21 January 2014

क्या देश भर में "आप" का उदय हो पायेगा ?

‘आम आदमी पार्टी’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में जो करिश्मा कर डाला है, उससे मौजूदा सड़ी-गली राजनीति से ऊब चुके लोगों में एक नया उत्साह पैदा हुआ है और ‘आप’ के इस प्रयोग को देश भर में अन्यत्र सफल बनाने की बात की जाने लगी है। एक जबर्दस्त जनांदोलन से पैदा हुए उत्तराखंड राज्य के पूरी तरह चौपट हो जाने से परेशान लोगों को भी यह जरूरत महसूस हो रही है कि दिल्ली जैसा कुछ उत्तराखंड में भी हो जाना चाहिये। निश्चित ही दिल्ली के इस प्रयोग को सर्वत्र दोहराया जाना चाहिये। मगर क्या यह प्रयोग अन्यत्र भी सफल होगा? यह समझने के लिये इसकी पड़ताल करना जरूरी है।

बीस साल पहले देश में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद एक ओर अरबपतियों की तादाद बढ़ी तो दूसरी ओर संसाधनों की लूट-झपट से आम जनता को गरीबी की सीेमारेखा से परे धकेल देने की प्रक्रिया बहुत तेज हुई। भ्रष्टाचार देश में नेहरू-इन्दिरा के जमाने में भी कम नहीं था, लेकिन निजीकरण- उदारीकरण के बाद इसने इतना विराट रूप धारण कर लिया कि जो इक्का-दुक्का घोटाले सामने आ सके, उन्ही से आँखें चौंधिया गईं। स्वाभाविक था कि राजनीति और जनान्दोलनों में सक्रिय ईमानदार लोग इस भ्रष्टाचार से चिन्तित हो कर इसका इलाज ढूँढने की कोशिश करते। अतः एक ओर चुनावी राजनीति में स्थापित किसम-किसम के राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में बने मोर्चों से इतर तीसरे विकल्प के लिये जोड़-तोड़ में लगे तो देश के कोने-कोने में जल, जंगल, जमीन पर अधिकार और सुशासन आदि मुद्दों को लेकर चल रहे तमाम जनान्दोलनों से जुड़े संगठन व लोग भी बात-बहस में जुटे कि इस राजनीति को कैसे आमूल बदला जाये।

पिछले पाँचेक सालों में इस प्रक्रिया में तेजी आयी। वर्ष 2007-08 में पहले ‘लोक राजनीति मंच’ का प्रयोग  शुरू हुआ और फिर उसके एकाध साल बाद ‘आजादी बचाओ आन्दोलन’ की पहल पर ‘जन संसद’ का। देश भर के सक्रिय जनान्दोलनकारी संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्त भूषण, योगेन्द्र यादव, आनन्द कुमार और अजित झा जैसे लोग, जो इन दिनों ‘आम आदमी पार्टी’ को नेतृत्व दे रहे हैं, भी इस प्रक्रिया में निरन्तर शामिल रहे थे। लेकिन ये कोशिशें न तो परवान चढ़ीं और न ही पूरी तरह खत्म हुईं। बैठक-सम्मेलनों का सिलसिला बना रहा, कभी बातचीत में अच्छी प्रगति होती दिखाई देती तो कभी एकदम गतिरोध आ जाता। गतिरोध के पीछे की वजहें सैद्धान्तिक इतनी नहीं होती थीं, जितनी व्यक्तियों के अहं या विभिन्न संगठनों के परस्पर स्वार्थों को लेकर होने वाले टकराव की थीं या फिर एन.जी.ओ. बनाम जन संगठन के उलझे सवाल को लेकर मतभेद उभर आते थे। यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन मीडिया में इसकी कोई चर्चा नहीं थी। जनान्दोलनों को लेकर मीडिया में उपेक्षा का गहरा भाव होता है। देश के कोने-कोने में लगातार चलते रहने वाले आन्दोलनों के बारे में सूचना देने में मीडिया जबर्दस्त कंजूसी बरतता है। इसलिये बावजूद इसके कि उत्तराखंड के अल्मोड़ा से लेकर महाराष्ट्र के भद्रावती तक ऐसी बैठकें होती रहीं, देश के सामान्य नागरिक को भनक भी नहीं लगी कि ऐसी कोई प्रक्रिया चल रही है। अन्यथा क्या पता नये लोग इस प्रक्रिया से जुड़ते। अन्ततः चिन्तित सिर्फ वही लोग नहीं होते, जो इस या उस संगठन से पहले से जुड़े होते हैं, बल्कि भ्रष्टाचार से दुःखी असंख्य लोग देश भर में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे हुए हैं, जो कुछ न कुछ करना भी चाहते हैं मगर कर नहीं पाते। वे जानते ही नहीं कि किससे मिलें, क्या करें ? इन्हें आपस में मिलाने या रास्ता सुझाने का काम मीडिया कर सकता है, लेकिन ऐसा करने में उसके व्यावसायिक स्वार्थ आड़े आते हैं।

अप्रेल 2011 में ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ के बैनर तले ‘जन लोकपाल’ विधेयक पारित करने की माँग को लेकर अण्णा हजारे का आन्दोलन शुरू हुआ। अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्त भूषण, किरण बेदी आदि इस आन्दोलन में अण्णा के साथ थे। न जाने क्यों अपने अब तक के रिकॉर्ड के विपरीत मीडिया ने आश्चर्यजनक रूप से इस आन्दोलन में जबर्दस्त रुचि दिखाई। उन दिनों ऐसा लगता था कि मानो सारे अखबारों और समाचार चैनलों ने एक जगह मिल कर यह कसम खाई हो कि विश्व कप क्रिकेट से ठीक पहले हो रहे इस आन्दोलन को भी वर्ल्ड कप की तरह ही एक बड़ी ‘ईवेंट’ बना दिया जाये। समाचार चैनल चौबीसों घण्टे इस आन्दोलन की खबरें चलाने लगे तो समाचार पत्र अपने पहले पेज इस आन्दोलन की सचित्र खबरों से भरने लगे। इसका रहस्य खोजना एक शोध का विषय हो सकता है कि अन्यथा जनान्दोलनों को हिकारत की दृष्टि से देखने वाले मीडिया की रुचि एकाएक अण्णा के आन्दोलन में कैसे हो पड़ी। जबकि अण्णा हजारे तो तीस साल से भी अधिक समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय थे और सामाजिक कर्म में रहने वाले लोगों में भी कुछ ही लोग उन्हें जानते थे। उनके प्रदेश महाराष्ट्र में तक उन्हें पहचानने वाले बहुत कम थे। उस वक्त लोकपाल आन्दोलन को लेकर मीडिया के इस अद्भुत उत्साह की एक व्याख्या यह की गई कि उन दिनों प्रकाश में आये कॉमनवेल्थ खेल घोटाला, टू जी घोटाला, नीरा राडिया टेप्स आदि को लेकर जनता के भीतर गुस्सा बहुत बढ़ चुका है। कॉरपोरेट जगत ने आँकलन किया किया यदि इस गुस्से का धीरे-धीरे रिसाव न हुआ तो यह बहुत हिंसक ढंग से फूटेगा, जो उसके लिये बहुत अधिक खतरनाक होगा। जनता भी यह सच्चाई समझ लेगी कि भ्रष्टाचार की ताली एक हाथ से नहीं बजती। यदि राजनीतिज्ञ बेईमान हैं तो उन्हें बेईमान बनाने वाली ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही हैं। अतः कॉरपोरेट मीडिया ने तय किया कि अण्णा हजारे के जन लोकपाल आन्दोलन के माध्यम से जनता के गुस्से के रिसाव के लिये एक रास्ता निकले।

बहरहाल कारण जो भी रहा हो, मीडिया द्वारा जन लोकपाल विधेयक आन्दोलन को ‘ईवेंट’ बना दिये जाने का परिणाम यह रहा कि देश का बच्चा-बच्चा अब तक गुमनामी में रहे अण्णा हजारे को पहचानने लगा। उन तमाम लोगों को, जो बढ़ते भ्रष्टाचार से गुस्सा तो थे और समझ नहीं पाते थे कि देश को पतन के गर्क में जाने से रोकने में उनकी क्या भूमिका हो सकती है, अपने गुस्से का इजहार करने का मौका मिला। दिल्ली इसका केन्द्र रहा, मगर देश भर में लाखों की संख्या में लोग इस आन्दोलन में शामिल हुए। अनेक लोग तो अच्छी-भली नौकरियाँ छोड़ कर इस आन्दोलन में कूदे। ये वे लोग थे, जिन्हें अपने आसपास चल रहे जन संघर्षों की कोई चेतना नहीं थी, राजनीति के नाम पर मार्क्सवाद, गांधीवाद, समाजवाद, अम्बेडकरवाद, हिन्दू राष्ट्रवाद जैसी किसी प्रचलित विचारधारा से भी वे अनभिज्ञ थे, मगर देश में बढ़ते भ्रष्टाचार के रोग ने उन्हें व्याकुल किया था। ‘टीम अण्णा’, जैसा कि अरविन्द केजरीवाल, प्रशान्त भूषण आदि ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ के लोगों को उन दिनों कहा जाता था, के साथ शिक्षा जगत, कानून, मीडिया, आई.टी. और मैनेजमेंट आदि के विशेषज्ञों, खासकर युवा पेशेवरों का एक बड़ा समूह जुड़ा। टीम अण्णा को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिये कि उसने इन पेशेवरों को एक मकसद के साथ एकजुट होकर काम करने का पूरा मौका दिया। इन लोगों की क्षमताओं का पूरा-पूरा उपयोग हुआ और अब तक के आन्दोलनों से अलग ‘जन लोकपाल विधेयक’ का मुद्दा यों जन साधारण के सामने गया, जैसे किसी कम्पनी का उत्पाद उपभोक्ताओं के पास जाता है। यह प्रयोग जनान्दोलनों में पहली बार हो रहा था।

मीडिया को अण्णा आन्दोलन से जितना कमाना-खाना था, उसने किया और फिर थोड़े समय बाद इस आन्दोलन में रुचि लेना धीरे-धीरे कम कर दिया। मीडिया के बनाये तूफान से जो अनावश्यक भीड़ लोकपाल आन्दोलन में आयी थी, वह भी छँट गई। जन लोकपाल विधेयक आन्दोलन किसी नतीजे पर नहीं पहुँचा और अभी भी वह मुद्दा घिसट ही रहा है। अण्णा को आजकल फिर ‘जन लोकपाल’ के लिये अपने गाँव रालेगण सिद्धी में आमरण अनशन पर बैठना पड़ रहा है। हो सकता है दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ की अप्रत्याशित विजय के बाद पैदा हुए दबाव से कांग्रेस और भाजपा अब उस विधेयक को पारित करने को विवश हो जायें। मगर 2011 के उस आन्दोलन के बहाने अण्णा और ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ के उनके साथियों को एक देशव्यापी पहचान तो मिल ही गई। जनता के लिये अपनी पूरी जिन्दगी झोंक देने वाले, बल्कि शहीद हो जाने वाले लोगों को वह प्रसिद्धि कभी नहीं मिल पाती जो अण्णा हजारे, अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों को अप्रेल 2011 से अगस्त 2011 के बीच मिली। मीडिया की इस ताकत, जिसका अन्यथा लगातार दुरुपयोग होता है, को अण्णा आन्दोलन और ‘आप’ के उदय के संदर्भ में भली भाँति समझा जाना चाहिये। यह भी सोचना चाहिये कि ‘आप’ जैसे प्रयोग क्या अन्यत्र हुए तो मीडिया इसी तरह सहभागी की भूमिका में रहेगा, जैसा तब रहा था?

2011 का आन्दोलन सुस्त पड़ा, मगर केजरीवाल और उनके साथियों की इतनी हैसियत बनी रही कि उनकी गतिविधियों की चर्चा पहले पेज पर न सही, अखबार के भीतरी पेजों पर बनी रही। वे जनता की स्मृति से खारिज नहीं हुए। इन लोगों ने एक महत्वपूर्ण काम यह भी किया कि आन्दोलन के ढीले पड़ जाने के दौर में भी, जैसा कि प्रायः ऐसे आन्दोलनों के साथ होता है अपने साथ जुड़े कार्यकर्ताओं को हताश-निराश होकर घर बैठ जाने के लिये विवश नहीं होने दिया। जनता में भ्रष्टाचार को लेकर जिज्ञासा जग ही गई थी, उन्होंने जब जहाँ से सम्भव हुआ, अपनी युवा पेशेवर टीम के माध्यम से सुराग लगा भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करने की मुहिम जारी रखी।

अण्णा व्यावहारिक राजनीति के स्तर पर मूर्खता के स्तर तक भोले व्यक्ति हैं, मगर केजरीवाल ने यह महसूस कर लिया कि खुल कर राजनीति में आये बगैर भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम आगे नहीं बढ़ सकती। परन्तु इस मुद्दे पर वे अण्णा को सहमत नहीं कर सके। अण्णा और केजरीवाल बिछुड़े तो केजरीवाल ने ‘आम आदमी पार्टी’ बना ली। कुछ लोग अण्णा के साथ रहे, लेकिन ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ के ज्यादातर लोग नये राजनीतिक दल में आ गये। केजरीवाल ने लम्बे समय से जनान्दोलनों में रहे देश भर के लोगों को भी अपने साथ लाने की बहुतेरी कोशिश की, लेकिन चुनावी राजनीति के अब तक के अनुभवों से बुरी तरह जले इन आन्दोलनकारियों में से इक्का-दुक्का को छोड़ कर अधिकांश ने अरविन्द केजरीवाल द्वारा पेश की जा रही छाछ को चखने से भी इन्कार कर दिया।

लेकिन अरविन्द केजरीवाल और उनके साथियों ने आग से खेलने का अपना इरादा छोड़ा नहीं। उन्होंने चुनावी राजनीति को एक मंजिल तक पहुँचा कर भी दिखा दिया। उन्होंने जाति, धर्म, विचारधारा आदि के लफड़े में पड़े बगैर सिर्फ समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध और मध्यवर्गीय नैतिकता के सर्वमान्य आधार पर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने का प्रयोग किया। चुनावी राजनीति के सारे फार्मूलों को ‘आप’ ने एक-एक कर तोड़ा। चुनाव में मतदाता की एक धारणा होती है कि ‘इस भले आदमी’ को तो जीतना नहीं है, जीत भी गया तो यह ‘अकेला भला आदमी’ क्या कर लेगा? फिर क्यों अपना वोट बर्बाद किया जाये? इसलिये ये जो बेईमान पार्टियाँ हैं, इनमें जो कम चोर है, उसे वोट दे दो। इस धारणा को ‘आप’ ने ‘एक भला आदमी’ से ‘भले आदमियों का समूह’ बना कर और जमीनी जरूरतों-हकीकतों का घोषणापत्र बना कर सफलतापूर्वक तोड़ा। उम्मीदवार चुनने के पैमाने बनाये। लूट-खसोट की राजनीति से बुरी तरह आजिज आ गये जन सामान्य के पास आधुनिक तकनीकी, प्रबंधन और कौशल के जरिये ‘आम आदमी पार्टी’ के घोषणापत्र और ‘स्वराज’ के विचार को एक बार फिर उसी तरह सामान्य मतदाता तक पहुँचाया, जैसे कोई सुसंगठित कम्पनी अपना नया उत्पाद पहुँचा रही हो। इस तरह के आधुनिक प्रबन्ध कौशल की कोई कमी बड़े राजनीतिक दलों में नहीं है, वे उसका भरपूर प्रयोग करते भी हैं। लेकिन उसके कार्यकर्ता में वह संकल्प और ईमानदारी की ताकत कहाँ से आती, जो ‘आप’ के स्वयंसेवकों में थी ?

देश के कोने-कोने से ही नहीं, विदेशों से तक स्वयंसेवक ‘आम आदमी पार्टी’ का प्रचार करने के लिये दिल्ली में जुटे। कांग्रेस-भाजपा के कार्यकर्ता के लिये चुनाव एक धंधा होता है। बड़े नेता करोड़ों-अरबों कमाने के लालच में होते हैं तो छोटा कार्यकर्ता हजार-लाख कमाने के। वह ‘हाई प्रोफाइल’, ‘हाईटेक’ प्रचार और बड़े नेताओं की बड़ी रैलियों पर निर्भर होता है। मतदाताओं को आमने-सामने की बातचीत से समझाने का आत्मविश्वास उसके पास नहीं होता। इसके उलट ‘आप’ के कार्यकताओं में एक जुनून था, भ्रष्टाचार मिटाने के लिये बदलाव लाने का। इन दो भावनाओं का फर्क ही दिल्ली विधान सभा के चुनाव में निर्णायक रहा।

‘आम आदमी पार्टी’ की सफलता सबके सामने है। अब आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता भी सभी को है। जिस भाजपा-कांग्रेस संस्कृति से केजरीवाल सीधे भिड़ रहे हैं, वह कुटिल है। ‘आप’ द्वारा पैदा की गई  नैतिकता की मजबूरी के तहत कांग्रेस-भाजपा को अल्पमत  सरकार चलाने के जोड़-तोड़ से अलग रहना पड़ रहा है। यह कुठाराघात वे ज्यादा देर तक कैसे बर्दाश्त कर लेंगे? इस तरह की नैतिकता आ गई तो राजनीति जिस तरह पूर्णकालिक व्यवसाय और सबसे बड़े मुनाफे का धंधा बन गई है, वह आगे कैसे बनी रहेगी?

मगर बदलाव की यह सुखद बयार आज की पीढ़ी भले ही पहली बार महसूस कर रही हो, भारतीय राजनीति में पहले भी अनेक बार आती रही है। 1967 में लोहिया के गैर कांग्रेसवाद ने अनेक प्रदेशों में ‘संविद’ सरकारें बनवायी थीं। उस वक्त भ्रष्टाचार पर जब चोट पड़ती तो हम लोग खुशी से उछल-उछल पड़ते थे। मगर बहुत जल्दी ही भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था ने उस प्रयोग को निगल लिया। जेपी आन्दोलन के बाद पैदा हुए उत्साह और इमर्जेंसी के दमन के बाद बनी जनता पार्टी का तो बिस्मिल्लाह ही इतना गलत हुआ कि हिन्दू साम्प्रदायिकता के रोग को अत्यत बेशर्मी से राजनीति में स्थायी रूप से टिक जाने का मौका मिल गया। ‘आम आदमी पार्टी’ को उन पुराने अनुभवों से सीखना होगा। सबसे बड़ी सीख तो उसके लिये यही हो सकती है कि उसका जन्म एक जनान्दोलन से हुआ है और जनान्दोलनों से उसका जुड़ाव ही उसे जीवन्त बनाये रख सकता है।

लेकिन भारतीय राजनीति में बदलाव चाहने वालों को भी ‘आम आदमी पार्टी’ के प्रयोग से सीखना चाहिये। चुनावों से नाक-भौं चढ़ाने के बदले उन्हें स्वीकार करना चाहिये कि जनान्दोलनों को चुनावी राजनीति में बदलने की अभी पर्याप्त संभावनायें हैं। 2011 में अण्णा आन्दोलन निश्चित रूप से एक मीडिया प्रायोजित आन्दोलन था, मगर उसके ‘आम आदमी पार्टी’ में रूपान्तरित होने के बाद मीडिया ने उसे तवज्जो नहीं दी। जिस दिन केजरीवाल ने रिलायंस का भंडाफोड़ किया, उसके बाद तो उनकी साख अखबारों में और भी गिर गई, क्योंकि अम्बानी की नाराजगी पर कॉरपोरेट मीडिया साँस भी कैसे ले सकता है? दिल्ली विधानसभा चुनाव ‘आप’ ने कमोबेश बगैर मीडिया की मदद के, सिर्फ आधुनिक तकनीकी, प्रबंध कौशल और उत्साही कार्यकर्ताओं के बूते पर ही लड़ा। मीडिया को मोदी की जै जैकार करने से ही फुर्सत नहीं थी, ‘आप’ की जै जैकार तो उसने तब शुरू की जब ‘आप’ की सफलता का डंका उसके बगैर भी बजने लगा। अतः यह गंभीरता से सोचा जाना चाहिये कि मीडिया के असहयोग के बावजूद कैसे नयी पीढ़ी, जो फिलहाल पूरी तरह अराजनीतिक है मगर बदलाव की आकांक्षा भी रखती है, के अधिक से अधिक लोगों को पहले जनान्दोलनों और फिर चुनावी राजनीति में सहभागिता के लिये प्रेरित किया जाये। यह सबसे बड़ी चुनौती है।

14 January 2014

क्या मोदी का रथ रोकेंगे केजरीवाल !

क्या आगामी आम चुनाव में भाजपा का विकल्प आम आदमी पार्टी और नरेन्द्र मोदी का विकल्प अरविन्द केजरीवाल होगा? हिन्दी प्रदेशों की राजनीति नरेन्द्र मोदी बनाम अरविन्द कजरीवाल के तौर पर बढ रही है। असली गेम तो कांग्रेस अप्रतयक्ष तौर पर खेल रही है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री की उड़ान को उत्तर, प्रदेश, बिहार और झारखंड में रोकने की पूरी राजनीतिक तानाबाना बुना जायेगा। कांग्रेस अब अरविन्द केजरीवाल के हथियार से नरेन्द्र मोदी का शिकार करेगी और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने केसपने को चकनाचूर करेगी और भाजपा की एक फिर से केन्द्रीय सत्ता पर कब्जा की उम्मीद को नाउम्मीदी में बदलेगी। 

बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में दिल्ली की तरह अरविन्द केजरीवाल भाजपा के वोटरों में सेंध लगायेंगे जिसका लाभ इन प्रदेशों के जातिवादी और वंशवादी दलों को लाभ होगा, भाजपा की प्रत्याशित सीटें मिलनी दुरूह हो जायेगी। कांग्रेस को यह मालूम हो गया है कि हिन्दी इलाकों में उसकी सफलता की उम्मीद ही नहीं बनती है, इसीलिए अरविन्द केजरीवाल को आगे कर नरेन्द्र मोदी की राह में घुन लगाया जाये। कांग्रेस की यह नीति सफल भी हो सकती है।

नरेन्द्र मोदी लगातार अपनी बाधाओं और रूकावटों को ध्वस्त करते हुए राजनीतिक सौपान को आसान करते रहे हैं। इसी कड़ी में गुजरात दंगो के पाप से नरेन्द्र मोदी को मुक्ति मिल गयी है। गुजरात के लोकल अदालत ने एसआईटी की जांच रिपोर्ट को आधार मानकर नरेन्द्र मोदी गुजरात दंगों के अपराध से मुक्त करने का फैसला दिया है। नरेन्द्र मोदी ने इस फैसले को न केवल सत्य की जीत बताया है बल्कि यह भी कहा कि उनकी आत्मा को शांति मिली है जो गुजरात दंगों के समय से ही मनगढंत व प्रत्यारोपित आरोप से आहत थी। यह सही है कि गुजरात दंगों में अब तक विभिन्न जांच आयोगों और न्यायिक परीक्षणों में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। नरेन्द्र मोदी अब दूगने उत्साह के साथ अपने विरोधियों पर हमला कर सकते हैं, विरोधियों के प्रंपचों को ध्वस्त कर सकते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है अदालती आदेश पक्ष में जाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी के सामने राजनीतिक चुनौ तियां विल्कुल आसान हो गयी है और उनकी प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की राह आसान हो गयी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को भारी सफलता मिली, पर दिल्ली में सत्ता तक न पहुंचने का आघात भाजपा के लिए होश उड़ाने वाले ही हैं।

कांग्रेस को तो परवाह ही नहीं है क्योंकि उसकी लूटिया तो लगभग डूब ही चुकी है। भाजपा का चाल-चलन और  उसकी जनविरोधी सरोकारों व प्रदर्शन ही अरविन्द केजरीवाल के निशाने पर है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा को शायद यह उम्मीद नहीं है कि उनके रास्ते में कितनी बडी चुनौती खड़ी हो गयी है। आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरह दिल्ली में अपनी धाकड़ और करिश्माई सफलता पायी है, उसके राजनीतिक अर्थ काफी गंभीर हैं और सीधेतौर नरेन्द्र मोदी की उड़ान को बीच में रोकने के लिए अग्रसर होगा। राजनीतिक विश्लेषकों को अभी से यह अहसास हो गया है कि दिल्ली में आप की सफलता का संदेश देश की राजनीति के दशा-दिशा को बदल देगी। पूरे देश में एक आवेग है कि राजनीतिक विद्रुपता मे आप और अरविन्द केजरीवाल एक नई उम्मीद है, नयी आशा मिली है। अरविन्द केजरीवाल ने अभी तक अपनी पूरी राजनीतिक बाजी को खोली नहीं है, फिर भी उनकी राजनीतिक बाजी कोई ओझल भी नहीं है, या छिपी हुई नहीं है? दिल्ली के राजनीति को ठीक करने के बाद अरविन्द केजरीवाल की पूरे देश पर निगाह होगी और अपनी पार्टी आप को एक राष्टीय पार्टी के रूप में स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे। ईमानदारी और भ्रष्टचार को लेकर पूरे देश में अरविन्द केजरीवाल के पक्ष हवा तो बन भी चुकी है और अब तो वह दिल्ली के मुख्यमंत्री भी बन गये हैं। अरविन्द केजरीवाल अब एक भ्रष्टचार विरोधी एक्टिविस्ट के तौर पर नहीं बल्कि एक पक्के राजनीतिज्ञ की तरह जायेंगे। आम लोग भी अरविन्द केजरीवाल को एक राजनीतिक के तौर पर ही सुनेंगे जिसके अंदर भ्रष्टचार और राजनीतिक विद्रुपता के खिलाफ आग धधक रही है।

अब हम यहां ध्यान यह दे कि अरविन्द केजरीवाल देश के किन-किन प्रदेशों में अगामी लोकसभा चुनावों में गहरी हस्तक्षेप करेंगे और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के अभियान में रूकावटें डालेंगे। पूरे देश में अरविन्द केजरीवाल की हस्तक्षेपकारी राजनीतिक सुनिश्चित होगी, यह कहना मूर्खता ही है। इसलिए कि देश हमारा विभिन्नताओं से भरा पड़ा है, हर प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां भिन्न-भिन्न है, कहीं पर जातिवाद का पहिया घूम रहा है तो कहीं पर वंशवाद का पहिया जनता को रोंद रहा है। वंशवादी-जातिवादी पहिया कहीं से भी न्यायसंगत नहीं हो सकता, जनांकाक्षी नहीं हो सकता है, फिर भी वंशवादी-जातिवादी पहियों, भाषा की राजनीतिक उफान पर जनता का बुलडोजर चलना मुश्किल ही दिखता है। दक्षिण में अरविन्द केजरीवाल का जादू चलना मुश्किल है। दक्षिण के मतदाताओं का मिजाज अलग ही होता है जहां पर ईमानदारी और राजनीतिक विद्रुपता ज्यादा रोल नहीं निभा पाता है। इमरजेंसी के समय का उदाहरण हमारे सामने है। इमरजेंसी विरोधी आंदोलन दक्षिण में निष्प्रभावी ही रहा था। इमरजेंसी की समाप्ति के बाद हुए चुनाव में इन्दिरा गांधी को दक्षिण में जोरदार सफलता मिली थी। अन्ना का आंदोलन भी हिन्दी भाषी क्षेत्रो मे ही प्रभाव छोड़ा, मुंबई में अन्ना के अनशन को भीड़ का साथ तक नहीं मिला था। अरविन्द केजरीवाल का धमाल तो हिन्दी वाली पट्टी पर ही चल सकता है।

अरविन्द केजरीवाल को हिन्दी क्षेत्रों में कुछ ज्यादा ही राजनीतिक ज्वार मिलेगा। हिन्दी क्षेत्रों का वर्गीकरण भी हम दो भागों मे करके देखे तो निर्णायक निष्कर्ष तक हम पहुंच सकते हैं। एक भाजपा के वर्चस्व वाले राज्य और दूसरे में गैर भाजपा  पूर्ण वर्चस्व वाले राज्य। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान भाजपा अभी-अभी फिर से सत्ता में आयी है और इन तीनों प्रदेशों में भाजपा की स्थिति लोकसभा चुनाव में बेहतर होगी, अरविन्द केजरीवाल इन प्रदेशों में मीडिया हाइफ तो पायेंगे पर अधिक प्रभावशाली राजनीतिक भूमिका हासिल करने में सफल होंगे, ऐसा संभव नहीं लगता है। भाजपा के गैर पूर्ण वर्चस्व वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की राजनीतिक स्थिति का हम आप की चुनौती के आधार पर देखते हैं। इन तीनो राज्यों में 134 लोकसभा सीट हैं। नरेन्द्र मोदी इन तीनों प्रदेशों से लगभग 100 सीटें जीतने की आश लगा बैठे हैं। इन प्रदेशों में भाजपा के सामने जद यू, सपा, बसपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा है। खासकर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कमिटमेंट वोटरों में अरविन्द केजरीवाल कोई प्रभावकारी और आश्चर्यचकित वाली सेंध नहीं लगा पायेंगे। उत्तर प्रदेश में कहीं यादव-मुसलमान समीकरण और कहीं दलित-मुसलमान समीकरण होगा। बिहार में भी लालू की पार्टी का यादव-मुसलमान वोटरों का समीकरण रहेगा। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में अरविन्द केजरीवाल का चुनावी पहिया भाजपा वोटरों पर ही चलेगा। अगर अरविन्द केजरीवाल ने भाजपा रूझान वाले वोटरों में पांच प्रतिशत का भी सेंध लगाने सफल हो गये तो निश्चित तौर भाजपा और नरेन्द्र मोदी का लुटिया डूब जायेगी। दिल्ली में भाजपा रूझान वाले वोटरो का आप के साथ जुड़ने के कारण ही अरविन्द केजरीवाल की सफलता सुनिश्चत हुई थी। दिल्ली में संघ और भाजपा के नेताओं के बेटे-बेटियों ने भी आप को वोट दिये थे।

भाजपा को अपनी पुरानी नीति को त्यागनी होगी। अरविन्द केजरीवाल की चुनौती तोड़नी ही होगी। अगर नहीं तो फिर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का उनका सपना ध्वस्त होगा। समस्या यह है कि भाजपा भी अपने आप को कांग्रेस की बी टीम के रूप में स्थापित कर ली है, भाजपा के अंदर में आम आदमी की पहुंच लगातार घटी है। अगर भाजपा जनविरोधी चेहरे के साथ अगामी लोकसभा चुनाव में उतरेगी तो फिर जनता के सामने भाजपा और अरविन्द केजरीवाल का विकल्प भी है जिसका दिल्ली में जनता ने सफलतापूर्वक प्रयोग किया है।

बंग- भंग और बंगलादेश आम चुनाव चुनाव 2014 !

बंगलादेश में आम चुनाव हो गए लेकिन चुनाव नतीजों पर भारी सवाल खड़े हो गए हैं. ५ जनवरी को हुए चुनाव की वैधता पर मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नैशनल पार्टी (बीएनपी) के बहिष्कार ने सवालिया निशान लगा दिया है. सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग में नतीजे आने के बाद जश्न का माहौल है. अवामी लीग के नेता और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा है कि विपक्ष की मांगें नाजायज़ थीं और तथाकथित मांगों के बहाने संविधान के हिसाब से चुनाव करवाने की सरकार की कोशिश में डाला गया अडंगा बेमतलब है. बहरहाल सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग ने जातीय संसद (कौमी असेम्बली) की ३०० में से २३२ सीटें जीत ली हैं और अब शेख हसीना के पास भारी बहुमत है लेकिन विपक्ष की नेता खालिदा जिया इस जीत को मान्यता देने को तैयार नहीं हैं.

इस बीच अमरीका ने भी सुझाव दे दिया है कि दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए. दक्षिण एशिया में अमरीका की ताक़त को देखते हुए यह माना जा सकता है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना को दोबारा चुनाव करवाना पड़ सकता है. बंगलादेश के चुनाव आयोग के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार पांच जनवरी को हुए मतदान में करीब ४० प्रतिशत लोगों ने वोट डाला है. जाहिर है कि चुनाव के बहिष्कार की खालिदा जिया की लाइन का ख़ासा असर पड़ा है. खालिदा जिया को शेख हसीना का विरोध करने के लिए जमाते इस्लामी का सहयोग मिल रहा है.

शेख हसीना भी बंगलादेश नैशनल पार्टी और उसकी नेता खालिदा जिया को कोई रियायत देने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होने चुनाव के अगले दिन बिलकुल साफ़ कर दिया कि मुख्य विपक्षी पार्टी जमाते इस्लामी के हाथों खेल रही है. जब उनसे पूछा गया कि क्या वे मौजूदा राजनीतिक हालात में विपक्ष से बात चीत करने के बारे में सोच रही हैं तो उन्होने साफ़ कह दिया कि जब ततक विपक्ष हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ देता तब तक किसी तरह की बात नहीं की जायेगी. उन्होंने कहा कि आज  लोकतंत्र के दामन पर बेगुनाह लोगों के खून के दाग लगा दिए गए हैं. हमारे लोकतंत्र पर उन लोगों के आंसू का क़र्ज़ है जिन्होंने २०१३ में राजनीतिक हिंसा का सामना किया और अपनी जान गंवाई. आज राष्ट्र की चेतना पर राजनीतिक लाभ के लिए  हिंसा का सहारा लेने वालों  ने भारी हमला किया है और उनको बातचीत का मौक़ा तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक वे हिंसा का रास्ता छोड़ न दें. शेख हसीना ने पत्रकारों को बताया कि उन्होने सेना को हुक्म दे दिया है कि चुनाव के बाद भी जो आतंकवादी हिंसा जारी है उसको ठीक करने के लिए  सख्ती का  तरीका भी अपनाया जा सकता है.

विपक्ष की नेता खालिदा ज़िया भी शुरू में अपने रुख में किसी तरह का बदलाव करने को तैयार नहीं थीं. उन्होने कहा था कि यह चुनाव पूरी तरह से फर्जी है, उनके आवाहन पर पूरे देश ने चुनाव का बहिष्कार किया है और मतदान का प्रतिशत किसी भी हालत में १० प्रतिशत से ज्यादा नहीं है. उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से जो ४० प्रतिशत मतदान की बात की जा रही है, वह भी फर्जी है. लेकिन शेख हसीना की सरकार की तरफ से मिल रहे सख्ती के संकेतों के बाद बीएनपी की नेता खालिदा जिया का रवैया भी बदला है. हालांकि वे चुनाव को अभी भी फर्जी बता रही हैं और सरकार पर हर तरह की बेईमानी करने के आरोप लगा रही  हैं लेकिन अब उनकी बोली बदली हुयी है और कह रही हैं की वे सरकार से बातचीत करने के सुझाव पर विचार कर सकती हैं लेकिन उनकी शर्त  है की उनकी पार्टी के उन नेत्ताओं को रिहा कर दिया जाये जिनको राजनीतिक कारणों से जेलों में बंद कर दिया गया है. देश में पांच जनवरी को हुए आम चुनाव के पहले बड़े पैमाने पर राजनीतिक नेताओं की धरपकड़ हुयी थी.

खालिदा जिया का कहना है कि अगर सरकार बातचीत करना चाहती है तो उन नेताओं को छोड़ना पडेगा. उन्होने कहा कि  जो नेता अभी जेलों में नहीं बंद हैं वे भी डर के मारे कहीं छुपे हुए हैं. ज़ाहिर है कि बातचीत करने के लिए सरकार को बातचीत का माहौल बनाना पडेगा. खालिदा जिया को चुनाव के एक हफ्ते पहले से ही उनके घर में नज़रबंद कर दिया गया था और किसी को भी उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी गेई थी लेकिन चुनाव के बाद अमरीकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स के संवाददाता को मिलने दिया गया. उसके साथ हुयी बातचीत में खालिदा जिया ने कहा कि वे जमाते इस्लामी से भी दोस्ताना सम्बन्ध ख़त्म करने पर विचार कर सकती हैं. उन्होने संवाददाता को बताया कि जमात के साथ उनको कोई परमानेंट सम्बन्ध नहीं है. उनसे पूछा गया कि क्या ज़रुरत पड़ने पर वे जमाते इस्लामी के साथ संबंधों को खत्म भी कर सकती हैं तो बीएनपी की अध्यक्ष ने कहा कि अभी  तुरंत तो खत्म नहीं कर सकती लेकिन जब वक़्त आयेगा तो विचार किया जा सकता है. यानी राजनीतिक सुविधा अगर आकर्षक लगी तो खालिदा जिया जमाते इस्लामी वालों को औकात बता सकती हैं.

उधर अमरीका और ब्रिटेन ने चुनाव नतीजों को नाकाफी बताकर माहौल में असमंजस की स्थिति पैदा कर दिया है . १९९६ का उदाहरण दिया जा रहा  है जब सत्ताधारी पार्टी बंगलादेश नैशनल पार्टी थी और खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं. शेख हसीना की अवामी लीग ने चुनाव के बहिष्कार का आवाहन किया था. बहुत कम लोग वोट डालने आये थे. लेकिन दुनिया भर के नेताओं के दबाव के बाद खालिदा जिया ने चार महीने बाद ही दोब़ारा चुनाव करवा दिया था. अमरीका ब्रिटेन और खालिदा जिया इस बार भी वही उम्मीद कर रहे हैं कि शायद १९९६ की तरह इस बार भी शेख हसीना पर दबाव डालकर दोबारा चुनाव करवाया जा सकता है. लगता है कि शेख हसीना भी इस संभावना पर विचार कर रही हैं क्योंकि उन्होंने भी मीडिया के ज़रिये मुख्य विपक्षी पार्टी को सुझाव दे दिया  है की बातचीत के बिना कोई रास्ता नहीं निकाला जा सकता.

उधर खालिदा जिया और उनके साथी यह कहकर चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं कि अवामी लीग सरकार को इस्तीफ़ा देकर कार्यवाहक सरकार की निगरानी में चुनाव कराने चाहिए था. सत्ताधारी पार्टी विपक्ष की इस मांग को ये कहते हुए सिरे से ख़ारिज़ कर चुकी है कि चुनाव एक संवैधानिक ज़रूरत है और समय से चुनाव होना ज़रूरी है  क्योंकि जब २४ जनवररी को संसद का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है तो उसके ९० दिन के पहले चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है. लेकिन सत्ता की उम्मीद लगाए बैठी बांगलादेश नैशनल पार्टी की अध्यक्ष खालिदा जिया कुछ भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. वे एक तरह से जमाते इस्लामी की आवाज़ में बात कर रही है.

सबको मालूम है कि १९७१ में जमाते इस्लामी की भूमिका बंगलादेश की स्थापना के विरोध में थी. सबको यह भी मालूम है कि जब जनरल याहया खान ने १९७१ में बंगलादेश के मुक्ति संग्राम को कुचल देने के लिए ढाका में जनरल टिक्का खान को तैनात किया था तो  बलात्कार की सारी घटनाएं इसी जमाते इस्लामी के रजाकारों की मिलीभगत से हुयी थीं. इसलिए जमाते इस्लामी की ख्याति एक खूंखार आतंकी संगठन के रूप में बंगलादेश में मानी जाती है और इसी कारण से सरकार ने उसपर पाबंदी लगा रखी है लेकिन खालिदा जिया, पता नहीं किस मजबूरी के चलते जमात का साथ पकडे हुए हैं .इसी जमाते इस्लामी की मदद से उन्होने २०१३ में कई बार हड़ताल करवाई, हिंसा हुयी और ८५ दिन तक बंद रखवाया. खालिदा जिया के उत्साह का कारण शायद यह है कि कुछ नगरों में हुए मेयर पद के चुनाव में खालिदा जिया की पार्टी ने सत्तधारी पार्टी को बुरी तरह से हरा दिया था. इसीलिए वे चुनाव के पहले एक ऐसी सरकार के अधीन चुनाव संपन्न करवाना चाहती थीं जो शुद्ध रूप से टेक्नोक्रेट लोगों की सरकार हो उसमें कोई राजनीतिक व्यक्ति न हो लेकिन शेख हसीना ने इस बात को यह कह कर खारिज कर दिया कि संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है .लेकिन खालिदा जिया एक नहीं मानीं. २९ दिसंबर २०१३ को उन्होने एक जुलूस निकाला और उसे मार्च आफ डेमोक्रेसी नाम दिया. उस दौरान बहुत हिंसा हुई. चुनाव के ऐन पहले ४ जनवरी के दिन कई बूथों में आग लगा दी गयी. सडकों पर ब्लाकेड लगा दिए गए और ऐसी हालात पैदा कर दिए गए कि सरकार को बहुत सारे  राजनीतिक नेताओं को जेल में डालना पडा.

अब तो  खालिदा जिया बातचीत के लिए तैयार नज़र आती हैं लेकिन हड़ताल और आन्दोलन के दौरान वे विजेता की तरह चलती थीं. बंगलादेश के मुक्तिसंग्राम मे  भारत के योगदान से कोई नहीं इनकार करता लेकिन बेगम खालिदा जिया भारतीय नेताओं की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थीं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब बंगलादेश की यात्रा पर गए थे और खालिदा जिया से मुलाक़ात का कार्यक्रम बन चुका था. उसके बावजूद उन्होने मना कर दिया . जमाते इस्लामी वाले प्रधानमंत्री शेख  हसीना  को भारत की कठपुतली साबित करने पर आमादा रहते हैं और उनको सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री काजी लेंदुप दोरजी की तरह का बताते हैं. आन्दोलन के दौर में खालिदा जिया ने भी कई बार शेख हसीना को काजी लेंदुप दोरजी जैसा कहा जबकि उनको मालूम है कि ऐसा नहीं है. लेकिन अब लगता है कि उनको अहसास हो गया है की ज़्यादा बढ़ बढ़ कर बात करने से कुछ नहीं होने वाला था और शायद इसीलिये न्यूयार्क टाइम्स को दिये गये इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि जमाते इस्लामी से रिश्ता स्थाई नहीं है और दोबारा चुनाव पर भी बात हो सकती है. जहां तक शेख हसीना की बात है वे तो बातचीत का आमंत्रण पहले ही दे चुकी हैं. बस उनकी एक शर्त है कि हिंसा का रास्ता छोड़ना पडेगा.

12 January 2014

स्वामी विवेकानंद की 151वीं जयंती पर कोटि- कोटि प्रणाम !

सिर्फ 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन का छोटा सा जीवन लेकिन कद इतना बड़ा की विश्व में करोड़ों लोग स्वामी विवेकानंद को न सिर्फ अपना आदर्श मानते हैं बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलते हैं स्वामी विवेकानंद ऐसे व्यक्ति थे जिन्होनें सदियों से गुलामी में जकड़े भारतवासियों को मुक्ति का रास्ता सुझाया और जन-जन के मन में भारतीय होने के गर्व का बोध कराया ऐसे महान स्वामी विवेकानंद जी को 151वीं जयंती पर कोटि- कोटि नमन।

स्वामी विवेकानंद जी बचपन से ही बड़े ही जिज्ञासु स्वभाव के व्यक्ति थे। परमात्मा को जानने की इच्छा उनमें प्रबल थी। पगड़ी, कोरो तथा गेरुए पोशाक में किसी भी संयासी को देख वो हमेशा बड़े होकर वैसा ही बनने की अकांक्षा व्यक्त करते थे। भारत भारतवर्ष में गुरु-शिष्य की प्राचीन परंपरा रही है। जितने भी महान लोग हुए हैं उनके पीछे कहीं न कहीं उनके गुरुजनों के स्नेह और आर्शीवाद का ही हाथ रहा है। ठीक इसी प्रकार कलकत्ता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर के संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के के प्रेम व आशीर्वाद से ही स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति एवं हिन्दू धर्म का प्रचार करके संसार का आध्यात्मिक मार्ग दर्शन किया।

स्वामी विवेकानंद जी ऐसे व्यक्ति हुए जिन्होंने पैदल ही पूरे भारत में भ्रमण किया और समाज को अन्याय, शोषण और कुरितियों के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस प्रदान किया। पाश्चात्य संस्कृति की ओर खींची चली जा रहीं युवा पीढ़ी को उन्होंने रोकने का प्रयास किया और उनके मन में स्वदेश प्रेम एवं हिन्दूत्व-जीवन दर्शन के प्रति विश्वास पैदा किया।

स्वामी विवेकानंद का मानना था कि अध्यात्म-ज्ञान और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा। उन्होंने अपने इस विश्वास को पूरा करने के लिए रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। अमेरिका में भी उन्होंने इसके कई शाखाएं स्थापित की। स्वामी विवेकानंद के विचारों ने तब न केवल भारतीयों को बल्कि अमेरिकन विद्वानों को भी बहुत प्रभावित किया था और यही कारण था कि अनेक अमेरिकन विद्वानों ने भी उनकी शिष्यता ग्रहण की थी।

आज हमने स्वामी विवेकानंद के माध्यम से जाना कि गुरु का क्या महत्व है, गुरु भक्ति क्या होती है? मानव कल्याण और देश के लिए अपना समस्त जीवन नौछावर कर देना। ऐसे महान व्यक्ति स्वामी विवेकानंद को हमारा सत् सत् नमन है।

11 January 2014

पत्रकारों की पीड़ा और राजनीति !

राजनीतिक माहौल है सो राजनीति चरम पर है। उसपर से कांग्रेस और भाजपा को चुनौती देती ‘आप’ ने सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनने के बाद पूरे देश में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की लहर फ़ैल गयी है। बड़ी संख्या में आम और खास लोग पार्टी से जुड़ रहे हैं। पत्रकार भी इसमें पीछे नहीं। इस खबर के बाद ये कयास लगाया जाने लगा कि टेलीविजन के कई और नामी-गिरामी पत्रकार ‘आप’ के साथ जुड़ सकते हैं।

समस्या जिससे मुंह मोड़ते आये हैं ऐसे सभी पत्रकार

देश भर में खुले आम युवा पत्रकारों का शोषणहो हो रहा है। दुनिया की प्रतिष्ठ‍ि‍त फोर्ब्स पत्रिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार एक रिपोर्टर की नौकरी से अच्छा काम वेटर का होता है। फोर्ब्स की रिपोर्ट तो पूरी दुनिया में हुए सर्वे पर आधारित है। वास्तव में देखा जाये तो भारत में ता स्थिति और भी ज्यादा खराब है। यहां तमाम अखबार ऐसे हैं, जहां के रिपोर्टर वेटर तो दूर, उनका वेतन मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। यह वो समस्या है, जिससे तमाम पत्रकार जो राजनीति में आये, सांसद बने, महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे लेकिन हल करने की कोशिश कभी नहीं की। और इस समस्या से भारत के मीडिया को उबरना बेहद जरूरी है।

हर साल 63000 नये पत्रकार

90 के दशक में देश भर में जब कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खुलने शुरू हुए थे, तब भारतीय मीडिया ने क्वालिटी पर सवाल उठाया था अब जब यही हाल मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म संस्थानों का है, तो मीडिया में एक भी खबर ऐसी नहीं दिखाई देती है, जिसमें किसी जर्नलिज्म कॉलेज की क्वालिटी की चर्चा की गई हो या फिर किसी मास कॉम संस्थान पर उंगली उठाई गई हो। अगर शिक्षा डॉट कॉम की मानें तो देश भर में 450 से ज्यादा पत्रकारिता के संस्थान हैं। इनमें विश्वविद्यालयों में चलने वाले पत्रकारिता विभाग भी शामिल हैं। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, रेडियो जर्नलिज्म, टीवी जर्नलिज्म, एडवर्टीजमेंट, क्रिएटिव राइटिंग, पीजी डिप्लोमा , अंडर ग्रेजुएट डिग्री, पोस्टग्रेजुएट कोर्स आदि में से औसतन 4 कोर्स एक संस्थान में चलते हैं। प्रत्येक कोर्स में औसतन 35 सीटें होती हैं। यानी कुल मिलाकर सभी पाठयक्रमों से देश भर में 63 हजार से ज्यादा छात्र पत्रकार बनकर निकलते हैं। 

अगर फीस की बात करें तो सरकारी संस्थानों में 20 से 30 हजार रुपए प्रति सेमेस्टर और निजी संस्थानों में 50 हजार से 1 लाख रुपए प्रति सेमेस्टर फीस होती है, जिसे देने में तमाम माता-पिता शायद कर्जे में डूब जाते होंगे। लेकिन इन बच्चों के करियर की शुरुआत इतनी खराब होती है, शायद उतनी किसी भी क्षेत्र में नहीं होती होगी। सैलरी की शुरुआत 1 हजार से ढाई हजार तक होती है। अगर दिल्ली, नोएडा जैसे शहर में हैं, तो 4 से 5 हजार से शुरुआत हो सकती है। ऐसा सिर्फ छोटे अखबारों में नहीं बल्कि कई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस इसी स्ट्रक्चर पर रिपोर्टर रखते हैं। यही नहीं चाहे वो नरेंद्र मोदी का गुजरात हो या अखिलेश यादव का उत्तर प्रदेश या फिर पृथ्वीराज चव्हाण का महाराष्ट्र हर जगह ऐसे तमाम चैनल व अन्य मीडिया हाउस हैं, जहां पर चार-चार महीने तक वेतन नहीं मिलता।

सालों साल हो जाता है अखबारों व इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में सैलरी बढ़ती नहीं, और नौकरी से कब निकाल दिया जाये, किसी को पता नहीं होता है। तमाम मीडिया हाउस में तो पत्रकार सुबह ड्यूटी पर निकलते हैं, तो उन्हें यह भी विश्वास नहीं होता है, कि शाम तक उनकी नौकरी रहेगी या नहीं। अगर श्रम कानून की धज्जियां किसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा उड़ाई जाती हैं, तो वो मीडिया है। एक दर्जन से भी कम मीडिया हाउस हैं, जो वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करते हैं। जबकि देश में चैनलों को अलग कर दिया जाये तो सिर्फ प्रिंट में ही 94,067 समाचार पत्र, पत्रिकाएं शामिल हैं। रजिस्ट्रार ऑफ न्यूज पेपर्स इन इंडिया से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रिंट मीडिया 8.43 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। जबकि भारत की जीडीपी 4.8 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। बीते 2013 में 21,897 नई एप्लीकेशन आयीं।

क्यों पकड़ते हैं गलत राह

पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत हजारों लोग कम सैलरी और दिन भर खुद को आग की भठ्ठी में झोंकने के बाद भी खुश रहते हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण समाज के लिये कुछ करने की इच्छा होती है, जो उसके मनोबल को टूटने नहीं देती। लोगों के बीच सम्मान होता है, जो उसके मनोबल को हमेशा ऊंचा रखता है और दिल में औरों से कम सैलरी का दर्द होता है, जो वो किसी से नहीं बांटते हैं। इस दर्द को तमाम मीडिया हाउस न तो समझते हैं और न ही समझना चाहते हैं। यही कारण है कि तमाम पत्रकार, जिनके परिवार का पेट वेतन से नहीं भर पाता है, तो वो गलत राह पकड़ लेते हैं, और देखते ही देखते दलाली के दलदल में ऐसे फंसते हैं, कि जीवन भर नहीं निकल पाते हैं।

देश की जीडीपी की दुगनी रफ्तार से बढ़ रहे मीडिया में किस कदर मानव संसाधन का दोहन हो रहा है, इसका अंदाजा आपको लग गया होगा। लेकिन अफसोस इस बात का है कि देश में प्रहरी के रूप में काम करने वाला यह क्षेत्र अपने ही घर की बदहाली के ख़िलाफ आवाज नहीं उठा पा रहा है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जनता के हक की बात करती है। इसी जनता के बीच खड़े पत्रकारों को उनका हक दिलाने की बात कभी नहीं करती।

तमाम एसोसिएशन लेकिन सशक्त कोई नहीं

पत्रकारों के संगठनों की बात करें तो देश भर में 500 से ज्यादा जर्नलिस्ट एसोसिएशन हैं। अगर राष्ट्रीय स्तर की बात करें तो श्रमजीवी पत्रकार यूनियन, न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया प्रेस एसोसिएशन, ऑल इंडिया मीडिया एसोसिएशन, ऑल इंडिया वर्किंग जर्नलिस्ट एसोसिएशन समेत तमाम संगठन हैं, लेकिन कोई भी मीडिया जगत में इस अव्यवस्था के ख़िलाफ आवाज़ को बुलंद नहीं कर पाया।

पत्रकारों का हक कभी नहीं दिला पायेंगे राजनीतिक दल

इसे खराब चलन कहें या अच्छा, लेकिन भारत पर यह बात बिलकुल फिट बैठती है, “जो दिखता है वही बिकता है”। इसका जीता जागता उदाहरण आम आदमी पार्टी है। कहीं न कहीं पार्टी को दिल्ली की सल्तनत दिलाने में मीडिया की अहम भूमिका रही है। जाहिर सी बात है, जिस मीडिया ने सत्ता तक पहुंचाया है, उस मीडिया के ख़िलाफ आम आदमी पार्टी क्यों आवाज उठायेगी। यही बात भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, बसपा, सपा, सभी पर लागू होती है। सभी जानते हैं कि उन्होंने पत्रकारों को हक दिलाने की बात की नहीं, कि मीडिया हाउस चिढ़ जायेंगे और उन्हें कवरेज मिलना बंद हो जायेगा।

चलिये अब जानते हैं  देश में उन जाने- माने पत्रकारों को जो मी‍डिया की लाइन छोड़कर राजनी‍ति में आये:

1- एमजे अकबर- जिन्होंने 1989 में बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़ा और सांसद बने। बाद में 1991 में लोकसभा चुनाव हार गये, लेकिन राजीव गांधी के सलाहकार व प्रवक्ता बने।

  • अहम बात: यह कि वो देश के सबसे शक्त‍िशाली यानी प्रधानमंत्री के सबसे करीब रहे। 
2- राजीव शुक्ल- एक पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और फिर वर्ष 2000 से लेकर यानी पिछले 14 सालों से वो सांसद हैं।
  • अहम बात: पिछले 10 सालों से आपकी सरकार केंद्र में कई बड़े फैसले ले रही है।
3- अरुण शौरी- एक पत्रकार जो भारतीय जनता पार्टी की सरकार में सांसद रहे।
  • अहम बात: आपके कार्यकाल में संचार एवं सूचना तकनीक मंत्रालय इन्हीं के पास रहा। 
4- मनीष सिसोधिया- आम आदमी के बीच से निकला एक पत्रकार जो अब दिल्ली विधानसभा में काबिज हैं।
अहम बात: दुनिया की समस्याएं लेकर तमाम मंचों पर गये, लेकिन जिस समस्या की हम बात करने जा रहे हैं, उस पर नजर तक नहीं डाली।

5- चंदन मित्रा- एक पत्रकार से राज्य सभा के सांसद तक का सफर तय किया।
  • अहम बात: वर्तमान में एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।

तो अब जन आंदोलनों को साफ करेगी ‘आप’ की झाड़ू !

कुछ साधन संपन्न सिविल सोसाइटी समूहों ने सोशल मीडिया, विदेशी धन, बेहतरीन साज-सरंजाम, कुशल प्रबंधन और अण्णा के त्यागतप के सहारे ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ (आईएसी) का गठन किया। उन्होंने ऐसे समय जन लोकपाल का मुद्दा खड़ा किया जब देश में घोटाले पर घोटाले हो रहे थे और आम जन सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार से बुरी तरह त्रस्त था। इण्डिया के मुखर मध्यवर्ग के खाये-पिये और अघाये लोगों को इस आंदोलन ने अपने से जोड़ लिया। गहराई से देखा जाय, तो आंदोलन के निशाने पर भ्रष्टाचार या उसका उद्गम स्थल बिल्कुल भी नहीं था। वह तो सिर्फ़ एक कानून के बनने-भर से काफ़ी हद तक भ्रष्टाचार के ख़त्म होने की बात करता था। आगे चलकर आंदोलन ही दो फाँड़ हो गया। एक आंदोलन के रास्ते पर आगे बढ़ा तो दूसरा धड़ा सीधे सत्ता और दल की राजनीति में उतर गया। 

दिन रात चौबीसों घंटे आईएसी के आंदोलन का इतना ज़बरदस्त प्रचार-प्रसार होने लगा कि भारत में बुनियादी मुद्दे से जुड़े तृणमूल स्तर पर जगह-जगह चल रहे अन्य जन आंदोलनों की गूँज अनसुनी हो गयी और वे नेपथ्य में चले गये। दरअसल वे ज़मीनी आंदोलन कॉरपोरेट-नीत भूमण्डलीकरण की व्यवस्था को चुनौती दे रहे थे जो सरकारी तंत्र और राजनीतिक नेतृत्व में व्याप्त बड़े भ्रष्टाचार का मूल स्रोत है। उस भ्रष्टाचार के वाहक नेता और नौकरशाह बने हुए हैं। आईएसी भ्रष्टाचार के मूल स्रोत कॉरपोरेट-नीत बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद के खि़लाफ नहीं था। वह केवल भ्रष्टाचार के वाहक एजेंटों यानी नेताओं और नौकरशाहों को एक सर्वसत्तात्मक संस्था जन लोकपाल के अन्तर्गत लाना चाहता था। भ्रष्टाचार कॉरपोरेट-केंद्रित विश्वव्यवस्था का एक लक्षण मात्र है। सच कहा जाय, तो आईएसी उस व्यवस्था की छाया से लड़ रहा था, व्यवस्था से नहीं। स्वाँगयुक्त इस छाया-युद्ध का एक ख़तरनाक पहलू यह था कि कॉरपोरेटीकरण, अंधाधुंध शहरीकरण, मेगा औद्योगीकरण, बहुराष्ट्रीयकरण, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तथा विकास के नाम पर विनाश के खि़लाफ़ देश-भर में जगह-जगह चल रहे ज़मीनी आंदोलनों का तेज़ और ताप मंद पड़ता गया।

इन जन आंदोलनों के मुद्दे मूलगामी हैं। देश के जल, जंगल, जमीन, खनिज या धात्विक पदार्थ जैसे अनमोल प्राकृतिक संसाधन भीमकाय प्रकल्पों और संयंत्रों की भेंट चढ़ते जा रहे हैं। बड़े पैमाने पर स्थानीय या देशज समुदायों के लोग भारी संख्या में अपनी आबादियों या बस्तियों से जबरन उजाड़े जा रहे हैं। उनकी  आजीविका के बुनियादी या परंपरागत स्रोतों को ख़त्म किया जा रहा है। विदेशों से होने वाले सस्ते आयातों के चलते छोटी-मझोली उत्पादन इकाइयाँ और अनौपचारिक क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाली अनगिनत रोज़गारदायी या  स्वरोज़गारी कारोबारी गतिविधियाँ ख़त्म हो रही हैं। इस प्रकार भारी पैमाने पर देश का अनौद्योगीकरण हो रहा है।

जन लोकपाल के लिए जब अण्णा टीम मुहिम चला रही थी तब उसकी तरफ स्थानीय जन आंदोलनों से जुड़े तमाम समाजकर्मी, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी खिंचे चले गये क्योंकि उन्हें लगा कि ऐसा करने से उनकी  लड़ाइयाँ भी मज़बूत होंगी और आगे बढ़ेंगी। वे अण्णा टीम के मंच पर अथवा उसके इर्द गिर्द नज़र आने लगे। उनमें से कइयों को बोलने का मौक़ा मिला और उन्होंने अपने आंदोलन के मुद्दे भी उठाये। जन लोकपाल का मुद्दा प्रमुख हो गया। अन्य मुद्दे उसमें सर्वथा विलीन हो गये अथवा एकदम गौण हो गये।

आईएसी का वह धड़ा जो सत्ता और दल की राजनीति में है, अब आम आदमी पार्टी (‘आप’) के रूप में उभरकर सामने आ चुका है। दिल्ली में 28 सीटें फ़तह करने के बाद ‘आप’ के हौसले बुलंद हैं। वह आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ताल ठोंकने जा रहा है। देश-भर में उसे उम्मीदवारों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भारी संख्या में तलाश है। संभवतः उसे संसाधनों की क़िल्लत नहीं है। एनआरआई- एनजीओ-कॉरपोरेट गठबंधन उसकी मदद के लिए है। उसे बस नेता चाहिए, कार्यकर्ता चाहिए। अब उसकी निगाहें तृणमूल स्तर पर चल रहे आंदोलनों के उन कार्यकर्ताओं की तरफ़ है जिनका स्थानीय जनाधार है, लोगों के बीच जिनकी साख़ है, जिनकी साफ़-सुथरी छवि है और जो अच्छे वक्ता हैं। इन निर्दलीय लोगों को अपनी ओर खींचने की कोशिशें चल रही हैं। दिल्ली के विधानसभा चुनावों में देश-भर से ऐसे लोग पहुँचे भी थे जिन्होंने ‘आप’ के उम्मीदवारों को जिताने के लिए मतदाताओं के बीच काम किया था।

देश में कई ऐसे छोटे-छोटे प्रतिबद्ध राजनीतिक दल या जनसंगठन हैं जो चुनावी राजनीति से परहेज़ नहीं रखते हैं। वे ‘आप’ की ओर जा सकते हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नायिका मेधा पाटकर का नाम सामने आने ही लगा है। किशन पटनायक द्वारा गठित समाजवादी जन परिषद् उनमें से एक है। वह तो आम आदमी पार्टी में लगभग विलीन हो चुकी है। पुराने लोहियावादियों ने सोशलिस्ट पार्टी को पुनरुज्जीवित किया है। उसके भी अधिकांश लोग ‘आप’ की ओर झुके हुए हैं। लेकिन यह बहुत बड़ी दुर्घटना होगी यदि देश के ज़मीनी आंदोलन अपने बुनियादी मुद्दों को दरकिनार कर एक राजनीतिक दल के पुरजे बन जाते हैं। ये आंदोलन एक नयी समाज-रचना के पैरोकार हैं। एक तरफ़ वे विकास के मौजूदा मॉडल को चुनौती दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ वे लोगों को जनता के बुनियादी सवालों पर संवदेनशील और जागरूक बना रहे हैं। इन आंदोलनों में देश का भविष्य छिपा हुआ है। शांतिपूर्ण ढंग से सामूहिक तौर पर एकजुट होकर अन्याय का प्रतिकार, सड़ी-गली व्यवस्था से असहयोग, ग़लत क़ानूनों के खि़लाफ़ सिविल नाफ़रमानी तथा लोकशक्ति के जरिये नयी समाज रचना का अधिष्ठान - ये सब तत्त्व इन आंदोलनों के कार्यक्रमों में अक़्सर दिख जाते हैं।

अगर ये आंदोलन तेज़ होंगे, तो तृणमूल स्तर पर लोगों के बीच से परिवर्तनधर्मी ऱाजनीति की प्रक्रिया शुरू होगी जिससे नया नेतृत्व प्रकट होगा। स्वतः स्फूर्त आंदोलनों के जरिये नीचे से लोकशक्ति पर टिकी जिस वैकल्पिक राजनीति का चक्रप्रवर्तन या उभार होगा वह बुनियाद से लेकर ऊपर तक सारी व्यवस्था का कायाकल्प कर सकती है। एक दूसरे को ऊर्जा देते हुए और एक दूसरे से ऊर्जा लेते हुए परस्पर मैत्री भाव रखकर देश-भर के जन आंदोलनों को एक नया राजनीतिक ढाँचा गढ़ना है। क्या वे इस चुनौती को स्वीकार करेंगे अथवा यथास्थितिवादी राजनीति के बियाबान में खो जायेंगे? जेपी (जयप्रकाश नारायण) कहा करते थे कि आंदोलनों के गर्भ से नयी राजनीतिक ताक़त पैदा होगी जो सामाजिक बदलाव करेगी। अब ज़रूरत है इस मूलमंत्र को गाँठ बाँध रखने की। आजादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता प्रो. बनवारी लाल शर्मा ने लिखा था, ‘‘इस प्रक्रिया में नीचे से राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा होगी, नया नेतृत्व उभरेगा, वह नीचे से बढ़ता-बढ़ता ऊपर तक की राजनीति को चलायेगा। एक नयी राजनीति का जन्म होगा।’’

गाड़ी बंगला और विवाद !

जनता ने सादगी की जितनी अपेक्षाएं केजरीवाल सरकार से लगा ली हैं, उनमें यही होना था, जो हो रहा है। उनकी हर हरकत पर पैनी नजर रखी जा रही है। तभी तो लोगों ने अरविंद केजरीवाल को टाइप सिक्स का डबल डुप्लेक्स बंगला मिलने पर इसका सबब पूछ लिया। ‘मुख्यधारा’ के किसी राजनीतिक दल के किसी मुख्यमंत्री को इससे भी बड़े फ्लैट अलॉट हो जाते, तो यकीनी तौर पर सवाल नहीं उठते। अभी तक उठे भी नहीं हैं। अरविंद केजरीवाल सरकार के सामने सुशासन देने से ज्यादा बड़ी अपनी ‘कमीज’ उजली रखने की चुनौती दरपेश है। कहीं ऐसा न हो कि ‘आप’ न तो अपनी कमीज उजली रख पाए और न ऐसा सुशासन दे पाए, जिसकी उम्मीद पूरे हिंदुस्तान और दीगर दुनिया ने भी लगा रखी है। गाड़ी बंगला विवाद के बाद केजरीवाल का छोटे घर में रहने का फैसला संकेत है कि वे विरोधियों और मीडिया के दबाव में आ गए हैं। इसे अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता। 

यह समझ से परे है कि आखिर उनके विरोधी और आलोचक चाहते क्या हैं? क्या यह कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री दीन-हीन बनकर रहे और वे सुविधाएं भी न ले, जो उसका अधिकार, और जरूरत हैं? किसी भी मुख्यमंत्री को इतनी जगह मिलनी ही चाहिए, जहां बैठकर वह उन वादों को पूरा कर सके, जो उसने जनता से किए हैं। ठीक है कि अरविंद ने दबाव में आकर छोटी जगह लेने की बात कही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह छोटी जगह पर अपने काम को ठीक तरह से अंजाम दे पाएंगे? यदि अरविंद सरकार को छोटी-छोटी बातों पर घेरा जाएगा, तो शायद वह ऐसा कुछ न कर पाए, जिसकी आशा जनता ने उससे लगा रखी हैं। सादगी का मतलब यह नहीं होता कि मुख्यमंत्री सरकारी काम के लिए भी अपनी गाड़ी का इस्तेमाल करे। अगर वह ऐसा करेगा, तो इतना पैसा कहां से लाएगा? व्यक्तिगत आवास में रहेगा, तो उसके मेंटिनेंस का खर्च कौन उठाएगा? क्या मुख्यमंत्री भी पुलिस की तरह सरकारी जीप में तेल डलवाने के लिए भ्रष्ट तरीके से पैसा कमाए? क्या ऐसा करना किसी को भी भ्रष्टाचार की ओर ले जाना नहीं होगा? हां, जब किसी को यह दिखाई दे कि दिल्ली का मुख्यमंत्री या कोई मंत्री-विधायक अपने बच्चों को सरकार गाड़ी में कनॉट प्लेस पर आइसक्रीम खिलाने ले जा रहा है, तो वाकई यह बुरी बात होगी।

जब गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तो उनके सामने एक बैठक में हुए खर्च का बिल आया, जिसमें चाय के साथ नाश्ते का बिल भी जुड़ा था। पंत ने कहा कि सरकार की ओर से तो सिर्फ चाय का प्रावधान है, यह नाश्ते का बिल किसलिए? जवाब आया कि चाय के साथ नाश्ता भी है, तो क्या फर्क पड़ता है? पंत जी ने नाश्ते के पैसे अपनी जेब से दिए और सिर्फ चाय का बिल पास किया। यानी उन्होंने नाश्ते का बोझ सरकारी खजाने पर नहीं डाला। दरअसल, अरविंद केजरीवाल से यही उम्मीद है कि वह सरकारी खजाने का दुरुपयोग नहीं होने देंगे, लेकिन चाय का बिल भी केजरीवाल ही भरें, यह तो मुमकिन नहीं हो सकता। देखा जाए, तो जिस तरह से सरकारी खजाने को लुटाया जा रहा है, उसे रोकने की जरूरत है और केजरीवाल का मिशन भी यही है। सरकारी खजाने की लूट ही वह भ्रष्टाचार है, जो पूरे देश में मची है। यही लूट देश के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा भी है। सवाल यह है कि आप सरकार पर होने वाले न्यूनतम सरकारी खर्च ज्यादा अहमियत रखते हैं या करोड़ों हजार रुपये के घोटालों को रोकना?

हमारे देश की जनता की त्रासदी है कि वह ऐसे राजनीतिक दलों को तो बार-बार मौका देती रहेगी, जिन्होंने इस देश को रसातल में ले जाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, लेकिन अलग हटकर चलने का वादा करने वाले राजनीतिक दल से उम्मीद करेगी कि उनके नेता ‘देवता’ सरीखे हों। कोई शख्स सर्वगुण संपन्न नहीं होता। थोड़े बहुत अवगुण होना मानवीय कमजोरी है, जिन्हें बड़े मकसद के लिए नजरअंदाज किया जाना चाहिए। 1977 में जब जेपी के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन चला और जनता पार्टी ‘संपूर्ण क्रांति’ के नाम पर देश की सत्ता पर काबिज हुई, तो उससे भी ऐसी ही अपेक्षाएं रखी गईं थीं, जो आज ‘आप’ से लगाई जा रही हैं। नतीजा यह हुआ था कि जनता पार्टी सरकार ‘अपेक्षाओं’ के बोझ से 19 महीने में ऐसी धराशायी हुई कि दोबारा नहीं पनप सकी। ऐसा ही 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी जनता दल सरकार के साथ हुआ था। ‘आप’ के साथ ऐसा न हो, इसके लिए यह जरूरी है कि उससे सौ प्रतिशत परिणाम देने की अपेक्षा न रखी जाए। कोई भी सरकार सड़ चुके सिस्टम को दो-चार महीने में तो क्या पांच साल में भी नहीं बदल सकती। हां, उसमें कुछ कमी जरूर ला सकती है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने सब कुछ सही नहीं कर दिया, जो जनता ने उन्हें दोबारा मौका दिया है। बस, उन्होंने दूसरों की अपेक्षा बेहतर शासन दिया है।

समस्या यह है कि जनता या कह लीजिए कि विरोधी ‘आप’ को ‘जीरो टॉलरेंस’ की कसौटी पर कस रहे हैं। कह नहीं सकते कि ‘आप’ की सरकार कितने दिन चलेगी, लेकिन जितने दिन भी चले, उससे उम्मीद यही है कि वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी, जिससे यह साबित हो जाए कि सत्ता में आने के बाद सभी की कमीजों पर दाग लग ही जाता है। लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि सरकार चलाने वालों को मिले अधिकार को ही ‘दाग’ कहकर इतना प्रचारित कर दिया जाए कि वह असली लगने लगें? देश में अपने विरोधियों को चित करने के लिए कौन छद्म दुष्प्रचार करता है, इसे भी केजरीवाल अच्छी तरह समझते हैं। यह भी नहीं समझना चाहिए कि ‘आप’ के सभी कार्यकर्ता, विधायक या मंत्री दूध के धुले ही होंगे। इनमें कुछ ऐसी ‘खरपतवार’ भी होगी, जो खेत की फसल को खाने का काम करेगी। उस खरपतवार से केजरीवाल कैसे निपटेंगे, यह देखना दिलचस्प होगा। आज तो अरविंद के ऊपर दो बड़े घर लेने पर उंगलियां उठी हैं। अभी तो उनके हर कदम पर सबकी बहुत बारीक और पैनी नजर रहेगी। लेकिन यदि केजरीवाल यही सोचते रहे कि कहीं उनकी कमीज पर दाग न लग जाए, तो शायद न इधर के रहेंगे, न उधर के। सरकार उनकी है, उनके पास अधिकार हैं। विरोधियों और मीडिया का काम है आलोचना करना। इनसे डरकर कदम वापस खींचना उनके लिए घातक हो सकता है।

07 January 2014

क्या कॉरपोरेट समूह में महिलाओं की भागीदारी घटी है ?

भले ही कुछ दिग्गज वित्तीय/बैंकिंग, कारोबारी या मेगा औद्योगिक कॉरपोरेट-समूहों में महिलाएँ शीर्ष पदों पर पहुँच जायँ लेकिन वहाँ की श्रमशक्ति में स्त्रियों की हिस्सेदारी बहुत ही कम है। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के ‘सेण्टर ऑफ एक्सीलेंस फॉर सस्टेनेबुल डेवलपमेण्ट’ (सीईएसडी) ने अभी एक सर्वेक्षण पूरा किया है जो ‘बिज़नेस रेसपांसिबिलिटी इण्डिया सर्वे, 2013’ के नाम से जारी हुआ है। उस सर्वेक्षण में बाज़ार पूँजीकरण की दृष्टि से चोटी की 200 कम्पनियों को शामिल किया गया है। उनमें 56 प्रतिशत कम्पनियाँ ऐसी हैं जिनकी श्रमशक्ति में स्त्रियों की भागीदारी 10 प्रतिशत से भी कम है। 

अमरीकी पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने कॉरपोरेट कारोबारी दुनिया की उन 50 महिला लीडरों की ‘ग्लोबल’ सूची जारी की है, जो सबसे ज़्यादा रुतबा या रसूख़ रखती हैं। इस सूची में 4 भारतीय महिलाएँ भी शामिल हैं। इसमें आईसीआईसीआई बैंक की एमडी एवं सीईओ चन्दा कोचर को चौथा स्थान मिला है। 17 वें स्थान पर हैं चित्रा रामकृष्णा, जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की एमडी एवं सीईओ हैं। एक्सिस बैंक की एमडी एवं सीईओ शिखा शर्मा 32वें स्थान पर तथा इसी प्रकार भारत में एचएसबीसी की कंट्री हेड व एचएसबीसी एशिया-पैसिफ़िक की निदेशक नैना लाल किदवई 42वें स्थान पर हैं। ‘फोर्ब्स’ की सूची आने से काफ़ी पहले अगर अरुन्धती भट्टाचार्य भारतीय स्टेट बैंक की चेयरपर्सन के पद पर आसीन रही होतीं, तो सम्भवतः उनका नाम भी इस सूची में शामिल रहता। ध्यान रहे कि गत 13 अक्टूबर को सुश्री भट्टाचार्या ने स्टेट बैंक की कमान सँभाली थी और ‘फोर्ब्स’ द्वारा तैयार सूची उजागर हुई 20 अक्टूबर को। अमरीका के लिए अलग से ऐसी सूची जारी हुई है, जिसमें भारतीय मूल की इन्दिरा नूयी ने अपना दूसरा स्थान बरकरार रखा है।

वर्ष 2011 से ‘फॉर्च्यून इण्डिया’ भारत की 50 सबसे ज़्यादा ताक़तवर कारोबारी नेत्रियों की सूची जारी कर रहा है। इस बार यानी वर्ष 2013 में आईसीआईसीआई बैंक की एमडी एवं सीईओ चन्दा कोछड़ इस सूची में पहला नाम है। वे लगातार तीसरी बार प्रथम स्थान पर क़ाबिज़ रहने में कामयाब रही हैं। शिखा शर्मा (एक्सिस बैंक), अरुणा जयन्ती (कैपजेमिनी इण्डिया), प्रीता रेड्डी (अपोलो हॉस्पिटल्स), मल्लिका श्रीनिवासन (टैªक्टर्स ऐण्ड फॉर्म इक्विपमेण्ट), शोभना भरतिया (एचटी मीडिया), किरण मजूमदार-शॉ (बॉयोकान), जिया मोदी (एजे़डबी), विनीता बाली (ब्रिटानिया) और नैना लाल किदवई (एचएसबीसी) क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठें, सातवें, आठवें, नौवें और दसवें स्थान पर हैं। इस बार उक्त सूची में 7 नये शामिल भी हुए हैं- यास्मीन हिल्टन (चेयर पर्सन, शैल इण्डिया), वनिता नारायण (एमडी, आईबीएम इण्डिया), अनीता डोंगरे (फैशन डिज़ाइनर), एन भुवनेश्वरी (वाइस-चेयरपर्सन एवं एमडी, हेरिटेज फूड्स), आशु सुयश (सीईओ, एल ऐण्ड टी इंवेस्टमेण्ट मैनेजमेण्ट) और अवनि सागलानी दावदा (सीईओ, टाटा-स्टारबक्स इण्डिया)। इसमें अन्य जिन लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं वे हैं - बालाजी टेलीफ़िल्मस की एकता कपूर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की चित्रा रामकृष्णा और एचडीएसी की रेणु सूद कार्नाड।

कॉरपोरेट-नीत भूमण्डलीकरण के दौर में देश की कुछ महिला बिज़नेस लीडर वैश्विक स्तर पर अगर अपनी पहचान, साख़ या प्रभुता स्थापित कर लेती हैं, तो इससे यह भ्रम बिल्कुल नहीं पालना चाहिए कि आम औरतें आर्थिक या कारोबारी व वित्तीय दृष्टि से सम्पन्न, सशक्त या स्वावलम्बी हो चुकी हैं। दरअसल वैश्वीकृत अर्थतन्त्र के चलते दरिद्रता के महासिन्धु में अतिशय समृद्धि के कुछ टापू ज़रूर उभरे हैं जहाँ विशिष्ट सुविधाभोगी, विशेषाधिकार-सम्पन्न, शक्तिसामन्त और सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र अभिजन रहते हैं। इन महामहिम धनकुबेरों में शामिल स्त्रियों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि आधी आबादी को ईमान की रोटी और इज़्ज़त की ज़िन्दगी मयस्सर है।

देश की कुल कामकाजी आबादी में पिछले दो दशकों 1981-91 एवं 1991-2001 के मुकाबले 2001-2011 के दशक के दौरान स्त्री कामगारों या श्रमजीवियों के अनुपात में कमी आयी है। 1981 के दौरान कुल कामकाजी आबादी में स्त्रियों की भागीदारी 19.7 फ़ीसदी थी जो 1991 में बढ़कर 22.3 फ़ीसदी हो गयी थी। यह आँकड़ा बढ़कर 2001 में 25.6 फ़ीसदी तक पहुँच गया था जो अब घटकर 2011-12 में 21.9 फ़ीसदी हो गया है। यह बात उजागर हुई है राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 68वें चक्र के निष्कर्षों से। विशेषज्ञ तरह-तरह से इन आँकड़ों की व्याख्या कर सकते हैं लेकिन एक बात तो तय है कि वर्ष 2001 से कॉरपोरेट -हितैषी आर्थिक सुधारों की दूसरी खेप की शुरुआत होती है और उसी समय से कामकाजी आबादी में महिलाओं की संख्या घटती जाती है। 2001 में महिलाओं की लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी कुल श्रम शक्ति में थी जो क्रमशः घटकर 2011-12 में लगभग पाँचवें हिस्से पर जा पहुँचती है। दरअसल यही वह दौर है जब कुछ कारोबारी महिलाएँ व्यावसायिक, वित्तीय या विनिर्माता कॉरपोरेट-समूहों में शीर्ष पदों पर क़ाबिज हो जाती हैं। इन्हीं चुनिंदा नामचीन महिलाओं के हवाले से यह कहा जा रहा है कि भूमण्डलीकरण के दौर में जिस प्रकार पुरुष महाबली बनकर वैश्विक स्तर पर कॉरपोरेट-समूहों के साम्राज्य-विस्तार या बाज़ार-अधिग्रहण के दिग्विजय अभियानों का नेतृत्व कर सकते हैं, उसी प्रकार महिलाएँ भी सबला या महाबला बनकर ग्लोबल बिज़नेस लीडर बन सकती हैं और इण्टरनेशनल पावर 50 या 100 में शामिल हो सकती हैं।

इस समय देश में कोई 17 करोड़ स्त्रियाँ खेतीबाड़ी और उससे जुड़ी अनगिनत गतिविधियों से सीधे-सीधे जुड़ी हुई हैं। वे 60 से लेकर 80 फ़ीसदी तक अनाजों, फल-सब्ज़ियों जैसे खाद्य पदार्थों का उत्पादन करती हैं। डेयरी के कारोबार में उनकी 90 फ़ीसदी हिस्सेदारी है। जहाँ तक खेतिहर ज़मीनों के मालिकाना हक़ का सवाल है, उनके नाम सिर्फ़ 13 फ़ीसदी ज़मीन दर्ज है। ज़्यादात़र गाँवों और खेतिहर समाजों में किसान के तौर पर स्त्री की पहचान अभी भी नहीं बन पायी है, वह सिर्फ़ गृहिणी-भर है। ऑक्सफाम इण्डिया ने 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के अवसर पर जो तथ्य-पत्र जारी किया है, उससे ये खुलासे हुए हैं। तथ्य-पत्र में यह भी कहा गया है कि एक फ़सल उगाने के दौरान एक महिला किसान आम तौर पर 3,300 घण्टे काम करती है जबकि पुरुष किसान 1,860 घण्टे। इस देश में किसानी की परख कृषि कर्म से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि सरकारी अभिलेखों में ज़मीन किसके नाम दर्ज है! सरकारी तन्त्र उसी को किसान मानता है जो भूस्वामी है।

गाँवों में स्त्रियाँ खेत-खलिहान में मर-खप रही हैं। वे फ़सलें उगाने के लिए ज़मीन तैयार करती हैं, बीज बोती हैं, उगने पर पौधों की परवरिश करती हैं, फ़सलें काटती हैं, दुधारू पशुओं की देखभाल करती हैं, उपज का रखरखाव करती हैं और आखि़रकार खाना पकाकर थाली में परोसती हैं, लेकिन विडम्बना है कि वे किसान नहीं हैं, जबकि वे ज़मीन पर हैं, भले ही कागज़ में न हों। खेती-किसानी में अब स्थानीय स्तर पर बनने वाले उपकरणों या औज़ारों का इस्तेमाल तेज़ी से घटता जा रहा है। उनके स्थान पर कॉरपोरेट-समूहों द्वारा बनायी जा रही मशीनों की खपत बेतहाशा बढ़ती जा रही है। बड़े-बड़े यन्त्र आने से खेतिहर मज़दूरों और यहाँ तक कि किसान परिवारों के घरेलू सदस्यों की भागीदारी कृषिकार्यों में कमतर होती जा रही है। खेतीबाड़ी में इस्तेमाल की जा रही मशीनें पुरुष ही चलाते हैं क्योंकि दैत्याकार मशीनों पर एकाधिकार या वर्चस्व पुरुषों का हैं। पहले कृषि कार्यवृत्त में स्त्री केन्द्र में थी पर अब उसे परिधि पर धकेला जा रहा है।

हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था में हमेशा से अनौपचारिक या परम्परागत क्षेत्र का दबदबा रहा है जिसमें अधिकांशतः स्त्रियाँ स्वरोज़गाररत हैं। इस क्षेत्र में तरह-तरह के बेशुमार उत्पादक, कारोबारी और सेवामूलक व्यवसायों का जाल बिछा रहा है। इन घरेलू-स्थानीय या आंचलिक छोटे-मझोले उद्योग-धन्धों में स्त्रियाँ बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती रही हैं। आज ऐसी अनगिनत रोज़गारदायी उत्पादक इकाइयों, गतिविधियों एवं प्रवृत्तियों का लोप होता जा रहा है। दोहरी मार पड़ रही है- एक तरफ बाहर से बेरोकटोक जारी भारी मात्रा में सस्ते आयात इनकी क़मर तोड़ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ बड़े-बड़े प्रौद्योगिकी-प्रधान, पूँजी-सघन और रोज़गारभक्षी विनिर्माण-संयन्त्र, उत्पादन-संकुल या कल-कारख़ाने लग रहे हैं जिनसे खेतीबाड़ी उजड़ रही है, रोज़ी रोटी के पुश्तैनी या बुनियादी स्रोत सूख रहे हैं, स्थानीय लोगों या समुदायों का विस्थापन हो रहा है और पर्यावरण का सर्वनाश हो रहा है। बहुमात्र उत्पादन पर टिका कॉरपोरेट-केन्द्रित मॉडल समूल विनाश कर रहा है उस मॉडल का, जो मॉडल ‘लोगों द्वारा उत्पादन’ पर टिका हुआ है। कुल मिलाकर इन सबके फलस्वरूप अनौद्योगीकरण का भीषण संक्रामक रोग देश-भर में फैला हुआ है जिसकी चपेट में सबसे पहले महिलाएँ आ रही हैं।

05 January 2014

दंगाईयों से धर्म के अधार पर भेदभाव करना कितना सही?

उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने लोक सभा चुनाव पास आते ही वोट बैंक के लिए अपने सियासी एजेंडे में जुट गई है। मुजफ्फरनगर में दंगों से पहले भड़काऊ भाषण देने के आरोपी बीएसपी और कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं से सरकार केस वापस लेने की तैयारी कर रही है। जिन नेताओं पर उकसाने वाला भाषण देने का आरोप है उनमें बीएसपी सांसद कादिर राना, उनके भाई और बीएसपी विधायक नूर सलीम राना, विधायक मौलाना जमील, पूर्व गृह राज्यमंत्री सईदुज्जमा समेत कई नेता शामिल हैं। यूपी सरकार के इस फैसले से सवाल भी उठने लगा है कि क्या ये दंगा किसी सोची समझी राजनीति का हिस्सा था। जिसे अंजाम देने के बाद अब खानापूर्ती करने की तैयारी शुरू हो गई है।

यूपी सरकार के इस फैसले को लेकर बीजेपी और कांग्रेस ने हल्ला बोल दिया है। दोनों पार्टियों ने इस कदम को महज सरकार की वोट बैंक नीति करार दिया है। अखिलेश सरकार कि किरकिरी इससे पहले भी वोट बैंक को लेकर किए गए मुआवजे के ऐलान पर हो चुकी है। पांच लाख लो और राहत शिविर छोड़ो पॉलिसी की लोगों ने जमकर आलोचना कि थी। अल्पसंख्यक नेताओं के खिलाफ दंगे का केस वापस लेने की अखिलेश सरकार की कोशिश पर कानून के जानकारों का मानना हैं कि केस की जांच के दौरान इसे वापस लेने की ये कोशिश सिर्फ एक वर्ग को खुश करने की राजनीति है।

स्थानीय अदालत द्वारा आरोपियों के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया जा चुका है। सईदुज्जमां और 3 अन्य आरोपियों को छोड़कर कादिर राणा सहित अन्य सभी आरोपी फिलहाल जमानत पर हैं। एसआईटी इस मामले की जांच कर रही है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि दंगाईयों से धर्म के अधार पर भेदभाव करना कितना सही?

दंगा पीडितों से भेदभाव

यूपी सरकार द्वारा भेदभाव करना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले कई ऐसे मौके आये हैं जब अखिलेश सरकार कि भदपीट चुकी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मुजफ्फरनगर दंगा पीडितों से नीतिगत तौरपे भेदभाव करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने अखिलेश सरकार की अधिसूचना रद्द कर नई अधिसूचना जारी करने का आदेश दिया था।

संविधान के 42वें संशोधन में समाजवादी और पंथनिरपेक्ष षब्द को जोड़ा गया था ताकी सभी लोगों को देश में एकसूत्र में बांध करन चलने की परंपरा कायम हो सके। साथ ही किसी के साथ धर्म के अधार पर भेदवाव नहीं हो सके। मगर अपने आप को समाजवाद का पुरोध्दा बताने वाली पार्टी आज खुद दंगापीडि़तों के साथ भेदभाव करके कटखरे में है। राज्य सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया था कि 90 करोड़ रुपये मुस्लिम परिवारों के पुनर्वास दी जारही है। इनमें से पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा मुस्लिम पीडितों को देने की व्यवस्था की गई थी।

दंगा पीडि़तों में इस वक्त कंबल बांटने की भी होड़ मची हुई है। मगर वहीं दुसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी है जो जिसे ‘ऊन के कंबल’ की जगह ‘इंसाफ के कंबल’ की जरूरत है। जिससे वह अपने पीड़ा को सकून दे सके। फिर भी अखिलेश सरकार को लोगों को इंसाफ देने की जगह अपनी वोट बैक ही नज़र आरही है। आज जहां पर दिलों में आई दरार को पाटना। नफरत की बारिश में प्यार के गुलमुहर खिलाने कि जरूरत है वहा सरकार भेदभाव करके लोगों में कभी नहीं भरने वाला जख्म को बार बार किसी न किसी बहाने उभार कर राजनीति का प्यादा बनाना चाहती है। ऐसे में आज के बदले सियासत ने समाजवाद की परिभाशा को नये सिरे से सोचने पर मजबूर करता है।

2014 का सबसे बड़ा एजेंडा क्या है ?

1- भ्रष्टाचार

देश में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा है। हर ओर आज भ्रष्टाचार सर चढ़ कर बोल रहा है। मगर 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद रोकपाल बिल अब कानून बन गया है। केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की संस्था के गठन का रास्ता भी साफ हो गया है। ऐसे में अब नए साल में ये देखना होगा कि लोकपाल कानून कितना असरदार साबित होता है। साथ ही ये भी देखना होगा कि कौन कौन से राज्य इसे सबसे पहले लागू करते है।

दुनिया भर के देशों में फैले भ्रष्टाचार के स्तर पर भारत 94 वें नम्बर पर है। देश में भ्रष्टाचार कम होने की जगह बढ़ता जा रहा है। इसे रोकने के लिए ठोस कदम उठाना सरकार के लिए 2014 की सबसे बड़ी चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सरकार से कहा था कि जिन संसद सदस्यों और राजनीतिज्ञों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध दो साल से अधिक की सजा मिली है, उन्हें अपना पद छोड़ना होगा। अदालतों में कई ऐसे मामले है जिसे लेकर 2014 में अहम फैसला इस साल आने वाला है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि इस बार किसकी कुर्सी जाती है। 

राहुल गाँधी भ्रष्टाचारको लेकर बड़े बड़े वायदे करते फिर रहे है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात को लेकर रहेगी कि आदर्श हाउसिंग घोटाले में अपने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चच्हाण पर दोश सिध्द होने पर पार्टी क्या कर्रवाई करती है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के उपर भी भ्रष्टाचार के आरोप लग चुका है। ऐसे में बिरभद्र कब तक कुर्सी छोड़ते है इसे लेकर लोगों को इंतजार रहेगा।

वहीं दुसरी ओर कर्नाटक की राजनीति में बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने पार्टी में फिर से वापसी करली है। ऐसे में बीजेपी की हार के बाद लोकसभा चुनाव में कितना लाभ पहुंचता है ये भी देखना दिलचस्प होगा।

2- अर्थव्यवस्था 

पीछले साल की उठापटक के बिच अब सबकी निगाहें 2014 पर टीकी हुई है। ऐसे में खासकर भारतीय अर्थव्यवस्था की बात करें तो ये साल कई मायने में चुनौती भरा रहने वाला है। आरबीआई के इतिहास को देखते हुए सबसे युवा गर्वनर रघुराम राजन से लोगों को काफी उम्मीदें हैं। साल 2013 में जब रघुराम राजन ने आरबीआई के गर्वनर का पद संभाला था तब एक डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत 68 पार कर गई थी। अब देखना यह है कि साल 2014 में नई सरकार के गठन के साथ रघुराम राजन कैसी नीतियां बनाते हैं। साथ ही केन्द्र सरकार के लिए भी बेलगाम महंगाई पर रोक लगाने के लिए ठोस कदम उठाना होगा।

टेलीकॉम और गैस सेक्टर में जारी गतिरोध 2014 के चुनाव के बाद दूर हो सकता है। ऐसे में गैस सेक्टर के बड़े खिलाड़ी अंबानी बंधुओं पर नजरें टिकी रहेंगी। तो वहीं दुसरी ओर 2012 में टाटा ग्रुप के चेयरमैन का पद संभालने वाले सायरस मिस्त्री पर कंपनी को और बुलंदियों तक ले जाने की जिम्मेदारी है। 2014 में उनपर नजर होगी कि वो रतन टाटा की कंपनी को कैसे और उंचाइयों तक ले जाते हैं।

भारत सरकार पर आयात निर्यात नीति को लेकर काफी दिनों से समिक्षा करने की दबाव बन रही है। ऐसे में व्यपारियों की नज़र सरकार के उन नीतियों पर रहेगी जिससे व्यापार घाटे को कम करने और आयात नीति को घटा कर स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा देने जैसे कदम सामिल है।

पेट्रोल और डीजल एवं एलपीजी की बढ़ती कीमतों ने भी जनता के बजट को बिगाड़ने का काम किया। ऐसे में इस साल इसे सवारने के लिए सरकार को कड़ी मसक्कत करनी होगी। स्टॉकिस्टों और निवेशकों की भारी बिकवाली के कारण सोने की कीमत में बेतहाशा गिरावट आई है। दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी 4.8 फीसदी पीछले साल रही है हालांकि बीते चार तिमाही से जीडीपी का आंकड़ा 5 फीसदी से कम रहा है, जो चिंता का विषय है। इसे भी बढ़ाना सरकार के लिए एक हमत्वपूर्ण कार्य है।

3- महिला सुरक्षा

में आज लगातार यौन उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो रही है। ऐसे देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती महिला सुरक्षा को लेकर है। यौन शोषण ने देश के सीने पर कई ऐसे जख्मी दिए है जिससे लोगों को दर्द तो हुआ ही, साथ ही मानवता भी शर्मसार हो गई। समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ माहौल तो बना, लेकिन दरिंदगी की वारदातों में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि इसे कैसे रोका जाय? 

देश की राजधानी दिल्ली में महज पांच साल की मासूम बच्ची के साथ गैंगरेप की वारदात होती है और पूरा देश दहल जाता है। तो वहीं दुसरी ओर फोटो जर्नलिस्ट के साथ गैंगरेप की वारदात मायानगरी को दहलाकर देता है। ऐसे में नारी सुरक्ष को देश की सुरक्षा के साथ जोड़ कर देखने की जरूरत है।

देश में भारतीय ही नहीं विदेशी महिला तक को गैंगरेप का शिकार बनाया जा रहा है। भारत घूमने आने वाली विदेशी शैलानियो की सुरक्षा भी हमारे लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का विशय बन चुका है। देश में लगातार राजनेओं पर बलात्कार के आरोप लग रहे है। ऐसे में नेताओं को भी अपनी छबी सुधारनी होगी।

आधुनिकता की बढ़ती बांधी ने समाजिक मर्यादाओं को तार तार कर रही है। परिवार और पड़ोस में रहने वाले कुछ ऐसे भेडि़ए आज मुह फैलाए घुम रहे है जो बहन बेटियों को हवस का शिकार बना रहे है। इस समाजिक कुचक्र को तोड़ने के लिए हम सब को आज आगे आने की जरूरत है।  

4- साम्प्रदायिक सदभावना

देश में साम्प्रदायिक सदभावना को बरकारार रखना आज के दौर में सबसे बड़ा मुद्दा है। मगर अब 2014 में मुजफ्फरनगर जैसी घटना फिर से नहीं दुहराई जाय इसे लेकर रोडमैप तैयार करना होगा। साथ ही राजनीतिक दलों को वोट बैंक पोलिटिक्स से उपर उठर कर सदभावना कायम करना होगा। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने सभी राज्यों को अलर्ट जारी कर कहा है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिश हो सकती है। ऐसे में सरकार को ये देखना है कि ये कौन से ऐसे सांम्प्रदायिक ताकतें हैं जो हिंसा फैलाने के फिराक में है? सवाल सरकार को लेकर भी है कि अब तक इसे रोकना के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाई जारही है? क्या नये साल में सरकार किसी अनहोनी का इंतजार कर रही है?

गृहमंत्रालय ने मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा के पहले भी अलर्ट जारी किया था। फिर भी इसे रोकने में राज्य और केन्द्र सरकार नकाम रही। देश आज जम्मू कष्मीर से लेकर बरेली तक और बिहार से लेकर महाराराष्ट्र तक दंगे कि आगोस में है।

सरकार साम्प्रदायिक हिंसा बिल को इस साल हरहाल में पारित करवाना चाहती है। मगर इस बिल कोलेकर राजनीतिक गतिरोध खत्म होते नहीं दिख रहा है। इस बिल को लेकर सरकार की मंषा पर भाजपा सहीत कई दल सवाल उठा रहे है। ऐसे में इसे लेकर सवाल सरकार से भी है, क्या सरकार एक खास समुदाय की वोट के लिए इसे पास करना चाहती है। भारत की एकता और अखंडता को विभाजित करने वाला षड्यंत्रकारी ताकतों को आज पहचान कर उन्हे धरपकड़ करने की जरूरत है ताकी देश में सांम्प्रदायिक सदभावना कायम रहे। 

5- शिक्षा सुधार

किसी भी देश में शिक्षा और रोजगार हमेशा से ही एक मत्वपूर्ण विशय रहा है। ऐसे में आज देश के अंदर भी इसे सुचारू रूप से आगे बढ़ाने की जरूरत है। देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दरकार राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी जता चुके हैं। आज कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय शीर्ष संस्थाओं में शामिल नहीं है। दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में आज अपने देश का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। आज इस स्थिति को बदलनी को जरूरत है। ज्ञान संपन्न समाज और शैक्षिक विस्तार के लक्ष्य को हासिल करना इस साल की सबसे बड़ी चुनौती है।

वर्ष 2012-14 के लिए वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिंग में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय को जगह नहीं मिली है। ऐसे मे आज सरकार को इसे दुर करने की जरूरत है। यूपी सहीत देश भर के कई सारे राज्य टीईटी को ट्रम्प कार्ड के रूप 2014 के लिए पेश करने की तैयारी में है। ऐसे शिक्षा का राजनीतिकरण और गिरते हुए शिक्षा के स्तर को हर हाल में रोकना होगा। संसद के आगामी सत्र में भी उच्च शिक्षा से जुड़े विधेयकों का पारित करना भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।

उच्च शिक्षण संस्थानों, खासकर मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रबंधन के मामले में संस्थानों की ओर से अवैध रूप से की जाने वाली उगाही को रोकने के लिए भी विधेयक संसद में लंबित है। 2014 में इसे पास कराना सरकार के लिए एक टेढ़ी खिर साबित होने वाली है। आज गा्रमिण भारत के सरकारी स्कुलों में शिक्षकों की कमी और प्रर्याप्त संसाधन नहीं होने के कारण भारत के वविष्य अंधेरे में डुबा हुआ है। इस साल इस अंधेरे को दुर करना होगा 

6- विदेश नीति 

पिछले कुछ वर्षों में लगातार भारत की विदेश नीति कमजोर हुई है। ऐसे में देश के सामने 2014 के लिए अपने विदेश नीति को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती है। सामरिक चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए संप्रग सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रबंधन क्षमताओं में भारी कमी आई है। अहम मसलों पर सरकार आमसहमति कायम करने में विफल रही है। बांग्लादेश के साथ संबंध तृणमूल कांग्रेस की राजनीति के कारण प्रभावित हुए तो श्रीलंका से रिश्तों पर तमिल दलों के कारण ग्रहण लगा। ऐसे में इन देशों के साथ भारत को अपने रिस्तों में सुधार लाना होगा। 2014 में राजनीतिक नफा नुकसान से आगे बढ़ हर दल को देश हीत में आगे बढ़ने की जरूरत है।

विदेश और सुरक्षा नीति को व्यवस्थित करने वाला संस्थागत ढांचा असंतुलित हो गया है। विदेश मंत्रालय की यह भूमिका दिन-प्रतिदिन सिमटती जा रही है। उसे 2014 में सुधारों की आवश्यकता है। 2014 में भारत की विदेश और सुरक्षा नीति का असली इम्तिहान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होने वाला है। 2014 के चुनाव में बंगलादेश में जमात जैसे तत्वों को रोकने का एजेंडा भी भारत को तय करना होगा ताकी दोनों देशों के बिच शांति बरकरार रहे।

वहीं दुसरी ओर चीन के बढ़ते सैन्य शक्ति और अरूणाचल प्रदेश में चीनी सेना कि घुसपैठ सरकार के लिए इस साल की एक अहम चुनौती है। भारतीय राजनयिकों के साथ अमेरिका का दुर्रव्यवहार और बिगड़ते रिस्ते को कुटनीतिक माध्यमों से सुधारने की जरूरत है। साथ ही पाकिस्तानी सेना द्वारा आए दिन कश्मीर में गोलिबारी की घटनाएं और सिमापार से बढ़ती घुसपैठ को हरहाल में सरकार को रोकना होगा। ऐसे में हम कह सकते हैं कि वर्ष 2014 में भारत की विदेश नीति के क्षेत्र में कई अहम कार्य करने की जरूरत है।

मोदी बनाम केजरीवाल !

दिल्ली में शीला दीक्षित को हराकर सरकार बनाने के बाद आप नेता अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों के हौसले सातवें आसमान पर हैं। ऐसे में अब केजरीवाल ने अगले लोकसभा चुनाव के दौरान तीन सौ सीटों पर उतरने का ऐलान कर साफ कर दिया है कि उनकी कोशिश सिर्फ दिल्ली या किसी एक राज्य तक सिमटने वाली नहीं है। आप का दावा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद 72 घंटों में करीब एक लाख लोग उसके सदस्य बने हैं। यह तादाद जमे जमाए नेताओं को परेशान करने के लिए काफी है। हालांकि अभी अरविन्द केजरीवाल को पीएम उम्मीदवार घोषित नहीं किया जा रहा है लेकिन उनकी जैसी छवि दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद निर्मित हुई है उसके बाद अगर देश उनके अंदर भविष्य का पीएम भी देखने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं। 

आम आदमी पार्टी ने ऐलान किया है कि अब वह अगले दस पंद्रह दिनों में अपने लोकसभा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर देगी। जाहिर है, इस सूची में कुछ बड़े नाम ही होंगे जिसके लिए पार्टी को ज्यादा माथापच्ची करने की जरूरत नहीं होगी। अटकलें लगाई जा रही हैं कि नरेन्द्र मोदी गुजरात में किसी सीट से चुनाव लड़ने की बजाय उत्तर प्रदेश की लखनऊ या वाराणसी सीट से आम चुनाव लड़ सकते हैं। केजरीवाल ऐसी चुनौती देकर अपने समर्थकों और संभावित वोटरों को यह संदेश दे सकते हैं कि वे राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में बड़े से बड़े नेता को टक्कर देना चाहते हैं और एक विकल्प खड़ा करना चाहते हैं। अगर केजरीवाल मोदी को चुनौती देते हैं, तो वे मोदी बनाम राहुल की चर्चा से पूरे विमर्श को मोदी बनाम केजरीवाल में तब्दील कर सकते हैं। जानकारों का मानना है कि अगर ऐसा होता है, तो यह आप के लिए संजीवनी साबित हो सकता है। क्योंकि इससे केजरीवाल एक झटके में न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर के नेता हो जाएंगे, बल्कि कुछ लोगों की नजर में मोदी के विकल्प भी। इसलिए केजरीवाल देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक माने जा रहे नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव में चुनौती दे सकते हैं।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में पटपड़गंज से विधायक चुने गए मनीष सिसोदिया को आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बाद दूसरे नंबर का नेता माना जाता है। अगर मनीष को आप ने मुलायम सिंह के विरोध में खड़ा कर दिया, तो क्या होगा? मुलायम इटावा या संभल से चुनाव लड़ सकते हैं। मनीष भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ के रहने वाले हैं। ऐसे में दोनों का मुकाबला 2014 के लोकसभा चुनाव के सबसे अहम चुनावों में से एक हो सकता है। आम आदमी पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति के सदस्य और केजरीवाल के सहयोगी गोपाल राय मूल रूप से उत्तर प्रदेश से आते हैं। यह बात और है कि गोपाल राय दिल्ली से चुनाव हार गए हैं, लेकिन आप में उनकी राजनीति अपनी तरह की चल रही है। वे लंबे समय तक लखनऊ यूनिवर्सिटी की छात्र संघ राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। गोपाल राय को आप भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के खिलाफ पूर्वी दिल्ली से सटी उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद सीट से मैदान में उतार सकती है। राजनाथ सिंह इसी सीट से मौजूदा सांसद हैं। दोनों नेता मूल रूप से उत्तर प्रदेश से आते हैं और भोजपुरी भाषी हैं। गाजियाबाद में भोजपुरी भाषी और पूर्वांचल के मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है। दोनों ही हिंदी पट्टी की राजनीति के दांव-पेंच से वाकिफ हैं। ऐसे में यह मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।

आप नेता कुमार विश्वास मूल रूप से पिलखुवा के रहने वाले हैं। हिंदी के प्रोफेसर के तौर पर लंबे समय तक नौकरी करने वाले विश्वास अब नौकरी नहीं करते। विश्वास ने अपने राजनीतिक मंसूबे जाहिर कर दिए हैं। कुमार अपनी वाकपटुता, कविताओं, शेर-ओ-शायरी के लिए मशहूर हैं। और युवाओं के आइकॉन भी। वे घोषणा कर चुके हैं कि अगर उन्हें अमेठी से लोकसभा चुनाव का टिकट मिला, तो वे राहुल गांधी को चुनौती देने के लिए तैयार हैं। विश्वास खुद पर विश्वास जताते हुए कहते हैं कि जब भी राजा और फकीर की लड़ाई होती है, तो जीत हमेशा फकीर की होती है। इस इलाके से महिलाओं की लड़ाई लड़ रही नागिन और कोबरा गैंग ने भी कुमार को हर स्तर पर मदद करने का ऐलान किया है। नागिन गैंग ने  कुमार विश्वास के चुनाव प्रचार के लिए बुंदेलखंड से 50-50 युवक-युवतियां भेजने का निर्णय लिया है। 

महिला जन संगठन नागिन और कोबरा गैंग की केंद्रीय समन्वयक नेहा कैथल ने बताया, ‘दोनों जन संगठन आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा छेड़े गए ‘ईमानदार राजनीति की शुरुआत’ और ‘राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद विरोधी अभियान’ में खुलकर साथ देना चाहते हैं।’ इसलिए केंद्रीय कोर कमेटी की बैठक में निर्णय लिया गया कि यदि आगामी लोकसभा चुनाव में आप ने अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ कुमार विश्वास को चुनाव लड़ाया, तो उनके चुनाव प्रचार के लिए महिला जन संगठन बुंदेलखंड से 50-50 युवक-युवतियों को खुद के संसाधन से अमेठी भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि नागिन गैंग की वाइस चीफ कमांडर मनोज सिंह द्वारा रखे राजनीतिक प्रस्ताव पर चर्चा के बाद दिग्गजों के खिलाफ लड़ने वाले आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर सहमति बनी है। उन्होंने बताया कि टीम फरवरी के अंत में अमेठी में डेरा जमाएगी और चुनाव प्रचार में युवतियों का नेतृत्व मनोज सिंह करेंगी। 

दूसरी तरफ, नेहरू-गांधी परिवार के गढ़ कहे जाने वाले अमेठी, सुल्तानपुर और रायबरेली में कांग्रेस की जमीन खिसकी है। कम से कम उत्तर प्रदेश में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव ने तो यही साबित किया था। उस चुनाव में कांग्रेस को अमेठी, सुल्तानपुर और रायबरेली लोकसभा सीटों की सभी विधानसभा सीटों में एक को छोड़कर बाकी सभी पर हार का मुंह देखना पड़ा था। ऐसे में यह चुनावी मुकाबला रोचक हो सकता है।

आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य शाजिया इल्मी पूर्व टीवी पत्रकार हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में वे आरके पुरम सीट से महज 326 वोटों से चुनाव हार गईं। अल्पसंख्यक समाज से आने वाली शाजिया तेज तर्रार वक्ता भी हैं। वे महिला होने के नाते महिलाओं, युवा होने के नाते युवाओं और अल्पसंख्यक समाज के वोटरों को आकर्षित कर सकती हैं। इन्हीं खूबियों को देखते हुए आप उन्हें रायबरेली सीट से लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी के खिलाफ उतार सकती है। सोनिया गांधी की लोकसभा सीट के तहत आने वाली विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का 2012 में बुरा हाल हो गया था। ऐसे  में यह टक्कर रोचक हो सकती है।

मूल रूप से हरियाणा की रहने वाली भाजपा की नेता और लोकसभा में नेता, विपक्ष सुषमा स्वराज मध्य प्रदेश की विदिशा से लोकसभा सांसद हैं। उनके एक बार फिर इसी सीट से चुनाव लड़ने की अटकल है। दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी मशहूर चुनाव विश्लेषक से नेता बने योगेंद्र यादव को उनके खिलाफ उतार सकती है। योगेंद्र भी हरियाणा के रहने वाले हैं। हालांकि, उन्हें चुनाव लड़ने का कोई तजुर्बा नहीं है, लेकिन लंबे समय से वैकल्पिक राजनीति को लेकर वे जोर आजमाइश करते रहे हैं। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने पूछे जाने पर कहा कि अगर उनकी पार्टी उन्हें चुनाव लड़ने को कहेगी, तो वे गुड़गांव लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते हैं, क्योंकि उनका गांव इसी सीट के तहत आता है। 

विदेश मंत्री और यूपीए सरकार के कद्दावर नेताओं में से एक सलमान खुर्शीद फर्रुखाबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं। वे आप के नेता अरविंद केजरीवाल को फर्रुखाबाद आने और जिंदा लौट जाने की चुनौती दे चुके हैं। हालांकि, वे तब केजरीवाल को रोकने में नाकाम रहे थे, लेकिन इस बार केजरीवाल के बनाए समीकरण में खुर्शीद उलझ सकते हैं। कांग्रेस जिन सीटों को तुलनात्मक रूप से सुरक्षित समझती है, उनमें फर्रुखाबाद एक है। लेकिन केजरीवाल अपनी राजनीतिक मामलों की समिति के सदस्य और दो बार लोकसभा सांसद रहे इलियास आजमी को उनके खिलाफ उतार कर भौंचक्का कर सकती है। फर्रुखाबाद में अल्पसंख्यकों की अच्छी-खासी तादाद और खुर्शीद पर लगे भ्रष्टाचार के मामले को ध्यान में रखा जाए, तो यह कहना मुश्किल नहीं होगा कि आजमी उन्हें टक्कर दे सकते हैं। ऐसा नहीं है कि सलमान के दुर्ग को यहां तोड़ा नहीं जा सकता है। 2012 के विधानसभा चुनाव में तमाम कोशिशों के बावजूद खुर्शीद अपनी पत्नी लुइस खुर्शीद को यहां से जिता नहीं सके थे। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर और आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य पंकज गुप्ता ने नौकरी छोड़कर बच्चों की भलाई के लिए समाजसेवा शुरू की थी। 

इस दौरान वे अरविंद केजरीवाल के संपर्क में आए। पंकज को आप भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतार सकती है। इस बार आडवाणी के गांधीनगर या भोपाल की किसी सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। ये दोनों सीटें शहरी सीटें हैं, जहां आप को आसानी से समर्थन मिल सकता है और पंकज आडवाणी जैसे नेता को टक्कर दे सकते हैं।

दिल्ली की चांदनी चौक लोकसभा सीट से सांसद कपिल सिब्बल अपने कई बयानों से विवाद में रहे हैं। वे मशहूर वकील भी हैं। ऐसे में आम आदमी पार्टी उनके जवाब में अपनी ही पार्टी के सदस्य और मशहूर वकील प्रशांत भूषण को उतार सकती है। प्रशांत कानूनी दांव-पेंच में माहिर हैं। वे पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण के बेटे हैं और लोकपाल आंदोलन की बड़ी आवाज रहे हैं। यूपीए सरकार की गिरती साख के बीच दोनों कानूनी जानकारों के बीच बढ़िया मुकाबला हो सकता है। भाजपा नेता वरुण गांधी यूं तो पीलीभीत से लोकसभा सांसद हैं, लेकिन इस बार अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे सुल्तानपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। आम आदमी पार्टी वरुण के खिलाफ सुल्तानपुर में संजय सिंह को उतार कर चुनौती दे सकती है। संजय सिंह सुल्तानपुर के ही रहने वाले हैं। उनके पास उत्तर प्रदेश में पार्टी की जड़ें मजबूत करने का जिम्मा है। वे आजाद समाज सेवा समिति नाम का संगठन भी चलाते हैं।  

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार आप के थिंकटैंक माने जाते हैं। अध्यापन के साथ-साथ प्रोफेसर आनंद लोकपाल आंदोलन के अलावा कई अन्य राजनीतिक-सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। आम आदमी पार्टी उन्हें लोकसभा चुनावों में बसपा सुप्रीमो मायावती के खिलाफ चुनाव में उतार सकती है। नई राजनीति की सोच को लेकर आगे बढ़ने का दावा करने वाली आप के एजेंडे को तय करने वालों में से एक प्रोफेसर आनंद कुमार राजनीति में ईमानदारी और त्याग के हिमायती रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच रोचक संघर्ष हो सकता है।

दलहन और तिलहन की फसलों में कमी के कारण !

विकास की रफ्तार में खेती के दरकिनार होने का मुद्दा गाहे-बगाहे सतह पर आता है। मुद्दे में इतनी गर्मी नहीं होती है कि उस पर सरकार कुछ ठोस निर्णय ले। लिहाजा, अन्नादाता पर हमदर्दी के बादल तो खुब गरजते हैं। पर हकीकत में जो होता है, वह उनके लिए संतोषजनक नहीं होता है। इस तरह के ढेरों झंझावातों के बावजूद किसानों ने अपने पसीने से देश का पेट भरने लायक अनाज उगाया है। धान और गेहूं के बाद दलहन और तिलहन जरूरी अनाजों में है। लेकिन करीब एक दशक से दहलन और तिलहन का उत्पादन पर भारी नकारात्मक असर पड़ा है। 

दशक भर पहले देश में दलहन और तिलहन उत्पादन को लेकर हम दंभ भरते थे। इसे पीली क्रांति की संज्ञा दिया था। लेकिन कब इस क्रांति पर ग्रहण लग गया किसी ने सुध ही नहीं ली। हालात तो यह हैं कि देश में दलहन और तिलहन का आयात बढ़ता जा रहा है। कृषि उत्पादों के आयात शुल्क में कमी देश के किसानों के साथ के साथ मजाक से कम नहीं है। पटरी से उतरी दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए सुझाए गए उपायों पर अमल तो दूर उन्हें फाइलों के झुरमुटों में ही अटका दिया गया है। लिहाजा, हकीकत के उपाय खेतों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। 

संसद के शीत सत्र में ही एक संसदीय समिति ने इसको लेकर सरकार की आलोचना की है। समिति ने अपनी 46 की रिपोर्ट में दलहन तिलहन के उत्पादन में वृद्धि के लिए दिए सुझाव पर पहल करने की सिफारिश भी की है। कृषि विभाग ने तिलहन और पाम तेल पर राष्ट्रीय मिशन एनएमओ ओपी के संबंध में भी निर्णय नहीं लिया है, जो चिंता का विषय है। सोयाबीन, मुंगफली, मुंग, उड़द और अरहर की खेती के बढ़ावा देकर दलहन और तिलहन के को आकर्षित करने समर्थन मूल्य में वृद्धि कर उन्नत बीज के साथ आधुनिक कृषि तकनीक उपलब्ध करने की जरूरत है। किंतु अफसोस समिति की सिफारिशों पर गौर नहीं किया जा रहा है। दलहन और तिलहन पर यदि समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो आयात में और वृद्धि स्वाभाविक है।

फिलहाल देश में हर साल 30 हजार करोड़ के खाद्य तेल का आयात किया जा रहा है। 90 के दशक में तिलहन के मामले में देश आत्म निर्भरता के करीब था। देश में घरेलू जरूरत का 97 प्रतिशत तक उत्पादन हो रहा था। किसानों को तकनीक और बीज के मामले में प्रोत्साहन नहीं मिलने से उत्पादन में गिरावट चली आई। दूसरी और आयात शुल्क में 75 प्रतिशत तक छूट दी जाने लगी, जिससे किसान पिछड़े उत्पादन गिरा और हमारी आत्म निर्भरता धराशाई हो गई है। इसके बाद भी दलहन और तिलहन के मामले अनुदार रवैया अपनाया जा रहा है। यह खतरे की घंटी है। आयात शुल्क घटाने से विदेशी विनिमय का लाभ इंडोनेशिया, मलेशिया, अमरीका और ब्राजील के किसानों को मिल रहा है। यदि दलहन-तिलहन के समर्थन मूल्य पर इजाफा किया जाता है तो आयात घटेगा और देश के किसान लाभान्वित होंगे।

राजीव गांधी के शासन काल 1985 में कमोबेश यही स्थिति बनी थी। तब संसद में बहस हुई। बहस का सार था हम पेट्रोल डीजल क्यों खरीदते हैं? तर्क आया दोनों वस्तुओं का उत्पादन देश में नहीं होता है। पर दहलन तिलहन हमारे श्रम का नतीजा है। फौरन कृषि नीति पर बदलाव किया गया। यात्र एक दो वर्ष के अंतराल में हमारी आयात निर्भरता घटने लगी। किंतु डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में इस अनिवार्य मामले में उपेक्षा मिली। 2007-2008 से लेकर अब तक कृषि कैलेंडर का अवलोकन करे तो स्वष्ट होता है धान, गेहूं, कपास सहित अन्य खाद्यान्नों के इस उत्पादन में उतरोत्तर तरक्की कर रहे हैं। बस दलहल तिलहन पिछड़ रहा है। इस सूरत में दलहन और तिलहन के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए ठोस पहल किया जाना चाहिए।

आयल सीड्स टेक्नालाजी मिशन को हासिल करना आज के दौर में बेहद सरल कार्य है। इस मामले में एक और विसंगति सामने आई है। सोयाबीन के उत्पादन के लिए जेनेटिकल मोडिफाइड कृत्रिम रूप से संवर्धित यानी जीएम सोसाबीन के उत्पादन बढ़ावा दिया जा रहा है। इस प्रजाति के बीज का उत्पादन सामान्य सोयाबीन से 4 से 20 प्रतिशत कम होता है। इस बीज को बढ़ावा देने देश को क्या लाभ होगा इसका खुलासा नहीं किया गया है। आश्चर्य की बा है कि कृत्रिम रूप से संवर्धित बीजों के अन्य उत्पादों का कम विरोध कर चुके है। उसके बाद सोयाबीन को बढ़ावा देना जांच का विषय हो सकता है।

सिफारिशी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि दलहन तिलहन के उत्पादन में आवश्यकता अनुसार उत्पादन के लिए देश में 30 प्रतिशत कृषि रकबे की आवश्यकता पड़ेगी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और आंध्र की परंपरागत खेती के साथ अलसी, सोयाबीन, सरसो और तिल की फसल आसानी से उगाई जा सकता है। दलहन और तिलहन के उत्पादन रकबे में वृद्धि से धान और गेहूं की उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी। किंतु इससे हमारी आर्थिक व्यवस्था पर बल आने की संभावना नहीं के बराबर होगी। पाम यानी ताड़ बुनियादी तौर से मुरस्थली उपज है। इसके लिए भारत की भूमि को ज्यादा उपयुक्त नहीं माना जाता है। पाम से 10 प्रतिशत अतिरिक्त कार्बन डिस्चार्ज होता है। जो बेहद हानिकारक है। इसलिए खाद तेल के विकल्प के रूप में पाम की जगह सोयाबीन आदि को बढ़ावा देना चाहिए। रिक्त भूमि का उपयोग दलहन और लिए परंपरागत रूप में किया जाता रहा है। इस प्रचलन में लाने के लिए कठिन प्रयास के आवश्यकता ही नहीं है।

04 January 2014

मोदी को विनाशकारी कहना कितना सही ?

                                            हजारों जवाबों से अच्छी है खामोशी मेरी।
                                           न जाने कितने सवालों की आबरू रखली।।

कलतक ख़ामोशी में विश्वास करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब अपनी ख़ामोशी तोड़ी तो मानो सियासी भूचाल आगया। सत्ता से सन्यास की ओर जाने की तैयारी करने वाले मनमोहन ने ऐसे शब्द बाड़ छोडे़ जैसे प्रधानमंत्री अपनी सारा मर्यादा ही भूल बैठे। मनमोहन सिंह बुझते दिए की फड़फड़ाती लौ के समान मोदी पर हमला बोला रहे थे। राजनैतिक हल्कों में मनमोहन सिंह के शाँत स्वभाव का सम्मान भी किया जाता है और उसकी खिल्ली भी उड़ाई जाती है। राजनीतिक विरोधियों पर शाब्दिक बाण चलाने के लिए उन्हे कभी नहीं जाना गया। संसद में भी जब कभी कभार नोकझोंक के मौके आते हैं और उन पर व्यक्तिगत हमले भी हो रहे होते हैं तब भी वह चुप रहना ही पसंद करते हैं।

मगर शुक्रवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाजपा के पीएम पद के उमीदवार नरेन्द्र मोदी को देश  के लिए विनाशकारी बता डाला। मनमोहन सिंह ने आगे ये भी कहा कि जिसके सत्ता में रहते अहमदाबाद में कत्लेआम हुआ हो, वो मजबूत नेता कैसे हो सकता है। मोदी का प्रधानमंत्री बनना देश के लिए घातक होगा। यह देश के हित में ठीक नहीं होगा। तो ऐसे में सवाल ये है कि क्या मनमोहन सिंह अपनी नकामी और असफलता के आगे इतना बेबस और लचार होचले है कि देश के भावी पीएम उन्हें विनाशकारी दिखाई देने लगे है। या फिर पीएम की ये खींझ कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके सहारे अक्सर कांग्रेस और उसके नेताओं को जाना जाता है। तो सवाल इस बात को लेकर भी है कि क्या मोदी देश के लिए विनाशकारी है या फिर कांग्रेस के लिए।

रोबोटनुमा चाल और किसी मुद्दे पर कोई राय न रखने वाले प्रधानमंत्री जब एकाएक "खिसियाई बिल्ली, खम्भा नौचे"के समान सियासत करने लगे तो सवाल और भी गंभिर हो जाता है। आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवी को भष्टाचार और घोटालों को बर्दाश्त करने और प्रतिभावान लोगों को आगे न ला पाने की कमजोरी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। सोनिया गाँधी के साथ सत्ता में भागीदार होने की मजबूरी ने न सिर्फ उनके हाथ बाँध दिए हैं बल्कि कहीं-कहीं यह आभास भी दिया है कि पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जाने की न तो उनमें इच्छा शक्ति है और न ही क्षमता। 

ऐसे में प्रधानमंत्री को अब ये अहसास होचला है कि आज के बदलते राजनीति दौर में मोदी न सिर्फ दश जनपथ के राह में रोड़ा बनने वाले है बल्कि उनके राजनीतिक वविष्य के लिए चुनौती भी मोदी ही होंगे। बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैलियां इन दिनों चर्चा में है, उनके विकास के मॉडल को भारत का भविष्य बताने का अभियान जोरों पर है। जतना का जनाधार खोने का भय सत्ता से दूरी का दंश का आभाश इस बात का गवाह है कि कांग्रेस की हर ख्वाहिशें टुटती नज़र आ रही है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि मनमोहन का मोदी को विनाशकारी कहना कितना सही ? नकामी की खींझ और सत्ता की ख्वाहिशों पर तो कोई भी यही कह सकता है कि,,,,,,,,,

                                         हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
                                         बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।।

01 January 2014

क्या "आप" पार्टी मोदी को चुनौती दे रही है ?

राजनीति में मुख्य रूप से दो प्रकार के गणित होते हैं। एक वास्तविक गणित और दूसरा अवधारणात्मक गणित। राजनीतिक जानकार इन दोनों ही आधार पर किसी पार्टी या नेता की लोकप्रियता का मूल्याँकन करते रहते हैं। ज़रूरी नहीं कि जो अवधारणा हो वैसा ही नतीजा हो और जैसा नतीजा हुआ है उसके आधार पर नई अवधारणा के लिए कोई गुज़ाइश न हो। कई प्रकार के अपवाद हैं। 

अरविंद केजरीवाल के उदय से और आम आदमी पार्टी के लोक सभा चुनाव में उतरने के एलान से अवधारणात्मक गणित में एफ नया फ़ैक्टर आ गया है । दिल्ली से संचालित मीडिया स्पेस में मोदी के बराबर अरविंद को जगह मिलने लगी है। बीजेपी हो सकता है कि अपना ध्यान क्षेत्रीय मीडिया स्पेस पर लगाये लेकिन अरविंद वहाँ भी पहुँच सकते हैं । इसलिए दोनों के लिए इस वक्त नया मीडिया स्पेस तलाशने से कोई फायदा नहीं है । स्पेस के लिहाज़ से अवधारणात्मक गणित बनाने का मंच राष्ट्रीय मीडिया ही है। अख़बारों के ज़िला संस्करण अवधारणा बनाने के सशक्त उपकरण नहीं हैं । वे भी राष्ट्रीय मीडिया के विस्तार हैं । उनकी भूमिका से इंकार नहीं कर रहा लेकिन ज़िला संस्करण भी भाषणों से राष्ट्रीय तत्वों का ही चयन करता है।

तो क्या आम आदमी पार्टी मोदी को चुनौती देगी? इसका सरल जवाब है। चुनौती तो देगी मगर दे नहीं पायेगी। कारण यह है कि अवधारणात्मक गणित में मोदी काफी आगे निकल चुके हैं। आप दिल्ली की तरह हर जगह कांग्रेस का ही विकल्प बनेगी। वह यूपी में सिर्फ मोदी से नहीं लड़ पायेगी। उसे अखिलेश यादव और मायावती से भी लड़ना होगा। दिल्ली में एक ही टारगेट था। आप को मिलने वाला हर वोट मोदी की जीत को पक्का करेगा। दिल्ली के नतीजे यही बताते हैं। दिल्ली में बीजेपी भले नहीं जीत पाई मगर वो हारने से इसलिए बच गई क्योंकि मोदी ने बचा लिया। वर्ना आम आदमी पार्टी के सामने कांग्रेस की तरह बीजेपी भी पंद्रह बीस सीटों वाली बन कर रह जाती। दिल्ली के उदाहरण से बीजेपी को बौखलाना नहीं चाहिए। आप भले ही मोदी को निशाना बनाएगी क्योंकि पहले के लेख में भी कह चुका हूँ कि अवधारणात्मक ज़मीन पर मोदी ही नंबर वन हैं। वहाँ आप दूसरे या तीसरे नंबर के मनमोहन सिंह या कांग्रेस को टारगेट कर उसे लाभ नहीं मिलेगा। लेकिन क्या बीजेपी को भी आप को नम्बर वन टारगेट समझना चाहिए? क्या बीजेपी आप को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम उठा सकेगी? जीत के प्रति आश्वस्त होने के बावजूद।

यह सही है कि आप की कामयाबी ने राजनीतिक चर्चा को बदल दिया है। यह भी सही है कि आप की टीम तीन सौ ज़िलों में मौजूद है। लेकिन वे तीन सौ ज़िले दिल्ली नहीं हैं। उनमें से कई ज़िले ज़रूर हो सकते हैं । कई शहर हो सकते हैं। दिल्ली में ही आप के लिए देश भर से वोलिंटियर काम करने आ गए थे। क्या आप यही रणनीति हर जगह पर दोहरा पाएगी? इंडियन एक्सप्रेस में योगेंद्र यादव का इंटरव्यू दिलचस्प है। आख़िर में योगेंद्र ने कहा है कि काश हम चुनाव आयोग से कह पाते कि लोक सभा चुनाव एक साल के लिए टाल दीजिये।

हाँ यह ज़रूर है कि आप ने अवधारणात्मक ज़मीन पर की जाने वाली गणित में मोदी का खेल बिगाड़ दिया है। मोदी पर अरविंद का हमला ज़्यादा आक्रामक और विश्वसनीय सा लगेगा। कांग्रेस आज दिल्ली में एंटी करप्शन यात्रा कर रही है। किसी चैनल पर यह फ़्लैश देखा है। यह महज़ नौटंकी है। आप की तरह रंग बदल कर कांग्रेस बीजेपी आप नहीं हो सकती । इससे लाभ आप को ही मिलेगा। लेकिन कांग्रेस से ज़्यादा फायदा बीजेपी को मिल सकता है। कांग्रेस जितना भ्रष्टाचार के विरोध को लेकर मुखर होगी आप की डुप्लीकेट लगेगी। इससे उसका वोटर आप में बँटेगा और कई शहरी क्षेत्रों में बीजेपी की तरफ़ जायेगा। तो जैसा मैं कह रहा था कि अवधारणात्मक गणित में अरविंद को नंबर तो मिलेंगे क्योंकि जानकार दिल्ली की तरह छह सीटें देने की ग़लती दोबारा नहीं करेंगे। आप को इस बार ज़्यादा सीटें देंगे। जिसके कारण अरविंद मोदी की दावेदारी को अपने सवालों से अवधारणात्मक चुनौती देने लगेंगे। कुमार विश्वास का यह बयान तुकबंदी नहीं है कि अगर मोदी वैचारिक रूप से वंशवाद के इतने ही ख़िलाफ़ हैं तो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ क्यों नहीं लड़ते। यह चुनौती कांग्रेस या लेफ़्ट की तरफ़ से नहीं आ सकता। मोदी भले ही चुप हो जाएँ मगर पब्लिक को तर्क के लिए ही सही एक नया मसाला तो मिल ही गया।

इसीलिए नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगा कि वे आप को नज़रअंदाज़ करें। आप के खाते में गए लोग कांग्रेस और बीजेपी स़े निकले हुए हैं। मोदी ने शुरू से ही पहली बार मतदाता बने युवाओं को ज़्यादा टारगेट किया है और उनमें अपनी पकड़ ज़रूर बनाई है। मोदी ने उन्हें इसलिए टारगेट किया कि ये नए लोग हैं। इनकी निष्ठाएँ नईं हैं। यो बीजेपी की कमज़ोरियों से कम वास्ता रखते हैं इसलिए नेतृत्व की मज़बूत दावेदारी को फिर से उभारा गया जिसे दो दो बार आडवाणी जी सामने लाकर कमज़ोर मनमोहन से हार गए। मोदी ने इस पिटे हुए फ़ार्मूले को युवाओं के बीच ले जाकर लोकप्रिय बना दिया। अब अरविंद के आने से पहली बार मतदाता बने युवाओं के बीच मोदी और अरविंद में ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा होने जा रही है। पार्टियों की निगाह में यह पहली बार मतदाता ज़्यादातर शहरी और पब्लिक स्कूल वाला है। इनके बीच से एक वोटर का भी मोदी से अरविंद की ओर जाना नुक़सान तो होगा ही। फिर भी यह बात अवधारणात्मक स्तर पर ही ज़्यादा प्रबल लगती है। वास्तविक गणित के धरातल पर कमज़ोर।

अगर टीवी और सोशल मीडिया को यह श्रेय दिया जा रहा है कि आप इनकी पैदाइश है तो यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी काल्पनिक मीडिया के असर के कारण बीजेपी में मोदी की दावेदारी प्रखर हुई थी। मोदी की टीम ने भी इसे काफी प्रचारित किया था कि टीवी वालों को टीआरपी आती है इसलिए मोदी को दिखाते हैं क्योंकि मोदी सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। इस तरह की बातें बीजेपी के कई नेताओं ने डिबेट शो में कहीं हैं। वे यह भूल गए कि टीवी को सनसनी, स्पीड न्यूज़ और क्रिकेट से भी टीआरपी मिलती है। अरविंद के कारण भी मिल रही होगी ! इसलिए अब इस चरण पर आकर आप मीडिया के प्रभाव (विवादास्पद) को ख़ारिज नहीं कर सकते।

ज़ाहिर है मोदी आगे हैं। उनके पास संगठन है। आप के पास वोलिंटियर की ताक़त तो है मगर हर जगह समान सघनता नहीं है। लेकिन जिस तरह से कई जगहों पर लोग आप की तरफ़ देख रहे हैं, बीजेपी आगे होते हुए भी इस नए फ़ैक्टर को अनदेखा नहीं कर सकती हैं। शहरीकरण के प्रसार को मोदी की कामयाबी से जोड़ा जा रहा था। इसमें एक और दावेदार आ गया है जो नया और आकर्षक है। दिल्ली की सात सीटों के अलावा आस पास की कुछ सीटों पर आप की मौजूदगी दस बीस तो हो ही जाती है। आगरा, कानपुर, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, पुणे, फ़रीदाबाद, गुड़गाँव, भिवानी, बंगलुरू जैसी सीटें। क्या बीजेपी ऐसी पंद्रह सीटों को अनदेखा करने का जोखिम उठा सकती है? हाँ अगर गडकरी अरविंद पर हमला करते हैं तो ज़रूर फ़ायदा आप को होगा। देखते हैं नरेंद्र मोदी कब तक आप या अरविंद को नज़रअंदाज़ करते हैं। मोदी के लिए मिशन 272 के लिए एक एक सीट ज़रूरी है। पहले तो उन्हें वाजपेयी के 186 सीटों का रिकार्ड तोड़ना है फिर मनमोहन सिंह से बड़ा नेता (२००९ के अनुसार) बनने के लिए 206 से ज़्यादा सीटें लानी हैं इसलिए वास्तविक गणित का वक्त आने से पहले अवधारणात्मक गणित की कापी पर काट पीट और बढ़ जाएगी।

केजरीवाल की खैरात की सौगात का राज़ !

रामलीला मैदान पर अरविंद केजरीवाल एंड नौटंकी कंपनी के शपथग्रहण के साथ बीते एक पखवाड़े से जारी बुद्धू बक्से के तमाशे का एक चरण पूरा हुआ। अब घोषणापत्र के घोषणा को बारी बारी से पूरा करने के दावे के साथ आम आदमी पार्टी अपने तमाशे का दूसरा चरण पूरा कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केजरीवाल एण्ड कंपनी सचमुच लोकतंत्र को मजबूत कर रही है या फिर सस्ती लोकप्रियता के लिए वह नागरिकों को दिग्भ्रमित कर रही है। 

आंदोलन की अवैध उपज

समाप्तप्राय वर्ष 2013 दुनिया के तमाम देशों में जनांदोलन का वर्ष रहा। इजिप्त, ब्राजील, ट्यूनीशिया जैसे देशों में जनांदोलनों का दौर २०११ में ही प्रारंभ हो गया था। ब्राजील, रूस और चीन में भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के बगलबच्चे एनजीओ 2011 से ही जनांदोलनों को हवा दे रहे हैं। 2013 आते-आते इजिप्त की जनतांत्रिक क्रांति मजहबी रक्तपात में तब्दील हो गई। इजिप्त के तहरीर स्क्वेयर से दिल्ली के जंतर-मंतर की तुलना हो रही थी। जिस तरह इजिप्त की क्रांति से मोहम्मद मोरसी जन्मे उसी तरह जंतर-मंतर आंदोलन की अवैध औलाद का नाम है केजरीवाल। मोहम्मद मोरसी ने जनक्रांति को अराजक मजहबी तानाशाही में तब्दील किया तो केजरीवाल खैराती चुनावी वादों से सत्ता में पहुंच कर जनतंत्र को खैराततंत्र में बदलने का नया अध्याय शुरू कर चुके हैं। वह दिल्ली का चुनाव भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बजाय दिल्लीवासियों को मुफ्त पानी, सस्ती बिजली और अवैध झुग्गी-झोपड़ियों को नियमित किए जाने के वादे के बल जीतने में कामयाब हुए हैं।

चुनावी वादों का पोस्टमॉर्टम

अग्रणी वित्तीय सूचना कंपनी जायफिन के वरिष्ठ सलाहकार सुरजीत एस. भल्ला ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) के चुनावी वादों का बेहतरीन पोस्टमॉर्टम किया है। श्री भल्ला ने जो पोस्टपार्टम किया था वह सही साबित हुआ। अरविन्द केजरीवाल की घोषणा के अनुसार ‘आप’ पार्टी दिल्ली के हर परिवार को प्रति दिन करीब पौने सात सौ लीटर पानी मुफ्त देगी। इस तरह हर परिवार को 20 किलोलीटर पानी प्रति माह मुफ्त प्राप्त होगा। परंतु कोई परिवार यदि 22 हजार लीटर से एक भी लीटर पानी अतिरिक्त उपभोग करता है तो उसे पूरे 21 हजार लीटर पानी का बिल अदा करना पड़ेगा। नेशनल सैंपल सर्वे ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रति दिन लगभग 150 लीटर पानी उपभोग करता है। दिल्ली में हर परिवार के सदस्यों की औसत संख्या 4 है। ‘आप’ मुफ्त में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 175 लीटर पानी का वादा कर चुकी है। पानी के उपभोग का यह परिमाण उन्नत देशों जर्मनी और डेनमार्क के औसत से कहीं ज्यादा है। रहस्य इस बात का भी है कि ‘आप’ ने यह सूत्र कहां से हासिल किया? एक दशक पहले दक्षिण अफ्रीका में थाबो म्बेकी ने गरीब अफ्रीकियों के लिए प्रति माह 6 हजार लीटर पानी मुफ्त उपलब्ध कराने का वादा कर चुनाव जीता था। इससे अधिक मासिक पानी उपभोग करने पर दक्षिण अफ्रीका में भी पूरा बिल वसूलने का प्रावधान था। दक्षिण अफ्रीका में पाया गया कि मुफ्त पानी योजना का लाभ गरीबों की बजाय पानी के बिल का भुगतान करने में समर्थ मध्यमवर्गीयों को मिला। दिल्ली में भी मुफ्त जल योजना का यही हाल होना है।’ भल्ला के शोधपूर्ण दावे का जवाब शायद ही ‘आप’ के किसी नीतिकार के पास हो। हवा पानी मुफ्त होना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती लेकिन वहां जहां हवा और पानी प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हो। जब पानी कहीं और से ढोकर कहीं और लाया जाएगा तब वह मुफ्त कैसे रह पायेगा?

केजरीवाल का खैरात तंत्र

झुग्गी-झोपड़ियों को पक्के मकान और सस्ती बिजली का वादा भी कुछ इसी तरह का है। तमाम विद्युतविशेषज्ञ ‘आप’ के दावों को हवाई करार देते हैं। यदि जिद वश ‘आप’ इन वादों को पूरा भी कर दे तो इस खैरात के लिए राजस्व कहां से आएगा? इस सवाल का जवाब अब तक किसी के पास नहीं। यदि खैराततंत्र ही लोकतंत्र का उत्तम तंत्र मान लिया जाए तो फिर केजरीवाल के वैचारिक काका तमिलनाडु के एम. करुणानिधि को मानना पड़ेगा। उन्होंने तो तमाम घरों में रंगीन टेलीविजन पहुंचा दिया। अखिलेश सिंह यादव आज भी मुफ्त के लैपटॉप बांट रहे हैं। फिर छत्तीसगढ़ के रमण सिंह और मध्य प्रदेश के शिवराज सिंह चौहान केजरीवाल के तो अग्रज हुए। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे 2004 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तो चुनाव जीतने के लिए उन्होंने किसानों को मुफ्त में बिजली देने का वादा किया। चुनाव कांग्रेस जीत गई। पर साल भर बीतते-बीतते मुफ्त की बिजली तो दूर बिल भुगतान करने की तैयारी दिखाने पर भी बिजली अनुपलब्ध हो गई। कांग्रेसी खैरात तंत्र ने सरप्लस बिजलीवाले महाराष्ट्र को आज दिन तक लोडशेडिंग के लिए मजबूर कर रखा है। दिल्ली जलबोर्ड को वित्त वर्ष 2012-13 में 466 करोड़ रुपयों का मुनाफा हुआ। ‘आप’ का दावा है कि हम यह मुनाफा जनता में बांट देंगे। योगेंद्र यादव और अरविंद केजरीवाल के फौरी दावे इस आधार पर विश्वसनीय लगते हैं। दिल्ली में 7 लाख घरों को अब तक पाइप लाइन से पानी उपलब्ध कराना बाकी है। ७ लाख घरों को पाइपलाइन से जोड़ने के खर्च का जुगाड़ ‘आप’ वाले कहां से करेंगे? शायद यह आंकड़ा अभी तक उनके विश्व बैंक के ‘हैंडलर्स’ ने उपलब्ध नहीं कराया है।

केजरी से सभी के हुए संबंध विच्छेद

‘आप’ के कर्ताधर्ता केजरीवाल 2011 से 2013 के ढाई वर्षों के सार्वजनिक जीवन में लगातार संबंध विच्छेदों के कारण जाने जाते हैं। पहले उन्होंने जन लोकपाल आंदोलन से स्वामी अग्निवेश को काटा, फिर एन. संतोष हेगड़े दूर हो लिए, मौलाना काजमी धकिया कर हटा दिए गए। अण्णा हजारे से उन्होंने किनारा कर लिया। किरण बेदी खारिज कर दी गर्इं। अब उनके पास पुरानी चौकड़ी में केवल प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, संजय सिंह और योगेंद्र यादव ही बचे हैं। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण चुनाव के समय जितने सक्रिय थे, सरकार संस्थापना में उतने ही निष्क्रिय नजर आए। बचे हुए कुमार विश्वास और संजय सिंह साख विहीन होने के चलते केजरीवाल की दुम बने रहने को मजबूर हैं। सो, जिस कांग्रेस को बीते 36 महीनों से केजरीवाल भ्रष्ट कहते आए हैं उसी के वंâधों पर सवार होकर सरकार में जा बैठे हैं। देखना है उनकी यह खैराती सियासत कितने माह चलती है? जिनको लगता है कि ‘आप’ पार्टी किसी चमत्कारी जनांदोलन की उपज है, उन्हें एक बार दिल्ली के सियासी दड़बे से बाहर वैश्विक परिदृश्य पर नजर घुमानी चाहिए। सिर्फ 2013 के जनांदोलनों को देख लें तो यूव्रेâन से थाईलैंड तक तमाम जनांदोलन नजर तो आते हैं, पर कोई सफलता चूमता नजर नहीं आता।

जनांदोलनों का फायदा जनता को नहीं

ब्राजील, टर्की, यूव्रेâन, इटली, रूस, इजिप्त, सिंगापुर और थाईलैंड की सड़कों ने जनप्रदर्शनों का दीदार किया। हर आंदोलन में सोशल मीडिया का प्रभाव, नागरिकों का अपेक्षाभंग, सत्तातंत्र का अनिर्णय और भ्रष्टाचार ‘कॉमन फैक्टर’ रहा। इनके परिणामों में भी कोई विशेष अंतर नहीं नजर आता। उदाहरण के तौर पर टर्की को देखें। टर्की में एनजीओ प्रेरित आंदोलनों की परिणति तानाशाही के शिकंजे में कसाव के रूप में हुई। सड़कों पर व्यापक प्रदर्शन हुए तो टर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तय्यिप एर्डोगन ने अधिकारों को अपने पास केन्द्रीकृत कर लिया। यूक्रेन के जनांदोलन ने वहां की सरकार को यूरोपियन यूनियन के साथ समझौते को तो मजबूर किया। पर यूव्रेâन के प्रदर्शनकारियों के लिए लोकतंत्र अभी बहुत दूर नजर आ रहा है। इजिप्त में मोहम्मद मोर्शी के समर्थकों और सेना के बीच आए दिन हिंसक वारदात हो रही है। ब्राजील के साओ पावलो शहर में मेट्रो के किराए में वृद्धि को लेकर जून 2013 में जनांदोलन खड़ा हुआ। जून में हिंदुस्तानी मुद्रा रुपया डॉलर के मुकाबले गत्र्त में जा रहा था, पर ब्राजील की मुद्रा स्थिर थी। ब्राजील ने 2 वर्ष पहले ‘ब्रिक’ देशों की अपनी मुद्रा की बात की थी और विश्व बैंक की तर्ज पर ‘ब्रिक’ देशों के बैंक अथवा इंटरनेशनल मोनेटरी फंड में ‘ब्रिक’ के ‘वोटिंग पॉवर’ को बढ़ाने की मांग रखी थी। मेट्रो जनांदोलन के बाद ब्राजील की राष्ट्राध्यक्ष दिल्मा रौसेफ को पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर औचक 50 बिलियन रियाल खर्च करने का पैâसला लेना पड़ा। परिणामस्वरूप ब्राजील के चालू खाते का घाटा बढ़ा और ब्राजील रियाल के मूल्य में 10 प्रतिशत की गिरावट आ गई। फायदा किसे हुआ? ब्राजील की जनता को नहीं बल्कि आईएमएफ और वल्र्ड बैंक को।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों के पीछे कौन?

रूस की राजधानी मॉस्को में ‘एंटी ऑरेंज प्रोटेस्ट’ का प्रभाव सरकारी दमनशाही के बावजूद जारी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन खुद आरोप लगा चुके हैं कि रूसी जनांदोलन अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने प्रायोजित किए। रूसी जनांदोलन का नेतृत्व करनेवाले थैलीशाह मिखाइल खोद्रोवस्की को महीनों की कैद के बाद अब जाकर रिहा किया गया है। थाईलैंड में 4 नवंबर से प्रस्तावित ‘एमनेस्टी बिल’ के खिलाफ जो जनांदोलन छिड़ा तो वह अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। तमाम सरकारी इमारतें आंदोलनकारियों के कब्जे में हैं। थाईलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री ठकसिन शिनावात्रा के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को माफ न किया जाए की मांग से जारी आंदोलन अब वर्तमान प्रधानमंत्री यिंगलुक शिनावात्रा की कुर्सी के लिए खतरा बन गया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शुरू में चीन में जारी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों पर नरम रहे। अब उन्होंने लिइयु पिंग, वी झोंगपिंग और ली सिहुआ जैसे आंदोलनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश दे दिया है। शी जिनपिंग का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नाम पर विदेशी ताकतें चीन में आंतरिक हस्तक्षेप करना चाहती हैं। ब्राजील हो, रूस, टर्की या चीन हर देश भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों को विश्व बैंक/ अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा पोषित एनजीओ का कुचक्र करार देता है। फिर भी हम केजरीवाल को माथे पर बैठाए नाच रहे हैं। यह बिसार कर कि केजरीवाल का उद्भव और हिंदुस्तान के अर्थतंत्र-सत्तातंत्र का नीतिगत लकवा समानांतर परिघटना है। ब्राजील की मुद्रा की गिरावट और रुपए के अवमूल्यन का लाभ अंतत: किसको हुआ? क्या इस तथ्य को हम आमजनों तक पहुंचा पाएंगे? जब तक लोग सयाने होंगे तब तक खजाना लुट चुका होगा।