापाई या मारपीट भी हुई थी? लगता तो है। क्योंकि अब तक टीवी मीडिया ने जितनी जांच पड़ताल की है उसमें इतना तो साफ हो गया है कि गुरूवार को सुंनदा ने अकेले ही होटल लीला में प्रवेश किया था। शशि थरूर बाद में कब आये पता नहीं। शुक्रवार की शाम कांग्रेस कार्यसमिति से खाली होकर शाम आठ से सवा आठ बजे के बीच जब थरूर होटल पहुंचे थे, तब उन्हें सुनंदा जीवित हाथ नहीं आई थीं।

होटल के कमरे से लेकर एम्स के पोस्टमार्टम रूम तक जो बातें उभरकर सामने आ रही हैं उससे हत्या जैसी बात तो कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं हो सकता। सवाल सिर्फ इतना हो सकता है कि आखिर सुनंदा की जान गई कैसे? क्या वे यह मान बैठी थीं कि अब शशि से उनका भावनात्मक संबंध खत्म हो जाएगा और उन्होंने आत्महत्या कर ली या फिर इस हारती बाजी का इतना गहरा सदमा उन्हें लगा कि सोते सोते ही वे इस दुनिया को अलविदा कह गईं? क्या सुनंदा पुष्कर का वह पुराना रोग फिर से उभर आया था जिसके कारण उन्होंने लोगों से बातचीत तक करना बंद कर दिया था? दूसरे पति सुजीत मेनन की मौत के बाद सुनंदा पुष्कर ने करीब तेरह साल अकेले रहते हुए बिताए थे। 2009 में शशि थरूर से दुबई में मुलाकात के पहले उनकी वीरान जिन्दगी कम्युनिकेशन डिसाआर्डर का शिकार हो चुकी थी।

सुनंदा पुष्कर की जिन्दगी एक नारी के संघर्ष की ऐसी कहानी है जो अपने दम पर दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहती है। मूलत: जमींदार कश्मीरी पंडित के परिवार में पैदा हुई सुनंदा पुष्कर भी उसी तरह यायावर हो गईं जैसे बाद के दिनों में अन्य कश्मीरी पंडित हुए। दिल्ली, दुबई और कनाडा में रहते हुए उन्होंने इवेन्ट मैनेजमेन्ट से लेकर विज्ञापन जगत तक सब जगह अपना भाग्य आजमाया। उनकी निजी जिन्दगी की त्रासद शुरूआत दिल्ली से होती है जब उनकी एक कश्मीरी पंडित संजय रैना से शादी हो जाती है। 1988 में दोनों अलग हो जाते हैं और सुनंदा अपनी आकांक्षाओं ओर अकेलेपन के साथ 1989 में दुबई चली जाती हैं। दुबई में वे दूसरी बार 1991 में केरल मूल के सतीश मेनन से शादी करती हैं और करीब छह साल साथ रहने के दौरान उन्हें एक बेटा भी होता है। दोनों मिलकर दुबई और भारत में इवेन्ट मैनेजमेन्ट का काम करते हैं लेकिन 1997 में दिल्ली में हुए एक सड़क हादसे में सतीश मेनन की मौत के बाद से सुनंदा की जिन्दगी फिर से वीरान हो जाती है।

करीब तेरह साल की वीरानी के बाद उसी दुबई में उनकी मुलाकात शशि थरूर से होती है जहां बीते साल मेहर तरार की थरूर से हुई मुलाकात के बाद दोनों के निजी जिन्दगी में हालात बहुत बदतर होते जाते हैं। 2009 में शशि थरूर से मुलाकात के साथ ही पहली बार सुनंदा पुष्कर भारत में चर्चित होती हैं। शशि थरूर तब तक भारत के लिए अपरिचित नाम नहीं रह गये थे और दोनों ही ऐसे खुले माहौल में जीवन जी रहे थे जहां प्यार समाज के डर से छिपाने या दबाने जैसी कोई वस्तु नहीं हुआ करती है। भारत जैसे प्रेम दमित देश में सुनंदा और शशि जल्द ही चटखारे के विषयवस्तु हो गये जिसे रोकने के लिए दोनों ने 2010 में शादी कर ली। जब तक यह सब होता शशि थरूर का मंत्रिपद छिन चुका था। हालांकि जल्द ही उन्हें मंत्रिपद वापस मिल गया लेकिन शायद थोड़े ही दिनों बाद दोनों की जिन्दगी में मेहर तरार का प्रवेश हो जाता है।

सुनंदा की मौत के बाद भले ही मेहर आश्चर्य प्रकट कर रही हों और ट्विटर पर आंसू बहा रही हों लेकिन अगर मनोवैज्ञानिक सही हैं तो संभावना इसी बात की ज्यादा है सुनंदा भावनात्मक रूप से इतना टूट गई थीं अपनी सांसों को जोड़कर नहीं रख पाईं। इसलिए सुनंदा की मौत पर पुलिसिया खोजबीन से ज्यादा जरूरी है उस बात पर भी बहस हो जो भारत की सबसे बड़ी समस्या समझा जाता है। सुनंदा या शशि थरूर कोई नौजवान नहीं थे कि उनके प्रेम को नादान कहकर किनारे रख दिया जाता। दोनों वयस्क थे और अपनी अपनी जिन्दगी का अधिकांश हिस्सा जी चुके थे। फिर भी, शायद उनमें जिन्दगी के प्रति ऐसी जिन्दादिली थी कि अधेड़ उम्र में एक नया जीवन शुरू करने की पहल की। पचास साल की उम्र में बुढ़ाकर घर बैठ जानेवाले देश को भले ही इसमें चटखारे लेने की चरम संभावना दिखाई देती हो लेकिन ऐसी पहल के पीछे छिपी पीड़ा का इलाज भी जरूरी है।

 सामाजिक रूप से भी। और निजी तौर पर भी। शशि थरूर अपनी निजी जिन्दगी में सुनंदा को कब तक और कितना बचाकर रखेंगे यह तो उनके विवेक पर निर्भर करता है लेकिन भावनात्मक रिश्तों को मजाक न बनाने की दिशा में भारतीय समाज एक कदम भी आगे बढ़ता हैं तो शायद यही सुनंदा पुष्कर को भावभीनी विदाई होगी।

राजनैतिक परिवर्तन आज और कल !

दिल्ली के चुनाव परिणामों के पश्चात दिल्ली में एक नई राजनैतिक व्यवस्था का सूत्रपात हुआ, जिसका सीधा असर न केवल दिल्ली की गद्दी पर आसीन श्रीमती शीला दीक्षित के राजनैतिक भविष्य पर पड़ा बल्कि दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष श्री विजय गोयल जी, पूर्व अध्यक्ष श्री विजेंद्र गुप्ता जी और दिल्ली में भाजपा के घोषित मुख्यमंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन जी का खेल भी बुरी तरह से बिगड़ गया। कांग्रेस जहाँ एक ओर किनारे पर आ लगी वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी को भी अपनी राजनैतिक सोच और दिशा को पुनर्निर्धारित करने के लिए मंथन करने की आवश्यकता आन पड़ी। जो भारतीय जनता पार्टी केवल और केवल कांग्रेस को अपना परंपरागत प्रतिद्वंद्वी मानती आई है उस भारतीय जनता पार्टी के लिए एक नया प्रतिद्वंद्वी आम आदमी पार्टी के रूप में उसे चुनौती देता हुआ उसके समक्ष खड़ा है। यही नहीं कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त जो अन्य दल हैं उनकी स्थिति भी कमोबेस इसी प्रकार की है। आज आम आदमी पार्टी अन्य सभी राजनैतिक दलों के लिए विकट समस्या बन चुकी है। आम आदमी का चेहरा बने श्री अरविंद केजरीवाल जी और उनके विचार आज बड़ों-बड़ों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। कम से कम दिल्ली को राजनैतिक पार्टी के रूप में एक ऐसी सरकार मिली है जिसका दृष्टिकोण लीक से हट कर है परंतु केवल दृष्टिकोण को कायम करना और उसे सफल बनाना दोनों अलग-अलग कार्य हैं। 

दिल्ली में बनी सरकार को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है इसलिए आम आदमी की सोच और उस सोच की सार्थकता की परीक्षा अभी होनी शेष है। दिल्ली की सफलता से आम आदमी की खुशी का ठिकाना नहीं है परंतु आम आदमी को यह भी याद रखना होगा कि अब वह आम आदमी नहीं रह गया है बल्कि अब आम से खास हो गया है। देश की जनता की उम्मीद ने उसे एकाएक खास व्यक्ति की, खास सरकार की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। अब स्वयं को आम आदमी कहने वाला यह उम्मीद बनाए हुए है कि अब वह व्यवस्था परिवर्तन करके अपने सारे कष्टों को दूर कर लेगा। दिल्ली सरकार के द्वारा हाल ही में दिल्ली सचिवालय के बाहर सड़क पर लगाया गया दिल्ली दरबार आम आदमी कि इसी उम्मीद का परिणाम है जिसके कारण दिल्ली के मुख्यमंत्री को दरबार बीच में छोड़कर जाना पड़ा। दिल्ली की इस खास जनता की आम आदमी की सरकार से बहुत-सी उम्मीद अभी शेष हैं जिन्हें पूरा करना दिल्ली के नव निर्वाचित मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के लिए एक चुनौती ही है। बिजली और पानी की समस्या के लिए भी दिल्ली आर्थिक सहायता लिए बिना स्थाई समाधान चाहती है। 

आर्थिक सहायता का दूरगामी परिणाम बहुत लाभदायक रहने वाला नहीं है। इसका कुप्रभाव दिल्ली को भुगतना ही पड़ेगा। इसलिए दिल्ली हर समस्या का निश्चित और स्थाई समाधान चाहती है और आम आदमी की सरकार की यह नैतिक ज़िम्मेदारी भी बनती हैं कि वह दिल्ली की समस्याओं का स्थाई और दूरगामी समाधान खोजे। अस्थाई समाधान किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता अपितु वह तो उस समस्या को भविष्य में और भी विकट रूप देने का कारण बनता है। आज देश और देश के आम आदमी की आर्थिक दुर्दशा इसी आर्थिक सहायता की प्रवृति और पद्धति का परिणाम है। आज आम आदमी पार्टी की सरकार के सामने सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती है ठिठुरती दिल्ली में रैन बसेरों में रहने वाले लोगों की। दिल्ली का तापमान 4 से 7 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है ऐसे में दिल्ली में रात गुजारने वाले लोगों के लिए बनाए गए रैन बसेरों की उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों का ध्यान देने की आवश्यकता है साथ ही यह भी सोचने की आवश्यकता है कि दिल्ली में जहाँ चारों और चकाचौंध दिखाई देती है वहाँ रैन बसेरों की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? इन रैन बसेरों में रहने वाले लोग कौन हैं? क्या उनका अपना घर-द्वार नहीं है यदि नहीं तो वे दिल्ली के किस गाँव या क्षेत्र से हैं? इसकी पहचान करके उन्हें स्थायी तौर से आवास उपलब्ध करने की व्यवस्था भी दिल्ली सरकार को अब करनी है। लोग बड़ी उम्मीद लगाए बैठे हैं।

 दिल्ली का एक बेहद खास तबका भी है जिसकी और कभी किसी का ध्यान नहीं जाता और वह तबका है मध्यम वर्गीय किरायदारों का तबका। जो दिल्ली में रोजी-रोटी के लिए आते हैं पर न तो झोपड़ पट्टी में रह पाते हैं और न ही वे अपना खुद का मकान दिल्ली जैसे महंगे शहर में बना पाते हैं कईयों की तो पूरी ज़िंदगी ही दिल्ली में किराए पर रहते बीत गई। अब मकान बनाना उनके लिए केवल एक सपना ही रह गया है। दिल्ली सरकार के द्वारा दी गई बिजली और पानी की छूट का लाभ भी इन लोगों को मिलने वाला नहीं है क्योंकि किराएदारी के कारण दिल्ली सरकार द्वारा दी जाने वाली छूट का लाभ मकान मालिक ले जाएगा केवल वहीं किरायेदार को इसका लाभ होगा जहाँ मकान मालिक स्वयं नहीं रहता है या केवल इकलौता परिवार एक मकान में किराए पर रहता है। दिल्ली सरकार को इस और भी ध्यान देने की जरूरत है और बहुत अधिक जरूरत है क्योंकि दिल्ली की आर्थिक संवृद्धि में इन लोगों का हिस्सा बहुत बड़ा है और बहुत महत्त्व का है। अन्य दलों ने अभी तक इन लोगों की ओर कभी कोई ध्यान ही नहीं दिया! अनधिकृत कालोनियों में रहने वालों को भी दिल्ली सरकार से बहुत सी उम्मीद हैं। दिल्ली का राजनैतिक परिवर्तन न केवल राजनैतिक पार्टियों के लिए खास है बल्कि परिवर्तन का कारण बनने वाली आम आदमी पार्टी के लिए भी यह परिवर्तन विशेष महत्त्व रखता है।

 सरकार का कहना है कि आम आदमी की जरूरतें बहुत छोटी-छोटी होती हैं और यह बात है भी सच, इसीलिए आम आदमी अपनी इन मूलभूत और अति आवश्यक छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करना चाहता है जिसकी खातिर आम आदमी पार्टी को दिल्ली की गद्दी सौंपी गई है। आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्ता स्वयं में आम आदमी होने का गौरव रखते हैं चाहे वे कितने ही खास क्यों न हों! फिर भी दिल्ली उन्हें आम आदमी के रूप में ही पहचानती है। दिल्ली का यह परिवर्तन यों ही नहीं हो गया! दिल्ली को आम आदमी पार्टी ने जो सुहाने सपने दिखाये थे दिल्ली उन सपनों को पूरा होते देखना चाहती हैं और वह भी बहुत जल्द। इसीलिए जनता दरबार बेहाल हो गया। दिल्ली की तर्ज पर ही अन्य राज्यों में भी लोगों की उम्मीदें जागी हैं। वे भी सस्ती बिजली और मुफ्त पानी तथा अन्य सुविधाओं को पाने की खातिर लालायित हो गए हैं और दिल्ली की इन सुविधाओं को ध्यान में रखकर ही वे आने वाले चुनावों में मतदान करेंगे। सभी पार्टियों को इस बात को जरूर मद्देनजर रखना चाहिए। दिल्ली का राजनैतिक परिवर्तन केवल दिल्ली में परिवर्तन नहीं कर रहा है अपितु दिल्ली के इस राजनैतिक परिवर्तन से देश में परिवर्तन का एक नया दौर शुरू होने वाला हैं। परंपरागत राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह से परिवर्तित होने की दिशा में अग्रसर हो रही है। 

2014 के चुनावों में इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देगा ही यह बताने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है। केंद्र में परिवर्तन भी अब विशेष महत्त्व रखता है। प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में अब एक नाम और जुड़ गया है और वह नाम होगा आम आदमी पार्टी से संसदीय दल के नेता का। अब समीकरण एक अलग दिशा ले रहे हैं। दिल्ली विधान सभा के विश्वास मत के अवसर पर श्री अरविंदर सिंह लवली जी ने जो चुटकी ले थी शायद वह सच हो जाए और श्री नरेंद्र मोदी जी का प्रधानमंत्री बनने का सपना केवल सपना ही न रह जाए। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए भरसक प्रयास किए जाएंगे। उत्तर प्रदेश का समीकरण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच विभाजित मतदाता का समीकरण है। कांग्रेस या भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में कोई खास करिश्मा करने वाली नहीं हैं केवल परंपरागत सीटों पर इनकी जीत निश्चित है। राजनीति के क्षेत्र में नव निर्मित आम आदमी पार्टी अवश्य ही नए समीकरण बना सकती हैं। फिर भी नरेंद्र मोदी को रोकने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन बनता नज़र आ रहा है। हाँ, इसमें आम आदमी पार्टी की भागीदारी भी गठबंधन को मजबूती प्रदान कर सकती है परंतु इन सब बातों का निर्णय चुनाव परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगा। 

इसी प्रकार बिहार में भी कांग्रेस, लालू प्रसाद, पासवान और नितीश कुमार के बीच गठबंधन के आसार हैं। मध्य प्रदेश, ओड़ीशा, गोवा, झारखंड, आंध्रा और तेलंगाना क्षेत्र में कांग्रेस का गठबंधन बनने का आसार है ही। इस प्रकार कुल मिलाकर कांग्रेस और सहयोगी दल नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में कामयाब हो सकते हैं। यदि कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाए तो इस पूरे खेल में एक बड़ा मोड़ आ सकता है। फिर भी आम आदमी पार्टी इस बार नि:सन्देह एक बड़ी भूमिका पूरे प्रकरण में अवश्य ही निभाएगी। इसलिए आम आदमी पार्टी और इस पार्टी के कार्यकर्ता अब आम नहीं रह गए हैं। इन्हीं सब कारणों से बड़े-बड़े नाम आम आदमी पार्टी के साथ अपना नाम जोड़ने को तैयार हो गए हैं। परंतु हमें इन सब बातों से परे वास्तविक आम आदमी के विषय में सोचना है कि इन सब परिवर्तनों से उसे क्या लाभ होने वाला है? हमें यह भी सोचना है कि इस नई राजनीति और व्यवस्था परिवर्तन से किसे और कितना लाभ मिलने वाला है। इस नई राजनैतिक नई व्यवस्था का औचित्य क्या होगा? 

क्या व्यवस्था परिवर्तन वास्तव में आम आदमी को नई दिशा प्रदान कर सकेगा या फिर केवल परिवर्तन मात्र रह जाएगा? देश के लोगों का कहना है कि आम आदमी की नई परिभाषा गढ़ने वाले दिल्ली के मुख्य सेवक नई व्यवस्था लाकर आम आदमी का कितना भला कर पाएंगे! श्री केजरीवाल जी और उनकी टीम के पास तब तक का ही समय है जब तक चुनाव आयोग की ओर से चुनाव की घोषणा जारी नहीं हो जाती। अधिसूचना जारी हो जाने के उपरांत केजरीवाल जी कोई विशेष कार्य नहीं कर पाएंगे इसीलिए समय रहते दिल्ली में समस्याओं का उचित निवारण अनिवार्य है। दिल्ली में किए गए कामों के आधार पर ही देश आम आदमी पार्टी का मूल्यांकन करेगा। परीक्षा जितनी कांग्रेस और भाजपा की है उससे कहीं ज्यादा आम आदमी पार्टी की हैं। यह और बात है कि इनके पास खोने को कुछ नहीं पाने को पूरा आकाश है। अब लोग देखना चाहते हैं कि है आम आदमी, आम आदमी पार्टी, आम आदमी की सोच और नई व्यवस्था परम्परागत राजनीति से कितनी हट कर हैं तभी इस परिवर्तन के औचित्य कि सार्थकता आम आदमी को समझ आ सकेगी।