13 May 2013

सवाल सिर्फ सरबजीत का ही नहीं है !

मामला सिर्फ सरबजीत का नहीं है, मामला सैकड़ों अथवा हजारों सरबजीतों में से एक और सरबजीत का है.! 28 अगस्त 1990 को बाघा सीमा पर अपने खेत पर गए सरबजीत शराब के नशे में सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँच गए और फिर उनकी जिन्दगी ऐसे शैतानी शिकंजे में फंस गई जहां उन्हें मौत के लिए भी 22 साल तक इंतजार करना पड़ा! पाकिस्तानी नियत और व्यवस्था का आदिम व संकुचित चेहरा कितना घिनौना है और सरबजीत को किस प्रकार की न्याय व्यवस्था के तहत सजा मिली इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय में उनकी फांसी की सजा मुकर्रर रखी गई क्योंकि उनको मिला वकील समय पर अदालत नहीं पहुंचा.! न्यायतंत्र का ऐसा संकीर्ण और गैरजिम्मेदार स्वरूप भी हो सकता है सभ्य विश्व आज इसकी कल्पना नहीं करता!

ऐसे ही कितने सरबजीत पाकिस्तानी जेलों में एक हिंदुस्तानी होने की यातना झेल रहे हैं यह हिंदुस्तान की सरकार भी भलीभाँति नहीं जानती। भारत पाकिस्तान द्वारा गठित न्यायाधीशों की समिति की 1 मई 2013 की हाल रिपोर्ट को यदि आधार मानें तो पाकिस्तान में भारत के 535 नागरिक बंद हैं। कुछ अन्य स्रोत दावा करते हैं कि पाकिस्तान के इन यातनागृहों में पड़े भारतीयों की वास्तविक संख्या हजारों में है। हाँलाकि कई ओर के दबाब और भारतीय जेलों में बंद पाकिस्तानी कैदियों के बदले जनवरी 2012 से अब तक 714 भारतीय नागरिकों की रिहाई अवश्य हुई है किन्तु भारत सरकार के लिए यह पाकिस्तान के साथ नागरिकों के लेन-देन से अधिक कुछ रहा हो ऐसा बिलकुल नहीं है। सवाल यह उठता है कि जिस एक सरबजीत की मौत पर पूरे देश में इस कदर आक्रोश है और परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि इसे किसी भी कीमत पर सहन नहीं किया जाएगा, वैसे ही सैकड़ों सरबजीत भारत सरकार के लिए कभी कोई मुद्दा ही नहीं रहे…, आखिर क्यों.? जिस सरबजीत की मौत पर भारत सरकार इतना गंभीर दिखने का प्रयास कर रही है वही सरबजीत जिंदा रहते हुए कभी सरकार की चिन्ता का विषय क्यों नहीं रहे.? क्यों सरबजीत अथवा अन्य सैकड़ों या हजारों भारतीय नागरिकों की जिन्दगी पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों एवं वार्ताओं को प्रभावित करने योग्य नहीं मानी गईं.? 

सरकार या कॉंग्रेस की तरफ से यदि कोई इसके जबाब में अपनी प्रयासों की कोई सूची लेकर आता है तो उससे पूंछा जाना चाहिए कि सालों के प्रयास के बाद भी यदि पाकिस्तानी जेलों में सड़ते भारतीयों को आजादी नहीं मिल पाती है, यदि सरबजीत को आखिर में मौत ही मिलती है तो इसे भारत की कमजोर, दबाबहीन, प्रभावहीन स्थिति के रूप में रूप में निरूपित किया जाना चाहिए अथवा सरकार की उपलब्धियों में गिना जाना चाहिए.? अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारत की इस अशक्त, असमर्थ व कमजोर स्थिति के लिए सरकार के अतिरिक्त किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए.? देश के सवा अरब नागरिकों की ओर से सरकार से प्रश्न पूंछा जाना चाहिए कि एक विदेशी मुल्क के अत्याचारों व प्रताड़ना की गिरफ्त में फंसा देश का नागरिक अपने देश की सरकार के अतिरिक्त किससे सहायता की आशा करे.?

दुर्भाग्य और विडम्बना भारत की, जो विश्व की महाशक्ति बनने का स्वप्न देखता है, कि जहां एक ओर अमेरिका जैसे देश रेमंड डेविस जैसे अपने एक नागरिक, जोकि लाहौर के अंदर दो पाकिस्तानियों को गोली से उड़ा देता है, की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान जैसे देश की नाक में दम कर देता है वहीं दूसरी ओर भारत अमानवीय अत्याचारों के शिकार अपने सैकड़ों नागरिकों की बात भी पड़ोसी मुल्क के साथ दमदार तरीके से उठाने का साहस नहीं कर पाता.! पाकिस्तान एक के बाद एक हमारा गिरेबान पकड़कर हमें झिंझोड़ता रहा है और हम हर बार और अधिक विनम्रता और संबंध बहाली की एकतरफा उत्सुकता से दोस्ती का गुलाब लेकर नतमस्तक होते रहे हैं!

हमारी नीतियों व राष्ट्रीय इच्छाशक्ति में यह घुन नेहरू के समय से ही लग गया था जिसे बाद की सरकारें लगातार पोषित करती रही हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के तुरंत बाद पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया और जबाब में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को बुरी तरह पछाड़ लगाते हुए एकतरफा तरीके से कश्मीर को कब्जे में ले लिया लेकिन नेहरू कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले गए और यही पाकिस्तान के लिए उस समय सबसे बेहतरीन विकल्प हो सकता था। 1965 के युद्ध में भी भारत अपनी जीत को कूटनीतिक लाभ में नहीं बदल पाया और वही चूक 1971 के बाद शिमला समझौते व 90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को बिना कोई कीमत बसूले रिहाई देकर फिर दोहराई गई। इसी तरह नब्बे के पूरे दशक में भारत ने पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की आग में पूरे कश्मीर को झुलसते हुए देखा लेकिन तत्कालीन सरकारें पाकिस्तान को कड़ा जबाब देने में पूरी तरह से विफल रहीं.! कॉंग्रेस की पाकिस्तान परस्त नीति के लाल बहादुर शास्त्री जैसे कुछ ही अपवाद हैं और गैर-काँग्रेसी सरकारों में अटल सरकार को ही सबसे तगड़े प्रतिरोध की स्थिति का सामना करना पड़ा जब देश को 1999 में पाकिस्तानी सेना की कारगिल में घुसपैठ और 2003 में संसद पर हमले का सामना करना पड़ा था। कारगिल मामले में अटल सरकार को पाकिस्तान के विरुद्ध उतना ही श्रेय दिया जा सकता है जितना 1971 का इन्दिरा गांधी को.! 

दोनों ने पाकिस्तान को सैन्य कार्यवाही से कड़ा जबाब दिया लेकिन बाद में शांति की एकतरफा आतुरता में भारत को लचर हालत में खड़ा कर दिया। कारगिल के तुरंत बाद ही षड्यंत्र में शामिल सेना के जनरल मुशर्रफ के साथ आगरा शिखर वार्ता एकदम गैरजरूरी थी, भले ही इसमें अटल ने कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को प्रमुखता व दृढ़ता से उठाया हो! किन्तु 2004 से जिस रीढ़हीन रणनीति का प्रदर्शन यूपीए सरकार कर रही है वह अतीत से अलग और कहीं अधिक अचंभित करने वाली है। संसद पर हमले के तुरंत बाद अटल सरकार ने ऑपरेशन पराक्रम लॉंच करते हुए सीमा पर सेना का मूवमेंट शुरू कर दिया था और पाकिस्तान के हाथ-पैर ढीले पड़ गए थे किन्तु वहीं 26/11 के हमले के जबाब में मनमोहन सरकार की प्रतिक्रिया क्रिकेट और बातचीत बंद करने तक सीमित थी वह भी शान्ति की व्यग्रता में अधिक नहीं टिकी। आश्चर्य होता है जब दशकों से आतंकवाद के भुक्तभोगी देश का प्रधानमन्त्री आतंकवाद को शह देने और जांच के नाम पर ठेंगा दिखाने वाले देश के प्रधानमन्त्री (गिलानी) को ‘शान्ति का मसीहा’ बताता है, शर्म-अल-शेख में राष्ट्रीय स्वाभिमान को बेशर्मी से लाद देता है अथवा अपनी ही सीमा में अपने सैनिक का सर काट लिए जाने के बाद भी देश का विदेशमंत्री कहता है कि इससे भारत-पाक सम्बन्धों व शान्तिवार्ताओं पर फर्क नहीं पड़ने दिया जाएगा.! 

सिर्फ और सिर्फ आश्चर्य ही होता है जब युद्धविराम को लगभग 200 बार धता बताते हुए पाकिस्तान द्वारा सीमा पर लगातार गोलीबारी की जाती है लेकिन इससे दिल्ली में सरकार को व उसकी अमन की आशाओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, सरकारी मंत्री शहीदों की शहादत को धता बताते हुए पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री परवेज़ अशरफ के लिए पलकें बिछाने अजमेर पहुँच जाते हैं .! आश्चर्य और शर्म की सीमाएं भी उस समय टूटने लगती हैं जब देखने में आता है कि एक टीवी चैनल की बहस में वरिष्ठ कॉंग्रेस नेता और सरकार के मंत्री मणिशंकर अय्यर सरबजीत की मौत के बाद भी पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि हमें भरोसा रखना चाहिए कि पाकिस्तान न्याय करेगा!

सरबजीत के मामले को मीडिया ने इतना उठाया तो आज सरकार इसे पाकिस्तान का बर्दास्त के बाहर का आचरण बता रही है, लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सरकार की इस बयानबाजी से सरबजीत की 22 साल की यातनाओं का जबाब मिल सकता है? क्या मात्र इतने से ही कैदी चमेल सिंह, कैप्टन सौरभ कालिया, शहीद हेमराज और पाकिस्तानी जेलों में यातना भोग रहे अन्य सैकड़ों भारतीय नागरिकों के प्रति जबाबदेही सुनिश्चित हो जाती है.? इसका जबाब मनमोहन सिंह के घिसे-पिटे बयान अथवा राहुल गांधी के राजनैतिक आंसुओं से नहीं मिलेगा, जबाब इस बात से मिलेगा कि मनमोहन बयान के बाद नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाते हैं अथवा वार्ता की एक और मेज सजाते हैं तथा भिखभिंड से दिल्ली पहुँचते पहुँचते राहुल के कितने आँसू बचते हैं और वो अपनी सरकार को क्या कुछ निर्णयात्मक कदम उठाने के लिए कहते हैं.! अतीत के अनुभव कड़वे हैं, भारतीय सैनिकों की सरकशी के बाद देशव्यापी आक्रोश के चलते पाकिस्तानियों के लिए तुरंत वीजा (Visa on arrival) की सुविधा को स्थगित करना पड़ा था उसे पिछले महीने सरकार ने गुपचुप तरीके से लागू कर दिया, क्या हेमराज को न्याय मिल गया?

राष्ट्रीय जीवटता व दृढ़ता के आभाव में न कभी किसी हेमराज या सरबजीत को ही न्याय मिलेगा और न ही दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे इस राष्ट्र की आत्मा को ही.! देखना होगा कि सरकार अब आगे सैकड़ों अन्य सरबजीतों के जीवन को प्राथमिकता देती है अथवा मामले के ठंडे पड़ते ही फिर अमन की आशा की अपनी राह पकड़ लेती है! यदि सरकार फिर से दूसरा विकल्प चुनती है तो स्पष्ट अवधारणा प्रमाणित हो जाएगी कि देश की सरकार व नीति-निर्माता संस्थानों के अंदर ऐसे एजेंट बैठ चुके हैं जिनका उद्देश्य पाकिस्तान व अमेरिका जैसे देशों के हितों की सुरक्षा में भारत की नीतियों को लकवा मारना है। वैसे भी इस देश में अफजल की फांसी पर मातम मनाने और सरबजीत की फांसी पर फूटे राष्ट्रवादी आक्रोश को आतंकवाद कहकर विदेशी हित साधने वाले तथाकथित बौद्धिकों की कमी नहीं है।

12 May 2013

क्या आज सिनेमा विषयविहीन हो गया है ?

‘ये कहाँ आ गए है हम’ लता जी की मीठी आवाज़ में गया ये गाना आज भारतीय सिनेमा के १०० साल की यात्रा पर बिल्कुल सटीक बैठता है क्योकि अपने उदगम से लेकर आज तक भारतीय सिनेमा में इतभारतीय सिनेमा का अंग है जो हमेशा भारतीय समाज में चेतना को जाग्रत करने का काम करता आया है। कहा जाता है कि किसी भी समाज को सही राह दिखाने के लिए सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा है,क्योकि सिनेमा दृश्य और श्रव्य दोनों का मिला जुला रूप है और ये सीधे मनुष्य के दिल पर प्रभाव डालता है । हमारे भारतीय सिनेमा ने अपने गौरवमयी १०० साल पूरे कर लिये है पर इन १०० सालो  की यात्रा में भारतीय सिनेमा कहा से कहाँ पंहुचा यह सोचनीय विषय है या फिर यूँ कहा जाए इन १०० सालो की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने समाज को क्या दिया? ये सच है कि फिल्मे समाज का आइना है और समाज के शसक्त निर्माण में फिल्मो की अहम् भूमिका होती है और इसीलिए ८० की दशक की फिल्मे जमींदारी, स्त्री शोषण सहित उन सभी मुद्दों पर आधारित होती थी जो समाज को प्रभावित करते थे। तब जो फिल्मे बनती थी उनका उद्देश्य व्यावसयिक न होकर सामजिक कल्याण होता था। पर ९० की दशक में फिल्मो में व्यापक बदलाव आये।
 
ये वो दौर था जब भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाया गया, भारत ने भी वैश्विक गांव में शामिल होने की दिशा में कदम बढ़ाए और दुनिया भर के देशों में वीजा नियमों में ढील देने की प्रक्रिया शुरू हुई। तब इन भौतिक बदलावों से प्रेरित होकर प्रवासी भारतीयों का स्वदेश प्रेम मुखर हुआ। इसके दर्शन हर क्षेत्र में होने लगे। एक तरह से उन्होंने अपने देश की घटनाओं में आक्रामक हस्तक्षेप शुरू किया।बिल्कुल उसी समय भारत में एक बड़ा मध्यवर्ग जन्म ले रहा था, जिसकी रूचियां काफी हद तक विदेशों में बस गए भारतीयों की तरह बन रही थीं। इसका श्रेय उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भारत आने और स्थानीय जरूरत के हिसाब से खुद को बदलने की प्रक्रिया को दिया जा सकता है। नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में वैश्विक गांव बनने की प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो चुका था। भारत का मध्यवर्ग और विदेश में बसा प्रवासी भारतीय खान-पान, पहनावे, रहन-सहन आदि में समान स्तर पर आ चुका था।
 
दोनों जगह एक ही कोक-पेप्सी पी जाने लगी, पिज्जा और बर्गर खाया जाने लगा और ली-लेवाइस की जीन्स पहनी जाने लगी। भारत की मुख्यधारा के फिल्मकार इस बदलाव को बहुत करीब से देख रहे थे। इसलिए उन्होंने अपनी सोच को इस आधार पर बदला। मशहूर फिल्मकार यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा ने स्वीकार भी किया कि वे घरेलू और विदेशी दोनों जगह के भारतीयों के पसंद की फिल्म बनाते हैं। यहां घरेलू भारतीय दर्शक का मतलब भारतीय मध्यवर्ग से लगाया जा सकता है। भारतीय फिल्मकारों की इस सोच में आए बदलाव ने फिल्मों की कथा-पटकथा को पूरी तरह से बदल दिया, खास कर बड़े फिल्मकारों की। उन्होंने ऐसे विषय चुनने शुरू कर दिए, जो बहुत ही सीमित वर्ग की पसंद के थे, लेकिन बदले में उन्हें चूंकि डॉलर में कमाई होने वाली थी इसलिए व्यावसायिक हितों को कोई नुकसान नहीं होने वाला था। और ये वही दौर था जब फिल्मे समाज हित से हटकर पूरी तरह से व्यावासिक हित में रम गयी फिल्मे बनाने वाले निदेशको और निर्माताओ का उदेश्य फिल्म में वास्तविकता डालने को बजाये उन चीजों को डालना होता जो दर्शक को मनोरंजन कराये जिसका आज समाज पर नकरात्मक प्रभाव पड़ने लगा। 
  आज भारतीय समाज जो आधुनिकता की नंगी दौड़ में दौड़ उसका श्रेय बहुत हद आज के दौर निर्मित होने वाली फिल्मो को ही जाता है अगर उदाहरण से समझना हो तो नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में बनी फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, से शुरू करके ‘नील और निक्की’ तक की कहानी में इस बदलाव को देखा जा सकता है। इस बदलाव को दो रूपों में देखने की जरूरत है। एक रूप है भारत के घरेलू फिल्मकारों का और दूसरा प्रवासी भारतीय फिल्मकारों का। दोनों की फिल्मों का कथानक आश्चर्यजनक रूप से एक जैसा है। इनमें से जो लोग पारिवारिक ड्रामा नहीं बना रहे हैं वे या तो औसत दर्जे की सस्पेंस थ्रिलर और अपराध कथा पर फिल्म बना रहे हैं या संपन्न घरों के युवाओं व महानगरों के युवाओं के जीवन में उपभोक्तावादी संस्कृति की अनिवार्य खामी के रूप में आए तनावों पर फिल्म बना रहे हैं। घरेलू फिल्मकारों में यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, फरहान अख्तर जैसे सफल फिल्मकारों के नाम लिए जा सकते हैं और दूसरी श्रेणी में गुरिन्दर चङ्ढा (बेंड इट लाइक बेकहम), नागेश कुकुनूर (हैदराबाद ब्लूज), विवेक रंजन बाल्ड (म्यूटिनी : एशियन स्टार्म म्यूजिक), बेनी मैथ्यू (ह्नेयर द पार्टी यार), निशा पाहूजा (बालीवुड बाउंड), महेश दत्तानी (मैंगो सौफल), मीरा नायर (मानसून वेडिंग), शेखर कपूर (द गुरू), दीपा मेहता आदि के नाम लिए जा सकते हैं, जो अनिवार्य रूप से प्रवासियों के लिए फिल्में बनाते हैं।
वास्तव में यही वो कारण जिनके कारण आज भारतीय सिनेमा के कथ्नांक में गिरावट आती जा रही है जिसका सीधा असर समाज पर रहा है। ये कहना गलत न होगा कि इन १०० सालो की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने जितने मुकाम हासिल किये उतना ही इसने समाज को गलत दिशा भी दी आज हमारी बॉलीवुड की फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल पर बन रही है ऐसी फिल्मे हिट भी हो रही है लेकिन यही फिल्मे जब अस्कार जैसे प्रतिष्ठित आवार्ड के लिए जाती है तो औंधेमुह गिर पड़ती हैइसके विपरीत स्लमडाग जैसी फिल्मे जो की सामजिक मुद्दों पर बनती है वो आस्कर जैसे आवार्ड को ला पाने में सफल होती है। कहने का तात्पर्य यह की विदेशो में भी अब ऐसी ही फिल्मो को पसंद किया जा रहा है जो किसी सामाजिक सरोकारों से जुडी हो। आज ये वक़्त की जरुरत है कि फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल से बाहर निकले और और ऐसे मुद्दों पर बने जो समाजिक मुद्दों से जुडी हो

 हो सकता है कि ऐसी फिल्मे बाक्स आफिस पर हिट न हो पर लगातार अगर सामाजिक मुद्दों पर फिल्मे बनना शुरू होंगी तो कुछ दिन बाद ऐसी फिल्मे बॉक्स आफिस पर हिट होना शुरू हो जायेंगी क्योकि सिनेमा समाज को जो देता समाज उसी को लेता है और इसका सीधा से उद्धरण ८० की दशक की फिल्मे है जो उस दौर में काफी पसंद की गयी वैसे भी जब इंसान किसी विषय से सालो दूर होता है तो निश्चित तौर पर उस विषय से उसकी दूरी बन जाती है पर अगर उसी विषय पर उसको वापस लाया जाये तो देर जरुर होती है पर अंततः रूचि जाग्रति होती है। इसलिए भारतीय सिनेमा के गौरवमयी इतिहास को बचाये रखने के लिए यह आवश्यक है की फिल्मे सामाजिक सरोकार से जुडी हो न की सेक्स, थ्रिल, धोखे जैसे मुद्दे से जिसका समाज पर नकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है।

40 चीनी पर भारत की विदेश नीति !

किसी भी देश के लिए उसकी सुरक्षा से बड़ा मुद्दा और क्या हो सकता है..? लेकिन भारत सरकार के लिए ये एक मामूली मसला है..! चीन 19 किलोमीटर तक हमारे क्षेत्र में घुसपैठ कर शान से बैठा है और हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद चीन यात्रा की तैयारी कर रहे हैं..! सरकार कहती है कि बातचीत से मसला सुलझा लिया जाएगा। इसका जवाब सरकार के पास नहीं है कि दो बार फ्लैग मीटिंग में जब बात नहीं बनी तो आगे कैसे बात बनेगी..! चीन तो उल्टा भारत को आंखे दिखाकर उसे अपना ही क्षेत्र बता रहा है..! चीनी हेलिकॉप्टर हमारी वायुसीमा में आकर फर्राटे से उड़ान भर रहे हैं लेकिन हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि ये स्थानीय मसला है और वे इसे तूल नहीं देना चाहते।  

कभी पाक तो कभी चीन हमारी सीमा में घुसपैठ कर हमें ही आंखे दिखा रहा है लेकिन विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर ससंद ठप कर रहा है तो सरकार सदन में गिनती पूरी कैसे रहे इस जुगत में व्यस्त है..? देश सुरक्षा के मुद्दे पर सरकार तो सो ही रही है लेकिन विपक्षी नेताओं के लिए भी चीनी घुसपैठ से बड़ा मुद्दा जेपीसी रिपोर्ट और कोलगेट के मसले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट पर सरकार का दखल है..! चीन के मुद्दे पर प्रमुख विपक्षी पार्टी के नेता सदन के बाहर तो खूब बोल रहे हैं लेकिन सदन में इस मुद्दे को जैसे वे भूल जाते हैं..! सत्ता में आने को बेचैन दिखाई दे रही मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के नेता शायद ये सोच रहे होंगे कि चीन के मसले पर एकजुटता दिखाई तो सरकार को टूजी पर जेपीसी रिपोर्ट और कोलेगेट के मसले पर बचने का मौका मिल जाएगा और वे इसे कैश नहीं करा पाएंगे..!

संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलकर चीनी घुसपैठ पर कड़े कदम उठाने पर चर्चा करनी चाहिए और इसे अमल में लाने के लिए एकजुटता दिखानी चाहिए लेकिन विपक्ष प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगने पर अड़ा है तो सत्तापक्ष प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाने में..! गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिंह साहब तो ये तक कहते सुनाई देते हैं कि 40 चीनी सैनिकों का भारत की सीमा में घुसना कोई बड़ी घुसपैठ नहीं है यानि कि आरपीएन सिंह साहब के लिए ये बड़ी बात तब होगी जब चीनी सेना पूरे लद्दाक पर कब्जा कर लेगी..! सरकार की एक सहयोगी समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह इस मुद्दे पर गुर्राते हुए सरकार को कायर कहते हुए गरियाते जरुर हैं लेकिन मुलायम की इस गुर्राहट में कितना दम है ये हम पहले भी कई बार देख चुके हैं..! 

अच्छा होता कि चीनी घुसपैठ पर चीन को सारे दल मिलकर ऐसी गुर्राहट दिखाते और चीनी सैनिकों को खदेड़ने को लेकिर साझा फैसला लेते लेकिन यहां तो हर कोई अपने हित साधने में लगा है। कोई दूसरे से कुर्सी छीनने पर अमादा है तो कोई अपनी कुर्सी बचाने में..! सत्ता सुख के चक्कर में हमारे देश के राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई के दुनिया मजे भी ले रही है और पाकिस्तान और चीन जैसे धूर्त पड़ोसी इसका फायदा उठाने से भी नहीं चूक रहे हैं..! चीन की इस घुसपैठ पर भारत को अपना लचर रवैया छोड़कर आक्रमक रुख अपनाना चाहिए ताकि न सिर्फ चीन को भारतीय क्षेत्र छोड़कर वापस लौटने पर मजबूर होना पड़े बल्कि वह भविष्य में ऐसी हरकत करने से बाज आए !

आखिर दुनिय हम पर क्योँ हँसती है ?

ये तो बहुत ही चिंता का विषय हो गया कि दुनिया हम पर हँस रही होगी. ये हमारे प्रधानमंत्री जी को भी बहुत देर में समझ में आया कि दुनिया हम पर हँसती भी है. अभी तक तो यही माना जा रहा था कि विश्वगुरु (पता नहीं कब) का स्वघोषित खिताब चपेटे भारत की हरकतों पर दुनिया गंभीरता से विचार करती है, उसका अनुसरण करती है. वैसे अनुसरण तो दुनिया को करते तो देखा नहीं, हाँ भारत को ही दुनिया की नक़ल करते अब देखा जा रहा है. ‘नक़ल हमेशा होती है, बराबरी कभी नहीं’ का फंडा भी इसी देश ने दिया इसके बाद भी नक़ल की तरफ सदा प्रेरित रहा. बहरहाल, बात दुनिया के हंसने की…
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चलिए इतनी सारी बकवास बातों के बाद, तमाम सारे आरोपों के बाद, अनगिनत घोटालों के बाद सरकार को लगा तो कि दुनिया इस देश की हरकतों पर हँस भी रही होगी. ये अपने आपमें भ्रामक तथ्य भी है कि दुनिया अब हँस रही होगी. अभी तक तो दुनिया की तरफ से कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है, जिससे एहसास हो कि दुनिया हँस रही है. इसके अतिरिक्त अभी ऐसा कोई कदम सरकारी स्तर पर नहीं उठाया गया है जिस पर दुनिया को कुछ अचरज लगे और वो हंसने की कवायद करे. अभी तक जो कुछ भी हुआ है वो जब पहली बार हुआ तब तो दुनिया ने हंसने की कोशिश की नहीं और जब समूची दुनिया ऐसी हरकतों की आदी हो गई है तब सरकार ये कह कर डराने की कोशिश कर रही है कि दुनिया हम पर हँस रही होगी.
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अरे सोचो जरा, जब दुनिया हमारे भ्रष्ट तंत्र पर नहीं हँसी, जब दुनिया ने हमारे रिश्वतधारी, घोटाला-सम्राट नेताओं, मंत्रियों, अधिकारीयों, क्लर्कों, चपरासियों तक पर हंसने की जहमत नहीं की, जब दुनिया ने संसद में, विधानसभाओं में चलते जूते-चप्पलों पर हंसने का प्रयास नहीं किया, दुनिया ने अनर्गल आरोप-प्रत्यारोपों पर हंसने का काम नहीं किया, खुलेआम होते रेप कांडों पर, मासूम बच्चियों के साथ यौनाचार किये जाने पर दुनिया ने हंसने जैसा काम नहीं किया, आतंकवादियों, अपराधियों के लिए सर झुकाते महोदयों के व्यवहार पर दुनिया नहीं हँसी, जिस देश में डकैत, हत्यारे, बलात्कारी सदन की शोभा बन जाते हों उस पर दुनिया ने हंसने की नहीं सोची, चिरकुट से पड़ोसियों की गीदड़ भभकी के सामने घुटने टेकने पर दुनिया ने हमें हँसी का पात्र नहीं माना, पडोसी देश के द्वारा सीना ठोंक कर जमीन कब्जाने पर भी दुनिया ने हम पर हंसने की कोशिश नहीं की और भी बहुत कुछ हुआ जिस पर दुनिया चाहती तो हँस सकती थी किन्तु वो नहीं हँसी तो अब ऐसी कौन सी विद्रूप हरकत हमारे माननीय लोगों ने कर दी कि दुनिया हँसती.
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इसलिए हे माननीयो, निःसंकोच अपने कलुषित कामों को अनवरत जारी रखो. जो देश विश्वगुरु रहा हो, विश्वगुरु बनने की तरफ है, जिस देश के माननीय यौन अपराधों में लिप्त हों, जिस देश के सिपहसालारों के लिए भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी प्राथमिकता हो, जिस देश में एड्स रोगी बढ़ रहे हों, जिस देश में नग्नता संस्कार बन रही हो, जिस देश में रिश्ते देह के पैमाने पर बनाये जा रहे हों, जिस देश में अघोषित राजशाही हो, जिस देश में कुछ लोगों को छोड़ सब असुरक्षित-वंचित-भयभीत-शोषित हों (आदि-आदि) उस देश पर हंसने की औकात दुनिया की नहीं हो सकती है. लगे रहो-लगे रहो…कोई कुछ भी कहे बस लगे रहो….यदि कोई हँसे भी तब भी लगे ही रहो.

अमेरिका की तलाशी पर आजम की नौटंकी !

बोस्टन हवाई अड्डे पर उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान को रोककर की गई पूछताछ अब धीरे-धीरे तूल पकड़ती जा रही है। एक तरफ जहां इस मुद्दे पर भारतीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि अमरीका में हर किसी को आव्रजन संबंधी कड़े कानूनों का सामना करना पड़ता है। खुर्शीद के अनुसार अगर इससे हटकर कुछ होता है तो सरकार केवल विशिष्ट व्यक्ति ही नहीं बल्कि हरेक नागरिक का मसला उठाएगी। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और स्वयं यूपी के शहरी विकास मंत्री आजम खान ने आरोप लगाया है कि विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद के इशारे पर बोस्टन एयरपोर्ट पर उनके साथ बदसलूकी हुई है। कांग्रेस ने इस मसले पर आजम खां के इस बयान को बेतुका करार दिया है। गौर करने वाली बात यह है कि समाजवादी पार्टी के एक नेता और उत्तर प्रदेश के सौर ऊर्जा मंत्री देवेंद्र गुप्ता ने पार्टी रुख से अलग स्टैंड अपनाते हुए कहा कि यदि अमेरिका के बोस्टन हवाई अड्डे पर कैबिनेट सहयोगी आजम खान की टटोल कर तलाशी ली गई तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने इसे अमेरिकी नियमों के तहत की गई कार्रवाई बताया।

सरकार हो या पार्टी, उनके बेबाक बयान और अक्रामक तेवर उन्हें विवादों में ला ही देते हैं। मेरठ के प्रभारी मंत्री पद से हटाए जाने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को मंत्री पद से इस्तीफे की पेशकश कर सरकार और पार्टी दोनों को मुश्किल में डालने वाले आजम का विवादों से पुराना नाता है।उत्तर प्रदेश के नगर विकास मंत्री आजम खान जब भी बोलते हैं विवाद उनके पीछे लग ही जाते हैं।अभी कुछ ही दिन पहले उन्‍होंने मुगल बादशाह शाहजहां पर उंगली उठाते हुए कहा है कि ताजमहल बनाकर शाहजहां ने फिजूलखर्ची कर दी थी। यही नहीं उन्‍होंने कहा कि अगर ताजमहल को गिराना हो तो आजम खान सबसे आगे होगा।गत वर्ष 18 दिसंबर को आज़म खान ने ट्रेन में कोच अटेंडेंट को मुर्गा बनाया था जिसे लेकर काफी मीडिया में भी काफी हो-हल्ला मचा था ।

मगर आदत है कि जाती नहीं है अपने बयानों कई बार से अपनी ही सरकार कि शर्मिंदगी शर्मिंदगी करा चुके खान साहब को शायद अमेरिका के नियम कानून नहीं मालूम थे ।अगर अमेरिका भी उत्तर प्रदेश ही होता तब शायद जांच पड़ताल के लिए पूछने भर पर आजम खान उसे थप्पड़ मार देते। यहां एक टिकट कलेक्टर ने उनसे एक बार यात्रा में सिर्फ टिकट मांग लिया था और बदले में आजम खान ने उसे थप्पड़ मार दिया था। लेकिन वह तो अमेरिका है। उसकी नजर में कोई आजम खान हो कि शाहरूख खान, सब खान एक समान है। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि कौन क्या कहेगा, और क्या हंगामा खड़ा होगा। शायद इसीलिए सिर्फ खान नाम जुड़ा होने के कारण ही आजम खान की बोस्टन हवाई अड्डे पर जमकर तलाशी हुई, और बवाल भी। लेकिन अमेरिका अपने रूख से रत्ती भर भी पीछे नहीं हटा।

आजम खान की तलाशी के बाद भारत में जमकर बवाल मचा है। खुद आजम खान भी अपनी तलाशी के लिए अमेरिका से ज्यादा भारत के विदेश मंत्री को दोषी ठहरा रहे हैं। लेकिन आजम खान यह नहीं बता रहे हैं कि आखिर वे अमेरिका गये ही क्यों? भारत के जिस कुंभ मेले के प्रबंधन का बखान करने के लिए वे मुख्यमंत्री के साथ अमेरिका गये थे, क्या उन्हें नहीं मालूम है कि उन्हीं के प्रभारी मंत्री रहते मेले के दौरान इलाहाबाद स्टेशन पर भगदड़ मची थी और 36 यात्री अकाल मौत मारे गये थे। कुंभ मेले के दौरान हुई इस घटना के बाद मेला प्रभारी मंत्री होने के नाते उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा तब दिया जाता है जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जो कुछ हुआ उसकी कोई न कोई जिम्मेदारी हमारी अपनी भी बनती है। अगर आजम खान ने इस्तीफा दिया तो कम से कम उन्होंने यह माना था कि मेले के दौरान अगर कोई कुप्रंधन था तो उसके लिए नैतिक रूप से वे जिम्मेदार हैं। तो फिर भला किस हैसियत से वे अमेरिका चले गये मेला प्रबंधन का बखान करने?

आजम खान को मालूम हो या न हो लेकिन अमेरिका में बाहर से आने वाले मुसलमानों की कुछ विशेष छानबीन होती रहती है और यदि आपके नाम के साथ खान जुड़ा हो तो छानबीन कुछ ज्यादा ही होती है। अमेरिका अपनी सतर्कता के साथ कोई समझौता कभी नहीं करता। अमेरिका इस मामले में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं करता। यदि आप मुसलमान हैं तो चाहे आप कोई भी क्यों न हों, आपको विशेष सतर्कता से गुजरना ही होगा और यदि आपके साथ खान जुड़ा है तो चाहे आप कितने भी तीस मार खां हों, आपको कोई विशेष रियासत नहीं मिल सकती। अमेरिका में ऐसे जुमलों के लिए कोई जगह नहीं है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता। फिर अगर वह मुसलमान किसी बाहरी देश से अमेरिका पहुंचा है तो उसकी नजर में हर मुसलमान संभावित आतंकवादी ही होता है। अमेरिका अपनी ऐसी सतर्कता के लिये प्रशंसा का पात्र हैं। चाहिए तो यह था कि आजम खान के साथ जो जांच पड़ताल हुई, उसके बाद वे अमेरिका की तारीफ करते लेकिन दुर्भाग्य से हमारे बड़बोले और घमण्डी मंत्री आजम खान ने अमेरिका की इस सतर्कता की प्रशंसा करने की जगह नाराजगी व्यक्त करके देश के गौरव को ठेस पहुंचाई।

कई वर्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्री जार्ज फर्नान्डीस तक को सुरक्षा के मामले में कोई रियायत नहीं मिली थी। यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी अमेरिका में ऐसी जांच पड़ताल के दायरे में आ चुके हैं। कई बार तो प्रधानमंत्री तक ऐसी विशेष जांच से गुजरते हैं और ऐसे समान व्यवहार की तारीफ करते हैं। किन्तु लगता है आजम खान ने अमेरिका को उत्तर प्रदेश समझने की भूल कर दी। अमेरिका ने यदि किसी साधारण से कार्य के लिये आमंत्रित कर दिया तो नेता लोग सारी दुनिया में ऐसा ढिंढोरा पीटते हैं जैसे कि स्वर्ग का आमंत्रण आ गया। स्पष्ट है कि नेता लोग अमेरिका जाना भारत के लोगों पर रौब जमाने का अच्छा प्रमाणपत्र मानते हैं। यदि इसी तरह अमेरिका जाने के लिये लार टपकती है तो फिर इस छोटी सी बात का बतंगड़ क्यों? आजम खान ही भारत में एक मंत्री होने के अलावा ऐसी क्या विशेषता रखते हैं कि अमेरिका उन पर विशेष विश्वास करे?

आजम खान उत्तर प्रदेश में भी साम्प्रदायिक ही माने जाते हैं जो हर जगह मुसलमान होने की अकड़ दिखाते हैं। जब आप भारत में भी रहकर पहले मुसलमान नेता हैं तब भारतीय तो अमेरिका ने तो आपके साथ ठीक ही व्यवहार किया है। लेकिन आजम खान को इसबात का भी जवाब देना होगा कि अमेरिका के धुर विरोधी होने के बाद भी उन्होंने हॉवर्ट का न्यौता क्यूं कबूल किया और अगर ये मसला सिर्फ मुसलमानों से जुड़ा है तो उत्तर प्रदेशके चीफ सेक्रेटरी जावेद उस्मानी इस कथित बदसलूकी से कैसे बच गए?अतः आजम खान सिर्फ इस मुद्दे को तिल का ताड़ बनाने की कोशिश न ही करें तो अच्छा होगा ,वरना उन्हें जगहंसाई के सिवा कुछ भी हासिल नहीं होगा ।

तुम्हें कैसे परिभाषित करूं माँ !

कहते हैं भगवान हर जगह नहीं हो सकता इसीलिए उसने मां को भेजा। यही वजह है कि मां हर वो फर्ज निभाती हैं जिसकी उम्मीद हम उस शक्ति से करते हैं जिसे हमने कभी देखा तो नहीं मगर कई बार महसूस जरूर किया है। मांए यह वो शब्द है जो किसी भी बच्चे को सुरक्षित होने का आश्वासन देता है। भले ही परिवार के पालन.पोषण की जिम्मेदारी पिता की होती है लेकिन बच्चों की खुशियों का ध्यान एक मां से बेहतर और कोई नहीं रख सकता। तभी तो कहा जाता है कि आपकी मां बिना आपसे पूछे ये बता सकती है कि आपको क्या चाहिए। पिता के पारिवारिक स्वरूप और उनकी भूमिका को थोड़ा कठोर दर्शाया जाता है इसीलिए बच्चे पिता से भले ही अपने दिल की बात ना कह पाएं लेकिन मां के साथ वह अपनी हर छोटी से छोटी बात शेयर करते हैं।

मां की इतनी सारी खूबियां बताने के बाद आपका दिल और दिमाग उन सभी पलों से जुड़ी सुनहरी यादों को फिर से सहेजने लगा होगा जो कभी आपने अपनी मां के साथ गुजारे थे। लेकिन उन्हें अपने तक सीमित रखने से बेहतर है आप मंच के अन्य पाठकों के साथ भी अपने उन कभी न भुला पाने वाले क्षणों को साझा करें। उन्हें बताएं कि आप बचपन में कैसे अपनी मां को परेशान किया करते थेए अपने हर छोटे काम के लिए उन पर निर्भर रहा करते थेए स्कूल से आते ही मां के हाथ के खाने की खुशबू घर में महकने लगती थीए जब पढ़ाई या जॉब के लिए घर से दूर गए तो कैसे उनकी याद आपको हर समय सताया करती थी।

वैसे तो मां के प्यार का मोल चुका पाना किसी के भी बस की बात नहीं है लेकिन कुछ ही दिनों में यानि 12 मई को मदर्स डे के उपलक्ष्य में आप उन्हें यह तो बता ही सकते हैं कि आपके जीवन में उनकी क्या अहमियत हैए वह क्यों आपके लिए दुनिया में सबसे ज्यादा जरूरी हैं।

रियलिटी शो का खौफनाक चेहरा !

टीण्वीण् पर आने वाले भिन्न.भिन्न रियलिटी शो को देखकर कई बार आपका मन भी ललचाता होगा और आप भी अपने अंदर कोई ना कोई टैलेंट ढूंढ़ने लग जाते होंगे ताकि आप भी टी वी की दुनिया के चमकते सितारे बन सकें आप तो फिर भी समझदार हैं लेकिन जरा सोचिए उन बच्चों का क्या जिनके बचपन के साथ खिलवाड़ कर रियलिटी शो निर्माता अपनी टीआरपी भुनाते हैं पहले बात युवाओं और वयस्कों तक ही सीमित थी लेकिन अब बच्चों को भी अपने फायदे के लिए प्रयोग किए जाने का सिलसिला शुरू हो चुका है कोई भी टी वी चैनल खोल लीजिए एक ना एक तथाकथित रियलिटी शो आपको जरूर नजर आ जाएगा जिसमें बच्चे हंसते गातेए कॉमेडी या फिर अदाकारी करते दिख जाएंगे लेकिन रियलिटी शो की रंगीन दुनिया इतनी भी रंगीन नहीं है क्योंकि यहां बच्चों के सपने सजाए नहीं उन्हें सिर्फ तोड़ा जाता है और वो भी इसलिए ताकि टीवी देख रहे दर्शकों को उनके साथ सांत्वना हो और वह चिपक कर टी वी के साथ बैठ जाएं

रियलिटी बेचकर बच्चों को जहां अति महत्वकांक्षी बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ अभिभावकों समेत उन छोटे.छोटे बच्चों में भी प्रतिस्पर्धा का एक ऐसा बीच बोया जा रहा है जो उन्हें हार सहन करने ही नहीं देता वह कुछ भी देखने.समझने में लाचार हो जाते हैं जिसकी वजह से अभिभावक अपने बच्चे पर जीत का दबाव बनाने लगते हैं  बच्चे मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते ऐसे में अपनी प्रतिभा दिखाने के बाद रियलिटी शो के जज के सामने आकर अगले राउंड के लिए सलेक्ट होना या ना होने जैसा सफर उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं होता लेकिन फिर भी माता.पिता उन्हें इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करते हैं 

इस बात से आप या हम कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जहां कुछ माता.पिता अपने बच्चों के जरिए अपने सपने पूरा करने की कोशिश में होते हैंए क्योंकि वे सिंगर बनना चाहते थे इसीलिए उनके बच्चे को भी गायक ही बनना है क्योंकि वो हीरो बनना चाहते थे इसीलिए उनके बच्चे को भी हीरो ही बनना हैए बस इसीलिए वह अपने बच्चे पर अप्रत्यक्ष तौर पर जीतने के लिए दबाव बनाने लगते हैं बिना यह समझे कि इस दबाव को उनका बच्चा सहन कर पा रहा है या नहीं वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो घर से भागकर ऑडिशन देने पहुंचते हैं इन बच्चों को उनके माता.पिता का समर्थन प्राप्त नहीं होताए जो कि अपने आप में तकलीफदेह है

किसी टैलेंट शो में अगर बच्चे का चयन हो जाता है तो जाहिर तौर पर यह खुशी की बात है लेकिन जब बच्चा असफल साबित हो जाता है तो एक तो वह पहले ही परेशान हो जाता है उसके ऊपर माता.पिता का स्वभाव उसे और दुखी करने लगता है घर पर पड़ने वाली डांट का डर उन्हें तंग करता है शो से बाहर होने के बावजूद वह यह मानने से भी इंकार कर देते हैं कि जिस टैलेंट की खोज की जा रही है वह उनमें है ही नहीं घर और बाहरए उसके पड़ोसीए रिश्तेदारए यहां तक कि परिवारवाले तक दूसरे बच्चों से उसकी तुलना की जाती है जिसकी वजह से उसके अंदर हीन भावना घर कर जाती है

रियलिटी शो में भाग सिर्फ इसीलिए लेना कि जीतकर ही आना है व्यक्ति के मनोबल को ऑडिशन देने से पहले तो मजबूत करता है लेकिन अगर किसी कारणवश उसे हार का मुंह देखना पड़े तो यही मनोबल धाराशायी हो जाता है बच्चा भी समझ जाता होगा कि रियलिटी शो में भाग लेकर खुद को अन्य बच्चों से बेहतर साबित करना कोई बच्चों का खेल नहीं है इस हार के बात उसका बचपना तो उसका साथ छोड़कर चला ही जाता है लेकिन जीवन की एक कड़वी रियलिटी से वो रूबरू हो जाता है

आखिर गुड़िया से हैवानियत कब तक ?

गत वर्ष 16 दिसम्बर को दिल्ली बलात्कार कांड के बाद उमड़े जनाक्रोश के बाद केंद्र सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के तमाम दावे किये थे ।मगर एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगता की देश में महिलाओं और मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म जैसे घटनाओं में तनिक भी कमी आई है।देश की राजधानी दिल्ली में हुए इस विभत्स बलात्कार काण्ड के बाद लग रहा था की शायद दिल्ली सरकार जागेगी और महिलाओं की सुरक्षा के लिए कुछ पुख्ता कदम उठाएगी।मगर विकृत मानसिकता वाले दरिन्दे आज भी खुलेआम महिलाओं और मासूम बच्चियों को अपना निशाना बना रहे हैं।गत दिनों जब पूरा देश नवरात्र के दौरान बच्चियों को देवी के रूप में पूज रहा था उसी समय एक हैवान दरिन्दे ने दरिंदगी की सारी हदें पर करते हुए दिल्ली के गाँधीनगर में एक पांच साल की मासूम बच्ची के साथ घिनौना कार्य किया ,जिसे लेकर एक बार फिर से आम जनता को सडकों पर उतरना पड़ा है,और इस हैवानियत भरे दुष्कर्म को लेकर देश की संसद में भी काफी हंगामा हुआ । पांच वर्ष की एक बच्ची के साथ अमानुषिक तरीके से दुष्कर्म की घटना सामने आने के बाद जहां दिल्ली एक बार फिर शर्मसार हुई है,वहीं इस मुद्दे को लेकर हुए प्रदर्शनों ने 16 दिसंबर के सामूहिक दुष्कर्म के बाद की हालत की याद ताजा कर दी। पीड़ित बच्ची को उसके पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति ने अपहरण कर दो दिनों तक बंधक रखा, भूखे प्यासे रख कर उसे अमानवीय यातनाएं दी और दुष्कर्म किया। दरिंदगी झेल चुकी बच्ची अब अस्पताल में जिंदगी के लिए जूझ रही है,दुष्कर्म की शिकार बच्ची की गंभीर हालत को देखते हुए उसे एम्स में भर्ती कराया गया है।

पूर्वी दिल्ली के गांधी नगर में रहने वाली बच्ची का अपहरण उसके पड़ोसी ने 15 अप्रैल को कर लिया था। दो दिनों तक अपने फ्लैट में बंधक बना कर कई बार दुष्कर्म करने वाले ने दरिंदगी की सारी हदें पार की और उसे भूखा-प्यासा रखा।17 अप्रैल को बच्ची की रोने की आवाज सुनने के बाद परिवार के लोगों ने उसे आजाद कराया । मासूम से दरिंदगी के मामले में घिरी दिल्ली पुलिस की खामियां गृह मंत्रालय की जांच में भी सामने आ गई हैं। जांच में पता चला है कि दिल्ली पुलिस सिर्फ इस मामले में ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की सीएम से हुई बदसलूकी और गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के घर प्रदर्शनकारियों के घुस जाने के मामले में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रही। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने माना है कि पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में पुलिसकर्मियों से लापरवाही हुई है। हालांकि उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार किया है।अपने इस्तीफे पर उन्होंने पत्रकारों से कहा, ”यदि आपकी गलती के लिए संपादक इस्तीफा नहीं देता तो फिर मैं क्यों इस्तीफा दूं? यदि मेरे इस्तीफे से बलात्कार जैसी घटनाएं रूक जाएंगी तो मैं हजार बार इस्तीफा देने को तैयार हूं।”कुमार ने कहा कि इस मामले में पुलिस ने तुरंत कदम उठाए हैं। प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारने वाले एसीपी अहलावत को सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं गांधीनगर थाने के एसएचओ और जांच अधिकारी को भी निलंबित कर दिया गया है।

दिल्ली में पांच साल की मासूम गुड़िया के साथ हुई दरिंदगी की घटना के खिलाफ गुस्से का उबाल सड़क से संसद तक चरम पर रहा।वहीं, ऐसी घटनाओं पर जवाबदेही और जिम्मेदारी तय करने को लेकर केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार हाथ खड़े करते दिखे। कमिश्नर के बचाव में उतरे गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि बलात्कार की घटनाएं सिर्फ दिल्ली में नहीं बल्कि देश भर में हो रही हैं। वहीं, नीरज कुमार बोले कि गांधीनगर में बच्ची के साथ जिस तरह की वारदात हुई, वैसी घटनाओं को रोक पाना पुलिस के बस की बात नहीं है।अब सवाल ये है कि न तो सरकार मामले की जिम्मेदारी लेने को तैयार है और न ही पुलिस। ऐसे में कौन जिम्मेदारी लेगा इन घटनाओं की। बात अगर राजधानी दिल्ली की करें तो यहां पिछले एक पखवाड़े में ही बलात्कार की सात घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन बच्चियों पर क्या बीती है, ये उनका दिल ही जानता है। पिछले दिनों गैंगरेप की शिकार हुई दिल्ली की फर्श बाजार की 13 साल की मासूम पुलिसिया रवैये से इतनी तंग आ गई कि उसने अपनी जिंदगी ही खत्म करने की कोशिश कर डाली।हैवान सिर्फ राजधानी में ही बच्चियों का शिकार नहीं कर रहे हैं। पूरे देश से दरिंदगी की दास्तान हमारे सामने आ रही हैं। 

 अब बात चाहे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बलात्कार की शिकार छोटी सी बच्ची की हो या फिर मध्य प्रदेश के सिवनी में हैवानियत की शिकार हुई मासूम की। तितलियां पकड़ने की उम्र थी। गुड़िया से खेलने की उम्र थी। दादी नानी की कहानियां सुनने की उम्र थी, एक खुशनुमा जिंदगी से रूबरू होने की उम्र थी लेकिन इन बच्चियों ने तो इसी उम्र में दुनिया का सबसे घिनौना, सबसे भयानक तस्वीर देख ली। बलात्कार, किसी हथौड़े कि तरह दिलो दिमाग पर चोट करता है ये लफ्ज। कन्या पूजन, नारी पूजन वाले इस देश में बलात्कार एक भयानक सच है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों में हमारा समाज कितना बर्बर हो गया है। एशियन ह्यूमन राइट्स और नेशनल क्राइन रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2001 से 2011 तक दस सालों में देश में बलात्कार के मामले 336 फीसदी बढ़ गए हैं। दस सालों में देश भर में बलात्कार के 48 हजार 338 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली में साल 2012 में बलात्कार के 706 मामले दर्ज हुए लेकिन पिछले तीन ही महीने में दिल्ली के दरिंदों ने बलात्कार की 393 घटनाओं को अंजाम दे दिया।

16 दिसंबर की रात दिल्ली में दुनिया का सबसे भयानक निर्भया बलात्कार कांड सामने आया था। पूरा देश हैवानों के खिलाफ उबल पड़ा था, लेकिन हैवानों की करतूत आप सुनेंगे तो सन्न रह जाएंगे। 16 दिसंबर से 31 दिसंबर तक सिर्फ 14 दिनों के भीतर राजधानी दिल्ली में बलात्कार के 40 मामले दर्ज किए गए। 16 दिसंबर की रात दिल्ली में जो कुछ भी हुआ था, उसने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। तब हमने बलात्कार पर नए कानून बनाने की लड़ाई लड़ी थी। मगर सब कुछ के बावजूद सिस्टम नहीं बदला, हैवानों की हरकतें नहीं बदलीं। आखिर कितनी निर्भया, कितनी गुड़िया हैवानियत की भेंट चढ़ेंगी। इस देश की हर बेटियां पूछ रही हैं कि आखिर कब रुकेगा उस जैसी मासूमों पर हैवानियत का कहर।

ये कौन सा समाज दिया है हमने अपनी बच्चियों को। ये कौन सा माहौल बना रखा है हमने बेटियों के लिए, जहां न बच्ची घर में महफूज है और न ही सड़क पर। देश उबल रहा है, लेकिन हैवानों पर कोई असर नहीं है। दिल्ली में मासूम के साथ हुई दरिंदगी पर सियासत भी गरमा गई है। बलात्कार के दोषियों को फांसी की सजा देने की मांग उठने लगी है। भाजपा ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र और दिल्ली की सरकार असंवेदनशील हो गई है और जनता उन्हें उखाड़ फेंकेगी। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जनाक्रोश रैली में भाषण केंद्र सरकार पर हमला करते हुए कहा कि दिल्ली में आएदिन बलात्कार की घटनाएं होती रहती हैं। सरकार संवेदनहीन हो गई है। ऐसी सरकार को गद्दी पर होने का कोई हक नहीं। हम दिल्ली की सरकार को भी बदलेंगे और केंद्र की भी।इस वजह से बजट सत्र के दूसरे चरण के हंगामेदार होने के भी आसार हैं। सवाल ये कि क्या वाकई में राजनीतिक पार्टियां इस मुद्दे पर संजीदा हैं या महज सियासी रोटियां सेंकी जा रही हैं?खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सामने आकर इस मुद्दे पर बयान देना पड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा कि समाज को महिलाओं के मुद्दे पर संवेदनशील होना होगा। वहीं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का कहना है कि अगर बलात्कारियों को सबक सिखाना है तो उन्हें जल्द से जल्द और कड़ी से कड़ी सजा देनी होगी। बच्चों से यौन हिंसा राजनीतिक मसला नहीं है। हमें मिलकर इसके खिलाफ लड़ना होगा और ये तय करना होगा कि दोषियों को जल्द और सख्त सजा मिले। कानून निर्माता और समाजशास्त्रियों को मिलकर इस पर विचार करना होगा ।

लेफ्ट पार्टियों ने भी मासूम के साथ हुई दरिंदगी की निंदा करते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस रेप के मामले रोकने में नाकाम रही है। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि ये हमारे लिए चिंता की बात है। वहीं सीपीआई नेता डी राजा ने कहा कि ये गंभीर मामला है। मेरे पास घटना की निंदा करने के लिए शब्द भी नहीं है।जेडीयू नेता शिवानंद तिवारी का कहना है कि सख्त कानून के साथ साथ समाज को अपनी मानसिकता भी बदलनी होगी, तभी जाकर बलात्कार की घटनाएं रुकेंगी। कल्पना करना भी मुश्किल है कि इस तरह का विचार भी लोगों के मन में कैसे आता है। इसका अध्यन होना चाहिए कि क्यों समाज के लोगों में इस तरह के विचार आ रहे हैं।मालूम हो कि 16 दिसंबर को दिल्ली में हुई दरिंदगी के बाद भी सियासी माहौल गरमाया था। नेताओं के तरह-तरह बयान आए थे। इस बार भी ऐसा हो रहा है। अगर हमारे नेता कई पार्टी राजनीती से ऊपर उठकर समाज और लोगों का भला सोचे तो बदलाव नामुमकिन नहीं।

एन डी ए की टीकरी मोदी शिवराज और नितीश

2014 के आम चुनाव से पहले देश के तीन बड़े राज्य सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। देश के अन्य राज्यों के साथ ही इन तीनों राज्यों में विकास भी खूब हुआ है लेकिन इन तीनों राज्यों में से चर्चा सिर्फ एक ही राज्य की ज्यादा हो रही है और वो राज्य है गुजरात..! गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के विकास की बातों के सहारे देश की तकदीर बदलने की बात करते हैं। बकौल मोदी जितना विकास गुजरात में हुआ है…उतनी तरक्की देश के किसी राज्य ने नहीं की है। मोदी गुजरात के विकास मॉडल की तारीफ करते नहीं थकते और गुजरात के विकास मॉडल को सर्वश्रेष्ठ ठहराते हैं। मोदी की नजरें 2014 में पीएम की कुर्सी पर है और इसके लिए मोदी हवा को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं। विकास के मुद्दे पर चर्चा में पीछे छूट रहा हिंदुस्तान का हृद्य प्रदेश मध्य प्रदेश चर्चा में भले ही गुजरात से पीछे हो लेकिन विकास की दौड़ में मध्य प्रदेश वास्तव में पीछे नहीं है लेकिन जितनी बातें गुजरात के विकास की होती हैं उतनी बातें मध्य प्रदेश की नहीं होती..! ये बात मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी शायद कचोटती होगी..! गुजरात और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है ऐसे में शिवराज सिंह चाहकर भी गुजरात के विकास के दावों पर सवाल तो नहीं उठा सकते..! शायद इसलिए ही कई मौकों पर विकास के मुद्दे पर गुजरात का जिक्र आने पर शिवराज सिंह मध्य प्रदेश के विकास की कहानियां सुनाने लगते हैं और दोनों ही प्रदेशों की स्थितियों की चर्चा करते हुए मध्य प्रदेश की 19 प्रतिशत की रिकार्ड कृषि विकास दर और 12 प्रतिशत की विकास दर का जिक्र करना नहीं भूलते हैं। 

प्रधानमंत्री के पद को लेकर मोदी की उम्मीदवारी पर वे किसी के नाम नहीं लेते तो किसी के नाम पर हामी भी नहीं भरते। खुद की उम्मीदवारी पर मन में किसी हसरत के बिना काम करने की बात कहना शिवराज नहीं भूलते हैं। भाजपा शासित राज्यों मोदी के गुजरात और शिवराज के मध्य प्रदेश के अलावा भाजपा समर्थित नीतीश कुमार का बिहार भी विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात के आगे नहीं ठहरता लेकिन इस बात को नहीं नकारा जा सकता कि नीतीश के राज में बिहार में तरक्की ने रफ्तार पकड़ी है..! विकास के मुद्दे पर चर्चा में गुजरात से पीछे छूट जाने की तकलीफ तो नीतीश को भी होती होगी..! तभी तो नीतीश बिहार को विशेष राज्य के दर्जे की मांग पर कभी दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन करते हुए मोदी की लोकप्रियता को टक्कर देने की कोशिश करते हैं तो कभी सांप्रदायिकता के बहाने ही सही मोदी के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए अपनी इस तकलीफ को जाहिर भी करते हैं..! नीतिश भले ही भाजपा से परहेज न करने की बात करते हुए सिर्फ मोदी से परहेज करने की बात करते हों लेकिन इसके पीछे सिर्फ धर्मनिरपेक्षता का ही मुद्दा है ये बात आसानी से हजम नहीं होती क्योंकि एक व्यक्ति विशेष को सांप्रदायिक कहते हुए आप विरोध का झंडा बुलंद करने में देर नहीं करते लेकिन उस व्यक्ति की पार्टी जिस पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगता है उसे आप स्वीकार कर लेते हो..!

जाहिर है विकास के नाम सिर्फ गुजरात की चर्चा होने पर शिवराज और नीतीश के पेट में भी दर्द होता होगा जो मानव स्वाभाव के अनुसार लाजिमी भी है..! मोदी और शिवराज की पार्टी एक होने के नाते शिवराज का मोदी को नीचा दिखाकर अपनी नाक ऊंचा न कर पाना भले ही उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है लेकिन नीतीश कुमार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। इससे नीतीश न सिर्फ खुद को सेक्यूलर दिखाकर खुद को अल्पसंख्यकों का सबसे बड़ा हिमायती दिखाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं बल्कि ये भी लोगों को बताने का पूरा जतन कर रहे हैं कि विकास सिर्फ गुजरात में नहीं हुआ है वरन बिहार में भी विकास की गंगा बह रही है..! टोपी पहनने और टीका लगाने के नीतीश के बोल तो कम से कम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।

बहरहाल मोदी की निगाहें पीएम की कुर्सी पर हैं तो नीतीश की कोशिश पीएम की कुर्सी मोदी से दूर रखने की है ऐसे में देखना ये होगा कि नीतीश की कोशिश कामयाब होती है या फिर चलता है मोदी का जादू..? फिलहाल तो 2014 के करीब आने के साथ – साथ ये लड़ाई और भी रोचक होनी की पूरी उम्मीद है..!

भूख से मरते लोग और खुले में सड़ता अनाज !

भूख से हो रही मौतों के सन्दर्भ में वर्ष 1996 में रोम में एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इसमें 180 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक स्वर से कहा था कि भूख से हो रही मौतें बहुत ही शर्मनाक बात है। सम्मेलन में यह भी संकल्प लिया गया था कि सन् 2015 तक वि·श्वभर से आधी भुखमरी मिटा दी जाएगी। किन्तु इस सम्बंध में कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं हुआ है। फलस्वरूप दिनोंदिन भूख से मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। उल्लेखनीय है कि इस समय दुनियाभर में 80 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दो जून की रोटी नहीं मिल पाती है। और अनुमान है कि 2015 तक यह संख्या डेढ़ अरब तक पहुंच जाएगी। इन 80 करोड़ में से लगभग 40 करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यानी दुनिया में जितने भूखे हैं, उसका आधा भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यह उस समय की बात है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भण्डार भी भरे पड़े हैं। तो फिर आम लोग भूख से क्यों मरते हैं? अन्न वितरण व्यवस्था में कहां कमी है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

विश्वभर में में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी जानलेवा बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे हैं। और इन 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन क्या पिछले 66 वर्षों में देशभर में इस बारे में कोई चिन्ता की गई? क्या संसद में इस सम्बंध में कोई बहस हुई? लेकिन अफसोस तो यह कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही 30 करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। फिर हम इस खुशफहमी में कैसे जी सकते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, जो सबका पेट भरता है। अगर वाकई ऐसा है तो हमारा देश भूखा क्यों हैं? आज भी छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड, उड़ीसा, झारखंड व बिहार में भुखमरी का प्रतिशत ज्यादा क्यों बना हुआ है?
एक तरफ देश में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है वहीं सरकारी लापरवाही के चलते लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। यह तो बीते सालों के आंकड़ें कहते हैं, जबकि इस साल तो अनाज सड़ने के इतने बड़े आंकड़े सामने आए हैं कि दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हैं। 

हाल ही में इतना अनाज सड़ चुका है कि उससे साल भर करोड़ों भूखों का पेट भर सकता था, जो भ्रष्टाचार के गलियारों में पनपती लापरवाही की सीलन में सड़ गया। विगत वर्ष अनाज सड़ने का अनुमान, जयपुर से लगया गया जहां गोदाम में शराब रखने के लिए करीब 70 लाख टन अनाज बाहर फेंक दिया गया जिससे वह सड़ गया। इसके बाद राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अनाज सड़ने के कई मामले सामने आए। लेकिन ठोस कारवाई अभी तक किसी पर नहीं हुई। इस मामले पर संसद और राजनीतिक सभाओं में तो बयानबाजी होती रही और ले-देकर कुछ अधिकारियों को निलंबित कर कार्रवाई का फर्ज पूरा कर दिया गया। किंतु इससे हापुड़ में सड़े 5 लाख टन गेहूं की पूर्ति नहीं की जा सकती है, करीब ढ़ाई करोड़ का यह गेहूं, 40 लाख बोरियों में भरे-भरे पूरे एक सप्ताह तक खुद के सहेजने का इंतजार करता है और अतंत: बारिश में भीगने के बाद सड़ ही गया!

पिछले 10 सालों के दौरान गोदामों में कितना अनाज ख़राब हुआ,ख़राब होने की क्या वजह रही और ख़राब अनाज को हटाने के लिए सरकार की क्या कोशिशें और ख़र्च आया? इस संदर्भ में जनवरी 2008 में उड़ीसा के कोरापुट ज़िले के आरटीआई कार्यकर्ता देवाशीष भट्टाचार्य ने गृह मंत्रालय को एक आवेदन भेजा था। इस आरटीआई आवेदन का जो जवाब मिला, वह चौंकाने वाला था। मालूम हुआ कि बीते 10 सालों में 10 लाख टन अनाज बेकार हो गया। जबकि इस अनाज से छह लाख लोगों को 10 साल तक भोजन मिल सकता था। सरकार ने अनाज को संरक्षित रखने के लिए 243 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए, लेकिन अनाज है कि गोदामों में सड़ता रहा। ख़राब अनाज नष्ट करने के लिए भी सरकार ने 2 करोड़ रुपये ख़र्च किए। एक दीगर सवाल के जवाब में सरकार ने अनाज के ख़राब होने की वजह उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, भंडारण और ख़राब वितरण प्रक्रिया बताया।

दरअसल, यदि हम दुनिया में विकसित विधियों का इस्तेमाल अपने गोदामों के लिए करें तो अनाज 4 से 5 साल तक अच्छी हालत में रह सकता है। वरना वह समय बीतने के साथ ख़राब होने लगता है। सरकारें हर साल खाद्य सब्सिडी पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करती हैं, मगर उन्हें इस बात का कतई ख्याल नहीं रहता कि जो अनाज ख़रीदा गया है, उसे कैसे ह़िफाज़त से रखा जाएगा। इस समस्या का एक नीतिगत पहलू और है, जिस पर चर्चा बेहद ज़रूरी है। अक्सर बफर स्टॉक की ज़रूरत से बहुत ज़्यादा सरकारी ख़रीद कर ली जाती है। फिलव़क्त सरकारी गोदामों में 60,428 लाख टन अनाज है, जबकि अतिरिक्त स्टॉक रखने की अनिवार्यता 319 करोड़ टन अनाज की है। ज़ाहिर है, जब हम गोदामों की क्षमता से दोगुना भार उन पर डाल देते हैं तो अनाज को सड़ने से किस तरह से बचाया जा सकता है। सरकार एक तऱफ कम उत्पादन और निजी जमाखोरी को बढ़ती महंगाई की अहम वजह बताती है, वहीं दूसरी तऱफ वह ख़ुद जमाखोरी में लगी हुई है, जिसके चलते बाज़ार के मंझे हुए खिलाड़ी अनाज की एक बनावटी किल्लत पैदा कर बेजा फायदा उठाते हैं। बहरहाल महंगाई से आम आदमी परेशान है, खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन सरकार को यह गवारा नहीं कि जब उसके पास इफरात में अनाज का भंडार है तो वह उसे खुले बाज़ार में क्यों नहीं जारी कर देती। 

भले ही गोदामों में अनाज चूहे खाते रहें, अनाज पानी में पड़ा सड़ता रहे, लेकिन मजाल है कि वह अनाज भूख से तिल-तिल मरती जनता तक पहुंच जाए। सुप्रीमकोर्ट ने ठीक ही यह सवाल उठाया है कि यदि सरकार के पास इतना अनाज रखने का इंतज़ाम नहीं है तो वह उसे ज़रूरतमंदों को क्यों नहीं बांट देती। सुप्रीमकोर्ट के कड़े रुख़ के बाद सरकार ने आगामी छह महीनों में एपीएल परिवारों के लिए राशन की दुकानों से 30 लाख टन चावल और गेहूं बेचने का फैसला किया है। अनाज पर आत्मनिर्भरता का दावा करने वाला भारत अनाज भंडारण के कुप्रबंधन की मार झेल रहा है,जिसके चलते टनों-टन अनाज प्रतिवर्ष सड़ जाता है| जिसका परिणाम देश में भुखमरी व महंगाई के रूप में हमारे सामने है।देश के ये हालात कोई नए नहीं है, आजादी के छह दशक बाद भी गरीबों के पेट की भूख लगातार बढ़ी, कुपोषण में भी बढ़ोत्त्तरी हुई, भुखमरी से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ। इसी के साथ देश के लिए चुनौती पूर्ण सवाल ये है कि आखिर खाद्य सामग्री की सुरक्षा किस स्तर से हो रही है ? खुले में पड़े लाखों टन अनाज को मात्र तिरपाल और चादरों के सहारे सुरक्षित रखने की समझ किसी नासमझी से कम नहीं है। 

मगर साल दर साल इसी तरीके से सब कुछ हो रहा है। देश में कुपोषण का प्रतिशत साल-दर-साल बढ़ रहा है। यूनिसेफ की एक रिर्पाट के अनुसार, विश्वभर में करीब पांच साल से कम उम्र के 25 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। शर्म की बात है कि इन बच्चों का सबसे बड़ा प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है। दुनिया में कुल भुखमरी के शिकार लोगों में 40 फीसदी लोग भारत के हैं। जिसमें से 46 फीसदी बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं और यह दर सहारा-अफ्रीका से दो गुना ज्यादा है। अब देश के कुपोषण वाले आंकड़े को देखकर बस यही कहा जा सकता है कि जहां देश में करोड़ों जनता के लिए दो जून की रोटी नहीं है, उनके पोषक भोजन की पूर्ति करना और करवाना दोनों ही मजाक लगता है। मनरेगा के बाद यूपीए की दूसरी सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना खाद्य सुरक्षा कानून को भले ही कैबिनेट की मंजूरी मिल गई हो, लेकिन अभी भी इसमें कई पेंच हैं, जो इस कानून की सफलता पर सवाल खडे क़रते हैं।खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाने के बारे में अब खुद सरकार के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए हैं, तो इसे समझा जा सकता है। सरकार के नीति-नियंता इस परियोजना को चाहे जितना बढ़ा-चढ़ाकर आंकें और संसद के इसी सत्र में इसे पारित करवाने की प्रतिबध्दता जताएं, हकीकत में यह विरोधाभासों से भरा है।

 मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। बावजूद इसके सरकार इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले पारित कराना चाहती है। यही कारण है कि अमूमन कल्याणकारी योजनाओं को खारिज करने वाले वित्ता मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने में देर नहीं लगाई। जबकि इस योजना की विसंगतियों की सूची लंबी है। देश के दस लोगों के पास जितनी संपत्ति बताई जाती है, उतनी निचले तबके के दस करोड़ लोगों के पास कुल मिलाकर नहीं है।करोड़ों लोगों को दिन शुरू करने के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी, वहीं लाखों लोग ऐसे हैं जो तय नहीं कर पाते कि आज उनका पिज्जा खाने का मन है या बर्गर खाने का, उन्हें मटन की डिश चाहिए थी या चिकिन की। करोड़ों जिन कैलोरियों के लिए तरसते हैं उतनी कैलोरियां कुछ लाख लोग मुंह में भर-भर कर सड़कों पर थूक देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं। जिन्हें सबसे ज्यादा इलाज और दवा की जरूरत है, उनके पास न इलाज है न दवा, लेकिन जो पहले से ही स्वस्थ्य हैं उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए हर गुरु और हर विशेषज्ञ मौजूद हैं।

 जिनके पास मानसिक और बौद्धिक क्षमताएं हैं, जो उचित शिक्षा और वातावरण पाकर चमत्कारिक ढंग से विकास कर सकते हैं और समाज की बेहतरी में बेहतरीन योगदान दे सकते हैं उनके पास कोई अवसर नहीं है।सर्वाधिक बर्बादी सामूहिक भोज के मौकों पर होती है। भोज समारोह में पश्चिमी संस्कृति की तर्ज पर बूफे का चलन बढा है। बूफे यानी स्वरुचि भोजन को खुद से प्लेट में निकालकर खाने का विधान। एक भाव में इस तरीके से भोजन की कम बर्बादी होनी चाहिए थी। खासकर पंगत में बैठकर पत्तों पर किसी और के हाथ से परोसे जाने पर पकवान के बर्बादी की गुंजाईश ज्यादा होती है। संभव है कि अंग्रेजों ने बूफे की पद्धति का ईजाद स्वरुचि भोजन का खुद चयन करने के लिए किया। भोज्य पात्र में सीमित मात्रा में खुद लेने की तरकीब अन्न बर्बादी से बचने का सुनहरा उपाय हो सकता। लेकिन आज पंगत में बैठाकर भोज करने कराने की विधा की तुलना में पश्चिमी नकल के तौर पर हमारे बीच आया बूफे संस्कार ज्यादा अन्न बर्बादी का कारण बना है। बूफे के नाम पर छप्पन भोग लगाने का शौक विलासियों के सिर चढकर बोल रहा है। समारोहों में एकसाथ राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी, बंगाली डिश का रेला सजा दिया जाता है। फिर आंगतुकों के हाथ इस आग्रह के साथ बूफे की तश्तरी पकड़ा दी जाती है कि सभी पकवानों का रसास्वादन ले।

 इंसान के भोजन की सीमा होती है। अगर वह हर पकवान में से एक एक कौर ले तो भी उसकी सीमा जवाब दे दे। ऐसे में, तश्तरी में ज्यादा लेकर छोडना या बना भोजन इस्तेमाल के बगैर बर्बाद करने की असंवेदनशीलता बढती जा रही है। चलन के चक्कर में विलासिता की अंधी प्रतियोगिता में शामिल समाज बर्बादी को नजरअंदाज कर रहा है। महंगाई के कारण आम आदमी का जीना बेहद मुश्किल हो गया है। नौकरी करने वाले और मोटी तनख्वाह पाने वाले लोग महंगाई के कारण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, तो उन 80 फीसदी लोगों का क्या हाल होगा, जिनकी औसतन आमदनी मात्र 20 रूपये प्रतिदिन है? क्या सरकार को तनिक भी इस पहलू का अहसास है? देश में 75 फीसदी करोड़पति मंत्रियों की फौज, गरीबों के खून-पसीने की कमाई पर मौज कर रही है, क्या सरकार को यह जानते हुए भी कोई शर्म अथवा संकोच नहीं होता है? क्या सरकार ने अपना दीन-ईमान इस कद्र बेच खाया है कि उसे उन 121 करोड़ लोगों की उम्मीदों और भावनाओं की जरा भी परवाह नहीं रह गई है, जिन्होंने उन पर ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ के नारे पर विश्वास करके उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपी थी? भारी भ्रष्टाचार के कारण सौ दिन के रोजगार की गारंटी वाली ‘मनरेगा’ योजना भी आम आदमी के साथ छलावा साबित हो रही है और सरकार फिर भी बड़ी बेशर्मी के साथ इसे अपनी ढ़ाल बनाने से बाज नहीं आ रही है?

भारतीय खाद्य निगम तो क्या, अनाज की बर्बादी में मुल्क की सूबाई सरकारें भी पीछे नहीं रहतीं, जो गोदामों से अपने कोटे का अनाज कभी समय से नहीं उठातीं, जिसके चलते अनाज आहिस्ता-आहिस्ता ख़राब होने लगता है। फिर दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली इस कोढ़ में खाज का काम करती है। पीडीएफ में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की शिक़ायतें आम हैं। पूर्व जस्टिस डीपी वाधवा की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी पोल हमारे सामने खोलकर रख देती है। वाधवा कमेटी के मुताबिक़, जन वितरण प्रणाली का 53 फीसदी चावल और 39 फीसदी गेहूं ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता। ज़रूरतमंदों को आवंटित अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में बेच दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक़, साल 2004-05 में 9,918 करोड़ रुपये का अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में पहुंचा तो 2005-06 में यह लूट 10,330 करोड़ रुपये और 2006-07 में यह बढ़कर 11,336 करोड़ रुपये आंकी गई। यानी इन 3 सालों में ज़रूरतमंद ग़रीबों को आवंटित 31,500 करोड़ रुपये का गेहूं-चावल राशन डीलर, नौकरशाह एवं सियासी लीडरों ने आपस में मिल-बांटकर डकार लिया और ग़रीब मुंह ताकता रह गया। 

कुल मिलाकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फैले भ्रष्टाचार से निजात और अनाज के भंडारण की उचित व्यवस्था जब तक सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं होगी, तब तक सरकारी सब्सिडी और अनाज की बर्बादी नहीं रुक पाएगी। देश में हर साल करीब साठ लाख टन अनाज या तो चूहे खा जाते हैं या फिर वो सड़ जाते हैं। अगर अनाज को सही ढंग से रखा जाए तो इससे 10 करोड़ बच्चों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है। करोड़ों का अनाज उचित भंडारण के अभाव में वर्षा, सीलन, कीड़ों और चूहों के कारण नष्ट हो जाता है। यह सिलसिला कब रुकेगा किसी को पता नहीं।भारतीय खाद्य निगम के आकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 से 2010 तक 35 मीट्रिक टन अनाज भंडारण सुविधाओं की कमी की वजह से नष्ट हो गये। उत्तर प्रदेश के हापुड़, उरई और हरदुआगंज स्थित एफसीआई गोदामों में भी हजारों टन अनाज बर्बाद हो रहे हैं। 1997 और 2007 के बीच 1 .83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल, 2।200 लाख टन धान और 111 लाख टन मक्का एफसीआई के विभिन्न गोदामों में सड़ गए।

ऐसा नहीं है कि भारत में खाद्य भंडारण के लिए कोई कानून नहीं है। 1979 में खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत किसानों में जागरूकता पैदा करने और उन्हें सस्ते दामों पर भंडारण के लिए टंकियां उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसके बावजूद आज भी लाखों टन अनाज बर्बाद होता है। तमाम लोग दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी जद्दोजहद में गरीब दम तक तोड़ देते हैं, जबकि सरकार के पास अनाज रखने को जगह नहीं है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। ब्यूरो के अनुसार 2009 में महाराष्ट्र में 2872 जबकि आंध्रप्रदेश में 2474 किसानों ने आत्महत्या की। 2010 से फरवरी 2011 तक सिर्फ मध्यप्रदेश में 348 किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड में यह दुखद आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में सामने आई कुछ रिपोर्टों में भारत में भुखमरी से संबंधित चौकाने वाले आंकड़ें सामने आए हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय, 2010 में भारत द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार कुछ आंकड़ें सहारा के आस पास के अफ़्रीकी देशों में पाए जाने वाले भुखमरी के संकेतकों से भी कहीं अधिक खराब हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भुखमरी से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग भारत में निवास करते हैं।

सरकारी गोदामों में अनाज के बर्बाद होने का यह पहला मामला नहीं। पिछले कई वर्षो से यह शर्मनाक सिलसिला कायम है। संप्रग सरकार 2004 से सत्ता में है और खास बात यह है कि तब से कृषि एवं खाद्य मंत्रालय पर शरद पवार ही काबिज हैं। पिछले साल केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में 11 हजार टन खाद्यान्न के खराब हो जाने की बात स्वीकारी थी। देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। एक जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया है।
 
वर्ष स्थिति
2009 – 2010 2 हजार टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ
2008 – 2009 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल खराब हुआ
2007 – 2008 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ
कुल : तीन साल साल में लगभग 58 हजार टन अनाज खराब हुआ।

इस तरह इस साल तक खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार साल में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज यूं ही बरबाद हो गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने भूख से लड़ने के लिए कारगर उपाय नहीं किए हैं। देश में आज खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम 2006 के तहत खाद्य पदार्थो और शीतल पेय को सुरक्षित रखने के लिए विधेयक संसद से पारित हो चुका है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, नरेगा, मिड डे भोजन, काम के बदले अनाज, सार्वजानिक वितरण प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा नेट, अंत्योदय अन्न योजना आदि कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि सभी देशवासियों की भूख मिटाने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से जीवनयापन के लिए रोजगार परक आय व पोषणयुक्त भोजन मिल सके। लेकिन कागजों पर बनने वाली यह योजनाएं जमीन पर कितनी अमल की जाती हैं इसका अंदाज आप भारत में भूख से मरने वाले लोगों की संख्या से लगा सकते हैं।
अन्न की बर्बादी एक अपराध है’ वर्ष 2010 में अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गरीबों की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है। 

अनाज को सड़ाने के बजाय जरुरतमंदों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और हर साल की तरह फिर मध्यप्रदेश और पंजाब में हजारों बोरी गेंहू बिना किसी रखरखाव से सड़ गया। इंद्र देव की ‘कृपा’ पर आश्रित राज्य सरकारें अन्न भंडारण की चुनौती के आगे बेबस नजर आ रही हैं। कुपोषण से होने वाली मौतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा था कि केंद्र से आवंटित अनाज ले जाकर गरीबों में बांटे। गांवों में आज भी 23 करोड़ लोग अल्प पोषित हैं, जबकि पचास फीसदी बच्चों की मौत की वजह कुपोषण है। देश की किसी भी सरकार के लिए यह शर्म की बात है कि दुनिया की 27 फीसदी कुपोषित जनसंख्या भारत में रहती है। इन विरोधाभासों के बीच यदि सरकार खाद्य सुरक्षा की बात करती है तो उसकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बारे में गंभीरता से विचार करें और देश की जन-कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी फायदे के हिसाब से लागू करने के बजाय सभी राजनीतिक पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार करें।

11 May 2013

सर्वप्रथम क्या देश या धर्म ?

                            उठो देशवासियों रणभेरी बज चुकी, मात्र-भूमि की पुकार है,
                                जो अब भी ना जागे तो तुम्हारे जीवन पर धिक्कार है।
                                रहे चुप तुम कई वर्शों तक अब तोड़ो दास्तां की बेड़ीयाँ,
                          करो भारत माता को सर्वस्व समर्पित यह तुमहारा अधिकार है।

जी हां आज हम एैसे इसलिए कह रहे है क्योंकि देश में आज कुछ एैसे कट्टरपंथी अपना पांव पसार रहें है जो राश्ट्र की एकता और अखंडता को धराशायी करना चाहते है। बात चाहे आज संसद में राष्ट्रगीत की अपमान का हो या फिर फतवे के मार्फत धर्म के नाम पर देश को बांटने की, हर ओर आज एक ही सवाल हर हिन्दुस्तानी पुछ रहा है की सर्वप्रथम क्या देश या धर्म। कुछ कट्टरपंथी तो ये भी मानते है की देश सीमाओं में बंधा हो सकता है मगर धर्म को कोई सीमा नही बांध सकती मगर देश से ही धर्म की सुरूआत होती है ये बात ये भूल जाते है। सवाल ये भी पैदा होता है की उनके लिए सर्वप्रथ देश पहले है या उनका धर्म। भारत एक ऐसा देश है जो सभी धर्मो का सम्मान करता है, इसलिए यहा बात देश की होती है फिर हम देश का सम्मान क्यों नही कर पाते आज ये एक गंभीर मुद्दा बन चुका है, जो देश और समाज को तोड़ने की दिषा चल रहे इस्लामिक सड्यंत्र का हिस्सा है। आज जाकिर और ओवैषी जैसे धार्मिक उन्माद फैलाने वाले लोग धर्म के सम्मान में देशको आड़े लाते है, और धर्म को देश से उपर बताते है। 


आज अल्पसंख्यक वोट बैक इस कदर महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारे नेता देश और संस्कृति की चिन्तन को स्वयं ही नष्ट करनें की दिषा में हर समय अपना दुष्चक्र चलाने पर अमादा हैं। यहा सवाल उठता है कि क्या आज के सेकुलवादी युग में अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को देश से उपर समझने लगा है। क्या आज बंदे मातरत का विरोध और हिन्दु देवा देवताओं के अपमान से ही हमारे देश के अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को सुरक्षित रख पाएगा या फिर देश के अंदर इस्लामिक कट्टरता को बढ़ावा देकर, ये एक महत्पूर्ण सवाल आज के संदर्भ में हर ओर लोग इस समुदाय से पूछ रहे है।

इस भारतभूमी की रक्षा का इतिहास हमेशा से ही भारत मां के चरणों में शीश झुकाने और सरहदों पर शहीद होने वाले जवांजों ने की है, एैसे में सर्वप्रथम हर हिन्दुस्तानी के अंदर पहले राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना हमेशा रहती है। देश की सनातन वैदिक के अनुसार राष्ट्र की रक्षा करना पहला कर्तव्य है और राष्ट्र क्या है उसको भी धर्म परिभाषित करता है। एैसे में सवाल उन मजहवी उन्माद फैलाने वाले इस्लाम के ठेकेदारों से है की आखिर किस मकसद से धर्म को राष्ट्र से उपर बताते है। इसलिए आज हम पुछ रहें है की सर्वप्रथ क्या देश या धर्म ?

10 May 2013

क्या वन्दे मातरम का विरोध देशद्रोह नहीं है ?

                             यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
                          तुमने इसे अपमान किया, खण्डित भारत का मान किया॥
                       वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है, तूने कैसे मान लिया॥
                             यह वंदेमातरम शब्द नहीं यह भारत माँ की पूजा है।
   

इस देश की आजादी का अगर इसे महामंत्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा। देश के सभी क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस महामंत्र का प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए किया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो। मगर आज ऐसा लगता है की हमारे देश के माननीय अपने आप को संसद, संविधान और राष्ट्र से भी उपर समझने लगे है। वंदे मातरम् का बॉयकॉट करके बसपा के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने एक बार फिर शहीदों का अपमान किया है। साथ ही राश्ट्रगान का अपमान के अलावे उन्होने लोकसभा कार्य संचालन विधि का भी उलंघन किया है। लोकसभा कार्य संचालन विधि के अनुसार कोई भी सांसद सदन से बाहर नहीं जा सकता है, जब राष्ट्रगीत बज रहा हो। क्या ये संसद और संविधान का घोर अपमान नहीं है। क्या ये सदन का अवमानना नहीं है। क्या एैसे सांसद को देषद्रोही घोशित नहीं करना चाहिए? क्या ये मानमीय अपने आप को लगता है इस्लाम के खिलाफ वंदे मातरम् बताने वाले महोदय खुद हिंदुस्तान के इतिहास से अनजान हैं। बीएसपी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का कहना है कि वंदेमातरम इस्लाम के खिलाफ है इसलिए वह लोकसभा छोड़कर चले गए थ। ये एक सांसद हैं लेकिन ये नहीं जानते कि वंदे मातरम् के विवाद को बरसों पहले ही मौलाना आजाद जैसे राजनीतिज्ञ सुलझा चुके हैं। मगर 21वीं सदी में भी शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेता बार-बार  विवाद का जन्म दे रहें हैं। इस्लाम भी इस बात कि इजाजत नहीं देता कि आप राष्ट्र के प्रतीकों का अपमान करें।

तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की आखिर ये मानमीय किस अधार पर ऐसे हरकत कर रहे है? क्या ये किसी साजि़स का हिस्सा है, या किसी अंतराश्ट्रीय अलगावादीयों के कहने पर एैसा कर रहे है? कोई इसे ‘तालिबानी आचरण’ करार दे रहा है तो कोई राश्ट्रद्रोह, मगर यहा सवाल ये है की संविधान निर्माता बाबा साहेब आम्बेडकर के नाम और विचारधारा के साथ सर्वजन हिताय सर्वजनय सुखाय की नारा देने वाली बसपा आज चुप क्यों है। क्या एैसे सांसद की सदस्यता तुरंत नहीं होनी चाहिए ? ये महज संसद में राष्ट्र गीत का अपमान नहीं है। यह हर हिंदुस्तानी की देशभक्ति को लगी गहरी चोट है। शफीकुर्रहान बर्क के खिलाफ देश भर में गुस्सा और आक्रोष का माहौल है। वंदेमातरम यूथ बिग्रेड की ओर से राष्ट्र गीत का अपमान करने पर बसपा सांसद के खिलाफ थाना शाहगंज में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया है। विश्व के अनेक देशों के राष्ट्र गीत तो एैसे है की जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्वयं के देश की प्रजा के स्वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। इस्लाम के नाम पर जिहाद जायज है तो क्या उनका इस्लाम राष्ट्रीयता का पाठ नही पढ़ाता है। ये सवाल शफीकुर्रहान बर्क जैसे हर भारतीय से है जो ऐसी भावनाएँ और शब्द हमें एक देश के नागरिक होने के बावजूद भी आत्मीय रूप से बिभाजित करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, वन्दे मातरम् का विरोध देशद्रोह नहीं है।

19 April 2013

हिन्दुओं का दर्द, जहा कदम कदम पर रोती है जिंदगी !

                                       देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
                                               कितना बदल गया इनसान
                                 सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
                                             कितना बदल गया इनसान


हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन कई कई योनियों के बाद संभव हो पाता हैए और ऐसा माना जाता है कि मानव ए भगवान् की सबसे सफल ए अशचार्यजनक और सबसे सम्रध रचना है ! अगर हम इस बात को मानते हैं तब हमें उस भगवान् का धन्यवाद भी करना चाहिए जिसने हमें इस रूप में दुनिया में भेजा है ! लोग धन्यवाद करते भी हैं पूजा पाठ करके ! भले ही विभिन्न रूप में करते हैं लेकिन करते तो हैं ! लेकिन क्या यही और इतना ही काफी है हम इंसान का रूप पाकर इस मद में अंधे हो जाते हैं और भगवान् द्वारा प्रदान करी गयी सुविधाओं का दुरूपयोग कर उन्हें कम करते जा रहे हैं  ! भगवान् भी कभी कभी अपनी इस रचना पर गर्व करने की बजाय दुःख करता होगा कि मैंने ये क्या कर दिया !

पिछले कुछ समय से इस तरह की घटनाएं विश्व भर में घटित हो रही हैं जो मन को अन्दर तक हिला देती हैं ! भारत में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू भारतीय नागरिक बनना चाहते हैं क्यों क्योंकि पाकिस्तान में उनकी जान और माल की हिफाज़त का उन्हें कोई  भरोसा नहीं है ! उनकी लड़कियों और महिलाओं की इज्ज़त महफूज़ नहीं है ! क्या एक  राष्ट्र इतना कुत्सित हो सकता है कि वो अपने ही नागरिकों की हिफाज़त न कर सके अब कहाँ हैं इस्लाम की हिमायत करने वाले ठेकेदार  और ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं जहां जहां मुस्लिम आबादी बाहुल्य में है वहां यही हालात  हैं !  असल में पाकिस्तान में हिन्दू ही नहीं बल्कि कोई भी सुरक्षित नहीं है ! क्या विश्व समुदाय को ये नहीं दीखता है घ् क्या कश्मीर में पल पल अपनी टांग अडाने वाले मानव अधिकार आयोग को पकिस्तान्ब की कारगुजारी समझ में नहीं आती है आप स्वयं समझ सकते हैं ! कश्मीर तो भारत का हिस्सा था वहां मुस्लिम अधिसंख्यक थे उन्होंने वहां से हिन्दुओं को भगा दिया तो पाकिस्तान से भगाने में  क्या दिक्कत रही होगी  भारत की सरकार पहले भी श्मूर्ति बनकर बैठी रही और आज भी बैठी है ! स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि  हम हिजड़ों की औलाद हैं हमारे बस का कुछ भी नहीं !

हमारे यहाँ  शाहरुख़ खान को कोई कुछ कह दे तो पाकिस्तानए  भारत में अल्पसंख्यकों की हिफाज़त का सवाल उठा  देता है लेकिन हमारे हिन्दू बिरादरी के लोग पाकिस्तान छोड़कर आ जाते हैं तो भी भारत  की सरका कुछ नहीं करती हिंदुस्तान की पहिचान कृष्णा और राम से है ये हमें समझना होगा ! हम धर्म निरपेक्ष है लेकिन हमारी संस्कृति भारतीय संस्कृति है हिन्दू संस्कृति  है ! हम पाकिस्तान जैसे असफल भूखे और आतंकवादी राष्ट्र से ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ कोई  कार्यवाही करेगा लेकिन हम विश्व समुदाय को आगाह कर सकते हैं कि  वो उस पर दबाव डाले ! पाकिस्तान से आये हिन्दू जब अपनी अपनी कहानी बयान करते हैं तब आँखों से आंसू आने लगते हैं कि क्या ऐसा भी हो सकता है क्या इंसान ऐसा भी कर सकता है इन कुछ हिन्दुओं की स्थिति को देखकर पाकिस्तान में रह रहे लगभग पच्चीस लाख हिन्दुओं की बेचारगी का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि वहां मानवता कैसे रहती होगी क्या इस्लाम इसकी इज़ाज़त देता है या सब कुछ बस इस्लाम ही है और मानवता कुछ भी नहीं कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान में इंसान नहीं हैवान बसते हैं !

मैं मानता हूँ कि वहां  भी कुछ इंसान है लेकिन उनकी हैवानों के सामने कोई औकात नहीं रही होगी ! मैं मानता हूँ कि  इस्लाम के सच्चे हितेषी भी वहां होंगे लेकिन कठमुल्लों के सामने उनकी हैसियत कमजोर रह गयी होगी लेकिन इस तरह तो मानवता ख़त्म हो जायेगी पता नहीं क्यूँ आज ऐसा लगता है धर्म मज़हब शायद इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चला है ! और एशिया में तो शायद और भी ज्यादा ! खाड़ी  के कुछ  देशों में हर रोज़ के विस्फोट शायद एक दिन सभ्यता को ही नष्ट न कर दें ! पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आपस में लड़ते झगड़ते तालिबान और कठमुल्ले शायद इंसान को वहां रहने ही नहीं देना चाहते ! ये शायद पाषाण  युग है ए जो जीतेगा वही जीएगा  ! बाकी को न जीने का हक़ है और न इस दुनिया में रहने का हक़ ! दुनिया को जंग का मैदान बना दिया है लोगों ने ! अगर कैसे भी दौनों  कोरिया अपनी अपनी बात पर अड़ गए  और कल को युद्ध हो जाए तब क्या होगा ए अनुमान लगाया जा सकता है आज इंसान शायद जंगली पशुओं से मुकाबला करना चाहता है कि  कौन जीतेगा और जो जीतेगा वो दूसरे  को मारेगा और उसका खून पिएगाए  उसका मांस खायेगा ! 

कभी श्री लंका में सिंहलीज़  तमिल हिन्दुओं का सफाया कर देना चाहते हैं तो कभी बंगला देश हमारे एहसानों के बदले हमारी कौन  को ही खतम कर देना चाहता है ! हालाँकि 100 करोड़ से ज्यादा और दुनिया भर में फैले हुए हिन्दुओं को इतनी आसानी से ख़त्म नहीं किया जा सकता ! वो दिन और थे जब हिन्दू लाचार था कायर था  !  हमारी सरकारें किसी मजबूरी से बंधी हो सकती हैं हम नहीं ! ये भी सत्य है कि  हिन्दू आज भी सहनशील है मानवता का पुजारी है और इसी वज़ह से वो हिंदुस्तान से गुलाम के रूप में जाकर मॉरिशस और फिजी में सत्ता तक पहुँचता है ए इसी वज़ह से माइक्रो सॉफ्ट जैसे संसथान में 40 प्रतिशत से ज्यादा अपना योगदान देता है ! तभी सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला जैसे बेटियां उसके घर की शोभा बनती हैं ! तभी 34 प्रतिशत नासा के कर्मचारी  भारतीय और हिन्दू होते हैं ! इसीलिए ए क्योंकि हमारे लिए मानवता सर्वश्रेष्ठ है  धर्म नहीं !

हालाँकि ये मानव प्रवृति है कि  वो दुसरे को न तो खुश देख सकता है और न ही प्रसन्न ! भगवान् गौतम बुद्ध ने हमेशा अहिंसा  का  नारा  दिया किन्तु बुद्ध धर्म के अनुयायियों ने जिस तरह का कत्ले आम मचाया  हुआ है वो कहीं से भी इस धर्म की शिक्षाओं पर खरा नहीं उतरता ! श्री लंका में सिंहलीज़  लोगों ने प्रभाकरन के बहाने लाखों तमिलों का खून बहा दिया ये कैसा धर्म है भाई बर्मा में बोद्धों ने रिंगानिया समुदाय के मुस्लिमों को घरों में जिन्दा जला दिया ए ये कैसी धरम की शिक्षा है भाई ये कैसा धर्म है और आज भी यही सब चल रहा है ! मुझे नहीं मालूम कि  आज तक कभी किसी हिन्दू राजा  ने या हिन्दुओं ने दूसरे धर्म  के मानने वालों से कभी इस तरह का सलूक किया हो या देश से भगाया हो संभव है इतिहास में ऐसा कुछ हुआ हो लेकिन मैं नहीं जानता !

आज शायद दुनिया को कुछ लोग जितना खूबसूरत  बना देना चाहते हैं ए ये धर्मों के ठेकेदार उसी दुनिया को बदबूदार ए खतरनाक और कुरूप करने में लगे हुए हैं ! कल्पना करिए उन लोगों के बारे में उनकी जिंदगी के बारे में जो हर पल मौत को देखते होंगे ! जो हर पल अपनी बहन बेटियों की इज्ज़त लुट जाने के डर  से सहमे सहमे से रहते होंगे ! कल्पना करिए उन मासूमों की जिंदगी की जिनकी आँखों में सुनहरे कल के सपने होंगे और जिन्हें अनायास ही अकस्मात ही मौत अपने आगोश में ले लेती होगी ! जहां जिन्दगी पल पल और कदम कदम रोती  होगी  !  तो क्या ऐसा धर्म  जरुरी है मानव के लिए ?

क्या आज रामायण से हम दूर हो रहे है ?

जीवन का अधार कही जाने वाली रामायण आज हम सब से दूर होती जा रहा है। राम का अर्थ है मेरे भीतर का प्रकाश, मेरे दिल के भीतर का प्रकाश। आप के भीतर का ओज ही राम है। 1987 का एक दौर था जब हर घर में दूरदर्षन के माध्यम से रामायण की गूंज सुनाई देती थी, सदियों से हर हिन्दुस्तानी के दिलों में रमने वाले राम की काल्पनिक छाया एक राम राज की ओर लोगों को दिषा दे रही थी, और अर्यावर्त की एक नई सुबह फिर से हिन्दुस्तान को अपने सांस्कृतिक विरासत में नई जोष भर चुकी थी। मगर आज हम उस राम को भूला दिए है, स्वार्थ और भौतिकवाद इस कदर हावी हो चुकी है की आज राम का जगह रावण ले चुका है। मर्यादा पुरूशोत्तम राम की आदर्ष जीसे हर मनुश्य अपने जीवन का मूल कर्तब्य मानता है, जिसका नाम सुबह षाम हर कोई जापता है, आज उसे आधुनिकता की आंधी उड़ा कर पंष्चमी चाल चलन की मैली मिट्टी हमेषा के लिए उसे दफन कर दी है। तो ऐसे सवाल भी खड़े हो रहे है की क्या आज वाकई हम सब रामायण से दूर हो रहे है। 

जिस रामायण की कहानी ने 100 मिलियन से अधिक दर्शकों को आकर्षित किया था। आज उसे कोई देखना नहीं चाहता है। रामायण भारत और विश्व टेलिविजन इतिहास में सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम बन गया था। सीता को राम की सेविका और उनकी हर आज्ञा को आंख मूंदकर स्वीकार करने वाली पत्नी की आदर्ष हर औरत अपनी नैतिक कर्तब्य मानती थी। मगर आज हर नारी सीता की आदर्षो को सिर्फ एक कहानी मात्र बताकर खुद को आधुनिक दिखाने की होड़ में विष्वास करने लगी है। यही कारण है की रामायण और राम हम सब से दूर हो गये है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि, ‘यदि तुम मुझ से सब कुछ छीन लो तो मैं जी सकता हूं, लेकिन यदि तुम मुझसे राम को दूर ले जाओगे तो मैं नहीं रह सकता।

रामायण पौराणिक ग्रंथों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। रामायण सिर्फ एक कथा अवतार या कालखंड ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का रास्ता बताने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। रामायण हर एक रिश्तों पर लिखा गया है, हर रिश्ते की आदर्श स्थितियां, किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करें, विपरित परिस्थिति में कैसे व्यवहार करें, ऐसी सारी बातें हैं। जिसे आज हम सब को सबसे जयादा जरूरत है, मगर युवा पीढ़ी इन ग्रन्थों को पढ़ना तो दूर देखना नहीं चाहता है। उसे सिर्फ विदेषी प्रकाषकों की मनगणंत कहानीय जयादा रोजक लगती है। वही दुसरी ओर माता पिता अपने बच्चों को संस्कृत और हिन्दी पढ़ाने के बजाय उसे अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते है जिसके कारण धर्म और अघ्यात्म आज हमारे घर और समाज से दूर होते जा रहा है। जिसे आज हमे अपने जीवन में अपनाकर उसे बेहतर बनाने की जरूरत है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रामायण से हम दूर हो रहे है ?

रामायण की आदर्श और हमारे जीवन में उसकी उपयोगिता ! 




- दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को युवराज घोषितकर उन्हें राजा बनाने की घोषणा भी कर दी। हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडना नहीं चाहते।

- राजा बनने जा रहे राम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया। जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं।

- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वनवास में भी रहे, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। ये हमें सिखाता है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।

- भरत ने निष्कंटक राज्य भी स्वीकार नहीं किया, राम की चरण पादुकाएं लेकर राज्य किया। हमारा धर्म अडिग होना चाहिए। अधिकार उसी चीज पर जमाएं जिस पर नैतिक रूप से आपका अधिकार हो और आप उसके योग्य हों। भरत ने खुद को हमेशा राम के अधीन समझा, इसलिए जो राजा पद राम को मिलना था, उसे भरत ने स्वीकार नहीं किया।

- राम ने सुग्रीव से मित्रता की, सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी दोनों दिलवाई। आप भी जीवन में मित्रता ऐसे व्यक्ति से करें, जो आपकी परेशानी, आपके दुरूख को समझ सके।

- राम हमेशा भरत की प्रशंसा करते, उसे ही अपना सबसे प्रिय भाई बताते, जबकि राम के साथ सारे दुरूख लक्ष्मण ने झेले, इसके बावजूद भी लक्ष्मण ने कभी इसका विरोध नहीं किया। आप कोई भी काम करें तो उसे कर्तव्य भाव से करें, प्रशंसा की अपेक्षा न रखें, प्रशंसा की इच्छा हमेशा काम से विचलित करती है।
 

17 April 2013

सत्ता के ढाई केंद्र वाला माडल और कांग्रेस !

देश की सियासी फिजां में इन दिनों बस एक ही बात पर चर्चा हो रही है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सही कह रहे हैं अथवा जनार्दन द्विवेदी। दोनों ही ने अपने अपने तरीके से सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के प्रयोग को सफल और असफल करार दिया है। दिग्विजय सिंह की बात में वंशवाद की हिमायत की बू आती है तो द्विवेदी का कहना वंशवाद की समाप्ति की ओर इशारा कर रहा है। भारत में ही इस बात का उदहारण मौजूद है कि यहां वंशवाद की परंपरा भी रही है तो वंशवाद से इतर ब्रितानी गोरों ने लंबे समय तक यहां राज भी किया है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का तिलिस्म दरक चुका है। कांग्रेस के अंदर अब नेहरू गांधी परिवार का चमत्कार ढहने पर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही भ्रष्टाचार पर अपना मुंह बंद रखकर देश की जनता की नजरों से उतर चुके हैं। राहुल के अंदर देश को संभालने का माद्दा नजर नहीं आता हैए वहीं दूसरी ओर टाईम मेग्जीन एक बार फिर पलनिअप्पम चिदम्बरम को ही मनमोहन सिंह का सक्सेसर बता रही है। देखा जाए तो सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं देश में वर्तमान समय में!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसे आजादी के उपरांत महात्मा गांधी ने भंग करने की सिफारिश की थी में स्वाधीनता के बाद से ही सामंतशाही हावी रही है। कांग्रेस के अंदर वंशवाद का बटवृक्ष किसी से छिपा नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उपरांत इंदिरा गांधीए राजीव गांधीए संजय गांधीए सोनिया गांधीए राहुल गांधीए वरूण गांधीए सियासी बियावान में विचरण कर रहे हैं। इनमें से मेनका और वरूण कांग्रेस से बाहर हैं। नब्बे के दशक में नरसिंहराव और सीताराम केसरी ने कांग्रेस को कुछ समय तक नेहरू गांधी परिवार की छाया से दूर रखा किन्तु उसके बाद एक बार फिर इस बटवृक्ष पर निठल्ले बैठे कांग्रेसी अमर बेल जैसे परजीवी बनकर लदे रहे और कांग्रेस की बागडोर तथा सत्ता की धुरी एक बार फिर सोनिया गांधी के पास लाकर रख दी। जैसे ही राहुल गांधी सोचने समझने के लायक हुए उन्हें भी महिमा मण्डित करना आरंभ कर दिया गया।

राहुल गांधी भी इन कांग्रेस के मठाधीशो के रंग में ही रंग गए। बाद में जब राहुल को अहसास हुआ कि उनके पैरों के नीचे जमीन ही नहीं है तो वे हतप्रभ रह गए। राहुल ने धीरे धीरे अपने कदम वापस खींचे और प्रधानमंत्री ना बनने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। फिर क्या था राहुल को आगे कर सत्ता की मलाई चखने वाले निठल्लों को यह बात रास नहीं आई और उन्होंने फिरसे राहुल के पीएम बनने की संभावनाओं को हवा देना आरंभ कर राहुल के मन में पीएम बनने की अभिलाषाएं जगाना आरंभ कर दिया। कांग्रेस के इस तरह के शातिर नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक है। जनता जाग चुकी हैए मीडिया को प्रलोभन देकर आप अपने कब्जे में ले सकते हैं पर सोशल मीडिया ने अपनी जो दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है वह निश्चित तौर पर सियासी लोगों की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।

इतिहास साक्षी है कि देश पर आक्रमण कर बाबर से लेकर औरंजेब और बहादुर शाह जफर तक खानदानी राज रहा है। बादशाह अकबर ने इस देश पर पचास साल लगातार राज किया है। अकबर की न्यायप्रियता के कारण जो नींव रखी गई थी वह उनकी नाकारा आल औलादें सौ साल तक भुनाती रहीं। इसके बाद जब बहादुर शाह जफर ने देश पर राज किया तब कंपनी बहादुर यानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पैर पसारने के उपरांत लाल किले तक ही सिमट गया। उस वक्त राज जरूर जफर का था पर आदेश ईस्ट इंडिया कंपनी का ही चला करता था। आज के दौर में यह उदहारण इसलिए भी प्रासंगिक माना जा सकता है क्योंकि आज राज नेहरू गांधी परिवार का ही चल रहा है। देश में उनकी मंशा कि बिना पत्ता भी नहीं खड़क रहा है। मनमोहन सिंह देश के वजीरे आजम जरूर हैं पर उनकी भी इतनी ताकत नहीं कि वे अपनी मर्जी से देश को चला सकें। देश की सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र सालों से 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी का आवास ही बना हुआ है।

इक्कीसवीं सदी का सपना देशवासियों ने बड़े ही चाव के साथ देखा था। आज इक्कीसवीं सदी का तेरहवां साल आधा बीतने को हैए पर इसके बाद भी आज देश की रियाया अपने आप को गोरे ब्रितानियों के बजाए स्वदेशी कालों की गुलाम समझ रही है। जनता को जो मिलना चाहिए वह उसे मिल ही नहीं पा रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में दस सालों के लिए किया गया था। आज संविधान बने छः दशक से ज्यादा समय हो गया है पर देश के हुक्मरान इन्हें मुख्य धारा में ला नहीं पाए हैंए परिणामस्वरूप आज भी आरक्षण का जिन्न सामान्य वर्ग पर हावी है। आज कांग्रेस की हालत इतनी गई गुजरी हो गई है कि वह जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के बजाए एक परिवार के भरोसे ही देश को हांकना चाह रही है। कांग्रेस के नेता एक परिवार विशेष के भाटचारण और महिमामण्डन को ही अपना मूल मंत्र मान रहे हैं। इन्हीं नेताओं के चलते इस परिवार के कथित युवा किन्तु वस्तुतः प्रोढ़ होते सदस्य को लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है।

शिवसेना भी राहुल पर वार कर रही है तो भाजपा उन्हें आड़े हाथों ले रही है। राहुल कहते हैं उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनना पर उन्हें पीएम बनाने के लिए कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सारे घोड़े छोड़ने पर आमदा नजर आ रहे हैं। राजा दिग्विजय सिंह द्वारा सोनिया और मनमोहन सिंह के दो पावर सेंटर को गलत और असफल बताया जाकर नई बहस छेड़ दी जाती है। इसकी काट के रूप में जनार्दन द्विवेदी सोनिया मनमोहन के दो पावर सेंटर वाले फार्मूले को सफल निरूपित करते हैं। समझ में नहीं आता कि दो राजनेता इस तरह परस्पर विरोधी बयान देकर जनता को भ्रमित क्यों करना चाह रहे हैं। इसके पीछे उनका क्या हिडन एजेंडा है। उधर टाईम पत्रिका एक बार फिर पूरी ईमानदारी के साथ मनमोहन के सक्सेसर के बतौर पलनिअप्पम चिदम्बरम का नाम आगे कर रही है।

दिग्विजय सिंह या जनार्दन द्विवेदी जो चाहे कहें पर वस्तुस्थिति यह है कि देश में सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं। एक हैं 7ए रेसकोर्स रोड़ पर रहने वाले प्रधानमंत्री डॉण्मनमोहन सिंहए दूसरी 10ए जनपथ में निवासरत यूपीए चेयर पर्सन श्रीमति सोनिया गांधी और तीसरे 12ए तुगलक लेन को आशियाना बनाने वाले राहुल गांधी। इस तरह देश में सत्ता के ढाई केंद्र अस्तित्व में हैं। 42 साल के अम्योच्योर पालीटिशिन राहुल गांधी आज भी अपनी मां श्रीमति सोनिया गांधी के मानिंद लिखा लिखाया भाषण पढ़ रहे हैं। उद्योगपतियों से रूबरू राहुल के भाषण के दौरान उनका एक पन्ना कहीं खो गया तो वे बोल उठे आई लास्ट। क्या यही अपरिपक्व राजनेता देश को इक्कीसवीं सदी का सपना दिखाने में सफल हो पाएंगेघ् कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की देश के हालातों और भ्रष्टाचार को छोड़कर अन्य बेमतलब के विषयों पर बयानबाजी को देखकर कहा जा सकता है कि .ष्ष्कौन है सच्चा कौन है झूठा हर चेहरे पे नकाब है

सांस्कृतिक आतंकवाद की आहट पर नज़र !

जब भी आतंकवाद की चर्चा की जाती है तो मन में तुरन्त ही बम विस्फोट, अपहरण, आगजनी, रेल दुर्घटनायें, मौत जैसी वीभत्स घटनाओं की छवि अंकित हो जाती है। देश तथा देशवासी विगत कई वर्षों से आतंक के इसी चेहरे से परिचित रहे हैं। आतंकवाद का यह रूप हमारे मन-मष्तिष्क पर इस कदर से हावी हो गया है कि हमें इसका कोई अन्य स्वरूप नजर ही नहीं आता है। देखा जाये तो यह आतंकवाद का वह चेहरा है जो हमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है, इसके अतिरिक्त अन्य आतंक के चेहरे हमारे आसपास होने के बाद भी हमें दिखाई नहीं देते हैं। विभिन्न प्रकार के आतंकी स्वरूपों में हमें प्रमुखता से सांस्कृतिक आतंकवाद को देखने और समझने की आवश्यकता है।
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सांस्कृतिक आतंकवाद देश के अन्दर आतंक की वह अवधारणा है जो बिना जान लिये, बिना बम धमाके किये हमारे देश को खोखला कर रही है। देश के समृद्ध विकास, आर्थिक उन्नति, प्रोद्योगिकी सक्षमता, शैक्षिक उन्नयन, उसकी सांस्कृतिक विरासत, जीवन-मूल्यों, मानवतावाद आदि से अपना विभेद रखने वाले देशों ने जब देख लिया कि भारत को आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से, सैन्य क्षमता के द्वारा, विज्ञान-प्रोद्योगिकी के द्वारा नियन्त्रण में रखना सम्भव नहीं है तो देश-विरोधी ताकतों ने विध्वंस का सहारा लिया। देश भर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं, मजहबी फसादों के बाद भी देश की एकता अक्षुण्य रही, विकास-यात्रा बाधित नहीं हुई तो देश में सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने का कार्य विघटनकारी ताकतों के द्वारा किया जाने लगा।
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युवाओं को आकर्षित कर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले समारोहों का आयोजन किया जाने लगा; विभिन्न विदेशी चैनलों के जरिये से घरों के भीतर पहुंच कर हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जाने लगा; आधुनिकता के नाम पर परिवार को विखण्डित किया जाने लगा; समूची दुनिया में भातरीय अस्मिता के नाम पर यहां की महिलाओं को आधार बनाकर विभिन्न विद्रूप कार्यक्रमों को संचालन किया जाने लगा। प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो भारत देश सिर्फ और सिर्फ देह के आसपास विचरने वाले, महिलाओं के प्रति हिंसा का भाव रखने वाले, सेक्स के प्रति लालायित रहने वाले नागरिकों का देश बन गया हो। आधुनिकता की अवधारणा को विभिन्न तरीकों से इस तरह से परिभाषित किया जाने लगा कि देश की सांस्कृतिक विरासत यहां के युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों को भी दकियानूसी, पाखंड से भरी दिखाई देनी लगी है। इन सबका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे समाज से परिवार की अवधारणा का विलोपन हो गया; रिश्तों की मर्यादा का ह्रास होने लगा; महिलाओं को आधार बनाकर बाजारवाद की संकल्पना का विकास होने लगा; राष्ट्रवाद की गरिमामयी छवि का विखण्डन होने लगा।
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आज के बम धमाकों, नित होते हादसों, मौतों के बीच इस आतंकवाद से भी लड़ने की आवश्यकता है। हमें हमारी युवा पीढ़ी के सामने देश के स्वर्णिम इतिहास को रखना होगा; यहां की भव्य सांस्कृति विरासत से उसका परिचय करवाना होगा; देह-सुख से इतर रिश्तों की मर्यादा को समझाना होगा; बाजारवाद से इतर सामाजिकता का विकास करवाना होगा; वैश्विक जीवन के साथ-साथ राष्ट्रवाद का पाठ भी पढ़ाना होगा; आर्थिक मूल्यों से ऊपर जीवन-मूल्यों को रखना होगा। यदि हम इस तरह के कुछ कदमों को उठाकर दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी को समझाने में सफल हुए तो सम्भव है कि आतंकवाद के इस छिपे चेहरे-सांस्कृतिक आतंकवाद-को हम अपने घरों के भीतर पहुंचने से रोक लेंगे।

क्या मोदी से अच्छा पी एम पद की उमीदवार सुषमा हो सकती है ?

जैसे.जैसे वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है वैसे.वैसे राजनीतिक गलियारों में होने वाली हलचलें तेज होती जा रही हैं। जाहिर सी बात है समय बहुत कम बचा है और वर्तमान हालातों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि सभी पार्टियों को खुद को अन्य से बेहतर साबित करने के लिए अभी बहुत ज्यादा तैयारियां करनी हैं। यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारना लगभग तय और स्वीकृत है लेकिन जब बात एनडीए की होती है तो यूं तो भाजपा की ओर से वर्ष 2014 के लिए नरेंद्र मोदी का प्रोजेक्शन किया जा रहा है और क्षेत्र विशेष से निकालकर उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर भी उभारा जा रहा है लेकिन एनडीए समेत स्वयं भाजपा में से भी मोदी की उम्मीदवारी का सांकेतिक विरोध शुरू हो गया है। नीतीश कुमार और शरद यादव भी नरेंद्र मोदी की दावेदारी को खारिज करने जैसा संकेत देते हुए यह कह चुके हैं कि जल्द ही बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा की जानी चाहिए। हालांकि इस बीच जो नाम तेजी के साथ लोकप्रियता बटोर रहा है वह है महिला राजनेता सुषमा स्वराज का। एनडीए का घटक दल शिवसेना पहले ही यह साफ कर चुका है कि सुषमा स्वराज ही बाला साहेब ठाकरे की पसंद थीं। शिवसेना के अलावा ऐसे बहुत से दल और व्यक्ति विशेष हैं जो सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का बेहतर उम्मीदवार बताने से नहीं हिचकते। उनका कहना है कि अगर मोदी की जगह सुषमा पर दांव लगाया गया होता तो हालात जुदा होते। इस बीच सुषमा और मोदी के नामों पर एक बहस छिड़ चुकी है क्योंकि जहां बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सुषमा को बेहतर बता कर नरेंद्र मोदी को नकारता प्रतीत हो रहा है वहीं नरेंद्र मोदी को भारत के लिए उपयुक्त प्रधानमंत्री कहने वाले भी पीछे नहीं हैं।


नरेंद्र मोदी का पक्ष लेने वाले लोगों का कहना है कि मोदी छा जाने वाले नेता हैं। वह जहां भी जाते हैं अपने प्रशसंकों का एक गुट तैयार कर देते हैं। वह जब बोलते हैं तो सामने वाले के पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचता। उनकी भाषण शैली कमाल की है। वह विशाल व्यक्तित्व वाले नेता हैं और उन्हें आरएसएस समेत भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का समर्थन भी प्राप्त है। गुजरात को विकास का मॉडल बनाने वाले नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जाता है। आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने में नरेंद्र मोदी पूरी तरह सक्षम हैं और उनका मीडिया मैनेजमेंट भी उनके लिए रामबाण का काम करता है। अब वह गुजरात तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता भी घोषित करने की तैयारी में हैं। वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का विरोध इस बात पर किया जाता है क्योंकि वह आज भी अपनी तानाशाह छवि से बाहर नहीं आ पाए हैं। हिंदुत्व का पुरोधा होने का ठप्पा उनका पीछा नहीं छोड़ पा रहा है जिस वजह से वह आज भी सांप्रदायिक नेता के तौर पर ही जाने जाते हैं। उन्हें ना सिर्फ एनडीए में बल्कि भाजपा में भी सर्वसम्मति वाले नेता के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा रहा है।


वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का वर्ग जो सुषमा की पैरवी करता है उसका कहना है कि सुषमा स्वराज को अगर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो जाहिर है उन्हें महिला होने का फायदा अवश्य मिलेगा। देश की अन्य सबसे बड़ी पार्टी ;कांग्रेसद्ध और बड़े गठबंधन ;यूपीएद्ध की मुखिया भी एक महिला ही है इसीलिए अगर सुषमा की छवि को उभारा जाएगा तो इसका फायदा भाजपा समेत एनडीए को अवश्य मिलेगा। दूसरी ओर सुषमा भाजपा के वरिष्ठ और सम्माननीय सदस्य लालकृष्ण आडवाणी की पसंदीदा उम्मीदवार हैं और उनका एनडीए और भाजपा दोनों में ही कोई विरोधी नहीं है। सुषमा एक प्रखर नेता और बेहतरीन वक्ता हैंए उन्हें सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाने की संभावनाएं भी तीव्र हैं। मोदी जहां राष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं सुषमा स्वराज पिछले 25 सालों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वह विपक्ष की नेता तो हैं ही साथ ही उन पर कभी किसी भी प्रकार का सांप्रदायिक होने जैसा भी आरोप नहीं लगा है। लेकिन सुषमा की दावेदारी को खारिज करते हुए और मोदी का पक्ष लेने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि जहां मोदी को पिछले दो सालों से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जा रहा है वहीं इस पद के लिए सुषमा का नाम कहीं भी सुनाई नहीं दे रहाए उन्हें तरजीह दी ही नहीं जा रही तो उनके बारे में बात करने का कोई फायदा ही नहीं है।

16 April 2013

मुंबई के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना कितनी सही ?

मुंबई पुलिस की बेतूका फरमान एक बार फिर सामने आई है। जिसे सुन कर आप भी हैरान रह जाएंगें। जी हां अब मुंबई के थानों में भगवान की मूर्तियां और तस्वीरें नहीं रहेंगी। न ही थाना परिसरों में पूजापाठ होगी और न उत्सव मनाए जाएंगे। पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह ने सभी थानेदारों को मूर्तियां-तस्वीरें हटाने के निर्देश दिए थे। इस काम के लिए तय समय सीमा समाप्त हो चुकी है, लेकिन महानगर के कुल 92 थानों में से महज 20 फीसद थानों ने पुलिस आयुक्त के निर्देश का पालन किया है। पुलिस आयुक्त कार्यालय से दो अप्रैल को जारी निर्देश पत्र में कहा गया था कि किसी भी सरकारी दफ्तर, विशेष कर पुलिस विभाग में किसी धर्म विशेष से जुड़ी तस्वीरें एवं मूर्तियां नहीं लगाई जानी चाहिए। पूजापाठ व उत्सव भी नहीं मनाया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। उन्हें यह लग सकता है कि धर्म विशेष में आस्था रखने वाला पुलिस विभाग उनके साथ न्याय नहीं कर सकता। इससे समाज में द्वेष की भावना पैदा हो सकती है।

पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह की इस आदेष से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है, की क्या मुंबई पुलिस को पूजा पाठ करने की अजादी नहीं है। क्या इससे हिन्दु धर्म के लोगों का आक्रोष नहीं बढ़ेगा? क्या ये संविधान के अनुच्छेद 25 का उलंघन नहीं है, ये अनुछेद किसी भी धर्म को समानता का अधिकार प्रदान करता है, और अपने धर्म को प्रचार प्रसार करने कि पूर्ण अजादी प्रदान करता है, तो एैसे में आखिर मुंबई पुलिस के आयुक्त किस अधार पर भेदभाव कर रहे है, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है। मुंबई के पुलिस थानों में लगाए गए भगवान की मूर्तियां किसी धार्मिक संगठ की ओर से या किसी के दबाव में नहीं रखी गई बल्कि खुद पुलिस थानों की अधिकारीयों और कर्मचारियों की ओर से स्थापित की कई है। देष की सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुकी है की हिन्दुत्व सिर्फ एक धर्म ही नहीं बल्कि जीवन जीने की एक कला है, जो किसी भी व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की रास्ता दिखाती है। देश में ये कोई पहला एैसा वाक्या नहीं है जब इस तरह की आदेष जारी की गई हो, एैसी घटना को बार बार इसलिए भी दोहराया जा रहा है ताकी हिन्दु धर्म को समाप्त किया जा सके।

 ये सड्यंत्र देष में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में राजनीति करने वाली पार्टीयों के दबाव में भी किया जा रहा है। ताकी इसे चुनाव में मुद्दा बनाया कर अपने आप को सेकुलर साबित कर सके। भगवान की मूर्ति सिर्फ महाराश्ट्र के पुलिस थानों में ही नहीं है, इस तरह के पूरे देश भर के थानों में भगवान की मूर्ति मौजूद है, तो क्या इसका मतलब देश भर के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना चाहिए। मगर अब तक महाराश्ट्र के अलावे किसी और राज्य के पुलिस आयुक्त की ओर से कभी भी कोई आपती जारी नहीं की गई, तो फिर एैसा मुंबई पुलिस आयुक्त क्यों कर रहे है, इसका जावाब खुद मुंबई पुलिस आयुक्त को देना होगा।

महाराश्ट्र के साथ साथ देश भर के कई एैसे पुलिस थानें है जहा पर हिन्दु देवी देवताओं की मंदिर मौजूद है, तो क्या वहा की लागों को न्याय नहीं मिलती है। पुलिस को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए क्या उसे हटा देना चाहिए? इतना ही नहीं देश में आज भी कई एैसे पुलिस थाना खुद देवी देवताओं के स्थान पर बने हुए है जहा पर वहा के स्थानीय लोग नियमीत रूप से पूजा पाठ करते है, क्या उनके उपर पूजा पाठ करने पर प्रतिबंध लगा देना देना चाहिए। ये तमाम एैसे सवाल है जो खुद मुंबई पुलिस आयुक्त के बेतूके फरमान पर खड़े होने लगे है। तो क्या एैसे में पुलिस थानों से भगवान के मूर्ति को हटाना सही है?

13 April 2013

नक्सली बनो पैसा पाओ जैसी नीति क्या सही है ?

केंन्द्रीय सत्ता बनाम नक्सलवाद की लड़ाई में सरकार तीसरें रास्तें के आसरे विकल्प तलास रहीं है। ये विकल्प केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर जारी की गई नई नीति केंद्रीय सत्ता के समर्पण को बयान कर रही है। नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने के उद्देश्य से जिन तमाम उपायों की घोषणा की गई है, उससे तो यही लगता है कि उन्हें शासन के खिलाफ बगावत करने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है। और सरकार इन नक्सलियों के आगे घुटने टेक रही है। इस नई नीति के तहत नक्सली संगठनों की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में शामिल कथित बड़े नक्सलियों को ढाई लाख रुपये और राज्य कमेटी में शामिल सदस्यों और कमांडर कहे जाने वाले नक्सलियों को डेढ़ लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा उन्हें रोजगार के लिए तीन साल तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस दौरान उन्हें चार हजार रुपये की मासिक सहायता भी प्रदान की जाएगी। साथ ही यदि वे हथियारों के साथ समर्पण करते हैं तो उन्हें उसके लिए अलग से पैसा दिया जाएगा। इतना ही नहीं उनके मामलों का निपटारा फास्ट ट्रैक अदालतों में होगा और इस दौरान सरकार उन्हें कानूनी सहायता भी देगी? छोटे-मोटे मामलों में शामिल रहे नक्सलियों को माफी देने का भी प्रावधान है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या लोगों को नक्सली बनने के लिए इनाम दिया जा रहा है।

देष में जब भी नक्सल आत्मसर्मपण की पेषकष हुई है, तो इसे नक्सली संगठनों ने ठुकराने का ही काम किया है। जब कभी भी संघर्ष विराम हुआ भी तो नक्सलियों ने उस अवधि का इस्तेमाल खुद को संगठित करने और अपने आप को ताकतवर बनाने में किया। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है की फिर सरकार किस अधार पर इस नीति को लागू करना चाहती है? क्या यहा भी उसे वोट की सियासत नज़र आ रही है? या फिर मनरेगा जैसा कोई नया घोटाले का समंदर ? ये सवाल यहा हम इसलिए भी उठा रहे है क्योंकि अब तक सरकार के पास एैसी कोई अधिकारिक आकड़ा मौजूद नहीं है जिसके अधार सरकार ये तय कर पायेगी की कौन से गांव में कौन नक्सली है और कौन आम नागरीक। भारत सरकार नक्सलियों से जिस तरह निपट रही है उससे दुनिया भर में पहले से ही उसकी भद पिट रही है। आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के मामले में भारत एक नरम राष्ट्र के रूप में उभर सामने आया है। एैसे में नक्सलियों के साथ सरकार की इस नीति से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। 

जहानाबाद जेल ब्रेक से लेकर लालगढ के दौर में न सिर्फ नक्सलवादी की मारक क्षमता बढ़ती हुई दिखायी दे रही है बल्कि संसदीय राजनीति और राज्य व्यवस्था नक्सलवादी प्रभावित इलाकों में प्रभावहीन होकर उभर रही है। तो वही सरकार कर्रवाई करने के बजाय नरमी दिखा रही है, जो पूरी तरह से सरकार की संवेदनहीनता को दर्षा रही है। आज संसदीय राजनीति में हाथ जलाये बगैर राजनीतिक दलों को भी नक्सलियों ने अपने प्रयोग में मोहरा बनाया है। षायद यही कारण है की सरकार इस प्रकार के नक्सल समर्थित नीति को आगे बढ़ाने की दिषा में बल दे रही है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, नक्सली बनों पैसा पाओ जैसी ये नीति सही है ?

12 April 2013

क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है ?

                                इनसानों ने पैसे के लिए आपस का प्यार मिटा डाला,
                               हँसते बसते घर फूँक दिए धरती को नर्क बना डाला।

                                मिट्टी से निकाला सोने को सोने से बनाए महल मगर,
                               जज़बातों के नाज़ूक रिश्ते को मिट्टी के तले दफ़ना डाला।

इंसानियत का रिश्ता इंसानों को जानवरों से अलग करता है लेकिन इंसान उस रिश्ते की ही बलि चढ़ा दे तो फिर फर्क क्या रहेगा ? जी हां, आज हम एैसा इसलिए कह रहें है की क्योंकि इस भौतिकवादीता के आंधी में कुछ भी शाश्वत नहीं रह गया है। बदलते जमाने ने मौसमों की तरह रिश्तों की तासीर को बदल डाली है। खून और पानी में कोई अंतर नहीं दीख रहा है, क्योंकि रुपए-पैसों और जमीन-जायदाद के आगे सारे रिश्ते बेमानी हो गए है। हर आंगन और परिवार कुरुक्षेत्र बन गया है और जमीन का टुकड़ा हस्तिनापुर। तो एैसे में सवाल भी खड़े होने लगे है, की क्या आज रिस्ते नाते पैसे की बली चढ़ रहे है। हर भाई धृतराष्ट्र की भूमिका में नज़र आ रहा है तो बेटा दुर्योधन बन बैठा।


शेक्सपियर की नाटक किंग लियर के तरह आज हू बहू रिस्तें कलंकीत होने लगे है, जो आज के समकालीन संदर्भ में सटीक बैठता है। खून पानी ही होता होगा शायद, तभी तो चड्ढा भाईयों ने एक-दूसरे पर रिवॉल्वर तानते हुए एक बार भी नहीं सोचा। तो वही रीयल स्टेट कारोबारी दीपक भारद्वाज की हत्या सुपारी देकर उसके अपने ही बेटे ने करवा दी। हाल ही में घटीत ये दोनों घटनाए सिर्फ उदाहरण मात्र है। लेकीन शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब अखबारों में रिश्तों के बली चढ़ने की खबरें न होती होंगी। आज देष में हर रोज एैसी हजारों घटनाए आम आम बात हो गई है, जो इस ओर इषारा कर रही है की रिस्तें पैसे की बली चढ़ रहे है। पैसे की मोह में आज रिस्तें दरकने की बात हर रोज सामने आ रही है। ये घटनाए एक सभ्य समाज के विनाश के पूर्व की आहट है, जिसे हम सब को समझने की दरकार है।

 तेजी से विकसित हो रहे शहरीकरण में ऐसी घटनाएं भारतीय समाज पर सवालिया निशान लगाती हैं। समाज रूपी परंपरा आज टूट रही है और भौतिकता हर ओर अपना पैर पसार रही है। हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है लेकिन जब कोई मर्यादा को लांघ जाता है तो रिश्ते अपनी गरिमा ही नहीं विश्वास भी खो बैठते हैं। एैसे में आज हम सब को इसकी चिंता करनी की जरूरत है। इस रिस्तें की पतझड़ में आधुनिकता की तूफ़ान हमारे समाज को जड़ से न उखाड़ दे, इसकी चिंता आज लोगों को सताने लगी है। सांस्कृतिक आदर्शांे की बलि भोगवादी परंपरा को जन्म दे रही है, जहा पैसें रिस्तेंकी अहमीयत को तय करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है?