06 October 2013

राम (राहुल+मनमोहन) राज्य और दादागीरी !

रामन केवल एक सनातन थिओलोजिकल कांसेप्ट है बल्कि पालिटिकल थिओलोजिकल भी है। राहुल-मनमोहन द्वन्द्व से रामका पुनर्जन्म हुआ है। रामसंक्षिप्त नाम है राहुल-मनमोहन द्वन्द्व का (रा=राहुल म= मनमोहन) इससे एक जनतांत्रिक बात सामने आई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि द्वंद्व या डायलेक्टिक से सदैव कुछ बेहतर निकल कर आता है। डायलेक्टिक मार्क्सवाद की बपौती नहीं है यह सनातन सिद्धान्त है और इसका उपयोग भारत के दोनों महान दार्शनिक नागार्जुन और आदि शंकराचार्य ने अपने अपने दर्शनों में किया है। आचार्य शंकर का अद्वैत इस डायलेक्टिक की ही उपज है भगवन कृष्ण ने भगवदगीता में कहा है द्वन्द्वः सामासिकस्य च'' समासो में मैं द्वन्द्व हूँ

राहुल मनमोहन द्वंद्व से जो रामनिकला वह गरीब नवाजू है। जो राम गरीब नवाजू न हो वह राम नहीं है। ध्यान देने की बात है कि गरीब नवाजू तुसलीदास का शब्द नहीं है यह उन्होंने इस्लाम से लेकर रामचरित मानस में समाहित किया है। तुसली के राम सेक्युलर हैं, सोशलिस्ट हैं और हिन्दू मुस्लिम दोनों संस्कृतियों के द्वन्द्व से उपजे हैं। राहुल-मनमोहन के द्वंद्व से जो अस्तित्त्व में आया है उससे कमोवेश क्रिमिनालाइज्ड हो गये राजनीतिक तंत्र से जनता को छुटकारा मिलेगा। राम ने भी जनता को ऐसे असुरों से मुक्ति दिलाई थी, हाँ उन्होंने यह काम लड़कर किया, इन्होने अहिंसक ढंग से राजनैतिक विमर्श से मुक्ति दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया।

इसलिए राजनीति में अपराधियों का संरक्षण करनेवाले विधेयक को फाड़ कर फेंक देने योग्य हैकहकर राहुल गाँधी ने कोई राजनीति नहीं की है बल्कि अपना राजधर्म निभाया है। दक्षिणपंथी हिन्दुत्त्व के प्रभाव में मीडिया के एक वर्ग को यह राजधर्म क्योंकर समझ में आता? दक्षिण पंथी इस मीडिया वर्ग ने जिसमे आजतक ग्रुप भी है नरेन्द्र मोदी के साथ सुर में सुर मिलाया कीराहुल ने प्रधान मंत्री की पगड़ी उछाल दी। इंडियन एक्सप्रेस के  एडिटर शेखर गुप्ता ने आननफानन में  हिन्दुत्त्व के पक्ष में रामको काउंटर करते हुए लेख ठेल दिया। इसी अख़बार में एक दूसरे महोदय संजय बारू ने यहाँ तक लिख डाला कि राहुल ने न केवल प्रधानमंत्री का बल्कि बिल को नॉनसेंस' कहकर सारी कैबिनेट का अपमान कर दिया है। महोदय को यह स्वीकार करने में एकदम दिक्कत थी कि राहुल ने पार्टी और कैबिनेट का निर्णय को सही किया है।

संजय बारू को तो नरेन्द्र मोदी के भाषणों में ग्रेस ही ग्रेस नजर आया होगा लेकिन राहुल का राजनैतिक प्रतिरोध अन- ग्रेसफुल था। इनके अनुसार राहुल का मोड़ ऑफ़ एक्सप्रेशन सही नहीं था। मिस्टर स्तम्भ कार थोडा मोदी के मोड ऑफ़ एक्स्प्रेशन पर भी लिखे| बनिस्बत इसके की मनमोहन सिंह ने पिछले दिनों स्वयं यह कहा था कि मैं राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करके बहुत प्रसन्नता का अनुभव करुंगा।फिर भी मीडिया लिख रहा है कि राहुल लम्बे समय से पीएम को पदच्युत करने की फ़िराक में हैं “!!  फ़िराक?? हम भी इन दक्षिणपंथियों की फ़िराक में हैं। इस प्रसंग में अपने को सेक्युलर बताने वाली मीडिया से भी मुक्तिबोध की तरह पूछना पड़ेगा व्हाट इज योर पालिटिक्स पार्टनर!

दूसरी बात जो इन मोदीवादी हिन्दूवादी लेखकों और स्तंभकारों के बारे में हास्यस्पद है कि कांग्रेस की वर्तमान जन कल्याणकारी योजनाओं के कारण कांग्रेस पर सीधे समाजवादी और कम्यूनिस्ट होने का आरोप लगाते है, इस लेखक संजय बारू ने भी लेख अंत में यही किया। तवलीन सिंह को तो मानो समाजवादी और कम्युनिस्ट कहने की आदत सी है। मनमोहन सिंह मूल्यों से समझौता न करने वाले एक अनुभवी कांग्रेसी हैं यह दक्षिणपंथियों को पचता नहीं और वे उनको अनापशनाप बोलते रहते हैं। राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलकात कर देश लौटते ही उन्होंने प्रेस कन्फ्रेंश में जो कहा उससे हिन्दुत्त्व की बोलती बंद हो गयी है।

दक्षिणपंथी लेखको को पीएम के वक्तव्यों को ठीक से पढ़ना चाहिए और दुष्प्रचार बंद करना चाहिए। उन्होंने प्रेस के सामने लौटते ही जो कहा उसका लबोलुबाब यह था जनतंत्र में जब मुद्दों से सरोकार रखने वाले अपनी बात सामने रखते हैं तो हमें समझना होगा कि मुद्दे की कौन से बात उन्हें परेशान कर रही है। कांग्रेस का कोई सदस्य अपनी बात सामने रख सकता है, यही तो जनतंत्र है।हम अथारिटेरियन पार्टी नहीं हैं।अथारिटेरियन पार्टी भाजपा है जिसने लालकृष्ण अडवाणी की एक न सुनी और नरेन्द्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया। 

उन्होंने एक बेहतर पीएम की तरह स्पष्ट किया कि राहुल गाँधी के मुद्दे को कैबिनेट और कांग्रेस पार्टी की कोर कमेटी के सामने रखेंगे! दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को देहाती औरतकहकर जो देश का अपमान किया था उसका भी उन्होंने करार जबाब दिया! मैं ऐसे बातों से रुबरूं हूँ। मैं बहुत आसानी से अपसेट नहीं होता हूँ। और फिर अक्खड़ अहंकारी हिन्दुत्त्व नरेन्द्र मोदी पर शुद्ध गांधीवादी तमाचा सभी सेक्युलर ताकतें मोदी के खिलाफ एक जुट होंमैं यह विश्वास करता हूँ कि यह होगा। आप थोड़ा इन्तजार करें जनता को भी (हिंदू नाजियों द्वारा बहकाए जाने का) अहसास होगा!” 

मिट्टी में मील गयी सिन्धु घाटी की सभ्यता !

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रहीम यार खान जिला अपनी जिस विशेषता के लिए जाना जाता है वह उसकी भौगोलिक दशा है। सिंधु घाटी की सभ्यता का विकास उद्भव और विकास जिस इलाके में हुआ उसमें पाकिस्तान के इस वर्तमान जिले का भूभाग भी शामिल रहा है। हालांकि तकनीकि तौर पर यह जिला पंजाब राज्य का हिस्सा है लेकिन इसका कुछ हिस्सा सिंध को भी छूता है। रेगिस्तान और पहाड़ एकसाथ इस जिले के अलग अलग छोर पर मौजूद हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता तो कब की इस्लाम के आगोश में सिमट गई लेकिन सिंधु नदी आज भी रहीमयार खान जिले के उत्तरी किनारे को छूकर बहती है। अतीत से वर्तमान के बीच सिर्फ सिंधु नदी ही वह आखिरी निशान है जो अनवरत है। नहीं तो, सिंधु नदी के किनारे जिस सभ्यता ने जन्म लिया उस सभ्यता के कमोबेश सारे निशान बड़ी मूर्खतापूर्ण तरीके से खत्म कर दिये गये। रहीम यार खान जिले के खानपुर तहसील में 18 हिन्दुओं के धर्मांतरण की खबर खात्मे के उन्हीं प्रयासों के आखिरी प्रयास हैं।
 
पाकिस्तान की जिस एसोसिएटेड प्रेस आफ पाकिस्तान ने 18 हिन्दुओं के धर्मांतरण की यह खबर दी है उनमें सात पुरुष और 11 महिलाएं हैं। पाकिस्तान में आमतौर पर हिन्दुओं की दशा इतनी दयनीय कर दी गई है कि उनका हिन्दू होना ही उनका लिए गुनाह हो गया है। अपनी जान बचाने के लिए उनके सामने दो ही रास्ता होता है। पहला रास्ता होता है कि वे किसी तरह भागकर भारत पहुंच जाएं और अपनी जान तथा अपना धर्म दोनों बचा लें। यह रास्ता सुलभ नहीं हो पाता तो वे धर्मांतरण कर इस्लाम कबूल कर लेते हैं। खानपुर के झोक फरीद निवासी सामाराम, लालूराम, सीतूराम, कैसूराम और कृष्णराम को भारत भाग आने का पहला रास्ता शायद नहीं मिला होगा इसलिए उन सब ने अपने नाम को मोहम्मद के नाम से जोड़ लिया। अब सासाराम मोहम्मद शरीफ हो गये हैं तो लालूराम मोहम्मद ताज। बाकियों ने भी इसी तरह अपने इस्लामिक नाम कबूल कर लिये हैं। आमतौर पर पाकिस्तान में काफिरों की लाश पर ही अल्ला-हो-अकबर का नारा बुलंद किया जाता है लेकिन इस बार ख्वाजा गुलाम फरीद की मस्जिद में इकट्ठा हुई भीड़ ने अल्ला-हो-अकबर नारा लगाया और 18 हिन्दुओं का अरब के इस्लाम में खैरमकदम किया।

ऊपरी तौर पर देखें तो यह बड़ी छोटी सी घटना है। एक ऐसे देश में जिसका जन्म ही एक धर्म विशेष के नाम पर हुआ हो उस देश में उस धर्म विशेष के अलावा किसी और के रहने का कोई नैतिक हक वैसे भी नहीं रह जाता। फिर वह धर्म इस्लाम हो कि ईसाईयत। धर्मतंत्र के संगठित समूह अपने अलावा किसी और के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते। अगर ऐसा न होता तो आज पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या कमोबेश वही होती जो 1951 की जनगणना में थी। 1951 में बंटवारे के चार साल बाद हुई जनगणना में पाकिस्तान की कुल आबादी में 22 प्रतिशत हिन्दू पाये गये थे। आखिरी जनगणना 2005 में उनकी संख्या घटकर 1.7 प्रतिशत रह गई है। जाहिर है, इन आठ सालों में यह 1.7 प्रतिशत भी घटकर एक प्रतिशत के पास ही पहुंचा होगा और काफिरों को कुफ्र से मुक्त करानेवाली इस्लाम की यही कठमुल्ला रफ्तार जारी रही तो इस दशक के बीतते बीतते पाकिस्तान पूरी तरह से हिन्दू मुक्त राष्ट्र हो जाएगा। जिस इस्लाम के नाम के नाम पर पाकिस्तान का गठन किया गया था, उसका अधूरा सपना पूरा हो जाएगा।

हो सकता है पाकिस्तान का कठमुल्ला इस्लाम अपने तरीके से इस्लाम को परिभाषित करके लागू कर रहा हो लेकिन क्या धार्मिक आधार पर इस तरह एकाकीपन हासिल कर लेने के बाद खुद पाकिस्तान बहुत लंबे वक्त तक जिन्दा रह पायेगा? इतिहास गवाह है और प्रकृति का सिद्धांत भी यही है कि एकाकीपन मौत के बिल्कुल पहले की अवस्था होती है। जब तक आप जीवन में हैं, बहुलता आपके जिन्दा रहने के लिए बहुत जरूरी होती है। फिर उस बहुलता में आपका समर्थन भी रहता है और विरोध भी। जिन भूभागों पर किसी भी एक खास धर्मतंत्र का एकाकीपन आया है उस धर्मतंत्र का कम से कम उस भूभाग से जल्द ही विनाश हो गया है। जिस रहीम यार खान जिले के खानपुर तहसील में धर्मांतरण की यह घटना घटाई गई है सिंध और पंजाब का वह इलाका किसी दौर में इसी तरह बौद्ध धर्म का गढ़ हुआ करता था। उससे भी पहले हिन्दू सभ्यता का उद्भव और विकास इसी सिन्धू घाटी में हुआ था। 

गांधार से लेकर कश्मीर होते हुए राजस्थान तक जिस एकल सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ वह भी बौद्ध धर्म से आक्रांत हुई और धीरे धीरे खिसकर दक्षिणायन होती गई। फिर भी बौद्ध धर्म के उद्भव और विकास के बाद भी ज्ञान और विज्ञान वह एक धरातल था जहां हिन्दू बौद्ध संघर्ष एक दूसरे को संरक्षण करते थे। गांधार से लेकर कश्मीर घाटी तक इसके प्रमाण मिलते हैं। रावलपिंडी का तक्षशिला विश्वविद्यालय हो कि पाक अधिकृत कश्मीर का शारदा मंदिर, ये हिन्दू बौद्ध सभ्यता के ऐसे केन्द्र के रूप में विकसित हुए जिन्होंने धर्म की कीमत पर भी ज्ञान की रक्षा की। विद्या की रक्षा की। यहां यह ध्यान रखने लायक है कि बौद्ध धर्म पूरी तरह से उन्हीं सिद्धांतों पर विकसित हुआ जो इस्लाम के बुतपरस्ती को खारिज करनेवाले सिद्धांत को समर्थन करता था। फिर भी, हिन्दू और बौद्ध संघर्ष में बहुलता को चुनौती नहीं दी गई तो उसका कारण धार्मिक उन्माद और पागलपन नहीं बल्कि ज्ञान और विद्या की चिंता थी। इस्लामी आक्रांताओं ने इसी एक बात का ध्यान कभी नहीं रखा। इसलिए उन्होंने तक्षशिला की पुस्तकों से आग जलाकर दो वक्त का खाना पका लिया और इस्लाम के नाम पर स्थापित हो गये।

कमोबेश वही आक्रांता मानसिकता आज भी पाकिस्तान में कायम है इसलिए बुतपरस्ती का निरा नामसझी भरा विरोध स्थापना की आधी सदी बाद भी जारी है। न सिर्फ जारी है बल्कि एक लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के बाद भी उसने ऐसी बुतविरोधी मानसिकता को बढ़ावा दिया है जो किसी भी व्यक्ति को धर्मोन्मादी बना देता है। धर्मोन्माद हमेशा बहुलता का दुश्मन होता है। जाहिर है, पाकिस्तान में अगर हिन्दुओं या फिर इसाईयों को निशाना बनाया जा रहा है तो इस्लाम की इस एकल समझ के बीज पाकिस्तान के निर्माण में निहित हैं। वह एक धर्मनिर्पेक्ष शासनतंत्र होने का ढोंग तो कर सकता है लेकिन दावा नहीं कर सकता ठीक वैसे ही जैसे भारत में कोई भी दल या व्यक्ति आ जाए वह धर्मसापेक्ष होने का ढोंग तो कर सकता है लेकिन दावा नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की बहुलवादी संस्कृति ऐसे प्रयासों का बहुत स्वाभाविक विरोध करती है। और बहुलतावाद की यह समझ कहीं और से नहीं बल्कि उसी सिंधु घाटी से आती है जहां इस सभ्यता का उद्भव और विकास हुआ।

अब भले ही सिन्धु घाटी और सिन्धु घाटी सभ्यता पर अरब का इस्लाम हावी हो गया हो लेकिन सिन्धु का यह एकलवादी संकट बहुत दिन टिक नहीं पायेगा। किसी न किसी दिन सिन्धु घाटी के लोगों को समझ आयेगा कि अरब के इस्लाम के लिए आखिरकार उन्होंने अपनी सभ्यता को क्योंकर नष्ट कर दिया? हो सकता है, यह समझ अगले पचास सौ सालों में भी न आये। लेकिन सभ्यताओं के इतिहास में पचास सौ सालों का कोई मोल नहीं हुआ करता। और जिस दिन सिन्धु घाटी को अपना अतीत याद आयेगा उस दिन यह संकट अपने आप खत्म हो जाएगा।

उत्तराखंड प्रदेश की मांग और गोलियों के निशान आज भी नहीं भरे है !

उत्तराखंड प्रदेश की मांग को लेकर दो अक्टूबर (1994) को दिल्ली में राजघाट पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने जा रहे उत्तराखंडियों पर मुजफ्फरनगर में रामपुर तिराहा के समीप फायरिंग और महिलाओं से दुर्व्यवहार के मामले को 19 वर्ष पूरी हो गये किन्तु उन्नीस साल बाद भी अब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिला है। शासन ने भले ही उत्तराखंड राज्य का गठन कर दिया परंतु अभी भी उन आरोपियों को कानूनी तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सका जिन्होंने उत्तराखण्ड आंदोलन के साथ बर्बरता पूर्ण व्यवहार किया था। 

1-2 अक्टूबर की आधी रात, 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे लोगों को पुलिस ने रामपुर तिराहे पर रोक लिया था और जबरदस्त फायरिंग की थी। पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई में आधा दर्जन लोग मारे गये थे और करीब डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए थे। इतना ही नहीं रात के अंधेरे में खाकी के नुमाइंदों ने कथित तौर पर कुछ महिला प्रदर्शनकारियों की आबरू से भी खिलवाड़ किया था। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह घटना सुर्खियां बनी थी और केन्द्र सरकार ने सीबीआई को पूरे प्रकरण की जांच सौंपी थी।

जांच पड़ताल के बाद सीबीआई ने मुजफ्फरनगर की पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ एक दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए थे। वर्तमान में मुजफ्फरनगर की विशेष अदालत में छह मामले लंबित है। इनमें 27 पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ बलात्कार, लूट, अपराधी षड्यंत्र रचने व आंदोलनकारियों के विरुद्ध फर्जी मामले दर्ज करने के मामले शामिल है। इनमें महिलाओं के साथ दुराचार समेत दो मामलों में सुनवाई पर आरोपियों ने हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले रखा था। लचर पैरोकारी के चलते यह काफी समय तक स्थगन आदेश रद नहीं कराया जा सका है।

 इसका सीधा लाभा आरोपियों को मिला है। बाकी मामलों में सीबीआई की ओर से सही प्रकार से पैरोकारी नहीं हो पा रही है। उधर, न्याय की आस में कई लोगों की मृत्यु हो चुकी है। मरने वालों में पीड़ित परिवार, गवाह और आरोपी भी शामिल हैं। मृतकों में फर्जी मामले दर्ज करने के आरोपी तत्कालीन कोतवाल मुजफ्फरनगर मोती सिंह, पुरकाजी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के प्रभारी डा. प्रीतम सिंह व सिपाही कमल सिंह आदि का देहांत हो चुका है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने पीड़ितों को जल्द त्वरित न्याय दिलाने के लिए समय-समय पर कई सरकारी वकीलों की नियुक्ति की, लेकिन यह प्रयास भी सफल नहीं रहे। क्योंकि सीबीआई के पक्षकार होने की वजह से उत्तराखंड के वकील सीधे तौर पर अदालत में अभिायोजन पक्ष की पैरवी नहीं कर पा रहे हैं। मुजफ्फरनगर में सीबीआई की स्थायी अदालत न होने की वजह से सीबीआई के वकीलों को मामले की पैरवी करने के लिए हर तारीख पर दिल्ली, गाजियाबाद व देहरादून से आकर यहां पैरोकारी करनी पड़ती है। यही कारण है कि उत्तराखंडियों के पृथक राज्य का सपना तो पूरा हो गया परंतु तत्कालीन प्रदेश सरकार खासकर पुलिस की ओर से जो जख्म मिले वे अभी तक नहीं भरे हैं।

घटनाक्रम
  • 21 जून, 1994 में उत्तराखंड निर्माण के सिलसिले में गठित रमाशंकर कौशिक समिति ने प्रदेश सरकार को 356 पृष्ठ की रिपोर्ट सौंपी थी। इसमें उत्तराखंड के आठ जिलों को मिलाकर अलग राज्य बनाने की सिफारिश की गई थी।
  • 22 जून 1994 को एक महत्वपूर्ण निर्णय के तहत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उत्तराखंड के लिए अतिरिक्त मुख्य सचिव नियुक्त किए जाने की घोषणा की थी। 
  • 24 अगस्त 1994 को राज्य सरकार द्वारा उत्तराखंड निर्माण का प्रस्ताव विधान सभा में पास कराकर केन्द्र सरकार को भोजा था। 
  • 2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली में प्रस्तावित रैली में भाग लेने के लिए जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर रोक लिया गया था। पुलिस फायरिंग में अनेक आंदोलनकारी मारे गये तथा महिलाओं के साथ दुव्यर्वहार किया गया था। 
  • 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लाल किले से उत्तराखंड राज्य की घोषणा की तथा प्रदेश सरकार से फिर से प्रस्ताव मांगा। 
  • केन्द्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 27 जुलाई, 2000 को उत्तराखंड निर्माण का बिल लोकसभा व राज्यसभा में पास कराया। 25 अगस्त को बिल पर राष्ट्रपति ने स्वीकृति दे दी। 
  • 9 नवम्बर, 2002 को उत्तरांचल के नाम से पृथक राज्य वजूद में आ गया। बाद में इसका नाम उत्तराखंड कर दिया गया। 
  • उत्तराखंड आंदोलन के दौरान विभिान्न स्थानों पर 29 लोग शहीद हुए थे। इनमें रामपुर तिराहा कांड में छह लोग भी पुलिस गोली के शिकार हुए थे। इनमें रविन्द्र रावत, राजेश लथेड़ा, सतेन्द्र सिंह चौहान, सूर्यप्रकाश थरियाल, गिरीश कुमार भाद्री, अशोक शामिल है।

क्या आसाराम परिवार के साथ ज्यादती हो रही है ?

आसाराम पर विवादों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। नाबालिग से तथाकथित दुष्कर्म का आरोप झेल रहे आसाराम के परिवार तक को इसमें अब घसीटा जा रहा है। ऐसे में मीडिया और प्रसाषन को लेकर कई अहम सवाल खडें होने लगे है। रेप के मामले में पहली बार आसाराम की पत्नी लक्ष्मी और बेटी भारती के खिलाफ भी मामला दर्ज कराया गया है। दोनों पर षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाय गया है। पहले आसाराम फिर उनके बेटा नरायण साईं और अब उनकी पत्नी और बेटी के उपर एफआईआर होने के बाद लोग इन आरोपों को लेकर सवाल खड़ा करने लगे है। हर कोई आज मीडिया और उसके द्वारा दिखाए जा रहे खबरों से हाय तौबा करने लगा है। दरअसल करे भी क्यों नहीं जिस तरह से शब्दों का इस्तेमाल खास कर टीवी चैनलों पर हो रहा है उससे कोई परिवार के साथ ऐसी खबरों को देखना पसंद नहीं कर रहा है। क्योंकि अब तो आसाराम और उनके परिवार तक को इसमें जिस रूप में पेश किया जा रहा है उससे कोई भी सभ्य सामाज सहमत नहीं हो सकता है, और ना ही उसे किसी भी एंगल से सही ठहराया जा सकता है।

आसाराम के तंत्र-मंत्र कि खबरों से लेकर, सम्मोहन का जाल, गुफा में लंबे वक्त तक बैठ कर रुहानी ताकतें हासिल करने जैसी भ्रामक और मनगढंत बातों को पेश करके, एक खास परिवार विषेश को निषाना बनाने के पीछे जो साजिस हो रही है। उससे मीडिया के एकतरफा रिर्पोटींग और विदेशी घरानों के हाथों में खेलने कि सच्चाई भी उजागर होने लगी है।  मीडिया में सनसनीखेज तरिके से आज जो खबरें पेश किया जा रहा उसको लेकर सर्वोच न्यालय के न्यायाधीष न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा और न्यायमूर्ति ए के पटनायक की पीठ ने प्रेस के एक हिस्से को असंवेदनशील होने पर अपनी चींता जता चुकी है।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को अदालत से जुड़े मामलों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने और सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणियों का संदर्भ से हटकर मतलब निकालने पर जमकर फटकार लगा चुकी है। न्यायमूर्ति जे एम पांचाल और न्यायमूर्ति ए के पटनायक की खंडपीठ ने कहा था कि मीडिया को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए। मगर आज मीडिया को न तो कोर्ट के ऐसे फटकार का असर है और न ही खुद की जिम्मेदारी कि। इन सब के अलावे न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोशिएसन और इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फेडरेशन हरेक चैनल पर निगरानी रखने का दावा करती हैं।

ये संस्थाएं हरेक चैनल पर अपने ई-मेल ऐड्रेस और फोन नंबर भी स्क्रॉल पर चलाती हैं, लेकिन उन्हें बार बार शिकायत करने के बावजूद इस बारे में दिशा-निर्देश तो दूर कोई चर्चा तक नहीं की जाती है। अंधविश्वास फैलाने वाले चैनलों के बारे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय तक को लोग इस संबंध में शिकायतें भेज रहे है। फिर भी कोई कर्रवाई नहीं हो रही है। तमाम आईपीसी और सीआरपीसी कि धाराओं कि धज्जियां उड़ रही है मगर न तो सरकार कोई गंभिरता दिखा रही है और न ही मीडिया को कंट्रोल करने के नाम पर चलने वाले संस्थान तो सवाल यहा ये खड़ा होता है कि क्या आसाराम परिवार के साथ जयादती हो रही है ? 

05 October 2013

नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं का प्रचार क्यों नहीं ?

‘नवरात्रि’ में हम ‘नव दुर्गा’ की उपासना करते हैं। नवरात्र यूं तो ‘पवित्र रात्रि’ का प्रतीक है, ऐसी रात्रि जो पाप रूपी अंधेरे का शमन कर जीवन में नई रौशनी का संचार करती है। मगर आज इन सब से इतर देश में नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं को भी जानने कि जरूरत है। शत्रुओं को जीतने वाली ‘दुर्गा’ का विस्तार ‘दुर्ग’ शब्द से हुआ है। ‘दुर्ग’ अर्थात् ‘किला’ जो सुरक्षा का प्रतीक है। ऐसे में दुर्गापूजा का महत्व देश की अभेद सुरक्षा व्यवस्था के साथ भी जुड़ा है। 

नवरात्र में उपासना के द्वारा आलस्य का त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि में प्रकृति के बहुत सारे अवरोध खत्म हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुसार मंदिरों में घंटे और शंख की आवाज के कंपन से दूर दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं।

दुर्गा के रूप में पूजी जाने वाली शक्ति स्वरूप स्त्री आज सामाज में  बेबस और लाचार नजर आती है। नारी का रूप बदला है किंतु नारी के प्रति संकीर्ण अवधारणाएं आज भी मौजूद है ऐसे में दुर्गापूजन से लोगों के अंदर एक सामाजिक परिवर्तन की उर्जा का संचार भी होता है, जो भोग बिलासीता से दुर होकर एक आदर्श जीवन की ओर अग्रसर करती है। शास्त्रों में दुर्गा को सरस्वती और लक्ष्मी का रूप भी बताया गया है ऐसे में दुर्गापूजन से बौधिक विकास भी होता है जो स्वच्छ सामाज कि ओर एक नई राह दिखाती है। साथ ही शरीर में जो उर्जा का संचार होता है उससे आर्थिक विकास की ओर मनुष्य आगे बढ़ता है। नवरात्र के पीछे का वैज्ञानिक आधार यह भी कि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियाँ हैं जिनमे से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है, और ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं। ऐसे समय में स्वस्थ रहने के लिए तथा शरीर को शुद्ध रखने के लिए और तनमन को निर्मल और स्वस्थ बनाये रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया नवरात्र से ये सब दूर हो जाता है।

रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। साथ ही इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो साइंस के डॉ जी एस बर्नी का कहना है कि अभ्यास के साथ समय का भी बहुत महत्व है। अभ्यास अगर नए चंद्रमा के हिसाब से शुरू किया जाए तो शरीर ही नहीं मन भी प्रभावित होता है। जो नवरात्र के समय ही संभव है। वहीं प्रो. गेराल्ड के अनुसार भारत ही नहीं दुनिया भर में इन तारीखों में कुदरत अपने रंग बदलती है। खगोल विज्ञानियों के अनुसार नौ दिनों तक व्रत रखने वाले लोग नवरात्र के समय आइंस्टीन और न्यूटन जैसे प्रतिभा को हासील कर सकते है। क्योंकि न्यूटन और आइंस्टीन ने नवरात्र के समय प्राकृति में होने वाले परिवर्तन को बिस्तार से वर्णन किया है। साथ कई सारे प्रयोगों का निर्धारण भी किया है। जो ध्वनी तरंग और गुरुत्वाकर्षण से संबंधित है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि नवरात्र के वैज्ञानिक पहलुओं का प्रचार क्यों नहीं?

क्या लालू की सज़ा से भ्रष्टाचार पर कोई असर होगा ?

सम्पूर्ण क्रांति के जन नायक जयप्रकाश नारायण ने जिस राजनैतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक न्याय के नारे के साथ इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने के लिये देश में एक क्रांति कि अलख जागाई थी, उसी क्रांति की आंधी से उपजे लालू यादव का भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना उस जेपी को शर्मशार करती है। बहुचर्चित चारा घोटाले में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को दोषी ठहराये जाने के बाद अहम सवाल ये है कि लालू की सज़ा से भरष्टाचार पर आने वाले समय में क्या असर पड़ेगा?

लालू ने 1990 में कहा था ‘आइ एम ए किंग’, और 1997 में ‘आइ एम ए किंग मेकर’ और अब 2013 में उन्हें अब जेल जाना पड़ा है। मगर सबसे अहम सवाल ये है कि क्या अब भी बिहार में जातीय समीकरण के आधार पर ही राजनीति होगी और सियासत की जमीन उसी से तय होगी? क्या राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए बिहार तैयार होगा? या फिर आगामी चुनावों में दागी उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में राजनीतिक दल अब भी कोताही नहीं बरतेंगे और दागियों को पहले की तरह ही संरक्षण देते रहेंगे? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में दागियों को टिकट देने के मामले में किसी भी दल ने कोताही नहीं बरती थी। वे चाहे नीतीश कुमार हों, लालू प्रसाद हों या फिर रामविलास पासवान। अब लालू प्रसाद को दोषी ठहराये जाने के बाद क्या भ्रष्टाचार के समीकरण में कोई परिर्वतन होगा या फिर लालू को जमानत मिलते ही सब कुछ पहले के ही तरह जातीय समीकरण के इर्द गिर्द ही घुमेगा इसके लिए कुछ इंतजार जरूर करना होगा।

मगर आज जिस प्रकार से सर्वोच न्यालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को खत्म करके दागियों के लिए रास्ते हमेशा के लिए बंद कर दिया है उससे भ्रष्टाचार और अपराध के आसरे सत्ता के रास्ते तलाशने वाले एक बार जरूर सोचने पर मजबूर होंगे। साथ ही राजनीति के अपराधीकरण पर कुछ हद तक असर जरूर पड़ेगा। तो क्या यह माना जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति में सफाई की जो बात कही है, उसका पहला असर बिहार में होने जा रहा है? लालू प्रसाद को दोषी ठहराये जाने के बाद पैदा हुए सवाल एक नयी राजनीति की भेंट चढ़ जाएंगे, या देश की राजनीति को एक नयी दिशा देंगे ये महत्वपूर्ण सवाल है। लालू प्रसाद यादव के लिये जेल जाना कोई नई बात नहीं, लेकिन बस फर्क इतना है कि वे कभी जेपी अंदोलन के कारण जेल जाते थे, और अब वे चारा घोटाले के दोषी ठहराए जाने के कारण जेल में है।

आज हर ओर इस बात को लेकर चर्चा है कि राष्ट्रीय जनता दल का राजनैतिक भविष्य क्या होगा? मगर इन सब से इतर महत्वपूर्ण सवाल ये है कि राजनीति में भ्रष्टाचार व घोटालों में लिप्त नेताओं व दलों का भविष्य अब आगे क्या होगा? क्या लालू को हुए जेल से अपराधीक छबि वाले नेताओं को कोई सबक मिलेगा? छल व प्रपंचों को अपना राजनैतिक हथियार बनाने वालों राजनेताओं को कोई सबक मिलेगा ये भी एक महत्वपूर्ण सवाल है। अब आगे ऐसे नेताओं का नैतिक भविष्य क्या होगा हर कोई इस बात को लेकर चर्चा कर रहा है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या लालू की सज़ा से भ्रष्टाचार पर क्या असर होगा ?

02 October 2013

भगवा पर भारी मोदी की दावेदारी !

लोकसभा चुनाव अभी कई महीने दूर है लेकिन उसकी धमक सुनाई पड़ने लगी है। नरेन्द्र मोदी जल्दी पीएम बनने की छपटाहट में चुनाव का बिगुल कुछ जल्दी बजा दिया है। भाजपा के इस चुनाव की कमान नरेन्द्र मोदी और उनके गैंग के हाथ में है भले ही कार्य विभाजन बाहरी तौर पर अलग अलग नेताओ के हाथ में दिखाई पड़े। चुनाव को दो छोरों से लड़ा जा रहा है -उत्तर प्रदेश में अमित शाह के हाथ में दंगा भड़काने का कार्यभार है तो केंद्र में हिन्दुत्त्ववादी राष्ट्रवाद का जहर और झूठ फ़ैलाने का काम मोदी कर रहे है। क्रोधोन्मुख भाषण फायर ब्रांड मोदी को कितनी सीट दिलायेगा यह तो समय बतायेगा लेकिन क्रोधमुखी व्यक्ति को भारत अच्छा नहीं मानता।

श्रीमद्भवदगीता कहती है क्रोध से न केवल व्यक्ति विभ्रमित होता है बल्कि उसका बुद्धि नाश हो जाता है। न केवल उसकी अपनी बुद्धि का बल्कि उनका भी जिसका वह प्रतिनिधित्त्व करता है। गुजरात में पंद्रह साल के शासन में मोदी ने गुजराती नवयुवको/जनता को न केवल उन्मादी बनाया है बल्कि उन्हें भ्रमित भी किया है।! यह एक वजह है कि पंद्रह सालों में गुजरात से न कोई खिलाड़ी सामने आया और न किसी तरह की प्रगतिशील सोच का कोई साहित्य सामने आया। क्रोधी नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में राजनीतिक सदाचार की सारी सीमाए लांघ दी है। हिंदी में रेटरिक को बोल बोलना कहते हैं और मोदी इसमें सिद्धहस्त है लेकिन जब इससे झूठ को सत्य बनाने की कोशिश की जाती है तब यह राजनीति खरतनाक हो जाती है।

दिल्ली की ऐतिहासिक रैली में भी मोदी ने दिल्ली की जनता को गुमराह करने के इतर कोई दूसरा काम नहीं किया है। दिल्ली की जनता सेक्युलर और प्रोग्रेसिव है लेकिन अब इसे भी उन्मादी बनाने की कोशिश की जा रही है। दिल्ली में मोदी ने अपने भाषण की पिच विशुद्ध रूप से नाजी रखा। अपने उन्मादी इन्टरनेट कार्यकर्ताओ से इनपुट लेकर उन्होंने खा की “पाकिस्तान के पत्रकारों को ब्रेकफास्ट पर बुला कर नवाज शरीफ ने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री “देहाती औरत” जैसे हैं! यह देश की जानता की तौहीन है। हम इस तौहीन को बर्दास्त नहीं करेंगे !” यह एक तरह का विशुद्ध नाजीवादी दुष्प्रचार था! भाषण के तत्काल बाद गलत होने की पुष्टि पाकिस्तान के पत्रकारों ने की थी। मान लें नवाज शरीफ ने अपनी बीवी से कुछ ऐसा कहा भी हो तो क्या उसे राजनीति का विषय बनाया जाना चाहिए? अंतरराष्ट्रीय राजनीति रसोई घर की बतकूचन पर आधारित नहीं होती बल्कि दर्ज वक्तव्यों पर संचालित होती है।

लेकिन मोदी की राष्ट्रभक्ति का यह आलम है कि दिल्ली की रैली में विदेशी कूटनीतिज्ञ बुलाये गए थे! किसलिए बुलाये गए थे? यह कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं था। कूटनीतिक संबंध सरकारी स्तर पर होते हैं इन्हें राजनीतिक स्तर पर नहीं स्थापित किया जाना चाहिए। लेकिन मोदी और मोदीवादी नाजीवाद एक नये तरह के राष्ट्र की कल्पनालोक में भ्रमण कर रहा है, उस कल्पनालोक में सिवाय मोदी के दूसरा कोई नहीं है। आखिर किस बिजनेस डील के लिए वहां विदेशी राजनयिक बुलाये गए थे? यह न सिर्फ अनैतिक है बल्कि देशद्रोह की श्रेणी में भी आता है जब राजनीतिक दल सीधे विदेशी राजनयिकों को अपनी रैलियों में बुलाने लगे। विदेशी कूटनीतिज्ञो को मोदी ने शायद इसलिए न्योता दिया था कि ”आकर अपनी आँखों से देख लो कि किस तरह मैं उन्माद फैला सकता हूँ कि क्यों मुझ पर दांव लगाना तुम्हारे लिए फायदेमंद है।” मोदी ने विदेशी कूटनीतिज्ञो को एक देशद्रोही की तरह बुलाया होगा कि ”केवल मोदी के मातहत ही वे भारत में अपना स्वर्णिम भविष्य बना सकते हैं!” स्वतन्त्र भारत में किसी राजनैतिक पार्टी या नेता ने ऐसा देशद्रोही काम पूर्व में नहीं किया है!

दूसरा राज कर्म जो स्वतन्त्र भारत के देशभक्त किसी राजनैतिक पार्टी या नेता ने पूर्व में नहीं किया है वह है ” रिटायर्ड सेना के जवानो और अधिकारियो का भगवा नाजीकरण”। संघ और भाजपा के मोदी ने रेवाड़ी में सेना के रिटायर्ड जवानो और अधिकारियो का नाजीकरण करने की कोशिस की थी जो की जनतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। छः दशको से सेना के जवानो और अधिकारियो को संबोधित करने का अधिकार केवल देश के प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्री को रहा है। सवाल यह है की आखिरकार किस सीक्रेट राजनीती के वशीभूत हो सेना के जवान और अधिकारी मोदी की रैली में इकठ्ठा हुए। मैं इस बात पर हतप्रभ था की किस लिंक से उतनी बड़ी तादाद में सेना के रिटायर्ड अधिकारियों और जवानो को रेवाड़ी में बुलाया गया था। गौरतलब है की रिटायर्ड सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह भी उस रैली में हिन्दुत्त्ववादी नाजियों की पार्टी में शरीक हुए थे। हिन्दुत्त्व इस तरह कई छोरों पर नाजीकरण कर रहा है। धार्मिक संगठन से लेकर सेना तक। भगवा नाजीकरण जनतंत्र और इसकी जनतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाले राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ा खतरा है! सभी राजनैतिक पार्टियों को भगवा नाजीकरण को चुनाव का मुद्दा बनाना चाहिए।

एक और बात जो प्रमुख है वह यह है कि सेना के अधिकारियो की नियुक्ति पत्र पर एक नियम होना चाहिए की रिटार्मेंट में बाद उन्हें किसी राजनितिक पार्टी से जुड़ने या किसी राजनैतिक संगठन का हिस्सा बनने का अधिकार नहीं होगा क्योकि सेना की तमाम बाते उन्हें पता होती है जिससे वे देश का अहित कर सकते हैं। आरएसएस और नरेन्द्र मोदी द्वारा रेवाड़ी में सेना के जवानों और अधिकारियों का नाजीकरण इस चुनाव का विषय है जिसे भारतीय लोकतन्त्र में आस्था रखने वाली सभी पार्टियाँ उठाये। इस प्रसंग में 'टीवी टुडे' जैसी अल्ट्रा राइटिस्ट मीडिया भी चिंता का विषय है! नहीं तो आज जिस मोदीवादी उभार को कांग्रेस के सब कुकर्मों का विकल्प समझा जा रहा है उस मोदित्व के कर्म कांग्रेस के कुकर्मों से भी बुरे साबित होगें, और तब शायद विरोध करनेवालों के लिए कहीं कोई जगह भी नहीं बचेगी।

लालू की सियासत समाप्त !

27 जनवरी 1996। पश्चिमी सिंहभूम जिले के डिपुटी कमिश्नर अमित खरे ने चाइबासा के पशुधन विभाग के दफ्तर पर छापामारे की। चापेमारी में अमित खरे को कुछ संदेहास्पद दस्तावेज हाथ लगे जो किसी बड़े घोटाले की ओर से इशारा करते थे। बात पटना तक पहुंची और मुख्यमंत्री लालू यादव ने तत्काल इस मामले में जांच के आदेश दे दिये। मामले की लपट कितनी भयावह थी कि मुख्यमंत्री की कमेटी की जांच से पटना हाईकोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ और सरयू राय की एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए तीन महीने के भीतर मार्च 1996 में चारा घोटाले की जांच का काम सीबीआई को सौंप दिया। 

तब से अब सत्रह साल नौ महीने बाद उसी सीबीआई की विशेष अदालत ने लालू यादव को उसी चारा घोटाले के लिए दोषी करार दे दिया है जिसकी जांच का आदेश बतौर मुख्यमंत्री खुद लालू यादव ने दिया था। सीबीआई ने जांच को अपने हाथ में लेते ही लालू यादव को घेरना शुरू कर दिया था क्योंकि चारा घोटाले के सरगना कोई और नहीं बल्कि खुद लालू यादव ही थे। शुरूआती जांच पड़ताल के बाद 950 करोड़ के चारा घोटाले में वे जुलाई 1997 में गिरफ्तार कर लिये गये। बिहार की राजनीति में दबंग राजनेता के तौर पर उभरे लालू यादव के लिए यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा झटका था। हालांकि जेल जाने से पांच दिन पहले 25 जुलाई 1997 को उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार की गद्दी सौंप दी थी और जेल के नाम पर पटना के पुलिस गेस्ट हाउस से सत्ता को संचालित करते रहे लेकिन लालू के लिए चारा को जो संकट शुरू हुआ तो अठारह सालों तक अनवरत चलता ही रहा।

भारत में चारा घोटाला कुछ उसी तरह से चर्चित हुआ जैसे बोफोर्स घोटाला। चारा और लालू को लेकर इतनी कहावतें और कहानियां प्रचलित हो गईं कि लालू प्रसाद यादव की छद्म छवि चाराचोर की ही बन गई। राजनीतिक रूप से जिस पिछड़े वर्ग के उभार के तौर पर बिहार में लालू यादव ने सत्ता संभाली थी, चारा घोटाले ने लालू को अगड़े ही नहीं बल्कि उस पिछड़े वर्ग में भी संदिग्ध कर दिया जिसका खामियाजा आनेवाले दिनों में लालू यादव को भुगतना पड़ा। पहले मुख्यमंत्री की कुर्सी गई, फिर गेस्टहाउस भी गया और बेउर जेल जाना पड़ा। चारा घोटाले के बाद उनके ऊपर आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया गया जिसमें भी वे रिमांड पर जेल गये। इन्हीं झंझावातों के बीच बिहार में नीतीश कुमार का उदय हुआ और उनका राष्ट्रीय जनता दल भी प्रदेश में सिमटकर लालू आकार का रह गया।

 नीतीश कुमार को एक बार नहीं बल्कि दो बार प्रदेश ने नेतृत्व सौंप दिया और लालू सिर्फ ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी का आरोप लगाते रह गये। इस बीच दिल्ली दरबार में सोनिया गांधी से सेटिंग की वजह से उन्हें रेल मंत्रालय जरूर मिल गया लेकिन 2009 के चुनाव में लालू के धराशाई होते ही सोनिया गांधी लालू यादव को बाहर का रास्ता दिखा दिया। 1977 से सत्ता की संसदीय राजनीति में समा चुके लालू धीरे धीरे करके छीजते ही चले गये और 2009 आने के साथ ही एक तरह से वे खत्म हो चले थे।

खुद को बिहार छात्र आंदोलन की पैदाइश कहनेवाले लालू यादव ने 29 साल की उम्र में ही संसदीय राजनीति का सफर शुरू कर दिया था जब 1977 में वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गये। उस वक्त वे सबसे कम उम्र के सांसदों में शुमार थे। इसके बाद समाजवादी राजनीति में सक्रिय रहे लालू को सबसे बड़ा मौका मिला 1990 में जब वे बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1990 से लालू का उभार केवल बिहार में नया राजनीतिक उभार नहीं था बल्कि देश की राजनीतिक क्षितिज पर एक ऐसे राजनीतिज्ञ के उभार के तौर पर देखा गया जो सभ्य जनों की सभा में मसखरे से ज्यादा महत्व नहीं रखता था। खुद लालू को यह मसखरा व्यक्तित्व पसंद था क्योंकि उन्हें लगता था कि यही उनकी सफलता का राज है। दुनिया लालू को जोकर कहती थी और लालू उसी जोकर वाली छवि के पीछे छिपकर एक दबंग की भांति बड़े बड़े कारनामों को अंजाम दिया करते थे। चारा घोटाला संभवत: उन्हीं कारनामों में से एक था।

जुलाई 1997 में पहली बार गिरफ्तारी के साथ लालू के राजनीतिक कैरियर का उतार शुरू हुआ तो वह दोबारा कभी चढ़ नहीं पाया। लालू की राजनीतिक मटकी एकसाथ धड़ाम से भले नहीं फूटी लेकिन क्रमश: छीजन में उनकी मटकी खाली होती चली गई। और लालू की खत्म होती राजनीति के मूल में जितनी उनकी नियति और कर्म था उतना ही चारा घोटाला भी था। जानवरों का चारा खानेवाले लालू को आखिरकार वही चारा चर गया और रांची की विशेष अदालत द्वारा वे दोषी करार दे दिये गये। अब दो दिन बाद जब सजा का ऐलान करते समय यह बताया जाएगा कि उन्हें कितने साल की सजा दी गई। लेकिन अगर आप लालू के राजनीतिक कैरियर को गौर से देखें तो पायेंगे कि बीते सत्रह साल उनके लिए किसी सजा से कम नहीं रहा है।