01 January 2021

देश विदेश में पादरियों का यौन शोषण

पूरी दुनिया में पादरियों का यौन शोषण जारी है. अमेरिका के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय की ओर से जारी में कहा गया है की करीब 700 पादरियों पर यौन शोषण का आरोप है. मगर पादरियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. आरोपों से निपटने में चर्च की असमर्थता की आलोचना अमेरिका के अटॉर्नी जनरल के कार्यालय की ओर से जारी बयान में की गई है. अमेरिका के इलिनोइस राज्य में करीब 700 पादरियों पर बच्चों के यौन शोषण का आरोप है, जो इससे पहले कैथॉलिक चर्च की ओर से बताई गई संख्या से कहीं ज्यादा है.

अमेरिका के मध्यपश्चिमी राज्य के प्रॉसीक्यूटर ने यह खुलासा किया है. अटॉर्नी जनरल कार्यालय का कहना है कि आरोपों की जांच अधूरी रही और कई मामलों में कानून का पालन नहीं किया गया और बाल कल्याण संस्थाओं को सूचना भी नहीं दी गई. साथ ही इस बयान में ये भी कहा गया है कि जांच के शुरूआती चरणों से पहले ही साफ हो चुका है कि कैथोलिक चर्च अपनी निगरानी नहीं कर सकता.

अमेरिका के पेंसिलवेनिया के सुप्रीम कोर्ट ने कैथोलिक चर्च की रिपोर्ट जारी की जिसमें 300 से ज्यादा पादरियों ने नाबालिग बच्चों का यौन शोषण किया. रोमन कैथोलिक चर्च की मैक्सिकन शाखा से जुड़े पादरियों ने 175 बच्चों को यौन शोषण किया. सभी बच्चे 11 से 16 साल के बीच के रहे थे. वहीँ पोलैंड के एक शक्तिशाली कैथोलिक चर्च ने कबूला कि 400 से ज्यादा पादरियों ने नाबालिग बच्चों का यौन शोषण किया. पोलिश बिशप के अनुसार 382 पादरियों ने 624 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण की जांच हुई.

चिली में पादरी पर नाबालिंग यौन शोषण के 178 मामले चले. पादरी को 178 मामलों में दोषी पाया गया लेकिन सजा में सिर्फ आजीवन प्रार्थना करने की सजा मिली. चिली का कानून पादरी को सजा नहीं दे सकता. पादरियों के इस कुकृत्य से स्पस्ट है की पूरी दुनिया में पादरियों का बाल यौन शोषण जारी है.

स्वामी लक्ष्मणानंद के हत्यारा ईसाई मिशनरियां

आज से करीब 12 साल पहले ओडिशा में पाल के संतों की तरह इसी तरह स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी और उनके चार शिष्यों की हत्या की गई थी. उस वक्त भी इसके पीछे ईसाई मिशनरियों और माओवादियों का कनेक्शन सामने आया था. 23 अगस्त 2008 को कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद और उनके शिष्यों की हत्या भी सुनियोजित तरीके से की गई हत्या के पीछे धर्मांतरण गिरोह का बड़ा हाथ था.

स्वामी लक्ष्मणानंद ओडिशा के वनवासी बहुल फुलबनी जिले के गाँव गुरुजंग के रहने वाले थे. उन्होंने वनवासी बहुल फुलबनी के चकापाद गाँव को अपनी कर्मस्थली बनाया था. जहां पर वह गरीब और आदिवासी हिन्दुओं को धर्मांतरण करने से रोकने के लिए कार्य कर रहे थे. उनके प्रयाश की वजह से उस क्षेत्र में काफी हद तक ईसाई धर्मांतरण रूक गई थी. यही बात धर्मांतरण गिरोह को रास नहीं आरही थी.

धर्मांतरण कर ईसाई बनाए गए लोगों की हिंदू धर्म में वापस लाने के लिए उन्होंने अभियान शुरू किया था. 1970 से दिसंबर 2007 के बीच स्वामी लक्ष्मणानंद पर 8 बार जानलेवा हमले हुए. आखिरकार 23 अगस्त 2008 जब वे जन्माष्टमी समारोह में भगवान् श्रीकृष्ण की आराधना में लीन थे उसी वक्त उनकी निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई थी.

ओडिशा के घने जंगलों में मिशनरी की संदिग्ध और धर्मांतरण की गतिविधियों के खिलाफ जोरदार अभियान चलाने वाले तथा आदिवासियों को चर्च के चंगुल में जाने से बचाने में इनकी प्रमुख भूमिका थी. स्वामीजी वहाँ व्यापक तौर पर सामाजिक सेवा के कार्य में लगे थे. आदिवासी लड़कियों के लिए स्कूल व हॉस्टल चलाते थे. उनके इस काम को मिशनरी के लोग धर्मांतरण के अपने मिशन में बाधा के तौर पर देखते थे.

ईसाई चर्चों का संस्थाओं के खिलाफ षड्यंत्र

भारत- रूस के सहयोग से स्थापित कुडनकुलम परमाणु संयंत्र से नाखुश कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को अटकाने के लिए वर्षों तक मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर धरने-प्रदर्शन करवाए। तत्कालीन संप्रग सरकार में मंत्री वी नारायणस्वामी ने यह आरोप लगाया था कि कुछ विदेशी ताकतों ने इस परियोजना को बंद कराने के लिए धरने-प्रदर्शन कराने के लिए तमिलनाडु के एक बिशप को 54 करोड़ रुपये दिए थे। इस मामले में विदेशी चंदा प्राप्त कर रहे चार एनजीओ पर कार्रवाई भी की गई थी। इसी प्रकार का दूसरा उदाहरण वेदांता द्वारा तूतीकोरीन में लगाए गए स्टरलाइट कॉपर प्लांट का है। इस प्लांट को बंद कराने में भी चर्च का हाथ माना जाता है। आठ लाख टन सालाना तांबे का उत्पादन करने में सक्षम यह प्लांट अगर बंद न होता, तो भारत तांबे के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया होता।

यह कुछ देशों को पसंद नहीं आ रहा था और इसलिए उन्होंने मिशनरी संगठनों का इस्तेमाल कर पादरियों द्वारा यह दुष्प्रचार कराया कि यह प्लांट पूरे शहर की हर चीज को जहरीला बना देगा। इस दुष्प्रचार के बाद हिंसा भड़की और पुलिस फायरिंग में 13 लोगों की मौत हो गई। नतीजा यह हुआ कि यह प्लांट बंद कर दिया गया। यह अभी भी बंद है और 18 साल बाद भारत को एक बार फिर तांबे का आयात करना पड़ रहा है। देश को गहरे नुकसान से बचाने के लिए विदेशी चंदे पर पूरी तरह रोक के साथ- साथ मिशनरी संगठनों की गतिविधियों पर सख्त पाबंदी आवश्यक है।

धार्मिक सभाएं करने से पहले ऐसे संगठनों के लिए स्थानीय पुलिस-प्रशासन को जानकारी देना आवश्यक होना चाहिए। अपनी धार्मिक सभाओं में ऐसे संगठनों द्वारा दूसरे धर्मों के देवी-देवताओं और प्रतीकों का प्रयोग करने को छल की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और धार्मिक नगरों और साथ ही सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकानों के आसपास उन पर कड़ी निगाह रखी जानी चाहिए, क्योंकि धर्मांतरण सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने के साथ देश की सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहा है।

पालघर में संतों की हत्या के पीछे ईसाई धर्मांतरण !

पालघर में संतों की हत्या के पीछे एक सबसे बड़ा साजिश ईसाई धर्मांतरण भी था. सुदर्शन ने सूत्रों ने अपने पड़ताल में ये पाया था कि इस आदिवासी इलाके में ईसाई धर्मांतरण को हथियार बनाया गया. साधु-संत इस इलाके में धर्मांतरण का विरोध करते हैं और हिंदुत्व के लिए आवाज़ उठाते हैं. इसीलिए उन्हें दुश्मन की तरह देखा जाता है.

स्थानीय हिन्दुओं के अनुसार पालघर में वामपंथी दलों और ईसाई मिशनरियों के गठजोड़ की बात बताई खुल कर सामने आई. हिंदूवादी संगठन और हिंदू साधु संत इन लोगों की आंखों में चुभते हैं. ये इलाका ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार और धर्मांतरण करने का बड़ा गढ़ है. इस आदिवासी इलाके में कई ईसाई मिसनरी काम करती हैं.

सवाल यही है कि क्या इन सभी बातों की वजह से पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई? क्य़ा इसी वजह से कल्पवृक्ष गिरी महाराज और सुशील महाराज की जान ले ली गई?

पालघर के कुछ इलाकों में रावण की पूजा के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इसके ज़रिए आदिवासियों को हिंदू मान्यताओं का विरोधी बनाने की कोशिश की जा रही है . कुछ लोग आदिवासियों में ये भ्रम फैला रहे हैं कि आदिवासी रावण के वंशज है और उन्हें रावण की पूजा करनी चाहिए . आदिवासी एकता परिषद जैसे कुछ संगठन पालघर में रावण दहन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाते हैं और रावण को देवता की तरह दिखाने की कोशिश करते हैं.

आदिवासियों को हिंदू मान्यताओं का विरोधी बनाने से रोकने में साधु संतों का एक बड़ा योगदान उस इलाके में था. यही कारण है की उन्हें निशाना बयाना जा रहा है और अब भी साधु संतों के खिलाफ मिसनारियों का साजिश जारी है.

ईसाई धर्मांतरण का षड्यंत्र

देश में ईसाई षड्यंत्र अपने चरम सीमा पर है. पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं. देश में विदेशी पैसे से हो रहे धर्मांतरण और ईसाई मिशनरी संगठनों द्वारा किए जा रहे भारत विरोधी दुष्प्रचार और देश की अंदरूनी मामलों में दखल जैसे मुद्दे शामिल है. 17 दिसंबर को वाशिंगटन स्थित मिशनरी संगठन इंटरनेशनल क्रिश्चियन कंसर्न ने ट्वीट कर भाजपा की विधानसभा चुनावों में हार पर खुशी जताई थी.

साथ ही एक अन्य ट्वीट में भारत के कुछ पादरियों के हवाले से जारी बयानों को आधार बनाते हुए बताया गया था कि भारत में किस तरह ईसाई भयभीत हैं और आने वाला क्रिसमस खुल कर नहीं मना पाएंगे. मतलब देश के अन्दर एक असंतोष पैदा करके विद्रोह खड़ा करना.  दूसरी ओर झारखंड में विदेशी फंड के दुरुपयोग के एक मामले में 88 एनजीओ के विरुद्ध चल रही जांच में राज्य सीआइडी ने दस लोगों को प्रारंभिक रूप से दोषी पाते हुए उनके खिलाफ सीबीआइ जांच की सिफारिश कर चुकी है. ये एनजीओ चर्च से संबंधित हैं और इन पर करोड़ों के फर्जी एकाउंट बनाने, अपने घोषित उद्देश्य से अलग विदेशी चंदे का उपयोग करने और सरकार को झूठी जानकारी देने के आरोप हैं. चूंकि इनके तार विदेशों में जुड़े हैं इसलिए सीबीआइ जांच की सिफारिश की गई.

अंडमान निकोबार द्वीप समूह के सेंटीनल द्वीप पर एक अमेरिकी नागरिक जॉन एलन चाऊ को वहां रहने वाले आदिवासियों ने तीरों से मार डाला था. चाऊ की चिट्ठियों से पता चला कि वह इस द्वीप पर रहने वाले आदिवासियों को ईसाई बनाने आया था. चाऊ की मानें तो वह इन आदिवासियों को जीसस के साम्राज्य का अंग बनाना चाहता था. इस क्षेत्र में भारतीय नौसेना की अंडमान कमान भी है. 

ऐसे में एक विदेशी नागरिक का इस क्षेत्र के आदिवासियों का धर्मांतरण करने की कोशिश एक राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिकों के खिलाफ गंभीर षडयंत्र को दर्शाता है. देश में ईसाई संगठनों का प्रभाव इतना हाबी हो चुका है की हाल में मिजोरम में हुए चुनावों के बाद मिजोरम के मुख्यमंत्री ने ईसाई प्रार्थनाओं के बीच अपने पद की शपथ ली. ये देश की संविधान और सत्ता पर ईसाई संगठनों का सबसे बड़ा षडयंत्र है.

दारा सिंह को किसने फंसाया ?

ईसाई धर्मांतरण गिरोह द्वारा हत्या और साजिश का सबसे बड़ा उदहारण ग्राहम केस है. स्टेंस 1995 में ओडिशा आए थे, जो कुष्ठ रोगियों और आदिवासियों के साथ 'काम' करने के नाम पर धर्मांतरण कार्य कर रहे थे. ग्राहम स्टेंस द इवेंजेलिकल फ़ेलोशिप ऑफ़ इंडिया से जुड़े थे, जो ईसाई धर्म के विस्तार में शामिल है. 23 जनवरी 1999 को ग्राहम स्टेंस की कथित तौर पर हत्या हो गई. मगर इस हत्या के पीछे सबसे दारा सिंह को दोषी बनाया गया.

इस मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का भी गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा ने की थी, ताकि घटना से संबंधित परिस्थितियों की जांच की जा सके. सीबीआई और वाधवा आयोग दोनों ने अपने जाँच के निष्कर्ष में पाया की हत्याओं के पीछे आदिवासियों समाज के धर्मांतरण एक प्रमुख कारण था. वाधवा आयोग ने कहा कि "कुछ आदिवासियों को शिविर में ईसाई दीक्षा दिया गया था".

पिछड़े आदिवसी क्षेत्रों के जंगलों में जंगल कैंप आयोजित किया गया था. शिविर का उद्देश्य ईसाइयों और धार्मिक नवीकरण और पारस्परिक प्रभाव को लेकर बातचीत होना बताया गया है. जंगल कैंप का मतलब है चार दिन की बाइबल शिक्षा, प्रार्थना और संगति. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दारा सिंह किसी भी संगठन से संबद्ध नहीं थे और अकेले कार्य करते थे. लेकिन, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने मामले में हस्तक्षेप किया और वाधवा आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और खुद अपनी जांच शुरू किया और बजरंग दल के साथ 'दारा सिंह' के संबंध को जोड़ा.

ग्राहम स्टेंस, ईसाई मिशनरियों और संबद्ध ईसाई पारिस्थितिक तंत्र के बीच संबंधों की जांच करने से पहले, जिन्होंने हिंदुओं को बदनाम करने का काम किया, ईसाई मिशनरियों, और संबद्ध ईसाई पारिस्थितिकी तंत्र, जिन्होंने हिंदुओं को अपमानित करने का काम किया.

ईसाई धर्मांतरण का विदेशी षड्यंत्र

ईसाई मिशनरियों का सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाभर में फ़ैली हुई है. देश विदेश में मौजूद फैले कैथोलिक मिशनरी वेटिकन को अपने आस-पास के इलाके की विस्तृत सूचनाएं भेजती है. सुदर्शन न्यूज़ ने जब अपने विशेष की सूत्रों से इनके षड्यंत्र की पड़ताल की तो पता चला कि सीआइए और वेटिकन चर्चों का बहुत ही घनिष्ठ और गहरा संबंध है. कैथलिक मिशनरियों द्वारा संचालित खुफिया एजेंसी प्रो डिओ को कई ईसाई देशो द्वारा धन भी मुहैया कराई जाती हैं.

ये पूरा षडयंत्र सैकड़ों वर्षों से चल रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सार्वर्न मिलिट्री ऑर्डर ऑफ माल्टा नामक एक पुरातन धार्मिक संस्था का उपयोग भी ईसाई मिसनारियों ने ख़ुफ़िया कार्यों के लिए किया था. अमेरिका और यूरोप के सत्ता तंत्र में बैठी कई कैथलिक शख्सियतें जैसे खुफिया अधिकारी, राजनयिक, उद्योगपति इसके सदस्य हैं. इसके रूतबे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की इस संस्था को संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक का दर्जा हासिल है.

इसे एक राष्ट्र की तरह पासपोर्ट तक जारी करने का अधिकार है. क्या आप सोच सकते हैं कि किसी हिंदू या सिख अखाड़े को संयुक्त राष्ट्र में ऐसा दर्जा प्राप्त हो सकता है? आज के इस ईसाई धर्मांतरण युग में सत्ता और चर्च का यही चोली दामन का नाता है. यही कारण है की 2015 में अपने भारत दौरे के दौरान बराक ओबामा ने चर्चो पर हो रहे फर्जी हमलों के बहाने इसे असहिष्णुता से जोड़ा था और ईसाई मिसनारियों के समर्थन में अपना बयान दिया था.

भारत के पूवरेत्तर राज्यों और मध्य भारत के प्रदेशों में आज मिसनारियों का षडयंत्र जारी है. इन इलाकों में विदेशी चंदा पा रहे मिशनरियों ने इतना धर्मांतरण कर डाला है कि पूरी की पूरी जनजातियां ईसाई हो गई हैं और अब यहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या खड़ी होगई है

भारत में प्रजनन दर सबसे निचले स्तर पर

सुप्रीम कोर्ट में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का हलफनामा भारतीय जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में मील का एक पत्थर माना जा सकता है। हलफनामे में कहा गया कि सरकार जनसंख्या नियंत्रण के तहत बच्चों की एक निश्चित संख्या थोपने के खिलाफ है; दंपति को अपने परिवार का आकार तय करने का अधिकार है। कोर्ट को बताया गया कि वर्ष 2000 में कुल प्रजनन दर 3.2 थी, जो 2018 में 2.2 पर आ गई। अतीत की, संघ परिवार की घोषित परिवार नियोजन नीति का यह नकार है। संघ साहित्य में अभी तक पढ़ते आए हैं कि मुसलमान चार-चार शादियां कर बहुत सारे बच्चे पैदा करते हैं, जिससे भारत कई दशक बाद हिंदू बहुल नहीं रह पाएगा। इस प्रक्रिया को रोकने के लिए अनिवार्य परिवार नियोजन की मांग की जाती रही। पिछली जनगणना का निष्कर्ष था कि मुसलमानों में जन्म दर कम हो रही है। कई हलकों में आशंकाएं तब भी बनी रहीं।

यह भारत का नया विचार हुआ या अनुभवों पर आधारित निष्कर्ष? जाहिरा तौर पर संघ के विचारों से प्रभावित, हर्ष मधुसूदन और राजीव मंत्री की नवीनतम पुस्तक अ न्यू आइडिया ऑफ इंडिया के पन्नों से इस तरह के सवाल निकलते हैं। स्वाभाविक है, लेखक द्वय पाठक के मन में चित्रांकन करते हैं कि पहले वाजपेयी और अब मोदी के कार्यकाल में भारत के नए विचार पर अमल हो रहा है। पुस्तक के प्रारंभ में जवाहर लाल नेहरू के एक चर्चित भाषण से लंबा उद्धरण दिया गया है, जो लेखकों की बौद्धिक ईमानदारी का सबूत है। 1961 में कांग्रेस के अधिवेशन में नेहरू ने कहा था, 'इतिहास की शुरुआत से ही भारत के लोग हमेशा मानते रहे हैं कि उनका संबंध एक महान देश से है। एक देश, एक संस्कृति की अनुभूति एकता के सूत्र में पिरोए रही है। यह समान विचार और समान आकांक्षा कदाचित हजारों साल पहले उत्पन्न हुए। हजारों साल से यह भूमि दिल, दिमाग और आध्यात्मिक विरासत में हमारी अपनी रही है।

शाश्वत भारत का यह विचार नेहरू के लेखन, मुख्यतः डिस्कवरी ऑफ इंडिया में निरंतर दृष्टिगोचर होता है। अन्य राष्ट्रवादी चिंतकों की भी भारत की यही अवधारणा रही है। इस विचार से असहमत लोगों ने पाकिस्तान आंदोलन चलाया और उसमें कुछ हिंदुओं का भी उन्हें वैचारिक सहयोग प्राप्त हुआ। नेहरू के इस चिंतन के मद्देनजर, पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होने का आरोप उन पर चस्पा नहीं होता। तो फिर नेहरू पर निर्मम प्रहार क्यों किए जाते हैं? सबसे बड़ा और वह भी अघोषित कारण शायद यह है कि नेहरू राष्ट्रीय स्वयं संघ के सर्वाधिक मुखर आलोचक थे। नागपुर से गोरखपुर तक हर हिंदुत्ववादी विचार को वह त्याज्य मानते रहे। मंत्री और मधुसूदन दूसरे धरातल से नेहरू पर वार करते हैं। 

अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियंत्रण, विदेश नीति और अल्पसंख्यकों के प्रति विशेष व्यवहार- ये तीन खास मोर्चे है। लेखक अगर टेक्नोक्रेट हैं, तो उनसे तथ्यपरक और वैज्ञानिक विश्लेषण की न्यूनतम उम्मीद की जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र को वरीयता देने के लिए नेहरू पर पत्थर फेंकने से पहले 'बांबे प्लान' को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। 1944-45 में जेआरडी टाटा, जीडी बिरला, लाला श्रीराम और कस्तूरभाई लाल भाई सहित आठ उद्योगपतियों ने यह दस्तावेज नेहरू को सौंपा था। प्लान का केंद्र बिंदु यह था कि सरकारी हस्तक्षेप और नियमन के बगैर आर्थिक पुनर्निर्माण संभव नहीं है। फिक्की ने बांबे प्लान की पुष्टि की थी। भारतीय उद्योग खुद शैशवावस्था में था। भिलाई स्टील प्लांट (1955) जैसे विराट कारखाने खड़ा करना भारतीय उद्योगपतियों के लिए संभव नहीं था। ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडियन बिजनेस के लेखक द्विजेंद्र त्रिपाठी संसद में निजी क्षेत्र को दिए गए नेहरू के आश्वासन को याद करते हुए लिखते हैं कि उन्होंने निजी क्षेत्र के लिए ऋण व्यवस्थाओं का प्रावधान किया; आईएफसीआई (भारतीय औद्योगिक वित्त निगम) का गठन इसका पहला उदाहरण है।

1947 में नेहरू की जगह किसी अन्य के प्रधानमंत्री बनने की कल्पना करें। क्या भारत अमेरिकी खेमे में शामिल हो जाता? बड़े-बड़े कारखाने लगाने में अमेरिका मदद करता? मिग जैसे लड़ाकू विमान बनाने में सहयोग करता? गोवा की मुक्ति का विरोध न करता?कश्मीर पर प्रतिकूल समझौते के लिए न कहता? यह सब संभव मान लें, तो राष्ट्रीय अस्मिता के खाते से कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती? गुटनिरपेक्षता के चश्मे से देखें या अन्य कोई चश्मा पहन लें, भारतीय विदेश नीति सदैव राष्ट्र के प्रति समर्पित रही है। सोवियत संघ की निर्णायक सहायता से भारी उद्योगों की स्थापना, 1962 में चीन के हमले के बाद भयभीत नेहरू का अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम पत्र, नंदादेवी पर चीन के खिलाफ जासूसी के लिए अमेरिकी परमाणु पावर पैक की स्थापना, 1971 में भारत-सोवियत संधि, 2005 में भारत-अमेरिकी परमाणु सहयोग पर समझौता और मोदी का 'ऐतिहासिक झिझक' को तोड़ना- ये सभी राष्ट्र रक्षा के संकल्प के विभिन्न रूप हैं।

सैकड़ों साल से जाति-उत्पीड़न की शिकार जनता के विषय में भारतीय मनीषियों और राज्य सत्ता ने जो निष्कर्ष निकाले, शेष जनता भी उसी की हकदार है। संविधान से सेक्यूलर शब्द निकल जाने पर भी कालपरीक्षित संविधान और इस सनातन राष्ट्र की आत्मा प्रभावित नहीं होगी। कालांतर में सेक्यूलरिज्म और पंथनिरपेक्षता पर्यायवाची हो चुके हैं। करोड़ों भुजदंड एक तनी हुई मुट्ठी की तरह जब नव-निर्माण में संलग्न हो जाएंगे, आशंकाओं से सर्वथा मुक्त, एक फौलादी, अपराजेय देश का अभ्युदय होने लगेगा। पूर्णतया आश्वस्त, नवीन भारत की पराकाष्ठा उसी में निहित है।

ग्राहम स्टेंस की मौत और दारा सिंह के खिलाफ षड्यंत्र का पर्दाफाश

ग्राहम स्टेंस की मौत और दारा सिंह के खिलाफ षड्यंत्र का पर्दाफाशसनातन धर्म पर हमला हो रहा है. आज हम एक सभ्यता युद्ध के बीच में खड़े हैं, अब्राहमिक धर्म के मानने वाले सनातन धर्म का सफाया करने के लिए आक्रामक धर्मयुद्ध कर रहे हैं. यह युद्ध एक सुनियोजित और बेहद हीं व्यवस्थित तरीके से चल रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र की गहराईयों से इसको अंजाम दिया जा रहा है. उदाहरण के लिए भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठन केबल टीवी के माध्यम से अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु समाज के रूप में भारत को दिखाने की पक्षपाती कथन और गलत तथ्यों तथा विवरणों प्रचारित करते हैं.

2002 में हुए गोधरा कांड में भी अब्राहमिक मीडिया केबल मीडिया की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट थी. जैसे 2008 में कंधमाल के दंगे, 2014 में अवार्ड वापसी, गोरक्षा का विरोध, 2019 में एंटी-सीएए विरोध प्रदर्शन. फिर इसके बाद दिल्ली और बेंगलुरु में 2020 में दंगे हुए या हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के लिए ईसाइयों द्वारा जवाबी कार्रवाई की गई. मीडिया और केबल टीवी ने इन घटनाओं की एक फर्जी रिपोर्टिंग की और कथित रूप से सरकार को अल्पसंख्यक-विरोधी और तथाकथित हिंदूवादी एजेंडा पर चलने वाली सरकार बताने की प्रयाश की गई.

ग्राहम स्टेंस 1995 में ओडिशा आए थे, जो कुष्ठ रोगियों और आदिवासियों के साथ 'काम' कर रहे थे. स्टेंस द इवेंजेलिकल फ़ेलोशिप ऑफ़ इंडिया से जुड़े थे, जो ईसाई धर्म के विस्तार में शामिल है. 23 जनवरी 1999 को बजरंग दल के कथित सदस्यों ने एक वाहन को आग लगा दी थी, तब स्टेंस सुर्ख़ियों में आगये थे. उसवक्त दारा सिंह को बजरंग दल के कथित सदस्य के रूप में नामजद किया गया था. घटना के बाद उड़ीसा पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी और बाद में मामला सीबीआई को स्थानांतरित कर दिया गया था.

इस मामले की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग का भी गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी.पी. वाधवा ने की थी, ताकि घटना से संबंधित परिस्थितियों की जांच की जा सके. सीबीआई और वाधवा आयोग दोनों ने अपने जाँच के निष्कर्ष में पाया की हत्याओं के पीछे आदिवासियों समाज के धर्मांतरण एक प्रमुख कारण था. वाधवा आयोग ने कहा कि "कुछ आदिवासियों को शिविर में ईसाई दीक्षा दिया गया था". तब आयोग ने उस शिविर को ईसाइयों के इलाके और धर्मांतरण करने वाले धार्मिक समूह" के रूप में जिक्र किया था.

पिछड़े आदिवसी क्षेत्रों के जंगलों में जंगल कैंप आयोजित किया गया था. शिविर का उद्देश्य ईसाइयों और धार्मिक नवीकरण और पारस्परिक प्रभाव को लेकर बातचीत होना बताया गया है. जंगल कैंप का मतलब है चार दिन की बाइबल शिक्षा, प्रार्थना और संगति. रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि दारा सिंह किसी भी संगठन से संबद्ध नहीं थे और अकेले कार्य करते थे. लेकिन, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने मामले में हस्तक्षेप किया और वाधवा आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया और खुद अपनी जांच शुरू किया और बजरंग दल के साथ 'दारा सिंह' के संबंध को जोड़ा. ग्राहम स्टेंस, ईसाई मिशनरियों और संबद्ध ईसाई पारिस्थितिक तंत्र के बीच संबंधों की जांच करने से पहले, जिन्होंने हिंदुओं को बदनाम करने का काम किया, ईसाई मिशनरियों, और संबद्ध ईसाई पारिस्थितिकी तंत्र, जिन्होंने हिंदुओं को अपमानित करने का काम किया, इसके लिए हमें मयूरभंज के इतिहास को समझने की आवश्यकता है.

मयूरभंज में ईसाई धर्मयुद्ध का इतिहास:

19 वीं शताब्दी के मध्य से मयूरभंज ईसाई मिशनरियों का लक्ष्य बन गया था. 1933 में एवेंजेलिकल मिशनरी सोसाइटी ऑफ मयूरभंज (ईएमएसएम) द्वारा प्रकाशित केट एलनबी ऑफ मयूरभंजनामक पुस्तक में केट एलनबी द्वारा की गई मिशनरी गतिविधियों का विवरण है.

किताब में उल्लेख किया गया है कि कैसे ईएमएसएम मिशनरी मयूरभंज साम्राज्य के युवा उत्तराधिकारी को, एक अंग्रेजी शिक्षक किडेल के माध्यम से ईसाई धर्म में शामिल होने के लिए राजकुमार का ब्रेनवाश किया गया. श्री किडेल तत्कालीन महाराजा के निजी सचिव भी थे. अल्लाबी द्वारा जीसस के शब्द को फैलाने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन करते हुए, पुस्तक ने विस्तार से वर्णन किया है कि कैसे इसने पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा को ईसाई धर्म के प्रति हिंदू भक्तों के ब्रेनवॉश करने के लिए एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया.

मिशनरियों ने रथयात्रा को काफ़िर, गैर ईसाई, हानिकर, निराशाजनक और दुखद रूप में वर्णित किया, जबकि भगवान जगन्नाथ को काफिरों का भगवान बताया. पुस्तक में उल्लेख किया गया है कि कैसे मिशनरियों ने जगन्नाथ रथ यात्रा का उपयोग इसाईयत के प्रसार के लिए किया. और एक उमीद जताया की जिस बिज को आज बोया जा रहा है वह धीरे-धीरे ही सही मगर जरुर फलदायक सिद्ध होगा.

नीचे पुस्तक के कुछ अंश दिए गए हैं. 19वीं शताब्दी के मध्य से मिशनरियों के उत्तराधिकार ने मयूरभंज में ईसाई प्रभाव का विस्तार करने का काम किया और जनवरी 1999 तक एक कुष्ठरोगी गृह का संचालन किया. जिसमे एक पुनर्वास संगठन, फार्म हाउस, दो मिशन कंपाउंड और लगभग 27 चर्च शामिल था.

ग्राहम स्टेन्स की मिशनरी गतिबिधियां:

ग्राहम स्टैंस मयूरभंज (ईएमएसएम) के इंजील मिशनरी सोसाइटी से जुड़े थे. EMSM ऑस्ट्रेलिया में एक पंजीकृत ईसाई धर्मार्थ संगठन है. सिडनी के प्रधान पादरी ग्राहम स्टेंस को एक ऑस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी के रूप में जिक्र किया गया है, जो 1995 से ईएमएसएम का हिस्सा था जो मयूरभंज में कुष्ठरोगी गृह का संचालन करता था. EMSM लेप्रोसी मिशन (TLM) से संबद्ध है. टीएलएम 1874 में स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय ईसाई धर्मार्थ संस्था है. इसका मुख्य उद्देश्य चर्च की  सहायता करना है.

हालिया खोज से ऑस्ट्रेलिया में ईएमएसएम के मिशनरी के बारे में विस्तृत जानकारी मिली है. ऑस्ट्रेलियाई चैरिटीज़ और नॉट-फॉर-प्रॉफ़िट कमीशन ने उल्लेख किया है कि EMSM के चैरिटी लाइसेंस को 2019 में स्वेच्छा से रद्द कर दिया गया था. 14 मई 2019 को एक फेसबुक पोस्ट में, स्टेंस बेटी ने स्वीकार किया कि उनके परिवार ईसाई मिशनरी चलाता थे और धर्मांतरण की गतिबिधियों में शामिल थे.

स्टेंस ने अपनी निजी पत्रिका के लेख में लिखा था की उनके मिशनरी के कार्य को कुछ मोटरसाइकिल सवार लोगों के द्वारा बाधित किया गया था. पुलिस ने उनसे कहा की तुम यहां से अपना पैकअप करो और निकल जाओं. चुनाव के कारण हम आपको सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते हैं. स्टेंस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रणचंद्रपुर में पहला जंगल शिविर काफी लाभदायक सिद्ध हुआ था.

लोगों में उत्साह इसकदर था की मानों उनके ह्रदय में ईस्वर की आत्मा काम कर रही है. यहां पर लगभग 100 लोगों ने भाग लिया, जिसमे से कुछ लोगों को शिविर में बपतिस्मा (ईसाई धर्म की शिक्षा) दिया गया. वर्तमान में मिसेल और चर्च के कुछ नेता कई स्थानों पर दौरा कर रहे हैं, जहाँ लोग बपतिस्मा लेने के लिए कह रहे हैं. बिगोनबाड़ी में पांच को बपतिस्मा दिया गया था. मयूरभंज अपने लंबे मिशनरी इतिहास को समेटे हुए है और आदिवासियों को परिवर्तित करने के लिए ईएमएसएम सक्रिय प्रयासों के साथ कार्य कर रहा है.

ग्राहम स्टेंस का कार्य संदेह से परे है ग्राहम स्टेंस एक कट्टरपंथी ईसाई मिशनरी थे, जिसने उड़ीसा के उग्र हिंदुत्व वाले क्षेत्र में अभियान चलाया. ग्राहम स्टेन्स का ईसाई मिशनरी और धर्मांतरण के केस को भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट के जरिये आसानी से छुपाया और मिटा दिया गया.

आदिवासियों के यौन शोषण के साक्ष्य:

चर्च दुनिया भर में बच्चों के यौन शोषण के लिए चर्चित है. महिला और पादरी द्वारा नन पादरी और उनके बड़े प्रमुख पादरी इनमे से किसी ने भी अभी तक इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है. कुछ उदाहरण ध्यान देने योग्य हैं. 2019 में पोप फ्रांसिस ने स्वीकार किया और कहा की पादरियों ने नन का यौन शोषण किया और उन्हें सेक्स सलेब्स बना कर रखा. फ्रांस में इसके लिए एक स्वतंत्र आयोग का गठन किया.

17 महीने में चर्चों में यौन शोषण के पीड़ितों का 6500 मामले सामने आए. भारत में बिशप फ्रैंको मुल्लाकाल एक नन के बलात्कार का आरोपी है. 2019 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज ने छात्रों के यौन शोषण के लिए जूलॉजी विभाग के अपने दो प्रोफेसरों को बर्खास्त कर दिया. ऑस्ट्रेलिया में पादरी जॉर्ज पेल के मामले ने ऑस्ट्रेलियाई चर्चों में व्याप्त बाल प्रेमी (पीडोफाइल) नेटवर्क पर प्रकाश डाला.

ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस अलग नहीं थे, माचागढ़ गांव की हेमलता करुआ ने क्षेत्र के एक धर्मांतरण शिविर के दौरान स्टेन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. उसने इस घटना के बारे में सत्र न्यायाधीश एम.एन.पाटनिक के सामने बयान दिया. जनवरी 1999 को मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर स्टेंस ने स्थानीय ईसाइयों के लिए एक वार्षिक शिविर का आयोजन किया था. यह शिविर सामाजिक व्यवस्था में स्थानीय लोगों के ईसाई विश्वास पर चर्चा करने के लिए तैयार किया गया था और यह ओडिशा के मयूरभंज और क्योंझर की सीमा पर आयोजित किया गया था.

हेमलता करुआ और उनके पति को भी शिविर में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था. उसने न्यायाधीश को बताया कि स्टेंस ने उसे और उसके पति को वित्तीय कठिनाइयों से बचने के लिए धर्मांतरित करने के लिए राजी किया. दोनों ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए और रात भर शिविर में रहे. रात की घटनाओं को याद करते हुए हेमलता ने कहा, “उसने प्रवेश किया और मुझसे आँखें बंद करके ध्यान करने को कहा, जैसा कि मैं ध्यान कर रही थी उसने मेरे शरीर पर हाथ रखा, मैंने विरोध किया लेकिन उसने मुझे मनाने की कोशिश की. उसने मुझसे कहा  कि शारीरिक संबंध बनाने से मुझे फायदा होगा" जब मैं चिल्लाई तो ग्राहम भाग गया. फिर मैं उसके अगले दिन अपने पति के साथ शिविर छोड़ दी. दो दिन बाद स्टेंस की हत्या हो गई थी. उसने न्यायाधीश को यह भी बताया कि घटना के 20 दिन बाद स्टेंस की पत्नी ग्लैडिस ने उससे संपर्क किया और अपने पति के कार्यों के लिए खेद व्यक्त किया.

भाजपा सांसद सत्य पाल सिंह ने ग्राहम स्टेन्स पर 30 आदिवासी लड़कियों से छेड़छाड़ करने और उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा कि महिलाओं के साथ बर्ताव और निर्दयी गतिविधियों ने स्थानीय लोगों को नाराज कर दिया. इस घटना ने स्थानीय लोगों को कानून अपने हाथ में लेने के लिए मजबूर किया. सत्य पाल सिंह ने कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता पर आरोप लगाते हुए कहा था कि चार्जशीट से आरोपी को बाहर करने के लिए सीबीआई को मजबूर किया गया.

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय पर चर्च का प्रभाव:

2011 में चर्च ने दबाव डाला और सांसदों, विधायकों को बाध्य करने के लिए हिंदू विरोधी राज्य के साथ जुड़ गए गया. सुप्रीम कोर्ट में स्टेंस की मौत के मुख्य आरोपी दारा सिंह की सजा में की गई मूल टिप्पणियों के दो पैराग्राफों से खुलासा हुआ. 2011 में चर्च ने दबाव डाला और सांसदों, विधायकों को बाध्य करने के लिए हिंदू विरोधी राज्य के साथ जुड़ गए गया.

सुप्रीम कोर्ट ने स्टेंस की मौत के मुख्य आरोपी दारा सिंह की सजा में की गई मूल टिप्पणियों से दो पैराग्राफों को हटा दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने मूल टिप्पणियों में चर्च द्वारा धर्मांतरण की गतिविधियों का संदर्भ दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की मूल पीठ ने अपने अवलोकन में कहा था, "जांच से पता चला है कि स्टेन्स धर्मांतरण में शामिल थे और मिशनरी बलपूर्वक धर्मांतरण करा रही थी. वाधवा आयोग ने कहा था कि दारा सिंह बजरंग दल से नहीं जुड़े थे क्योंकि कोई सबूत नहीं था. लेकिन राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने कमिशन की रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया और दारा सिंह को बजरंग दल का सदस्य घोषित कर दिया.

उपरोक्त घटनाओं से यह काफी स्पष्ट है कि इसमें कई साजिश होने की संभावना थी:

1) स्टेंस द्वारा यौन दुर्व्यवहार के आरोपों को छिपाएं

2) असहिष्णुता, घृणा और कट्टरता साबित करने के लिए सबूतों की कमी के बावजूद हिंदू संगठनों पर दोषारोपण करना.

3) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और राज्य की मशीनरी की मिलीभगत से धर्मनिरपेक्ष की बात, हिंदू विरोधी साबित होती है.

ग्राहम स्टेंस के जीवन पर आधारित एक ईसाई प्रचार फिल्म, “The Least of These” (इनमें से कम से कम)

ग्राहम स्टेंस स्टोरी '2019 में रिलीज़ हुई थी. फिल्म का निर्देशन अनीश डैनियल ने किया था और ग्राहम स्टेंस की भूमिका स्टीफन बाल्डविन ने निभाई थी. फिल्म में शरमन जोशी भी हैं, जिन्होंने पहले फिल्म 3 इडियट्स में अभिनय किया था. जबकि अनीश डैनियल ने पहले क्रिश्चियन-आस्था पर आधारित लघु फिल्में बनाई थीं. डैनियल और बाल्डविन दोनों एक विज्ञापन फिल्म करते थे. हालांकि स्काईपास एंटरटेनमेंट के संस्थापक और फिल्म के निर्माता, विक्टर अब्राहम एक प्रसिद्ध ईसाई कट्टरपंथी हैं.

निष्कर्ष:

ग्राहम स्टेन्स के मामले में निगरानी समिति की जाँच  निंदनीय है. मयूरभंज में हिंदुओं को भारत की मजबूत न्यायिक प्रणाली पर भरोसा करना चाहिए था. यह कहते हुए कि, हिंदुओं को विरोध करने का अधिकार है, अब्राहमवादी ताकतों द्वारा सैकड़ों वर्षों से छेड़े जा रहे निरंतर धर्मयुद्ध का बचाव करती हैं. क्या पालघर में साधु की हत्या ग्राहम स्टेंस का बदला है..? जांच एजेंसियों को किसी भी इसके कनेक्शन की तलाश करनी चाहिए.

ग्राहम स्टेंस और परिवार भारतीय वीजा नियमों को तोड़ रहे थे. इसने यह भी दिखाया कि पश्चिमी देशों का भारत के प्रति सम्मान है. मिशन काली टीम ने कई पश्चिमी ईसाई धर्म के प्रचारकों को उजागर किया है जिन्होंने भारत को और भारतीयों को बदलने के लिए भारतीय वीजा प्रणाली और कार्यान्वयन का उपयोग करते हैं. वे तब हमारे चारों ओर घूमते हैं और हमें 'असहिष्णु' कहते हैं, जब हम उनके वर्चस्व, घृणा और कट्टरता के लिए खड़े होते हैं.

2005 में भारत सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाया और धर्मांतरण गतिविधियों के लिए और भारतीय वीजा नियमों को तोड़ने के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया. ईसाई दुनिया पर अत्याचार से त्रस्त उनके क्रूर अतीत से चौकन्ना रहने की जरूरत है, जैसे ईसाई वर्चस्व स्थापित करने के लिए यीशु के नाम पर गुलाम बनाना और मारना. भारत में काम कर रहे क्रिश्चियन इंजीलिकल को सनातन धर्म के अनुयायियों पर मुकदमा चलाने, उन्हें रोकने और छेड़ने की जरूरत है. 

भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर लागू करो

                                      भारत सरकार के गृह मंत्रालय का आदेश

24 अक्टूबर 1956 को भारत के गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को लिखा था पत्र. तत्कालीन प्रधानमंत्री ने सभी  मुख्यमंत्रियों को इस संबंध में संबोधित किया था. 1 अक्टूबर 1956 के परिपत्र के उत्तर में विभिन्न मुख्यमंत्रियों द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को लागू किया गया. आदेश में कहा गया कि भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर का उपयोग सभी कार्यालयों और इसी तरह के उद्देश्यों के लिए किया जायेगा. 



समिति द्वारा सुझाया गया था कि 22 मार्च 1957 से  अर्थात 1 चैत्र शुक्ल 1879 से समान राष्ट्रीय कैलेंडर को भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में उपयोग किया जायेगा.

साथ ही ये भी कहा गया कि कैलेंडर को आधिकारिक उद्देश्यों के लिए भी उपयोग किया जायेगा. 

भारतीय राजपत्र के प्रकाशन के बाद नई भारतीय राष्ट्रीय तिथि का उपयोग ग्रेगोरियन तिथि के जगह किया जाना चाहिए. 



नई भारतीय राष्ट्रीय तिथि को ग्रेगोरियन तिथि के साथ घोषित किया जाना चाहिए.

ऑल इंडिया रेडियो पर सभी भाषाओं के समाचार प्रसारण में इसका उपयोग व उद्घोष होना चाहिए. 

सरकार द्वारा प्रकाशित सभी कैलेंडर में ग्रेगोरियन तिथि के साथ नई भारतीय राष्ट्रीय तिथि दिखाई जानी चाहिए.

सभी राज्य सरकारों को ग्रेगोरियन कैलेंडर के साथ समान राष्ट्रीय कैलेंडर का उपयोग करने की सिफारिश की जानी चाहिए.

प्रचलित प्रथा के अनुसार छुट्टी देने से बचना अपेक्षित नहीं है, लेकिन समिति द्वारा सुझाई गई तारीखों का यथासंभव पालन किया जाना चाहिए. 



जनता की सुविधा के लिए सभी भारतीय भाषाओं और संस्कृत में समिति की रिपोर्ट प्रकाशित करने की व्यवस्था की जा रही है.

सरकारी प्रकाशनों को बेचने वाले प्रमुख बुकस्टोर्स में अंग्रेजी में रिपोर्ट की प्रतियां बिक्री के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं.

इस समान राष्ट्रीय कैलेंडर को उचित प्रचार देने और इस कैलेंडर के बारे में लोगों को शिक्षित करने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यों में इसका उपयोग करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए. 

जैसे:- 

1. दस्तावेज़ पर तारीख

2. व्यापार लेनदेन का रिकॉर्ड

3. कुछ रिकॉर्ड रखने के लिए. जन्म रजिस्टर आदि.

4. किराए आदि के विशिष्ट प्रकार. 

5. पत्राचार की तारीखें (दोनों निजी और वाणिज्यिक)

भारत सरकार द्वारा इस विषय पर जारी प्रेस विज्ञप्ति की एक प्रति राज्य सरकारों की जानकारी के लिए संलग्न है।



हस्ताक्षर: फतेह सिंह, उप सचिव, भारत सरकार, F68 / 56 सार्वजनिक 1 नई दिल्ली – 11002, गृह मंत्रालय, भारत सरकार, 24 अक्टूबर 1956

प्रतियां भारत सरकार के सभी (सरकारी) विभागों आदि को भी भेजी गई हैं.

15 December 2020

जनसंख्या नियंत्रण पर स्वास्थ्य मंत्रालय का भ्रमजाल क्यों ?

जनसंख्या नियंत्रण कानून पर भारत सरकार के स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय ने अपना रुख स्पष्ट किया है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने की बात सिरे से ख़ारिज कर दिया है. साथ ही ये विषय केंद्र ने राज्यों के साथ जोड़ दिया है. केंद्र का कहना है की इसपर राज्य सरकार क़ानून बना सकती है. मगर संविधान की अनुसूची 7 के कांक्रेंट लिस्ट में 20-A में साफ तौर पर उल्लेख है की इसपर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. 

तो ऐसे में सवाल स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय के हलफनामे को लेकर खड़ा होता है की मंत्रालय इसपर टालमटोल क्यों कर रहा है. मंत्रालय का कहना है की भारत में किसी को कितने बच्चे हों, यह खुद पति-पत्नी तय करें. सरकार नागरिकों पर जबर्दस्ती नहीं करे कि वो निश्चित संख्या में ही बच्चे पैदा करे. स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय देश के लोगों पर जबरन परिवार नियोजन थोपने के साफ तौर पर विरोध में है.

मतलब साफ है की इसपर मंत्रालय बिल्कुल भी चिंतित नहीं है और ना ही जनसंख्या नियंत्रण पर कोई ठोस कदम उठाना चाहता है. ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट भी इस याचिका को लेकर असमंजस में दिख रहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने जवाब में ये भी कहा है की निश्चित संख्या में बच्चों को जन्म देने की किसी भी तरह की बाध्यता हानिकारक होगी. 

ऐसा करने से जनसांख्यिकीय विकार पैदा करेगी. देश में परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वैच्छिक है जिसमें अपने परिवार के आकार का फैसला दंपती कर सकते हैं और अपनी इच्छानुसार परिवार नियोजन के तरीके अपना सकते हैं. ऐसे में इसमें किसी तरह की अनिवार्यता नहीं है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक तर्क ये भी है की 'लोक स्वास्थ्य' राज्य के अधिकार का विषय है और लोगों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचाने के लिए राज्य सरकारों को स्वास्थ्य क्षेत्र में उचित एवं निरंतर उपायों से सुधार करने चाहिए. 

"स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार का काम राज्य सरकारें प्रभावी निगरानी तथा योजनाओं एवं दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन की प्रक्रिया के नियमन एवं नियंत्रण के लिए विशेष हस्तक्षेप के साथ प्रभावी ढंग से कर सकती हैं." साथ में मंत्रालय ने अपने हलफनामे में ये भी बताया है कि सरकार परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को लेकर बहुतसी योजनायें चला रही है. मंत्रालय का इरादा इसपर विषय पर क़ानून बनाने का नहीं है. 

07 December 2020

किसान आन्दोलन की फसल पर राजनीति क्यों ?

किसानों ने भारत बंद करने का एलान किया है. सुबह 11 बजे से शाम 3 बजे तक किसान सड़कों पर होंगे. मगर इस आन्दोलन को केंद्र सरकार के विरोध का माध्यम बनाने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट हो गया है. हर दल किसान आन्दोलन के आसरे अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में जूट गयें हैं. 

कृषि क्षेत्र से जुड़े नए कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अब पूरी तरीके से राजनीति दलों ने हाईजैक कर लिया है. कांग्रेस, लेफ्ट, टीएमसी, बसपा, डीएमके, सपा समेत अधिकतर विपक्षी पार्टियों ने भारत बंद को समर्थन देने का ऐलान किया है. मतलब बेगाने शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसे माहौल में किसान आन्दोलन तब्दील होगया है.

एकतरफ किसान संगठन ये कहते नहीं थक रहे हैं की वे किसी भी राजनीतिक दल को अपने आन्दोलन में नहीं बुलाया है...मगर बिपक्षी दल है की मानने को तैयार नहीं हैं...दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार नए कृषि कानून को राज्य में गजट नोटीफिकेसन जारी करके लागू भी कर चुकी है. मगर फिर भी अरविन्द केजरीवाल अपने आप को रोक नही सके और टीकरी बॉर्डर पर किसानों का समर्थन करने पहुंच गए.

किसान आंदोलन की शुरुआत में पंजाब और हरियाणा के किसान शामिल थे. बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं ने हिस्सा लिया, लेकिन अब इस आंदोलन में राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के किसान शामिल होरहे हैं. तो सवाल यहां भी खड़ा होता है की आखिर एकाएक इतने राज्यों के किसान कैसे अचानक से सड़कों पर उतरने का ऐलान कर दिया..?

आन्दोलन में शामिल होने वाले क्या सभी लोग किसान होंगे या राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता..? और अगर अधिकतर आन्दोलनकारी राजनीतिक दलों से हैं तो फिर ये आन्दोलन किसानों तक सिमित कैसे रहा...? शरद पवार बतौर कृषि मंत्री कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) ऐक्ट में बदलाव की वकालत कर चुके हैं मगर अब किसान आंदोलन के साथ खुद को हितैसी दिखा रहे हैं. 

वहीँ शिवसेना ने कृषि कानून का लोकसभा में समर्थन किया था मगर आज वो किसानों के सूर में सूर मिला रही है. किसानों के आंदोलन में राजनीतिक दलों के मौका देख स्टैंड चेंज लिया है. तो ऐसे में सवाल ये है की किसान आन्दोलन की फसल पर राजनीति क्यों ?

01 December 2020

भारत संघ के 16वें राज्य नागालैंड स्थापना दिवस पर विशेष

आज नागालैंड का स्थापना दिवस है. इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने नागालैंड के लोगों को राज्य के स्थापना दिवस पर बधाई दी है. नागालैंड की स्थापना एक दिसम्बर 1963 को देश के 16 वें राज्य के रूप में की गयी थी.

नगालैंड भारत का उत्तर पूर्वी राज्य है जिसकी राजधानी कोहिमा है. पहाड़ियो से घिरे इस राज्य की सीमा म्यांमार से लगती है. यहां आदिवासी संस्कृति अहम है जिसमें स्थानीय त्योहार और लोक गायन काफी महत्वपूर्ण हैं. 2012 की जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी 22.8 लाख है.

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन ने 1 दिसंबर, 1963 को नगालैंड का भारत संघ के 16वें राज्य के रूप में उद्घाटन किया था. नागालैंड स्थापना दिवस प्रतिवर्ष 1 दिसम्बर को मनाया जाता है. नागालैंड के पूर्व में म्यांमार, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम में असम और दक्षिण में मणिपुर से घिरा हुआ है. इसे पूरब का स्विजरलैंडभी कहा जाता है. 

नागालैंड राज्य का क्षेत्रफल 16,579 वर्ग किमी है. इसकी सबसे ऊंची पहाड़ी का नाम सरमती है जिसकी ऊंचाई 3,840 मीटर है। यह पर्वत शृंखला नागालैंड और म्यांमार के मध्य एक प्राकृतिक सीमा रेखा का निर्माण देती है.

पीएम मोदी ने आज एक टि्वट संदेश में कहा, राज्य के स्थापना दिवस पर नागालैंड के भाइयों तथा बहनों को बधाई तथा शुभकामनाएं। नागालैंड के लोग अपने साहस और दयालु स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। इनकी संस्कृति असाधारण है और इसी के अनुरूप उन्होंने देश की प्रगति में योगदान दिया है। नागालैंड के निरंतर विकास की प्रार्थना करता हूं.

नागालैंड को पूर्वी भारत के प्रहरी की भूमि के रूप में भी जाना जाता है. नागा पीपुल्स कन्वेंशन और डॉ इम्कोन्ग्लिबा एओ, और अन्य दूरदर्शी नागा नेताओं के साहस और शांति के लिए भी आज उन्हें याद किया जाता है. इन नेताओं ने नागा लोगों की शांति और समृद्धि के लिए 16 बिंदुओं पर हस्ताक्षर किए थे. जो 1 दिसंबर 1963 को नागालैंड राज्य के निर्माण का मार्ग शुलभ हुआ.