15 May 2013

कर्नाटक चुनाव की राजनीतिक निष्कर्ष !

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों ने शायद ही किसी को अचंभित किया हो! परिणाम मतदान के काफी पूर्व बन चुके जनसामान्य के अनुमान और मतदान बाद के एक्ज़िट पोल्स के लगभग अनुरूप ही हैं। अप्रत्याशित न होने के बाद भी कर्नाटक चुनाव परिणाम समय और स्थान के संयोग के कारण राजनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे थे। स्वाभाविक है भाजपा के लिए दक्षिण का एकमात्र किला होने के कारण कर्नाटक दक्षिण में भविष्य की उम्मीदों का आधार था जहां से पिछले लोकसभा चुनावों में उसके खाते में महत्वपूर्ण 19 सीटें आयीं थीं। वहीं केंद्र में बुरे समय से जूझती कॉंग्रेस के लिए एक बड़े प्रदेश के रूप में कर्नाटक एकमात्र ऐसा मौका था जिसने कि उसके लिए न केवल मरहम का काम किया वरन उसे यह संदेश देने का सशक्त अवसर भी दिया कि उसकी जड़े अभी तक हिली नहीं हैं। निश्चित रूप से कर्नाटक चुनाव परिणामों पर भाजपा को मंथन की आवश्यकता है और यही अब वो कर भी सकती है। किन्तु राजनीतिक दलों के अतिरिक्त कर्नाटक के चुनाव परिणाम राजनीतिक पंडितों के लिए भी गंभीर सबक हैं कि भारत की राजनीति को इसकी ऊबड़-खाबड़ जमीनी वास्तविकता के आधार पर ही समझा व परखा जाना चाहिए।

 कर्नाटक में येदुरप्पा फैक्टर को हाँलाकि नजरंदाज नहीं किया गया और न ही यह संभव था किन्तु मीडिया में अधिकांश विशेषज्ञों ने भाजपा की हार के लिए उसकी सरकार में कथित भ्रष्टाचार को ही प्रमुखता से जिम्मेदार ठहराया है, किन्तु जमीनी यथार्थ यह है कि भाजपा की हार के लिए येदुरप्पा व भ्रष्टाचार दोनों को एक साथ जिम्मेदार ठहराया जाना संभव ही नहीं है; न सैद्धान्तिक रूप से और न वास्तविकता की कसौटी पर ही.! किसी ग्रामसभा, निकाय चुनाव को निकट से देखने वाला व्यक्ति अथवा विधानसभा चुनाव में सक्रिय रहा कोई भी आम आदमी भारतीय राजनीति के कड़वे सच को बखूबी समझता है लेकिन अब हमें इसे आंकड़ों के स्तर पर बड़े विश्लेषकों की भाषा में भी समझने की आवश्यकता है। कर्नाटक राजनीति के निष्कर्षों से हम भारतीय राजनीति के वास्तविक चित्र व दूरगामी भविष्य को काफी हद तक समझ सकते हैं। सैद्धान्तिक रूप से, कर्नाटक के संदर्भ में, यह संभव नहीं है कि जो जनता भाजपा से भ्रष्टाचार के कारण कुर्सी खाली करा ले वही जनता येदुरप्पा को अपना समर्थन दे, बावजूद इसके कि येदुरप्पा के अपने बल बूते सरकार बनाने की संभावना शून्य थी।

जनता के समर्थन को स्पष्ट करने के लिए हम प्राप्त मतों के प्रतिशत को आधार बनाते हैं। इस चुनाव में कॉंग्रेस को 36.6% मत मिले और 42 सीटों  की बढ़त के साथ उसके विधायकों की संख्या 121 पर पहुँच गई। किन्तु 2008 की अपेक्षा कॉंग्रेस को मिले मतों में मात्र 1.8 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है। भाजपा को अपने 2008 की अपेक्षा 13.9 प्रतिशत मतों का तगड़ा नुकसान हुआ और परिणाम स्वरूप उसे 70 सीटों से हाथ धोना पड़ा और उसके विधायकों की संख्या 40 तक लुढ़क गई। भाजपा से खिसके मतदाताओं का बड़ा हिस्सा, 9.8 प्रतिशत, कॉंग्रेस नहीं बल्कि बी एस येदुरप्पा के साथ गया, भले ही उनके खाते में 6 सीटें ही आई हों। हाँलाकि भ्रष्टाचार के मुख्य आरोपी तो येदुरप्पा ही थे और भाजपा ने उन्हें निकालने की बड़ा जोखिम लेकर भी  अपना दामन साफ कर लिया था। येदुरप्पा की पार्टी को मिले मतों का प्रतिशत अपने पहले ही चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा व जेडीएस के 20-20 प्रतिशत का लगभग आधा व विजेता कॉंग्रेस का एक तिहाई पहुँच गया जबकि येदुरप्पा को अपनी पार्टी बनाए छह महीने भी नहीं हुए थे।

इस तरह ये तर्क स्वीकार पाना कि जनादेश भ्रष्टाचार के विरोध में है हकीकत के आईने में संभव नहीं होता.! यदि भाजपा व येदुरप्पा को मिले मतों को जोड़ लिया जाए तो यह प्रतिशत अभी भी 29.8 होता है। अतः भाजपा को जो 13.9 प्रतिशत मतों का जो नुकसान हुआ उसने पूरे सियासी समीकरण निश्चित रूप से बदल दिए किन्तु उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनादेश कहकर परिभाषित नहीं किया जा सकता अन्यथा येदुरप्पा उसके सीधे लाभदार नहीं होते। कॉंग्रेस और जेएसडी को जो क्रमशः 1.8 व 1.1 प्रतिशत का लाभ हुआ क्योंकि येदुरप्पा के भाजपा छोड़ने से स्पष्ट हो गया था कि भाजपा सत्ता वापसी नहीं कर सकती अतः यही दोनों दल के सत्ता के संभावी दावेदार के रूप में बच रहे थे। यह राजनीति का यथार्थ है कि सत्ता के लिए विकल्प के रूप में जिस पार्टी की संभावना बन जाती है उसे एक जनभावना का लाभ मिलता है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों को मतदान पूर्व एक्ज़िट पोल्स से ख़ासी आपत्ति रही है और अंत में चुनाव आयोग ने एक्ज़िट पोल्स को प्रतिबंधित ही करने का निर्णय लिया।

अतः कम तैयारियों व तमाम आरोपों के बाद भी येदुरप्पा की पार्टी को मिले बड़ी संख्या में मतों से हम दो ही तरह के निष्कर्ष निकाल सकते हैं; या तो कर्नाटक की जनता ने येदुरप्पा को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना अथवा भ्रष्टाचार चुनाव का प्रभावी मुद्दा ही नहीं रहा। दुर्भाग्य से क्षेत्रीय राजनीति का कटु सत्य दूसरा बिन्दु ही है, क्षेत्रीय राजनीति में मतदाताओं के बींच भ्रष्टाचार अभी तक प्रभावी मुद्दा नहीं बन सका है। क्षेत्रीय राजनीति में विचारधारागत वोट बैंक के अतिरिक्त क्षेत्रीय मुद्दे ही प्रभावी व निर्णायक होते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा वहाँ तक प्रभावी है जहां तक इसे क्षेत्रीय मुद्दे के रूप में स्थापित किया जा सके! किन्तु दुर्भाग्य से भारत के अधिकांश राज्यों के चुनाव परिणाम कम से कम अब तक यही सिद्ध करते आए हैं कि ऐसा जमीनी आधार पर नहीं हो सका है.! संभव है कि भारतीय मतदाता अभी तक यह स्वीकार ही न कर पाया हो कि भ्रष्टाचार का शासन व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा नहीं है.! अन्यथा कर्नाटक में जनता भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे येदुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतारकर बाहर का रास्ता दिखाने वाली भाजपा की अपेक्षा अधिक तीव्रता से नकारा जाना चाहिए था।

सबसे मुख्य बात कि भ्रष्टाचार के चुनावी मुद्दा रहते हुए केंद्र में भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी, जूझती कॉंग्रेस जनता द्वारा प्रदेश के भ्रष्टाचार का विकल्प कैसे मानी जा सकती थी.? क्या केंद्र कॉंग्रेस के ही नेता कर्नाटक में स्टार प्रचारक नहीं थे? अंत में हमें क्षेत्रीय कारकों को ही स्वीकारना पड़ता है और यह स्थिति पूरे देश की है। हिमाचल प्रदेश में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के बाद भी वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच जाते हैं, उत्तराखण्ड में ईमानदार खंडूरी का कोई जादू नहीं चलता और अपनी ही सीट हार जाते हैं, उत्तर प्रदेश में सत्ता भ्रष्टाचार के दिग्गज आरोपियों माया मुलायम के बींच ही झूलती है, महाराष्ट्र में शरद पवार आज भी मराठा स्ट्रॉंगमैन के नाम जाने जाते हैं।  भ्रष्टाचार के प्रति उदासीन भारतीय राजनीति भारत का दुर्भाग्य है किन्तु शुभ संकेत यह है कि अब ग्रामसभा से लेकर विधानसभा व लोकसभा चुनावों तक विकास एक मुद्दा बनता जा रहा है, जनता किए गए काम पर सवाल पूंछने लगी है।

 हो सकता है विकास के प्रति जबाबदेही से भ्रष्टाचार पर लगाम लगे किन्तु यदि भ्रष्टाचार पर भी जनता जबाब मांगने लगे तो विकास पर लगी लगाम जल्दी ही हट जाएगी। दुर्भाग्य से यह तात्कालिक सच नहीं लगता अतः कर्नाटक में मुंह की खा चुकी भाजपा को 2014 में ध्यान रखना होगा कि भ्रष्टाचार को तीखा तीर तो बनाया जा सकता है लेकिन ‘जनता में आधार’ का धनुष भी मजबूत करना होगा, साथ ही इकलौते तीर से भी काम नहीं चलने वाला! कॉंग्रेस को ध्यान रखना होगा कि दिल्ली की दौड़ में क्षेत्रीय मुद्दों और समीकरणों की कर्नाटक जैसी सहूलियत उपलब्ध नहीं होगी, जनता तब दिल्ली का हिसाब मांगेगी, निःसन्देह काफी कुछ केंद्र के भ्रष्टाचार का भी.!

आज के सन्दर्भ में राजनैतिक विश्लेषण, कर्नाटक चुनाव विशेष !

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद मीडिया के द्वारा, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया, सभी में भाजपा-कांग्रेस, मोदी-राहुल, हार-जीत आदि के समीकरणों पर चर्चा-बहस होने लगी है. इस बहस के परिदृश्य में आगामी लोकसभा चुनाव ही है. तमाम बहस, चर्चाओं में ये दर्शाया जा रहा है कि कहीं न कहीं मोदी कमजोर पड़ गए हैं, भाजपा का भ्रष्टाचार का मुद्दा जनता के बीच प्रभावी नहीं रहा है, राहुल जनता के बीच सशक्त होकर उभरे हैं, कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता के बीच बढ़ी है. जो लोग भी राजनीति को सिर्फ शौकिया तौर पर ही समझने का प्रयास करते हैं या फिर राजनैतिक विश्लेषण करने में अपने पूर्वाग्रहों का सहारा लेते हैं उनके लिए किसी भी चुनावी परिणाम का सही से आकलन कर पाना आसान नहीं होता है. सम्बंधित चुनावी आकलन में उनका पूर्वाग्रह वास्तविकता पर हावी हो जाता है और अधिकतर ऐसे आकलन खुशफहमी के अलावा और कुछ नहीं होते.
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हमारे देश का राजनैतिक ढांचा जिस तरह का है, राजनीति का स्वरूप जिस तरह का है, मतदाताओं मानसिकता जिस तरह से मुद्दों-जाति-धर्म-क्षेत्रीयता के आधार पर बनती-बिगडती हों वहां की राजनीतिक हलचल का, चुनावी गतिविधि का आकलन कर पाना सहज काम नहीं होता है. इसके बाद भी यदि साधारण रूप में समझा जाए तो चुनावों के समय में राजनीति कुछ निश्चित बिन्दुओं के आसपास केन्द्रित होकर रह जाती है और उसी के अनुसार मतदाताओं का अपना व्यवहार बनने-बिगड़ने लगता है. इन बिन्दुओं में स्थानीय मुद्दे, क्षेत्रीय मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दे तो अपनी भूमिका निभाते ही निभाते हैं चुनाव विधानसभा का है अथवा लोकसभा का, सम्बंधित क्षेत्र के प्रत्याशियों की अपनी जन-स्वीकार्यता क्या है, किसी भी राजनैतिक दल की गतिविधियाँ और उनके नेताओं का चाल-चलन, सम्बंधित क्षेत्र/राज्य में राजनैतिक दलों के गठबंधन की स्थिति आदि को शामिल किया जा सकता है. इनके अलावा कुछ और भी बिंदु जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यक्ति आदि को माना जा सकता है, इन सबके सम्मिलित स्वरूप के बाद ही मतदाता किसी भी दल की, प्रत्याशी की, मुद्दे की स्थिति को अर्श पर अथवा फर्श पर पहुँचाने का काम करते हैं.
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कर्नाटक विधानसभा चुनावों का आकलन करने के लिए इन चुनावों को किसी भी रूप में लोकसभा चुनावों की रिहर्सल अथवा सेमीफाइनल जैसा नहीं समझना चाहिए. विधानसभा चुनावों में मतदाता के सामने प्रदेश प्रमुखता से खड़ा दीखता है. उसके लिए मतदान करते समय सम्बंधित राज्य में राजनैतिक दलों की स्थिति, उसके क्रियाकलाप, प्रत्याशियों की अपनी व्यक्तिगत प्रस्थिति प्रमुख होती है. कर्नाटक चुनावों में वहां के मतदाताओं के लिए न तो मोदी प्रमुखता में रहे होंगे और न ही राहुल. जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर घनघोर भ्रष्टाचार के बाद भी वहां के मतदाताओं द्वारा कांग्रेस को पूर्णबहुमत प्रदान किया है उससे साफ़ जाहिर होता है कि मतदाताओं ने प्रदेश स्तर पर भाजपा-कांग्रेस को तौलकर सत्ता प्रदान की है. भाजपा ने अपने भ्रष्ट मंत्री को बाहर का रास्ता दिखाकर भले ही कर्नाटक की जनता में स्वच्छ छवि का सन्देश देने का प्रयास किया था किन्तु राज्य में भाजपा के अन्य मंत्रियों-विधायकों के कारनामों ने उस सन्देश को जनता के बीच स्वीकार्य नहीं बनाया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों को देखकर भले ही ये कहा जाये कि वहां की जनता ने भाजपा के प्रादेशिक भ्रष्टाचार के ऊपर कांग्रेस के राष्ट्रीय भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है किन्तु इसके पूर्व उस राज्य में कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ अन्य प्रभावी दलों का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा; इन दलों के प्रत्याशियों की प्रस्थिति, उनके कार्यों का भी आकलन करना होगा.
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इस स्थिति को जाने-पहचाने बिना हार-जीत का आकलन पूरी गंभीरता से रखना कहीं न कहीं वास्तविकता से मुंह मोड़ना ही होगा. जो लोग सिर्फ कांग्रेस-भाजपा, मोदी-राहुल के नाम पर प्रभावित-दिग्भ्रमित होकर अपने-अपने अनुमान-आकलन दे रहे हैं उन्हें ऐसा करके खुशफहमी में रहने दिया जाए और जो लोग वाकई राजनैतिक विश्लेषण में रुचि रखते हैं, राजनैतिक विश्लेषण को शोधपरक अध्ययन मानते हैं वे कर्नाटक की वास्तविकता को जांचने-परखने के बाद ही अपना गंभीर और वास्तविकता के करीब आकलन प्रस्तुत करेंगे. ऐसे ही आकलन राजनीति के अध्ययन की पहचान होते हैं, राजनैतिक विश्लेषण को स्वीकार्य बनाते हैं और देश की राजनैतिक स्थिति का सही-सही अनुमान, पूर्वानुमान, आकलन, परिणाम बताते हैं. आज के विभ्रम भरे दौर में ऐसे ही अध्ययन, विश्लेषण, आकलन की आवश्यकता है.

14 May 2013

क्या सत्ता परिवर्तन के बाद सुधरेगा पाकिस्तान ?

वर्ष 1999 में नवाज शरीफ के हाथ से सत्ता छीन लेने के बाद तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में सेना का तानाशाही राज स्थापित किया था। यह वो समय था जब पहले से ही अपने अस्तित्व और वैश्विक पहचान सुधारने की कोशिशों में लगे पाकिस्तान को एक ऐसा झटका लगा जिससे वह आज तक उभर नहीं पाया। सत्ता सेना के हाथ में चले जाने के बाद मुल्क की तकदीर जो शायद बदल सकती थी वह गर्त की खाई में जाती रही। पाकिस्तान की आवाम तो शुरुआती समय से ही ध्वस्त अर्थव्यवस्थाए भ्रष्टाचार और दिनोंदिन मजबूत होते तालिबान से जूझ रही है लेकिन इस मुल्क की वजह से बाहरी देशों में भय और आतंकवाद का जो माहौल बना हुआ है उसकी वजह से वैश्विक पटल पर भी पाकिस्तान पर आतंकवादी राष्ट्र होने का ऐसा दाग लगा जिसे आज तक धोया नहीं जा सका है। भारत का पड़ोसी मुल्क होने के कारण पाकिस्तान की नकारात्मक गतिविधियों का प्रभाव भी सबसे ज्यादा भारत पर ही पड़ा। आतंकवाद का गढ़ बन चुका पाकिस्तान हर संभव प्रयास कर भारत में आतंकवादी घुसपैठ करवाता रहाए जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के संबंध कभी अच्छे नहीं बन पाए।

लेकिन अब शायद पाकिस्तान की तकदीर उस पर मेहरबान होने जा रही है क्योंकि पाकिस्तान की जनता ने तानशाही का अंत कर लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का चुनाव किया है और इस चुनाव में जीत दर्ज कर एक बार फिर वही नवाज शरीफ सत्ता में वापसी कर रहे हैं जिसे कभी मुशर्रफ ने गद्दी से गिराकर फांसी की सजा सुनाई थी। गठबंधन सरकार बनाकर नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान की गद्दी संभालने जा रहे हैं। नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही जहां कुछ बुद्धिजीवी ऐसी उम्मीद कर रहे हैं कि शायद अब पाकिस्तान की भीतरी और बाहरी गतिविधियां नियंत्रित होंगी जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरेंगे वहीं कुछ इसे मात्र एक कल्पना मान रहे हैंए क्योंकि उनका मानना है कि अभी भी उस मुल्क पर कट्टरपंथ पूरी तरह प्रभावी है जो उसे अन्य देशों के साथ संबंध सुधार की कवायद को प्रभावित करेगा।

पाकिस्तान के इस सत्ता परिवर्तन के बाद महत्वपूर्ण सुधारों की उम्मीद कर रहा वर्ग इस बात की पैरवी करता है कि नवाज शरीफ 13 वर्ष के इस अंतराल के बाद परिपक्व नेता के तौर पर देश के बाहरी और अंदरूनी गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए तैयार हैं। कारगिल युद्ध के समय भी पीएमएल.एन के नेता और पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का कहना था कि उन्हें कारगिल युद्ध के बारे में भनक भी नहीं थीए वह इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सेना के साथ युद्ध छेड़ दिया है। जाहिर है वह भारत के साथ युद्ध कर संबंध और नहीं बिगाड़ना चाहते थे और अब जब पाकिस्तान की सत्ता पर फिर एक बार नवाज शरीफ का राज स्थापित होने वाला है तो भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधार जैसी उम्मीद की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की लगभग अधिकांश जनता ऐसी है जिसका किसी ना किसी तरह से संबंध भारत से हैए इसीलिए राजनैतिक संबंध के साथ.साथ जमीनी स्तर पर भी बहुत हद तक संभव है कि पाकिस्तानए भारत के साथ संबंध सुधारे। नवाज शरीफ अपनी गलतियों से सबक लेकर सत्ता संभालने जा रहे हैं इसीलिए अब उनसे ऐसे किसी कदम की अपेक्षा नहीं है जिससे उनके संबंध पड़ोसी मुल्कों के साथ बिगड़ें। सेना की तानाशाही में उन्होंने पाकिस्तान के बिगड़ते हालातों और देश की जनता की त्रासदी को बहुत करीब से देखा है इसीलिए उम्मीद है कि वो ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिसकी वजह से हालात बद से बदतर हो जाएं।

वहीं दूसरी ओर वह वर्ग जो नवाज शरीफ की कार्यप्रणाली और भविष्यगत योजनाओं पर ज्यादा विश्वास नहीं कर रहा हैए का कहना है कि इस बदलाव से पाकिस्तान और भारत के संबंध में सुधार की उम्मीद करना खुद को भ्रमित करने जैसा है। पाकिस्तान की ओर से हमेशा से ही पहले आश्वासन दिए जाते हैं और उसके बाद पीठ पर छुरा घोंपा जाता है। पाकिस्तान के इतिहास पर नजर डाली जाए तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं जब पहले दोस्ती का हाथ बढ़ाकर दगा दिया गया है। नवाज शरीफ पहली बार गद्दी संभालने नहीं जा रहे बल्कि यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा। जब पहले वे मुल्क के सरताज थे तब भी भारत के साथ पाक के संबंधों में किसी प्रकार का सुधार नहीं था इसीलिए अब भी उनसे कोई अपेक्षा नहीं रखी जानी चाहिए। इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का यह भी कहना है कि भले ही नवाज शरीफ भारत.पाकिस्तान के संबंध सुधारने की कोशिश करें लेकिन पाकिस्तान में व्याप्त कट्टरपंथ इन कोशिशों को साकार होने ही नहीं देगा।

पाकिस्तान में हुए इस सत्ता परिवर्तन के बाद भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में होने वाले बदलावों से संबंधित दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैंए जैसेर
1 नवाज शरीफ सत्ता की कमान फिर एक बार संभालने जा रहे हैंए उनकी पूर्व की कार्यप्रणालीए प्राथमिकताएं और निर्णय क्षमता का आंकलन कर क्या इस बार सुधार की उम्मीद की जा सकती है
2 नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने से भारत और पाकिस्तान के संबंध किस हद तक प्रभावित होंगे
3 भारतीय प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भारत आने का न्यौता दे चुके हैंए क्या हमारी यह पहल हमेशा की तरह हमारे लिए ही तो घातक सिद्ध नहीं होगी
4 पाकिस्तान में कट्टरपंथी गुट क्या पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधार की कोशिशें सफल होने देंगे

क्या ड्रैगन के आगे घुटने टेक रही है भारत सरकार ?

15 अप्रैल को चीनी सेना ने भारतीय नियंत्रण सीमा में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में 19 किमी भीतर घुसपैठ करते हुए अपने पाँच तम्बू गाड़ दिये थे, परिणामस्वरूप सीमा के दोनों ओर लगभग बीस दिनों तक एक गहरे तनाव का वातावरण बना रहा। कई दौर की बातचीत एवं सुलह-समझौतों के बाद भले ही चीनी सेना वापस अपनी सीमा में चली गई हो लेकिन इसे भारत की किसी बड़ी जीत अथवा कूटनीतिक सफलता के रूप में जल्दबाज़ी में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। एक ऐसी कल्पित सफलता, जिसमें हमें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, पर उल्लास के स्थान के पर समय मंथन व चिंतन का है कि आखिर ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई.? इसके लिए तात्कालिक ही नहीं पुरानी कूटनीतिक व रणनीतिक असफलताओं व चूकों पर भी ईमानदारी से विचार होना चाहिए।

भारतीय सीमा में 19 किमी चीनी घुसपैठ न चीन की उद्देश्यहीन चूक थी और न ही 20-25 किमी के भारतीय परिक्षेत्र को हड़पने का प्रयास.! भारतीय नीतिकार भले ही चीनी सेना की वापसी पर अपनी पीठ ठोंक लें किन्तु सच्चाई यह है कि चीन वह अपने साथ ले जा चुका है जो वो लेने आया था। 15 अप्रैल को चीन भारत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसा था और सूचना होते ही 16 अप्रैल को भारत ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए चीन से सेना वापसी की मांग कर डाली थी। 18 अप्रैल को दोनों देशों की सेनाओं के बींच हुई पहली फ्लैग मीटिंग निष्कर्षहीन रही। इसके बाद की सभी फ्लैग मीटिंग से भी कोई रास्ता नहीं निकल सका। मान्य सीमा के 19 किमी एक ऐसे देश की सेना की घुसपैठ जिसके साथ सीमा को लेकर हमारा कड़वा अनुभव रहा है निश्चित रूप से एक सामान्य घटना नहीं थी जिसकी उपेक्षा की जा सकती हो, देश के भीतर फैला व्यापक जनाक्रोश इस घटनाक्रम की संवेदनशीलता को व्यक्त करने के पर्याप्त था। राष्ट्र की संप्रभुता, जिसे कि भारतीय संविधान ने अपनी भावना के भीतर स्थान दिया है, राष्ट्र की आत्मा का सर्वोच्च व सर्व-प्राथमिक प्रश्न है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत सरकार ने आश्चर्य व विडम्बनापूर्ण तरीके से चीन के सुर में सुर मिलाते हुए 20 अप्रैल को इस गंभीर मसले को स्थानीय समस्या कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। जनता, विपक्ष व मीडिया के घोर दबाब के बावजूद सरकार घुसपैठ को महत्व न देते हुए 2 मई तक विदेश मंत्री की चीन यात्रा को सुनिर्धारित बताती रही। सीमा सुरक्षा जैसे एक गंभीरतम विषय पर सरकार के ऐसे लचर, लाचार, जनभावना विरोधी व कूटनीति से मीलों दूर कदम इतिहास में चूक के रूप में नहीं वरन घोर मूर्खता के रूप में अंकित किए जाते हैं! यही कारण है कि हमें आज फिर पलटकर इतिहास की ओर देखने की देखने व सीखने की आवश्यकता है।
 
1962 के युद्ध में मिली शर्मनाक हार नेहरू व उनके सहयोगियों की ऐसी ही मूर्खता का परिणाम थी जिसमें भारत को अपना लगभग 38,000 वर्ग किमी क्षेत्र चीन के हाथों गंवाना पड़ा था। किन्तु चीन का भारत के प्रति कुटिलतापूर्ण रवैया 1962 के बाद भी जारी रहा, और निःसन्देह अधिकांश मौकों पर भारत की लचर नीतियाँ भी! 1962 की पराजय के बाद भारत लंबे समय तक कोई प्रतिक्रिया देने अथवा दबाब बनाने की स्थिति में ही नहीं था अतः इन परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1988 में किया गया चीन का दौरा एक सकारात्मक शुरुआत थी जोकि नेहरू द्वारा किए गए अनर्थ की भरपाई के लिए एकमात्र कदम हो सकता था। परिणामस्वरूप दोनों देशों ने सीमा संबंधी समस्या को नए सिरे से स्वीकारा और समाधान के लिए प्रतिबद्धता जताई। 1991 में चीनी प्रधानमंत्री ने भी भारत यात्रा की और सीमा समस्या को सुलझाने की बात दोहराई गई।

 किन्तु भारत-चीन सम्बन्धों में वास्तविक प्रगति नरसिम्हा राव के कार्यकाल में हुई और 1993 में दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने के समझौते पर हस्ताक्षर किए और विशेषज्ञों के एक समूह को संभावित समाधान तलाशने के लिए नियुक्त किया गया। परिणामस्वरूप आगे पूर्वोत्तर सीमा पर कई पोस्टों से दोनों देशों की सेना हटाये जाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय हुए। यह प्रगति एक प्रारम्भ मात्र थी जिसे किसी सफलता के रूप में नहीं वरन सफलता प्राप्ति के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए था जिसके द्वारा एक एक करके भारत के हित साधे जा सकते थे, दुर्भाग्य से भारतीय नीतिनिर्धारक ऐसा नहीं कर सके। किन्तु चीन बखूबी जानता था कि उसे भारत से क्या चाहिए और तीन दशकों से ठंडे पड़े रिश्तों की नयी शुरुआत को अपने फायदे के लिए बखूबी प्रयोग किया।

चीन ने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करने की आड़ में दो बड़े व महत्वपूर्ण हित साधे; पहला व्यापारिक व दूसरा सीमा संबंधी। व्यापार के क्षेत्र में जहां चीन ने भारत को अपने बाज़ार के रूप में छोटे बड़े सामानों से पाट दिया और अरबों डॉलर का शुद्ध लाभ अपने विकास के लिए निकाला वहीं भारत निर्यात के मामले में पूर्णतः असंतुलित व्यापार की चपेट में है। सीमा विवाद के मुद्दे पर भी भारत सभी सौदों में घाटे में ही रहा है। उदाहरण के लिए कश्मीर के अक्साई चिन मसले पर भारत वहीं खड़ा है किन्तु चीन अरुणाचल प्रदेश पर लगातार दबाब बढ़ाता जा रहा है। 1993 की शुरुआत के एक दशक बाद भी सीमा विवाद पर भारत अपने किसी भी दावे को मजबूत नहीं कर सका, यद्यपि चीन द्वारा कब्जे में लिए गए कैलाश मानसरोवर को तीर्थयात्रा के लिए अवश्य खोला गया। 2003 में एक बार फिर भारत-चीन संबंधों में एक नई शुरुआत देखने को मिली और विशेष प्रतिनिधियों के स्तर पर वार्ताएं आयोजित हुईं और परिणामस्वरूप चीन ने पहली बार सिक्किम को भारतीय प्रदेश स्वीकारते हुए भारत के मानचित्र में दिखाया। 

किन्तु भारत ने इसके लिए एक बड़ी कूटनीतिक कीमत चुकाई और तिब्बत को चीन का अभिन्न भाग स्वीकार कर लिया। निश्चित रूप से यह बड़े घाटे का सौदा नहीं होता यदि भारत सरकार सिक्किम के साथ साथ कम से कम अरुणाचल प्रदेश और केंद्रीय सैक्टर के क्षेत्रों, जोकि भारतीय नियंत्रण में ही हैं, को भारतीय क्षेत्र स्वीकार करवा लेती। फिर हम वेस्टर्न सैक्टर मे चीनी अधिकृत भारतीय क्षेत्र को विवाद और समझौते का केंद्र बना सकते थे। किन्तु यही पूरे इतिहास में भारतीय पक्ष की सबसे बड़ी कूटनीतिक असफलता रही है कि भारत ने समझौता उस पर किया जो उसका अपना है और उसके नियंत्रण में भी है, और वह भी अधूरा समझौता! इस तरह चीन को भारतीय पक्ष ने अपने आप बढ़त व दबाब बनाने की स्थिति में पहुंचा दिया। इसी गलती को भारत ने 2013 में फिर दौलत बेग ओल्डी में दोहराया है।

भारत सरकार भले ही मुंह चुराने के लिए स्थिति साफ नहीं कर रही हो किन्तु जितना अब तक स्पष्ट हो सका है उसके आधार पर चीनी सेना के भारतीय क्षेत्र से हटने के लिए भारत को चीन की मांगों के सामने घुटने टेकने पड़े। भारतीय सीमा में सेना की चुमार पोस्ट को खाली करने व वहाँ बनाए गए बंकर हटाने के लिए भारत को तैयार होना पड़ा। चुमार भारतीय सैन्य दृष्टिकोण अत्यधिक महत्वपूर्ण पोस्ट है जहां से काराकोरम के उस पार चीन द्वारा बनाए गए हाइवेज़ पर चीनी सेना की गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है किन्तु चीन अपने क्षेत्र से इस ओर नहीं देख पाता। यह पोस्ट पीपल्स लिबरेशन आर्मी को अत्यधिक खटक रही थी। इसी तरह सम्पूर्ण भारतीय सीमा पर सैन्य दृष्टि से विशाल इनफ्रास्ट्रक्चर बना चुके चीन को पिछले तीन चार सालों से भारतीय सेना द्वारा बनाई जा रही सड़कों व हवाईपट्टियों पर गहरी आपत्ति है।

भारत ने यदि चीन की शर्तों को मानते हुए ऐसे कुछ भी समझौते किए हैं तो निश्चित रूप से उसने भविष्य के लिए चीन को ऐसी घुसपैठों व अन्य समानान्तर तरीकों से भारत को मजबूर करने का निमंत्रण दे दिया है। मैंने लिखा कि चीन जिस उद्देश्य के लिए दौलत बेग ओल्डी में घुसा उसे वह पाकर निकला है। पहला; भारत के प्रतिरोधहीन लचर नेतृत्व की कलई खोलकर चीन ने न सिर्फ भारतीय पक्ष पर अपना दबाब स्पष्ट कर दिया वरन भारत को मजबूर कर मनमुताबिक सौदेबाजी का एक और रास्ता खोज निकाला है, दूसरा; चुमार जैसी रणनीतिक पोस्ट को खाली कराने में सफलता प्राप्त करने के साथ साथ भारत को ऐसे किसी निर्माण के विरुद्ध चेतावनी दे दी है, तीसरा; बिना किसी सैन्य कार्यवाही के भारतीय सेना को अपने ही क्षेत्र से पीछे हटने को मजबूर कर भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र को विवादित चित्रित करने में सफलता पा ली है। 

अब भविष्य में जब कभी भारत अक्साइ चिन की बात उठाएगा चीन भारत के इस क्षेत्र पर ही सवाल उठाकर उसे रक्षात्मक भूमिका में आने को मजबूर करेगा। यही चीन की रणनीति रही है और इसी के तहत भारत को दबाब में लाने के लिए उसकी ओर से भारतीय सीमा में घुसपैठ होती है, अरुणाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारी को वीजा देने से इन्कार किया जाता है, कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताकर स्टेपल वीजा जारी किया जाता है, भारतीय सेना के अधिकारी जनरल जसवाल को वीजा देने से इन्कार किया जाता है और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश यात्रा का चीन यह कहकर विरोध करता है कि भारतीय प्रधानमंत्री चीनी क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश कर रहे हैं। इन सब के बाद भी भारत सरकार सख्त संदेश तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, उल्टे ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा बांध बनाने जैसे गंभीर मुद्दे पर लंबे समय तक देश की जानता को ही गुमराह करके रखती है!

1962 से लेकर 2013 तक एक के बाद एक की गई गलतियों के बाद भारत के पास सीमित विकल्प बचे हैं और उन सभी विकल्पों के लिए प्रबुद्ध कूटनीति व निर्णायक इच्छाशक्ति वाले नेतृत्व की आवश्यकता है। सबसे पहले भारत को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि चीन अरुणाचल प्रदेश समेत भारत के किसी भी हिस्से पर सवाल उठाता है तो भारत तिब्बत पर अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए विवश होगा। दूसरा, चीन के किसी अतिक्रमण या घुड़की के जबाब में सरकार को चीनी दोस्ती का नेहरू राग अलापना बंद करके दृढ़ता से देश की जानता को आश्वासन देना चाहिए कि भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है और किसी भी स्थिति में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है ताकि चीन तक भारत के सख्त रुख का संदेश जाए। इसके अतिरिक्त जापान सहित पूर्वोत्तर के वियतनाम जैसे उन सभी देशों के साथ सम्बन्धों को वरीयता से सुदृढ़ करना चाहिए व उनकी चीन विरोधी स्थिति को उसी प्रकार भुनाना चाहिए जैसे चीन पाकिस्तान में करता है।

 वर्तमान में ईरान व उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर अमेरिका इस्राइल आदि के साथ कूटनीतिक तरीकों से चीन को विपरीत ध्रुव पर पहुंचाना चाहिए व उसकी वर्तमान स्थिति को भुनाना चाहिए। साथ ही रूस के सम्बन्धों को समानान्तर तरीके से मजबूत करना होगा। इसके अतिरिक्त सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, सैन्य आत्मनिर्भरता व व्यापार। व्यापार में 2011-12 में भारत का चीन को मात्र निर्यात 17.90 अरब अमेरिकी डॉलर रहा जबकि चीन ने भारत को 57.55 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया। इस वर्ष भारत के निर्यात में 19.6% की तीव्र कमी हुई। हम चीन को खनिज, दुर्लभ मृदा तत्व व कॉटन आदि कच्चा माल बेंचते हैं और बदले में सजावट से लेकर मशीन तक बना बनाया माल खरीदते हैं। इस असंतुलन को न सिर्फ हमें पाटना होगा वरन यह समझते हुए कि भारतीय बाज़ार चीन की बड़ी आर्थिक ताकत है और चीन इसे खोना कभी नहीं चाहेगा। 

अतः चीन के किसी भी अवांछनीय कदम उठाते ही हमें इस बात का दृढ़ संदेश देना चाहिए कि यदि सीमा संबंधी भारतीय हितों पर आंच आती है तो ऐसे में चीन के साथ व्यापारिक संबंध बिलकुल कायम नहीं रखे जा सकते! चीन को होने वाला भारतीय अधिकांश निर्यात दुर्लभ मृदा तत्व जैसे कच्चे माल का है जिसके लिए भारत के पास और भी बाज़ार हैं जिन्हें भारत को जापान आदि में तलाशना चाहिए। आवश्यकता तो यह है कि व्यापार के दांव को भारत चीन अधिकृत कश्मीर के लिए भी सफलतापूर्वक प्रयोग करे लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि भारत सैन्य व व्यापारिक दोनों रूप से आत्मनिर्भर बने। निश्चित रूप से ये कूटनीतिक तीर भारत के तरकश में अभी भी बचे हुए हैं लेकिन प्रश्न यह है कि वो धनुर्धर अभी हमारे पास कहाँ है जो इनका सधा प्रयोग कर सके। वैश्विक राजनीति में हर कूटनीतिक तीर का या तो आपको लाभ उठाना आना चाहिए अन्यथा उसी से आप क्षति भुगतने के लिए तैयार रहें।

13 May 2013

मेरे पास सिर्फ माँ है !

दुनिया ही क्या समूची सृष्टि में मां को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पशु-पक्षी जगत से लेकर मानव जगत में मां की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जन्म देने वाली मां को विश्‍व की समस्त संस्कृतियों में सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है। भारत में तो मातृ पूजा हजारों साल से चली आ रही है। हम तो धरती को भी मां के रूप में पूजते हैं। दरअसल जिन स्थानों पर मनुष्य का जीवन भोजन के लिए प्रकृति पर अधिक निर्भर रहा, वहां के लोगों ने स्त्री की उर्वरता, पोषण की सामर्थ्य, ममता और सृजनात्मकता को नमन करते हुए मातृशक्ति की कल्पना की। माँ, समूची धरती पर बस यही एक रिश्ता है जिसमें कोई छल कपट नहीं होता। कोई स्वार्थ, कोई प्रदूषण नहीं होता। इस एक रिश्ते में निहित है अनंत गहराई लिए छलछलाता ममता का सागर। शीतल, मीठी और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। इस रिश्‍ते की गुदगुदाती गोद में ऐसी अनुभूति छुपी है मानों नर्म-नाजुक हरी ठंडी दूब की भावभीनी बगिया में सोए हों। माँ, इस एक शब्द को सुनने के लिए नारी अपने समस्त अस्तित्व को दाँव पर लगाने को तैयार हो जाती है। नारी अपनी संतान को एक बार जन्म देती है। लेकिन गर्भ की अबोली आहट से लेकर उसके जन्म लेने तक वह कितने ही रूपों में जन्म लेती है। यानी एक शिशु के जन्म के साथ ही स्त्री के अनेक खूबसूरत रूपों का भी जन्म होता है। ‘माँ’ शब्द की पवित्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में देवियों को माँ कहकर पुकारते है। बेटी या बहन के संबोधनों से नहीं। मदर मैरी और बीवी फातिमा का ईसाई और मुस्लिम धर्म में विशिष्ट स्थान है।

नारी जननी है, जो अपने एक संतति को जन्म देने के लिए लाखों शारीरिक और मानसिक कष्टों का सामना करती है। एक संतान को जन्म देने से पहले और उसके जन्म के बाद अपना जीवन, खुशियां उसी के नाम कर देती है। अपना खून (दूध) पिलाकर बच्चे को पोषित करती है। भावी पीढ़ी में नैतिकता के बीज बोती है। महान लेखक मैरी मैक्लॉयड ने कहा है कि किसी नस्ल का सच्चा मूल्य उसके नारीत्व के लक्षण से मापा जाना चाहिए। नारी ही इस समाज का प्रारंभिक गुरु है। वही अपने संस्कार, सोच, विचार, भाषा आदि अगली पीड़ी को निशुल्क उपलब्ध कराती है। एक सच्ची मार्गदर्शिका बन कर अपने परिवार को, समाज को सुख और उन्नति की राह पर अग्रसर करती है। माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए एक दिवस नहीं एक सदी भी कम है। किसी ने सच ही कहा है ना कि सारे सागर की स्याही बना ली जाए और सारी धरती को कागज मान कर लिखा जाए तब भी माँ की महिमा नहीं लिखी जा सकती। भारत में जहां मां को शक्तिरूपा माना जाता है और गाय को उसका प्रतिरूप, वहीं ग्रीक संस्कृति में मां को गैया कहा जाता था।

 बौद्ध धर्म में तो भगवान बुद्ध के स्त्रीरूप में देवी तारा की महिमा गाई जाती है। रंग और विशेषताओं के अनुसार देवी तारा के दर्जनों रूपों की पूजा की जाती है। यहूदियों की बाइबिल के अनुसार कुल 55 पैगंबर धरती पर आए उनमें से 7 स्त्रियां थीं। ईसाई समुदाय में तो मदर मैरी की महिमा का लंबा इतिहास है और प्रभु यीशु की माता को सर्वोपरि माना गया है। यूरोप के कई देशों में, खास तौर पर ब्रिटेन और आयरलैंड में तथा पुराने ब्रिटिश उपनिवेशी देशों में मदरिंग सण्डे मनाने की परंपरा आज भी विद्यमान है। वैसे अगर गौर से देखा जाए तो दुनिया के विभिन्न धर्मों में बहुत से ऐसे ईश्‍वर या देवदूत हुए हैं, जिन्हें मां ने ईश्‍वरीय इच्छा के लिए जन्म दिया, फिर वो चाहे राम हों, कृष्ण हों, ईसा मसीह हों, भगवान महावीर हों अथवा गणेश। इस्लाम में मां को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। पैगंबर मोहम्मद साहेब का कहना था कि जन्नत का दरवाजा मां के कदमों में है। अर्थात्‌ जिसने मां को नाराज किया या दुख पहुंचाया तो ऐसे इंसान को जन्नत में जगह नहीं मिलती। एक बार एक व्यक्ति ने पैगंबर मोहम्मद साहेब से पूछा कि हे खुदा के पैगंबर, मुझे समझाओ कि मैं किसके प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करूं? मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ व्यक्ति ने फिर पूछा, ‘इसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ उस आदमी ने फिर से पूछा, ‘इसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ बंदे ने चौथी बार पूछा, ‘और उसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘अपने पिता के प्रति।’ इस्लामी देशों में मोहम्मद साहेब की बेटी फातिमा के जन्मदिन को मातृत्व का दिवस माना जाता है। बहुत से अरब देशों में 21 मार्च को मातृदिवस मनाया जाता है।

वर्तमान समय की नारी जागरूक व शिक्षित है। आज वह सुशिक्षित होकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहती है। इसके लिए वह अपनी इच्छानुसार कार्य चुनती है और उसे पूर्ण समर्पण, निष्ठा एवं तन्मयता से करती है। मां के पास दो आंखें नहीं वरन् चार आंखें होती हैं। उसका दिमाग दसों जगह दौड़ता है। मां व नारी एक ही समय में अनेक कार्यों को उत्कृष्ट तरीके से कर सकती हैं। इसलिए आज नारी अधिकतर क्षेत्र में सफल है। अपने क्षेत्र में सफल होने के साथ ही वह एक मां भी है और इन सबके साथ मां की भूमिका को न सिर्फ अच्छी तरह से बल्कि सर्वश्रेष्ठ तरीके से निभा रही है। शिक्षित होने के कारण वह विश्व में घट रही सभी घटनाओं व परिवर्तनों से वाकिफ है। बच्चों को किस उम्र में क्या शिक्षा देनी है, वह जानती है। आज अनेक सफल मांएं ऐसी हैं जो स्वयं तो अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं ही ,उनके बच्चे भी अपने कार्यक्षेत्र में सफलता के परचम फहरा रहे हैं । मां के त्याग, संघर्ष, ममता व प्रेम के बिना बच्चों की सफलता असंभव है। मां की पोशाक बदलने से उसका स्वभाव, ममता व प्रेम नहीं बदला। आज मां साड़ी, सूट-सलवार, स्कर्ट या जींस कुछ भी पहने लेकिन उसके सीने में मां की तड़प, उसकी ममता, वैसा प्रेम और दुलार आज भी बरकरार है।

‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार…..ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है। हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।

हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:  मशहूर फ़िल्मकार यश चोपड़ा की दीवार 1975 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है । यश चोपड़ा निर्मित दीवार हिन्दी सिनेमा की सबसे सफलतम फिल्मों मे से है जिसने अमिताभ के “एंग्री यंग मैन” के खिताब को स्थापित कर दिया। इस फिल्म ने अमिताभ के करियर को नयी बुलंदियों पर पहुँचा दिया। इस फिल्म के ज्यादातर हिस्से में अमिताभ बच्चन का अभिनय जबर्दस्त रहा था मगर फिल्म का वह हिस्सा जहाँ शशि कपूर अमिताभ बच्चन से कहते हैं “मेरे पास माँ है ” आज तक हिंदी सिनेमा के सबसे बढ़िया संवादों में माना जाता है ।इस एक संवाद में ही शशि कपूर ने दर्शकों की वाहवाही लूटी थी । बहुत खुशनसीब होते हैं वह लोग जिनके पास उनकी माँ होती है।धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप माँ में है ।एक जमाना था, जब श्रवण कुमार जैसे पुत्र ने अपने अंधे माता-पिता की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आधुनिक श्रवण कुमार आधुनिकता के आकर्षण में धन कमाने की अंधीदौड़ में वृद्ध माता-पिता को जीवन के अंतिम दौर में अकेले रहने को विवश कर रहे हैं। माता-पिता की छाया में ही जीवन सँवरता है। माता-पिता, जो निःस्वार्थ भावना की मूर्ति हैं, वे संतान को ममता, त्याग, परोपकार, स्नेह, जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

आज आधुनिकता और पैसे कमाने की दौड़ में लोग अपने माँ -बाप को बोझ समझने लगे हैं ।आजकल एकल परिवारों के चलते परिवार विघटित हो रहे हैं ।पर जो लोग अपने माँ-बाप की सेवा करते हैं उनका मान-सम्मान करते हैं उनसे ज्यादा सुखी व्यक्ति दुनिया में कोई नहीं हो सकता है। हमारे समाज में हर बात को महत्व देने के लिए 365 दिनों में से सिर्फ ‘एक दिन’ तय कर दिया गया हैं, पर माँ को महत्व देने के लिए सिर्फ एक दिन काफी नहीं हैं। जिस तरह माँ की ममता और प्रेम ‘असीमित और नि:स्वार्थ’ है, उसी तरह माँ के लिए हर दिन एक महत्व लिए होना चाहिए, और सिर्फ दिन ही क्यों बल्कि हर क्षण वह हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

अगर हम भी बिना किसी स्वार्थ के उन्हें आदर देकर, माँ की ममता को भूले बिना और उनका हर सुख-दु:ख में साथ दें, तो अपना जीवन सार्थक बना सकते है।मां की अंगुली पकडक़र ही तो कई बार गिर-गिर और संभल कर हम चलना सीखते हैं। विफलताओं की ठोकर लगने पर मां के कोमल स्पर्श मात्र से शरीर में एक नई शक्ति का संचार हो जाता है। मगर कुछ मां ऐसी भी है जो बदनसीब हैं। क्या बीतती होगी उस माँ पर जिसने नौ महीने तक पेट में जिस बच्चे को पाला आज वह बूढ़ी मांओं का खर्च उठाने को तैयार नहीं है।यदि आपके पास भी माँ है तो दुनिया के सबसे सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से एक है। अपने पास इस माँ रूपी ईश्वर को हमेशा साथ रखें।

सवाल सिर्फ सरबजीत का ही नहीं है !

मामला सिर्फ सरबजीत का नहीं है, मामला सैकड़ों अथवा हजारों सरबजीतों में से एक और सरबजीत का है.! 28 अगस्त 1990 को बाघा सीमा पर अपने खेत पर गए सरबजीत शराब के नशे में सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँच गए और फिर उनकी जिन्दगी ऐसे शैतानी शिकंजे में फंस गई जहां उन्हें मौत के लिए भी 22 साल तक इंतजार करना पड़ा! पाकिस्तानी नियत और व्यवस्था का आदिम व संकुचित चेहरा कितना घिनौना है और सरबजीत को किस प्रकार की न्याय व्यवस्था के तहत सजा मिली इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय में उनकी फांसी की सजा मुकर्रर रखी गई क्योंकि उनको मिला वकील समय पर अदालत नहीं पहुंचा.! न्यायतंत्र का ऐसा संकीर्ण और गैरजिम्मेदार स्वरूप भी हो सकता है सभ्य विश्व आज इसकी कल्पना नहीं करता!

ऐसे ही कितने सरबजीत पाकिस्तानी जेलों में एक हिंदुस्तानी होने की यातना झेल रहे हैं यह हिंदुस्तान की सरकार भी भलीभाँति नहीं जानती। भारत पाकिस्तान द्वारा गठित न्यायाधीशों की समिति की 1 मई 2013 की हाल रिपोर्ट को यदि आधार मानें तो पाकिस्तान में भारत के 535 नागरिक बंद हैं। कुछ अन्य स्रोत दावा करते हैं कि पाकिस्तान के इन यातनागृहों में पड़े भारतीयों की वास्तविक संख्या हजारों में है। हाँलाकि कई ओर के दबाब और भारतीय जेलों में बंद पाकिस्तानी कैदियों के बदले जनवरी 2012 से अब तक 714 भारतीय नागरिकों की रिहाई अवश्य हुई है किन्तु भारत सरकार के लिए यह पाकिस्तान के साथ नागरिकों के लेन-देन से अधिक कुछ रहा हो ऐसा बिलकुल नहीं है। सवाल यह उठता है कि जिस एक सरबजीत की मौत पर पूरे देश में इस कदर आक्रोश है और परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा, वैसे ही सैकड़ों सरबजीत भारत सरकार के लिए कभी कोई मुद्दा ही नहीं रहे…, आखिर क्यों.? जिस सरबजीत की मौत पर भारत सरकार इतना गंभीर दिखने का प्रयास कर रही है वही सरबजीत जिंदा रहते हुए कभी सरकार की चिन्ता का विषय क्यों नहीं रहे.? क्यों सरबजीत अथवा अन्य सैकड़ों या हजारों भारतीय नागरिकों की जिन्दगी पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों एवं वार्ताओं को प्रभावित करने योग्य नहीं मानी गईं.? 

सरकार या कॉंग्रेस की तरफ से यदि कोई इसके जबाब में अपनी प्रयासों की कोई सूची लेकर आता है तो उससे पूंछा जाना चाहिए कि सालों के प्रयास के बाद भी यदि पाकिस्तानी जेलों में सड़ते भारतीयों को आजादी नहीं मिल पाती है, यदि सरबजीत को आखिर में मौत ही मिलती है तो इसे भारत की कमजोर, दबाबहीन, प्रभावहीन स्थिति के रूप में रूप में निरूपित किया जाना चाहिए अथवा सरकार की उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए.? अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारत की इस अशक्त, असमर्थ व कमजोर स्थिति के लिए सरकार के अतिरिक्त किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए.? देश के सवा अरब नागरिकों की ओर से सरकार से प्रश्न पूंछा जाना चाहिए कि एक विदेशी मुल्क के अत्याचारों व प्रताड़ना की गिरफ्त में फंसा देश का नागरिक अपने देश की सरकार के अतिरिक्त किससे सहायता की आशा करे.?

दुर्भाग्य और विडम्बना भारत की, जो विश्व की महाशक्ति बनने का स्वप्न देखता है, कि जहां एक ओर अमेरिका जैसे देश रेमंड डेविस जैसे अपने एक नागरिक, जोकि लाहौर के अंदर दो पाकिस्तानियों को गोली से उड़ा देता है, की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान जैसे देश की नाक में दम कर देता है वहीं दूसरी ओर भारत अमानवीय अत्याचारों के शिकार अपने सैकड़ों नागरिकों की बात भी पड़ोसी मुल्क के साथ दमदार तरीके से उठाने का साहस नहीं कर पाता.! पाकिस्तान एक के बाद एक हमारा गिरेबान पकड़कर हमें झिंझोड़ता रहा है और हम हर बार और अधिक विनम्रता और संबंध बहाली की एकतरफा उत्सुकता से दोस्ती का गुलाब लेकर नतमस्तक होते रहे हैं!

हमारी नीतियों व राष्ट्रीय इच्छाशक्ति में यह घुन नेहरू के समय से ही लग गया था जिसे बाद की सरकारें लगातार पोषित करती रही हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के तुरंत बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया और जबाब में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को बुरी तरह पछाड़ लगाते हुए एकतरफा तरीके से कश्मीर को कब्जे में ले लिया लेकिन नेहरू कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले गए और यही पाकिस्तान के लिए उस समय सबसे बेहतरीन विकल्प हो सकता था। 1965 के युद्ध में भी भारत अपनी जीत को कूटनीतिक लाभ में नहीं बदल पाया और वही चूक 1971 के बाद शिमला समझौते व 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बिना कोई कीमत बसूले रिहाई देकर फिर दोहराई गई। इसी तरह नब्बे के पूरे दशक में भारत ने पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की आग में पूरे कश्मीर को झुलसते हुए देखा लेकिन तत्कालीन सरकारें पाकिस्तान को कड़ा जबाब देने में पूरी तरह से विफल रहीं.! कॉंग्रेस की पाकिस्तान परस्त नीति के लाल बहादुर शास्त्री जैसे कुछ ही अपवाद हैं और गैर-काँग्रेसी सरकारों में अटल सरकार को ही सबसे तगड़े प्रतिरोध की स्थिति का सामना करना पड़ा जब देश को 1999 में पाकिस्तानी सेना की कारगिल में घुसपैठ और 2003 में संसद पर हमले का सामना करना पड़ा था। कारगिल मामले में अटल सरकार को पाकिस्तान के विरुद्ध उतना ही श्रेय दिया जा सकता है जितना 1971 का इन्दिरा गांधी को.! 

दोनों ने पाकिस्तान को सैन्य कार्यवाही से कड़ा जबाब दिया लेकिन बाद में शांति की एकतरफा आतुरता में भारत को लचर हालत में खड़ा कर दिया। कारगिल के तुरंत बाद ही षड्यंत्र में शामिल सेना के जनरल मुशर्रफ के साथ आगरा शिखर वार्ता एकदम गैरजरूरी थी, भले ही इसमें अटल ने कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को प्रमुखता व दृढ़ता से उठाया हो! किन्तु 2004 से जिस रीढ़हीन रणनीति का प्रदर्शन यूपीए सरकार कर रही है वह अतीत से अलग और कहीं अधिक अचंभित करने वाली है। संसद पर हमले के तुरंत बाद अटल सरकार ने ऑपरेशन पराक्रम लॉंच करते हुए सीमा पर सेना का मूवमेंट शुरू कर दिया था और पाकिस्तान के हाथ-पैर ढीले पड़ गए थे किन्तु वहीं 26/11 के हमले के जबाब में मनमोहन सरकार की प्रतिक्रिया क्रिकेट और बातचीत बंद करने तक सीमित थी वह भी शान्ति की व्यग्रता में अधिक नहीं टिकी। आश्चर्य होता है जब दशकों से आतंकवाद के भुक्तभोगी देश का प्रधानमन्त्री आतंकवाद को शह देने और जांच के नाम पर ठेंगा दिखाने वाले देश के प्रधानमन्त्री (गिलानी) को ‘शान्ति का मसीहा’ बताता है, शर्म-अल-शेख में राष्ट्रीय स्वाभिमान को बेशर्मी से लाद देता है अथवा अपनी ही सीमा में अपने सैनिक का सर काट लिए जाने के बाद भी देश का विदेशमंत्री कहता है कि इससे भारत-पाक सम्बन्धों व शान्तिवार्ताओं पर फर्क नहीं पड़ने दिया जाएगा.! 

सिर्फ और सिर्फ आश्चर्य ही होता है जब युद्धविराम को लगभग 200 बार धता बताते हुए पाकिस्तान द्वारा सीमा पर लगातार गोलीबारी की जाती है लेकिन इससे दिल्ली में सरकार को व उसकी अमन की आशाओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, सरकारी मंत्री शहीदों की शहादत को धता बताते हुए पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री परवेज़ अशरफ के लिए पलकें बिछाने अजमेर पहुँच जाते हैं .! आश्चर्य और शर्म की सीमाएं भी उस समय टूटने लगती हैं जब देखने में आता है कि एक टीवी चैनल की बहस में वरिष्ठ कॉंग्रेस नेता और सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर सरबजीत की मौत के बाद भी पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि हमें भरोसा रखना चाहिए कि पाकिस्तान न्याय करेगा!

सरबजीत के मामले को मीडिया ने इतना उठाया तो आज सरकार इसे पाकिस्तान का बर्दास्त के बाहर का आचरण बता रही है, लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सरकार की इस बयानबाजी से सरबजीत की 22 साल की यातनाओं का जबाब मिल सकता है? क्या मात्र इतने से ही कैदी चमेल सिंह, कैप्टन सौरभ कालिया, शहीद हेमराज और पाकिस्तानी जेलों में यातना भोग रहे अन्य सैकड़ों भारतीय नागरिकों के प्रति जबाबदेही सुनिश्चित हो जाती है.? इसका जबाब मनमोहन सिंह के घिसे-पिटे बयान अथवा राहुल गांधी के राजनैतिक आंसुओं से नहीं मिलेगा, जबाब इस बात से मिलेगा कि मनमोहन बयान के बाद नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाते हैं अथवा वार्ता की एक और मेज सजाते हैं तथा भिखभिंड से दिल्ली पहुँचते पहुँचते राहुल के कितने आँसू बचते हैं और वो अपनी सरकार को क्या कुछ निर्णयात्मक कदम उठाने के लिए कहते हैं.! अतीत के अनुभव कड़वे हैं, भारतीय सैनिकों की सरकशी के बाद देशव्यापी आक्रोश के चलते पाकिस्तानियों के लिए तुरंत वीजा (Visa on arrival) की सुविधा को स्थगित करना पड़ा था उसे पिछले महीने सरकार ने गुपचुप तरीके से लागू कर दिया, क्या हेमराज को न्याय मिल गया?

राष्ट्रीय जीवटता व दृढ़ता के आभाव में न कभी किसी हेमराज या सरबजीत को ही न्याय मिलेगा और न ही दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे इस राष्ट्र की आत्मा को ही.! देखना होगा कि सरकार अब आगे सैकड़ों अन्य सरबजीतों के जीवन को प्राथमिकता देती है अथवा मामले के ठंडे पड़ते ही फिर अमन की आशा की अपनी राह पकड़ लेती है! यदि सरकार फिर से दूसरा विकल्प चुनती है तो स्पष्ट अवधारणा प्रमाणित हो जाएगी कि देश की सरकार व नीति-निर्माता संस्थानों के अंदर ऐसे एजेंट बैठ चुके हैं जिनका उद्देश्य पाकिस्तान व अमेरिका जैसे देशों के हितों की सुरक्षा में भारत की नीतियों को लकवा मारना है। वैसे भी इस देश में अफजल की फांसी पर मातम मनाने और सरबजीत की फांसी पर फूटे राष्ट्रवादी आक्रोश को आतंकवाद कहकर विदेशी हित साधने वाले तथाकथित बौद्धिकों की कमी नहीं है।

12 May 2013

क्या आज सिनेमा विषयविहीन हो गया है ?

‘ये कहाँ आ गए है हम’ लता जी की मीठी आवाज़ में गया ये गाना आज भारतीय सिनेमा के १०० साल की यात्रा पर बिल्कुल सटीक बैठता है क्योकि अपने उदगम से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा में इतभारतीय सिनेमा का अंग है जो हमेशा भारतीय समाज में चेतना को जाग्रत करने का काम करता आया है। कहा जाता है कि किसी भी समाज को सही राह दिखाने के लिए सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा है,क्योकि सिनेमा दृश्य और श्रव्य दोनों का मिला जुला रूप है और ये सीधे मनुष्य के दिल पर प्रभाव डालता है । हमारे भारतीय सिनेमा ने अपने गौरवमयी १०० साल पूरे कर लिये है पर इन १०० सालो  की यात्रा में भारतीय सिनेमा कहा से कहाँ पंहुचा यह सोचनीय विषय है या फिर यूँ कहा जाए इन १०० सालो की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने समाज को क्या दिया? ये सच है कि फिल्मे समाज का आइना है और समाज के शसक्त निर्माण में फिल्मो की अहम् भूमिका होती है और इसीलिए ८० की दशक की फिल्मे जमींदारी, स्त्री शोषण सहित उन सभी मुद्दों पर आधारित होती थी जो समाज को प्रभावित करते थे। तब जो फिल्मे बनती थी उनका उद्देश्य व्यावसयिक न होकर सामजिक कल्याण होता था। पर ९० की दशक में फिल्मो में व्यापक बदलाव आये।
 
ये वो दौर था जब भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाया गया, भारत ने भी वैश्विक गांव में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ाए और दुनिया भर के देशों में वीजा नियमों में ढील देने की प्रक्रिया शुरू हुई। तब इन भौतिक बदलावों से प्रेरित होकर प्रवासी भारतीयों का स्वदेश प्रेम मुखर हुआ। इसके दर्शन हर क्षेत्र में होने लगे। एक तरह से उन्होंने अपने देश की घटनाओं में आक्रामक हस्तक्षेप शुरू किया।बिल्कुल उसी समय भारत में एक बड़ा मध्यवर्ग जन्म ले रहा था, जिसकी रूचियां काफी हद तक विदेशों में बस गए भारतीयों की तरह बन रही थीं। इसका श्रेय उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत आने और स्थानीय जरूरत के हिसाब से खुद को बदलने की प्रक्रिया को दिया जा सकता है। नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में वैश्विक गांव बनने की प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका था। भारत का मध्यवर्ग और विदेश में बसा प्रवासी भारतीय खान-पान, पहनावे, रहन-सहन आदि में समान स्तर पर आ चुका था।
 
दोनों जगह एक ही कोक-पेप्सी पी जाने लगी, पिज्जा और बर्गर खाया जाने लगा और ली-लेवाइस की जीन्स पहनी जाने लगी। भारत की मुख्यधारा के फिल्मकार इस बदलाव को बहुत करीब से देख रहे थे। इसलिए उन्होंने अपनी सोच को इस आधार पर बदला। मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने स्वीकार भी किया कि वे घरेलू और विदेशी दोनों जगह के भारतीयों के पसंद की फिल्म बनाते हैं। यहां घरेलू भारतीय दर्शक का मतलब भारतीय मध्यवर्ग से लगाया जा सकता है। भारतीय फिल्मकारों की इस सोच में आए बदलाव ने फिल्मों की कथा-पटकथा को पूरी तरह से बदल दिया, खास कर बड़े फिल्मकारों की। उन्होंने ऐसे विषय चुनने शुरू कर दिए, जो बहुत ही सीमित वर्ग की पसंद के थे, लेकिन बदले में उन्हें चूंकि डॉलर में कमाई होने वाली थी इसलिए व्यावसायिक हितों को कोई नुकसान नहीं होने वाला था। और ये वही दौर था जब फिल्मे समाज हित से हटकर पूरी तरह से व्यावासिक हित में रम गयी फिल्मे बनाने वाले निदेशको और निर्माताओ का उदेश्य फिल्म में वास्तविकता डालने को बजाये उन चीजों को डालना होता जो दर्शक को मनोरंजन कराये जिसका आज समाज पर नकरात्मक प्रभाव पड़ने लगा। 
  आज भारतीय समाज जो आधुनिकता की नंगी दौड़ में दौड़ उसका श्रेय बहुत हद आज के दौर निर्मित होने वाली फिल्मो को ही जाता है अगर उदाहरण से समझना हो तो नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में बनी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, से शुरू करके ‘नील और निक्की’ तक की कहानी में इस बदलाव को देखा जा सकता है। इस बदलाव को दो रूपों में देखने की जरूरत है। एक रूप है भारत के घरेलू फिल्मकारों का और दूसरा प्रवासी भारतीय फिल्मकारों का। दोनों की फिल्मों का कथानक आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा है। इनमें से जो लोग पारिवारिक ड्रामा नहीं बना रहे हैं वे या तो औसत दर्जे की सस्पेंस थ्रिलर और अपराध कथा पर फिल्म बना रहे हैं या संपन्न घरों के युवाओं व महानगरों के युवाओं के जीवन में उपभोक्तावादी संस्कृति की अनिवार्य खामी के रूप में आए तनावों पर फिल्म बना रहे हैं। घरेलू फिल्मकारों में यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, फरहान अख्तर जैसे सफल फिल्मकारों के नाम लिए जा सकते हैं और दूसरी श्रेणी में गुरिन्दर चङ्ढा (बेंड इट लाइक बेकहम), नागेश कुकुनूर (हैदराबाद ब्लूज), विवेक रंजन बाल्ड (म्यूटिनी : एशियन स्टार्म म्यूजिक), बेनी मैथ्यू (ह्नेयर द पार्टी यार), निशा पाहूजा (बालीवुड बाउंड), महेश दत्तानी (मैंगो सौफल), मीरा नायर (मानसून वेडिंग), शेखर कपूर (द गुरू), दीपा मेहता आदि के नाम लिए जा सकते हैं, जो अनिवार्य रूप से प्रवासियों के लिए फिल्में बनाते हैं।
वास्तव में यही वो कारण जिनके कारण आज भारतीय सिनेमा के कथ्नांक में गिरावट आती जा रही है जिसका सीधा असर समाज पर रहा है। ये कहना गलत न होगा कि इन १०० सालो की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने जितने मुकाम हासिल किये उतना ही इसने समाज को गलत दिशा भी दी आज हमारी बॉलीवुड की फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल पर बन रही है ऐसी फिल्मे हिट भी हो रही है लेकिन यही फिल्मे जब अस्कार जैसे प्रतिष्ठित आवार्ड के लिए जाती है तो औंधेमुह गिर पड़ती हैइसके विपरीत स्लमडाग जैसी फिल्मे जो की सामजिक मुद्दों पर बनती है वो आस्कर जैसे आवार्ड को ला पाने में सफल होती है। कहने का तात्पर्य यह की विदेशो में भी अब ऐसी ही फिल्मो को पसंद किया जा रहा है जो किसी सामाजिक सरोकारों से जुडी हो। आज ये वक़्त की जरुरत है कि फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल से बाहर निकले और और ऐसे मुद्दों पर बने जो समाजिक मुद्दों से जुडी हो

 हो सकता है कि ऐसी फिल्मे बाक्स आफिस पर हिट न हो पर लगातार अगर सामाजिक मुद्दों पर फिल्मे बनना शुरू होंगी तो कुछ दिन बाद ऐसी फिल्मे बॉक्स आफिस पर हिट होना शुरू हो जायेंगी क्योकि सिनेमा समाज को जो देता समाज उसी को लेता है और इसका सीधा से उद्धरण ८० की दशक की फिल्मे है जो उस दौर में काफी पसंद की गयी वैसे भी जब इंसान किसी विषय से सालो दूर होता है तो निश्चित तौर पर उस विषय से उसकी दूरी बन जाती है पर अगर उसी विषय पर उसको वापस लाया जाये तो देर जरुर होती है पर अंततः रूचि जाग्रति होती है। इसलिए भारतीय सिनेमा के गौरवमयी इतिहास को बचाये रखने के लिए यह आवश्यक है की फिल्मे सामाजिक सरोकार से जुडी हो न की सेक्स, थ्रिल, धोखे जैसे मुद्दे से जिसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है।

40 चीनी पर भारत की विदेश नीति !

किसी भी देश के लिए उसकी सुरक्षा से बड़ा मुद्दा और क्या हो सकता है..? लेकिन भारत सरकार के लिए ये एक मामूली मसला है..! चीन 19 किलोमीटर तक हमारे क्षेत्र में घुसपैठ कर शान से बैठा है और हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद चीन यात्रा की तैयारी कर रहे हैं..! सरकार कहती है कि बातचीत से मसला सुलझा लिया जाएगा। इसका जवाब सरकार के पास नहीं है कि दो बार फ्लैग मीटिंग में जब बात नहीं बनी तो आगे कैसे बात बनेगी..! चीन तो उल्टा भारत को आंखे दिखाकर उसे अपना ही क्षेत्र बता रहा है..! चीनी हेलिकॉप्टर हमारी वायुसीमा में आकर फर्राटे से उड़ान भर रहे हैं लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि ये स्थानीय मसला है और वे इसे तूल नहीं देना चाहते।  

कभी पाक तो कभी चीन हमारी सीमा में घुसपैठ कर हमें ही आंखे दिखा रहा है लेकिन विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर ससंद ठप कर रहा है तो सरकार सदन में गिनती पूरी कैसे रहे इस जुगत में व्यस्त है..? देश सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार तो सो ही रही है लेकिन विपक्षी नेताओं के लिए भी चीनी घुसपैठ से बड़ा मुद्दा जेपीसी रिपोर्ट और कोलगेट के मसले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट पर सरकार का दखल है..! चीन के मुद्दे पर प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता सदन के बाहर तो खूब बोल रहे हैं लेकिन सदन में इस मुद्दे को जैसे वे भूल जाते हैं..! सत्ता में आने को बेचैन दिखाई दे रही मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के नेता शायद ये सोच रहे होंगे कि चीन के मसले पर एकजुटता दिखाई तो सरकार को टूजी पर जेपीसी रिपोर्ट और कोलेगेट के मसले पर बचने का मौका मिल जाएगा और वे इसे कैश नहीं करा पाएंगे..!

संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलकर चीनी घुसपैठ पर कड़े कदम उठाने पर चर्चा करनी चाहिए और इसे अमल में लाने के लिए एकजुटता दिखानी चाहिए लेकिन विपक्ष प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने पर अड़ा है तो सत्तापक्ष प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने में..! गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह साहब तो ये तक कहते सुनाई देते हैं कि 40 चीनी सैनिकों का भारत की सीमा में घुसना कोई बड़ी घुसपैठ नहीं है यानि कि आरपीएन सिंह साहब के लिए ये बड़ी बात तब होगी जब चीनी सेना पूरे लद्दाक पर कब्जा कर लेगी..! सरकार की एक सहयोगी समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह इस मुद्दे पर गुर्राते हुए सरकार को कायर कहते हुए गरियाते जरुर हैं लेकिन मुलायम की इस गुर्राहट में कितना दम है ये हम पहले भी कई बार देख चुके हैं..! 

अच्छा होता कि चीनी घुसपैठ पर चीन को सारे दल मिलकर ऐसी गुर्राहट दिखाते और चीनी सैनिकों को खदेड़ने को लेकिर साझा फैसला लेते लेकिन यहां तो हर कोई अपने हित साधने में लगा है। कोई दूसरे से कुर्सी छीनने पर अमादा है तो कोई अपनी कुर्सी बचाने में..! सत्ता सुख के चक्कर में हमारे देश के राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई के दुनिया मजे भी ले रही है और पाकिस्तान और चीन जैसे धूर्त पड़ोसी इसका फायदा उठाने से भी नहीं चूक रहे हैं..! चीन की इस घुसपैठ पर भारत को अपना लचर रवैया छोड़कर आक्रमक रुख अपनाना चाहिए ताकि न सिर्फ चीन को भारतीय क्षेत्र छोड़कर वापस लौटने पर मजबूर होना पड़े बल्कि वह भविष्य में ऐसी हरकत करने से बाज आए !

आखिर दुनिय हम पर क्योँ हँसती है ?

ये तो बहुत ही चिंता का विषय हो गया कि दुनिया हम पर हँस रही होगी. ये हमारे प्रधानमंत्री जी को भी बहुत देर में समझ में आया कि दुनिया हम पर हँसती भी है. अभी तक तो यही माना जा रहा था कि विश्वगुरु (पता नहीं कब) का स्वघोषित खिताब चपेटे भारत की हरकतों पर दुनिया गंभीरता से विचार करती है, उसका अनुसरण करती है. वैसे अनुसरण तो दुनिया को करते तो देखा नहीं, हाँ भारत को ही दुनिया की नक़ल करते अब देखा जा रहा है. ‘नक़ल हमेशा होती है, बराबरी कभी नहीं’ का फंडा भी इसी देश ने दिया इसके बाद भी नक़ल की तरफ सदा प्रेरित रहा. बहरहाल, बात दुनिया के हंसने की…
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चलिए इतनी सारी बकवास बातों के बाद, तमाम सारे आरोपों के बाद, अनगिनत घोटालों के बाद सरकार को लगा तो कि दुनिया इस देश की हरकतों पर हँस भी रही होगी. ये अपने आपमें भ्रामक तथ्य भी है कि दुनिया अब हँस रही होगी. अभी तक तो दुनिया की तरफ से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है, जिससे एहसास हो कि दुनिया हँस रही है. इसके अतिरिक्त अभी ऐसा कोई कदम सरकारी स्तर पर नहीं उठाया गया है जिस पर दुनिया को कुछ अचरज लगे और वो हंसने की कवायद करे. अभी तक जो कुछ भी हुआ है वो जब पहली बार हुआ तब तो दुनिया ने हंसने की कोशिश की नहीं और जब समूची दुनिया ऐसी हरकतों की आदी हो गई है तब सरकार ये कह कर डराने की कोशिश कर रही है कि दुनिया हम पर हँस रही होगी.
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अरे सोचो जरा, जब दुनिया हमारे भ्रष्ट तंत्र पर नहीं हँसी, जब दुनिया ने हमारे रिश्वतधारी, घोटाला-सम्राट नेताओं, मंत्रियों, अधिकारीयों, क्लर्कों, चपरासियों तक पर हंसने की जहमत नहीं की, जब दुनिया ने संसद में, विधानसभाओं में चलते जूते-चप्पलों पर हंसने का प्रयास नहीं किया, दुनिया ने अनर्गल आरोप-प्रत्यारोपों पर हंसने का काम नहीं किया, खुलेआम होते रेप कांडों पर, मासूम बच्चियों के साथ यौनाचार किये जाने पर दुनिया ने हंसने जैसा काम नहीं किया, आतंकवादियों, अपराधियों के लिए सर झुकाते महोदयों के व्यवहार पर दुनिया नहीं हँसी, जिस देश में डकैत, हत्यारे, बलात्कारी सदन की शोभा बन जाते हों उस पर दुनिया ने हंसने की नहीं सोची, चिरकुट से पड़ोसियों की गीदड़ भभकी के सामने घुटने टेकने पर दुनिया ने हमें हँसी का पात्र नहीं माना, पडोसी देश के द्वारा सीना ठोंक कर जमीन कब्जाने पर भी दुनिया ने हम पर हंसने की कोशिश नहीं की और भी बहुत कुछ हुआ जिस पर दुनिया चाहती तो हँस सकती थी किन्तु वो नहीं हँसी तो अब ऐसी कौन सी विद्रूप हरकत हमारे माननीय लोगों ने कर दी कि दुनिया हँसती.
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इसलिए हे माननीयो, निःसंकोच अपने कलुषित कामों को अनवरत जारी रखो. जो देश विश्वगुरु रहा हो, विश्वगुरु बनने की तरफ है, जिस देश के माननीय यौन अपराधों में लिप्त हों, जिस देश के सिपहसालारों के लिए भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी प्राथमिकता हो, जिस देश में एड्स रोगी बढ़ रहे हों, जिस देश में नग्नता संस्कार बन रही हो, जिस देश में रिश्ते देह के पैमाने पर बनाये जा रहे हों, जिस देश में अघोषित राजशाही हो, जिस देश में कुछ लोगों को छोड़ सब असुरक्षित-वंचित-भयभीत-शोषित हों (आदि-आदि) उस देश पर हंसने की औकात दुनिया की नहीं हो सकती है. लगे रहो-लगे रहो…कोई कुछ भी कहे बस लगे रहो….यदि कोई हँसे भी तब भी लगे ही रहो.

अमेरिका की तलाशी पर आजम की नौटंकी !

बोस्टन हवाई अड्डे पर उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान को रोककर की गई पूछताछ अब धीरे-धीरे तूल पकड़ती जा रही है। एक तरफ जहां इस मुद्दे पर भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि अमरीका में हर किसी को आव्रजन संबंधी कड़े कानूनों का सामना करना पड़ता है। खुर्शीद के अनुसार अगर इससे हटकर कुछ होता है तो सरकार केवल विशिष्ट व्यक्ति ही नहीं बल्कि हरेक नागरिक का मसला उठाएगी। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और स्वयं यूपी के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने आरोप लगाया है कि विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के इशारे पर बोस्टन एयरपोर्ट पर उनके साथ बदसलूकी हुई है। कांग्रेस ने इस मसले पर आजम खां के इस बयान को बेतुका करार दिया है। गौर करने वाली बात यह है कि समाजवादी पार्टी के एक नेता और उत्तर प्रदेश के सौर ऊर्जा मंत्री देवेंद्र गुप्ता ने पार्टी रुख से अलग स्टैंड अपनाते हुए कहा कि यदि अमेरिका के बोस्टन हवाई अड्डे पर कैबिनेट सहयोगी आजम खान की टटोल कर तलाशी ली गई तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने इसे अमेरिकी नियमों के तहत की गई कार्रवाई बताया।

सरकार हो या पार्टी, उनके बेबाक बयान और अक्रामक तेवर उन्हें विवादों में ला ही देते हैं। मेरठ के प्रभारी मंत्री पद से हटाए जाने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश कर सरकार और पार्टी दोनों को मुश्किल में डालने वाले आजम का विवादों से पुराना नाता है।उत्तर प्रदेश के नगर विकास मंत्री आजम खान जब भी बोलते हैं विवाद उनके पीछे लग ही जाते हैं।अभी कुछ ही दिन पहले उन्‍होंने मुगल बादशाह शाहजहां पर उंगली उठाते हुए कहा है कि ताजमहल बनाकर शाहजहां ने फिजूलखर्ची कर दी थी। यही नहीं उन्‍होंने कहा कि अगर ताजमहल को गिराना हो तो आजम खान सबसे आगे होगा।गत वर्ष 18 दिसंबर को आज़म खान ने ट्रेन में कोच अटेंडेंट को मुर्गा बनाया था जिसे लेकर काफी मीडिया में भी काफी हो-हल्ला मचा था ।

मगर आदत है कि जाती नहीं है अपने बयानों कई बार से अपनी ही सरकार कि शर्मिंदगी शर्मिंदगी करा चुके खान साहब को शायद अमेरिका के नियम कानून नहीं मालूम थे ।अगर अमेरिका भी उत्तर प्रदेश ही होता तब शायद जांच पड़ताल के लिए पूछने भर पर आजम खान उसे थप्पड़ मार देते। यहां एक टिकट कलेक्टर ने उनसे एक बार यात्रा में सिर्फ टिकट मांग लिया था और बदले में आजम खान ने उसे थप्पड़ मार दिया था। लेकिन वह तो अमेरिका है। उसकी नजर में कोई आजम खान हो कि शाहरूख खान, सब खान एक समान है। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि कौन क्या कहेगा, और क्या हंगामा खड़ा होगा। शायद इसीलिए सिर्फ खान नाम जुड़ा होने के कारण ही आजम खान की बोस्टन हवाई अड्डे पर जमकर तलाशी हुई, और बवाल भी। लेकिन अमेरिका अपने रूख से रत्ती भर भी पीछे नहीं हटा।

आजम खान की तलाशी के बाद भारत में जमकर बवाल मचा है। खुद आजम खान भी अपनी तलाशी के लिए अमेरिका से ज्यादा भारत के विदेश मंत्री को दोषी ठहरा रहे हैं। लेकिन आजम खान यह नहीं बता रहे हैं कि आखिर वे अमेरिका गये ही क्यों? भारत के जिस कुंभ मेले के प्रबंधन का बखान करने के लिए वे मुख्यमंत्री के साथ अमेरिका गये थे, क्या उन्हें नहीं मालूम है कि उन्हीं के प्रभारी मंत्री रहते मेले के दौरान इलाहाबाद स्टेशन पर भगदड़ मची थी और 36 यात्री अकाल मौत मारे गये थे। कुंभ मेले के दौरान हुई इस घटना के बाद मेला प्रभारी मंत्री होने के नाते उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा तब दिया जाता है जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जो कुछ हुआ उसकी कोई न कोई जिम्मेदारी हमारी अपनी भी बनती है। अगर आजम खान ने इस्तीफा दिया तो कम से कम उन्होंने यह माना था कि मेले के दौरान अगर कोई कुप्रंधन था तो उसके लिए नैतिक रूप से वे जिम्मेदार हैं। तो फिर भला किस हैसियत से वे अमेरिका चले गये मेला प्रबंधन का बखान करने?

आजम खान को मालूम हो या न हो लेकिन अमेरिका में बाहर से आने वाले मुसलमानों की कुछ विशेष छानबीन होती रहती है और यदि आपके नाम के साथ खान जुड़ा हो तो छानबीन कुछ ज्यादा ही होती है। अमेरिका अपनी सतर्कता के साथ कोई समझौता कभी नहीं करता। अमेरिका इस मामले में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करता। यदि आप मुसलमान हैं तो चाहे आप कोई भी क्यों न हों, आपको विशेष सतर्कता से गुजरना ही होगा और यदि आपके साथ खान जुड़ा है तो चाहे आप कितने भी तीस मार खां हों, आपको कोई विशेष रियासत नहीं मिल सकती। अमेरिका में ऐसे जुमलों के लिए कोई जगह नहीं है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता। फिर अगर वह मुसलमान किसी बाहरी देश से अमेरिका पहुंचा है तो उसकी नजर में हर मुसलमान संभावित आतंकवादी ही होता है। अमेरिका अपनी ऐसी सतर्कता के लिये प्रशंसा का पात्र हैं। चाहिए तो यह था कि आजम खान के साथ जो जांच पड़ताल हुई, उसके बाद वे अमेरिका की तारीफ करते लेकिन दुर्भाग्य से हमारे बड़बोले और घमण्डी मंत्री आजम खान ने अमेरिका की इस सतर्कता की प्रशंसा करने की जगह नाराजगी व्यक्त करके देश के गौरव को ठेस पहुंचाई।

कई वर्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री जार्ज फर्नान्डीस तक को सुरक्षा के मामले में कोई रियायत नहीं मिली थी। यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी अमेरिका में ऐसी जांच पड़ताल के दायरे में आ चुके हैं। कई बार तो प्रधानमंत्री तक ऐसी विशेष जांच से गुजरते हैं और ऐसे समान व्यवहार की तारीफ करते हैं। किन्तु लगता है आजम खान ने अमेरिका को उत्तर प्रदेश समझने की भूल कर दी। अमेरिका ने यदि किसी साधारण से कार्य के लिये आमंत्रित कर दिया तो नेता लोग सारी दुनिया में ऐसा ढिंढोरा पीटते हैं जैसे कि स्वर्ग का आमंत्रण आ गया। स्पष्ट है कि नेता लोग अमेरिका जाना भारत के लोगों पर रौब जमाने का अच्छा प्रमाणपत्र मानते हैं। यदि इसी तरह अमेरिका जाने के लिये लार टपकती है तो फिर इस छोटी सी बात का बतंगड़ क्यों? आजम खान ही भारत में एक मंत्री होने के अलावा ऐसी क्या विशेषता रखते हैं कि अमेरिका उन पर विशेष विश्वास करे?

आजम खान उत्तर प्रदेश में भी साम्प्रदायिक ही माने जाते हैं जो हर जगह मुसलमान होने की अकड़ दिखाते हैं। जब आप भारत में भी रहकर पहले मुसलमान नेता हैं तब भारतीय तो अमेरिका ने तो आपके साथ ठीक ही व्यवहार किया है। लेकिन आजम खान को इसबात का भी जवाब देना होगा कि अमेरिका के धुर विरोधी होने के बाद भी उन्होंने हॉवर्ट का न्यौता क्यूं कबूल किया और अगर ये मसला सिर्फ मुसलमानों से जुड़ा है तो उत्तर प्रदेशके चीफ सेक्रेटरी जावेद उस्मानी इस कथित बदसलूकी से कैसे बच गए?अतः आजम खान सिर्फ इस मुद्दे को तिल का ताड़ बनाने की कोशिश न ही करें तो अच्छा होगा ,वरना उन्हें जगहंसाई के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होगा ।

तुम्हें कैसे परिभाषित करूं माँ !

कहते हैं भगवान हर जगह नहीं हो सकता इसीलिए उसने मां को भेजा। यही वजह है कि मां हर वो फर्ज निभाती हैं जिसकी उम्मीद हम उस शक्ति से करते हैं जिसे हमने कभी देखा तो नहीं मगर कई बार महसूस जरूर किया है। मांए यह वो शब्द है जो किसी भी बच्चे को सुरक्षित होने का आश्वासन देता है। भले ही परिवार के पालन.पोषण की जिम्मेदारी पिता की होती है लेकिन बच्चों की खुशियों का ध्यान एक मां से बेहतर और कोई नहीं रख सकता। तभी तो कहा जाता है कि आपकी मां बिना आपसे पूछे ये बता सकती है कि आपको क्या चाहिए। पिता के पारिवारिक स्वरूप और उनकी भूमिका को थोड़ा कठोर दर्शाया जाता है इसीलिए बच्चे पिता से भले ही अपने दिल की बात ना कह पाएं लेकिन मां के साथ वह अपनी हर छोटी से छोटी बात शेयर करते हैं।

मां की इतनी सारी खूबियां बताने के बाद आपका दिल और दिमाग उन सभी पलों से जुड़ी सुनहरी यादों को फिर से सहेजने लगा होगा जो कभी आपने अपनी मां के साथ गुजारे थे। लेकिन उन्हें अपने तक सीमित रखने से बेहतर है आप मंच के अन्य पाठकों के साथ भी अपने उन कभी न भुला पाने वाले क्षणों को साझा करें। उन्हें बताएं कि आप बचपन में कैसे अपनी मां को परेशान किया करते थेए अपने हर छोटे काम के लिए उन पर निर्भर रहा करते थेए स्कूल से आते ही मां के हाथ के खाने की खुशबू घर में महकने लगती थीए जब पढ़ाई या जॉब के लिए घर से दूर गए तो कैसे उनकी याद आपको हर समय सताया करती थी।

वैसे तो मां के प्यार का मोल चुका पाना किसी के भी बस की बात नहीं है लेकिन कुछ ही दिनों में यानि 12 मई को मदर्स डे के उपलक्ष्य में आप उन्हें यह तो बता ही सकते हैं कि आपके जीवन में उनकी क्या अहमियत हैए वह क्यों आपके लिए दुनिया में सबसे ज्यादा जरूरी हैं।

रियलिटी शो का खौफनाक चेहरा !

टीण्वीण् पर आने वाले भिन्न.भिन्न रियलिटी शो को देखकर कई बार आपका मन भी ललचाता होगा और आप भी अपने अंदर कोई ना कोई टैलेंट ढूंढ़ने लग जाते होंगे ताकि आप भी टी वी की दुनिया के चमकते सितारे बन सकें आप तो फिर भी समझदार हैं लेकिन जरा सोचिए उन बच्चों का क्या जिनके बचपन के साथ खिलवाड़ कर रियलिटी शो निर्माता अपनी टीआरपी भुनाते हैं पहले बात युवाओं और वयस्कों तक ही सीमित थी लेकिन अब बच्चों को भी अपने फायदे के लिए प्रयोग किए जाने का सिलसिला शुरू हो चुका है कोई भी टी वी चैनल खोल लीजिए एक ना एक तथाकथित रियलिटी शो आपको जरूर नजर आ जाएगा जिसमें बच्चे हंसते गातेए कॉमेडी या फिर अदाकारी करते दिख जाएंगे लेकिन रियलिटी शो की रंगीन दुनिया इतनी भी रंगीन नहीं है क्योंकि यहां बच्चों के सपने सजाए नहीं उन्हें सिर्फ तोड़ा जाता है और वो भी इसलिए ताकि टीवी देख रहे दर्शकों को उनके साथ सांत्वना हो और वह चिपक कर टी वी के साथ बैठ जाएं

रियलिटी बेचकर बच्चों को जहां अति महत्वकांक्षी बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ अभिभावकों समेत उन छोटे.छोटे बच्चों में भी प्रतिस्पर्धा का एक ऐसा बीच बोया जा रहा है जो उन्हें हार सहन करने ही नहीं देता वह कुछ भी देखने.समझने में लाचार हो जाते हैं जिसकी वजह से अभिभावक अपने बच्चे पर जीत का दबाव बनाने लगते हैं  बच्चे मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते ऐसे में अपनी प्रतिभा दिखाने के बाद रियलिटी शो के जज के सामने आकर अगले राउंड के लिए सलेक्ट होना या ना होने जैसा सफर उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं होता लेकिन फिर भी माता.पिता उन्हें इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करते हैं 

इस बात से आप या हम कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जहां कुछ माता.पिता अपने बच्चों के जरिए अपने सपने पूरा करने की कोशिश में होते हैंए क्योंकि वे सिंगर बनना चाहते थे इसीलिए उनके बच्चे को भी गायक ही बनना है क्योंकि वो हीरो बनना चाहते थे इसीलिए उनके बच्चे को भी हीरो ही बनना हैए बस इसीलिए वह अपने बच्चे पर अप्रत्यक्ष तौर पर जीतने के लिए दबाव बनाने लगते हैं बिना यह समझे कि इस दबाव को उनका बच्चा सहन कर पा रहा है या नहीं वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो घर से भागकर ऑडिशन देने पहुंचते हैं इन बच्चों को उनके माता.पिता का समर्थन प्राप्त नहीं होताए जो कि अपने आप में तकलीफदेह है

किसी टैलेंट शो में अगर बच्चे का चयन हो जाता है तो जाहिर तौर पर यह खुशी की बात है लेकिन जब बच्चा असफल साबित हो जाता है तो एक तो वह पहले ही परेशान हो जाता है उसके ऊपर माता.पिता का स्वभाव उसे और दुखी करने लगता है घर पर पड़ने वाली डांट का डर उन्हें तंग करता है शो से बाहर होने के बावजूद वह यह मानने से भी इंकार कर देते हैं कि जिस टैलेंट की खोज की जा रही है वह उनमें है ही नहीं घर और बाहरए उसके पड़ोसीए रिश्तेदारए यहां तक कि परिवारवाले तक दूसरे बच्चों से उसकी तुलना की जाती है जिसकी वजह से उसके अंदर हीन भावना घर कर जाती है

रियलिटी शो में भाग सिर्फ इसीलिए लेना कि जीतकर ही आना है व्यक्ति के मनोबल को ऑडिशन देने से पहले तो मजबूत करता है लेकिन अगर किसी कारणवश उसे हार का मुंह देखना पड़े तो यही मनोबल धाराशायी हो जाता है बच्चा भी समझ जाता होगा कि रियलिटी शो में भाग लेकर खुद को अन्य बच्चों से बेहतर साबित करना कोई बच्चों का खेल नहीं है इस हार के बात उसका बचपना तो उसका साथ छोड़कर चला ही जाता है लेकिन जीवन की एक कड़वी रियलिटी से वो रूबरू हो जाता है

आखिर गुड़िया से हैवानियत कब तक ?

गत वर्ष 16 दिसम्बर को दिल्ली बलात्कार कांड के बाद उमड़े जनाक्रोश के बाद केंद्र सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावे किये थे ।मगर एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगता की देश में महिलाओं और मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म जैसे घटनाओं में तनिक भी कमी आई है।देश की राजधानी दिल्ली में हुए इस विभत्स बलात्कार काण्ड के बाद लग रहा था की शायद दिल्ली सरकार जागेगी और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ पुख्ता कदम उठाएगी।मगर विकृत मानसिकता वाले दरिन्दे आज भी खुलेआम महिलाओं और मासूम बच्चियों को अपना निशाना बना रहे हैं।गत दिनों जब पूरा देश नवरात्र के दौरान बच्चियों को देवी के रूप में पूज रहा था उसी समय एक हैवान दरिन्दे ने दरिंदगी की सारी हदें पर करते हुए दिल्ली के गाँधीनगर में एक पांच साल की मासूम बच्ची के साथ घिनौना कार्य किया ,जिसे लेकर एक बार फिर से आम जनता को सडकों पर उतरना पड़ा है,और इस हैवानियत भरे दुष्कर्म को लेकर देश की संसद में भी काफी हंगामा हुआ । पांच वर्ष की एक बच्ची के साथ अमानुषिक तरीके से दुष्कर्म की घटना सामने आने के बाद जहां दिल्ली एक बार फिर शर्मसार हुई है,वहीं इस मुद्दे को लेकर हुए प्रदर्शनों ने 16 दिसंबर के सामूहिक दुष्कर्म के बाद की हालत की याद ताजा कर दी। पीड़ित बच्ची को उसके पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति ने अपहरण कर दो दिनों तक बंधक रखा, भूखे प्यासे रख कर उसे अमानवीय यातनाएं दी और दुष्कर्म किया। दरिंदगी झेल चुकी बच्ची अब अस्पताल में जिंदगी के लिए जूझ रही है,दुष्कर्म की शिकार बच्ची की गंभीर हालत को देखते हुए उसे एम्स में भर्ती कराया गया है।

पूर्वी दिल्ली के गांधी नगर में रहने वाली बच्ची का अपहरण उसके पड़ोसी ने 15 अप्रैल को कर लिया था। दो दिनों तक अपने फ्लैट में बंधक बना कर कई बार दुष्कर्म करने वाले ने दरिंदगी की सारी हदें पार की और उसे भूखा-प्यासा रखा।17 अप्रैल को बच्ची की रोने की आवाज सुनने के बाद परिवार के लोगों ने उसे आजाद कराया । मासूम से दरिंदगी के मामले में घिरी दिल्ली पुलिस की खामियां गृह मंत्रालय की जांच में भी सामने आ गई हैं। जांच में पता चला है कि दिल्ली पुलिस सिर्फ इस मामले में ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सीएम से हुई बदसलूकी और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के घर प्रदर्शनकारियों के घुस जाने के मामले में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रही। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने माना है कि पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में पुलिसकर्मियों से लापरवाही हुई है। हालांकि उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार किया है।अपने इस्तीफे पर उन्होंने पत्रकारों से कहा, ”यदि आपकी गलती के लिए संपादक इस्तीफा नहीं देता तो फिर मैं क्यों इस्तीफा दूं? यदि मेरे इस्तीफे से बलात्कार जैसी घटनाएं रूक जाएंगी तो मैं हजार बार इस्तीफा देने को तैयार हूं।”कुमार ने कहा कि इस मामले में पुलिस ने तुरंत कदम उठाए हैं। प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारने वाले एसीपी अहलावत को सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं गांधीनगर थाने के एसएचओ और जांच अधिकारी को भी निलंबित कर दिया गया है।

दिल्ली में पांच साल की मासूम गुड़िया के साथ हुई दरिंदगी की घटना के खिलाफ गुस्से का उबाल सड़क से संसद तक चरम पर रहा।वहीं, ऐसी घटनाओं पर जवाबदेही और जिम्मेदारी तय करने को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार हाथ खड़े करते दिखे। कमिश्नर के बचाव में उतरे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि बलात्कार की घटनाएं सिर्फ दिल्ली में नहीं बल्कि देश भर में हो रही हैं। वहीं, नीरज कुमार बोले कि गांधीनगर में बच्ची के साथ जिस तरह की वारदात हुई, वैसी घटनाओं को रोक पाना पुलिस के बस की बात नहीं है।अब सवाल ये है कि न तो सरकार मामले की जिम्मेदारी लेने को तैयार है और न ही पुलिस। ऐसे में कौन जिम्मेदारी लेगा इन घटनाओं की। बात अगर राजधानी दिल्ली की करें तो यहां पिछले एक पखवाड़े में ही बलात्कार की सात घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन बच्चियों पर क्या बीती है, ये उनका दिल ही जानता है। पिछले दिनों गैंगरेप की शिकार हुई दिल्ली की फर्श बाजार की 13 साल की मासूम पुलिसिया रवैये से इतनी तंग आ गई कि उसने अपनी जिंदगी ही खत्म करने की कोशिश कर डाली।हैवान सिर्फ राजधानी में ही बच्चियों का शिकार नहीं कर रहे हैं। पूरे देश से दरिंदगी की दास्तान हमारे सामने आ रही हैं। 

 अब बात चाहे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बलात्कार की शिकार छोटी सी बच्ची की हो या फिर मध्य प्रदेश के सिवनी में हैवानियत की शिकार हुई मासूम की। तितलियां पकड़ने की उम्र थी। गुड़िया से खेलने की उम्र थी। दादी नानी की कहानियां सुनने की उम्र थी, एक खुशनुमा जिंदगी से रूबरू होने की उम्र थी लेकिन इन बच्चियों ने तो इसी उम्र में दुनिया का सबसे घिनौना, सबसे भयानक तस्वीर देख ली। बलात्कार, किसी हथौड़े कि तरह दिलो दिमाग पर चोट करता है ये लफ्ज। कन्या पूजन, नारी पूजन वाले इस देश में बलात्कार एक भयानक सच है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों में हमारा समाज कितना बर्बर हो गया है। एशियन ह्यूमन राइट्स और नेशनल क्राइन रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2001 से 2011 तक दस सालों में देश में बलात्कार के मामले 336 फीसदी बढ़ गए हैं। दस सालों में देश भर में बलात्कार के 48 हजार 338 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली में साल 2012 में बलात्कार के 706 मामले दर्ज हुए लेकिन पिछले तीन ही महीने में दिल्ली के दरिंदों ने बलात्कार की 393 घटनाओं को अंजाम दे दिया।

16 दिसंबर की रात दिल्ली में दुनिया का सबसे भयानक निर्भया बलात्कार कांड सामने आया था। पूरा देश हैवानों के खिलाफ उबल पड़ा था, लेकिन हैवानों की करतूत आप सुनेंगे तो सन्न रह जाएंगे। 16 दिसंबर से 31 दिसंबर तक सिर्फ 14 दिनों के भीतर राजधानी दिल्ली में बलात्कार के 40 मामले दर्ज किए गए। 16 दिसंबर की रात दिल्ली में जो कुछ भी हुआ था, उसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। तब हमने बलात्कार पर नए कानून बनाने की लड़ाई लड़ी थी। मगर सब कुछ के बावजूद सिस्टम नहीं बदला, हैवानों की हरकतें नहीं बदलीं। आखिर कितनी निर्भया, कितनी गुड़िया हैवानियत की भेंट चढ़ेंगी। इस देश की हर बेटियां पूछ रही हैं कि आखिर कब रुकेगा उस जैसी मासूमों पर हैवानियत का कहर।

ये कौन सा समाज दिया है हमने अपनी बच्चियों को। ये कौन सा माहौल बना रखा है हमने बेटियों के लिए, जहां न बच्ची घर में महफूज है और न ही सड़क पर। देश उबल रहा है, लेकिन हैवानों पर कोई असर नहीं है। दिल्ली में मासूम के साथ हुई दरिंदगी पर सियासत भी गरमा गई है। बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग उठने लगी है। भाजपा ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र और दिल्ली की सरकार असंवेदनशील हो गई है और जनता उन्हें उखाड़ फेंकेगी। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जनाक्रोश रैली में भाषण केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा कि दिल्ली में आएदिन बलात्कार की घटनाएं होती रहती हैं। सरकार संवेदनहीन हो गई है। ऐसी सरकार को गद्दी पर होने का कोई हक नहीं। हम दिल्ली की सरकार को भी बदलेंगे और केंद्र की भी।इस वजह से बजट सत्र के दूसरे चरण के हंगामेदार होने के भी आसार हैं। सवाल ये कि क्या वाकई में राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर संजीदा हैं या महज सियासी रोटियां सेंकी जा रही हैं?खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सामने आकर इस मुद्दे पर बयान देना पड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा कि समाज को महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील होना होगा। वहीं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगर बलात्कारियों को सबक सिखाना है तो उन्हें जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा देनी होगी। बच्चों से यौन हिंसा राजनीतिक मसला नहीं है। हमें मिलकर इसके खिलाफ लड़ना होगा और ये तय करना होगा कि दोषियों को जल्द और सख्त सजा मिले। कानून निर्माता और समाजशास्त्रियों को मिलकर इस पर विचार करना होगा ।

लेफ्ट पार्टियों ने भी मासूम के साथ हुई दरिंदगी की निंदा करते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस रेप के मामले रोकने में नाकाम रही है। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि ये हमारे लिए चिंता की बात है। वहीं सीपीआई नेता डी राजा ने कहा कि ये गंभीर मामला है। मेरे पास घटना की निंदा करने के लिए शब्द भी नहीं है।जेडीयू नेता शिवानंद तिवारी का कहना है कि सख्त कानून के साथ साथ समाज को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी, तभी जाकर बलात्कार की घटनाएं रुकेंगी। कल्पना करना भी मुश्किल है कि इस तरह का विचार भी लोगों के मन में कैसे आता है। इसका अध्यन होना चाहिए कि क्यों समाज के लोगों में इस तरह के विचार आ रहे हैं।मालूम हो कि 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई दरिंदगी के बाद भी सियासी माहौल गरमाया था। नेताओं के तरह-तरह बयान आए थे। इस बार भी ऐसा हो रहा है। अगर हमारे नेता कई पार्टी राजनीती से ऊपर उठकर समाज और लोगों का भला सोचे तो बदलाव नामुमकिन नहीं।

एन डी ए की टीकरी मोदी शिवराज और नितीश

2014 के आम चुनाव से पहले देश के तीन बड़े राज्य सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। देश के अन्य राज्यों के साथ ही इन तीनों राज्यों में विकास भी खूब हुआ है लेकिन इन तीनों राज्यों में से चर्चा सिर्फ एक ही राज्य की ज्यादा हो रही है और वो राज्य है गुजरात..! गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास की बातों के सहारे देश की तकदीर बदलने की बात करते हैं। बकौल मोदी जितना विकास गुजरात में हुआ है…उतनी तरक्की देश के किसी राज्य ने नहीं की है। मोदी गुजरात के विकास मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते और गुजरात के विकास मॉडल को सर्वश्रेष्ठ ठहराते हैं। मोदी की नजरें 2014 में पीएम की कुर्सी पर है और इसके लिए मोदी हवा को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। विकास के मुद्दे पर चर्चा में पीछे छूट रहा हिंदुस्तान का हृद्य प्रदेश मध्य प्रदेश चर्चा में भले ही गुजरात से पीछे हो लेकिन विकास की दौड़ में मध्य प्रदेश वास्तव में पीछे नहीं है लेकिन जितनी बातें गुजरात के विकास की होती हैं उतनी बातें मध्य प्रदेश की नहीं होती..! ये बात मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी शायद कचोटती होगी..! गुजरात और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है ऐसे में शिवराज सिंह चाहकर भी गुजरात के विकास के दावों पर सवाल तो नहीं उठा सकते..! शायद इसलिए ही कई मौकों पर विकास के मुद्दे पर गुजरात का जिक्र आने पर शिवराज सिंह मध्य प्रदेश के विकास की कहानियां सुनाने लगते हैं और दोनों ही प्रदेशों की स्थितियों की चर्चा करते हुए मध्य प्रदेश की 19 प्रतिशत की रिकार्ड कृषि विकास दर और 12 प्रतिशत की विकास दर का जिक्र करना नहीं भूलते हैं। 

प्रधानमंत्री के पद को लेकर मोदी की उम्मीदवारी पर वे किसी के नाम नहीं लेते तो किसी के नाम पर हामी भी नहीं भरते। खुद की उम्मीदवारी पर मन में किसी हसरत के बिना काम करने की बात कहना शिवराज नहीं भूलते हैं। भाजपा शासित राज्यों मोदी के गुजरात और शिवराज के मध्य प्रदेश के अलावा भाजपा समर्थित नीतीश कुमार का बिहार भी विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात के आगे नहीं ठहरता लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि नीतीश के राज में बिहार में तरक्की ने रफ्तार पकड़ी है..! विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात से पीछे छूट जाने की तकलीफ तो नीतीश को भी होती होगी..! तभी तो नीतीश बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर कभी दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन करते हुए मोदी की लोकप्रियता को टक्कर देने की कोशिश करते हैं तो कभी सांप्रदायिकता के बहाने ही सही मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए अपनी इस तकलीफ को जाहिर भी करते हैं..! नीतिश भले ही भाजपा से परहेज न करने की बात करते हुए सिर्फ मोदी से परहेज करने की बात करते हों लेकिन इसके पीछे सिर्फ धर्मनिरपेक्षता का ही मुद्दा है ये बात आसानी से हजम नहीं होती क्योंकि एक व्यक्ति विशेष को सांप्रदायिक कहते हुए आप विरोध का झंडा बुलंद करने में देर नहीं करते लेकिन उस व्यक्ति की पार्टी जिस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगता है उसे आप स्वीकार कर लेते हो..!

जाहिर है विकास के नाम सिर्फ गुजरात की चर्चा होने पर शिवराज और नीतीश के पेट में भी दर्द होता होगा जो मानव स्वाभाव के अनुसार लाजिमी भी है..! मोदी और शिवराज की पार्टी एक होने के नाते शिवराज का मोदी को नीचा दिखाकर अपनी नाक ऊंचा न कर पाना भले ही उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन नीतीश कुमार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। इससे नीतीश न सिर्फ खुद को सेक्यूलर दिखाकर खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हिमायती दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं बल्कि ये भी लोगों को बताने का पूरा जतन कर रहे हैं कि विकास सिर्फ गुजरात में नहीं हुआ है वरन बिहार में भी विकास की गंगा बह रही है..! टोपी पहनने और टीका लगाने के नीतीश के बोल तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

बहरहाल मोदी की निगाहें पीएम की कुर्सी पर हैं तो नीतीश की कोशिश पीएम की कुर्सी मोदी से दूर रखने की है ऐसे में देखना ये होगा कि नीतीश की कोशिश कामयाब होती है या फिर चलता है मोदी का जादू..? फिलहाल तो 2014 के करीब आने के साथ – साथ ये लड़ाई और भी रोचक होनी की पूरी उम्मीद है..!

भूख से मरते लोग और खुले में सड़ता अनाज !

भूख से हो रही मौतों के सन्दर्भ में वर्ष 1996 में रोम में एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इसमें 180 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक स्वर से कहा था कि भूख से हो रही मौतें बहुत ही शर्मनाक बात है। सम्मेलन में यह भी संकल्प लिया गया था कि सन् 2015 तक वि·श्वभर से आधी भुखमरी मिटा दी जाएगी। किन्तु इस सम्बंध में कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं हुआ है। फलस्वरूप दिनोंदिन भूख से मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। उल्लेखनीय है कि इस समय दुनियाभर में 80 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दो जून की रोटी नहीं मिल पाती है। और अनुमान है कि 2015 तक यह संख्या डेढ़ अरब तक पहुंच जाएगी। इन 80 करोड़ में से लगभग 40 करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यानी दुनिया में जितने भूखे हैं, उसका आधा भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यह उस समय की बात है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भण्डार भी भरे पड़े हैं। तो फिर आम लोग भूख से क्यों मरते हैं? अन्न वितरण व्यवस्था में कहां कमी है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

विश्वभर में में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी जानलेवा बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे हैं। और इन 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन क्या पिछले 66 वर्षों में देशभर में इस बारे में कोई चिन्ता की गई? क्या संसद में इस सम्बंध में कोई बहस हुई? लेकिन अफसोस तो यह कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही 30 करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। फिर हम इस खुशफहमी में कैसे जी सकते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, जो सबका पेट भरता है। अगर वाकई ऐसा है तो हमारा देश भूखा क्यों हैं? आज भी छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड, उड़ीसा, झारखंड व बिहार में भुखमरी का प्रतिशत ज्यादा क्यों बना हुआ है?
एक तरफ देश में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है वहीं सरकारी लापरवाही के चलते लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। यह तो बीते सालों के आंकड़ें कहते हैं, जबकि इस साल तो अनाज सड़ने के इतने बड़े आंकड़े सामने आए हैं कि दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हैं। 

हाल ही में इतना अनाज सड़ चुका है कि उससे साल भर करोड़ों भूखों का पेट भर सकता था, जो भ्रष्टाचार के गलियारों में पनपती लापरवाही की सीलन में सड़ गया। विगत वर्ष अनाज सड़ने का अनुमान, जयपुर से लगया गया जहां गोदाम में शराब रखने के लिए करीब 70 लाख टन अनाज बाहर फेंक दिया गया जिससे वह सड़ गया। इसके बाद राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अनाज सड़ने के कई मामले सामने आए। लेकिन ठोस कारवाई अभी तक किसी पर नहीं हुई। इस मामले पर संसद और राजनीतिक सभाओं में तो बयानबाजी होती रही और ले-देकर कुछ अधिकारियों को निलंबित कर कार्रवाई का फर्ज पूरा कर दिया गया। किंतु इससे हापुड़ में सड़े 5 लाख टन गेहूं की पूर्ति नहीं की जा सकती है, करीब ढ़ाई करोड़ का यह गेहूं, 40 लाख बोरियों में भरे-भरे पूरे एक सप्ताह तक खुद के सहेजने का इंतजार करता है और अतंत: बारिश में भीगने के बाद सड़ ही गया!

पिछले 10 सालों के दौरान गोदामों में कितना अनाज ख़राब हुआ,ख़राब होने की क्या वजह रही और ख़राब अनाज को हटाने के लिए सरकार की क्या कोशिशें और ख़र्च आया? इस संदर्भ में जनवरी 2008 में उड़ीसा के कोरापुट ज़िले के आरटीआई कार्यकर्ता देवाशीष भट्टाचार्य ने गृह मंत्रालय को एक आवेदन भेजा था। इस आरटीआई आवेदन का जो जवाब मिला, वह चौंकाने वाला था। मालूम हुआ कि बीते 10 सालों में 10 लाख टन अनाज बेकार हो गया। जबकि इस अनाज से छह लाख लोगों को 10 साल तक भोजन मिल सकता था। सरकार ने अनाज को संरक्षित रखने के लिए 243 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए, लेकिन अनाज है कि गोदामों में सड़ता रहा। ख़राब अनाज नष्ट करने के लिए भी सरकार ने 2 करोड़ रुपये ख़र्च किए। एक दीगर सवाल के जवाब में सरकार ने अनाज के ख़राब होने की वजह उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, भंडारण और ख़राब वितरण प्रक्रिया बताया।

दरअसल, यदि हम दुनिया में विकसित विधियों का इस्तेमाल अपने गोदामों के लिए करें तो अनाज 4 से 5 साल तक अच्छी हालत में रह सकता है। वरना वह समय बीतने के साथ ख़राब होने लगता है। सरकारें हर साल खाद्य सब्सिडी पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करती हैं, मगर उन्हें इस बात का कतई ख्याल नहीं रहता कि जो अनाज ख़रीदा गया है, उसे कैसे ह़िफाज़त से रखा जाएगा। इस समस्या का एक नीतिगत पहलू और है, जिस पर चर्चा बेहद ज़रूरी है। अक्सर बफर स्टॉक की ज़रूरत से बहुत ज़्यादा सरकारी ख़रीद कर ली जाती है। फिलव़क्त सरकारी गोदामों में 60,428 लाख टन अनाज है, जबकि अतिरिक्त स्टॉक रखने की अनिवार्यता 319 करोड़ टन अनाज की है। ज़ाहिर है, जब हम गोदामों की क्षमता से दोगुना भार उन पर डाल देते हैं तो अनाज को सड़ने से किस तरह से बचाया जा सकता है। सरकार एक तऱफ कम उत्पादन और निजी जमाखोरी को बढ़ती महंगाई की अहम वजह बताती है, वहीं दूसरी तऱफ वह ख़ुद जमाखोरी में लगी हुई है, जिसके चलते बाज़ार के मंझे हुए खिलाड़ी अनाज की एक बनावटी किल्लत पैदा कर बेजा फायदा उठाते हैं। बहरहाल महंगाई से आम आदमी परेशान है, खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन सरकार को यह गवारा नहीं कि जब उसके पास इफरात में अनाज का भंडार है तो वह उसे खुले बाज़ार में क्यों नहीं जारी कर देती। 

भले ही गोदामों में अनाज चूहे खाते रहें, अनाज पानी में पड़ा सड़ता रहे, लेकिन मजाल है कि वह अनाज भूख से तिल-तिल मरती जनता तक पहुंच जाए। सुप्रीमकोर्ट ने ठीक ही यह सवाल उठाया है कि यदि सरकार के पास इतना अनाज रखने का इंतज़ाम नहीं है तो वह उसे ज़रूरतमंदों को क्यों नहीं बांट देती। सुप्रीमकोर्ट के कड़े रुख़ के बाद सरकार ने आगामी छह महीनों में एपीएल परिवारों के लिए राशन की दुकानों से 30 लाख टन चावल और गेहूं बेचने का फैसला किया है। अनाज पर आत्मनिर्भरता का दावा करने वाला भारत अनाज भंडारण के कुप्रबंधन की मार झेल रहा है,जिसके चलते टनों-टन अनाज प्रतिवर्ष सड़ जाता है| जिसका परिणाम देश में भुखमरी व महंगाई के रूप में हमारे सामने है।देश के ये हालात कोई नए नहीं है, आजादी के छह दशक बाद भी गरीबों के पेट की भूख लगातार बढ़ी, कुपोषण में भी बढ़ोत्त्तरी हुई, भुखमरी से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ। इसी के साथ देश के लिए चुनौती पूर्ण सवाल ये है कि आखिर खाद्य सामग्री की सुरक्षा किस स्तर से हो रही है ? खुले में पड़े लाखों टन अनाज को मात्र तिरपाल और चादरों के सहारे सुरक्षित रखने की समझ किसी नासमझी से कम नहीं है। 

मगर साल दर साल इसी तरीके से सब कुछ हो रहा है। देश में कुपोषण का प्रतिशत साल-दर-साल बढ़ रहा है। यूनिसेफ की एक रिर्पाट के अनुसार, विश्वभर में करीब पांच साल से कम उम्र के 25 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। शर्म की बात है कि इन बच्चों का सबसे बड़ा प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है। दुनिया में कुल भुखमरी के शिकार लोगों में 40 फीसदी लोग भारत के हैं। जिसमें से 46 फीसदी बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं और यह दर सहारा-अफ्रीका से दो गुना ज्यादा है। अब देश के कुपोषण वाले आंकड़े को देखकर बस यही कहा जा सकता है कि जहां देश में करोड़ों जनता के लिए दो जून की रोटी नहीं है, उनके पोषक भोजन की पूर्ति करना और करवाना दोनों ही मजाक लगता है। मनरेगा के बाद यूपीए की दूसरी सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना खाद्य सुरक्षा कानून को भले ही कैबिनेट की मंजूरी मिल गई हो, लेकिन अभी भी इसमें कई पेंच हैं, जो इस कानून की सफलता पर सवाल खडे क़रते हैं।खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाने के बारे में अब खुद सरकार के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए हैं, तो इसे समझा जा सकता है। सरकार के नीति-नियंता इस परियोजना को चाहे जितना बढ़ा-चढ़ाकर आंकें और संसद के इसी सत्र में इसे पारित करवाने की प्रतिबध्दता जताएं, हकीकत में यह विरोधाभासों से भरा है।

 मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। बावजूद इसके सरकार इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले पारित कराना चाहती है। यही कारण है कि अमूमन कल्याणकारी योजनाओं को खारिज करने वाले वित्ता मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने में देर नहीं लगाई। जबकि इस योजना की विसंगतियों की सूची लंबी है। देश के दस लोगों के पास जितनी संपत्ति बताई जाती है, उतनी निचले तबके के दस करोड़ लोगों के पास कुल मिलाकर नहीं है।करोड़ों लोगों को दिन शुरू करने के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी, वहीं लाखों लोग ऐसे हैं जो तय नहीं कर पाते कि आज उनका पिज्जा खाने का मन है या बर्गर खाने का, उन्हें मटन की डिश चाहिए थी या चिकिन की। करोड़ों जिन कैलोरियों के लिए तरसते हैं उतनी कैलोरियां कुछ लाख लोग मुंह में भर-भर कर सड़कों पर थूक देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं। जिन्हें सबसे ज्यादा इलाज और दवा की जरूरत है, उनके पास न इलाज है न दवा, लेकिन जो पहले से ही स्वस्थ्य हैं उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए हर गुरु और हर विशेषज्ञ मौजूद हैं।

 जिनके पास मानसिक और बौद्धिक क्षमताएं हैं, जो उचित शिक्षा और वातावरण पाकर चमत्कारिक ढंग से विकास कर सकते हैं और समाज की बेहतरी में बेहतरीन योगदान दे सकते हैं उनके पास कोई अवसर नहीं है।सर्वाधिक बर्बादी सामूहिक भोज के मौकों पर होती है। भोज समारोह में पश्चिमी संस्कृति की तर्ज पर बूफे का चलन बढा है। बूफे यानी स्वरुचि भोजन को खुद से प्लेट में निकालकर खाने का विधान। एक भाव में इस तरीके से भोजन की कम बर्बादी होनी चाहिए थी। खासकर पंगत में बैठकर पत्तों पर किसी और के हाथ से परोसे जाने पर पकवान के बर्बादी की गुंजाईश ज्यादा होती है। संभव है कि अंग्रेजों ने बूफे की पद्धति का ईजाद स्वरुचि भोजन का खुद चयन करने के लिए किया। भोज्य पात्र में सीमित मात्रा में खुद लेने की तरकीब अन्न बर्बादी से बचने का सुनहरा उपाय हो सकता। लेकिन आज पंगत में बैठाकर भोज करने कराने की विधा की तुलना में पश्चिमी नकल के तौर पर हमारे बीच आया बूफे संस्कार ज्यादा अन्न बर्बादी का कारण बना है। बूफे के नाम पर छप्पन भोग लगाने का शौक विलासियों के सिर चढकर बोल रहा है। समारोहों में एकसाथ राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी, बंगाली डिश का रेला सजा दिया जाता है। फिर आंगतुकों के हाथ इस आग्रह के साथ बूफे की तश्तरी पकड़ा दी जाती है कि सभी पकवानों का रसास्वादन ले।

 इंसान के भोजन की सीमा होती है। अगर वह हर पकवान में से एक एक कौर ले तो भी उसकी सीमा जवाब दे दे। ऐसे में, तश्तरी में ज्यादा लेकर छोडना या बना भोजन इस्तेमाल के बगैर बर्बाद करने की असंवेदनशीलता बढती जा रही है। चलन के चक्कर में विलासिता की अंधी प्रतियोगिता में शामिल समाज बर्बादी को नजरअंदाज कर रहा है। महंगाई के कारण आम आदमी का जीना बेहद मुश्किल हो गया है। नौकरी करने वाले और मोटी तनख्वाह पाने वाले लोग महंगाई के कारण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, तो उन 80 फीसदी लोगों का क्या हाल होगा, जिनकी औसतन आमदनी मात्र 20 रूपये प्रतिदिन है? क्या सरकार को तनिक भी इस पहलू का अहसास है? देश में 75 फीसदी करोड़पति मंत्रियों की फौज, गरीबों के खून-पसीने की कमाई पर मौज कर रही है, क्या सरकार को यह जानते हुए भी कोई शर्म अथवा संकोच नहीं होता है? क्या सरकार ने अपना दीन-ईमान इस कद्र बेच खाया है कि उसे उन 121 करोड़ लोगों की उम्मीदों और भावनाओं की जरा भी परवाह नहीं रह गई है, जिन्होंने उन पर ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ के नारे पर विश्वास करके उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपी थी? भारी भ्रष्टाचार के कारण सौ दिन के रोजगार की गारंटी वाली ‘मनरेगा’ योजना भी आम आदमी के साथ छलावा साबित हो रही है और सरकार फिर भी बड़ी बेशर्मी के साथ इसे अपनी ढ़ाल बनाने से बाज नहीं आ रही है?

भारतीय खाद्य निगम तो क्या, अनाज की बर्बादी में मुल्क की सूबाई सरकारें भी पीछे नहीं रहतीं, जो गोदामों से अपने कोटे का अनाज कभी समय से नहीं उठातीं, जिसके चलते अनाज आहिस्ता-आहिस्ता ख़राब होने लगता है। फिर दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली इस कोढ़ में खाज का काम करती है। पीडीएफ में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की शिक़ायतें आम हैं। पूर्व जस्टिस डीपी वाधवा की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी पोल हमारे सामने खोलकर रख देती है। वाधवा कमेटी के मुताबिक़, जन वितरण प्रणाली का 53 फीसदी चावल और 39 फीसदी गेहूं ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता। ज़रूरतमंदों को आवंटित अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में बेच दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक़, साल 2004-05 में 9,918 करोड़ रुपये का अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में पहुंचा तो 2005-06 में यह लूट 10,330 करोड़ रुपये और 2006-07 में यह बढ़कर 11,336 करोड़ रुपये आंकी गई। यानी इन 3 सालों में ज़रूरतमंद ग़रीबों को आवंटित 31,500 करोड़ रुपये का गेहूं-चावल राशन डीलर, नौकरशाह एवं सियासी लीडरों ने आपस में मिल-बांटकर डकार लिया और ग़रीब मुंह ताकता रह गया। 

कुल मिलाकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फैले भ्रष्टाचार से निजात और अनाज के भंडारण की उचित व्यवस्था जब तक सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं होगी, तब तक सरकारी सब्सिडी और अनाज की बर्बादी नहीं रुक पाएगी। देश में हर साल करीब साठ लाख टन अनाज या तो चूहे खा जाते हैं या फिर वो सड़ जाते हैं। अगर अनाज को सही ढंग से रखा जाए तो इससे 10 करोड़ बच्चों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है। करोड़ों का अनाज उचित भंडारण के अभाव में वर्षा, सीलन, कीड़ों और चूहों के कारण नष्ट हो जाता है। यह सिलसिला कब रुकेगा किसी को पता नहीं।भारतीय खाद्य निगम के आकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 से 2010 तक 35 मीट्रिक टन अनाज भंडारण सुविधाओं की कमी की वजह से नष्ट हो गये। उत्तर प्रदेश के हापुड़, उरई और हरदुआगंज स्थित एफसीआई गोदामों में भी हजारों टन अनाज बर्बाद हो रहे हैं। 1997 और 2007 के बीच 1 .83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल, 2।200 लाख टन धान और 111 लाख टन मक्का एफसीआई के विभिन्न गोदामों में सड़ गए।

ऐसा नहीं है कि भारत में खाद्य भंडारण के लिए कोई कानून नहीं है। 1979 में खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत किसानों में जागरूकता पैदा करने और उन्हें सस्ते दामों पर भंडारण के लिए टंकियां उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसके बावजूद आज भी लाखों टन अनाज बर्बाद होता है। तमाम लोग दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी जद्दोजहद में गरीब दम तक तोड़ देते हैं, जबकि सरकार के पास अनाज रखने को जगह नहीं है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। ब्यूरो के अनुसार 2009 में महाराष्ट्र में 2872 जबकि आंध्रप्रदेश में 2474 किसानों ने आत्महत्या की। 2010 से फरवरी 2011 तक सिर्फ मध्यप्रदेश में 348 किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड में यह दुखद आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में सामने आई कुछ रिपोर्टों में भारत में भुखमरी से संबंधित चौकाने वाले आंकड़ें सामने आए हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय, 2010 में भारत द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार कुछ आंकड़ें सहारा के आस पास के अफ़्रीकी देशों में पाए जाने वाले भुखमरी के संकेतकों से भी कहीं अधिक खराब हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भुखमरी से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग भारत में निवास करते हैं।

सरकारी गोदामों में अनाज के बर्बाद होने का यह पहला मामला नहीं। पिछले कई वर्षो से यह शर्मनाक सिलसिला कायम है। संप्रग सरकार 2004 से सत्ता में है और खास बात यह है कि तब से कृषि एवं खाद्य मंत्रालय पर शरद पवार ही काबिज हैं। पिछले साल केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में 11 हजार टन खाद्यान्न के खराब हो जाने की बात स्वीकारी थी। देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। एक जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया है।
 
वर्ष स्थिति
2009 – 2010 2 हजार टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ
2008 – 2009 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल खराब हुआ
2007 – 2008 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ
कुल : तीन साल साल में लगभग 58 हजार टन अनाज खराब हुआ।

इस तरह इस साल तक खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार साल में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज यूं ही बरबाद हो गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने भूख से लड़ने के लिए कारगर उपाय नहीं किए हैं। देश में आज खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम 2006 के तहत खाद्य पदार्थो और शीतल पेय को सुरक्षित रखने के लिए विधेयक संसद से पारित हो चुका है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, नरेगा, मिड डे भोजन, काम के बदले अनाज, सार्वजानिक वितरण प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा नेट, अंत्योदय अन्न योजना आदि कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि सभी देशवासियों की भूख मिटाने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से जीवनयापन के लिए रोजगार परक आय व पोषणयुक्त भोजन मिल सके। लेकिन कागजों पर बनने वाली यह योजनाएं जमीन पर कितनी अमल की जाती हैं इसका अंदाज आप भारत में भूख से मरने वाले लोगों की संख्या से लगा सकते हैं।
अन्न की बर्बादी एक अपराध है’ वर्ष 2010 में अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गरीबों की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है। 

अनाज को सड़ाने के बजाय जरुरतमंदों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और हर साल की तरह फिर मध्यप्रदेश और पंजाब में हजारों बोरी गेंहू बिना किसी रखरखाव से सड़ गया। इंद्र देव की ‘कृपा’ पर आश्रित राज्य सरकारें अन्न भंडारण की चुनौती के आगे बेबस नजर आ रही हैं। कुपोषण से होने वाली मौतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा था कि केंद्र से आवंटित अनाज ले जाकर गरीबों में बांटे। गांवों में आज भी 23 करोड़ लोग अल्प पोषित हैं, जबकि पचास फीसदी बच्चों की मौत की वजह कुपोषण है। देश की किसी भी सरकार के लिए यह शर्म की बात है कि दुनिया की 27 फीसदी कुपोषित जनसंख्या भारत में रहती है। इन विरोधाभासों के बीच यदि सरकार खाद्य सुरक्षा की बात करती है तो उसकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बारे में गंभीरता से विचार करें और देश की जन-कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी फायदे के हिसाब से लागू करने के बजाय सभी राजनीतिक पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार करें।

11 May 2013

सर्वप्रथम क्या देश या धर्म ?

                            उठो देशवासियों रणभेरी बज चुकी, मात्र-भूमि की पुकार है,
                                जो अब भी ना जागे तो तुम्हारे जीवन पर धिक्कार है।
                                रहे चुप तुम कई वर्शों तक अब तोड़ो दास्तां की बेड़ीयाँ,
                          करो भारत माता को सर्वस्व समर्पित यह तुमहारा अधिकार है।

जी हां आज हम एैसे इसलिए कह रहे है क्योंकि देश में आज कुछ एैसे कट्टरपंथी अपना पांव पसार रहें है जो राश्ट्र की एकता और अखंडता को धराशायी करना चाहते है। बात चाहे आज संसद में राष्ट्रगीत की अपमान का हो या फिर फतवे के मार्फत धर्म के नाम पर देश को बांटने की, हर ओर आज एक ही सवाल हर हिन्दुस्तानी पुछ रहा है की सर्वप्रथम क्या देश या धर्म। कुछ कट्टरपंथी तो ये भी मानते है की देश सीमाओं में बंधा हो सकता है मगर धर्म को कोई सीमा नही बांध सकती मगर देश से ही धर्म की सुरूआत होती है ये बात ये भूल जाते है। सवाल ये भी पैदा होता है की उनके लिए सर्वप्रथ देश पहले है या उनका धर्म। भारत एक ऐसा देश है जो सभी धर्मो का सम्मान करता है, इसलिए यहा बात देश की होती है फिर हम देश का सम्मान क्यों नही कर पाते आज ये एक गंभीर मुद्दा बन चुका है, जो देश और समाज को तोड़ने की दिषा चल रहे इस्लामिक सड्यंत्र का हिस्सा है। आज जाकिर और ओवैषी जैसे धार्मिक उन्माद फैलाने वाले लोग धर्म के सम्मान में देशको आड़े लाते है, और धर्म को देश से उपर बताते है। 


आज अल्पसंख्यक वोट बैक इस कदर महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारे नेता देश और संस्कृति की चिन्तन को स्वयं ही नष्ट करनें की दिषा में हर समय अपना दुष्चक्र चलाने पर अमादा हैं। यहा सवाल उठता है कि क्या आज के सेकुलवादी युग में अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को देश से उपर समझने लगा है। क्या आज बंदे मातरत का विरोध और हिन्दु देवा देवताओं के अपमान से ही हमारे देश के अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को सुरक्षित रख पाएगा या फिर देश के अंदर इस्लामिक कट्टरता को बढ़ावा देकर, ये एक महत्पूर्ण सवाल आज के संदर्भ में हर ओर लोग इस समुदाय से पूछ रहे है।

इस भारतभूमी की रक्षा का इतिहास हमेशा से ही भारत मां के चरणों में शीश झुकाने और सरहदों पर शहीद होने वाले जवांजों ने की है, एैसे में सर्वप्रथम हर हिन्दुस्तानी के अंदर पहले राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना हमेशा रहती है। देश की सनातन वैदिक के अनुसार राष्ट्र की रक्षा करना पहला कर्तव्य है और राष्ट्र क्या है उसको भी धर्म परिभाषित करता है। एैसे में सवाल उन मजहवी उन्माद फैलाने वाले इस्लाम के ठेकेदारों से है की आखिर किस मकसद से धर्म को राष्ट्र से उपर बताते है। इसलिए आज हम पुछ रहें है की सर्वप्रथ क्या देश या धर्म ?

10 May 2013

क्या वन्दे मातरम का विरोध देशद्रोह नहीं है ?

                             यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
                          तुमने इसे अपमान किया, खण्डित भारत का मान किया॥
                       वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है, तूने कैसे मान लिया॥
                             यह वंदेमातरम शब्द नहीं यह भारत माँ की पूजा है।
   

इस देश की आजादी का अगर इसे महामंत्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा। देश के सभी क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस महामंत्र का प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए किया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो। मगर आज ऐसा लगता है की हमारे देश के माननीय अपने आप को संसद, संविधान और राष्ट्र से भी उपर समझने लगे है। वंदे मातरम् का बॉयकॉट करके बसपा के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने एक बार फिर शहीदों का अपमान किया है। साथ ही राश्ट्रगान का अपमान के अलावे उन्होने लोकसभा कार्य संचालन विधि का भी उलंघन किया है। लोकसभा कार्य संचालन विधि के अनुसार कोई भी सांसद सदन से बाहर नहीं जा सकता है, जब राष्ट्रगीत बज रहा हो। क्या ये संसद और संविधान का घोर अपमान नहीं है। क्या ये सदन का अवमानना नहीं है। क्या एैसे सांसद को देषद्रोही घोशित नहीं करना चाहिए? क्या ये मानमीय अपने आप को लगता है इस्लाम के खिलाफ वंदे मातरम् बताने वाले महोदय खुद हिंदुस्तान के इतिहास से अनजान हैं। बीएसपी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का कहना है कि वंदेमातरम इस्लाम के खिलाफ है इसलिए वह लोकसभा छोड़कर चले गए थ। ये एक सांसद हैं लेकिन ये नहीं जानते कि वंदे मातरम् के विवाद को बरसों पहले ही मौलाना आजाद जैसे राजनीतिज्ञ सुलझा चुके हैं। मगर 21वीं सदी में भी शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेता बार-बार  विवाद का जन्म दे रहें हैं। इस्लाम भी इस बात कि इजाजत नहीं देता कि आप राष्ट्र के प्रतीकों का अपमान करें।

तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की आखिर ये मानमीय किस अधार पर ऐसे हरकत कर रहे है? क्या ये किसी साजि़स का हिस्सा है, या किसी अंतराश्ट्रीय अलगावादीयों के कहने पर एैसा कर रहे है? कोई इसे ‘तालिबानी आचरण’ करार दे रहा है तो कोई राश्ट्रद्रोह, मगर यहा सवाल ये है की संविधान निर्माता बाबा साहेब आम्बेडकर के नाम और विचारधारा के साथ सर्वजन हिताय सर्वजनय सुखाय की नारा देने वाली बसपा आज चुप क्यों है। क्या एैसे सांसद की सदस्यता तुरंत नहीं होनी चाहिए ? ये महज संसद में राष्ट्र गीत का अपमान नहीं है। यह हर हिंदुस्तानी की देशभक्ति को लगी गहरी चोट है। शफीकुर्रहान बर्क के खिलाफ देश भर में गुस्सा और आक्रोष का माहौल है। वंदेमातरम यूथ बिग्रेड की ओर से राष्ट्र गीत का अपमान करने पर बसपा सांसद के खिलाफ थाना शाहगंज में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया है। विश्व के अनेक देशों के राष्ट्र गीत तो एैसे है की जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्वयं के देश की प्रजा के स्वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। इस्लाम के नाम पर जिहाद जायज है तो क्या उनका इस्लाम राष्ट्रीयता का पाठ नही पढ़ाता है। ये सवाल शफीकुर्रहान बर्क जैसे हर भारतीय से है जो ऐसी भावनाएँ और शब्द हमें एक देश के नागरिक होने के बावजूद भी आत्मीय रूप से बिभाजित करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, वन्दे मातरम् का विरोध देशद्रोह नहीं है।