24 September 2013

मुजफ्फरनगर दंगों की सच से कोसों दूर सेकुलर मीडिया !

मुजफ्फरनगर दंगे में मुस्लिम परस्त मीडिया रिपोर्टिंग ने एक ओर जहां मीडिया आचार संहिता की धज्जियां उड़ायी हैं वहीं एक बड़े संवैधानिक नियामक की भी जरूरत महसूस हुई है जो दंगों के दौरान मीडिया की रिपोर्टिंग की जांच/समीक्षा करे और तथ्यगत विरोधी व एकतरफा या किसी परस्ती का शिकार होकर रिपोर्टिंग करने वाले मीडिया समूहों और मीडियाकर्मियों को दंडित कर सके और उन्हें सच का आईना भी दिखा सके। प्रिंट मीडिया ने एक हद तक संतुलित रिपोर्टिंग की है वहीं वेब मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सरासर झूठ और तथ्यारोपित और सनसनी फैलाने वाली कवरेज की है। विदेशी मीडिया बीबीसी से लेकर आईबीएन सेवन, एनडीटीवी और न्यूज 24 जैसे चैनल सिर्फ हिन्दुओं को ही खलनायक के तौर पर दिखाया और ऐसा वातावरण तैयार करने की भरपूर कोशिश भी की है कि दंगे में सर्वाधिक हताहत होने वाला समुदाय मुस्लिम ही है। दंगे की शुरूआत और भड़काउ भाषण देने का आरोपी भी हिन्दुओं को ही ठहराया गया है

लव जेहाद और महिला हिंसा के तथ्यात्मक घटनाओं को सिरे से गायब कर दिया गया। दंगे की बुनियाद लव जेहाद और महिला हिंसा थी। अगर इस तह को मीडिया खोलती तो निश्चिततौर मुस्लिम समुदाय और उनके नेताओं की करतूत सामने आती और यह भी आम लोगों को मालूम होता कि न सिर्फ मुजफ्फरनगर में बल्कि सहारनपुर, शामली, अलीगढ़, आगरा जैसे दर्जनों जिलों में हिन्दू किस तरह अपनी बहू-बेटियों की रक्षा करने के लिए चिंतित और प्रताडि़त हैं। क्या यह सही नहीं है कि महिला हिंसा के आरोपी शाहनवाज के पक्ष में मुसलमानों ने दंगे की शुरूआत की थी? क्या यह सही नहीं है कि महिला हिंसा के दोषी शाहनवाज के पक्ष में हजारों मुसलमानों की भीड़ ने महिला हिंसा की शिकार युवती के भाई गौरव और सचिन की हत्या नहीं की थी? जब मुसलमानों की भीड़ नमाज के बाद बलवा करने के लिए सड़कों पर उतर सकती है और कहीं भी और कभी भी हिंसा कर सकती हैं, प्रशासन और सरकार मूकदर्शक बन देखती रहेगी तब हिन्दुओं को क्या अपनी-बेटियों बहुएं बचाने और आत्मस्वाभिमान से जीने के लिए संगठित होने का अधिकार नहीं है क्या

अगर मीडिया का आचरण और मीडिया का व्यवहार सही में निष्पक्ष होता व मीडिया सही में धर्मनिपेक्ष होता तो यह जरूर दिखाया जाता और प्रसारित किया जाता कि कैसे और किस मस्जिद से निहत्थे हिन्दुओं पर गोलियां चली थीं, किस मस्जिद से चली गोलियां पत्रकार राजेश वर्मा और फोटोग्राफर की जान ली थी, मस्जिद को इबाबत का घर कहा जाता है जहां पर हथियार और हिंसा की अन्य वस्तुएं रखना इस्लाम विरोधी माना जाता है पर मस्जिद में हथियार छुपा कर रखे गये थे, मस्जिद में छिपा कर रखे गये हथियारों से ही निहत्थे हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया हैं। बहू-बेटी बचाओ पंचायतमें आये निहत्थे हिन्दुओं का कत्लेआम करने वाली मुस्लिम आबादी क्या सत्य-अहिंसा की पुजारी या फिर इनोसेंट हो सकती है? तथाकथित सेक्युलर मीडिया की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की यह कैसी अवधारणा है?

तथाकथित सेक्युलर मीडिया की धर्मनिरपेक्षता व सांप्रदायिकता की अवधारणा न तो लोकतांत्रिक मानी जा सकती है और न ही संविधान-कानून की कसौटी पर चाकचैबंद मानी जा सकती है। तथाकथित सेक्युलर मीडिया की यह अवधारणा पूरी तरह से ध्वंस होनी चाहिए कि मुस्लिम आबादी अगर नमाज के बाद वहशी भीड़ की तरह सड़कों पर दौड़ लगाये, सरेआम हिंसा करे, बहुसंख्यक आबादी को भयभती करे, मुस्लिम नेता सरेआम आपतिजनक भाषण दे, भड़काउ मानसिकता का प्रचार-प्रसार करें और दलीय सीमा लांघ कर एकजुट होकर दंगा-फसाद करें तो भी ये धर्मनिरेपक्ष कहलाये, पर बहुसंख्यक आबादी अपनी बहू-बेटियों को बचाने के लिए और मुस्लिम आबादी की दंगाई मानसिकता, दंगाई भय और लव जेहाद के खिलाफ सभा करें, एकजुट होने के लिए संगठित हों तो तथाकथित सेक्युलर मीडिया हिन्दुओं की इस एकजुटता को सांप्रदायिकता मान बैठती है। मुस्लिम नेता और मुस्लिम मुल्ला-मौलवी जब आतंकवादियों के पक्ष में सरेआम खड़े होते हैं, कसाब और अफजल गुरू जैसे दुर्दांत आतंकवादियों के पक्ष में मुस्लिम नेता-मुस्लिम मुल्ला-मौलवी खड़े होते हैं तो भी इनकी धर्मनिरपेक्षता की पदवी दी जाती हैं, ये मीडिया के लिए सम्माननीय होते हैं। 

इसका दुष्परिणाम भयानक होता है, दुष्परिणामों में मुस्लिम कट्टरता, मुस्लिम दंगाई मानसिकता, परसंप्रभुता की पैरवी और परसंप्रभुता के हित साधने जैसे राष्ट्रविरोधी कारनामें शामिल है। बीबीसी ऐसे तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उपज है, इसकी पृष्ठभूमि में ब्रिटिश उपनिवेवाद को प्रचारित-स्थापित करने और अप्रत्यक्षतौर ईसाइत संस्कृति की रक्षा करने जैसे एजेंडे थे। यही कारण है कि जब प्रसंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद का होता है या फिर ब्रिटिश महराजा-महारानी से जुड़ा हुआ होता है तो बीबीसी की पत्रकारिता की धार स्वतः जमींदोज हो जाती है। अगर-मगर में बीबीसी की पत्रकारिता सिमट जाती है। बीबीसी अपने आपको निष्पक्ष पत्रकारिता का सिरमौर कहता है लेकिन भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी खबरों को वह उछालने की किसी भी हद को पार कर सकता है। बीबीसी में कार्यरत मुस्लिम पत्रकारों को हिन्दुओं के खिलाफ कुछ भी लिखने की छूट होती है।
 
मुजफ्फरनगर दंगे में ही बीबीसी की मुस्लिम पत्रकारों की रिपोर्टिंग आप खुद देख लीजिये। बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा छह सितम्बर को अपनी रपट आखिर क्यों हैं मुजफ्फरनगर में तनावशीर्षक से खबर झूठी और इस्लामिक जेहाद से प्रेरित है। मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा अपनी रिपोर्टिंग में लिखता है कि दंगे की शुरूआत शाहनवाज और गौरव के बीच रास्ते में किसी बात को लेकर हुई थी। जबकि इसके पीछे महिला से छेड़छाड़ थी। गौरव की बहन से शाहनवाज पिछले एक साल से छेड़खानी कर रहा था, एक बार शाहनवाज गौरव की बहन का अपहरण तक करने का प्रयास किया था। ऐसे में गौरव ने शाहनवाज की हत्या जैसे कदम उठाया। शाहनवाज एक महिला हिंसा का अपराधी था जिसके पक्ष में पूरी मुस्लिम आबादी खड़ी हो गयी और सैकड़ों की भीड़ ने गौरव और उसके ममेरे भाई सचिन की हत्या निर्ममतापूर्वक की थी। अगर बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार निष्पक्ष होता और वह इस्लामिक कट्टरता से मुक्त होता तो यह लिखता कि शाहनवाज एक महिला हिंसा का अपराधी था। महिला हिंसा का अपराधी शाहनवाज के पक्ष में मुस्लिम आबादी ने एकजुट होकर दंगे की शुरूआत की थी।

जाटों के बेटी-बहु बचाओं पंचायतपर मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा ने लिखा कि जाटों की पंचायत में भड़काने वाले गैरजिम्मेदाराना भाषण दिये गये थे? पर उसने नहीं लिखा कि किस प्रकार मुस्लिम आबादी ने नमाज अदा करने के बाद अराजक भीड़ एक बार नहीं बल्कि कई बार उतरी और मुस्लिम नेताओं व मौलानाओं ने हिन्दुओं का कत्लेआम करने जैसे भड़काउ भाषण दिये थे? बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा ने अपने रिपोर्ट मे मुस्लिम नेताओं के भड़काउ और जेहादी भाषणों को छिपा दिया। प्रमाणित तथ्य भी आप यहां देख लीजिये। जाटों के बहू-बेटी बचाओ पंचायत के पूर्व मुस्लिम आबादी ने धारा 144 तोड़कर बडी सभा की थी, सभा में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के सांसद कादिर राणा, समाजवादी पार्टी के नेता राशिद सिद्धीकी और कांग्रेस के नेता सैयद उज्ममा जैसे मुस्लिम नेताओं ने हिन्दुओं के खिलाफ भड़काउ भाषण दिये थे, इतना ही नहीं बल्कि भारतीय संप्रभुता के खिलाफ भी भाषण दिया गया था, सबसे चिंताजनक बात यह थी कि मुजफफरनगर जिले का डीएम और एसएसपी ने मंच पर जाकर ज्ञापन लिया था। 

अगर दिलनवाज पाशा ईमानदार होता तो यह जरूर लिखता कि जाटो की पंचायत के पूर्व मुस्लिम नेता कादिर राणा, राशिद सिद्धीकी, सैयद उज्मामा और मुल्ला-मौलवियां ने धारा 144 को तोड़कर सभा की थी और हिन्दुओं के खिलाफ आपत्तिजनक व भडकाऊ भाषण दिये थे। सिर्फ मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा की ही बात नहीं है बल्कि बीबीसी में जितने भी मुस्लिम पत्रकार हैं सभी के मुस्लिम प्रेम और मुस्लिम जेहाद हावी रहता है, हिन्दू विरोधी और भारत विरोधी खबरें देने की इनकी प्राथमिकता होती है। अब यहां यह सवाल उठता है कि क्या बीबीसी सिर्फ हिन्दू विरोधी-भारत विरोधी और मुस्लिम जेहाद की प्राथमिकता से ही मुस्लिम पत्रकारों की नियुक्ति करता है। अगर नहीं तो फिर बीबीसी के मुस्लिम पत्रकारों की रिर्पाेटिंग निष्पक्ष और संतुलित क्यों नहीं होती है, मुस्लिम परस्ती इन पर क्यों होवी है? इस पर बीबीसी संज्ञान लेता क्यों नहीं है? एनडीटीवी की दंगे की रिपोर्टिंग तो और भी खतरनाक और एकतरफा होने के साथ ही साथ पत्रकारिता के मान्यदंडों को तार-तार करने वाला है? एनडीटीवी की अराजक, सनसनी फैलाने वाली, एकतरफा रिपोटिंग को बड़े-बड़े मीडियाकर्मी और अपने आप को सेकुलर कहने वाले लोग भी पचा नहीं पाये हैं। 

बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व संपादक विजय राणा तक को एनडीटीवी के खिलाफ खड़ा होकर विरोध करना पड़ा है। विजय राणा अपनी बात में कहते हैं कि एनडीटीवी ने मुजफ्फरनगर दंगे की रिपोर्टिंग एकतरफा की थी, मीडिया आचरण कोड की धज्जियां उड़ायी गयी, ऐसी खतरनाक रिपोटिग का मकसद साफ है। दरअसल एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन ने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान जाटों को खलनायक के तौर पर प्रस्तुत किया और यह स्थापित करने की कोशिश की कि दंगों के लिए सिर्फ और सिर्फ जाट ही दोषी हैं। उसने भी सचिन-गौरव की मुस्लिम आबादी की हिंसक भीड़ द्वारा हत्या कर दंगे की शुरूआत करने और महिला हिंसा-छेड़छाड़ को सिरे से गायब कर दिया। 

मीडिया ने स्वयं एक आचरण कोड बनाया है। मीडिया आचरण कोड के अनुसार दंगे में प्रभावित परिवार की जाति और धर्म से जुड़ी जानकारियां नहीं देनी है पर एनडीटीवी का पत्रकार श्रीनिवासन जैन अपनी लाइव रिपोर्टिंग में दिखाता है कि मुस्लिम निर्दोष हैं, मुस्लिम डरे हुए हैं, अपने घरों से पलायन कर रहे हैं, जाट मुस्लिम आबादी की हत्या कर रहे हैं? ‘बेटी-बहू बचाओ पंचायतसे निहत्थे लौट रहे जाटों पर कैसे मुस्लिम आबादी ने गोलियों से भूना, अन्य हथियारों से कत्लेआम किया, दंगे में मारे गये जाट के परिजन और हिन्दुओं के जलाये घर, हिन्दुओं की लूटी गयी संपतियों और किस प्रकार से हिन्दू डरे हुए हैं उसकी न तो श्रीनिवासन जैन ने खोज-खबर ली व न ही उसकी लाइव वीडियो दिखायी, इतना ही नहीं बल्कि हताहत और प्रताडि़त हिन्दू पजिनों से प्रमुखता व गंभीरता से वाइट भी नहीं ली गई। श्रीनिवासन जैन के संबंध में जो जानकारी मिली है वह यह है कि श्रीनिवासन जैन कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि का है जिसके उपर हिन्दू विरोध और मुस्लिम परस्ती हावी रहती है। सवाल यह उठता है कि क्या पत्रकारिता में भी श्रीनिवासन जैन जैसे कम्युनिस्ट अपनी मुस्लिम परस्ती और कम्युनिस्ट विचारधारा को तुष्ट कर सकते हैं? क्या ऐसा करने का पत्रकारिता का मूल्य इजाजत देता है? श्रीनिवासन और बरखा दत्त जैसे टाटा-राडिया संस्कृति, भ्रष्टाचार और मुस्लिम परस्तों से एनटीटीवी भरा पड़ा है।  

एनडीटीवी का सरगना प्रणव राय के दूरदर्शन में किये गये मान्य-अमान्य खेल के किस्से अभी मीडिया में तैरते रहते हैं। चैनल पत्रकार राजेश वर्मा को मुस्लिम दंगाइयों ने मारा डाला। मुस्लिम दंगाइयों ने राजेश वर्मा को इसलिए मार डाला कि वह मुस्लिम दंगाइयों की करतूत और हिंसा के साथ ही साथ निहत्थे हिन्दुओं के कत्लेआम का लाइव वीडियो संकलित करा रहा था। फोटोग्राफर के कैमरे में राजेश वर्मा की हत्या की पूरी कहानी है कि किस मस्जिद से गोलियां चल रही थी, गोलिया चलाने वाले मुस्लिम दंगाई कौन थे, इन दंगाइयों को सह देने वाले मुस्लिम नेता कौन-कौन थे, यह सब प्रमाण के तौर पर उपलब्ध है। लेकिन टीवी चैनलों ने पत्रकार राजेश वर्मा की हत्या की पूरी परते खोली ही नहीं। सिर्फ राजेश वर्मा की तस्वीर लगा कर एक-दो लाइन का टिकर चला दिया गया। आखिर मुस्लिम दंगाइयों का शिकार एक कर्तव्यनिष्ट पत्रकार होता है और राजेश वर्मा को इसलिए शहीद होना पड़ा कि उसकी रिकार्डिंग और कवरेज मुस्लिम दंगाइयों की करतूत की तह-तह खोलने वाला था। अगर चैनल ईमानदार होते, इनमें कर्तव्यनिष्ठा होती, इन पर निष्पक्षता का भार होता और इन्हें अपनी विश्वसनीयता की चिंता होती तो चैनल जरूर राजेश वर्मा की हत्या पर एक-दो घंटे का न्यूज पैकेज बनाते। एक-दो घंटे का न्यूज पैकेज चलाने की बात तो दूर रही पर चैनलों ने एक-दो मिनट का न्यूज पैकेज नहीं बनाया। 

शहीद हुए पत्रकार राजेश वर्मा के परिजन किस तरह से बेहाल है, मुस्लिम दंगाइयों के प्रति राजेश वर्मा के परिजनों की सोच क्या है, यह भी दिखाने की जरूरत चैनलों ने नहीं समझी? विनोद कापडी जैसे पत्रकार जरूर राजेश वर्मा की शहादत पर चितिंत हैं और राजेश वर्मा के परिजनों के मदद के लिए आगे आये हैं। चैनल मठाधीश पूरी तरह से राजेश वर्मा की शहादत पर चुप्पी साधे बैठे हैं। खासकर जाटों को अन्यायी, शोषक और हिंसक बताने और दिखाने की मीडिया में होड़ है। जबकि मुस्लिम आबादी को शांत, सत्य व अहिंसा का पुजारी, हिंसा-आतंकवाद से दूर रहने वाला साबित करने की होड़ लगी है। जबकि सच्चाई यह है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में सिर्फ जाट ही क्यों, बनिया, ठाकुर, ब्राह्मण, दलित-पिछड़े सभी मुस्लिम आबादी की हिंसा, मुस्लिम आबादी का लव जेहाद, मुस्लिम आबादी द्वारा हिन्दू महिला हिंसा का शिकार हैं।
 
मुजफ्फरनगर में गौरव की बहन के साथ छेड़छाड़ और उसे मुस्लिम अपराधी शाहनवाज द्वारा अपहरण करने के प्रयास की अकेली घटना भी तो नहीं है। हाल के तीन-चार महीनों में एक पर एक कई ऐसी लोमहर्षक और चिंता में डालने वाली हिन्दू लड़कियों के साथ मुस्लिम युवकों ने सामूहिक तौर पर बलात्कार किये हैं। हरिद्वार जाते हुए मुजफ्फरनगर के मुस्लिम राजनीतिज्ञों के युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं भी कम उल्लेखनीय नहीं है। मुस्लिम आबादी हिन्दुओं की बहू-बेटियों के साथ सरेआम हिंसा करते हैं फिर भी उनका विरोध करना गुनाह है। हिन्दू जब विरोध करता है तब मुस्लिम आबादी एकजुट होकर हिंसा पर उतर आती है। पहले होता यह था कि सिर्फ पीडि़त हिन्दू ही विरोध के लिए आगे आता था और न्याय की मांग करता था, इसलिए उसकी विरोध की आवाज दबा दी जाती थी। चूंकि जाट एक सशक्त जाति है और उसने यह महसूस भी किया कि जब तक वे संगठित नहीं होंगे तब तक उनकी बहू-बेटियों की इज्जत बचने वाली नहीं है। इसीलिए जाटों ने बहू-बेटी पंचायतकी थी।

टीवी पत्रकार राजेश वर्मा को मुस्लिम दंगाइयों ने मारा डाला। मुस्लिम दंगाइयों ने राजेश वर्मा को इसलिए मार डाला कि वह मुस्लिम दंगाइयों की करतूत और हिंसा के साथ ही साथ निहत्थे हिन्दुओं के कत्लेआम का लाइव वीडियो संकलित करा रहा था। फोटोग्राफर के कैमरे में राजेश वर्मा की हत्या की पूरी कहानी है कि किस मस्जिद से गोलियां चल रही थी, गोलिया चलाने वाले मुस्लिम दंगाई कौन थे, इन दंगाइयों को सह देने वाले मुस्लिम नेता कौन-कौन थे, यह सब प्रमाण के तौर पर उपलब्ध है।

फिर मुस्लिम आबादी को डर भी नहीं होता क्योंकि उन्हें मालूम है मुलायम-अखिलेश की सरकार उनकी है और मुलायम-अखिलेश की सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं करेगी? मुलायम-अखिलेश को भी यह मालूम है कि अगर उन्होंने मुस्लिम दंगाइयों, मुस्लिम अपराधियों, मुस्लिम लव जेहादियों के खिलाफ कार्रवाई की तो फिर उन्हें मुस्लिम वोट मिलेगा नहीं? अगर ऐसा नहीं होता तो फिर गौरव-सचिन की निर्ममतापूर्वक हत्या के लिए दोषी सैकड़ों मुस्लिम आबादी की भीड़ पर कार्रवाई जरूर होती। उल्टे अपनी बहन की इज्जत बचाने में शहीद हुए गौरव-सचिन के परिजनों के खिलाफ ही मुलायम-अखिलेश की सरकार, प्रशासन और पुलिस ने मुकदमा ठोक दिया। क्या यह सब मीडिया को मालूम नहीं है फिर भी मीडिया हिन्दुओं को दंगाई साबित करने के लिए जेहादी बन चुका है।

भारतीय मीडिया पर अरब देशों और पाकिस्तान से करोड़ों-अरबों डॉलर बरस रहे हैं। गुजरात दंगों पर मुस्लिम परस्त रिपोर्टिंग करने के लिए अरब देशों से चैनलों और अंग्रेजी अखबारों को करोड़ों-अरबों रुपये दिये गये थे। पाकिस्तान की आतंकवादी गुप्तचर ऐजेंसी आईएसआई ने अपने समर्थक एक पत्रकार संगठन भी भारत में खड़ा कर रखा है। अप्रत्यक्षतौर पर आईएसआई समर्थक और फंडित वह पत्रकार संगठन दक्षेस की राजनीति करता है। वह पत्रकार संगठन अपने पाकिस्तान प्रेम और मेलजोल के माध्यम से भारत की जनमानस की धारणाएं बदलने और पाकिस्तान परस्ती के लिए अप्रत्यक्षतौर पर सक्रिय होता है। ईरान के पैसे पर भारत में आतंकवाद फैलाने वाले एक मुस्लिम पत्रकार की गिरफतारी भी हो चुकी है। वह मुस्लिम पत्रकार इजरायल दूतावासकर्मी की गाड़ी में स्टिकर बम रखने का सहदोषी है। वह मुस्लिम पत्रकारों को ईरान से करेंसी मिलती थी जिसके बदौलत वह भारत में इजरायल विरोधी आतंकवाद की संरचना और सक्रियता में शामिल था, यह निष्कर्ष कोई मेरा नहीं है बल्कि दिल्ली पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों का है। आतंकवादी जेहाद में लगे उस मुस्लिम पत्रकार जमानत पर छूटा और फिर दनादन उसने अपना नया-पुराना अखबार लांच कर दिया, उसके अखबार के लांचिंग में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के साथ ही साथ बड़े-बड़े मुस्लिम नेता थे। जब आतंकवादी जेहाद में आरोपित और पत्रकार का चोंगा पहनने वालों के साथ जब शीला दीक्षित और उनकी दिल्ली की सरकार खड़ी होगी तब आप उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि मुस्लिम आबादी अपनी कट्टरता और आतंकवादी मानसिकता छोड़ देगी। चैनलों और पत्रकार संगठनों को अगर मुस्लिम देशों और भारत को तोड़ने वाली शक्तियों से पैसे नहीं मिलते तो फिर इनकी मुस्लिम परस्ती क्यों चलती है?

बात तो यहां तक उठी है कि चैनलों ने मुस्लिमपरस्त रिपोर्टिंग के लिए मुलायम-अखिलेश सरकार से भी डील किये हैं। भारत सरकार और भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को सबकुछ मालूम है कि चैनलों और अंग्रेजी अखबारों के किस मुस्लिम देश से पैसे मिलते हैं, किस मुस्लिम देश से सभी मान्य-अमान्य सुविधाएं मिलती हैं? लेकिन कांग्रेस की सरकार चैनलों और अंग्रेजी अखबारों पर कार्रवाई ही नहीं करना चाहती है। आखिर क्यों? इसका जवाब यह है कि कांग्रेस खुद मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुत्व को लांक्षित करने, बदनाम करने और हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने में लगी हुई है। कहने का अर्थ यह है कि कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक जेहाद में मुस्लिम देशों के पैसों पर पलने वाले चैनल और अंग्रेजी अखबार सहभागी-सहयोगी हैं, ऐसे में कांग्रेस की केन्द्रीय सरकार मुस्लिम देशों के पैसों पर पलने वाले चैनल और अखबारों पर कार्रवाई क्यों करेगी? खासकर चैनलों को संवैधानिक आचार संहिता में बांधने की बात हमेशा उठती रहती है। पर चैनल संवैधानिक आचार संहिता में बांधने के विरोधी हैं।

मुजफ्फरनगर में दंगे के लाइव प्रसारण में जिस तरह से एकतरफा और मुस्लिम परस्त रिपोर्टिंग हुई है और मीडिया इथिक्स की धज्जियां उड़ायी गयी उसके खिलाफ संज्ञान कौन लेगा? लव जेहाद और महिला हिंसा के तथ्यात्मक घटनाओं को सिरे से गायब कर दिया गया। दंगे की बुनियाद लव जेहाद और महिला हिंसा थी। अगर इस तह को मीडिया खोलती तो निश्चिततौर मुस्लिम समुदाय और उनके नेताओं की करतूत सामने आती और यह भी आम लोगों को मालूम होता कि न सिर्फ मुजफ्फरनगर में बल्कि सहारनपुर, शामली, अलीगढ़, आगरा जैसे दर्जनों जिलों में हिन्दू किस तरह अपनी बहू-बेटियों की रक्षा करने के लिए चिंतित और प्रताडि़त हैं। क्या यह सही नहीं है कि महिला हिंसा के आरोपी शाहनवाज के पक्ष में मुसलमानों ने दंगे की शुरूआत की थी? क्या यह सही नहीं है कि महिला हिंसा के दोषी शाहनवाज के पक्ष में हजारों मुसलमानों की भीड़ ने महिला हिंसा की शिकार युवती के भाई गौरव और सचिन की हत्या नहीं की थी? जब मुसलमानों की भीड़ नमाज के बाद बलवा करने के लिए सड़कों पर उतर सकती है और कहीं भी और कभी भी हिंसा कर सकती हैं, प्रशासन और सरकार मूकदर्शक बन देखती रहेगी तब हिन्दुओं को क्या अपनी-बेटियों बहुएं बचाने और आत्मस्वाभिमान से जीने के लिए संगठित होने का अधिकार नहीं है क्या?  

अगर मीडिया का आचरण और मीडिया का व्यवहार सही में निष्पक्ष होता व मीडिया सही में धर्मनिपेक्ष होता तो यह जरूर दिखाया जाता और प्रसारित किया जाता कि कैसे और किस मस्जिद से निहत्थे हिन्दुओं पर गोलियां चली थीं, किस मस्जिद से चली गोलियां पत्रकार राजेश वर्मा और फोटोग्राफर की जान ली थी, मस्जिद को इबाबत का घर कहा जाता है जहां पर हथियार और हिंसा की अन्य वस्तुएं रखना इस्लाम विरोधी माना जाता है पर मस्जिद में हथियार छुपा कर रखे गये थे, मस्जिद में छिपा कर रखे गये हथियारों से ही निहत्थे हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया हैं। बहू-बेटी बचाओ पंचायतमें आये निहत्थे हिन्दुओं का कत्लेआम करने वाली मुस्लिम आबादी क्या सत्य-अहिंसा की पुजारी या फिर इनोसेंट हो सकती है? तथाकथित सेक्युलर मीडिया की धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की यह कैसी अवधारणा है

तथाकथित सेक्युलर मीडिया की धर्मनिरपेक्षता व सांप्रदायिकता की अवधारणा न तो लोकतांत्रिक मानी जा सकती है और न ही संविधान-कानून की कसौटी पर चाकचैबंद मानी जा सकती है। तथाकथित सेक्युलर मीडिया की यह अवधारणा पूरी तरह से ध्वंस होनी चाहिए कि मुस्लिम आबादी अगर नमाज के बाद वहशी भीड़ की तरह सड़कों पर दौड़ लगाये, सरेआम हिंसा करे, बहुसंख्यक आबादी को भयभती करे, मुस्लिम नेता सरेआम आपतिजनक भाषण दे, भड़काउ मानसिकता का प्रचार-प्रसार करें और दलीय सीमा लांघ कर एकजुट होकर दंगा-फसाद करें तो भी ये धर्मनिरेपक्ष कहलाये, पर बहुसंख्यक आबादी अपनी बहू-बेटियों को बचाने के लिए और मुस्लिम आबादी की दंगाई मानसिकता, दंगाई भय और लव जेहाद के खिलाफ सभा करें, एकजुट होने के लिए संगठित हों तो तथाकथित सेक्युलर मीडिया हिन्दुओं की इस एकजुटता को सांप्रदायिकता मान बैठती है। मुस्लिम नेता और मुस्लिम मुल्ला-मौलवी जब आतंकवादियों के पक्ष में सरेआम खड़े होते हैं, कसाब और अफजल गुरू जैसे दुर्दांत आतंकवादियों के पक्ष में मुस्लिम नेता-मुस्लिम मुल्ला-मौलवी खड़े होते हैं तो भी इनकी धर्मनिरपेक्षता की पदवी दी जाती हैं, ये मीडिया के लिए सम्माननीय होते हैं। 

इसका दुष्परिणाम भयानक होता है, दुष्परिणामों में मुस्लिम कट्टरता, मुस्लिम दंगाई मानसिकता, परसंप्रभुता की पैरवी और परसंप्रभुता के हित साधने जैसे राष्ट्रविरोधी कारनामें शामिल है। बीबीसी ऐसे तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद की उपज है, इसकी पृष्ठभूमि में ब्रिटिश उपनिवेवाद को प्रचारित-स्थापित करने और अप्रत्यक्षतौर ईसाइत संस्कृति की रक्षा करने जैसे एजेंडे थे। यही कारण है कि जब प्रसंग ब्रिटिश साम्राज्यवाद का होता है या फिर ब्रिटिश महराजा-महारानी से जुड़ा हुआ होता है तो बीबीसी की पत्रकारिता की धार स्वतः जमींदोज हो जाती है। अगर-मगर में बीबीसी की पत्रकारिता सिमट जाती है। बीबीसी अपने आपको निष्पक्ष पत्रकारिता का सिरमौर कहता है लेकिन भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी खबरों को वह उछालने की किसी भी हद को पार कर सकता है। बीबीसी में कार्यरत मुस्लिम पत्रकारों को हिन्दुओं के खिलाफ कुछ भी लिखने की छूट होती है।
 
मुजफ्फरनगर दंगे में ही बीबीसी की मुस्लिम पत्रकारों की रिपोर्टिंग आप खुद देख लीजिये। बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा छह सितम्बर को अपनी रपट आखिर क्यों हैं मुजफ्फरनगर में तनावशीर्षक से खबर झूठी और इस्लामिक जेहाद से प्रेरित है। मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा अपनी रिपोर्टिंग में लिखता है कि दंगे की शुरूआत शाहनवाज और गौरव के बीच रास्ते में किसी बात को लेकर हुई थी। जबकि इसके पीछे महिला से छेड़छाड़ थी। गौरव की बहन से शाहनवाज पिछले एक साल से छेड़खानी कर रहा था, एक बार शाहनवाज गौरव की बहन का अपहरण तक करने का प्रयास किया था। ऐसे में गौरव ने शाहनवाज की हत्या जैसे कदम उठाया। शाहनवाज एक महिला हिंसा का अपराधी था जिसके पक्ष में पूरी मुस्लिम आबादी खड़ी हो गयी और सैकड़ों की भीड़ ने गौरव और उसके ममेरे भाई सचिन की हत्या निर्ममतापूर्वक की थी। अगर बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार निष्पक्ष होता और वह इस्लामिक कट्टरता से मुक्त होता तो यह लिखता कि शाहनवाज एक महिला हिंसा का अपराधी था। महिला हिंसा का अपराधी शाहनवाज के पक्ष में मुस्लिम आबादी ने एकजुट होकर दंगे की शुरूआत की थी।

जाटों के बेटी-बहु बचाओं पंचायतपर मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा ने लिखा कि जाटों की पंचायत में भड़काने वाले गैरजिम्मेदाराना भाषण दिये गये थे? पर उसने नहीं लिखा कि किस प्रकार मुस्लिम आबादी ने नमाज अदा करने के बाद अराजक भीड़ एक बार नहीं बल्कि कई बार उतरी और मुस्लिम नेताओं व मौलानाओं ने हिन्दुओं का कत्लेआम करने जैसे भड़काउ भाषण दिये थे? बीबीसी का मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा ने अपने रिपोर्ट मे मुस्लिम नेताओं के भड़काउ और जेहादी भाषणों को छिपा दिया। प्रमाणित तथ्य भी आप यहां देख लीजिये। जाटों के बहू-बेटी बचाओ पंचायत के पूर्व मुस्लिम आबादी ने धारा 144 तोड़कर बडी सभा की थी, सभा में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के सांसद कादिर राणा, समाजवादी पार्टी के नेता राशिद सिद्धीकी और कांग्रेस के नेता सैयद उज्ममा जैसे मुस्लिम नेताओं ने हिन्दुओं के खिलाफ भड़काउ भाषण दिये थे, इतना ही नहीं बल्कि भारतीय संप्रभुता के खिलाफ भी भाषण दिया गया था, सबसे चिंताजनक बात यह थी कि मुजफफरनगर जिले का डीएम और एसएसपी ने मंच पर जाकर ज्ञापन लिया था। अगर दिलनवाज पाशा ईमानदार होता तो यह जरूर लिखता कि जाटो की पंचायत के पूर्व मुस्लिम नेता कादिर राणा, राशिद सिद्धीकी, सैयद उज्मामा और मुल्ला-मौलवियां ने धारा 144 को तोड़कर सभा की थी और हिन्दुओं के खिलाफ आपत्तिजनक व भडकाऊ भाषण दिये थे।

सिर्फ मुस्लिम पत्रकार दिलनवाज पाशा की ही बात नहीं है बल्कि बीबीसी में जितने भी मुस्लिम पत्रकार हैं सभी के मुस्लिम प्रेम और मुस्लिम जेहाद हावी रहता है, हिन्दू विरोधी और भारत विरोधी खबरें देने की इनकी प्राथमिकता होती है। अब यहां यह सवाल उठता है कि क्या बीबीसी सिर्फ हिन्दू विरोधी-भारत विरोधी और मुस्लिम जेहाद की प्राथमिकता से ही मुस्लिम पत्रकारों की नियुक्ति करता है। अगर नहीं तो फिर बीबीसी के मुस्लिम पत्रकारों की रिर्पाेटिंग निष्पक्ष और संतुलित क्यों नहीं होती है, मुस्लिम परस्ती इन पर क्यों होवी है? इस पर बीबीसी संज्ञान लेता क्यों नहीं है? एनडीटीवी की दंगे की रिर्पाेटिंग तो और भी खतरनाक और एकतरफा होने के साथ ही साथ पत्रकारिता के मान्यदंडों को तार-तार करने वाला है? एनडीटीवी की अराजक, सनसनी फैलाने वाली, एकतरफा रिर्पाेटिंग को बड़े-बड़े मीडियाकर्मी और अपने आप को सेकुलर कहने वाले लोग भी पचा नहीं पाये हैं। बीबीसी हिन्दी सेवा के पूर्व संपादक विजय राणा तक को एनडीटीवी के खिलाफ खड़ा होकर विरोध करना पड़ा है। विजय राणा अपनी बात में कहते हैं कि एनडीटीवी ने मुजफ्फरनगर दंगे की रिपोर्टिंग एकतरफा की थी, मीडिया आचरण कोड की धज्जियां उड़ायी गयी, ऐसी खतरनाक रिपोटिग का मकसद साफ है।

मीडिया ने स्वयं एक आचरण कोड बनाया है। मीडिया आचरण कोड के अनुसार दंगे में प्रभावित परिवार की जाति और धर्म से जुड़ी जानकारियां नहीं देनी है पर एनडीटीवी का पत्रकार श्रीनिवासन जैन अपनी लाइव रिपोर्टिंग में दिखाता है कि मुस्लिम निर्दोष हैं, मुस्लिम डरे हुए हैं, अपने घरों से पलायन कर रहे हैं, जाट मुस्लिम आबादी की हत्या कर रहे हैं? ‘बेटी-बहू बचाओ पंचायतसे निहत्थे लौट रहे जाटों पर कैसे मुस्लिम आबादी ने गोलियों से भूना, अन्य हथियारों से कत्लेआम किया, दंगे में मारे गये जाट के परिजन और हिन्दुओं के जलाये घर, हिन्दुओं की लूटी गयी संपतियों और किस प्रकार से हिन्दू डरे हुए हैं उसकी न तो श्रीनिवासन जैन ने खोज-खबर ली व न ही उसकी लाइव वीडियो दिखायी, इतना ही नहीं बल्कि हताहत और प्रताडि़त हिन्दू पजिनों से प्रमुखता व गंभीरता से वाइट भी नहीं ली गई। श्रीनिवासन जैन के संबंध में जो जानकारी मिली है वह यह है कि श्रीनिवासन जैन कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि का है जिसके उपर हिन्दू विरोध और मुस्लिम परस्ती हावी रहती है। सवाल यह उठता है कि क्या पत्रकारिता में भी श्रीनिवासन जैन जैसे कम्युनिस्ट अपनी मुस्लिम परस्ती और कम्युनिस्ट विचारधारा को तुष्ट कर सकते हैं? क्या ऐसा करने का पत्रकारिता का मूल्य इजाजत देता है? श्रीनिवासन और बरखा दत्त जैसे टाटा-राडिया संस्कृति, भ्रष्टाचार और मुस्लिम परस्तों से एनटीटीवी भरा पड़ा है। एनडीटीवी का सरगना प्रणव राय के दूरदर्शन में किये गये मान्य-अमान्य खेल के किस्से अभी मीडिया में तैरते रहते हैं।

चैनल पत्रकार राजेश वर्मा को मुस्लिम दंगाइयों ने मारा डाला। मुस्लिम दंगाइयों ने राजेश वर्मा को इसलिए मार डाला कि वह मुस्लिम दंगाइयों की करतूत और हिंसा के साथ ही साथ निहत्थे हिन्दुओं के कत्लेआम का लाइव वीडियो संकलित करा रहा था। फोटोग्राफर के कैमरे में राजेश वर्मा की हत्या की पूरी कहानी है कि किस मस्जिद से गोलियां चल रही थी, गोलिया चलाने वाले मुस्लिम दंगाई कौन थे, इन दंगाइयों को सह देने वाले मुस्लिम नेता कौन-कौन थे, यह सब प्रमाण के तौर पर उपलब्ध है। लेकिन टीवी चैनलों ने पत्रकार राजेश वर्मा की हत्या की पूरी परते खोली ही नहीं। सिर्फ राजेश वर्मा की तस्वीर लगा कर एक-दो लाइन का टिकर चला दिया गया। आखिर मुस्लिम दंगाइयों का शिकार एक कर्तव्यनिष्ट पत्रकार होता है और राजेश वर्मा को इसलिए शहीद होना पड़ा कि उसकी रिकार्डिंग और कवरेज मुस्लिम दंगाइयों की करतूत की तह-तह खोलने वाला था। अगर चैनल ईमानदार होते, इनमें कर्तव्यनिष्ठा होती, इन पर निष्पक्षता का भार होता और इन्हें अपनी विश्वसनीयता की चिंता होती तो चैनल जरूर राजेश वर्मा की हत्या पर एक-दो घंटे का न्यूज पैकेज बनाते। एक-दो घंटे का न्यूज पैकेज चलाने की बात तो दूर रही पर चैनलों ने एक-दो मिनट का न्यूज पैकेज नहीं बनाया। शहीद हुए पत्रकार राजेश वर्मा के परिजन किस तरह से बेहाल है, मुस्लिम दंगाइयों के प्रति राजेश वर्मा के परिजनों की सोच क्या है, यह भी दिखाने की जरूरत चैनलों ने नहीं समझी?

विनोद कापडी जैसे पत्रकार जरूर राजेश वर्मा की शहादत पर चितिंत हैं और राजेश वर्मा के परिजनों के मदद के लिए आगे आये हैं। चैनल मठाधीश पूरी तरह से राजेश वर्मा की शहादत पर चुप्पी साधे बैठे हैं। खासकर जाटों को अन्यायी, शोषक और हिंसक बताने और दिखाने की मीडिया में होड़ है। जबकि मुस्लिम आबादी को शांत, सत्य व अहिंसा का पुजारी, हिंसा-आतंकवाद से दूर रहने वाला साबित करने की होड़ लगी है। जबकि सच्चाई यह है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में सिर्फ जाट ही क्यों, बनिया, ठाकुर, ब्राह्मण, दलित-पिछड़े सभी मुस्लिम आबादी की हिंसा, मुस्लिम आबादी का लव जेहाद, मुस्लिम आबादी द्वारा हिन्दू महिला हिंसा का शिकार हैं।

मुजफ्फरनगर में गौरव की बहन के साथ छेड़छाड़ और उसे मुस्लिम अपराधी शाहनवाज द्वारा अपहरण करने के प्रयास की अकेली घटना भी तो नहीं है। हाल के तीन-चार महीनों में एक पर एक कई ऐसी लोमहर्षक और चिंता में डालने वाली हिन्दू लड़कियों के साथ मुस्लिम युवकों ने सामूहिक तौर पर बलात्कार किये हैं। हरिद्वार जाते हुए मुजफ्फरनगर के मुस्लिम राजनीतिज्ञों के युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं भी कम उल्लेखनीय नहीं है। मुस्लिम आबादी हिन्दुओं की बहू-बेटियों के साथ सरेआम हिंसा करते हैं फिर भी उनका विरोध करना गुनाह है। हिन्दू जब विरोध करता है तब मुस्लिम आबादी एकजुट होकर हिंसा पर उतर आती है। पहले होता यह था कि सिर्फ पीडि़त हिन्दू ही विरोध के लिए आगे आता था और न्याय की मांग करता था, इसलिए उसकी विरोध की आवाज दबा दी जाती थी। चूंकि जाट एक सशक्त जाति है और उसने यह महसूस भी किया कि जब तक वे संगठित नहीं होंगे तब तक उनकी बहू-बेटियों की इज्जत बचने वाली नहीं है। इसीलिए जाटों ने बहू-बेटी पंचायतकी थी।

फिर मुस्लिम आबादी को डर भी नहीं होता क्योंकि उन्हें मालूम है मुलायम-अखिलेश की सरकार उनकी है और मुलायम-अखिलेश की सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं करेगी? मुलायम-अखिलेश को भी यह मालूम है कि अगर उन्होंने मुस्लिम दंगाइयों, मुस्लिम अपराधियों, मुस्लिम लव जेहादियों के खिलाफ कार्रवाई की तो फिर उन्हें मुस्लिम वोट मिलेगा नहीं? अगर ऐसा नहीं होता तो फिर गौरव-सचिन की निर्ममतापूर्वक हत्या के लिए दोषी सैकड़ों मुस्लिम आबादी की भीड़ पर कार्रवाई जरूर होती। उल्टे अपनी बहन की इज्जत बचाने में शहीद हुए गौरव-सचिन के परिजनों के खिलाफ ही मुलायम-अखिलेश की सरकार, प्रशासन और पुलिस ने मुकदमा ठोक दिया। क्या यह सब मीडिया को मालूम नहीं है फिर भी मीडिया हिन्दुओं को दंगाई साबित करने के लिए जेहादी बन चुका है।

भारतीय मीडिया पर अरब देशों और पाकिस्तान से करोड़ों-अरबों डॉलर बरस रहे हैं। गुजरात दंगों पर मुस्लिम परस्त रिपोर्टिंग करने के लिए अरब देशों से चैनलों और अंग्रेजी अखबारों को करोड़ों-अरबों रुपये दिये गये थे। पाकिस्तान की आतंकवादी गुप्तचर ऐजेंसी आईएसआई ने अपने समर्थक एक पत्रकार संगठन भी भारत में खड़ा कर रखा है। अप्रत्यक्षतौर पर आईएसआई समर्थक और फंडित वह पत्रकार संगठन दक्षेस की राजनीति करता है। वह पत्रकार संगठन अपने पाकिस्तान प्रेम और मेलजोल के माध्यम से भारत की जनमानस की धारणाएं बदलने और पाकिस्तान परस्ती के लिए अप्रत्यक्षतौर पर सक्रिय होता है। ईरान के पैसे पर भारत में आतंकवाद फैलाने वाले एक मुस्लिम पत्रकार की गिरफतारी भी हो चुकी है। वह मुस्लिम पत्रकार इजरायल दूतावासकर्मी की गाड़ी में स्टिकर बम रखने का सहदोषी है। वह मुस्लिम पत्रकारों को ईरान से करेंसी मिलती थी जिसके बदौलत वह भारत में इजरायल विरोधी आतंकवाद की संरचना और सक्रियता में शामिल था, यह निष्कर्ष कोई मेरा नहीं है बल्कि दिल्ली पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों का है।

 आतंकवादी जेहाद में लगे उस मुस्लिम पत्रकार जमानत पर छूटा और फिर दनादन उसने अपना नया-पुराना अखबार लांच कर दिया, उसके अखबार के लांचिंग में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के साथ ही साथ बड़े-बड़े मुस्लिम नेता थे। जब आतंकवादी जेहाद में आरोपित और पत्रकार का चोंगा पहनने वालों के साथ जब शीला दीक्षित और उनकी दिल्ली की सरकार खड़ी होगी तब आप उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि मुस्लिम आबादी अपनी कट्टरता और आतंकवादी मानसिकता छोड़ देगी। चैनलों और पत्रकार संगठनों को अगर मुस्लिम देशों और भारत को तोड़ने वाली शक्तियों से पैसे नहीं मिलते तो फिर इनकी मुस्लिम परस्ती क्यों चलती है?

बात तो यहां तक उठी है कि चैनलों ने मुस्लिमपरस्त रिपोर्टिंग के लिए मुलायम-अखिलेश सरकार से भी डील किये हैं। भारत सरकार और भारतीय गुप्तचर एजेंसियों को सबकुछ मालूम है कि चैनलों और अंग्रेजी अखबारों के किस मुस्लिम देश से पैसे मिलते हैं, किस मुस्लिम देश से सभी मान्य-अमान्य सुविधाएं मिलती हैं? लेकिन कांग्रेस की सरकार चैनलों और अंग्रेजी अखबारों पर कार्रवाई ही नहीं करना चाहती है। आखिर क्यों? इसका जवाब यह है कि कांग्रेस खुद मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुत्व को लांक्षित करने, बदनाम करने और हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने में लगी हुई है। 

कहने का अर्थ यह है कि कांग्रेस के मुस्लिम वोट बैंक जेहाद में मुस्लिम देशों के पैसों पर पलने वाले चैनल और अंग्रेजी अखबार सहभागी-सहयोगी हैं, ऐसे में कांग्रेस की केन्द्रीय सरकार मुस्लिम देशों के पैसों पर पलने वाले चैनल और अखबारों पर कार्रवाई क्यों करेगी? खासकर चैनलों को संवैधानिक आचार संहिता में बांधने की बात हमेशा उठती रहती है। पर चैनल संवैधानिक आचार संहिता में बांधने के विरोधी हैं। मुजफ्फरनगर में दंगे के लाइव प्रसारण में जिस तरह से एकतरफा और मुस्लिम परस्त रिपोर्टिंग हुई है और मीडिया इथिक्स की धज्जियां उड़ायी गयी उसके खिलाफ संज्ञान कौन लेगा?

22 September 2013

केदारनाथ में पूजा की सियासत और सच्चाई !

उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने केदार धाम में पूजा-अर्चना को अपनी राजनैतिक प्रतिष्ठा समझ रही है। दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान की ओर से लगातार पूजा सुरू कराने को लेकर मंदिर समिति पर दबाव बनाया जा रहा था।

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती और बदरी-केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक गणेश गोदियाल ने भी केदारधाम में पूजा को लेकर दबाव बनाया।  सरकार ने अपनी पूरी ताकत संपर्क से कटे गांवों को राहत देने के बजाय पूजा सुरू कर राजनीतिक लाभ लेने में लगा दी।

केदारनाथ में पूजा की पहल को राजनीतिक लाभ लेने के लिए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और कृषि मंत्री डा. हरक सिंह रावत मंदिर का मलबा साफ करते हुए अपनी फोटो खिंचवाते नजर आए। भाजपा के नेता भी पीछे नहीं रहे। पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य भगत सिंह कोश्यारी और वरिष्ठ भाजपा नेता उमाभारती केदारधाम में पूजा करने पहुंच गए।

तेलगुदेशम पार्टी के नेता रमेश राव और कांग्रेस के हनुमंत राव राजनीतिक लाभ लेने के लिए पूजा के दिन आपस में भिड़ गए। केदारनाथ में पूजा को लेकर वहां के मुख्य पुजारी रावल और जगदगुरू शंकराचार्य में बहस ठन गई। कांग्रेस नेता और सांसद सतपाल महाराज ने कहा कि 5 अक्टूबर से शुरू होने वाले शारदीय नवरात्र से ही केदारनाथ मंदिर में पूजा शुरू की जानी चाहिए थी।

सतपाल महाराज ने कहा कि इस संबंध में सरकार को पुरोहित समाज से भी पूछना चाहिए था। मगर सरकार ने ऐसा नहीं किया। पूजा को सिर्फ 11 मंत्री और विधायकों ने सम्पन्न कराया कोई भक्त वहां मौजूद नहीं था।

21 September 2013

बाबा रामदेव के साथ बदसलूकी क्यों ?

सत्ता की प्रकोप से प्रताड़ित स्वामी रामदेव को अब विदेशों में भी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ रहा है। योग गुरू बाबा रामदेव को लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर ब्रिटिश सीमा शुल्क अधिकारियों ने पूछताछ के लिए 8 घंटे तक रोके रखा। योग गुरू लंदन में रविवार को स्वामी विवेकानंद पर होने वाले एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पहुंचे थे। आठ घंटे तक बिठाए रखने के बाद भारतीय समय के अनुसार देर रात एक बजे बाबा रामदेव को छोड़ दिया गया। बाबा रामदेव ने कहा मुझे आठ घंटे यहां क्या अष्टांग योग करवाया गया जब मेरे पास ऐसा कुछ था ही नहीं ? बाबा ने अपने सफाई में कहा कि मेरे पास एक ढेला भी नहीं है। एक डॉलर, एक रुपया भी नहीं। मैं रखता ही नहीं अपने पास। इनलोगों ने मेरी नोट बुक तक ले ली जिसमें लेक्चर्स के नोट्स बनाता हूं। रोके जाने का कोई कारण नहीं बताया।

जब स्वामी रामदेव से पत्रकारों ने पूछा ताछ के बारे में जानना चाहा तो उन्होने सीधे सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि सोनिया गांधी को कारण पता होगा। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या सोनिया गांधी कि विदेश दौरे पर स्वामी रामदेव द्वारा उठाए सवालों के जवाब में ऐसा किया जा रहा है। क्या ये कोई सोची समझी साजि़श का हिस्सा तो नहीं है? इस पूछ ताछ को लेकर एैसी आशंका जताई जा रही है। इस पूरे मामले पर स्वामी रामदेव के सहयोगी एसके तिजारावाला ने विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को चिट्ठी लिख कर मामले में फौरन कार्रवाई की अपील की है। तिजारावाजा ने कहा कि योग गुरू को बेवजह बैठा कर रखा गया।

समारोह के आयोजकों का कहना है कि स्वामी रामदेव ने हिंदी और संस्कृत में लिखी कुछ किताबें लिए हुए थे जिसे लेकर उनसे पूछताछ की गयी है। खुद स्वामी रामदेव कहते रहे कि मै बचपन से लेकर आज तक कोई भी गलत या गैरकानूनी कार्य नहीं किए। मगर रामदेव की एक भी बात नहीं सुनी गई। बार- बार योग गुरू द्वारा पूछे जाने पर बताया गया कि आपके बारे में रेड अलर्ट है। लंदन में एयरपोर्ट पर पूछ ताछ नियमों के मुताबिक किसी को बिना किसी प्रमाण के तीन घंटे से जयादा बिठाकर नहीं रखा जा सकता है। सामान की जांच करने वाले ब्रिटिश सीमा शुल्क के अधिकारियों ने उनके उस डायरी को जब्त कर लिया जिसमें यूपीए सरकार के घोटालों के बारे में विस्तृत विवरण था। तो ऐसे में सवाल और प्रबल हो जाता है कि क्या ब्रिटिश अधिकारीयों द्वारा ये पूछ ताछ किसी भारतीय राजनेता के इशारे पर की गई। या फिर स्वदेशी उत्पादों को विदेशों तक पहुचाने और मल्टीनेशनल कंपनियों कि बिक्री कम होने के चलते रामदेव को निशान बनाया जा रहा है?

बीजेपी नेता केप्टन अभिमन्यु ने मामले में भारत सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है। यहा सवाल भारत सरकार कि नरम रूख और विदेश मंत्रालय की चुप्पी को लेकर भी सवाल खड़ा होता है कि सरकार अब तक ब्रिटेन के राजदूत को बुला कर इसका कारण क्यों नहीं पूछा। भारत सरकार अपने नागरिकों और गणमान्य संतों के साथ हुए इस दुर्रबेवहार पर चुप क्यों है। बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान को अमेरिका में एयरपोर्ट पर दो घंटे तक रोकने पर सड़क से लेकर संसद तक हो हल्ला मच जाती है। तो वही दुसरी ओर अमेरिका में सपा नेता आजम खान से पूछ ताछ पर देश में अल्पसंख्यक अस्मित्ता को लेकर लंबी चौड़ी बहस छीड़ जाती है। मगर आज एक संत पराये मुल्क में अपनी बेगुनाही का 8 घटे तक गुहार लगाता रहता है फिर भी हमारी सरकार मौन साधे रहती है। ऐसे में आजदेश ये सवाल कर रहा हैं कि बाबा रामदेव के साथ ये बदसलूकी क्यों ?

19 September 2013

क्या ‘पीएम इन वेटिंग’ की परंपरा तोड़ पाएंगे मोदी ?

जैसे-जैसे मिशन 2014 नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे राजनीतिक सरगर्मियां भी और अधिक बढ़ती जा रही हैं। कांग्रेस की ओर से तो बहुत हद तक यह निश्चित है कि अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनावों में राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी हों लेकिन भाजपा के भीतर चल रहे द्वंद की वजह से यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल ही था कि नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद और दी जा रही प्राथमिकताओं के बावजूद उनका नाम भाजपा की ओर से पीएम पद के लिए नामित किया जाएगा या नहीं? इन सभी चर्चाओं पर विराम लगाते हुए आखिरकार नरेंद्र मोदी को औपचारिक तौर पर पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। पार्टी के भीतर और बाहर दोनों ही जगह नरेंद्र मोदी की छवि काफी हद तक विवादित रही है। एक ओर जहां कुछ लोग मोदी को उनके तानाशाही रवैये और सांप्रदायिक छवि की वजह से अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं वहीं कुछ लोग मोदी को आज के समय की मांग बता रहे हैं। इसी कारण यह चर्चा जोरों पर है कि क्या नरेंद्र मोदी “पीएम इन वेटिंग” की परंपरा को तोड़कर इस बार देश के प्रधानमंत्री का पद हासिल कर पाएंगे?

बहुत से ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि नरेंद्र मोदी को अपना प्रत्याशी बनाना भाजपा की बहुत बड़ी गलती साबित होने वाली है। नरेंद्र मोदी अभी गुजरात दंगों के आरोप से जूझ रहे हैं जिसकी वजह से इन्हें अभी भी सांप्रदायिक नेता करार दिया जाता है। अधिकांश लोग उनके कट्टर और तानाशाही रवैये की वजह से उन्हें पसंद भी नहीं करते। ऐसे लोगों का मानना है कि भले ही मोदी को पीएम पद का प्रतिनिधि बनाया गया है लेकिन इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि इस निर्णय को लेने के लिए आडवाणी जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सुझावों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि मोदी की मीडिया कैंपेनिंग गजब की है इसीलिए उनकी पहुंच भी सिर्फ उन लोगों तक है जो मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं। समाज के दलित और पिछड़े वर्गों के बीच जिस प्रकार कांग्रेस लोकप्रिय है, मोदी अभी तक अपनी वैसी पहचान स्थापित नहीं कर पाए हैं। वे युवा जो मोदी के नाम के नारे लगाते हैं चुनाव के समय उन्हीं के वोट डालने के आंकड़े सबसे कम रहते हैं। इनका कहना है कि मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री तो हो सकते हैं लेकिन देश के नहीं।

वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जो यह मान चुके हैं कि इस बार नरेंद्र मोदी भाजपा की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरेंगे और पीएम इन वेटिंग की परंपरा को तोड़कर दिखाएंगे। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि कांग्रेस के अत्याचारों से मुक्ति के साथ पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी राजनीति में सुधार लाने के लिए आज देश को मोदी जैसे मुखिया की ही जरूरत है जो सही समय पर उपयुक्त और कठोर कदम उठाने का माद्दा रखता हो। फिलहाल भारत का नेतृत्व लचर हाथों में है जिसकी वजह से भारत में महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद जैसे दानव सिर उठाए खड़े हैं। एक लंबे अर्से से देश ऐसे नकारात्मक हालातों से जूझ रहा है जिसके लिए सीधे तौर पर कांग्रेस जिम्मेदार है और जनता यह बात भली प्रकार समझती है। ऐसे लोगों का कहना है कि जनता बदलाव चाहती है और इस बार बदलाव के सेनापति बनेंगे नरेंद्र मोदी।

15 September 2013

क्या बिंदास बोलना जरूरी है ?

एक पहल है, ये हौसला है, देश को आगे ले जाने का, देश से भ्रष्टाचार मिटाने का। ये प्रतिज्ञा है समाज को जगाने की, देश को नंबर वन बनाने की। केवल चैनल ही नहीं देश नंबर वन बनाना है। इसी सोच और प्रतिज्ञा को पूरा करने का जज्बा लेकर हमारा सफर शुरू हुआ था बिंदास बोल का, जो आज 400 वां ऐपीसोड पूरे कर चुका है। इस दौरान बहुत सी चुनौतियां सामने आयी पर बिंदास के चाहने वालों और साथ देने वालों ने हमारा हौसला कमजोर नहीं पड़ने दिया। इस कार्यक्रम के माध्यम से हमने तमाम ऐसे ज्वलंत मुद्दे को देश के सामने रखा जो अमूमन सेकुलरिस्ट मीडिया उसे नहीं दिखाता है। चाहे मुद्दा राजनीतिक, सामाजिक, हिन्दुत्व, केन्द्रीय सत्ता, का हो या फिर पाकिस्तान, कश्मीर, आतंकवाद, अलगाववाद, बंगलादेशी घुसपैठ, भ्रष्टाचार, महिला, और पर्यावरण से जुड़ा हुआ हो हमने बेबाक और बेखौफ होकर बिंदास तरिके से आपके बिच रखने में सफल रहे। समाज कल्याण से लेकर इंसानियत की जंग तक अपने साहस और उत्साह के साथ राष्ट्र और सामाज को जगाते रहे।

हमने हर वो मुमकिन कोशिश की है जो हमारे देश और आम आदमी से जुड़ी समस्या आने वाले कल के लिए नासूर बनने वाली थी। ये सब सिर्फ इसलिए हो सका, क्यों हम देश और सामाज में नई चेतना को जागृत कर राष्ट्र निर्माण के कार्यों में हौशले को बुलंद रखा। तमाम तरह की धमकियों और बंदिशों के बावजूद भी हमने वो किया जो देश के एक सच्चे नागरिक को एक संस्था को और एक चैनल को करना चाहिए। पत्रकारिता की आड़ में अवैध व्यापार के नाम पर नेताओं और पार्टियों की चापलूसी की चलन से अलग हट कर अपने निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता को ही माध्यम बनाया। बिंदास बोल कार्यक्रम के माध्यम से हमने जो भी मुद्दे उठाए उसका सिधा और सकरात्मक असर सरकार और सामाज के उपर पड़ा। जो आगे चल कर राष्ट्रनिर्माण के कार्य में मील का पत्थर साबित हुआ।

इनमें से कुछ प्रमुख मुद्दों से हम आपको इस 400 वां एपिसोड के माध्यम से रूबरू करा रहे है। सबसे पहले हमने बिदास बोल में बंदे मातरम् पर देवबंद के फतवे को लेकर लोगों में एक नई अलख जगाई जो आगे चल कर कई मुस्लिम धर्मगुरूओं ने फतवे को गलत करार दिया। तो वही दुसरी ओर ढ़ोगी बाबाओं के बढते जाल को लेकर भी हमने जो बाते उठार्ठ आज वह एक आदोलन के रूप में देश भर में जारी है। मानवता से जुड़ें कार्य के प्रति भी हमने लोगों को आगे लाने का प्रयास किया जिससे उत्तराखंड के प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्यों में लोगों ने बढ़ चढ़ कर अपनी भागीदारी निभाई। 

जिस आईपीएल को सरकार और समाज में आदर्शो का खेल बताया जा रहा था उसी के पीछे का खेल जब सामने आया तो सबसे पहले बिंदास बोल कार्यक्रम में इसको बंद करने को लेकर मांग उठी, हमारे देश के माननीय सांसद भी जागे और इसकी गूंज सड़क से लेकर संसद तक सुनाई दी। इसी आईपीएल में असलील डांस पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी हमने उठाई बाद में ऐसे डांस पर प्रतिबंध लगा। राम का अपमान करने वाले जेठमजाली पर कार्रवाई की मांग भी बिंदास बोल कार्यक्रम में हमने उठाई जिसके बाद जेठमलाली को पार्टी से बाहर किया गया। तो वही दुसरी ओर क्षत्रिय सामाज को नीचा दिखाने वाले कार्यक्रम जोधा अकबर की झूठी कहानी को बैन करने की मांग जब बिंदास बोल कार्यक्रम उठा तो आखिरकार एकता कपूर को प्रेस कांफ्रेंस कर सफाई देनी पड़ी। साथ ही नरेन्द्र मोदी को प्रधान मंत्री बनाने के मुद्दे पर 7 बार कार्यक्रम पेश किया गया।

इस सबका श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो है हमारेदेश के बिंदास नागरिक आज इस सफर के 400 दिन पूरे हो चुके है। ये सफर आगे भी यू ही चलता रहेगा हमे उमीद है कि आप सब का साथ ऐसे ही अगे जारी रहेगा। इस जोश और जज्बे के साथ एक दिन हमारा आपका और पूरे देश का स्वप्निल भारत का सपना जरूर पूरा होगा। पर हमें इसके लिए हमें दिखानी होगी हिम्मत, सच कहने की और बोलना होगा बिंदास। इसी लिए आज हम आप से पूछ रहे है क्या बिंदास बोलना जरूरी है?                        

बिंदास बोल के 400 कार्यक्रमों की सुची

देवबंद का वंदे मातरम् पर फतवा ? सत्ता का धिनौना खेल ? प्रजातंत्र का कोढ़- मधु कोड़ा ! राष्ट्र पहले या राज्य?मराठी वर्सेस हिन्दी? किसानों की अनदेखी क्यों? कौन है हेडली (दाउद गिलानी) ? क्या अजहरूद्दीन को माफी देनी चाहिए? क्या लातों के भूत बातों से मानेगें? क्या इतने मंहगे खेल गरीब देश  के लिए सही है? क्या भटक रहा है मीडिया ? क्या आपके सांसद कामचोर तो नहीं है? क्या हम अमेरीका के पिछलग्गु तो नहीं बन रहे हैं? मुस्लिम नेता धर्म के नाम पर पीएम बनाने कि बात कितनी सही? क्या अफजल गुरू को फांसी न देना शहीदों का अपमान है ? नए राज्यों के गठन की बढती मांग? क्या भारतीय जीवन पद्धति ही ग्लोबल वार्मिंग से निबटने का उपाय है? क्या नीतिन गडकरी भाजपा की नैया बचा पाएगें ? क्या टीवी पर अंधश्रद्धा को बढ़ावा दिया जा रहा है?  क्या मतदान करना अनिवार्य होना चाहिए? क्या असंवेदनशील है शीला सरकार ? लड़ाई के साथ किकेट कितना सही? क्या क्रांति लाएगें कल्याण ? क्या राजनीति एक व्यापार बन गया है और राजनैतिक पार्टिया कंपनियां हो गई है? सूरज का तो ग्रहण हट गया क्या देश का ग्रहण हटेगा ? पुलिस- रक्षक है या भक्षक ? उच्च जीवन सादा विचार ये भारतीय राजनीति का चोला बन गया है? पाकिस्तान की सोच? क्या नेताजी के साथ अन्याय हुआ है? क्या खेल का खेल राजनैतिक नेताओं ने बिगाडा है?

जनवरी पर लाल चैक पर तिरंगा फहराना क्या राष्ट्रशर्म की बात है ? लड़ाई के साथ क्रिकेट कितना सही सही ? आईपीएल- टैक्स माफी किसको चाहिए ? आतंकवाद पर राजनीति ! वेलेनटाई डे- प्यार या बाजार ? क्या आज शिवाजी महाराज के विचारों की आवश्कता है ? बम और बात साथ-साथ कितनी सही? क्या मीडिया को बदलना चाहिए? क्या प्रणब के बजट में आम आदमी की अनदेखी हुई है? क्या हम अपने त्योहारों का महत्व भूल गए है ? कौन जिम्मेदार है ऐसी घटनाओं का?  क्या साधू संत बनने का कोई मापदंड होना चाहिए? क्या एम एफ हुसैन को भारत सरकार द्वारा सजा मिलनी चाहिए? राजनीति में बाबा - रामदेव सही या गलत? क्या अब्बू आजमी पर देशद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए? शादी के पहले सबकुछ कितना सही? कसाब से मानवता और साध्वी के साथ दानवता क्यों? क्या सानिया मसला मिशन लव पाकिस्तान है? क्या आईपीएल डांस और बीयर बार बना है? क्या नक्सलवाद को युद्ध मानना चाहिए? क्या समाज सहिदों को भूलता जा रहा है? बहुराष्ट्रीय कंपनिया क्या हमारे राष्ट्र से खिलवाड़ कर रही है ? क्या आईपीएल पर बैन लगना चाहिए? हाउसिंग सोसाईटी में मुसलमानों को आरक्षण कितना सही ? क्या आईपीएल से जुड़े सारे नेताओं का इस्तीफा लेना चाहिए? ग्रांउड़ जीरो के सामने बन रही मस्जिद का विरोध कितना सही ? प्यार के बदले जान कितनी सही ?

 क्या महंगाई पर सरकार असंवेदनशील  है ? आसान तलाक का कानून कितना सही ? क्या ओबामा की मनमोहन तारीफ से आप सहमत है ? फिर हुआ शिवाजी महाराज जी का अपमान है ? क्या विद्यार्थी आंदोलन भटक रहा है ? क्या सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण की भक्ति की जरूरत है ? गाय के प्रति सरकारें  असंवेदनशील  है? क्या विदेशों में हिंदू धर्म के प्रति आस्था बढ़ रही है ? क्या हम पूरे आजाद है ? सोनिया गांधी का चैथी बार अध्यक्ष बनना कितना सही? क्या शिक्षक, शिक्षक रह गया है? क्या सिमी और आरएसएस एक जैसे है? क्या गरीबों को मुफ्त में अनाज नहीं देने का निर्णय सही है? जाती गणना का निर्णय कितना सही? क्या कश्मीर  में सुरक्षा बलों के अधिकारों में कटौती जायज है? क्या सरकार कश्मीर में अलगावादीयों के आगे झुक रही है? क्या अयोध्या मसले पर समझौता संभव है ?  क्या कॉमनवेल्थ समिति ने भारत की छवि खराब कि है ? कॉमनवेल्थ पर करोड़ों खर्च- बाढ़ग्रस्त उत्तराखण्ड को 500 करोड़ कितना सही ? क्या अयोध्या फैसले से हिन्दू मुस्लिम विवाद खत्म हो जाएगा? क्या राजकुमार के द्वारा कॉमनवेल्थ का सुभारंभ गुलामी का प्रतिक है ? क्या राजनैतिक मुल्यों में गिरावट आ गई है ? बिग बॉस कौन ? देश या टीवी शो ? कॉमनवेल्थ में गौमांस परोसना कितना सही?

क्या राज्यपाल का पद केंद्र के एजेंट का हो गया है? राजनैतिक धन वसूली को देशद्रोह कहा जाए? क्या आर्थिक भ्रष्टाचार की तरह सांस्कृतिक भ्रष्टाचारपर भी कार्यवाही होनी चाहिए? क्या बोलने की आजादी का देशद्रोही फायदा उठा रहे है ? क्या फारुख अब्दुल्ला से इस्तीफा लेना चाहिए? शहीदों के घर लूटने वालों को क्या सजा दी जाए? क्या लव जिहाद षड्यंत्र है? क्या दिपावली के मायने बदल रहे है? क्या राजा का सिंहासन छीन लेना चाहिए? क्या न्यायलय भी भ्रष्ट्र हो गए है ? क्या राखी सावंत को जेल में डालना चाहिए? हमले से हमने क्या सिखा ? देवबंद का रक्तदान पर फतवा कितना सही ? क्या पत्रकार भी दलाली करने लगे है ? क्या विपक्ष आंदोलन का तरीका बदलना चाहिए ? क्या हम घोटालेबाज देश बन रहे हैं ? क्या हिन्दु धर्म खतरे में है?- लाइव र्फाम अलोरा क्या सरकार धार्मिक संगठनों के प्रति उदासीन है ?- लाईव र्फाम एलोरा क्या राजनीति के लिए देशद्रोह किया जा रहा है ? सीबीआई छापे कार्रवाई है या दिखावा ? क्या सचिन को भारत रत्ना मिलना चाहिए ? 2010 को किसलिए याद किया जाए ? 2011 क्या हो प्राथमिकता- आवाह्न ? क्या महापुरुषों को जातीय चैखट में बांधना गलत है? सांभाजीनगर नगर या औरंगाबाद क्या हो नाम ? आईपीएल खिलाड़ियों की मंड़ी कितना सही ? तामिलनाडु में हिंदू स्कूलों को मनाही-कितना सही ? क्या सरकार महंगाई रोकने में नाकामयाब है? क्या विदेश में काला धन रखने वालों को बचाया जा रहा है? क्या प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए?

गरीबों का शिक्षा नकारना कितना सही ? क्या कश्मीर में तिरंगे को फहराने पर रोक सही है? क्या नेताजी के साथ अन्याय हुआ है ? क्या सरकार माफियाओं को बचा रही है? क्या पद्म पुरस्कार की गरिमा कम हुई है? क्या उत्सव शर्मा का कानून हाथ में लेना सही है ? क्यादेश में रोजगार के नाम पर मौत दी जा रही है? क्या अकेले राजा की गिरफ्तारी काफी है ? संदीप के चाचा आत्मदाह, सरकार और मीडिया की चुप्पी कितनी सही? कसाब की जनगणना कितनी सही ? प्रधानमंत्री का न्यायालयों को हद सिखाना सही है? क्या नागरिक पत्रकारिता समय की मांग है? क्या कॉर्पोरेट कंपनिया देश को लूट रही है? क्या सरकार बाबा रामदेव को धमका रही है? केवल हिंदूओं का कानून बदलना कितना सही ? क्या सावरकर जी के साथ अन्याय हो रहा है ? क्या 150 रूपए का सिक्का क्रांतिकारियों का अपमान है ? क्या मनमोहन सिंह को नैतिकता के आधार पर इस्तिफा देना चाहिए? क्या बोर्फोस घोटाले को दबाया गया है ?  संस्कृत को 0 और अरबी को 100 कितना सही ? आरक्षण का आधार क्या हो- जाति या आर्थिक स्थिति? क्रिकेट से पाकिस्तान से दोस्ती की पहल कितना सही? क्या अमेरिका का हस्तक्षेप गुलाम मानसिकता का प्रतिक है ? क्या संसद बेशर्मी का अंतिम अड्डा है? क्या ग्लोबल वार्मिग पर भारतीय जीवन शैली ही उपाय है ? क्रिकेट से पाकिस्तान से दोस्ती की पहल कितनी सही? क्या जनसंख्या घटाने के बजाय क्रयशक्ति में बदलना चाहिए ? क्या क्रिकेट की दीवानगी अन्य मुद्दों पर नहीं हो सकती ?

क्या अन्ना के आंदोलन ने जनता को जगाया है? क्या हम नवरात्र सही तरीके से मनाते है? क्याशहरों में इंसानियत खत्म हो रही है? देशद्रोहियों से हमदर्दी देशद्रोह क्यों नहीं? क्यों नरेन्द्र मोदी के विकास की तारीफ करना गलत है? क्या नदियों केप्रदुषण पर समाज और सरकार गंभीर है? बैडमिन्टन खिलाड़ियों को स्र्कट पहनाना कितना सही? क्या अकेले कलमाड़ी की गिरफ्तारी काफी है ? क्या राजकुमार की शादी के लिए दीवानगी गुलाम मानसिकता है? पोप के लिए राष्ट्रीय शोक तो सत्य साईं के लिए क्यों नहीं ? क्या भारत अमेरिका जैसी हिम्मत दिखा पाएगा ? क्या किसानो को उजाड़ा जा रहा है ? क्या भारत में साम्यवाद विफल हुआ है ? क्या अमर सीडी कांड पर कार्यवाही होनी चाहिए? क्या चुनाव बाद पेट्रोल भाव बढ़ोतरी जनता से बेईमानी है? क्या सरकार पाकिस्तान पे गंभीर नहीं है ? क्या विनाश की खबरों पर रोक लगे ? क्या अमरनाथ विवाद कश्मीर को तोड़ने की साजिश है? क्या राम के श्राप से हुआ करूणानिधि का नाश ? क्या पेप्सी- कोक पे रोक लगनी चाहिए ? सरकार द्वारा मंदिरों का अधिग्रहण कितना सही ? क्या सरकार बाबा से धोखा कर रही है ? बाबा का रास्ता क्या हो सुभाष या गांधी ? क्या लोग केवल बाते करतें है संघर्श नहीं? शाहरूख- सलमान द्वारा रामदेव बाबा का विरोध क्यों ? एम. एफ हुसैन का महिमा मंडन कितना सही ? रोबर्ट वाड्रा दामाद किसका सरकार या सोनिया के? क्या जेल में बन्द नेताओं को लाइव किया जाए? अपराधियों को हीरो बनाना कितना सही है? क्या राजनैतिक दल लोकपाल पर नाटक कर रहे है?

क्या राहुल गांधी कांग्रेसी राज्यो में ही यात्रा करे? साईं संस्थान का एयरर्पोट को 100 करोड़ देना कितना सही है?क्या राहुल गांधी का आंतकवाद पर बयान सही है ? क्या दिग्विजय सिंह के पाकिस्तानी संबंधों की जांच हो? क्या हो देश का नाम- भारत, इंडिया या हिन्दुस्तान ? क्या शीला दीक्षित को जेल भेजना चाहिए ? आतंकियों को वापस बुलाना कितना सही है ? सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम कानून कितना सही ? क्या अफजल की फांसी के लिए राष्ट्रपति पर दवाब बनाना चाहिए ? क्या रिश्तों के मायने बदल गए ? क्या हम पूरे आजाद है ? सरकार का आदर्श कौन गांधी या मुसोलोनी ? क्या कांग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री बनाने का खेल खेलेगी ? क्या अब अन्ना को व्यवस्था परिर्वतन की मांग करनी चाहिए? क्या कांग्रेस में अब अच्छे लोग नहीं बचे? क्या सरकार अन्ना से वादा निभाएगी ? क्या स्वामी अग्निवेश स्वामी नाम और भगवे कपड़े छोड़े ? क्या गणेश उत्सव अपना उदेश्य भटक गया है ? क्या भ्रष्टाचार की लड़ाई में जनता ईमानदार है ? क्या सरकार का रवैया दमनकारी है ? क्या सरकार आतंकवाद पर विफल है? क्या कैश फॉर वोट में असली खलनायक को बचाया जा रहा है ? क्या चायना का बायकॉट करना चाहिए ? क्या नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए? क्या 32 रुपए कमाने वाले को अमीर कहना मजाक है? क्या भरष्टाचार रोकने अन्ना का पाकिस्तान जाना सही है ?

क्या पाक नेता पे खर्च 14 करोड़ उमर से वसूले जायें ? क्या ढ़ोंगी बाबागिरि धर्म को कम कर रही है ? क्या गांधीवादियों ने ही गांधी को पराजित किया है ? किंगफ़िशर को सरकारी मदद कितनी सही ? क्या पाकिस्तानी हिन्दुओं की आवाज उठानी चाहिए ? सोशल नेंटवर्किंग साइटों पर प्रतिबंध कितना सही ? अंधश्रद्धा के नाम पर श्रद्धा का कत्ल कितना सही ? क्या प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जनता से सीधे जुड़ें ? क्या राहुल के पीएम बनने से देश को खतरा होगा ? क्या एनजीओं को लोकपाल के दायरे में लाना चाहिए ? चुनाव के लिए कलमाड़ी को जेल से छोड़ने देना कितना सही ? क्या टीम अन्ना सरकार से डर गयी है ? क्या गौ हत्या पर मध्य प्रदेश का आदर्श लेना चाहिए ? क्या देश नेहरू गांधी घराने की जागीर है ? क्या ये गणतंत्र है ? क्या महिलाओं की गरिमा कम की जा रही है ? क्या साईं संस्थान को राजनीति का अड्डा बनाया जा रहा है? क्या देश क्रांतिकारियों को भूल रहा है ? क्या विदेशी धन लेने वाली संस्थाओं लोकपाल के अधीन ? क्या हमारी सेना को कमजोर किया जा रहा है ? क्या ग्लोबल वार्मिग पर भारतीय जीवन शैली ही उपाय है ?

क्या विदेशी में हिन्दू मंदिर खतरे में है ? पुरातत्व विभाग- धरोहरों का संरक्षक या भक्षक ? लव जिहाद जरदारी की आवभगत् कितनी सही ? क्या वैश्वीकरण में श्रमिकों का शोषण बढ़ा है ? क्या साधु संतो के लिए आचार संहिता होनी चाहिए ? 100 साल सिनेमा के तरक्की या गिरावट ? क्या कांग्रेस सचिन को मोहरा बना रही है ? क्या सेना के प्रति युवाओ की रूची घटी है ? क्या रिहाई के बदले नक्सलियो आतंकियो को छोड़ना चाहिए ? क्या हो राष्ट्रपति चुनाव का आधार ? क्या केंन्द्र सरकार राज्यो के अधिकारों को हानी पहुंचा रही ? क्या सरकार एनआरआई के प्रति उदासिन है ? क्या संसद की गरीमा घटी है ? क्या भरष्टाचार को सजा होने की संभावना है ?  नाथुराम गोडसे फिल्म पर रोक कितनी सही है ? क्या आइपीएल पर बैन लगाना चाहिए ? क्या आम आदमी कपंनियों के हवाले है ? क्या कश्मीर वार्ता रिर्पोट देश तोड़ने की साजिश है ? गरीबी छोड़ ममता पचस प्रेम कितना सही ? गरीब को 32 रूपए और बाबूओं के लिए 35 लाख ! मुस्लिम बाहुल्य इलाके में केवल मुस्लिम अधिकारी कितना सही ? अमरनाथ यात्रा की अवधि कम करना कितना सही ? क्या देश में इमर्जेंसी जैसे हालात हैं ? क्या आधुनिक विज्ञान को भारतीय संस्कृति के पीछे आना चाहिए? क्या आदर्शवादी नेता खत्म हो गये हैं ? नाइट लाइफ को सपोर्ट करना कितना सही ? क्या राष्ट्रपति पद की गरिमा घटी है ?

पाक के साथ क्या हो क्रिकेट या जंग ? क्या आचार्य बालकृष्ण को फंसाया जा रहा है? क्या असम में कश्मीर दोहराया जा रहा है? सरकार अन्ना आंदोलन को नजरअंदाज क्यों कर रही है ? क्या आर-पार की लड़ाई हो जाये ? क्या टीम अन्ना राजनीति में आये ? पाक को भारत में विदेशी निवेश की परमिशन दी जाये? क्या सरकार भगतसिंह को शहीद नहीं मानती ? क्या बाबा रामदेव को ब्लैकमेल किया जा रहा है ? भूखे को क्या रोटी या मोबाइल ? असम की प्रतिक्रिया पूरे देश में क्यों ? क्या देश को बेचा जा रहा है ? सोशल मीडिया पर प्रतिबंध कितना सही? क्या नशामुक्ति पर हम गंभीर हैं ? क्या एक था टाइगर फिल्म पर प्रतिबंध लगे ? क्या अश्लील विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगे ? क्या जुआ सटटा लॉटरी को मान्यता देना सही है ? क्या कोयला भ्रष्टाचारियों  पर कार्यवाही होगी ? क्या गाय राष्ट्रीय पशु घोशित हो ? मनमोहन का मीडिया को नसीहत देना कितना सही ? रिटेल में एफडीआइ कितना सही ? प्रफुल्ल पटेल को बचाया जा रहा है ? पत्नियों को वेतन का फरमान कितना सही ? सड़क पर विरोध संसद में ड्रामा कितना सही ? क्या गणेशोत्सव के मायने बदल गये हैं ? मंदिर और शौचालय की तुलना कितना सही ? रावर्टवाड्रा दामाद किसके सरकार या सोनिया के? क्या जायसवाल का मंत्री बने रहना महिलाओं का अपमान हैं? क्या संघ के शिविरों में जाना गलत है ? 7721 रुपए की थाली गरीबों का अपमान नही है ? क्या जाकिर नाईक पर कार्यवाही हो ? क्या हम जेपी को भूल गये ? क्या सरकार सूचना के अधिकार से डर गई हैं ? क्या मनुष्य का जीवन सस्ता हो गया है ? क्या पैसा ही सब कुछ है ?क्या चीन युद्ध से देश ने काई सबक लिया ? क्या कॉर्पोरेट घराने देश के नये जमींदार हैं ? शहीदों को छोड़ आतंकियों का पुर्नवास कितना सही ? इफतार पार्टी देने वाले नवरात्रों में उदासीन क्यों ? क्या नये मंत्रिमंडल से सरकार की छवि बदलेगी? क्या प्राकृतिक आपदाएं भौतिकवाद का परिणाम हैं ? क्या 84 के दंगा पीड़ित सिक्खों को कभी न्याय मिलेगा ?

राम का अपमान करने वाले जेठमलानी पर क्या कार्यवाही हो? विद्याथी को सजा देने वाले शिक्षक को जेल कितनी सही? क्या सरकार कैग, कोर्ट, मीडिया से डरी हैं ? क्या राहुल गांधी कांग्रेस को बचा पायेंगे ? बाला साहेब के सपनों का भारत कैसे बनायेंगे? कसाब को गोपनीय तरीके से फांसी देना कितना सही ? क्या अधिकारी पर कार्यवाही नेता का अधिकार हो ? आतंकियों के समर्थक जाकिर पर क्या हो कार्यवाही ? क्या जाकिर भारत का तालिबानीकरण कर रहा है ? आगे क्या हो जाकिर का ? सर क्रीक पाकिस्तान को सौंपना कितना सही ? पाक के सामने क्यों झुक रही है सरकार ? 4 रुपए में पूरा दिन कैसे काटें शीला जवाब दो ? क्या नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनना चाहिए ? बलात्कारियों को क्या हो सजा ? क्या सरकार असंवेदनशिल हो गई है ? क्या कॉर्पोरेट को रेप पर बोलने का अधिकार है ? ओवैसी पे देशद्रोह का मुकद्दमा क्यों नहीं ? ओवैसी की पार्टी की मान्यता रद्द क्यों नहीं ? अलगाववादी तत्व क्यों बढ़ रहे हैं ? क्या अकेले ओवैसी की गिरफतारी काफी है ? क्या पाक का नामोनिशान मिटाना चाहिए ? क्या हम विवेकानंद के आदर्शों को भूल गए हैं ? इस देश का असली बिग बॉस कौन ? क्या हम सुजाता पाटिल को जेल में डालने देंगे ? क्या महेश भट्ट के पाक संबंधों की जांच हो ? क्या आरएसएस आतंकवादी है ? क्या ये लोकतंत्र है ? 26 जनवरी 15 अगस्त पर छुटटी क्यों? क्या अन्ना की नई पारी सफल होगी ?

कश्मीरी अलगाववादियों को जेड प्लस सुरक्षा कितनी सही? संतों को पीएम नाम पर सुझाव  देने से रोकना कितना सही? अफजल की फांसी में देरी के गुनहगारों को सजा कब ? शीला को युद्ध स्मारक बनाने पर आपत्ति क्यों ? क्या प्यार की परिभाषा बदली है ? देशद्रोही ओवैसी को 10 हजार की जामानत पर छोड़ना सही है ? क्या बंगाल बांग्लादेश बन रहा है ? क्या देश को आज फिर पोटा कानून की जरूरत है? क्या रामसेतु तोड़ने की साजिष सफल होगी ? बांग्लादेश में हिंदू अत्याचार पर भारत चुप क्यों ? क्या स्त्री भोग वस्तु बनकर रह गई है ? समाजरूपी महादेव की तीसरी आँखें कब खुलेगी ? क्या सरकार अनैतिकता बढ़ा रही है ? क्या हमारी विदेश नीति विफल हो गई है ? क्या हिंदू धर्म को खत्म किया जा रहा है ? संजय दत्त से सहानुभूति क्यों ? भगत सिंह को शहीद का दर्जा क्यों नहीं ? क्या तीसरे मोर्चे के राजनीति देश क लिए सही है? क्या आज वीर शिवाजी महाराज के विचारों की जरूरत है? धर्म के आधार पर कोर्ट बनाना कितना सही ? क्या सारी नदियां जोड़ी जाएं ?क्या रिश्ते पैसों की बलि चढ़ रहे हैं ? नक्सली बनो पैसा पाओं नीति कितनी सही ?

पुलिस थानों से भगवान को हटाना कितना सही ? क्या हम रामायण से दूर हो रहे हैं ? इतनी हैवानियत क्यों बढ़ रही है ? क्या अब चीन को सबक सिखाने का वक्त है ? क्या मीडिया-समाज में सेना के प्रति उदासीनता है? आतंकियों की रिहाई की राजनीति कितनी सही ? चीन पर सरकार समाज उदासीन क्यों? क्या भारत को पोर्निस्तान बनाया जा रहा है ? वंदे मातरम् का अपमान देशद्रोह क्यों नहीं ? सर्वप्रंथम क्या देश या धर्म ? क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए ? क्या एफडीआई और वाल्मार्ट के लिए भारतीय व्यपारियों को खत्म किया जा रहा है ? पानी का निजीकरण कितना सही ? क्या क्रिकेट से नेताओं को हटाना चाहिए ? क्या नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारा जाए ?

पत्रकारिता-गिरावट या तरक्की ? क्या सट्टंबाजी को वैध किया जाए ? इश्वर के प्रति आस्था बढ़ी है या घटी है ? क्या राजनीतिक दलों को आरटीआई में लाएं ? मोदी का विरोध क्यों ? क्या हम महाराण प्रताप को भूल रहे हैं ? अदालती कार्यवाही हमारी भाषाओँ में क्यों नहीं ? क्या सभी को आर्मी शिक्षा दी जाए ? आज के युवाओं में पिता के प्रति संस्कार कम हैं ? उत्तराखंड तबाही को राष्ट्रीय आपदा घोशित हो ? इस आापदा में आप क्या मदद करेंगे ? रुपए का मूल्य क्यों गिर रहा है ? उत्तराखं डमें कैसे करें पुनर्वास ? क्या मोंदी को जेल में डालने की तैयारी है ? शाहरूख के किराए की गोद पर आप क्या कहेंगे ? खाद्य सुरक्षा हमदर्दी या राजनीति ? उत्तराखंड तबाही के पीछे कहीं चीन तो नहीं ? क्या राजनीति जातिभेदभाव बढ़ा रही है ? हिंदू राष्ट्रवाद पर आपत्ति क्यों ? क्या देशभर के डांसबार बंद हों ? मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कितना सही ? राजनीति के लिए सुरक्षा एजेंसियों दुरूप्योग कितना सही?

हुड़दंगियों पर धार्मिक आधार पर कार्यवाही कितनी सही ? गउ गोपाल पर सरकार मीडिया चुप क्यों ? पाठयक्रम में राहुल गांधी कितना सही ? क्या दोस्ती के मायने बदल गए हैं ? पाकिस्तान को क्यों बचा रही है सरकार ? जोधा अकबर का झूठ कब तक ? क्या कश्मीर से पलायन कराया जा रहा है? पाक-हिंदुस्तानियों के लिए आप क्या करेंगे ? भारत में इस्लामिक बैंक कितना सही ? सुदर्शन धारी श्रीकृष्ण की पूजा क्यों नहीं ? रुपए  को बचाने के लिए मंदिरों को सोना गिरवी रखना कितना सही ? संतों के खिलाफ ही क्यों होती है साजिश ? सरकारी योजनाओं पर नेताओं की फोटो कितनी सही? क्या ये उत्तरप्रदेश है या दंगा प्रदेश? क्या हो मोदी का एजेंडा? हिंदी अभी भी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं ? क्या बिंदास बोलना जरूरी है ?

1971 की युद्ध से पहले की कहानी !

13 जून 1971 को ब्रिटेन के अखबार द संडे टाइम्स में एक खबर छपी. जिसके मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज का जुल्म बढ़ गया था. इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के सामने पू्र्वी पाकिस्तान के हालात को बयां किया और बताया कि किस तरह पूर्वी पाकिस्तान के अंदर फौज आम लोगों का कत्लेआम कर रही है.

ये उन दिनों की बात है जब भारत के पूरब और पश्चिम दोनों में ही पाकिस्तान था. पूर्वी पाकिस्तान में बांग्ला बोलने वाले लोग थे जबकि पश्चिमी पाकिस्तान में उर्दू जुबान बोली जाती थी. पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान में दो हजार किलोमीटर का फासला था. लेकिन ये एक ही मुल्क के दो हिस्से थे. फौज, और सरकारी नौकरियों में पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का दबदबा था.  जिसके चलते पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने बगावत कर दी. इस बगावत को दबाने के लिये पाकिस्तान की सेना ने मोर्चा संभाला.

25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सेना ने अपने ही मुल्क के बंगाली भाषी लोगों पर जुल्म ढाहना शुरू किया. इस कार्रवाई को पाकिस्तानी सेना ने आपरेशन सर्च लाइट का नाम दिया. बांग्लादेश की सरकार के आंकड़ो के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के दमन में मारे जाने वालों की तादाद 30 लाख थी.

25 अप्रैल 1971 को इंदिरा ने एक कैबिनेट की मीटिंग बुलाई और थल सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को भी बुलाया बैठक में आने के लिए कहा. कैबिनेट की मीटिंग की शुरुआत में इंदिरा गांधी ने खुद पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के मुख्य मंत्रियों की चिट्टियां पढ़ी और फिर मानेकशॉ की तरफ मुड़ कर कहा कि मैं चाहती हूं इस समस्या से निपटने के लिए कुछ किया जाए. मैं चाहती हूं कि पूर्वी पाकिस्तान में सेना भेजी जाए...

युद्ध से मानेकशॉ का कतराना

जनरल सैम मानेकशॉ ने कई वजह गिनाते हुए कहा कि अभी हम युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है. 25 अप्रैल की इस मीटिंग में फिलहाल ये तय हो गया था कि पूर्वी पाकिस्तान में जो हो रहा था उसको लेकर भारत चुप नहीं बैठेगा. युद्ध की तैयारी के खुले आदेश भारत की सेना को मिल गए थे. दूसरी तरफ 7 मार्च 1971  को पूर्वी पाकिस्तान के ढाका शहर में बंगबंधु मुजीबुर्रहमान ने जोरदार भाषण दिया. और पश्चिमी पाकिस्तान के अत्याचारी शासन के खिलाफ पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन शुरु हो चुका था.

शेख मुजीबुर्रहमान पाकिस्तान के बांग्लाभाषी लोगों का नेतृत्व कर रहे थे. पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ शेख मुजीब का विरोध पहले से ही था. जब 1956 में यह फैसला हुआ था कि पूर्वी बंगाल को अब पूर्वी पाकिस्तान कहा जाएगा. मुजीब ने इसे बंगाली संस्कृति और पहचान के लिए खतरा बताया. शेख मुजीबर्रहमान को पूर्वी पाकिस्तान में बंगबंधु कहा जाता था. उन्हें इतना जबरदस्त समर्थन हासिल था कि दिसबंर 1970 के आम चुनाव में दो सीटों को छोड़कर पूर्वी पाकिस्तान की सभी सीटों पर मुजीब की पार्टी आवामी लीग की जीत हुई. इस जबरदस्त जीत के बाद पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में भी उनकी पार्टी को बहुमत हासिल हो गया.

बंगबंधु का विरोध

बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान को मिली जबरदस्त जीत और उनके लोकतांत्रिक आंदोलन से पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहया खान और आम चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो, दोनो ही घबराए हुए थे. शेख मुजीबुर्रहमान ने चुनाव के नतीजों के आधार पर सरकार बनाने की पेशकश की.. लेकिन याह्या खां और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की जोड़ी ने आवामी लीग को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया. इस रवैये से नाराज मुजीबुर्ररहमान ने 7 मार्च 1971 को पश्चिमी पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ बिगूल फूंक दिया. मुजीब समर्थक सड़कों पर उतर आए. आंदोलन की अगुवाई कर रहे मुजीबुर्ररहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तानी की जेल में भेज दिया गया.

जीनोसाइड यानी नरसंहार. पूर्वी पाकिस्तान में उन दिनों यही हो रहा था. पश्चिमी पाकिस्तान की सेना के जुल्मों से बचने के लिए हजारों की संख्या में शरणार्थी रोज भारत के पूर्वी राज्यों में आ रहे थे. पूर्वी पाकिस्तान के हालात से पैदा हुई स्थिति से इंदिरा के सामने दोहरी चुनौती आ ख़ड़ी हुई. एक थी शरणार्थियों की वजह से पूर्वी राज्यों में किसी भी तरह के सांप्रदायिक तनाव को रोकना और दूसरी इन शरणार्थियों के रहने और खाने की व्यवस्था करना.

भारत में शरणार्थियों के लिए राहत शिविर लगाए गए थे. मई 1971 में इंदिरा ने खुद शरणार्थियों के लिए बने राहत शिविरों का दौरा किया और कहा कि उनकी मदद के लिए जो कुछ हो सकता है किया जाएगा. इतना ही नहीं, 24 मई 1971 को इंदिरा ने लोकसभा में यह बयान देकर दुनिया के सामने भी भारत का रुख साफ कर दिया कि “आज जिसे पाकिस्तान की आंतरिक समस्या कहा जाता है वह भारत की भी आंतरिक समस्या बन गई है. इसीलिए हम पाकिस्तान को यह कहने के हकदार हैं कि वह आंतरिक मामलों के नाम पर जो कार्रवाइयां कर रहा है उसे तत्काल बंद करे."

इंदिरा ने इस बात पर जोर दिया कि अब यह पाकिस्तान का अंदरूनी मामला न रहकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है इसलिए बड़े देशों को मिलकर पाकिस्तान पर दबाव बनाना होगा. अमेरिका उन दिनों चीन के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाने में लगा हुआ था. इसके लिए उसे पाकिस्तान की जरूरत थी. इंदिरा ने इसके जवाब में ऐसा पासा फेंका जिसकी अमेरिका ने कल्पना भी नहीं की थी.  9 अगस्त 1971 को भारत और सोवियत संघ ने एक ऐसा समझौता किया जिसके तहत दोनो देश एक दूसरे की सुरक्षा का भरोसा अपने उपर ले लिया.

इधर पूर्वी पाकिस्तान के हालात बद से बदतर होते जा रहे थे. वहां पुलिस, पैरामिलिट्री फोर्स, ईस्ट बंगाल रेजिमेंट और ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स के बंगाली सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज के खिलाफ बगावत कर खुद को आजाद घोषित कर दिया था. और सभी मुक्ति वाहिनी में शामिल हो गये . अब लड़ाई मुक्तिवाहिनी और पाकिस्तानी फौज के बीच हो रही थी. मार्च से सितंबर तक भारत में करीब 1 करोड़ शरणार्थी आ चुके थे. इसकी वजह से भारतीय खजाने पर करीब 300 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा था. कई देशों ने भारत की आर्थिक मदद का भरोसा दिया लेकिन पाकिस्तान पर लगाम लगाने के मूल मुद्दे पर सब खामोश थे.

इंदिरा का सब्र का बांध टूटा

इंदिरा के सब्र का बांध अब टूट चुका था. उधर पाकिस्तान अमेरिका और चीन के दम पर रह रह कर युद्ध के लिए ललकारने की कोशिश कर रहा था. नवंबर के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान के विमानों ने बार बार भारतीय वायु सीमा का उल्लंघन शुरू कर दिया. इस पर भारत की तरफ से पाकिस्तान को चेतावनी दी गयी लेकिन बजाय संभलने के पाकिस्तानी राष्ट्रपति याहिया खान ने 10 दिन के अंदर युद्ध की धमकी दे डाली. इसी बीच पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति सेना एक के बाद कई पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करती जा रही थी. ऐसे में पाकिस्तान ने अपनी रणनीति बदली और भारत की पश्चिमी सीमा पर गोलीबारी तेज कर दी.

आखिरकार भारतीय सेना ने भी जवाबी कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. 3 दिसंबर 1971 को इंदिरा एक दौरे पर पश्चिम बंगाल में थी. जब उन्हें खबर दी गयी कि पाकिस्तान ने भारत की पश्चिमी सीमा हर हवाई हमला कर दिया है. इंदिरा तुरंत दिल्ली लौट आयी और दिल्ली पहुंचते ही इंदिरा सीधे मैप रूम पहुंची, जहां उन्हें हालात के बारे में बताया गया.

आधी रात हो चुकी थी जब इंदिरा ने ऑल इंडिया रेडियो के जरिए पूरे देश को संबोधित किया. और कहा - कुछ ही घंटों पहले पाकिस्तानी हवाई जहाजों ने हमारे अमृतसर, पठानकोट, फरीदकोट श्रीनगर, हलवारा, अम्बाला, आगरा, उत्तरलाई, जोधपुर, जामनगर, सिरसा और सरवाला के हवाई अड्डों पर बमबारी की. आप सबको मालूम है कि हम इस कोशिश में थे कि बांग्लादेश का मसला शांति से निपटे. स्थिति बिगड़ती गयी, मुक्तिवाहिनी ने उन आदर्शों की लड़ाई लड़ी, जो हम लड़ते रहे हैं. अब बांग्लादेश पर जो लड़ाई थी वो भारत पर भी आ गयी है, मुझे संदेह नही है कि विजय भारत की जनता की और भारत की बहादुर सेना की होगी.

14 September 2013

हिन्दी अभी तक राष्ट्रभाषा क्यों नहीं ?

                                               भाषा जो सम्पर्क की, हिन्दी उसमे मूल।
                                            भाषा बनी न राष्ट्र की, यह दिल्ली की भूल।।

हिन्दी दिवस के अवसर पर आज दिल्ली की इसी भूल को याद दिलाने के लिए हम ये कार्यक्रम आपके बिच लेकर आए है। देश में आज भले ही लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हैं। देश के सर्वाधिक लोग हिंदी को अच्छी तरह से समझते और बोलते हैं। मगर आज यह भी एक सत्य है कि हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा है ही नहीं। जी हां, सूचना के अधिकार के तहत गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा जो सूचना दी गई है उसके अनुसार भारत के संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी भारत की राजभाषा है, न की राष्ट्रभाषा । यानी इसका मतलब ये हुआ कि हिन्दी सिर्फ राजकाज की भाषा मात्र है। भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा का कोई उल्लेख नहीं है। तो सवाल भी खड़ा होता है कि अब तक सर्वाधिक बोली जाने वाली हिन्दी को राष्ट्रभाषा की दर्जा क्यों नहीं मिल पाई है ?

जिस हिन्दी भाषा ने स्वतंत्रता संग्राम के समय पूरे देश के लोगों को जोड़ने का काम किया, देशवासियों को अंग्रेज और अंग्रेजियत से मुक्ति दिलाने में अहम भूमिका का निर्वहन किया, आज वही हिन्दी इतनी उपेक्षित और निरीह क्यों है? विश्व के सबसे बड़े स्वतंत्र भारत की कोई अपनी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं है? इस देश में अपना राष्ट्र ध्वज है, राष्ट्रगीत है तो फिर राष्ट्रभाषा क्यों नहीं? इसका जवाब न तो हमारी सरकार के पास है और ना ही विपक्ष के पास। 

विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र की बात कह हम गौरवान्वित तो होते हैं, किंतु राष्ट्रभाषा की अनुपस्थिति इस गर्व पर एक काला परदा जरूर डाल देती है।राजनीतिक दलों ने हिंदी को अपनी राजनीति का आधार बनाय लिया है। वे अपनी राजनीति हिन्दी भाशा में करते है ताकी पूरे देश भर में उनका संदेश जाय मगर जब बात राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता देने कि आती है तो कदम पीछे खिंच लेते है। यहां उनकी राष्ट्रीय राजनीति क्षेत्रिय दलों की तरह हो जाती है। ऐसे ये दो लाईन ऐसे नेताओं पर सटीक बैठती है।
        
                                          मंत्री की सन्तान सब, अक्सर पढ़े विदेश।
                                          भारत में भाषण करे, हिन्दी में संदेश।।

महात्मा गांधी ने घोषणा की थी कि राष्ट्रभाषा के बगैर देश गूंगा है। तो सवाल उन गांधी के नाम पर राजनीति करने वालों से भी है कि वे इस देश को कब तक गूंगा बना कर रखेंगें? हिन्दी अभी तक राष्ट्रभाषा क्यों नहीं ? 

13 September 2013

केदारनाथ में पूजा पर राजनीति क्यों ?

आज एक ओर जहां उत्तराखंड में पीडि़तों को प्रभावित इलाकों से निकालने के लिए भारतीय सेना और वायुसेना ने मौसम और वक्त के खिलाफ जंग अब भी जारी है। वहीं हमारे माननीय सांसद और नेता इस पर अपनी राजनीति की रोटी सेकने से बाज नहीं आ रहे हैं। बुधवार को तेलगुदेशम पार्टी के नेता रमेश राव और कांग्रेस के हनुमंत राव आपस में भिड़ गए। साथ ही केदारनाथ में पूजा को लेकर वहां के मुख्य पुजारी रावल और जगदगुरू शंकराचार्य में ठन गई है।

उत्तराखंड सरकार भले ही फिर से पूजा शुरू करा दी, लेकिन तीर्थ पुरोहितों और सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी में भी इसे लेकर विरोध के स्वर फूट पड़े हैं। सरकारी पूजा का विरोध करने वालों का कहना है कि चातुर्मास में दोबारा पूजा शुरू कराने का कोई औचित्य नहीं है। तो ऐसे में सवाल ये खड़ा होता है कि केदारनाथ में पूजा को लेकर सरकारी आपदा क्यों खड़ी कि जा रही है ?

कांग्रेस नेता और सांसद सतपाल महाराज ने कहा कि 5 अक्टूबर से शुरू होने वाले शारदीय नवरात्र से ही केदारनाथ मंदिर में पूजा शुरू की जानी चाहिए थी और अपने इस विचार के बारे में उन्होंने मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को बता दिया था। कांग्रेस सांसद ने कहा कि संत समाज के मुताबिक, रक्षाबंधन के बाद और नवरात्र शुरू होने से पहले कोई देवकार्य नहीं किया जाता। सतपाल महाराज ने कहा कि इस संबंध में सरकार को पुरोहित समाज से भी पूछना चाहिए था। मगर सरकार ने ऐसा नहीं किया। भाजपा नेता बीसी खंडूड़ी और रमेश पोखरियाल ने भी इस समय पूजा शुरू कराने के औचित्य पर सवाल उठाया है।

100 साल में यह पहला मौका था जब पूजा में न तो भक्त शामिल हुए और न ही स्थानीय तीर्थ पुरोहित। सिर्फ उत्तराखंड सरकार के मंत्री और अधिकारी ही पूजा के साक्षी बनें। सरकार ने इसके लिए 11 तारीख को 11 मंत्री और विधायक के इस पूजा को सम्पन्न कराया। ऐसे में इस पूजा को लेकर एक सवाल ये भी खड़ा होता है कि सरकार मंदिर का नहीं अपना शुद्धीकरण करा रही है। साथ हैरान करने वाली बात ये है कि इस वीआईपी पूजा पर 45 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए गए, वो भी बिना किसी मुहूर्त के। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि केदारनाथ में सरकारी आपदा क्यों ?

12 September 2013

आधुनिक भारत और यौन शिक्षा की ज़रूरत !

यौन शिक्षा का एबीसी।अब यही बाकी बचा था। इसे भी पूरा कर दो। क्यों रखोगे बच्चों को भी चैन, सुकून में। उनसे उनका बचपन भी छीन लो। उसे भी बाजारवाद की अंधी गलियों में परोस दो। बना दो एक जीवंत उत्पाद। जो सज-संवर के बिक रहे हैं अभी चोरी-छिपे। उसे खुले बाजार का हिस्सा बना डालो। बिकने दो उनके जिस्म और खरीद लो मनचाहा बचपन। बच्चे अब तक ही कहां थे सुरक्षित। कहां था उनमें बालपन कि उसे सेक्स की शिक्षा देकर खड़ा करना चाहते हो चौराहों पर। खुले बदन निहारना चाहते हो चंचलता को। समाज के सामने खुद की भूख के लिये खड़ा करना चाहते हो मासूमों को, तो देख नहीं रहे, तुम्हारे सामने है समाज का सच। सब कुछ बिल्कुल साफ। समाज में कई नाम हैं इन फेहरिस्त में। खंगाल लो पुलिस फाइल से। झांक कर देखो शहर से लेकर गांवों तक के स्कूलों में। दीवारों पर तुम्हें वैसे ही मिल-मिलेंगे पढऩे के लिये कई किस्से, जिससे तुम्हारे अंदर की हैवानियत जाग जायेगी। बहशी हो जाओगे तुम यह जानकर कि जिन्हें तुम कल-तलक मासूम, समझ रहे थे वो उससे आगे हैं। स्कूलों के ब्लैक बोर्ड से लेकर बाथरूम व अन्य दीवारों पर कभी झांक कर देखो वहां तुम्हें वैसे ही बचपन जवान होता दिखेगा। फिर क्यों उसे और उसकाना चाहते हो। उन दीवारों पर परोसे जा रहे अश्लीलता को तुम व्यवहार में लाना चाहते हो पढ़ाओगे ही कि सेक्स क्या है। कैसे करते हैं तो तेरी मर्जी। पढ़ाकर ही देख लो। तुम्हारा सभ्य समाज कहां जाकर रूकता, ठहरता है देख लेना। 

अभी तुम्हारा कालेज तो दूर, स्कूल परिसर के बाहर ही अभद्रता है। चाट-पकौड़े खाते, पान चबाते, सिगरेट पीते मनचले लड़कों को लेकर वहां खूब चल रही है लोगों की दुकानें। अब तुम भी स्कूल-कालेज परिसर में खोल लो कंडोम की दुकान ताकि प्रैक्टिकल ज्ञान वो अपने मनपंसद फ्लेवर के साथ कर सकें। अरे अब भी शर्म करो। चेत जाओ। मां-बाप के बेडरूम में बच्चों को मत झांकने की इजाजत दो। देख नहीं रहे हो जेएनयू में छात्रायें पोर्न धंधे में लिप्त मिल रही हैं। बड़े-बड़े स्कूलों की लड़कियां सेक्स रैकेट में संलिप्त हैं। ब्लू कैसेट बच्चे बेच ही नहीं रहे बल्कि बड़ों के साथ हमबिस्तर होते तुम उन्हें परोस भी रहे हो खुलेआम। फर्क भी सामने आ रहा है। बड़े-बड़े शहरों में बच्चों का अभिवादन करने का तरीका भी तुम्हारे लिये मुसीबत बन गया है। बच्चे अब हाथ मिलाकर या गले मिलकर अभिवादन नहीं कर रहे बल्कि चुंबन लेकर कर रहे हैं। होठों पर किस करते देख शिक्षिकायें भी हैरान हैं। अब सेमिनार होगा। माता-पिता को बुलाया जायेगा। अभी तो बुलाबा है बाकी क्या होगा खुद सोच लो। कहां ले जाना चाहते हो बच्चों को। क्या शिक्षा देना चाहते हो उन्हें। किसको कहोगे कल होकर शिक्षित। 

सोचो, जब तुम्हारे घर में बच्चे सेक्स के बारे में तुम्ही से सवाल दागेंगे। कहेंगे, पूछेंगे। अश्लीलता तुम्हारे घर से ही शुरू हो जायेगी। तुम क्या सिर उठाकर नजरें मिलाकर बच्चों से बात कर सकोगे। वैसे चिंता की कोई बात नहीं। मुंबई की सांसद प्रिया दत्त ने यौनकर्मियों को मान्यता दिलाने की पहल, बात कर रही है। शुक्र मनाओ, अगर इस कालेज को मान्यता मिल गयी तो तुम्हारे बच्चों को यौनकर्मी की नौकरी तो समझो एकदम पक्की। क्या कहां मैं कुछ गलत कह रहा हूं। क्यों तुम्ही बतलाओ इसमें बुरा क्या है। जो पढ़ोगे उसी फैकेल्टी की नौकरी मिलेगी ना। समाज में लोग शिक्षा मित्र की नौकरी पा ही रहे हैं। विकास मित्र बन ही रहे हैं तो यौन मित्र बनने में गुरेज कैसा। बच्चे को यौन शिक्षा देने पर आमादा हो लेकिन उसे यौनकर्मी नहीं बनाओगे। नौवीं व ग्यारहवी के बच्चों को यौन शिक्षा देने पायलट प्रोजेक्ट बना चुके हो। बारह साल की उम्र में बच्चों के बीच सेक्स को वैध करार देने के लिये प्रस्ताव पर विचार कर रहे हो। 

बारह साल के बच्चों के बीच नान पैनेट्रटिव सेक्स यानी बाहरी अंगों के साथ सेक्स को अपराध मानने से इनकार के लिये मसौदे तैयार कर रहे हो। बाल विकास मंत्रालय के पास प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल आफसेज बिल 2010 पड़ा है लेकिन तुम तो बच्चों को रूपम पाठक बनाना चाहते हो जो एक दिन खुद खंजर उठाकर तेरे सिने पर खड़ा हो जाये। परोसो, खूब परोसो। नग्नता को उछालो। मगर सोच लेना पहले और बाद का सेंस आफ सेक्स। बच्चे तुम्हारे हैं। सेक्स की पढ़ाई तुम्हारी जरूरत ही है। इसके बिना तुम शिक्षित नहीं कहला सकते तो एक सलाह बिन मांगें दे रहा हूं- शहर वालों मान लेना गांव मेरा आ गया-बच्चियों के सर पे जब आंचल नजर आने लगे।

क्या देश में भोगवादी और सेक्सवाद की परंपरा जन्म ले है ?

देश की मान्यताओं पर खतरा उग आया है। भोगवादी प्रवृत्ति ने मनुष्यता की तमाम सीमाएं लांध, तोड़ दी है। सेक्सवाद आज सबसे रहस्यमयी मौन, एक ताकतवर चुप्पी के साथ सामने निर्वस्त्र है। और हमारा समाज…। अज्ञात हंसी मंद-मंद मुस्कुराते इस शहद की चासनी में सराबोर, लसलसाए, चुपचाप खड़ा, तमाशबीन बना है। जहां, बसों से लेकर ट्रेनों की सवारी घर की शक्ल में दरवाजों के भीतर कैद, बंद मिलते हैं। कहीं कोई आश्चर्य, पछतावा, संकोच नहीं। यह क्षणिक आवेग नक्सल उस आतंकवाद, भ्रष्टाचार से भी दमदार, खतरनाक, बेखौफ कहीं भी देह को मचोडऩे को तैयार। हश्र, टीस, जख्म में लहूलुहान पूरा परिवार, समाज का हर तबका। समूचा देश मरहम लगाने को बेचैन। तार-तार, हताश शक्ल में। मुंह छुपाने को विवश, लाचार, सड़कों पर पुलिस से जूझते, लड़ते-हारते- हांफते। मानो, हर तरफ, हर नफस, संपूर्ण धर्म, संस्कृति, पूरा कुनबा ही आज अप्राकृतिक होने पर आमादा हो। पहले, यौन शोषण फिर दुष्कर्म अब अप्राकृतिक मैथुन के रूप में। उसी का आवरण लपेटे, बिछाए। उसी के रसीले स्वाद, फ्लेवर में। बिल्कुल नंग-धड़ंग। जहां, शर्म, हया, लोक-लाज, पद-प्रतिष्ठा, गरिमा, उम्र की सीमा कोई मायने नहीं। सभी नग्न। उसी की भाषा बोलते। पूजते-परोसते-खाते। समाज के हर तबके को। 

स्त्री-पुरुष को बिना परिभाषित, निर्धारित, वर्गीकृत किए। बेशर्म आंखों से ताकते, निहारते, चटकारा लेते, हजम करते। मादकता यानी तरह-तरह के सेक्सरेसेपरी, व्यंजनासन का सपाट मंचन। उसी का पाठ, चित्रांकन, नायिका की देह पर कुछ लिखते। क्या नौ-दस साला नर, क्या 75 वर्षीय मंत्री। कोई फर्क, कहीं कोई समझौता नहीं। सब कुछ अप्राकृतिक। विनाश की ओर बढ़ता पूरा देश-काल। भला प्रकृति की शक्ति, उर्वरा, उसकी पवित्रता, अनायास अपवित्र, अनियंत्रित, भटकाव में बहकते, अप्राकृतिक, विकराल स्वभाव में कैसे? प्रकृति का हर रंग अचानक इतना अप्राकृतिक, विकृत मनोदशा में क्यों-कैसे? अप्राकृतिक तरीके से बादल फटते हैं। हजारों मानव-पशुओं की अप्राकृतिक मौत गले लग जाती है। कहीं, अप्राकृतिक बारिश, कहीं सूखा। कहीं रिश्तों के बीच झूलती-लटकती बच्चियां। मासूम जिंदगी की वीभत्स अनकहीं चेहरे। हमें झकझोरती। खुद की ओर खिंचती। दु:ख, विषाद नजरों से टटोलती, कुछ बोलती। चिंतित, हताश, सोचने को विवश करती। सकपकाई सी। यानी फिर से समाज में उसी नग्नपंथियों का जोर। जहां वस्त्रहीन, निरावरण अवस्था में नर-मादा नग्न विचर रहे। बाहर मैदान में क्रीड़ा़-कौतुक करते।

 पानी में देहों पर नग्न रेत की धार बहाते, नहाते, स्नान करते। भोजन संबंधी आयोजन में लगे। खुले में आग पजारे, जलाए। सच है, महाविनाश की विध्वंस लीला जब कराल-अट्टहास के साथ असहाया पृथ्वी की छाती पर नग्न नृत्य करने लगे। समाज में पाश्विक मनोवृत्तियों से परवश, निस्सहाया स्त्रियों का आर्त-क्रन्दन निरंतर ध्वनित होकर परिवेश, समाज के आकाश को विदर्ण, छेद करते दिखे। वीभत्स, धोर नीचतापूर्ण व निपट अमानुषिक अत्याचार की बातें स्वत: प्रकृति से दूर अप्राकृतिकता की श्रेणी में आ उतरे तो चकित, विभ्रान्त, वित्रस्त मानवीय स्वभाव, ह्रदय का अप्राकृतिक होना स्वभाविक। ऐसे में, समाज का अमानुशिकता की ओर बढ़े कदम से पतन की सीमा कल्पनातीत है। वर्तमान सभ्यता की उच्छृश्रंखता विचारें तो परिणाम प्रधानत: पंभावात्मक के संकेत साफ हैं। जहां युद्ध, विग्रह, अंतर राजनीतिक कलह, अशांति व उन्मक्त इंद्रिय परायणता के अतिरिक्त और कोई लाभ इस सभ्यता से होते नहीं दिख रहा।

प्रकृति का साथ छूटने की पीड़ा देखिए। एक भाजपाई मंत्री हवस में तल्लीन। संस्कारित उग्र दराज पत्नी, बेटी को छोड़। मोहपाश में एक नौकर के अंगों को तलाशता, अप्राकृतिक हो उठता है। एकनामी पति अपनी गिरामी पत्नी, सफल नायिका, एक मॉडल को अप्राकृतिक संबंध कबूलने, करने को धमकाता है। बसपा का मंत्री गर्भवती बीवी के साथ अप्राकृतिक रसलोलुप्य चाहता, मांगता और विरोध करने पर उसकी पिटाई-मारपीट सरेआम। वेस्ट प्वाइंट में सेना की प्रशिक्षण ले रही महिलाओं की सर्जेंट नहाती हुई तस्वीर उतारते। पांच बेटियों के साथ बीस साल तक रेप करता बाप। कहीं एक युवक अपने दोस्त। एक लड़की अपनी ही सहेली से अप्राकृतिक, बिल्कुल असहनीय, असहज, उन्मुक्त।

समाज क्षण भर में पराया कैसे हो सकता? समय की सुई में ये पल-पल अप्राकृतिक बदलाव। हर वर्ग का अनायास होमो सेक्सुअल-गे हो जाना, कहां से, कैसे? निसंदेह सोचनीय। जिस नारी का जन्म से सम्मान करना हमने सीखा। उसे ही अप्राकृतिक सजा भोगने को विवश, लाचार, सजा देने का ये रिवाज, क्यूं? भारतीय संस्कृति की पूजा-परंपरा, सरोकार, धरोहर, रीति-रिवाज, रहन-सहन में जिस औरत के स्तन से दूधपान कर लिया वह मां की श्रेणी में आ सी गई। मगर, आज हमारे समाज के बहुमूल्य लोग उसी औरत को खरीद रहे हैं जो एक-दो दिन पूर्व ही मातृत्व को भोगा है। मंशा साफ, उसी के नव उठान वक्ष से दूध का रस उसका पान किया जा सके महज शौक, सनसनी, मदनोत्सव पूरे सेक्सोन्माद के लिए। ठीक उस मंत्री के समान जो अपने नौकर से पहले मालिश करवाता है फिर देह की आग बुझाता, बेशर्म हो उठता है खुलेआम, ट्रेनों, घरों में कहीं कोई पाबंदी, मर्यादा की बंदिश नहीं। संपूर्ण देह को निचोड़ते, फरोशी करते। उसी के सामीप्य, बहते, झांग निकालते, धोते, पोछते। नतीजा, घर के पालतू जानवर भी इन हवसी मानवता से कहीं सुरक्षित नहीं। घोड़े, कुत्ते यहां तक कि डाल्फीन भी बतौर सेक्स मशीनी औजार बने, इस्तेमाल हो रहे।

 45 साला टेक्सास पुलिस की पकड़ में आता है जो पड़ोसी की घोड़ी के साथ कामवासना की आग जलाए, पजारे, उसी को धधकाए बैठा था। मेट्रो ट्रेन में सफर करती छोरी अपने ही मित्र एक छोरे के साथ सीसीटीवी फुटेज के सहारे पोर्न साइट की हकदार, हमसफर बन जाती है। इस सबके बीच हसीन, जवान, इश्क करता एक बीए पास युवक भी है बहनों की पेट भरने के लिए अपनी ही मालकिन से छुपता-छुपाता देह बांट लेता है। बाद में मालकिन की बढ़ती प्यास उसकी सहेलियां भी चुपचाप इस उन्मक्त लास्यलीला में सहभागी, तरंगित हो पति-पत्नी के प्राकृतिक प्रेम को विरोध की श्रेणी में अमर्यादित, अप्राकृतिक बना देती है। फलसफा, सिक्वेंसिग आईवीएफ तकनीक सामने, जिससे कम लागत में बच्चे पैदा होने लगे हैं या शाहरुख को अपने ही बेटे अवराम को लेकर सफाई देने की नौबत।

 अब देखिए ना, क्या आसाराम का इस उम्र, ओहदे धर्म गुरु के चोला में सेक्स के प्रति समर्पण एक अप्राकृतिक स्वभाव सा ही कुछ नहीं दिखता। हालात, जहां शारीरिक सौष्ठव ही उस दहलीज को पार, उतरने को बेकाबू हैं जो पति नंबर 1 कहलाने के लिए जापानी तेल की जरूरत नहीं महसूसता। बस एक नौकर रख लेता है। वही मालिश भी करता है। आवेग के आगे जींस भी उतार अप्राकृतिक, गलेफाश लेता है। या फिर अपने शिष्य की बेटी से कामुकता की हद तोड़ता सफेद दाढ़ी वाला मनुष्य को नैतिकता, आध्यात्मिक पाठ पढ़ाता बार-बार नाबालिगों के जिस्म से खेलने को उकस पड़ता है।

भारत में प्रत्येक 20 मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार हो रहीं हैं !

एक ऐसा देश जहाँ अगली 16 तारीख से माँ दुर्गा के नौ अलग अलग रूपों की दिन रात पूजा होगी| महिला पुरुष उपवास कर देवी को खुश करने के लिए अपना तन मन धन सभी कुछ अर्पित कर देंगे| अब आपको दिखाते हैं तस्वीर का दूसरा पहलू, इसी देश में नारी को वो चाहे किसी भी उम्र की हो उसे पुरुष भूखे भेड़िये की तरह देखते हैं और जब भी मौका मिलता है उसकी अबरू को तार तार कर देते हैं। अबतक तो आप समझ गए होंगे की हम बात कर रहे हैं भारत देश की अपने वतन की| पिछले कुछ दिनों पर नज़र डालें तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित पश्चिम बंगाल के अलग अलग कोने में नारी पुरुषों की हवस का शिकार बनी है| कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी कहा, ''ये सच है कि बलात्‍कार की घटनाएं बढ़ी हैं लेकिन ऐसा सिर्फ हरियाणा में नहीं देश के सभी राज्‍यों में हो रहा हैं|' देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश जहाँ एक युवा सत्ता का संचालन कर रहा है, वहां पिछले नौ महीनों में 1040 महिलाओं से बलात्कार की घटनाएं सामने आयी हैं। रोज की खबरें देखने पर बलात्कार की एक नहीं दो तीन खबरें आखों के सामने होती हैं। देश की राजधानी दिल वालों की दिल्ली में भी लगातार बलात्कार की खबरें चर्चा में रहती है, यहाँ ये भी जान लेना आवश्यक है कि ऐसे मामलों में गवाह भी मुकर जाते हैं और दोषी को सजा नहीं मिल पाती। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आकड़ों के मुताबिक देश में हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है।

हमारे ही देश में उपलब्ध आंकड़ो के अनुसार महिलाओं के लिए भारत दुनिया में सबसे खतरनाक स्थान बन चुका है। देश के किसी भी कोने में महिलाएं सुरक्षित नहीं है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा 2011 में दिए गये आंकड़ों पर गौर करें तो सामने आयेगा की हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है और तीसरा बलात्कार पीड़ित बच्चा होता है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के आरोपी को सजा मिल ही नहीं पाती।

हमने जब उपलब्ध आकड़ों पर जमी धूल झाड़ी तो सामने आया कि वर्ष 2010 में मध्य प्रदेश में सबसे अधिक बलात्कार हुए। वहीँ हरियाणा में पिछले एक महीने के दौरान दर्जन भर बलात्कार के मामले सामने आए हैं।

अब यदि इन आकड़ों पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि ये वो मामले हैं जो पुलिस तक पहुंचे| हमारे देश का सामाजिक ढांचा कुछ ऐसा है कि बदनामी और अन्य कारणों से बलात्कार के अधिकतर मामले दर्ज ही नहीं होते। रसूखदार आरोपी के सामने हमारी पुलिस भी नतमस्तक नज़र आती है और समझौता करने का दबाव बना देती है|

प्रत्येक वर्ष बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी होती जा रही है। वर्ष 2011 में देशभर में बलात्कार के कुल 7,112 मामले सामने आए, जबकि 2010 में 5,484 मामले ही दर्ज हुए थे। आंकड़ों के हिसाब से एक वर्ष में बलात्कार के मामलों में 29.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में पंजीकृत होते हैं। इस प्रकार भारतभर में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं बलात्कारियों के हाथों अपनी अस्मत गंवा देती हैं, लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती। बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं हो पाती।

बलात्कार के मामलों में मध्यप्रदेश सबसे आगे रहा, जहां 1,262 मामले दर्ज हुए, जबकि दूसरे और तीसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश (1,088) और महाराष्ट्र (818) रहे। इन तीनों प्रदेशों के आंकड़े मिला दिए जाएं तो देश में दर्ज बलात्कार के कुल मामलों का 44.5 प्रतिशत इन्हीं तीनों राज्यों में दर्ज किया गया। यह आंकड़ा राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो का है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीबी के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। पिछले कुछ दिनों में ही दिल्ली में कार में बलात्कार के कई सनसनीखेज मामले दर्ज हुए। दूसरी ओर राजस्थान की राजधानी जयपुर भी बलात्कार के मामलों में देशभर में पांचवें नंबर पर है। दिल्ली, मुंबई, भोपाल और पुणे के बाद जयपुर का नंबर इस मामले में आता है।

2007 से 2011 की अवधि के दौरान अर्थात चार साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस मामले में दिल्ली नंबर वन रही। एनसीबी के आंकड़ों के मुताबिक देश की राजधानी लगातार चौथे साल बलात्कार के मामले में सबसे आगे है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में साल 2011 में रेप के 568 मामले दर्ज हुए, जबकि मुंबई में 218 मामले दर्ज हुए।

राज्यों की बात करें तो मध्यप्रदेश इस मामले में सबसे ऊपर है। मप्र में रेप के सबसे अधिक 15,275 मामले दर्ज किए गए। पश्चिम बंगाल में 11,427, यूपी में 8834 और असम 8060 का स्थान है। 7703 रेप केस के साथ महाराष्ट्र इस सूची में पांचवें नंबर पर है यानी कुल 51 हजार 299 बलात्कार हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2008 के बीच 18 से 30 की उम्र के करीब 57,257 लोगों को गिरफ्तार किया गया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा यह आंकड़े सिर्फ महिला अत्याचार के आधार पर जारी किए गए हैं।

‘विश्व स्वास्थ संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, 'भारत में प्रत्येक 54वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’ वहीं महिलाओं के विकास के लिए केंद (सेंटर फॉर डेवलॅपमेंट ऑफ वीमेन) अनुसार, ‘भारत में प्रतिदिन 42 महिलाएं बलात्कार का शिकार बनती हैं। इसका अर्थ है कि प्रत्येक 35वें मिनट में एक औरत के साथ बलात्कार होता है।’

रेप के मामलों की जांच में जुटे पुलिस अधिकारियों का मानना है कि ऐसे अधिकतर मामलों में आरोपी को पीड़िता के बारे में जानकारी होती है। यह एक सामाजिक समस्या है और ऐसे अपराधों पर नकेल कसने के लिए रणनीति बनाना असंभव है।

अधिकारियों की मानें तो इनमें से अधिकांश मामले बेहद तकनीकी होते हैं। अक्सर ऐसे अपराध दोस्तों या रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं, जो पीड़िता को झूठे वादे कर बहलाते हैं, फिर गलत काम करते हैं। कई बार ऐसे अपराध अज्ञात लोग करते हैं और पुलिस की पहुंच से आसानी से बच निकलते हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि इसमें पीड़िता की रजामंदी होती है। उसे इस बात के लिए रजामंद कर लिया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि बलात्कार से पीड़ित महिला बलात्कार के बाद स्वयं अपनी नजरों में ही गिर जाती है, और जीवनभर उसे उस अपराध की सजा भुगतनी पड़ती है, जिसे उसने नहीं किया।

08 September 2013

क्या ये उत्तरप्रदेश है या दंगा प्रदेश ?

हमेशा की तरह उत्तरप्रदेश एक बार फिर से दंगे की आग में सुलस रहा है। प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सवा साल अपनी सरकार का पूरा कर चुके है। लेकिन आज भी वह वहीं खड़े हैं जहां सवा साल पहले शपथ लेने के समय खड़े थे। तमाम दावों और उपायों के बाद भी उनकी सरकार को दंगों और दबंगों से छुटकारा नहीं मिल रहा है। न तो मुलायम की नसीहतें काम आ रही हैं न अखिलेश की तेजी से कोई कारनामा रंग ला रहा है। अखिलेश राज में जनता की सुरक्षा दंगों, दागियों और दबंगों की दहशत भारी पड़ रही है। प्रदेष में लगातार एक के बाद एक दंगे हो रहे है। तो वही दुसरी ओर अखिलेश सरकार अल्पसंख्यकों को दंगे का भय दिखा कर उसे रोकने के बजाय अपना वोट बैंक साधने में लगे हुए है। वोट बैंक बचाने के लिये ही दंगाइयों पर हाथ नहीं डाला जा रहा है, बल्कि दबंगों को पनाह दी जा रही है। तो सवाल भी खड़ा होता है कि क्या उत्तरप्रदेश  को दंगा प्रदेश  बनाया जा रहा है।

मुज़फ़्फ़रनगर में सांप्रदायिक हिंसा के चलते अब तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है। यूपी में हुए दंगे के इतिहास में शुक्रवार को एक और नया अध्याय जुड़ गया। मुज़फ़्फ़रनगर में शाम ढलती गई और लाशें बिछती गईं। मगरप् रदेश के मुखिया अखिलेश यादव और उनके सिपहसालार इस बात में उलझे रहे की प्रसाशन को कार्रवाई करने की अनुमती दी जाय या नहीं। क्यों मामला एक खास समुदाय के लोगों द्वारा फैलाये गए दंगे से जुड़ा हुआ था। सुनसान सड़कें, दरवाजों पर लगे ताले, घरों के अंदर पड़ा हुआ टूटा सामान और कुछ जली हुई गाडि़याँ ये चीख. चीख कर कह रही है कि इन दंगे को पूर्वनियोजित तरिके से अंजाम दिया गया है।

मुज़फ़्फ़रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2012 में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए थे। गृह मंत्रालय की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 100 से ज्यादा दंगों में 34 लोगों की मौत हुई और 456 जख्मी हो गए। जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सिर्फ 27 दंगे होने की बात कबुल कर रहे है। अखिलेश सरकार की सरकार कानून व्यवस्था के लिहाज से बदतर साबित हुई हैं और इसने प्रचंड बहुमत की सरकार की हैसियत को दंगों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। अगर इन आकड़ों पर गौर करें तो ये कहना गलत नहीं होगा की उत्तरप्रदेश दंगा प्रदेश बन चुका है।

पिछले साल यानी 2012 में 1 जून को मथुरा में, 23 जून को प्रतापगढ़, 23 जुलाई और 11 अगस्त को दो बार बरेली में दंगे हुए। यही नहीं, 17 अगस्त को लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद में सड़कों पर उपद्रव हुआ तो 17 सितंबर को गाजियाबाद के मसूरी इलाके में दंगा। 24 अक्टूबर को फैजाबाद में दंगे हुए। इस साल 5 मार्च 2013 को अंबेडकरनगर के टांडा में हत्या के बाद दंगा हुआ और अब मुज़फ़्फ़रनगर दंगे का दंश झेल रहा है। उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल में अन्य प्रांतों के मुकाबले सर्वाधिक सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2009 से लेकर अक्टूबर 2012 तक के हालात पर गौर किया जाए तो वहां सांप्रदायिक दंगों की कुल 468 घटनाएं हुई हैं जिनमें करीब सौ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। 

इतना ही नहीं यूपी के ये आंकड़ें बताते हैं कि वर्ष 2009 में 159 घटनाएं हुई तो वहीं वर्ष 2010 में यह आंकड़ा बढ़ कर 185 हो गई, 2011 में कुल 84 दंगे हुए। लेकिन वर्ष 2012 में प्रदेश में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या में अचानक से इजाफा हुआ और अक्टूबर तक सांप्रदायिक दंगों की 104 घटनाएं हुई जिनमें 34 लोग मारे गए और 456 घायल हुए। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ये उत्तरप्रदेश  है या फिर दंगा प्रदेश ?

07 September 2013

बलात्कारी इसाई और मुस्लिम धर्मगुरूओं को सज़ा क्यों नहीं ?

मुगलिया शासक मुहम्मद बिन कासिम द्वारा 711 ई. में राजा दाहिर को हरा कर उसकी दोनों बेटियों का बलात्कार करने की घटना से सुरू हुई ये कुकृत्य हिन्दुस्तान की संस्कृति को नष्ट कर रही है। देश में लगातार बलात्कार की घटनाए हो रही है। मगर आज इन सब के बिच एक खास धर्म समुदाय के धर्मगुरूओं द्वारा जिस प्रकार से देश के अंदर इनके द्वारा बलात्कार करने कि संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े होने लगे है। कैथोलिक चर्च की पूर्व नन सिस्टर मैरी चांडी ने अपने आत्मकथा श्ननमा निरंजवले स्वस्तिस में पादरियों द्वारा किए गए दुराचार के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा किया है। अपनी आत्मकथा में उसने लिखा है कि पादरी ननों के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं। जब वह गर्भवती हो जाती हैं तो बच्चों को गर्भ में ही मार देते हैं। ऐसी प्रवृत्ति यहां लगातार बढ़ रही है।

इस खुलासे से ये बात पूरी तरह साफ हो जाती है की इसाई धर्मगुरूयों द्वारा ऐसे घटनाओं को लगातार अंजाम दिया जा रहा है। मगर यहा गौर करने वाली बात ये है कि ऐसे घटनाओं पर न तो कोई ख़बर दिखती है और ना ही कभी आसाराप बापू की तरह हो हल्ला मचता है। इन मुस्लिम और इसाई धर्मगुरूयों द्वारा किए गए तमाम ऐसे उदाहरण आज मौजूद है मगर अब तक इनके उपर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो रही है। ऐसे में, आईये हम आपको बताते है की आखिर कैसे इन मुस्लिम और इसाई धर्मगुरूयों द्वारा देष भर में बलात्कार के रिकार्ड बनाए जा रहे है। हम पहले सुरूआत करते है इसाई धर्मगुरूओं से,,,!

पंजाब के मोगा जिले में विक्षिप्त 22 वर्षीय दलित लड़की के साथ स्वयंभू पादरी प्रीतन मसीह ने बलात्कार किया। पादरी अब तक फरार है। तो वही हरियाण के जींद में पादरी ने छात्रों को पोर्न फिल्म दिखा कर बलात्कार करने कि कोशिश की मगर अब तक एफाईआर तक दर्ज नहीं हुई है। इंदौर के विजयनगर में एक पादरी रॉबर्टसन ने पूर्व जन्म की प्रेमिका बताकर एक महिला से बलात्कार किया। तो धर्मकोट इलाके में पादरी प्रीतम मसीह ने 18 साल की मंदबुद्धि लड़की के साथ बलात्कार किया। लोगों के दबाव के बाद चार अक्टूबर 2011 को आरोपी पादरी के खिलाफ केस दर्ज कर जांच शुरू कि गई थी। ऐसे में मीडिया का मौन, प्रशासन की नरमी और सरकार की अनदेखी अपने आप में कई अहम सवाल खड़े करते है।

प्रतापगढ़ जिले मे ईसाई मिशनरी के पादरी द्वारा एक एक युवती को चार महीने तक कमरे बंद रखा गया और उसके साथ दुराचार किया जाता रहा। बाद में लड़की ने भाग कर अपनी इज्जत बचाई, मगर अब तक पादरी को सजा नहीं मिल पाई है। तो वहीं श्री नगर थाने के पादरी बीजूमन ने शादी के बहाने 19 वर्षीय एक लड़की से अपने आवास पर बलात्कार किया। जिसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया। साथ ही सिलीगुडी में 16 साल की छात्रा से पादरी जार्ज सैमुअल ने बलात्कार किया। ये सभी बलात्कार कि घटनाए पुलिस थाने में दर्ज है। फिर भी इस देश  में आज तक इनको कोई सजा क्यों नहीं दी गई। कोई सामाजिक संगठन आगे क्यों नहीं आए तो मतलब साफ है कि आज हमारी सरकार अपने मीडिया दोनों इन्हीं के हाथों में खेल रही है।

अब हम आपको बताते है कुछ बलात्कारी मुस्लिम धर्मगुरूओं के बारे में जो आज धर्म कि टोपी पहने भेडि़ए के रूप में घुम रहे है। मध्य प्रदेश के देवास जिले में नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मस्जिद के मौलवी ने बलात्कार किया, मामला अभी कोर्ट में है। तो वही दुसरी ओर 15 साल की लड़की को दुष्कर्म और बंधक बनाने के रखने के आरोप में एक युवक को सिर्फ इसलिए बरी कर दिया गया क्योंकि मुस्लम लॉ में 15 साल की लड़की से शादी करने की अनुमती है। मुजफ्फरनगर जिले के बुढाना शहर में एक 11 वर्षीय बच्ची का अपहरण करने के आरोप में मुस्लिम धर्मगुरु को गिरफ्तार किया गया। जांच के दौरान एक मस्जिद के ईमाम अब्दुल रहीम ने बलात्कार करने की गुनाह कबूल कर ली। वही दुसरी ओर कश्मीर घाटी के बडगाम जिले में बच्चियों को पोर्न दिखाकर मौलवी गुलजार अहमद ने रेप किया। मौलवी को 5 लड़कियों के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है।

अभी घटना थमी ही नहीं थी की एक सूफी धर्मगुरू दरवेश द्वारा 4 लड़कियों का यौन शोषण करने की घटना सामने आ गई। इन सभी तथ्य और घटनाओं के देखने के बाद ये सवाल खड़ा होता है कि इसाई और मुस्लिम धर्मगुरूओं को सज़ा क्यों नही ?

06 September 2013

सरकारी योजनाओं में नेताओं के फोटों कितना सही ?

अपनी उपलब्धियों का बखान करने और योजनाओं का श्रेय लूटने के मकसद से अपने नेताओं की तस्वीरों वाले विज्ञापन देना सरकारों की पुरानी आदत हो चुकी है। अब गरीबों के लिए सस्ती दर पर अनाज या फिर स्वरोजगार के लिए कर्ज या स्कूली बच्चों को बस्ते, पुस्तकें, कपड़े आदि उपलब्ध कराने जैसी योजनाओं में भी प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों की तस्वीरें छापने के मौके तलाश जाने लगे है। दिल्ली सरकार की अन्नश्री और स्वरोजगार के लिए पांच लाख रुपए तक कर्ज मुहैया कराने वाली योजना के आवेदन पत्रों पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और लोक निर्माण मंत्री राजकुमार चैहान की तस्वीरें इसका ताजा उदाहरण हैं। तो सवाल भी उठने लगा है कि इस तरह से सरकारी योजनाओं में नेताओं के फोटो छापना क्या उचीत है ?

भाजपा और दूसरी पार्टियों की सरकारों ने भी पहले प्रचार के ऐसे हथकंडे अपनाए हैं। अनाज की थैलियों, बच्चों के बस्तों, कर्ज के लिए आवेदन पत्रों और लैपटाॅप तकपे आज नेताओं की फोटो छपने लगी है। वोट बैंक की खांचे में अपने आप को फिट बैठाने के लिए इस दिखावे की होड़ में एक सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या आज सत्ता में बैठे नेता योजनाओं को जरूरतमंदों का हक कि जगह खैरात समझने लगे हैं? क्या इस सामंती सोच पे रोक नहीं लगनी चाहिए? सरकारी योजनाओं के माध्यम से नेताओं और मंत्रियों को महिमामंडित करना क्या ये आम आदमी के पैसे का दुरुपयोग नहीं है?

ऐसे ही एक यूपीए सरकार की उपलब्धियों से जुड़े योजना का मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंच गया है। दाखिल कि गई जनहित याचिका में कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के फोटो पर आपत्ति जताई गई है। बात सिर्फ सोनिया गांधी तक ही सीमित नहीं है। आज देश में हर वर्ष नेहरू-गांधी परिवार के चार सदस्यों के फोटों छापने पर जनता की गाढ़ी कमाई के 600 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं।

देष भर में चलने वाले 6500 सरकारी योजनाओं में से पिछले 18 वर्ष में गांधी नेहरू परिवार के नाम पर 450 केंद्रीय और प्रांतीय परियोजनाए चल रही है। इन योजनाओं के बहाने नेताओं की फोटों छापने में सरकार अरबों रूपये पानी कि तरह बहा रही है। क्या ये लोकतंत्र है या फिर प्रचार तंत्र ये सवाल आज देश के हर वो आम आदमी पूछ रहा है जो दिन रात की अपनी मेहनत के बाद सरकारी खजाने को भरने में अपना सहयोग देता है। जिसे हमारे नेता आज गुलछर्रे उड़ा रहे है।

2012 से 2017 के बीच सरकारी योजनाओं पर केन्द्र सरकार 6 सौ करोड़ रूपये खर्च करने कि योजना रखी है, जिसमे से अब तक तीन सौ करोड़ रुपए पहले ही दो साल में खर्च हो चुका है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी जनता के धन से सरकार की उपलब्धियों का प्रचार करने से केंद्र और राज्य सरकारों को रोकने के लिए दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा है। साथ ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी लोकायुक्त कार्रवाई के सिफारिश पर दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग तथा सूचना एवं प्रसार निदेशालय को हिदायत दी है कि भविष्य में इस तरह की गलती नहीं दुहराई जाए। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि सरकारी योजनाओं में नेताओं की फोटों कितना सही है?

03 September 2013

साधू- संतों के खिलाफ ही साजिश क्यों होती है ?

देश में साधु संतो के खिलाफ हमेशा से ही साजिश होती रही है। आज बात चाहे आसाराम बापू कि हो या फिर कांची कामकोटि के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की। हर बार संत तो निराधार साबित हुए मगर साजिशकर्ता की नक़ाब जरूर उठ गई। आज ऐसी ही साजिश बापू जी के खिलाफ भी रची गई है। संत आसाराम खुद ये कह चुके है कि साधु-संतों को साजि़श के तहत लगातार बदनाम किया जा रहा है।  सिंध प्रान्त के नवाबशाह जिले के बेराणी गाँव में जन्मे पूज्य श्री बापू जी हिन्दुस्तान विभाजन के बाद अहमदाबाद आ कर बस गये। तब से लेकर अब धर्म के प्रचार प्रसार में अपना अपना जीवन समर्पित कर राष्ट्रसेवा में लगे हुए है। आज आसाराम बापू के मार्ग पर चलने वाले करोड़ों समर्थक पूरे विश्व में भगवान के तरह पूजते है।

आज ऐसे संत के उपर बलात्कार जैसे कलंक लगा कर पूरे संत समाज को शर्मशार करने कि साजिश हो रही है। तो सवाल भी खड़ा होता है कि ऐसे निराधार आरोप आज देश में सिर्फ संतों के उपर ही क्यों लगाई जा रही है। आखिर कौन सी एैसी ताकते है जो संतों के खिलाफ लगातार साजिश रच रही है? क्या ये हिन्दू धर्म को कमजोर करने की साजिश  है या फिर आगामी लोकसभा चुवान की वोट बैंक पोलिटिक्स।  हमेशा से साधु संतों के मार्ग पर चलने वाला देश अपने रास्ते से क्यों भटक रहा है, आज संत समाज को इस बात पर सोचने को सोचने पर मजबूर होना पड़ रहा है। देश में इस्मालीकरण की आंधी हर ओर अपना पांव पसार रही है। ऐसे समय में साधु संतों के उपर लगाये गए आरोपों में किसी साजि़स से इंकार नहीं किया जा सकता है। आसाराम बापू ऐसी आशंका पहले ही जता चुके है कि मेडम और उनके सुपुत्र के इशारे पर ही उनके खिलाफ साजिश रची गयी है।

आसाराप बापू के उपर लगाये गए ये कोई पहला ऐसा वाक्या नहीं है, इससे पहले भी गुरुकुल के बच्चों पर तांत्रिक विद्या करने की आरोप लगा कर समाज को गुमराह किया गया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आश्रम में तांत्रिक विद्या होने की बात को नकार दिया। देश भर में संत अपमान का अभियान इस वक्त जोरो पर है हर ओर धर्मातरण कराने वाले ठेकेदार नक़ाब ओढ़े घूम रहे है, आज सही कारण है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, शंकराचार्य दयानंद, स्वामी अमृतानंद जैसे संतों के अभियान को साजि़स के तहद खत्म करने के लिए इन्हे तरह- तरह के झूठे आरोपों में फसाया जा रहा है। रात को 12 बजकर 25 मीनट पर अपने आश्रम में सो रहे संत आसाराम बापू को पुलिस हिरासत में लेकर राजस्थान पुलिस और सरकार क्या देश में किसी नए अपालकाल को याद दिलाना चाहती है। तो कभी योग के माध्यम से विश्व को शिक्षा देने वाले स्वामी रामदेव को आधी रात को अनशन स्थल से उठा लेना इस बात का प्रतीक है कि आज देश में संतों की विचारधारा और उनके कार्यो को साजिश कि जाल में डाल कर बदनाम किया जा रहा है। हर यातना और प्रताड़ना का शिकार संत समाज के उपर डालने कि साजि़स क्या इसदेश की इस्लामीकरण कि ओर इशारा नहीं करता है। क्या ये भारत कि एकता और अखंण्डता के उपर खुला प्रहार नहीं है। इन सभी तथ्यों के बाद ये सवाल उभर कर सामने आता है की संतों के खिलाफ ही साजिश क्यों होती है ?

संत आसाराम बापू के समाजिक कार्य: 40 सालों चल रहे है आसाराम जी के प्रवचन। देश भर में 425 आश्रम है आसाराम जी बापू के। 1400 समिति देश भर में मौजूद है। 17000 बालसंस्कार केन्द्र चलाए जा रहे है। 50 गुरूकुल देश भर में मौजूद है। विश्वभर में करोड़ों समर्थक है आसाराम बापू के।

योग गुरू स्वामी रामदेव के समाजिक कार्य: दिव्य योग साधनाः स्वामी जी महाराज द्वारा विभिन्न रोगों के लिये बताये जाने वाले योग-उपचार तथा उनके भजनों पर आधारित भक्ति गीतांजलि व राष्ट्र वंदना की सी.डी.

योग संदेशः योग, आयुर्वेद, संस्कृति, संस्कार व अध्यात्म की संवाहक योग संदेश मासिक पत्रिका। दिव्य फार्मेसीः ऋषियों के प्राचीन ज्ञान एवं अत्याधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से उच्च गुणवत्तायुक्त आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण।

पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेडः शुद्ध, गुणवत्तायुक्त एवं वैज्ञानिक रुप से विकसित खनिज एवं वानस्पतिक उत्पादों के निर्माण ।

पतंजलि फूड एवं हर्बल पार्क लिमिटेडः फूड एवं हर्बल पार्क का निर्माण । लगभग 500 करोड रुपए की राशि से निर्मित। किसानों को उनकी उपजों का उचित मूल्य मिलेगा। इससे किसानों एवं देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इससे 15000 व्यक्तियों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार प्राप्त होगा ।

गुरुकुल का संचालनः किशनगढ घासेडा में आधुनिक एवं प्राच्य विषय की शिक्षा प्रदान की जाती है।

श्री श्री रविशंकर के सामाजिक कार्य: वेद विज्ञान विद्यापीठ। श्री श्री सेंटर फार मीडिया स्टडीज। श्री श्री कालेज और आयुर्वेदिक साइंस एण्ड रिसर्च। श्री श्री मोबाइल एग्रीकल्चरल इनिसिएटीव्स। श्री श्री रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट।

तनाव निष्कासन कार्यक्रमः द आर्ट ऑफ लिविंग कई स्वयं के विकास के लिए तनाव निष्कासन कार्यक्रम का आयोजन करती है जो लोगों को जीवन की चुनौतियों का लातित्यपूर्ण रूप से सामना करने की शक्ति प्रदान करता है। यह कार्यशाला में भाग लेने वालों को ऐसी निपुणता और तकनीकों से सज्जित किया जाता है जिससे उनके जीवन के स्तर में बढ़ावा होता है। इन अनूठे कार्यक्रमों का केन्द्र है सुदर्शन क्रिया, जो एक प्रभावशाली स्फूर्तिकारक श्वसन तकनीक है जो श्री श्री ने विश्व को उपहार में दी है। यह तकनीक भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक तंदुरूस्ती के लिए प्रमाणित है।

मानवता के लिए सेवाः द आर्ट ऑफ लिविंग एक बहु पक्षीय, बिना किसी लाभ वाली शैक्षिक और मानवतावादी गैर सरकारी संस्था है जो 140 देशों में मौजूद है। परम पूज्य श्री श्री रविशंकर द्वारा 1982 में संस्थापित द आर्ट ऑफ लिविंग विश्व की सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था है।

महिला सशक्तिकरणः द आर्ट ऑफ लिविंग ने परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों को कई सारी पहल के द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए उठाया है। इससे ग्रामीण महिला और कारागार और आपदा ग्रसित क्षेत्र पर केन्द्र विन्दु है। यह कार्यक्रम जिसमें रोजगार मूलक प्रशिक्षण और महिलाओं को जीवन में प्रवीणता, महिलाओं में आत्मविश्वास देना उनकी आर्थिक निर्भरता को कम करना और उनको समुदाय में नेतृत्व करने के लिए प्रेरित करना जिससे फलतरू दूरदर्शी सामाजिक बदलाव का मार्ग प्रशस्त होगा।

पर्यावरण की निरंतर स्थिरताः वैश्विक जलवायु का परिवर्तन का घातक खतरा भयबध्द हो गया है, इसलिए द आर्ट ऑफ लिविंग ने कई सम्पूर्ण और बहु पक्षीय पहल को किया है जिससे पर्यावरण की स्थिति निरंतरता की सुनिश्चित हो सके। इस पहल का उद्देश्य है कि पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सक्रिय होना और ऐसे जीवनचर्या का अभ्यास जो उसे लालन पालन कर सके। सजगता और प्रभावी कार्यवाही के संयोजन से उसने कई जनआंदोलन की पहल करी है जिसका उद्देश्य पर्यावरण की निरंतर स्थिरता है जो संयुक्त राष्ट्र के सहस्रादी विकास का लक्ष्य है।