13 April 2021

मध्यप्रदेश के उज्जैन में लव जिहाद

मध्यप्रदेश के उज्जैन में लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। यहां माहिद ने मोहित बनकर एक 15 साल की नाबालिग लड़की को फंसाया। उसके साथ दुष्कर्म किया और अपने दोस्तों से भी उसका रेप करवाया और गर्भवती होने पर उसे उसकी बहन के पास भेज दिया।

इस मामले में केस उज्जैन में रजिस्टर हुआ है, लेकिन जांच 3 राज्यों में होनी है। पीड़ित लड़की MP के बड़वानी की रहने वाली है। वह काम करने महाराष्ट्र के मालेगांव गई थी। यहां उसे UP के औरैया में रहने वाला माहिद मिला। माहिद ने पीड़ित को अपना नाम मोहित बताया और धोखा देकर दोस्ती कर ली। माहिद उसे अपने साथ मालेगांव से पुणे, दिल्ली और फिर औरैया ले गया। इस बीच उसके दोस्तों ने भी लड़की से दुष्कर्म करना शुरू कर दिया। नाबालिग ने बच्चे को जन्म दिया, बाद में मौत

नाबालिग के गर्भवती होने के बाद माहिद ने उसे बस में बैठाकर उसकी बहन के पास उज्जैन भेज दिया। यहां लड़की ने एक दिव्यांग बच्चे को जन्म दिया, जिसकी बाद में मौत हो गई। ASI रशीद खान ने बताया कि मामले की जांच की जा रही है। मामला कई शहरों से जुड़ा हुआ है, इसलिए शून्य पर केस दर्ज कर इसे बड़वानी ट्रांसफर किया जा रहा है।

नाबालिग की बहन ने उसे उज्जैन के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। यहां पीड़ित के बगल में एक लड़की एडमिट थी। नाबालिग ने उसे पूरी दास्तान सुनाई। उस लड़की का परिचित हिंदू जागरण मंच में था। लड़की ने उसे घटना के बारे में बताकर मदद मांगी। हिंदू जागरण मंच के लोगों ने पीड़ित को विश्वास में लिया। पीड़ित ने माहिद को फोन कर उज्जैन बुलाया और देवास गेट पुलिस के हवाले कर दिया।

मंदिर में कंडोम रखने वाले जिहादी की मौत

कर्नाटक के मंगलुरू में स्वामी कोरगज्जा को लेकर स्थानीयों के मन में असीम आस्था है. लोग उन्हें भगवान शिव का अवतार मानते हैं. मगर जिहादियों ने अपने हदों को पार करते हुए एक घिनौना हरकतें कर दी. पिछले दिनों कोरगज्जा के मंदिर में कई अभद्र घटनाएँ हुईं. मंदिर की दानपेटी में कंडोम तक डाल दिया गया.

ऐसे घृणित वाकये के बावजूद पुलिस आरोपितों को ढूँढने में असमर्थ थी. निराश श्रद्धालु लगातार कोरगज्जा भगवान से ऐसे विधर्मियों को सजा देने के लिए प्रार्थना कर रहे थे. कुछ दिन पहले भगवान ने अपने श्रद्धालुओं की सुनी और ऐसी स्थिति पैदा हो गई कि विधर्मी स्वयं मंदिर में आकर माफी माँगने लगे.

इसी साल जनवरी में मंदिर की दानपेटी से एक कंडोम निकला था, जिसके बाद से वहाँ हड़कंप था. लेकिन तीन दिन पहले अचानक दूसरे समुदाय के दो लड़के मंदिर में आए और पुजारी के सामने माफी के लिए गिड़गिड़ाने लगे. पहले पुजारी को लगा कि वह मजाक कर रहे हैं. दोनों ने पुजारी को बताया कि अपने साथी नवाज के साथ मिल कर उन्होंने ही कुछ दिन पहले मंदिर की दानपेटी में कंडोम डाला था.

नवाज माफी माँगने के लिए जिंदा नहीं था. दानपेटी में कंडोम डालने के बाद उसे एक दिन खून की उल्टियाँ हुईं और फिर पेचिश से उसके मल से खून निकला. अंत में वह अपने घर की दीवारों पर सिर मारते हुए मर गया. लेकिन वक्त बीतने के साथ रहीम को भी खून की उल्टियाँ शुरू हो गई हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे नवाज को हुई थी. उसके बाद दोनों अपनी जान जाने के डर से घबराकर पुजारी की शरण में जाकर माफी की भीख माँग करने लगे. भगवान के सामने खड़े होकर दोनों ने सब स्वीकार कर लिया और दया की भीख माँगने लगे.

 दोनों को हिरासत में ले लिया गया है. दोनों अब भी डरे हुए हैं. मीडिया से बात करते हुए पुलिस ने भी कहा कि ये एक रहस्यमयी केस था. आरोपितों के जुर्म कबूलने के बाद सबूत जुटाने की कोशिश हो रही है. हालाँकि, कृत्य के पीछे का उद्देश्य साफ नहीं हो पाया है. जाँच चल रही है. अभी तक की जाँच में आरोपितों ने बताया कि उन्होंने 3 जगह ऐसा किया था.

मौलवी ने 14 वर्ष की हिन्दू नाबालिग के साथ मस्जिद में किया बलात्कार

राजस्थान के भिवाड़ी से बलात्कार का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, एक मौलवी ने 14 वर्ष की नाबालिग के साथ मस्जिद में बलात्कार करने के बाद लड़की को कुएं में फेंककर फरार हो गया, आरोप है कि भिवाड़ी गाँव की एक मस्जिद में मौलवी ने 14 साल की नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया और फिर उसे एक कुएं में धकेल कर फरार हो गया। घटना के 7 दिन बाद, पीड़ित लड़की के परिवार ने पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, पुलिस ने एफआईआर दर्ज मामलें की जांच शुरू कर दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भिवाड़ी के सीओ हरिराम कुमावत ने जानकारी दी है कि गांव के ही एक व्यक्ति ने मौलवी जफरू के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। वह मूल रूप से हरियाणा के पुन्हाना इलाके के बिसरू गांव का रहना वाला हैं। वह अलवर में परिवार के साथ रहता था। पीड़िता की ओर से दर्ज कराइ गई शिकायत में कहा गया है कि 1 अप्रैल 2021 की रात को मौलवी उसकी 14 साल की बेटी को घर से मस्जिद में ले गया। और वहां बलात्कार किया।

दोपहर करीब 3:30 बजे, जब लड़की के परिवार वाले उसकी तलाश में पहुंचे, तो आरोपी ने पीड़ित को एक कुएं में धकेल दिया। लड़की ने कुएं में गिरने के बाद शोर मचाना शुरू किया, जिसके बाद आसपास के ग्रामीण वहां जमा हो गए और कुछ देर बाद किसी तरह उसे कुएं से बाहर निकाला। पीड़ित के पिता एक ट्रक ड्राइवर हैं। पिता ने कहा कि वह घटना के समय घर पर नहीं था और किसी काम से बाहर गया था। उसके लौटने के बाद, परिवार ने उसे घटना से अवगत कराया, इसलिए रिपोर्ट दर्ज करने में एक सप्ताह लग गया।

बंगाल में जिहादी लिंचिंग एसएचओ की पीट-पीटकर हत्या

बंगाल में जिहादी आतंक किस कदर बढ़ गई है इसका सबसे खौफनाक हालात देखने को मिला है. बिहार के किशनगंज जिले के टाउन थाने के एसएचओ की पश्चिम बंगाल में पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी. जी हाँ आपने बिल्कुल सही सुना एसएचओ की पीट-पीट कर हत्या. किशनगंज टाउन थाने के एसएचओ अश्विनी कुमार अपनी टीम के साथ बंगाल सीमा के पास बाइक चुराने वाले गैंग के एक ठिकाने पर उन्हें दबोचने के लिए पहुंचे थे.

इसी दौरान मुस्लिम अपराधियों ने पहले उनसे झगड़ा किया. फिर उन पर हमला कर उनकी हत्या कर दी सूचना पाकर आईजी समेत कई बड़े पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और मृतक एसएचओ अश्विनी के शव को पोस्टमार्टम के लिए इस्लामपुर अस्पताल भेजा दिया.

बिहार पुलिस ने जब पूरे मामले की पड़ताल की तो पता चला की पुलिस के सभी हत्यारे मुस्लिम समुदाय से हैं. ऐसे साफ होजाता है की बंगाल में जिहादी आतंक अपने चरम सीमा पर है. और ये सब कुछ ममता राज में सत्ता के संरक्षण में चल रहा है. पुलिस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष मृत्युंजय कुमार सिंह ने पश्चिम बंगाल में सरकार और क़ानून ध्वस्त होजाने का आरोप लगया है. उन्होंने कहा, बंगाल में कानून कैद हैं. बंगाल में पुलिस वर्दी का कोई वजूद नहीं है. भारत सरकर का गृह मंत्रालय मामले को संज्ञान लेकर उचित करवाई करे."

इधर बेटे के मौत की सदमा उनकी मां उर्मिला देवी बर्दाश्‍त नहीं कर पाईं. रविवार की सुबह हृदयाघात से उनकी भी मौत हो गई. शनिवार की देर रात उन्हें इस घटना की सूचना मिली, इसके बाद रविवार की सुबह उनकी मौत हो गई. पूरे गावं में गुस्से और गम का माहौल है. परिवार शोकाकुल होकर न्याय की मांग कर रहा है.

सरकारी सिस्टम की लेटलतीफी 69 साल बाद मिली पेंशन

सरकारी सिस्टम की लेटलतीफी का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि एक महिला को पति की मौत के 69 साल बाद पेंशन मिली है. मात्र 12 साल में ब्याही परूली देवी के पति की मौत भारतीय सेना में ड्यूटी के दौरान 1952 में हो गई थी. लेकिन पेंशन 2021 में स्वीकृत हुई है. परूली देवी की शादी 10 मार्च 1951 को देवलथल तहसील के लोहाकोट निवासी सैनिक गगन सिंह के साथ हुई थी. दुर्भाग्य से 14 मई को गगन सिंह की गोली लगने से ड्यूटी के दौरान ही मौत हो गई थी. पति के मौत के बाद कुछ समय परूली देवी ने ससुराल में ही गुजारा. लेकिन फिर वे मुख्यालय के करीब लिंठ्यूडा स्थित अपने मायके आ गईं.

पूरी जिंदगी परूली देवी ने अपने मायके में ही गुजार डाली. मायके पक्ष के लोगों ने परूली देवी का पालन-पोषण किया. इस दौरान न तो परूली देवी को पेंशन की कोई जानकारी मिली और नही भारतीय सेना ने उनकी कोई सुध ली. आखिरकार लम्बे समय बाद लोगों की पेंशन मामलों में मदद करने के लिए चर्चित रिटायर्ड उपकोषाधिकारी डीएस भंडारी ने परूली देवी की पेंशन के लिए कोशिशें की तो उनकी मेहनत रंग लाई.

'प्रधान नियंत्रक रक्षा लेखा पेंशन प्रयागराज' से परूली देवी की पारिवारिक पेंशन स्वीकृत हुई है. रिटायर्ड उपकोषाधिकारी डीएस भंडारी का कहना है कि परूली देवी 1977 से 44 साल की पेंशन का एरियर 20 लाख के करीब मिलेगा. परूली देवी कहतीं हैं कि उन्हें मायके में कभी कोई कमी नहीं हुई. ऐसे में इस धनराशि के असल हकदार उनके मायके के लोग ही हैं. मायके वालों ने उनका जिंदगी भर पालन-पोषण किया है. परूली देवी के भाई के बेटे प्रवीण लुंठी इस बात से ही खुश है कि उनकी बुआ की पेंशन 69 साल बाद मिल रही है. लेकिन वे इस बात से भी थोड़ा आहत हैं कि सेना ने इतने लंबे समय तक भी पेंशन की हकदार होने के बाद भी उन्हें पेंशन देने की पहल नहीं की.

दुनिया भर के देशों में अपना-अपना नव वर्ष

दुनिया भर के देश अपना अपना नव वर्ष मानते हैं. सभी का अपना समय और उसका महत्व है. ऐसे में भारत का हिन्दू नववर्ष भी अपने आप में एक महान सनातन परंपरा का हिस्सा है जिसे मना कर हम सब को गर्व महसूस करना चाहिए. चीनी नव वर्ष हर साल जनवरी 21 और फरवरी 20 के बीच अलग-अलग तारीखों पर मनाता है. कोरियाई लोगों का कैलेंडर भी चंद्र के आधार पर सेलून वर्ष के पहले दिन नए साल के रूप में सल्लल नाम का त्योहार मनाते हैं, जो कि 5 फरवरी को मनाया जाता है. रूस, मैसेडोनिया, सर्बिया और यूक्रेन के लोग जूलियन को मानते हैं जो कि 14 जनवरी को बदलता है. इसलिए इसदिन यहां पर नव वर्ष मनाया जाता है. ऑस्ट्रेलिया के मूल लोग ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 30 अक्टूबर को नया साल मनाते है.

श्रीलंका के सिंहली अप्रैल के मध्य में नया वर्ष मनाते हैं. इसी तरह कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड और म्यांमार के लोग भी अप्रैल के मध्यह में उनका नववर्ष प्रारंभ होता है. इथियोपिया में 12 सितंबर को नया साल मनाया जाता है. इराक, सीरिया, तुर्की और ईरान में कुच लोग 1 अप्रैल को नया साल मनाते हैं. अफगानिस्तान में ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 21 मार्च को नया वर्ष मनाते हैं. इंडोनेशिया में 7 मार्च को बालिनी नव वर्ष मनाया जाता है. मंगोलिया में नया साल 16 फरवरी को मनाया जाता है.

जीवन मंत्र डेस्क. नया साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक शुरू होगा इसे अंग्रेज अपनी संस्कृति और जीवन का हिस्सा मानते हैं. चूंकि, ब्रिटिश साम्राज्य ने लगभग हर जगह राज किया, इसलिए दुनिया में सबसे ज्यादा मान्यता ग्रेगोरियन कैलेंडर की ही है. लेकिन हर देश और संस्कृति की अपनी एक अलग कालगणना और अपना अलग कैलेंडर है. एक आंकड़े के मुताबिक, दुनियाभर में 96 तरह के कैलेंडर हैं. अकेले भारत में 36 कैलेंडर या पंचांग हैं. इनमें से 12 आज भी चलन में हैं. 24 चलन से बाहर हो चुके हैं. दुनिया में जितने कैलेंडर इस समय चलन में हैं, इनमें से ज्यादातर के नए साल की शुरुआत फरवरी से अप्रैल के बीच होती है.


              दुनियाभर के देशों का अपना-अपना नव वर्ष 

 

01. चीनी हर साल नव वर्ष 21 जनवरी और 20 फरवरी के बीच नववर्ष मनाते हैं.

02. कोरियाई 5 फरवरी को अपना नव वर्ष सेलून वर्ष नए साल के रूप में मनाते हैं

03. रूस, मैसेडोनिया, सर्बिया और यूक्रेन के लोग 14 जनवरी को नव वर्ष मनाते हैं

04. ऑस्ट्रेलिया के लोग ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 30 अक्टूबर को नया साल मनाते हैं

05. श्रीलंका के सिंहली अप्रैल के मध्य में नया वर्ष मनाते हैं.

06. कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड और म्यांमार के लोग भी अप्रैल के मध्य में नववर्ष मनाते हैं.

07. इथियोपिया में 12 सितंबर को नया साल मनाया जाता है.

08. इराक, सीरिया, तुर्की और ईरान में कुच लोग 1 अप्रैल को नया साल मनाते हैं

09. अफगानिस्तान में ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 21 मार्च को नया वर्ष मनाया जाता है

10. इंडोनेशिया में 7 मार्च को बालिनी नव वर्ष मनाया जाता है

11. मंगोलिया में नया साल 16 फरवरी को मनाया जाता है

घरों व मंदिरों में त्रिशूल लगाने की वैज्ञानिक महत्व

आपने मंदिरों के बहुत दर्शन किये होंगे मगर क्या आप जानते हैं की मंदिरों में त्रिशूल को क्यों लगाया जाता है. तो चलिए इससे जुड़ी हुई कुछ वैज्ञानिक और अध्यात्मिक महत्व को हम आज बता रहे हैं. भोले शंकर का त्रिशूल घर के मंदिर में रखने से बुराई का नाश होता है इस लिए मंदिर में उनका त्रिशूल अवशय रखे जाते हैं. आप के घर की नकारातमक शक्तिया पूरी तरह खत्म हो जाएंगी अगर आप भी अपने घरों में त्रिशूल स्थापित करते हैं तो. त्रिशूल भगवान शिव का अस्त्र है. इसे घर में स्थापित करने से बुरी शक्तियों का नाश होता है.


त्रिशूल चांदी या तांबे के होने के कारण इसमें बहुत से रोग नाशक शक्ति मौजूत होता है जो आपको कई तरह के लाभ पहुंचाता है. साथ ही ऊँची मंदिरों पर इसको लगाने से आकाशीय बिजली को रोकने में मदद मिलती है. इसलिए लिए ऊँची घरों और इमारतों में नुकीले नुमा त्त्रिशूल की तरह यन्त्र लगाया जाता है. जिसे हमारे ऋषि मुनियों ने करोड़ों साल पहले ही समझ लिया था.


हिंदू धर्म में त्रिशूल का बहुत महत्व है, यह लगभग सभी देवताओं के हाथ में है लेकिन इस महत्व तब और भी अधिक है जब इसे भगवान शिव या देवी द्वारा धारण किया जाता है. अब त्रिशूल को हमारी संस्कृति में इतना महत्व क्यों दिया गया है इसका बहुत गहरा अर्थ है. त्रिशूल बहुपत्नी और प्रकृति से समृद्ध है. कई संबंधित जहर का मुकाबला करने या एक सूक्ष्मजीव के कई अलग-अलग उपभेदों के खिलाफ प्रतिरक्षा देने में त्रिशूल परिपूर्ण है. यह आध्यात्मिक स्तर पर समृद्ध बनाने में मदद करता है.


तीन बिंदु निर्माण, संरक्षण और विनाश के कृत्यों का प्रतिनिधित्व करता हैं. भगवान शिव इन तीनों भूमिकाओं को पूरा करते हैं. तीन बिंदु तीन गुणों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भौतिक दुनिया, राजस (गतिशील ऊर्जावान), तमस (नकारात्मक, निष्क्रिय, स्थिर) और सत्त्व (उत्थान, संतुलित, विचारशील) में प्रदर्शित होते हैं. आमतौर पर त्रिशूल का हैंडल पकड़े हुए देखा जाता है, क्योंकि वह तीनों बिंदुओं से परे हैं. त्रिशूल में हमारे कई अलग-अलग नकारात्मक गुणों को हटाने की क्षमता भी है जो हमें आत्मा के साथ एक होने से रोकती है.



तो यह कहा जाता है कि त्रिशुला हमें आध्यात्मिक स्तर पर अमीर बनाने में मदद करता है. योग में, त्रिशूल सूक्ष्म शरीर के भीतर नाड़ियों या ऊर्जा धाराओं का भी प्रतिनिधित्व करता है। आईडीए (स्त्री, निष्क्रिय) और पिंगला (पुरुष, सक्रिय) चैनल जो एक डबल हेलिक्स की तरह ऊपर की ओर सर्पिल होते हैं, विशुद्धि या गले के चक्र में आखिरी बार पार करते हैं. इन्हें सामान्य रूप से सांप के रूप में दर्शाया जाता है.



केंद्रीय चैनल या सुषुम्ना नाड़ी सीधे रीढ़ तक जाती है, ताज चक्र के माध्यम से जारी रहती है जहां अन्य दो चैनल समाप्त हो जाते हैं. इस क्षेत्र के चैनल त्रिशूल जैसी आकृति बनाते हैं. हिंदू धर्म में, त्रिशूल प्रतीक शुभता का प्रतिनिधित्व करता है. इस प्रकार हमें आत्मा के संरक्षण में रहते हुए आनंद की जीवन जीने में मदद करना।

मंदिरों की गुंबद पर लगे कलश की अध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

मंदिर की गुंबद देखते हीं मन में एक सुविचार उत्पन्न होता है कि आखिर इसके ऊपर कलश को क्यों स्थापित किया जाता है. इसके अनेकों लाभ और खूबियां हैं. उज्जैन के धर्म विज्ञान शोध संस्था:न के निदेशक डॉ जेजे सर ने वैज्ञानिक शोध के आधार पर बताया है की इसको देखने से मन को शांति मिलती है. दुनिया की थकान जब चूर कर देती है तब हम सब भगवान के दर पर जाते है. जहाँ से फिर से जीने की एक ऊर्जा मिल जाती है. मंदिरों पर स्थापित किये गए कलश एक अदृश्य शक्ति को प्रदान करता है. मन के साथ तन को भी करोड़ों तरंगों से झंकृत करता है. देव प्रतिमाओं की विशेष स्थातपना के अलावा मंदिर के कलश और गुंबद विशेष ऊर्जा देने वाले होते हैं.


मंदिर में कलश विधि पूर्वक स्थादपना के बाद ही लगते हैं. जब कोई मंदिर में आकर प्रतिदिन मंत्र जाप करता है या नाद का स्विर करता है तो उस मंत्र शक्ति का लगातार घर्षण होता है. उससे कलश और गुंबद के अंदर घूम घूमकर मंत्रशक्ति की एक ऊर्जा बनती है। जो ऊर्जा संबंधित व्यक्ति जो मंत्र कर रहा है उस पर सीधा प्रहार करके उसका उपचार करती है. इसके आलावा जो उसके आसपास किसी तरह की कोई नकारात्म शक्ति होती है वो कलश के द्वारा समाप्तज हो जाती है.


 मंदिर के कलश में चक्र हो होते हैं जोकि सात, तीन, दो, एक चक्र होते हैं. ये चक्र अलग- अलग ऊर्जाओं के लिए होते हैं. जैसे जो कठिन मंत्र होते हैं उनके अनुसार अलग ऊर्जा मिलती है. मंदिर की स्थापना अलग अलग राज्यों में अलग अलग प्रकार की होती है. जैसे उत्तिर भारत के मंदिरों की बनावट अलग और दक्षिण के मंदिरों की अलग होती है.


हर स्थान पर मंत्र अलग- अलग स्वर के साथ गूंजते हैं और गूंजने के बाद एक माइक्रो पावर बनता है जोकि शरीर के आकर्षण के लिए लाभदायक होता है. माइक्रो पावर गुंबद या कलश के चक्र में जाकर सीधा नीचे की ओर चलता है और शरीर पर सीधा अपना प्रभाव छोड़ता है. मंदिर में मंत्र के उच्चारण और कलश के चक्र से मिलने वाली ऊर्जा जाप करने वाले व्याक्ति के साथ उसके परिवार को भी मिलती है. ये ऊर्जा जींस के द्वारा उसके परिवार को लाभांवित करती है. परिवार में कोई भी परेशानी हो वो दूर होती है.


कलश चांदी और सोने के होते हैं. सूर्य से पृथ्वीर पर पराबैंगनी किरणों के साथ अन्यस विभिन्नश ऊर्जावान किरणें भी गिरती हैं लेकिन पृथ्वील पर सिर्फ .0 फीसद ही रुक पाती हैं. बाकि सब वापस चली जाती हैं. 


लेकिन कलश के व्यूह में जब ‍किरणें पड़ती हैं तो विद्युत ऊर्जाचक्र बनकर शरीर को शक्ति प्रदान करने के लिए फिर से कोमल ऊर्जा के रूप में मंदिर में प्रवेश कर जाती हैं. इस प्रवेश के कारण व्यक्ति जिस कार्य को लेकर मंत्र, आरती, प्रार्थना या प्रणाम करता हैं उसे इष्टक जल्दी स्वीकार कर लेते हैं. 

घरों-मंदिरों पर भगवा ध्वज लगाने की अध्यात्मिक और वैज्ञानिक लाभ

भारत की सनातन संस्कृति में प्रतीक चिन्हों का सबसे ज्यादा महत्व है. प्रतीक चिन्हों में सबसे महत्वपूर्ण होते हैं ध्वज और पताका. पताका त्रिकोणाकार होती है जबकि ध्वज चतुष्कोणीय होता है. प्राचीन काल में प्रत्येक घर के ऊपर ध्वज लगाने की परंपरा रही है, लेकिन अब यह परंपरा केवल मंदिरों तक सिमटकर रह गई है. हमारे ऋषि मनीषियों ने कोई भी परंपरा यूं ही नहीं बनाई, उसके पीछे एक रहस्य, तर्क और विज्ञान छुपा हुआ है, ध्वजा लगाने के अपने नियम और लाभ होते हैं.


भगवा ध्वज हिंदू परंपरा में भगवा ध्वज लगाने का महत्व है. दरअसल भगवा, केसरिया या सिंदूरी रंग ऊर्जा, शौर्य, आध्यात्मिकता, सात्विकता का प्रतीक है. इसमें सूर्य का तेज समाया हुआ है. महाभारत के युद्ध में भी अर्जुन के रथ पर भगवान कृष्ण ने केसरिया ध्वज लगवाया था, जिस पर प्रतीक के रूप में हनुमानजी का चित्र अंकित था. वेद, उपनिषद, पुराण श्रुति भी ध्वज का महत्व बताते हैं. 



संतगण इसकी ओंकार, निराकार या साकार की तरह पूजा अर्चना करते हैं। यही कारण है कि देवस्थानों पर सिंदूरी रंग के ध्वज का ही प्रयोग होता है. किसी भी शुभ कार्य में ध्वज लगाने की परंपरा भी रही है. चाहे गृह प्रवेश हो, पाणिग्रहण संस्कार हो या अन्य कोई हिंदू रीति-रिवाज, पूजा पर्व, उत्सव हो घर के शिखर पर ध्वजा फहराई जाती है. ध्वजा का महत्व केवल हिंदू पूजा पद्धति में ही नहीं है, बल्कि यह वास्तु दोष दूर करके घर को नकारात्मक शक्तियों से बचाने का कार्य भी करता है.


यदि घर की छत पर केसरिया ध्वजा लगाई जाए तो बुरे ग्रहों के दोष समाप्त हो जाते हैं। विजय का प्रतीक है ध्वज ध्वजा को सकारात्मकता और विजय का प्रतीक माना गया है। इसीलिए प्राचीनकाल से युद्ध के बाद विजय पताका फहराने की परंपरा रही है। वास्तु के अनुसार ध्वजा को शुभता का प्रतीक माना गया है। घर की छत पर ध्वजा लगाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है.


घर बुरी नजर से बचा रहता है. घर के उत्तर-पश्चिम कोने में यदि ध्वजा लगाई जाए तो यह वास्तु की दृष्टि से अत्यंत शुभ होता है इससे उत्तर-पश्चिम दिशा से संबंधित समस्त वास्तु दोष दूर हो जाते हैं. इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता घर के भीतर उत्तर-पूर्व दिशा में केसरिया ध्वज लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और रोगों से मुक्ति मिलती है. भगवा ध्वज हिन्दू संस्कृति और धर्म का शाश्वत प्रतीक है. 


यही श्रीराम, श्रीकृष्ण और अर्जुन के रथों पर फहराया जाता था और छत्रपति शिवाजी सहित सभी मराठों की सेनाओं का भी यही ध्वज था. यह धर्म, समृद्धि, विकास, अस्मिता, ज्ञान और विशिष्टता का प्रतीक है. इन अनेक गुणों से सम्मिलित है अपना यह भगवा ध्वज.

माथे पर तिलक लगाने की अध्यात्मिक और वैज्ञानिक लाभ

भारतीय संस्कृति में तिलक लगाने की परंपरा अति प्राचीन है. युगों-युगों से अपने देश में ये परम्परा लोग आज भी निभा रहे हैं. किसी के माथे पर तिलक लगा देखकर मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है तो आज हम आपको बताते है इसका वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व. इसके पीछे वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ है. तो आइए जानते हैं आखिर क्या है वो कारण ? मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है.

माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है इसलिए मध्य में तिलक लगाया जाता है. तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है. माथे पर तिलक लगाने के पीछे मनोवैज्ञानिक कराण यह है कि, इससे व्यक्त‍ि के आत्मविश्वास और आत्मबल में भरपूर इजाफा होता है. माथे के बीच पर जब भी आप तिलक लगाते हैं उससे लोग शांति व सुकून अनुभव करते हैं. यह कई तरह की मानसिक बीमारियों से भी हमें बचाता है. साथ ही तिलक लगाने से मानसिक उत्तेजना पर भी आप काफी हद तक नियंत्रण कर पाते हैं.


अगर आप हर दिन चंदन का तिलक अपने माथे पर लगाते हैं तो दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे उदासी दूर होती है और मन में उत्साह जगता है. यह उत्साह मनुष्य को अच्छे कामों में लगाता है. साथ ही इससे तनाव कम होता है और सिरदर्द की समस्या में कमी आती है.


धार्मिक मान्यता के अनुसार, चंदन का तिलक लगाने से मनुष्य के पापों का नाश होता है. लोग कई तरह के संकट से बच जाते हैं. ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक, तिलक लगाने से ग्रह शांत रहते हैं. अगर आप हल्दी से तिलक करते हैं तो आपकी त्वचा शुद्ध होगी क्योंकि हल्दी में एंटी बैक्ट्र‍ियल तत्व होते हैं जो रोगों से मुक्त करता है. 


चंदन का तिलक लगाने वाले घर में अन्न-धन पर्याप्त मात्रा में रहते हैं और सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है. साथ ही इससे शांति भी मिलती है.

हिन्दू नववर्ष की प्राचीन एवं ऐतिहासिक महत्व

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन ही परम पिता परमात्मा ने यौवनावस्था प्राप्त मानव की प्रथम पीढ़ी को इस पृथ्वी माता के गर्भ से जन्म दिया था. इस कारण यह मानव सृष्टि संवत्  भी है. इसी दिन परमात्मा ने अग्नि वायु आदित्य अंगिरा चार ऋषियों को समस्त ज्ञान विज्ञान का मूल रूप में संदेश क्रमशः ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेद के रूप में दिया था. इस कारण इस वर्ष को ही वेद संवत् भी कहते हैं. आज के दिन ही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर विजय प्राप्त कर वैदिक धर्म की ध्वजा फहराई थी.


आज ही से कली संवत् तथा भारतीय विक्रम संवत् युधिष्ठिर संवत् प्रारंभ होता है. आज ही के शुभ दिन संसार के समस्त सनातन धर्म अनुयायियों का दैविक बल जगाने के लिए धर्मराज्यम् की स्थापना की गयी थी. इन सब कारणों से यह संवत् केवल भारतीय या किसी पंथ विशेष के मानने वालों का नहीं अपितु संपूर्ण विश्व मानवों के लिए है.


भारतवर्ष में इस समय देशी-विदेशी मूल के अनेक सम्वतों का प्रचलन है. किन्तु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की द्दष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय सम्वत यदि कोई है तो वह विक्रम सम्वत ही है. आज से 2072 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था. 


उसी विजय की स्मृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से विक्रम सम्वत का भी आरम्भ हुआ था. प्राचीनकाल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था. 


राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया सम्वत चलाया. भारतीय कालगणना के अनुसार वसन्त ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीनकाल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है. वसन्त ऋतु में आने वाले वासन्तिक नवरात्र का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्यतिथि से होता है.


विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर सम्वत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवन्दन करता है.

हिन्दू नव वर्ष का अध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

आओ अपना नव वर्ष मनाएं, जी हैं अपना नव वर्ष क्योंकी इसमें अपनापन है, वैज्ञानिकता है और अपनी राष्ट्र-धर्म की महान पहचान व स्वाभिमान है. राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाने वाला यह पुण्य दिवस हिंदू नव वर्ष चैत्र मास की प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है. इस दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरूआत होती है. देश के अलग-अलग हिस्से में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. महारष्ट्र में इस दिन को गुड़ी पड़वा कहा जाता है तो वहीँ दक्षिण भारत में इसे उगादि के नाम से जाना जाता है. 


विक्रम संवत को नव संवत्सर भी कहा जाता है. संवत्सर 5 प्रकार का होता है जिसमें सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास आते हैं.  विद्वानों का मत है कि भारत में विक्रमी संवत से भी पहले लगभग 700 ई.पू. हिंदुओं का प्राचीन सप्तर्षि संवत अस्तित्व में आ चुका था. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष प्रारंभ होता है. इसी दिन सूर्योदय के साथ सृष्टि का प्रारंभ परमात्मा ने किया था. अर्थात् इस दिन सृष्टि प्रारंभ हुई थी तब से यह गणना चली आ रही है.


यह हिन्दू नववर्ष संपूर्ण मानव जाति का नववर्ष है. यह दिन विशुद्ध रुप से भौगोलिक पर्व है. क्योकि प्राकृतिक दृष्टि से भी वृक्ष वनस्पति फूल पत्तियों में भी नयापन दिखाई देता है. वृक्षों में नई-नई कोपलें आती हैं. वसंत ऋतु का वर्चस्व चारों ओर दिखाई देता है. मनुष्य के शरीर में नया रक्त बनता है. हर जगह परिवर्तन एवं नयापन दिखाई पडता है. 


रवि की नई फसल घर में आने से कृषक के साथ संपूर्ण समाज प्रसन्नचित होता है. वैश्य व्यापारी वर्ग का भी इकोनॉमिक दृष्टि से मार्च महीना समापन माना जाता है. इससे यह पता चलता है कि जनवरी साल का पहला महीना नहीं है पहला महीना तो चैत्र है जो लगभग मार्च-अप्रैल में पड़ता है. 


चैत्र माह में नई ऋतु, नई फसल, नई पवन, नई खुशबू, नई चेतना, नया रक्त, नई उमंग, नया खाता, नया संवत्सर, नया माह, नया दिन हर जगह नवीनता नज़र आती है. यह नवीनता हमें नई उर्जा प्रदान करती है. नव वर्ष को शास्त्रीय भाषा में नवसंवत्सर (संवत्सरेष्टि) कहते हैं. 



इस समय सूर्य मेष राशि से गुजरता है इसलिए इसे "मेष संक्रांति" भी कहते हैं. प्राचीन काल में नव-वर्ष को वर्ष के सबसे बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता था. यह रीत आजकल भी दिखाई देती है जैसे बंगाल में पइला पहला वैशाख और गुजरात आदि अनेक प्रांतों में इसके विभिन्न रूप हैं.

सपा राज में पूर्व डिप्टी एसपी शैलेन्द्र सिंह को कैसे फंसाया गया रिपोर्ट

शैलेन्द्र सिंह एक ऐसा नाम जिसने माफिया मुख़्तार अंसारी को सलाखे के पीछे पहुंचा दिया. 17 साल पहले माफिया मुख्तार अंसारी पर ऐक्शन लेने के बाद डीएसपी शैलेंद्र सिंह चर्चा में आए थे. उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सियासत में उतरे. अब योगी सरकार ने उनके खिलाफ दर्ज मुकदमे में राहत दी है. मुख्तार अंसारी पर कार्रवाई को लेकर 17 साल पहले सुर्खियों में आए पुलिस अधिकारी शैलेंद्र कुमार सिंह का मामला एक फिर चर्चा में है.


योगी सरकार की तरफ से 20 दिसंबर 2017 को शैलेंद्र सिंह के खिलाफ मुकदमा हटाने के संबंध में प्रस्ताव तैयार किया गया था. हालांकि, पहले भेजे गए प्रस्ताव में धारा 353 की जगह 553 लिख गया था. इसे सात जून 2018 को संशोधित किया गया. वाराणसी सीजेएम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि इस मामले में लोकहित या किसी व्यक्ति या संपत्ति को क्षति पहुंचाने की बात नहीं कही गई है, इसलिए न्याय हित में मामले को वापस लेने की अनुमति दी जाती है. कोर्ट ने छह मार्च, 2021 को मामला वापसी के आवेदन को मंजूरी दे दी.


लाइट मशीनगन मिलने के मामले में मुख्तार के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई थी. 2004 में मुख्तार अंसारी पर पोटा लगाने के बाद तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने उनके खिलाफ किसी भी मामले में कमी ढूंढकर कार्रवाई के निर्देश दिए थे. उसी दौरान वाराणसी में बलवंत राय डिग्री कॉलेज के भ्रष्टाचार के मामले ने जोर पकड़ रखा था. इस्तीफा देने के बाद वह वाराणसी में समाज सेवा में लगे थे. इसी दौरान बलवंत राय कॉलेज के छात्रों के मदद मांगने पर वह छात्रों के साथ डीएम के यहां गए. डीएम अपने ऑफिस में ही नहीं थे. करीब एक घंटे तक इंतजार करने के बाद सभी वहां से लौट आए थे.


इसके बाद डीएम ऑफिस के चपरासी लालजी ने कैंट कोतवाली में डीएम ऑफिस के विश्राम कक्ष की कुर्सियों, डीएम की कुर्सी पर बैठने, नारा लगाने और सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज करवा दिया. कैंट कोतवाली में शैलेंद्र और अन्य के खिलाफ आईपीसी की धारा 353, 143, 419 7 सीएलए के तहत मामला दर्ज हुआ था. शैलेन्द्र सिंह के मुताबिक इस मामले में उन्हें जेल भेजकर प्रताड़ित करने की पूरी तैयारी थी, कोर्ट में पेशी के दौरान वकीलों के भारी विरोध के बाद उन्हें कोर्ट से ही जमानत दे दी गई.

मुख़्तार अंसारी की पूरी अपराधिक कहानी

अपराध की दुनिया में एक ऐसा नाम जिसने उत्तर प्रदेश का पूरा पूर्वी हिस्सा को खौफ और दहशत से भर दिया था. 1980 के दशक में पनपा माफियाराज ने गोरखपुर से वाराणसी और गाजीपुर तक फैला हुआ था. इस माफिया जगत की कहानी की शुरुआत होती है मकनू सिंह और साहिब सिंह के गैंग के बीच सरकारी ठेकों को पाने को लेकर. इन दोनों गैंग के बीच आए दिन गैंगवार जैसी घटना देखने को मिलती है थी. 


2017 में जमा किए गए उनके अपने चुनावी शपथपत्रों के अनुसार उन पर फ़िलहाल देश की अलग-अलग अदालतों में हत्या, हत्या के प्रयास, हथियारबंद तरीक़े से दंगे भड़काने, आपराधिक साज़िश रचने, आपराधिक धमकियाँ देने, सम्पत्ति हड़पने के लिए धोखाधड़ी करने, सरकारी काम में व्यावधान पहुंचाने से लेकर जानबूझकर चोट पहुंचाने तक के 16 से ज्यादा केस अदालतों में चल रही हैं. मकोका यानि महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट और गैंगस्टर ऐक्ट के तहत 30 से ज़्यादा मुक़दमे मुख़्तार के नाम पहले दर्ज थे. इनमें से कुछ अहम मामलों में अदालत ने सबूतों की कमी, गवाहों के पलट जाने और सरकारी वकील की कमज़ोर पैरवी के कारण इन्हें बरी कर दिया गया. भाजपा के विधायक कृष्णानंद राय की हत्या समेत 16 गंभीर मामलों में इसपर अब भी मुक़दमे चल रहे हैं.


सिर्फ़ 8-10 प्रतिशत मुसलमान आबादी वाले ग़ाज़ीपुर में मुख़्तार अपने बाहुबल और बूथ कैप्चरिंग से चुनाव जीतता रहा. 1985 से अंसारी परिवार के पास रही गाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट 17 साल बाद 2002 के चुनाव में उनसे बीजेपी के कृष्णानंद राय जीत ली. मुख़्तार को कृष्णानंद की जीत रास नहीं आई उसने तीन साल बाद उनकी हत्या कर दी. एक कार्यक्रम का उद्घाटन करके लौट रहे थे कृष्णानन्द कि तभी उनकी बुलेट प्रूफ़ टाटा सूमो गाड़ी को चारों तरफ़ से घेर कर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गई. कृष्णानंद के साथ कुल 6 और लोग गाड़ी में थे. एके-47 से तक़रीबन 500 राउंड गोलियां चलाई गईं, सभी सातों लोग मारे गए.

माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की कस्टडी पंजाब सरकार

मुख़्तार अंसारी को सजा देने की मांग एकबार फिर से तेज़ होगयी है. माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की कस्टडी को हस्तांतरण करने के लिए पंजाब सरकार ने यूपी सरकार को चिट्ठी लिखी है. कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा गया है कि मुख्तार अंसारी को सीधे बांदा जेल भेजा जाएगा. अबतक छुपते-छुपाते भागते मुख़्तार को अब योगी सरकार हरहाल में उसके किये करतूतों की सजा दिलाने के लिए तैयारियां कर ली है. 

पंजाब के अपर मुख्य सचिव गृह ने यूपी के अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी को लिखे पत्र में कहा है कि 8 अप्रैल से पहले मुख्तार अंसारी को हैंडओवर कर लें. 12 अप्रैल को पंजाब में होने वाली सुनवाई में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मुख्तार को पेश करना होगा. ऐसे में अब ये तय होगया है की मुख़्तार में बच नहीं पायेगा.

पंजाब सरकार ने यूपी स्थानांतरित करने के लिए विधिवत सुरक्षा और मेडिकल व्यवस्थाएं कराने को कहा है साथ ही शिफ्टिंग के लिए वाहन का बंदोबस्त करते समय अंसारी की मेडिकल रिपोर्ट्स का ध्यान रखने को भी कहा है. मुख़्तार अंसारी की इस खातिरदारी पर अब लोग सवाल उठाने लगे हैं की आखिर पंजाब सरकार मुख़्तार पर इतना मेहरबान क्यों है.

वहीं, मुख्तार अंसारी की सेवा में लगी एंबुलेंस पंजीकरण में फर्जी दस्तावेजों की पुष्टि के बाद दर्ज किए गए केस की विवेचना के लिए बाराबंकी से मऊ और पंजाब के लिए टीमें भेजी गई हैं. पुलिस की ये टीम मऊ में डॉ. अलका राय से पूछताछ कर सकती है. 

तो पंजाब में माफिया से मिलने वालों की जानकारी एंबुलेंस और चालक को कब्जे में लेकर जानकारी जुटाएगी. स्थानीय लोगों से मुख्तार के रिश्तों को भी खंगाला जा रहा है. फर्जी वोटर कार्ड बनवाने से लेकर पंजीकरण कराने तक सरकारी अमले की क्या भूमिका रही है, इस पर भी पुलिस अभी पूरी पड़ताल कर रही है.

नरसिंहानन्द की गर्दन काटने की बात अमानतुल्लाह की जिहादी सनक

एक बार फिर से अमानुतुल्ला खान ने सनकी दिखाई है, जी हाँ हम इसे सनक इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसने यति नरसिंहानन्द जी की गर्दन काटने की बात कही है... दिल्ली के प्रेस क्लब में यति जी ने एक प्रेस कांफ्रेंस क्या कर दिया जिहादियों में सनक फ़ैल गई.. नरसिंहानन्द जी की कटुसत्य बातें जिहादियों को कांटे की तरह चुभ रही है. शिवशक्ति धाम डासना के अधिष्ठाता यति नरसिंहानंद सरस्वती जी महाराज, राष्ट्रीय सैनिक संस्था के अध्यक्ष वीर चक्र विजेता कर्नल टी पी एस त्यागी जी सुप्रसिद्ध हिंदूवादी चिंतकों ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मीडिया को सम्बोधित किया.

इस दौरान अपने विचार रखते हुए यति नरसिंहानंद सरस्वती जी ने कहा कि अब सम्पूर्ण विश्व के हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं. पूरी दुनिया में बढ़ती हुई मुस्लिम जनसँख्या ने पूरी दुनिया को विनाश की ओर धकेल दिया है. अब भारत ही नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका तक में कट्टरपंथी जिहादियों का प्रभाव बढ़ रहा है. आधुनिक लोकतंत्र उनकी ताकत बन चुका है और पूरी दुनिया उनके सामने बेबस नजर आ रही है. दुर्भाग्य से भारत इस समय पूरी दुनिया की सबसे कमजोर कड़ी बन चुका है जो इस्लामिक देश बनने के बिल्कुल नजदीक पहुँच चुका है. ऐसे में भारत की स्थिति पाकिस्तान बांग्लादेश अफगानिस्तान सीरिया इराक लेबनान से भी बदतर हो जायेगी.

 अपने विपुल संसाधन और जनसँख्या के बूते पर इस्लामिक ताकतें भारत पूरी दुनिया के लिये सबसे बड़ा खतरा होगा और इस्लाम के जिहादी इसे अपना गढ़ बना कर सम्पूर्ण विश्व को बर्बाद कर देंगे. हम भारतवासी इस्लाम के जिहाद के सबसे बड़े और पुराने शिकार हैं. ये हमारी नैतिक व मानवीय जिम्मेदारी है कि हम सम्पूर्ण विश्व को इस्लामिक जिहाद के खतरों के बारे में बताए और मानवता को बचाने के लिये हर सम्भव बलिदान दे. इसपर आम आदमी के पार्टी ने ट्वीट करते हुए लिखा..हमारे नबी की शान में गुस्ताखी हमें बिल्कुल बर्दाश्त नहीं, इस नफ़रती कीड़े की ज़ुबान और गर्दन दोनों काट कर इसे सख़्त से सख़्त सजा देनी चाहिए

 ऐसे में अपने जहरीले बोल के लिए प्रसिद्ध असुद्दीन ओवैसी भला कहाँ चुप रहने वाले थे...ओवैसे ने भी अमानुतुल्ला खान के सुर में सुर मिलाते हुए ट्वीट किया...“नवी का अपमान अस्वीकार्य है। क्योंकी धार्मिक शिक्षक के रूप में काम करने वाले इन अपराधियों को इस्लाम के साथ अप्राकृतिक नियतन प्राप्त होता है. दिल्ली पुलिस, आपका मौन व्रत शर्मनाक है. यदि आप अपनी ड्यूटी भूल गए हैं, तो हम अपना कर्तव्य निभाते हुए इसका जवाब देंगे”


इस ट्वीट से साफ है की ओवैसी ने दिल्ली पुलिस को खुलेआम धमकी दी है. साथ यति जी को भी उसने धमकी दी है. कर्नल टी पी एस त्यागी जी ने प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि एक सैनिक होने के नाते वो कभी भी उन खतरों को अनदेखा नहीं कर सकते जो राष्ट्र,धर्म और मानवता के लिये चुनौती बनते जा रहे हैं. इस देश का एक दायित्ववान नागरिक होने के नाते ये हम सबका कर्तव्य है कि हम इस देश का इस्लामीकरण न होने दे और न ही इस देश को सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि में पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तरह का बर्बाद और आतंकवादी देश बनने दे.