12 May 2013

भूख से मरते लोग और खुले में सड़ता अनाज !

भूख से हो रही मौतों के सन्दर्भ में वर्ष 1996 में रोम में एक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। इसमें 180 देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने एक स्वर से कहा था कि भूख से हो रही मौतें बहुत ही शर्मनाक बात है। सम्मेलन में यह भी संकल्प लिया गया था कि सन् 2015 तक वि·श्वभर से आधी भुखमरी मिटा दी जाएगी। किन्तु इस सम्बंध में कोई ठोस प्रयास अभी तक नहीं हुआ है। फलस्वरूप दिनोंदिन भूख से मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। उल्लेखनीय है कि इस समय दुनियाभर में 80 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दो जून की रोटी नहीं मिल पाती है। और अनुमान है कि 2015 तक यह संख्या डेढ़ अरब तक पहुंच जाएगी। इन 80 करोड़ में से लगभग 40 करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यानी दुनिया में जितने भूखे हैं, उसका आधा भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में हैं। यह उस समय की बात है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भण्डार भी भरे पड़े हैं। तो फिर आम लोग भूख से क्यों मरते हैं? अन्न वितरण व्यवस्था में कहां कमी है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

विश्वभर में में प्रतिदिन 24 हजार लोग किसी जानलेवा बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन 24 हजार में से 18 हजार बच्चे हैं। और इन 18 हजार का एक तिहाई यानी 6 हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन क्या पिछले 66 वर्षों में देशभर में इस बारे में कोई चिन्ता की गई? क्या संसद में इस सम्बंध में कोई बहस हुई? लेकिन अफसोस तो यह कि दुनिया भर में निर्यात करने वाले देश में ही 30 करोड़ गरीब जनता भूखी सोती है। फिर हम इस खुशफहमी में कैसे जी सकते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है, जो सबका पेट भरता है। अगर वाकई ऐसा है तो हमारा देश भूखा क्यों हैं? आज भी छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड, उड़ीसा, झारखंड व बिहार में भुखमरी का प्रतिशत ज्यादा क्यों बना हुआ है?
एक तरफ देश में भुखमरी का खतरा मंडरा रहा है वहीं सरकारी लापरवाही के चलते लाखों टन अनाज बारिश की भेंट चढ़ रहा है। हर साल गेहूं सड़ने से करीब 450 करोड़ रूपए का नुकसान होता है। यह तो बीते सालों के आंकड़ें कहते हैं, जबकि इस साल तो अनाज सड़ने के इतने बड़े आंकड़े सामने आए हैं कि दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हैं। 

हाल ही में इतना अनाज सड़ चुका है कि उससे साल भर करोड़ों भूखों का पेट भर सकता था, जो भ्रष्टाचार के गलियारों में पनपती लापरवाही की सीलन में सड़ गया। विगत वर्ष अनाज सड़ने का अनुमान, जयपुर से लगया गया जहां गोदाम में शराब रखने के लिए करीब 70 लाख टन अनाज बाहर फेंक दिया गया जिससे वह सड़ गया। इसके बाद राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में अनाज सड़ने के कई मामले सामने आए। लेकिन ठोस कारवाई अभी तक किसी पर नहीं हुई। इस मामले पर संसद और राजनीतिक सभाओं में तो बयानबाजी होती रही और ले-देकर कुछ अधिकारियों को निलंबित कर कार्रवाई का फर्ज पूरा कर दिया गया। किंतु इससे हापुड़ में सड़े 5 लाख टन गेहूं की पूर्ति नहीं की जा सकती है, करीब ढ़ाई करोड़ का यह गेहूं, 40 लाख बोरियों में भरे-भरे पूरे एक सप्ताह तक खुद के सहेजने का इंतजार करता है और अतंत: बारिश में भीगने के बाद सड़ ही गया!

पिछले 10 सालों के दौरान गोदामों में कितना अनाज ख़राब हुआ,ख़राब होने की क्या वजह रही और ख़राब अनाज को हटाने के लिए सरकार की क्या कोशिशें और ख़र्च आया? इस संदर्भ में जनवरी 2008 में उड़ीसा के कोरापुट ज़िले के आरटीआई कार्यकर्ता देवाशीष भट्टाचार्य ने गृह मंत्रालय को एक आवेदन भेजा था। इस आरटीआई आवेदन का जो जवाब मिला, वह चौंकाने वाला था। मालूम हुआ कि बीते 10 सालों में 10 लाख टन अनाज बेकार हो गया। जबकि इस अनाज से छह लाख लोगों को 10 साल तक भोजन मिल सकता था। सरकार ने अनाज को संरक्षित रखने के लिए 243 करोड़ रुपये ख़र्च कर दिए, लेकिन अनाज है कि गोदामों में सड़ता रहा। ख़राब अनाज नष्ट करने के लिए भी सरकार ने 2 करोड़ रुपये ख़र्च किए। एक दीगर सवाल के जवाब में सरकार ने अनाज के ख़राब होने की वजह उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, भंडारण और ख़राब वितरण प्रक्रिया बताया।

दरअसल, यदि हम दुनिया में विकसित विधियों का इस्तेमाल अपने गोदामों के लिए करें तो अनाज 4 से 5 साल तक अच्छी हालत में रह सकता है। वरना वह समय बीतने के साथ ख़राब होने लगता है। सरकारें हर साल खाद्य सब्सिडी पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करती हैं, मगर उन्हें इस बात का कतई ख्याल नहीं रहता कि जो अनाज ख़रीदा गया है, उसे कैसे ह़िफाज़त से रखा जाएगा। इस समस्या का एक नीतिगत पहलू और है, जिस पर चर्चा बेहद ज़रूरी है। अक्सर बफर स्टॉक की ज़रूरत से बहुत ज़्यादा सरकारी ख़रीद कर ली जाती है। फिलव़क्त सरकारी गोदामों में 60,428 लाख टन अनाज है, जबकि अतिरिक्त स्टॉक रखने की अनिवार्यता 319 करोड़ टन अनाज की है। ज़ाहिर है, जब हम गोदामों की क्षमता से दोगुना भार उन पर डाल देते हैं तो अनाज को सड़ने से किस तरह से बचाया जा सकता है। सरकार एक तऱफ कम उत्पादन और निजी जमाखोरी को बढ़ती महंगाई की अहम वजह बताती है, वहीं दूसरी तऱफ वह ख़ुद जमाखोरी में लगी हुई है, जिसके चलते बाज़ार के मंझे हुए खिलाड़ी अनाज की एक बनावटी किल्लत पैदा कर बेजा फायदा उठाते हैं। बहरहाल महंगाई से आम आदमी परेशान है, खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं, लेकिन सरकार को यह गवारा नहीं कि जब उसके पास इफरात में अनाज का भंडार है तो वह उसे खुले बाज़ार में क्यों नहीं जारी कर देती। 

भले ही गोदामों में अनाज चूहे खाते रहें, अनाज पानी में पड़ा सड़ता रहे, लेकिन मजाल है कि वह अनाज भूख से तिल-तिल मरती जनता तक पहुंच जाए। सुप्रीमकोर्ट ने ठीक ही यह सवाल उठाया है कि यदि सरकार के पास इतना अनाज रखने का इंतज़ाम नहीं है तो वह उसे ज़रूरतमंदों को क्यों नहीं बांट देती। सुप्रीमकोर्ट के कड़े रुख़ के बाद सरकार ने आगामी छह महीनों में एपीएल परिवारों के लिए राशन की दुकानों से 30 लाख टन चावल और गेहूं बेचने का फैसला किया है। अनाज पर आत्मनिर्भरता का दावा करने वाला भारत अनाज भंडारण के कुप्रबंधन की मार झेल रहा है,जिसके चलते टनों-टन अनाज प्रतिवर्ष सड़ जाता है| जिसका परिणाम देश में भुखमरी व महंगाई के रूप में हमारे सामने है।देश के ये हालात कोई नए नहीं है, आजादी के छह दशक बाद भी गरीबों के पेट की भूख लगातार बढ़ी, कुपोषण में भी बढ़ोत्त्तरी हुई, भुखमरी से मरने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ। इसी के साथ देश के लिए चुनौती पूर्ण सवाल ये है कि आखिर खाद्य सामग्री की सुरक्षा किस स्तर से हो रही है ? खुले में पड़े लाखों टन अनाज को मात्र तिरपाल और चादरों के सहारे सुरक्षित रखने की समझ किसी नासमझी से कम नहीं है। 

मगर साल दर साल इसी तरीके से सब कुछ हो रहा है। देश में कुपोषण का प्रतिशत साल-दर-साल बढ़ रहा है। यूनिसेफ की एक रिर्पाट के अनुसार, विश्वभर में करीब पांच साल से कम उम्र के 25 प्रतिशत बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। शर्म की बात है कि इन बच्चों का सबसे बड़ा प्रतिशत भारत के हिस्से में आता है। दुनिया में कुल भुखमरी के शिकार लोगों में 40 फीसदी लोग भारत के हैं। जिसमें से 46 फीसदी बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में हैं और यह दर सहारा-अफ्रीका से दो गुना ज्यादा है। अब देश के कुपोषण वाले आंकड़े को देखकर बस यही कहा जा सकता है कि जहां देश में करोड़ों जनता के लिए दो जून की रोटी नहीं है, उनके पोषक भोजन की पूर्ति करना और करवाना दोनों ही मजाक लगता है। मनरेगा के बाद यूपीए की दूसरी सर्वाधिक महत्वाकांक्षी परियोजना खाद्य सुरक्षा कानून को भले ही कैबिनेट की मंजूरी मिल गई हो, लेकिन अभी भी इसमें कई पेंच हैं, जो इस कानून की सफलता पर सवाल खडे क़रते हैं।खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करवाने के बारे में अब खुद सरकार के भीतर ही मतभेद उभरकर सामने आए हैं, तो इसे समझा जा सकता है। सरकार के नीति-नियंता इस परियोजना को चाहे जितना बढ़ा-चढ़ाकर आंकें और संसद के इसी सत्र में इसे पारित करवाने की प्रतिबध्दता जताएं, हकीकत में यह विरोधाभासों से भरा है।

 मंत्रिमंडल ने खाद्य सुरक्षा विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी तो दे दी है लेकिन इसमें तमाम विसंगतियां हैं और यह कहीं-कहीं अव्यावहारिक प्रतीत होता है। बावजूद इसके सरकार इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से पहले पारित कराना चाहती है। यही कारण है कि अमूमन कल्याणकारी योजनाओं को खारिज करने वाले वित्ता मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने में देर नहीं लगाई। जबकि इस योजना की विसंगतियों की सूची लंबी है। देश के दस लोगों के पास जितनी संपत्ति बताई जाती है, उतनी निचले तबके के दस करोड़ लोगों के पास कुल मिलाकर नहीं है।करोड़ों लोगों को दिन शुरू करने के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी, वहीं लाखों लोग ऐसे हैं जो तय नहीं कर पाते कि आज उनका पिज्जा खाने का मन है या बर्गर खाने का, उन्हें मटन की डिश चाहिए थी या चिकिन की। करोड़ों जिन कैलोरियों के लिए तरसते हैं उतनी कैलोरियां कुछ लाख लोग मुंह में भर-भर कर सड़कों पर थूक देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं। जिन्हें सबसे ज्यादा इलाज और दवा की जरूरत है, उनके पास न इलाज है न दवा, लेकिन जो पहले से ही स्वस्थ्य हैं उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए हर गुरु और हर विशेषज्ञ मौजूद हैं।

 जिनके पास मानसिक और बौद्धिक क्षमताएं हैं, जो उचित शिक्षा और वातावरण पाकर चमत्कारिक ढंग से विकास कर सकते हैं और समाज की बेहतरी में बेहतरीन योगदान दे सकते हैं उनके पास कोई अवसर नहीं है।सर्वाधिक बर्बादी सामूहिक भोज के मौकों पर होती है। भोज समारोह में पश्चिमी संस्कृति की तर्ज पर बूफे का चलन बढा है। बूफे यानी स्वरुचि भोजन को खुद से प्लेट में निकालकर खाने का विधान। एक भाव में इस तरीके से भोजन की कम बर्बादी होनी चाहिए थी। खासकर पंगत में बैठकर पत्तों पर किसी और के हाथ से परोसे जाने पर पकवान के बर्बादी की गुंजाईश ज्यादा होती है। संभव है कि अंग्रेजों ने बूफे की पद्धति का ईजाद स्वरुचि भोजन का खुद चयन करने के लिए किया। भोज्य पात्र में सीमित मात्रा में खुद लेने की तरकीब अन्न बर्बादी से बचने का सुनहरा उपाय हो सकता। लेकिन आज पंगत में बैठाकर भोज करने कराने की विधा की तुलना में पश्चिमी नकल के तौर पर हमारे बीच आया बूफे संस्कार ज्यादा अन्न बर्बादी का कारण बना है। बूफे के नाम पर छप्पन भोग लगाने का शौक विलासियों के सिर चढकर बोल रहा है। समारोहों में एकसाथ राजस्थानी, गुजराती, पंजाबी, बंगाली डिश का रेला सजा दिया जाता है। फिर आंगतुकों के हाथ इस आग्रह के साथ बूफे की तश्तरी पकड़ा दी जाती है कि सभी पकवानों का रसास्वादन ले।

 इंसान के भोजन की सीमा होती है। अगर वह हर पकवान में से एक एक कौर ले तो भी उसकी सीमा जवाब दे दे। ऐसे में, तश्तरी में ज्यादा लेकर छोडना या बना भोजन इस्तेमाल के बगैर बर्बाद करने की असंवेदनशीलता बढती जा रही है। चलन के चक्कर में विलासिता की अंधी प्रतियोगिता में शामिल समाज बर्बादी को नजरअंदाज कर रहा है। महंगाई के कारण आम आदमी का जीना बेहद मुश्किल हो गया है। नौकरी करने वाले और मोटी तनख्वाह पाने वाले लोग महंगाई के कारण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, तो उन 80 फीसदी लोगों का क्या हाल होगा, जिनकी औसतन आमदनी मात्र 20 रूपये प्रतिदिन है? क्या सरकार को तनिक भी इस पहलू का अहसास है? देश में 75 फीसदी करोड़पति मंत्रियों की फौज, गरीबों के खून-पसीने की कमाई पर मौज कर रही है, क्या सरकार को यह जानते हुए भी कोई शर्म अथवा संकोच नहीं होता है? क्या सरकार ने अपना दीन-ईमान इस कद्र बेच खाया है कि उसे उन 121 करोड़ लोगों की उम्मीदों और भावनाओं की जरा भी परवाह नहीं रह गई है, जिन्होंने उन पर ‘कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ’ के नारे पर विश्वास करके उन्हें सत्ता की बागडोर सौंपी थी? भारी भ्रष्टाचार के कारण सौ दिन के रोजगार की गारंटी वाली ‘मनरेगा’ योजना भी आम आदमी के साथ छलावा साबित हो रही है और सरकार फिर भी बड़ी बेशर्मी के साथ इसे अपनी ढ़ाल बनाने से बाज नहीं आ रही है?

भारतीय खाद्य निगम तो क्या, अनाज की बर्बादी में मुल्क की सूबाई सरकारें भी पीछे नहीं रहतीं, जो गोदामों से अपने कोटे का अनाज कभी समय से नहीं उठातीं, जिसके चलते अनाज आहिस्ता-आहिस्ता ख़राब होने लगता है। फिर दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली इस कोढ़ में खाज का काम करती है। पीडीएफ में भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की शिक़ायतें आम हैं। पूर्व जस्टिस डीपी वाधवा की अध्यक्षता में बनी कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी पोल हमारे सामने खोलकर रख देती है। वाधवा कमेटी के मुताबिक़, जन वितरण प्रणाली का 53 फीसदी चावल और 39 फीसदी गेहूं ज़रूरतमंद लोगों तक पहुंच ही नहीं पाता। ज़रूरतमंदों को आवंटित अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में बेच दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक़, साल 2004-05 में 9,918 करोड़ रुपये का अनाज कालाबाज़ारी के ज़रिए बाज़ार में पहुंचा तो 2005-06 में यह लूट 10,330 करोड़ रुपये और 2006-07 में यह बढ़कर 11,336 करोड़ रुपये आंकी गई। यानी इन 3 सालों में ज़रूरतमंद ग़रीबों को आवंटित 31,500 करोड़ रुपये का गेहूं-चावल राशन डीलर, नौकरशाह एवं सियासी लीडरों ने आपस में मिल-बांटकर डकार लिया और ग़रीब मुंह ताकता रह गया। 

कुल मिलाकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में फैले भ्रष्टाचार से निजात और अनाज के भंडारण की उचित व्यवस्था जब तक सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं होगी, तब तक सरकारी सब्सिडी और अनाज की बर्बादी नहीं रुक पाएगी। देश में हर साल करीब साठ लाख टन अनाज या तो चूहे खा जाते हैं या फिर वो सड़ जाते हैं। अगर अनाज को सही ढंग से रखा जाए तो इससे 10 करोड़ बच्चों को एक साल तक खाना खिलाया जा सकता है। करोड़ों का अनाज उचित भंडारण के अभाव में वर्षा, सीलन, कीड़ों और चूहों के कारण नष्ट हो जाता है। यह सिलसिला कब रुकेगा किसी को पता नहीं।भारतीय खाद्य निगम के आकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008 से 2010 तक 35 मीट्रिक टन अनाज भंडारण सुविधाओं की कमी की वजह से नष्ट हो गये। उत्तर प्रदेश के हापुड़, उरई और हरदुआगंज स्थित एफसीआई गोदामों में भी हजारों टन अनाज बर्बाद हो रहे हैं। 1997 और 2007 के बीच 1 .83 लाख टन गेहूं, 6.33 लाख टन चावल, 2।200 लाख टन धान और 111 लाख टन मक्का एफसीआई के विभिन्न गोदामों में सड़ गए।

ऐसा नहीं है कि भारत में खाद्य भंडारण के लिए कोई कानून नहीं है। 1979 में खाद्यान्न बचाओ कार्यक्रम शुरू किया गया था। इसके तहत किसानों में जागरूकता पैदा करने और उन्हें सस्ते दामों पर भंडारण के लिए टंकियां उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन इसके बावजूद आज भी लाखों टन अनाज बर्बाद होता है। तमाम लोग दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी जद्दोजहद में गरीब दम तक तोड़ देते हैं, जबकि सरकार के पास अनाज रखने को जगह नहीं है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। ब्यूरो के अनुसार 2009 में महाराष्ट्र में 2872 जबकि आंध्रप्रदेश में 2474 किसानों ने आत्महत्या की। 2010 से फरवरी 2011 तक सिर्फ मध्यप्रदेश में 348 किसानों ने आत्महत्या की है। विदर्भ से लेकर बुंदेलखंड में यह दुखद आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। हाल ही में सामने आई कुछ रिपोर्टों में भारत में भुखमरी से संबंधित चौकाने वाले आंकड़ें सामने आए हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्लूएफपी) और स्वास्थ्य मंत्रालय, 2010 में भारत द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार कुछ आंकड़ें सहारा के आस पास के अफ़्रीकी देशों में पाए जाने वाले भुखमरी के संकेतकों से भी कहीं अधिक खराब हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भुखमरी से पीड़ित लगभग 50 प्रतिशत लोग भारत में निवास करते हैं।

सरकारी गोदामों में अनाज के बर्बाद होने का यह पहला मामला नहीं। पिछले कई वर्षो से यह शर्मनाक सिलसिला कायम है। संप्रग सरकार 2004 से सत्ता में है और खास बात यह है कि तब से कृषि एवं खाद्य मंत्रालय पर शरद पवार ही काबिज हैं। पिछले साल केंद्रीय कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में 11 हजार टन खाद्यान्न के खराब हो जाने की बात स्वीकारी थी। देश में एफसीआई के गोदामों में कुल 11 लाख 708 टन अनाज खराब हुआ है। एक जुलाई 2010 की स्थिति के अनुसार भारतीय खाद्य निगम के विभिन्न गोदामों में 11,708 टन गेंहू और चावल खराब हो गया है।
 
वर्ष स्थिति
2009 – 2010 2 हजार टन गेहूं और 3680 टन चावल खराब हुआ
2008 – 2009 947 टन गेंहू और 19,163 टन चावल खराब हुआ
2007 – 2008 924 टन गेंहू और 32 हजार 615 टन चावल खराब हुआ
कुल : तीन साल साल में लगभग 58 हजार टन अनाज खराब हुआ।

इस तरह इस साल तक खराब हुए अनाज को अगर मिला लिया जाए तो चार साल में देश में सरकारी स्तर पर कुल 71 हजार 47 टन अनाज यूं ही बरबाद हो गया है। ऐसा भी नहीं है कि सरकार ने भूख से लड़ने के लिए कारगर उपाय नहीं किए हैं। देश में आज खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम 2006 के तहत खाद्य पदार्थो और शीतल पेय को सुरक्षित रखने के लिए विधेयक संसद से पारित हो चुका है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, नरेगा, मिड डे भोजन, काम के बदले अनाज, सार्वजानिक वितरण प्रणाली, सामाजिक सुरक्षा नेट, अंत्योदय अन्न योजना आदि कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, ताकि सभी देशवासियों की भूख मिटाने के लिए ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से जीवनयापन के लिए रोजगार परक आय व पोषणयुक्त भोजन मिल सके। लेकिन कागजों पर बनने वाली यह योजनाएं जमीन पर कितनी अमल की जाती हैं इसका अंदाज आप भारत में भूख से मरने वाले लोगों की संख्या से लगा सकते हैं।
अन्न की बर्बादी एक अपराध है’ वर्ष 2010 में अनाज की बर्बादी पर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी गरीबों की पीड़ा को व्यक्त करने वाली है। 

अनाज को सड़ाने के बजाय जरुरतमंदों में बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राज्य सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और हर साल की तरह फिर मध्यप्रदेश और पंजाब में हजारों बोरी गेंहू बिना किसी रखरखाव से सड़ गया। इंद्र देव की ‘कृपा’ पर आश्रित राज्य सरकारें अन्न भंडारण की चुनौती के आगे बेबस नजर आ रही हैं। कुपोषण से होने वाली मौतों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के मुख्य सचिवों से कहा था कि केंद्र से आवंटित अनाज ले जाकर गरीबों में बांटे। गांवों में आज भी 23 करोड़ लोग अल्प पोषित हैं, जबकि पचास फीसदी बच्चों की मौत की वजह कुपोषण है। देश की किसी भी सरकार के लिए यह शर्म की बात है कि दुनिया की 27 फीसदी कुपोषित जनसंख्या भारत में रहती है। इन विरोधाभासों के बीच यदि सरकार खाद्य सुरक्षा की बात करती है तो उसकी मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बारे में गंभीरता से विचार करें और देश की जन-कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी फायदे के हिसाब से लागू करने के बजाय सभी राजनीतिक पार्टियां दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार करें।

11 May 2013

सर्वप्रथम क्या देश या धर्म ?

                            उठो देशवासियों रणभेरी बज चुकी, मात्र-भूमि की पुकार है,
                                जो अब भी ना जागे तो तुम्हारे जीवन पर धिक्कार है।
                                रहे चुप तुम कई वर्शों तक अब तोड़ो दास्तां की बेड़ीयाँ,
                          करो भारत माता को सर्वस्व समर्पित यह तुमहारा अधिकार है।

जी हां आज हम एैसे इसलिए कह रहे है क्योंकि देश में आज कुछ एैसे कट्टरपंथी अपना पांव पसार रहें है जो राश्ट्र की एकता और अखंडता को धराशायी करना चाहते है। बात चाहे आज संसद में राष्ट्रगीत की अपमान का हो या फिर फतवे के मार्फत धर्म के नाम पर देश को बांटने की, हर ओर आज एक ही सवाल हर हिन्दुस्तानी पुछ रहा है की सर्वप्रथम क्या देश या धर्म। कुछ कट्टरपंथी तो ये भी मानते है की देश सीमाओं में बंधा हो सकता है मगर धर्म को कोई सीमा नही बांध सकती मगर देश से ही धर्म की सुरूआत होती है ये बात ये भूल जाते है। सवाल ये भी पैदा होता है की उनके लिए सर्वप्रथ देश पहले है या उनका धर्म। भारत एक ऐसा देश है जो सभी धर्मो का सम्मान करता है, इसलिए यहा बात देश की होती है फिर हम देश का सम्मान क्यों नही कर पाते आज ये एक गंभीर मुद्दा बन चुका है, जो देश और समाज को तोड़ने की दिषा चल रहे इस्लामिक सड्यंत्र का हिस्सा है। आज जाकिर और ओवैषी जैसे धार्मिक उन्माद फैलाने वाले लोग धर्म के सम्मान में देशको आड़े लाते है, और धर्म को देश से उपर बताते है। 


आज अल्पसंख्यक वोट बैक इस कदर महत्वपूर्ण हो गया है कि हमारे नेता देश और संस्कृति की चिन्तन को स्वयं ही नष्ट करनें की दिषा में हर समय अपना दुष्चक्र चलाने पर अमादा हैं। यहा सवाल उठता है कि क्या आज के सेकुलवादी युग में अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को देश से उपर समझने लगा है। क्या आज बंदे मातरत का विरोध और हिन्दु देवा देवताओं के अपमान से ही हमारे देश के अल्पसंख्यक समुदाय अपने आप को सुरक्षित रख पाएगा या फिर देश के अंदर इस्लामिक कट्टरता को बढ़ावा देकर, ये एक महत्पूर्ण सवाल आज के संदर्भ में हर ओर लोग इस समुदाय से पूछ रहे है।

इस भारतभूमी की रक्षा का इतिहास हमेशा से ही भारत मां के चरणों में शीश झुकाने और सरहदों पर शहीद होने वाले जवांजों ने की है, एैसे में सर्वप्रथम हर हिन्दुस्तानी के अंदर पहले राष्ट्र सर्वप्रथम की भावना हमेशा रहती है। देश की सनातन वैदिक के अनुसार राष्ट्र की रक्षा करना पहला कर्तव्य है और राष्ट्र क्या है उसको भी धर्म परिभाषित करता है। एैसे में सवाल उन मजहवी उन्माद फैलाने वाले इस्लाम के ठेकेदारों से है की आखिर किस मकसद से धर्म को राष्ट्र से उपर बताते है। इसलिए आज हम पुछ रहें है की सर्वप्रथ क्या देश या धर्म ?

10 May 2013

क्या वन्दे मातरम का विरोध देशद्रोह नहीं है ?

                             यह वंदेमातरम उसी शक्तिशाली युग की शुभ गाथा है।
                          तुमने इसे अपमान किया, खण्डित भारत का मान किया॥
                       वंदेमातरम सम्प्रदाय का परिचायक है, तूने कैसे मान लिया॥
                             यह वंदेमातरम शब्द नहीं यह भारत माँ की पूजा है।
   

इस देश की आजादी का अगर इसे महामंत्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा। देश के सभी क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस महामंत्र का प्रयोग अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए किया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद भी चाहते थे कि संसद की कार्यवाही वंदे मातरम् के गायन से हो। मगर आज ऐसा लगता है की हमारे देश के माननीय अपने आप को संसद, संविधान और राष्ट्र से भी उपर समझने लगे है। वंदे मातरम् का बॉयकॉट करके बसपा के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने एक बार फिर शहीदों का अपमान किया है। साथ ही राश्ट्रगान का अपमान के अलावे उन्होने लोकसभा कार्य संचालन विधि का भी उलंघन किया है। लोकसभा कार्य संचालन विधि के अनुसार कोई भी सांसद सदन से बाहर नहीं जा सकता है, जब राष्ट्रगीत बज रहा हो। क्या ये संसद और संविधान का घोर अपमान नहीं है। क्या ये सदन का अवमानना नहीं है। क्या एैसे सांसद को देषद्रोही घोशित नहीं करना चाहिए? क्या ये मानमीय अपने आप को लगता है इस्लाम के खिलाफ वंदे मातरम् बताने वाले महोदय खुद हिंदुस्तान के इतिहास से अनजान हैं। बीएसपी सांसद शफीकुर्रहमान बर्क का कहना है कि वंदेमातरम इस्लाम के खिलाफ है इसलिए वह लोकसभा छोड़कर चले गए थ। ये एक सांसद हैं लेकिन ये नहीं जानते कि वंदे मातरम् के विवाद को बरसों पहले ही मौलाना आजाद जैसे राजनीतिज्ञ सुलझा चुके हैं। मगर 21वीं सदी में भी शफीकुर्रहमान बर्क जैसे नेता बार-बार  विवाद का जन्म दे रहें हैं। इस्लाम भी इस बात कि इजाजत नहीं देता कि आप राष्ट्र के प्रतीकों का अपमान करें।

तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की आखिर ये मानमीय किस अधार पर ऐसे हरकत कर रहे है? क्या ये किसी साजि़स का हिस्सा है, या किसी अंतराश्ट्रीय अलगावादीयों के कहने पर एैसा कर रहे है? कोई इसे ‘तालिबानी आचरण’ करार दे रहा है तो कोई राश्ट्रद्रोह, मगर यहा सवाल ये है की संविधान निर्माता बाबा साहेब आम्बेडकर के नाम और विचारधारा के साथ सर्वजन हिताय सर्वजनय सुखाय की नारा देने वाली बसपा आज चुप क्यों है। क्या एैसे सांसद की सदस्यता तुरंत नहीं होनी चाहिए ? ये महज संसद में राष्ट्र गीत का अपमान नहीं है। यह हर हिंदुस्तानी की देशभक्ति को लगी गहरी चोट है। शफीकुर्रहान बर्क के खिलाफ देश भर में गुस्सा और आक्रोष का माहौल है। वंदेमातरम यूथ बिग्रेड की ओर से राष्ट्र गीत का अपमान करने पर बसपा सांसद के खिलाफ थाना शाहगंज में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज करने के लिए प्रार्थना पत्र दिया गया है। विश्व के अनेक देशों के राष्ट्र गीत तो एैसे है की जिनसे दूसरे देशों की जनता को काफी ठेस पहुंचती है। ये देश दूसरे देश के अपमान या मानहानि के बजाय स्वयं के देश की प्रजा के स्वाभिमान, अभिमान और गुमान की ही पहली चिंता करते हैं। इस्लाम के नाम पर जिहाद जायज है तो क्या उनका इस्लाम राष्ट्रीयता का पाठ नही पढ़ाता है। ये सवाल शफीकुर्रहान बर्क जैसे हर भारतीय से है जो ऐसी भावनाएँ और शब्द हमें एक देश के नागरिक होने के बावजूद भी आत्मीय रूप से बिभाजित करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, वन्दे मातरम् का विरोध देशद्रोह नहीं है।

19 April 2013

हिन्दुओं का दर्द, जहा कदम कदम पर रोती है जिंदगी !

                                       देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
                                               कितना बदल गया इनसान
                                 सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
                                             कितना बदल गया इनसान


हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन कई कई योनियों के बाद संभव हो पाता हैए और ऐसा माना जाता है कि मानव ए भगवान् की सबसे सफल ए अशचार्यजनक और सबसे सम्रध रचना है ! अगर हम इस बात को मानते हैं तब हमें उस भगवान् का धन्यवाद भी करना चाहिए जिसने हमें इस रूप में दुनिया में भेजा है ! लोग धन्यवाद करते भी हैं पूजा पाठ करके ! भले ही विभिन्न रूप में करते हैं लेकिन करते तो हैं ! लेकिन क्या यही और इतना ही काफी है हम इंसान का रूप पाकर इस मद में अंधे हो जाते हैं और भगवान् द्वारा प्रदान करी गयी सुविधाओं का दुरूपयोग कर उन्हें कम करते जा रहे हैं  ! भगवान् भी कभी कभी अपनी इस रचना पर गर्व करने की बजाय दुःख करता होगा कि मैंने ये क्या कर दिया !

पिछले कुछ समय से इस तरह की घटनाएं विश्व भर में घटित हो रही हैं जो मन को अन्दर तक हिला देती हैं ! भारत में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू भारतीय नागरिक बनना चाहते हैं क्यों क्योंकि पाकिस्तान में उनकी जान और माल की हिफाज़त का उन्हें कोई  भरोसा नहीं है ! उनकी लड़कियों और महिलाओं की इज्ज़त महफूज़ नहीं है ! क्या एक  राष्ट्र इतना कुत्सित हो सकता है कि वो अपने ही नागरिकों की हिफाज़त न कर सके अब कहाँ हैं इस्लाम की हिमायत करने वाले ठेकेदार  और ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं जहां जहां मुस्लिम आबादी बाहुल्य में है वहां यही हालात  हैं !  असल में पाकिस्तान में हिन्दू ही नहीं बल्कि कोई भी सुरक्षित नहीं है ! क्या विश्व समुदाय को ये नहीं दीखता है घ् क्या कश्मीर में पल पल अपनी टांग अडाने वाले मानव अधिकार आयोग को पकिस्तान्ब की कारगुजारी समझ में नहीं आती है आप स्वयं समझ सकते हैं ! कश्मीर तो भारत का हिस्सा था वहां मुस्लिम अधिसंख्यक थे उन्होंने वहां से हिन्दुओं को भगा दिया तो पाकिस्तान से भगाने में  क्या दिक्कत रही होगी  भारत की सरकार पहले भी श्मूर्ति बनकर बैठी रही और आज भी बैठी है ! स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि  हम हिजड़ों की औलाद हैं हमारे बस का कुछ भी नहीं !

हमारे यहाँ  शाहरुख़ खान को कोई कुछ कह दे तो पाकिस्तानए  भारत में अल्पसंख्यकों की हिफाज़त का सवाल उठा  देता है लेकिन हमारे हिन्दू बिरादरी के लोग पाकिस्तान छोड़कर आ जाते हैं तो भी भारत  की सरका कुछ नहीं करती हिंदुस्तान की पहिचान कृष्णा और राम से है ये हमें समझना होगा ! हम धर्म निरपेक्ष है लेकिन हमारी संस्कृति भारतीय संस्कृति है हिन्दू संस्कृति  है ! हम पाकिस्तान जैसे असफल भूखे और आतंकवादी राष्ट्र से ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ कोई  कार्यवाही करेगा लेकिन हम विश्व समुदाय को आगाह कर सकते हैं कि  वो उस पर दबाव डाले ! पाकिस्तान से आये हिन्दू जब अपनी अपनी कहानी बयान करते हैं तब आँखों से आंसू आने लगते हैं कि क्या ऐसा भी हो सकता है क्या इंसान ऐसा भी कर सकता है इन कुछ हिन्दुओं की स्थिति को देखकर पाकिस्तान में रह रहे लगभग पच्चीस लाख हिन्दुओं की बेचारगी का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि वहां मानवता कैसे रहती होगी क्या इस्लाम इसकी इज़ाज़त देता है या सब कुछ बस इस्लाम ही है और मानवता कुछ भी नहीं कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान में इंसान नहीं हैवान बसते हैं !

मैं मानता हूँ कि वहां  भी कुछ इंसान है लेकिन उनकी हैवानों के सामने कोई औकात नहीं रही होगी ! मैं मानता हूँ कि  इस्लाम के सच्चे हितेषी भी वहां होंगे लेकिन कठमुल्लों के सामने उनकी हैसियत कमजोर रह गयी होगी लेकिन इस तरह तो मानवता ख़त्म हो जायेगी पता नहीं क्यूँ आज ऐसा लगता है धर्म मज़हब शायद इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चला है ! और एशिया में तो शायद और भी ज्यादा ! खाड़ी  के कुछ  देशों में हर रोज़ के विस्फोट शायद एक दिन सभ्यता को ही नष्ट न कर दें ! पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आपस में लड़ते झगड़ते तालिबान और कठमुल्ले शायद इंसान को वहां रहने ही नहीं देना चाहते ! ये शायद पाषाण  युग है ए जो जीतेगा वही जीएगा  ! बाकी को न जीने का हक़ है और न इस दुनिया में रहने का हक़ ! दुनिया को जंग का मैदान बना दिया है लोगों ने ! अगर कैसे भी दौनों  कोरिया अपनी अपनी बात पर अड़ गए  और कल को युद्ध हो जाए तब क्या होगा ए अनुमान लगाया जा सकता है आज इंसान शायद जंगली पशुओं से मुकाबला करना चाहता है कि  कौन जीतेगा और जो जीतेगा वो दूसरे  को मारेगा और उसका खून पिएगाए  उसका मांस खायेगा ! 

कभी श्री लंका में सिंहलीज़  तमिल हिन्दुओं का सफाया कर देना चाहते हैं तो कभी बंगला देश हमारे एहसानों के बदले हमारी कौन  को ही खतम कर देना चाहता है ! हालाँकि 100 करोड़ से ज्यादा और दुनिया भर में फैले हुए हिन्दुओं को इतनी आसानी से ख़त्म नहीं किया जा सकता ! वो दिन और थे जब हिन्दू लाचार था कायर था  !  हमारी सरकारें किसी मजबूरी से बंधी हो सकती हैं हम नहीं ! ये भी सत्य है कि  हिन्दू आज भी सहनशील है मानवता का पुजारी है और इसी वज़ह से वो हिंदुस्तान से गुलाम के रूप में जाकर मॉरिशस और फिजी में सत्ता तक पहुँचता है ए इसी वज़ह से माइक्रो सॉफ्ट जैसे संसथान में 40 प्रतिशत से ज्यादा अपना योगदान देता है ! तभी सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला जैसे बेटियां उसके घर की शोभा बनती हैं ! तभी 34 प्रतिशत नासा के कर्मचारी  भारतीय और हिन्दू होते हैं ! इसीलिए ए क्योंकि हमारे लिए मानवता सर्वश्रेष्ठ है  धर्म नहीं !

हालाँकि ये मानव प्रवृति है कि  वो दुसरे को न तो खुश देख सकता है और न ही प्रसन्न ! भगवान् गौतम बुद्ध ने हमेशा अहिंसा  का  नारा  दिया किन्तु बुद्ध धर्म के अनुयायियों ने जिस तरह का कत्ले आम मचाया  हुआ है वो कहीं से भी इस धर्म की शिक्षाओं पर खरा नहीं उतरता ! श्री लंका में सिंहलीज़  लोगों ने प्रभाकरन के बहाने लाखों तमिलों का खून बहा दिया ये कैसा धर्म है भाई बर्मा में बोद्धों ने रिंगानिया समुदाय के मुस्लिमों को घरों में जिन्दा जला दिया ए ये कैसी धरम की शिक्षा है भाई ये कैसा धर्म है और आज भी यही सब चल रहा है ! मुझे नहीं मालूम कि  आज तक कभी किसी हिन्दू राजा  ने या हिन्दुओं ने दूसरे धर्म  के मानने वालों से कभी इस तरह का सलूक किया हो या देश से भगाया हो संभव है इतिहास में ऐसा कुछ हुआ हो लेकिन मैं नहीं जानता !

आज शायद दुनिया को कुछ लोग जितना खूबसूरत  बना देना चाहते हैं ए ये धर्मों के ठेकेदार उसी दुनिया को बदबूदार ए खतरनाक और कुरूप करने में लगे हुए हैं ! कल्पना करिए उन लोगों के बारे में उनकी जिंदगी के बारे में जो हर पल मौत को देखते होंगे ! जो हर पल अपनी बहन बेटियों की इज्ज़त लुट जाने के डर  से सहमे सहमे से रहते होंगे ! कल्पना करिए उन मासूमों की जिंदगी की जिनकी आँखों में सुनहरे कल के सपने होंगे और जिन्हें अनायास ही अकस्मात ही मौत अपने आगोश में ले लेती होगी ! जहां जिन्दगी पल पल और कदम कदम रोती  होगी  !  तो क्या ऐसा धर्म  जरुरी है मानव के लिए ?

क्या आज रामायण से हम दूर हो रहे है ?

जीवन का अधार कही जाने वाली रामायण आज हम सब से दूर होती जा रहा है। राम का अर्थ है मेरे भीतर का प्रकाश, मेरे दिल के भीतर का प्रकाश। आप के भीतर का ओज ही राम है। 1987 का एक दौर था जब हर घर में दूरदर्षन के माध्यम से रामायण की गूंज सुनाई देती थी, सदियों से हर हिन्दुस्तानी के दिलों में रमने वाले राम की काल्पनिक छाया एक राम राज की ओर लोगों को दिषा दे रही थी, और अर्यावर्त की एक नई सुबह फिर से हिन्दुस्तान को अपने सांस्कृतिक विरासत में नई जोष भर चुकी थी। मगर आज हम उस राम को भूला दिए है, स्वार्थ और भौतिकवाद इस कदर हावी हो चुकी है की आज राम का जगह रावण ले चुका है। मर्यादा पुरूशोत्तम राम की आदर्ष जीसे हर मनुश्य अपने जीवन का मूल कर्तब्य मानता है, जिसका नाम सुबह षाम हर कोई जापता है, आज उसे आधुनिकता की आंधी उड़ा कर पंष्चमी चाल चलन की मैली मिट्टी हमेषा के लिए उसे दफन कर दी है। तो ऐसे सवाल भी खड़े हो रहे है की क्या आज वाकई हम सब रामायण से दूर हो रहे है। 

जिस रामायण की कहानी ने 100 मिलियन से अधिक दर्शकों को आकर्षित किया था। आज उसे कोई देखना नहीं चाहता है। रामायण भारत और विश्व टेलिविजन इतिहास में सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम बन गया था। सीता को राम की सेविका और उनकी हर आज्ञा को आंख मूंदकर स्वीकार करने वाली पत्नी की आदर्ष हर औरत अपनी नैतिक कर्तब्य मानती थी। मगर आज हर नारी सीता की आदर्षो को सिर्फ एक कहानी मात्र बताकर खुद को आधुनिक दिखाने की होड़ में विष्वास करने लगी है। यही कारण है की रामायण और राम हम सब से दूर हो गये है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि, ‘यदि तुम मुझ से सब कुछ छीन लो तो मैं जी सकता हूं, लेकिन यदि तुम मुझसे राम को दूर ले जाओगे तो मैं नहीं रह सकता।

रामायण पौराणिक ग्रंथों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। रामायण सिर्फ एक कथा अवतार या कालखंड ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का रास्ता बताने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। रामायण हर एक रिश्तों पर लिखा गया है, हर रिश्ते की आदर्श स्थितियां, किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करें, विपरित परिस्थिति में कैसे व्यवहार करें, ऐसी सारी बातें हैं। जिसे आज हम सब को सबसे जयादा जरूरत है, मगर युवा पीढ़ी इन ग्रन्थों को पढ़ना तो दूर देखना नहीं चाहता है। उसे सिर्फ विदेषी प्रकाषकों की मनगणंत कहानीय जयादा रोजक लगती है। वही दुसरी ओर माता पिता अपने बच्चों को संस्कृत और हिन्दी पढ़ाने के बजाय उसे अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते है जिसके कारण धर्म और अघ्यात्म आज हमारे घर और समाज से दूर होते जा रहा है। जिसे आज हमे अपने जीवन में अपनाकर उसे बेहतर बनाने की जरूरत है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रामायण से हम दूर हो रहे है ?

रामायण की आदर्श और हमारे जीवन में उसकी उपयोगिता ! 




- दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को युवराज घोषितकर उन्हें राजा बनाने की घोषणा भी कर दी। हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडना नहीं चाहते।

- राजा बनने जा रहे राम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया। जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं।

- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वनवास में भी रहे, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। ये हमें सिखाता है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।

- भरत ने निष्कंटक राज्य भी स्वीकार नहीं किया, राम की चरण पादुकाएं लेकर राज्य किया। हमारा धर्म अडिग होना चाहिए। अधिकार उसी चीज पर जमाएं जिस पर नैतिक रूप से आपका अधिकार हो और आप उसके योग्य हों। भरत ने खुद को हमेशा राम के अधीन समझा, इसलिए जो राजा पद राम को मिलना था, उसे भरत ने स्वीकार नहीं किया।

- राम ने सुग्रीव से मित्रता की, सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी दोनों दिलवाई। आप भी जीवन में मित्रता ऐसे व्यक्ति से करें, जो आपकी परेशानी, आपके दुरूख को समझ सके।

- राम हमेशा भरत की प्रशंसा करते, उसे ही अपना सबसे प्रिय भाई बताते, जबकि राम के साथ सारे दुरूख लक्ष्मण ने झेले, इसके बावजूद भी लक्ष्मण ने कभी इसका विरोध नहीं किया। आप कोई भी काम करें तो उसे कर्तव्य भाव से करें, प्रशंसा की अपेक्षा न रखें, प्रशंसा की इच्छा हमेशा काम से विचलित करती है।
 

17 April 2013

सत्ता के ढाई केंद्र वाला माडल और कांग्रेस !

देश की सियासी फिजां में इन दिनों बस एक ही बात पर चर्चा हो रही है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सही कह रहे हैं अथवा जनार्दन द्विवेदी। दोनों ही ने अपने अपने तरीके से सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के प्रयोग को सफल और असफल करार दिया है। दिग्विजय सिंह की बात में वंशवाद की हिमायत की बू आती है तो द्विवेदी का कहना वंशवाद की समाप्ति की ओर इशारा कर रहा है। भारत में ही इस बात का उदहारण मौजूद है कि यहां वंशवाद की परंपरा भी रही है तो वंशवाद से इतर ब्रितानी गोरों ने लंबे समय तक यहां राज भी किया है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का तिलिस्म दरक चुका है। कांग्रेस के अंदर अब नेहरू गांधी परिवार का चमत्कार ढहने पर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही भ्रष्टाचार पर अपना मुंह बंद रखकर देश की जनता की नजरों से उतर चुके हैं। राहुल के अंदर देश को संभालने का माद्दा नजर नहीं आता हैए वहीं दूसरी ओर टाईम मेग्जीन एक बार फिर पलनिअप्पम चिदम्बरम को ही मनमोहन सिंह का सक्सेसर बता रही है। देखा जाए तो सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं देश में वर्तमान समय में!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसे आजादी के उपरांत महात्मा गांधी ने भंग करने की सिफारिश की थी में स्वाधीनता के बाद से ही सामंतशाही हावी रही है। कांग्रेस के अंदर वंशवाद का बटवृक्ष किसी से छिपा नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उपरांत इंदिरा गांधीए राजीव गांधीए संजय गांधीए सोनिया गांधीए राहुल गांधीए वरूण गांधीए सियासी बियावान में विचरण कर रहे हैं। इनमें से मेनका और वरूण कांग्रेस से बाहर हैं। नब्बे के दशक में नरसिंहराव और सीताराम केसरी ने कांग्रेस को कुछ समय तक नेहरू गांधी परिवार की छाया से दूर रखा किन्तु उसके बाद एक बार फिर इस बटवृक्ष पर निठल्ले बैठे कांग्रेसी अमर बेल जैसे परजीवी बनकर लदे रहे और कांग्रेस की बागडोर तथा सत्ता की धुरी एक बार फिर सोनिया गांधी के पास लाकर रख दी। जैसे ही राहुल गांधी सोचने समझने के लायक हुए उन्हें भी महिमा मण्डित करना आरंभ कर दिया गया।

राहुल गांधी भी इन कांग्रेस के मठाधीशो के रंग में ही रंग गए। बाद में जब राहुल को अहसास हुआ कि उनके पैरों के नीचे जमीन ही नहीं है तो वे हतप्रभ रह गए। राहुल ने धीरे धीरे अपने कदम वापस खींचे और प्रधानमंत्री ना बनने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। फिर क्या था राहुल को आगे कर सत्ता की मलाई चखने वाले निठल्लों को यह बात रास नहीं आई और उन्होंने फिरसे राहुल के पीएम बनने की संभावनाओं को हवा देना आरंभ कर राहुल के मन में पीएम बनने की अभिलाषाएं जगाना आरंभ कर दिया। कांग्रेस के इस तरह के शातिर नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक है। जनता जाग चुकी हैए मीडिया को प्रलोभन देकर आप अपने कब्जे में ले सकते हैं पर सोशल मीडिया ने अपनी जो दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है वह निश्चित तौर पर सियासी लोगों की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।

इतिहास साक्षी है कि देश पर आक्रमण कर बाबर से लेकर औरंजेब और बहादुर शाह जफर तक खानदानी राज रहा है। बादशाह अकबर ने इस देश पर पचास साल लगातार राज किया है। अकबर की न्यायप्रियता के कारण जो नींव रखी गई थी वह उनकी नाकारा आल औलादें सौ साल तक भुनाती रहीं। इसके बाद जब बहादुर शाह जफर ने देश पर राज किया तब कंपनी बहादुर यानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पैर पसारने के उपरांत लाल किले तक ही सिमट गया। उस वक्त राज जरूर जफर का था पर आदेश ईस्ट इंडिया कंपनी का ही चला करता था। आज के दौर में यह उदहारण इसलिए भी प्रासंगिक माना जा सकता है क्योंकि आज राज नेहरू गांधी परिवार का ही चल रहा है। देश में उनकी मंशा कि बिना पत्ता भी नहीं खड़क रहा है। मनमोहन सिंह देश के वजीरे आजम जरूर हैं पर उनकी भी इतनी ताकत नहीं कि वे अपनी मर्जी से देश को चला सकें। देश की सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र सालों से 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी का आवास ही बना हुआ है।

इक्कीसवीं सदी का सपना देशवासियों ने बड़े ही चाव के साथ देखा था। आज इक्कीसवीं सदी का तेरहवां साल आधा बीतने को हैए पर इसके बाद भी आज देश की रियाया अपने आप को गोरे ब्रितानियों के बजाए स्वदेशी कालों की गुलाम समझ रही है। जनता को जो मिलना चाहिए वह उसे मिल ही नहीं पा रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में दस सालों के लिए किया गया था। आज संविधान बने छः दशक से ज्यादा समय हो गया है पर देश के हुक्मरान इन्हें मुख्य धारा में ला नहीं पाए हैंए परिणामस्वरूप आज भी आरक्षण का जिन्न सामान्य वर्ग पर हावी है। आज कांग्रेस की हालत इतनी गई गुजरी हो गई है कि वह जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के बजाए एक परिवार के भरोसे ही देश को हांकना चाह रही है। कांग्रेस के नेता एक परिवार विशेष के भाटचारण और महिमामण्डन को ही अपना मूल मंत्र मान रहे हैं। इन्हीं नेताओं के चलते इस परिवार के कथित युवा किन्तु वस्तुतः प्रोढ़ होते सदस्य को लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है।

शिवसेना भी राहुल पर वार कर रही है तो भाजपा उन्हें आड़े हाथों ले रही है। राहुल कहते हैं उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनना पर उन्हें पीएम बनाने के लिए कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सारे घोड़े छोड़ने पर आमदा नजर आ रहे हैं। राजा दिग्विजय सिंह द्वारा सोनिया और मनमोहन सिंह के दो पावर सेंटर को गलत और असफल बताया जाकर नई बहस छेड़ दी जाती है। इसकी काट के रूप में जनार्दन द्विवेदी सोनिया मनमोहन के दो पावर सेंटर वाले फार्मूले को सफल निरूपित करते हैं। समझ में नहीं आता कि दो राजनेता इस तरह परस्पर विरोधी बयान देकर जनता को भ्रमित क्यों करना चाह रहे हैं। इसके पीछे उनका क्या हिडन एजेंडा है। उधर टाईम पत्रिका एक बार फिर पूरी ईमानदारी के साथ मनमोहन के सक्सेसर के बतौर पलनिअप्पम चिदम्बरम का नाम आगे कर रही है।

दिग्विजय सिंह या जनार्दन द्विवेदी जो चाहे कहें पर वस्तुस्थिति यह है कि देश में सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं। एक हैं 7ए रेसकोर्स रोड़ पर रहने वाले प्रधानमंत्री डॉण्मनमोहन सिंहए दूसरी 10ए जनपथ में निवासरत यूपीए चेयर पर्सन श्रीमति सोनिया गांधी और तीसरे 12ए तुगलक लेन को आशियाना बनाने वाले राहुल गांधी। इस तरह देश में सत्ता के ढाई केंद्र अस्तित्व में हैं। 42 साल के अम्योच्योर पालीटिशिन राहुल गांधी आज भी अपनी मां श्रीमति सोनिया गांधी के मानिंद लिखा लिखाया भाषण पढ़ रहे हैं। उद्योगपतियों से रूबरू राहुल के भाषण के दौरान उनका एक पन्ना कहीं खो गया तो वे बोल उठे आई लास्ट। क्या यही अपरिपक्व राजनेता देश को इक्कीसवीं सदी का सपना दिखाने में सफल हो पाएंगेघ् कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की देश के हालातों और भ्रष्टाचार को छोड़कर अन्य बेमतलब के विषयों पर बयानबाजी को देखकर कहा जा सकता है कि .ष्ष्कौन है सच्चा कौन है झूठा हर चेहरे पे नकाब है

सांस्कृतिक आतंकवाद की आहट पर नज़र !

जब भी आतंकवाद की चर्चा की जाती है तो मन में तुरन्त ही बम विस्फोट, अपहरण, आगजनी, रेल दुर्घटनायें, मौत जैसी वीभत्स घटनाओं की छवि अंकित हो जाती है। देश तथा देशवासी विगत कई वर्षों से आतंक के इसी चेहरे से परिचित रहे हैं। आतंकवाद का यह रूप हमारे मन-मष्तिष्क पर इस कदर से हावी हो गया है कि हमें इसका कोई अन्य स्वरूप नजर ही नहीं आता है। देखा जाये तो यह आतंकवाद का वह चेहरा है जो हमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है, इसके अतिरिक्त अन्य आतंक के चेहरे हमारे आसपास होने के बाद भी हमें दिखाई नहीं देते हैं। विभिन्न प्रकार के आतंकी स्वरूपों में हमें प्रमुखता से सांस्कृतिक आतंकवाद को देखने और समझने की आवश्यकता है।
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सांस्कृतिक आतंकवाद देश के अन्दर आतंक की वह अवधारणा है जो बिना जान लिये, बिना बम धमाके किये हमारे देश को खोखला कर रही है। देश के समृद्ध विकास, आर्थिक उन्नति, प्रोद्योगिकी सक्षमता, शैक्षिक उन्नयन, उसकी सांस्कृतिक विरासत, जीवन-मूल्यों, मानवतावाद आदि से अपना विभेद रखने वाले देशों ने जब देख लिया कि भारत को आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से, सैन्य क्षमता के द्वारा, विज्ञान-प्रोद्योगिकी के द्वारा नियन्त्रण में रखना सम्भव नहीं है तो देश-विरोधी ताकतों ने विध्वंस का सहारा लिया। देश भर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं, मजहबी फसादों के बाद भी देश की एकता अक्षुण्य रही, विकास-यात्रा बाधित नहीं हुई तो देश में सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने का कार्य विघटनकारी ताकतों के द्वारा किया जाने लगा।
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युवाओं को आकर्षित कर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले समारोहों का आयोजन किया जाने लगा; विभिन्न विदेशी चैनलों के जरिये से घरों के भीतर पहुंच कर हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जाने लगा; आधुनिकता के नाम पर परिवार को विखण्डित किया जाने लगा; समूची दुनिया में भातरीय अस्मिता के नाम पर यहां की महिलाओं को आधार बनाकर विभिन्न विद्रूप कार्यक्रमों को संचालन किया जाने लगा। प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो भारत देश सिर्फ और सिर्फ देह के आसपास विचरने वाले, महिलाओं के प्रति हिंसा का भाव रखने वाले, सेक्स के प्रति लालायित रहने वाले नागरिकों का देश बन गया हो। आधुनिकता की अवधारणा को विभिन्न तरीकों से इस तरह से परिभाषित किया जाने लगा कि देश की सांस्कृतिक विरासत यहां के युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों को भी दकियानूसी, पाखंड से भरी दिखाई देनी लगी है। इन सबका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे समाज से परिवार की अवधारणा का विलोपन हो गया; रिश्तों की मर्यादा का ह्रास होने लगा; महिलाओं को आधार बनाकर बाजारवाद की संकल्पना का विकास होने लगा; राष्ट्रवाद की गरिमामयी छवि का विखण्डन होने लगा।
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आज के बम धमाकों, नित होते हादसों, मौतों के बीच इस आतंकवाद से भी लड़ने की आवश्यकता है। हमें हमारी युवा पीढ़ी के सामने देश के स्वर्णिम इतिहास को रखना होगा; यहां की भव्य सांस्कृति विरासत से उसका परिचय करवाना होगा; देह-सुख से इतर रिश्तों की मर्यादा को समझाना होगा; बाजारवाद से इतर सामाजिकता का विकास करवाना होगा; वैश्विक जीवन के साथ-साथ राष्ट्रवाद का पाठ भी पढ़ाना होगा; आर्थिक मूल्यों से ऊपर जीवन-मूल्यों को रखना होगा। यदि हम इस तरह के कुछ कदमों को उठाकर दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी को समझाने में सफल हुए तो सम्भव है कि आतंकवाद के इस छिपे चेहरे-सांस्कृतिक आतंकवाद-को हम अपने घरों के भीतर पहुंचने से रोक लेंगे।

क्या मोदी से अच्छा पी एम पद की उमीदवार सुषमा हो सकती है ?

जैसे.जैसे वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है वैसे.वैसे राजनीतिक गलियारों में होने वाली हलचलें तेज होती जा रही हैं। जाहिर सी बात है समय बहुत कम बचा है और वर्तमान हालातों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि सभी पार्टियों को खुद को अन्य से बेहतर साबित करने के लिए अभी बहुत ज्यादा तैयारियां करनी हैं। यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारना लगभग तय और स्वीकृत है लेकिन जब बात एनडीए की होती है तो यूं तो भाजपा की ओर से वर्ष 2014 के लिए नरेंद्र मोदी का प्रोजेक्शन किया जा रहा है और क्षेत्र विशेष से निकालकर उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर भी उभारा जा रहा है लेकिन एनडीए समेत स्वयं भाजपा में से भी मोदी की उम्मीदवारी का सांकेतिक विरोध शुरू हो गया है। नीतीश कुमार और शरद यादव भी नरेंद्र मोदी की दावेदारी को खारिज करने जैसा संकेत देते हुए यह कह चुके हैं कि जल्द ही बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा की जानी चाहिए। हालांकि इस बीच जो नाम तेजी के साथ लोकप्रियता बटोर रहा है वह है महिला राजनेता सुषमा स्वराज का। एनडीए का घटक दल शिवसेना पहले ही यह साफ कर चुका है कि सुषमा स्वराज ही बाला साहेब ठाकरे की पसंद थीं। शिवसेना के अलावा ऐसे बहुत से दल और व्यक्ति विशेष हैं जो सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का बेहतर उम्मीदवार बताने से नहीं हिचकते। उनका कहना है कि अगर मोदी की जगह सुषमा पर दांव लगाया गया होता तो हालात जुदा होते। इस बीच सुषमा और मोदी के नामों पर एक बहस छिड़ चुकी है क्योंकि जहां बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सुषमा को बेहतर बता कर नरेंद्र मोदी को नकारता प्रतीत हो रहा है वहीं नरेंद्र मोदी को भारत के लिए उपयुक्त प्रधानमंत्री कहने वाले भी पीछे नहीं हैं।


नरेंद्र मोदी का पक्ष लेने वाले लोगों का कहना है कि मोदी छा जाने वाले नेता हैं। वह जहां भी जाते हैं अपने प्रशसंकों का एक गुट तैयार कर देते हैं। वह जब बोलते हैं तो सामने वाले के पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचता। उनकी भाषण शैली कमाल की है। वह विशाल व्यक्तित्व वाले नेता हैं और उन्हें आरएसएस समेत भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का समर्थन भी प्राप्त है। गुजरात को विकास का मॉडल बनाने वाले नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जाता है। आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने में नरेंद्र मोदी पूरी तरह सक्षम हैं और उनका मीडिया मैनेजमेंट भी उनके लिए रामबाण का काम करता है। अब वह गुजरात तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता भी घोषित करने की तैयारी में हैं। वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का विरोध इस बात पर किया जाता है क्योंकि वह आज भी अपनी तानाशाह छवि से बाहर नहीं आ पाए हैं। हिंदुत्व का पुरोधा होने का ठप्पा उनका पीछा नहीं छोड़ पा रहा है जिस वजह से वह आज भी सांप्रदायिक नेता के तौर पर ही जाने जाते हैं। उन्हें ना सिर्फ एनडीए में बल्कि भाजपा में भी सर्वसम्मति वाले नेता के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा रहा है।


वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का वर्ग जो सुषमा की पैरवी करता है उसका कहना है कि सुषमा स्वराज को अगर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो जाहिर है उन्हें महिला होने का फायदा अवश्य मिलेगा। देश की अन्य सबसे बड़ी पार्टी ;कांग्रेसद्ध और बड़े गठबंधन ;यूपीएद्ध की मुखिया भी एक महिला ही है इसीलिए अगर सुषमा की छवि को उभारा जाएगा तो इसका फायदा भाजपा समेत एनडीए को अवश्य मिलेगा। दूसरी ओर सुषमा भाजपा के वरिष्ठ और सम्माननीय सदस्य लालकृष्ण आडवाणी की पसंदीदा उम्मीदवार हैं और उनका एनडीए और भाजपा दोनों में ही कोई विरोधी नहीं है। सुषमा एक प्रखर नेता और बेहतरीन वक्ता हैंए उन्हें सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाने की संभावनाएं भी तीव्र हैं। मोदी जहां राष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं सुषमा स्वराज पिछले 25 सालों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वह विपक्ष की नेता तो हैं ही साथ ही उन पर कभी किसी भी प्रकार का सांप्रदायिक होने जैसा भी आरोप नहीं लगा है। लेकिन सुषमा की दावेदारी को खारिज करते हुए और मोदी का पक्ष लेने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि जहां मोदी को पिछले दो सालों से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जा रहा है वहीं इस पद के लिए सुषमा का नाम कहीं भी सुनाई नहीं दे रहाए उन्हें तरजीह दी ही नहीं जा रही तो उनके बारे में बात करने का कोई फायदा ही नहीं है।

16 April 2013

मुंबई के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना कितनी सही ?

मुंबई पुलिस की बेतूका फरमान एक बार फिर सामने आई है। जिसे सुन कर आप भी हैरान रह जाएंगें। जी हां अब मुंबई के थानों में भगवान की मूर्तियां और तस्वीरें नहीं रहेंगी। न ही थाना परिसरों में पूजापाठ होगी और न उत्सव मनाए जाएंगे। पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह ने सभी थानेदारों को मूर्तियां-तस्वीरें हटाने के निर्देश दिए थे। इस काम के लिए तय समय सीमा समाप्त हो चुकी है, लेकिन महानगर के कुल 92 थानों में से महज 20 फीसद थानों ने पुलिस आयुक्त के निर्देश का पालन किया है। पुलिस आयुक्त कार्यालय से दो अप्रैल को जारी निर्देश पत्र में कहा गया था कि किसी भी सरकारी दफ्तर, विशेष कर पुलिस विभाग में किसी धर्म विशेष से जुड़ी तस्वीरें एवं मूर्तियां नहीं लगाई जानी चाहिए। पूजापाठ व उत्सव भी नहीं मनाया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। उन्हें यह लग सकता है कि धर्म विशेष में आस्था रखने वाला पुलिस विभाग उनके साथ न्याय नहीं कर सकता। इससे समाज में द्वेष की भावना पैदा हो सकती है।

पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह की इस आदेष से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है, की क्या मुंबई पुलिस को पूजा पाठ करने की अजादी नहीं है। क्या इससे हिन्दु धर्म के लोगों का आक्रोष नहीं बढ़ेगा? क्या ये संविधान के अनुच्छेद 25 का उलंघन नहीं है, ये अनुछेद किसी भी धर्म को समानता का अधिकार प्रदान करता है, और अपने धर्म को प्रचार प्रसार करने कि पूर्ण अजादी प्रदान करता है, तो एैसे में आखिर मुंबई पुलिस के आयुक्त किस अधार पर भेदभाव कर रहे है, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है। मुंबई के पुलिस थानों में लगाए गए भगवान की मूर्तियां किसी धार्मिक संगठ की ओर से या किसी के दबाव में नहीं रखी गई बल्कि खुद पुलिस थानों की अधिकारीयों और कर्मचारियों की ओर से स्थापित की कई है। देष की सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुकी है की हिन्दुत्व सिर्फ एक धर्म ही नहीं बल्कि जीवन जीने की एक कला है, जो किसी भी व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की रास्ता दिखाती है। देश में ये कोई पहला एैसा वाक्या नहीं है जब इस तरह की आदेष जारी की गई हो, एैसी घटना को बार बार इसलिए भी दोहराया जा रहा है ताकी हिन्दु धर्म को समाप्त किया जा सके।

 ये सड्यंत्र देष में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में राजनीति करने वाली पार्टीयों के दबाव में भी किया जा रहा है। ताकी इसे चुनाव में मुद्दा बनाया कर अपने आप को सेकुलर साबित कर सके। भगवान की मूर्ति सिर्फ महाराश्ट्र के पुलिस थानों में ही नहीं है, इस तरह के पूरे देश भर के थानों में भगवान की मूर्ति मौजूद है, तो क्या इसका मतलब देश भर के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना चाहिए। मगर अब तक महाराश्ट्र के अलावे किसी और राज्य के पुलिस आयुक्त की ओर से कभी भी कोई आपती जारी नहीं की गई, तो फिर एैसा मुंबई पुलिस आयुक्त क्यों कर रहे है, इसका जावाब खुद मुंबई पुलिस आयुक्त को देना होगा।

महाराश्ट्र के साथ साथ देश भर के कई एैसे पुलिस थानें है जहा पर हिन्दु देवी देवताओं की मंदिर मौजूद है, तो क्या वहा की लागों को न्याय नहीं मिलती है। पुलिस को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए क्या उसे हटा देना चाहिए? इतना ही नहीं देश में आज भी कई एैसे पुलिस थाना खुद देवी देवताओं के स्थान पर बने हुए है जहा पर वहा के स्थानीय लोग नियमीत रूप से पूजा पाठ करते है, क्या उनके उपर पूजा पाठ करने पर प्रतिबंध लगा देना देना चाहिए। ये तमाम एैसे सवाल है जो खुद मुंबई पुलिस आयुक्त के बेतूके फरमान पर खड़े होने लगे है। तो क्या एैसे में पुलिस थानों से भगवान के मूर्ति को हटाना सही है?

13 April 2013

नक्सली बनो पैसा पाओ जैसी नीति क्या सही है ?

केंन्द्रीय सत्ता बनाम नक्सलवाद की लड़ाई में सरकार तीसरें रास्तें के आसरे विकल्प तलास रहीं है। ये विकल्प केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर जारी की गई नई नीति केंद्रीय सत्ता के समर्पण को बयान कर रही है। नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने के उद्देश्य से जिन तमाम उपायों की घोषणा की गई है, उससे तो यही लगता है कि उन्हें शासन के खिलाफ बगावत करने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है। और सरकार इन नक्सलियों के आगे घुटने टेक रही है। इस नई नीति के तहत नक्सली संगठनों की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में शामिल कथित बड़े नक्सलियों को ढाई लाख रुपये और राज्य कमेटी में शामिल सदस्यों और कमांडर कहे जाने वाले नक्सलियों को डेढ़ लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा उन्हें रोजगार के लिए तीन साल तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस दौरान उन्हें चार हजार रुपये की मासिक सहायता भी प्रदान की जाएगी। साथ ही यदि वे हथियारों के साथ समर्पण करते हैं तो उन्हें उसके लिए अलग से पैसा दिया जाएगा। इतना ही नहीं उनके मामलों का निपटारा फास्ट ट्रैक अदालतों में होगा और इस दौरान सरकार उन्हें कानूनी सहायता भी देगी? छोटे-मोटे मामलों में शामिल रहे नक्सलियों को माफी देने का भी प्रावधान है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या लोगों को नक्सली बनने के लिए इनाम दिया जा रहा है।

देष में जब भी नक्सल आत्मसर्मपण की पेषकष हुई है, तो इसे नक्सली संगठनों ने ठुकराने का ही काम किया है। जब कभी भी संघर्ष विराम हुआ भी तो नक्सलियों ने उस अवधि का इस्तेमाल खुद को संगठित करने और अपने आप को ताकतवर बनाने में किया। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है की फिर सरकार किस अधार पर इस नीति को लागू करना चाहती है? क्या यहा भी उसे वोट की सियासत नज़र आ रही है? या फिर मनरेगा जैसा कोई नया घोटाले का समंदर ? ये सवाल यहा हम इसलिए भी उठा रहे है क्योंकि अब तक सरकार के पास एैसी कोई अधिकारिक आकड़ा मौजूद नहीं है जिसके अधार सरकार ये तय कर पायेगी की कौन से गांव में कौन नक्सली है और कौन आम नागरीक। भारत सरकार नक्सलियों से जिस तरह निपट रही है उससे दुनिया भर में पहले से ही उसकी भद पिट रही है। आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के मामले में भारत एक नरम राष्ट्र के रूप में उभर सामने आया है। एैसे में नक्सलियों के साथ सरकार की इस नीति से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। 

जहानाबाद जेल ब्रेक से लेकर लालगढ के दौर में न सिर्फ नक्सलवादी की मारक क्षमता बढ़ती हुई दिखायी दे रही है बल्कि संसदीय राजनीति और राज्य व्यवस्था नक्सलवादी प्रभावित इलाकों में प्रभावहीन होकर उभर रही है। तो वही सरकार कर्रवाई करने के बजाय नरमी दिखा रही है, जो पूरी तरह से सरकार की संवेदनहीनता को दर्षा रही है। आज संसदीय राजनीति में हाथ जलाये बगैर राजनीतिक दलों को भी नक्सलियों ने अपने प्रयोग में मोहरा बनाया है। षायद यही कारण है की सरकार इस प्रकार के नक्सल समर्थित नीति को आगे बढ़ाने की दिषा में बल दे रही है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, नक्सली बनों पैसा पाओ जैसी ये नीति सही है ?

12 April 2013

क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है ?

                                इनसानों ने पैसे के लिए आपस का प्यार मिटा डाला,
                               हँसते बसते घर फूँक दिए धरती को नर्क बना डाला।

                                मिट्टी से निकाला सोने को सोने से बनाए महल मगर,
                               जज़बातों के नाज़ूक रिश्ते को मिट्टी के तले दफ़ना डाला।

इंसानियत का रिश्ता इंसानों को जानवरों से अलग करता है लेकिन इंसान उस रिश्ते की ही बलि चढ़ा दे तो फिर फर्क क्या रहेगा ? जी हां, आज हम एैसा इसलिए कह रहें है की क्योंकि इस भौतिकवादीता के आंधी में कुछ भी शाश्वत नहीं रह गया है। बदलते जमाने ने मौसमों की तरह रिश्तों की तासीर को बदल डाली है। खून और पानी में कोई अंतर नहीं दीख रहा है, क्योंकि रुपए-पैसों और जमीन-जायदाद के आगे सारे रिश्ते बेमानी हो गए है। हर आंगन और परिवार कुरुक्षेत्र बन गया है और जमीन का टुकड़ा हस्तिनापुर। तो एैसे में सवाल भी खड़े होने लगे है, की क्या आज रिस्ते नाते पैसे की बली चढ़ रहे है। हर भाई धृतराष्ट्र की भूमिका में नज़र आ रहा है तो बेटा दुर्योधन बन बैठा।


शेक्सपियर की नाटक किंग लियर के तरह आज हू बहू रिस्तें कलंकीत होने लगे है, जो आज के समकालीन संदर्भ में सटीक बैठता है। खून पानी ही होता होगा शायद, तभी तो चड्ढा भाईयों ने एक-दूसरे पर रिवॉल्वर तानते हुए एक बार भी नहीं सोचा। तो वही रीयल स्टेट कारोबारी दीपक भारद्वाज की हत्या सुपारी देकर उसके अपने ही बेटे ने करवा दी। हाल ही में घटीत ये दोनों घटनाए सिर्फ उदाहरण मात्र है। लेकीन शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब अखबारों में रिश्तों के बली चढ़ने की खबरें न होती होंगी। आज देष में हर रोज एैसी हजारों घटनाए आम आम बात हो गई है, जो इस ओर इषारा कर रही है की रिस्तें पैसे की बली चढ़ रहे है। पैसे की मोह में आज रिस्तें दरकने की बात हर रोज सामने आ रही है। ये घटनाए एक सभ्य समाज के विनाश के पूर्व की आहट है, जिसे हम सब को समझने की दरकार है।

 तेजी से विकसित हो रहे शहरीकरण में ऐसी घटनाएं भारतीय समाज पर सवालिया निशान लगाती हैं। समाज रूपी परंपरा आज टूट रही है और भौतिकता हर ओर अपना पैर पसार रही है। हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है लेकिन जब कोई मर्यादा को लांघ जाता है तो रिश्ते अपनी गरिमा ही नहीं विश्वास भी खो बैठते हैं। एैसे में आज हम सब को इसकी चिंता करनी की जरूरत है। इस रिस्तें की पतझड़ में आधुनिकता की तूफ़ान हमारे समाज को जड़ से न उखाड़ दे, इसकी चिंता आज लोगों को सताने लगी है। सांस्कृतिक आदर्शांे की बलि भोगवादी परंपरा को जन्म दे रही है, जहा पैसें रिस्तेंकी अहमीयत को तय करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है?

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ...!

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून। वर्षों पुराना यह दोहा कभी नीतिवाद से प्रेरित लगता था, लेकिन आज यह सच साबित होता दिख रहा है। बढ़ते जल संकट को लेकर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का यह कहना कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर लड़ा जाए, भविष्य में पानी के भयावह संकट की चेतावनी देते हैं। महाराष्ट्र के 34 जिले इस समय भयंकर सूखे की चपेट में हैं।सूखे ने पिछले चालीस सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। लगातार दूसरे साल भी बारिश कम होने से ऐसी स्थिति बनी हुई है। मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के कई इलाके 1972 के बाद सबसे बड़े सूखे का सामना कर रहे हैं।इस भीषण सूखे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य के जलाशयों में इस वक्त महज 38 प्रतिशत पानी है और मराठवाड़ा जोन के जलाशयों में तो 13 प्रतिशत पानी ही बचा है। इलाके में गन्ना, हल्दी, केले की फसलें पानी न मिलने से बर्बाद हो गई हैं। नतीजतन, यहां के किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। साफ है कि स्थिति विकट है। तालाबों,  नदियों, कुओं- सभी से पानी गायब हो गया है। पानी बस यहां के लोगों की आंखों में दिखता है। सूखे का सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा में है। याद करें, 1972 में सूखे से देश भर में खाद्यान्न की कमी हुई थी और सारे खाद्य उत्पादों के दाम बढ़ गए थे। भारत सरकार को फिर खाद्यान्न आयात बढ़ाने पड़े थे। कुछ ऐसी हालत 2009 में भी हुई। इस बार भी महाराष्ट्र में सूखे ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यह ठीक है कि सरकारी नीतियों में सूखा पीड़ितों की फिक्र दिखने लगी है, पर किसी भी योजना तक उनकी पहुंच आसान नहीं दिखती। अभी आलम यह है कि किसानों को समय चलते मदद नहीं मिली तो वे कर्ज और आर्थिक नुकसान के बोझ तले दिनोंदिन और दबते चले जाएंगे।

 यह जगजाहिर है कि हाल के वर्षों में कर्ज न चुका पाने के कारण ही ज्यादातर किसान जान दे रहे हैं। पूरे देश में विदर्भ ऐसा क्षेत्र है जहां सबसे ज्यादा किसानों ने कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या की है। जाहिर है, सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इतनी बड़ी आपदा के बावजूद अब तक सरकार ने किसानों के हित में कोई सीधा और कारगर कदम नहीं उठाया है। महाराष्ट्र अकेला ऐसा राज्य है, जो कृषि के मुकाबले उद्योगों को पानी उपलब्ध कराने को ज्यादा प्राथमिकता देता है। इसलिए यहां जो सिंचाई योजनाएं बनती हैं, उनका पानी शहरों में उद्योगों की जरूरतों पर खर्च कर दिया जाता है। अमरावती जिले में ही, जो सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त इलाका है, प्रधानमंत्री राहत योजना के तहत अपर वर्धा सिंचाई प्रोजेक्ट बनाया गया, लेकिन जब यह बनकर तैयार हुआ तो राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि इसका पानी एक थर्मल पावर प्रोजेक्ट को दे दिया जाए। बहरहाल, सूखे की अब तक जो भयावह तस्वीर दिख रही है, उससे स्पष्ट है कि इस बार खेती-किसानी को बुरी तरह प्रभावित होने वाली है और इसका असर उन किसानों पर पड़ना तय है, जिन्होंने भारी कर्ज लिया है। यह ठीक है कि सूखे से अकाल की समस्या अब तक नहीं है पर मौजूदा परिस्थितियां डराने वाली हैं। यही वजह है कि सूखे से उत्पन्न स्थिति को लेकर अब केंद्र सरकार भी चिंता में दिखने लगी है। कृषि मंत्री शरद पवार भी सूखे को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) ने महाराष्ट्र के लिए 1,207 करोड़ रुपये का सूखा राहत पैकेज मंजूर कर दिया है। लंबे समय से महाराष्ट्र सरकार इसकी मांग कर रही थी। सूखे की विकरालता को देखते हुए यह राशि बहुत ज्यादा नहीं है, परंतु कम भी नहीं है। यदि इसका ईमानदारी के साथ सौ फीसद उपयोग किया जाए तो काफी हद तक सूखे की समस्या से निजात पायी जा सकती है। खैर, इस पैकेज का कितना सही इस्तेमाल हो पाएगा, इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है।

महाराष्ट्र में कुल 34 जिलों में से सोलापुर, अहमदनगर, सांगली, पुणे, सतारा, बीड़ और नासिक सूखे से सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं। बुलढाना, लातूर, उस्मानाबाद, नांदेड़, औरंगाबाद, जालना, जलगांव और धुले जिलों में भी स्थिति गंभीर है। राज्य में कुछ जिले पशुचारे और पेयजल की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में सूखे के हालात को देखते हुए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने लोगों से अपील की है कि वे सूखा पीड़ितों की मदद के लिए आगे आएं और सूखे से निपटने के लिए बनाए गए मुख्यमंत्री राहत कोष में अधिकाधिक दान कर राज्य सरकार की मदद करें। राज्य सरकार ने इस बार के सूखे को पिछले चालीस सालों में सबसे भयंकर सूखा घोषित किया है। अकाल का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था से है। व्यापक शहरीकरण के बावजूद महाराष्ट्र में कृषि ही अर्थव्यवस्था का पूरक आधार है। अब राज्य को अपने संसाधन अकाल से निपटने में लगाने पड़ेंगे। बड़ा संकट यह है कि भूजल स्तर राज्य के उन हिस्सों में भी नीचे जा रहा है जहां पर्याप्त वर्षा हुई थी। राज्य में ढेरों सिंचाई परियोजनाएं कई दशकों से किसी न किसी छोटे-मोटे कारण से अधूरी पड़ी हैं। यहां दशकों पूर्व जो महत्वाकांक्षी जल संवंर्धन योजना शुरू की थी, वह अब सिर्फ दिखावा रह गई हैं। वास्तव में देश के किसानों के लिए मौसमी बारिश बड़ी अहमियत रखती है क्योंकि देश के केवल 40 फीसद कृषि क्षेत्र के बारे में यह कहा जा सकता है कि वहां सिचाई की सुविधाएं हैं और एकाध मानसून में गड़बड़ी वह बर्दाश्त कर सकता है। लेकिन शेष 60 फीसद इलाका पूरी तरह मौसमी बारिश पर निर्भर होता है और ऐसे में अगर बारिश सामान्य से कम हुई, तो मुश्किल होना स्वाभाविक है।

इस तरह कहा जा सकता है कि अभी भी भारतीय कृषि बहुत हद तक प्राकृतित बारिश पर निर्भर है। अगर महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति इसी तरह बनी रहती है तो आने वाले कुछ समय में देश की अर्थव्यवस्था पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। क्योंकि ग्रामीण आमदनी और उपभोक्ता खर्च के लिए मौसमी बारिश अहम कारक है, साथ ही सूखे से भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्रों- आर्थिक विकास, खाद्यान्न संकट और मुद्रास्फीति- पर असर पड़ना सुनिश्चित है। जाहिर है जिस तरह से सिंचाई भगवान भरोसे है और ग्लोबल वार्मिंग से बारिश का चक्र बदल रहा है उसका सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। दिन-प्रतिदिन हमारी जरूरतें बढ़ रही हैं। ऐसे में बिना सिंचित क्षेत्र में वृद्धि के सिर्फ मानसून के भरोसे इसे हासिल करना असंभव है। आज भी देश की 60 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है, जीडीपी का लगभग 13.6 प्रतिशत अब भी कृषि एवं सहायक गतिविधियों से प्राप्त होता है। इस तरह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अभी भी कृषि का विशेष महत्व है और कृषि के लिए मानसून का। यह देश की विडंबना है कि आजादी के छह दशक बाद भी हम कृषि के संदर्भ में मानसून पर अपनी निर्भरता कम नहीं कर पाए।

1972 के बाद महाराष्ट्र सबसे बड़े सूखे की चपेट में है, करीब आधा महाराष्ट्र बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है।हमारे देश में 72 प्रतिशत आबादी के पास जरूरत भर भी पानी नहीं है, वह पानी क्या बचाएगी। 28 प्रतिशत पानी वाले लोग ही पानी बचाने की क्षुद्रताभरी बातें करते हैं। आजादी के तुरंत बाद गाँवों को छोड़कर हमारी सरकार ने नगर में पानी की जो व्यवस्था खड़ी की थी, उस व्यवस्था का कालक्रम में उसने सही-सही संरक्षण, संवर्धन और अनुरक्षण नहीं किया। तो क्या ऐसे में पानी की किल्लत नहीं होगी? वैज्ञानिक हमें डराते हैं, बुद्धीजीवी भरमाते हैं। किसी के पास पानी बनाने का वैकल्पिक उपाय नहीं है। पानी प्रकृति की अनुपम देन है। हम इसका दुरुपयोग होने से रोक सकते हैं। कहने को हम कह सकते हैं कि नदियाँ सूख रहीं हैं, ताल-तलैया सूख रहे हैं, जलप्रपात सूख रहे हैं, नदी का स्रोत सूख रहा है, लेकिन उसे रोकने के उपाय हमारे पास नहीं हैं। अगर उपाय होता तो देश में कई जगहों पर रेगिस्तान बनने से रोक सकते थे, लेकिन हमारे वैज्ञानिक के पास डराने के अलावा कोई समाधन नहीं है। यह प्रकृति का चक्र है, जिसे कोई रोक नहीं सकता है। जल के लिए जो मारा-मारी है, वह हमारी क्षुद्र मानसिकता का परिचायक ही है। ऐसी परिस्थिति में यह कहीं और बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जाजनक है कि समस्याओं को लेकर भी कुछ लोग सरकारी संगठन बनाकर माल बटोरने में लगे हैं, उनकी कार्यशालाएँ शानदार होटलों में चलती हैं। नदी के किनारे की गंदगी को साफ करने के लिए उनके पास न समय है और न ही कुदाल और न ही देह गंदा करने का इरादा। पानी बचाने की बात बेमानी है, हाँ, हमें पानी का दुरुपयोग अवश्य रोकना चाहिए। इसका हम संकल्प लें।

गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं।पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है।धरती से पानी खत्म हो गया तो क्या होगा। कुछ ही सालों बाद ऐसा हो जाए तो ताजुब नहीं होना चाहिए। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम हो रहा है। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। यही सही समय है कि पानी को लेकर कुछ तो सोचा जाए। पानी खत्म हो गया तो कैसा होगा हमारा जीवन। आमतौर पर ऐसे सवालों को हम अनसुना कर देते हैं और ये मान लेते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा। गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं। पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है। दुनिया के दो तिहाई हिस्से में तो पानी ही पानी भरा है तो भला कमी कैसे होगी। पर मानवीय जीवन जिस पानी से चलता है उसकी मात्रा पूरी दुनिया में पांच से दस फीसदी से यादा नहीं है। नदियां सूख रही हैं। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। झीलें और तालाब लुप्त हो चुके हैं। कुएं, कुंड और बावडियों का रखरखाव नहीं होता। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम होता जा रहा है। हालत चिंताजनक है-आखिर किस ओर बढ़ रहे हैं हम।

नासा के सेटेलाइट के आंकड़ें कहते हैं कि अब भी चेता और पानी को बचा लो अन्यथा पूरी धरती बंजर हो जाएगी, लेकिन दुनिया से पहले अपनी बात करते हैं यानि अपने देश की। जिसके बारे में विश्व बैंक की रिपोर्ट का कहना है कि अगले कुछ सालों के बाद भारत में पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मचने वाली है। सब कुछ होगा, लेकिन हलक के नीचे दो घूंट पानी के उतारना ही मुश्किल हो जाएगा। हजारों साल पहले देश में जितना पानी था वो तो बढ़ा नहीं, स्रोत बढ़े नहीं, लेकिन जनसंख्या कई गुना बढ़ गई। मांग उससे यादा बढ़ गई। पानी के स्रोत भी अक्षय नहीं हैं, लिहाजा उन्हें भी एक दिन खत्म होना है। विश्व बैंक की रिपोर्ट को लेकर बहुत लोग उसे कामर्शियल दबावों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साजिश से जोडक़र देख सकते हैं। उन्हें लगता है कि अपनी इस रिपोर्ट के जरिए यूरोपीय देशों का पैरवीकार माना जाने वाला विश्व बैंक कोई नई गोटियां बिठाना चाहता हो, लेकिन इस रिपोर्ट से अपने देश के तमाम विशेषज्ञ इत्तफाक रखते हैं। पर्यावरणविज्ञानी कहते रहे हैं कि पानी को बचाओ। बात सही है कि जायरे और कनाडा के बाद दुनिया में सबसे यादा पानी भारत में है। अभी भी समय है कि हम चेतें और अपने पानी के स्रोतों को अक्षय ही बनाए रखें। एक सदी पहले हम देशी तरीके से पानी का यादा बेहतर संरक्षण करते थे, लेकिन नई जीवनशैली के नाम पर हम उन सब बातों को भूल गए। हम भूल गए कि कुछ ही दशक पहले तक हमारी नदियों में कल-कल करके शुध्द जल बहता था। अब ऐसा नहीं रहा। तथाकथित विकास की दौड़ में शुध्द पानी और इसके स्रोत प्रदूषित होते चले गए। अनियोजित और नासमझी से भरे विकास ने नदियों को प्रदूषित और विषाक्त कर दिया। जल संरचना तैयार करने पर ध्यान तो दिया गया, लेकिन कुछ ही समय तक जबकि ये एक सतत प्रक्रिया थी, जो चलती रहनी चाहिए थी। एशिया के 27 बड़े शहरों में, जिनकी आबादी 10 लाख या इससे ऊपर है, में चेन्नई और दिल्ली की जल उपलब्धता की स्थिति सबसे खराब है। मुंबई इस मामले में दूसरे नंबर पर है। जबकि कोलकाता चैथे नंबर पर। दिल्ली में तो पानी बेचने के लिए माफिया की समानांतर व्यवस्था ही सक्रिय हो चुकी है। हालत ये है कि पानी का कारोबार करने वाले इन लोगों ने कई इलाको में अपनी पाइप लाइनें तक बिछा रखी हैं। इनके टैंकर पैसों के बदले पानी बेचते हैं।

पानी की कमी को लेकर टकराव तो अभी से पैदा हो गया है। कई राज्यों में नदियों के जल बंटवारे को लेकर दशको से विवाद जारी है। कावेरी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में टकराव, गोदावरी के जल को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक में तनातनी और नर्मदा जल पर गुजरात और मध्यप्रदेश में टकराव की स्थिति। ये टकराव कभी रायों के बीच गुस्सा पैदा करते रहे हैं तो कभी राजनीतिक विद्वेष का कारण बनते रहे हैं। दरअसल भारत का नब्बे फीसदी हिस्सा नदियों के जल पर निर्भर करता है, जो विभिन्न रायों के बीच बहती हैं। हमारे देश में अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि नदी का कितने जल पर किसका हक है। दूसरे देशों में जहां पानी को लेकर दिक्कतें हैं, वहां जल अधिकारों को साफतौर पर परिभाषित किया गया है। इनमें चिली, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। पाकिस्तान और चीन भी पानी के अधिकारों को लेकर सिस्टम बनाने में लगे हैं। मौसम में बदलाव से भारत में पानी की समस्या और विकराल होगी। मानसून के प्रभावित होने और ग्लेशियर्स के पिघलने से भारत को स्थिति से निपटने के बारे में सोचना होगा। भारत में दोनों ही स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। कुछ इलाको में बाढ़ आ जाती है तो कुछ इलाके सूखे का शिकार हो जाते हैं। भारत के कृषि सेक्टर को मानसून के बजाए दूसरे विकल्प तलाशने अगर जरूरी हो चले हैं तो पानी के उचित संरक्षण की भी।

भारत के बांध प्रति व्यक्ति करीब 200 क्यूबिक मीटर पानी स्टोर करते हैं, जो अन्य देशों चीन, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका प्रति व्यक्ति 1000 मीटर से खासा कम है। पूर्वोत्तर रायों में, जहां साल भर खासी बारिश होती है। बेहतर जल संरचना से मिलने वाला धन यहां की तस्वीर बदल सकता है। छोटे स्तर पर सामुदायिक जल एकत्रीकरण और वाटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट्स भी भविष्य में काम की चीज साबित हो सकते हैं। दुनिया में पानी की मात्रा बहुत ही सीमित है। इस पर ज़िंदा रहने वाली मानव जाति और दूसरी प्रजातियों को इस बात की उम्मीद नही रखनी चाहिए कि उन्हें हमेशा पानी मिलता रहेगा। धरती का दो-तिहाई हिस्सा पानी से घिरा है। लेकिन इसमें से ज़्यादातर हिस्सा इतना खारा है कि उसे काम में नहीं ला सकते। सिर्फ ढाई फ़ीसदी पानी ही खारा नहीं है। हैरानी की बात ये है कि इस ढाई फ़ीसदी मीठे पानी का भी दो-तिहाई हिस्सा बर्फ़ के रूप में पहाड़ों और झीलों में जमा हुआ है। अब जो बाकी बचता है उसका भी 20 फ़ीसदी हिस्सा दूर-दराज़ के इलाक़ों में है। बाकी का मीठा पानी ग़लत वक़्त और जगह पर आता है मसलन मानसून या बाढ़ से। कुल जमा बात ये है कि दुनिया में जितना पानी है उसका सिर्फ़ 0.08 फ़ीसदी इंसानों के लिए मुहैया है। इसके बावजूद अंदाज़ा है कि अगले बीस वर्षों में हमारी माँग करीब चालीस फ़ीसदी बढ़ जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी ने 1999 में एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि पचास देशों में 200 से भी ज़्यादा वैज्ञानिकों ने पानी की कमी को नई शताब्दी की दो सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया था। दूसरी समस्या धरती का बढ़ता तापमान थी। हम अपने पास उपलब्ध पानी का 70 फ़ीसदी खेती-बाड़ी में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन विश्व जल परिषद का मानना है कि सन् 2020 तक पूरी दुनिया को खाना खिलाने के लिए हमें अभी मौजूद पानी से 17 फ़ीसदी ज़्यादा पानी चाहिएगा। हम इसी ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले दिनों में आज के मुक़ाबले ऐसे लाखों लोग ज़्यादा होंगे जो हर रात सोते वक्ते भूखे-प्यासे होंगे। आज पूरी दुनिया में हर पाँच में से एक आदमी को पीने के साफ़ पानी की सुविधा नही है। हर दो में से एक को साफ़-सुधरे शौचालय की सुविधा नहीं है। हर रोज़ क़रीब तीस हज़ार बच्चे पांच साल की उम्र पूरी कर पाने से पहले ही मर जाते हैं। इनकी मौत या तो भूख से या फिर उन बीमारियों से होती हैं जिनकी आसानी से रोक-थाम की जा सकती थी। पीने का साफ़ पानी अच्छी सेहत और खुराक की चाबी है। जैसे चीन में एक टन चावल पैदा करने के लिए एक हज़ार टन पानी का इस्तेमाल होता है।

जल संकट के कई कारण हैं। एक तो बड़ा ही साफ़ है। जनसंख्या में बढोत्तरी और जीवन का स्तर ऊँचा करने की चाह। दूसरा है पानी को इस्तेमाल करने के तरीक़े के बारे में हमारी अक्षमता। सिँचाई के कुछ तरीक़ों में फ़सलों तक पानी पहुंचने से पहले ही हवा हो जाता है। प्रदूषण की वजह से  हमें अभी जो पानी उपलब्ध है वो भी गंदा होता जा रहा है। मध्य एशिया में अराल समुद्र एक ऐसा ही उदहारण है कि किस तरह प्रदूषण ज़मीन और पानी को बर्बाद कर सकता है। दिलचस्प बात ये है कि सरकारें पानी की अपनी समस्याओं को बरसाती पानी और धरती पर मौजूद पानी पर निर्भरता बढ़ाने के बजाए भूमिगत पानी का इस्तेमाल कर सुलझाना चाहती हैं। लेकिन इसका मतलब ये हुआ कि बैंक खाते में पैसा जमाए कराए बिना लगातार पैसे निकाले जाना। नदियों और झीलों का पानी भूमिगत जल से आता है और ये सूख सकता है। ज़मीन के भीतर से निकाले गए मीठे पानी की जगह खारा पानी ले सकता है। और ज़मीन के भीतर से पानी निकालने के बाद जो जगह खाली बच जाती है वो कई बार तबाही पैदा कर सकती है। जैसा कि बैंकाक, मेक्सिको शहर और वेनिस में हुआ। इस समस्या से निपटने के लिए कुछ रास्तों पर काम शुरु किया जा सकता है। सिंचाई के लिए फव्वारे वाली सिंचाई जिसमें कि सीधा पौधों की जड़ों में पानी की बूंदे डाली जाती हैं। एक रास्ता ऐसी फ़सलें बोना का भी है जो पानी पर ज़्यादा निर्भर न रहती हों। या फिर खारे पानी को मीठा किया जाए लेकिन इसमें काफी ऊर्जा लगेगी और कचरा फैलेगा। मौसम बदलने से कुछ इलाक़ों में ज़्यादा पानी गिरेगा तो कुछ में कम। साफ़ बात है कि कुल मिलाकर असर मिला-जुला ही रहेगा। लेकिन अगर हमें जल संकट से उबरना है तो हमें यूएनईपी की रिपोर्ट पर ध्यान देना होगा जिसमें कहा गया है कि पूरे ब्रहांड में सिर्फ पृथ्वी ही है जहां पानी है और जल ही जीवन है।

आज देश की 14 बड़ी नदियां बड़े संकट की शिकार हैं। छोटी नदियां मर रही हैं। नदियां मरती रहीं तो हमारा अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। नदियों के बहाव क्षेत्र में वास स्थान बनाये जा रहे हैं और नदियां उफान को तैयार हैं। आज स्थिति यह बनती है कि कहीं बाढ़ से परेशानी है, तो कहीं सुखाड़ से। लेकिन साथ ही साथ यह भी सही है कि नदियां लाखों सालों का कैलेंडर बनाकर चलती हैं। वे लाखों साल में बनती हैं। न मालूम कौन सी नदी कितने बरस बाद फिर कब जिंदा हो जाये? कुछ पता नहीं। लेकिन हमें सजगता तो बरतनी ही होगी। 20 वर्ष में गंगा की साफ-सफाई के मद में सरकार 39,226 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक व बुनियादी मसलों को ध्यान न देने की वजह से अब तक नाकामी हाथ लगी है। इसलिए हमें कानूनी पक्ष को मजबूत करने के साथ ही सामाजिक पक्ष पर भी लोगों की सोच बदलनी होगी। केवल कभी-कभार आंदोलन करने मात्र से स्थिति में सुधार नहीं होगा। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी। यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि आगे आने वाले समय में देश के समक्ष जल संकट एक बड़ी चुनौती बन कर उभरेगा। आज भी जगह-जगह पर पानी की कमी की वजह से संघर्ष की स्थिति है। लेकिन यह सवाल हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम इस समस्या के प्रति सजग हुए हैं। जवाब यही है कि – नहीं। तो फिर जब हम ही सजग नहीं हैं, तो देश के नीति नियंताओं से यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे इस मसले पर गंभीर होंगे।

09 April 2013

क्या यौन उत्पीड़न के लिए उत्प्रेरक है, इज्जत की अवधारणा ?

उत्तर प्रदेश में पारिवारिक रंजिश का बदला लेने के लिए पहले एक परिवार के पुरुषों ने दूसरे परिवार की महिला के साथ गैंग रेप किया फिर इस गैंग रेप का बदला लेने के लिए पीड़ित महिला के पुरुष संबंधियों ने उक्त परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया। सीरिया के अंदर भड़की विरोध की आग को दबाने के लिए सीरिया की सेना द्वारा विरोधी गुट में शामिल महिलाओं का ना सिर्फ बेहद अमानवीय तरीके से बलात्कार किया जा रहा है बल्कि उन्हें क्रूरतम तरीके से प्रताड़ित भी किया जा रहा है। नक्सलवादए जिसे भारत की आंतरिक सुरक्षा और शांति के लिए खतरा करार दिया जाता हैए उससे निपटने के लिए भी सरकारी नुमाइंदे नक्सली और माओवादी महिलाओं से निपटने के लिए उनका बलात्कार करते हैं या चीरहरण कर उन्हें सरेआम घुमाते हैं। इतना ही नहीं नक्सली भी सरकारी नुमाइंदों को मजा चखाने के लिए उनसे संबंधित महिलाओं को ही अपना शिकार बनाते हैं।

यह भले ही हालिया उदाहरण हों लेकिन प्राचीन काल में भी जब कोई आक्रमणकारी किसी राज्य पर अपना कब्जा कर लेता था तो वह उस राज्य को नीचा दिखाने के लिए सबसे पहले राज्य की महिलाओं पर ही धावा बोलता था। उसकी सेना घरों में घुसकर या फिर राह चलती महिलाओं को अगवाकर उनके साथ बलात्कार करती थी। यह भी देखा गया है कि हमारी क्षेत्रीय गालियां भी स्त्री अंगों और उनसे कथित रूप से जोड़ ली गई नातेदारियों से ही संबद्ध रहती हैं। विभिन्न प्रकार के वाद.विवाद में जनसामान्य के बीच एक.दूसरे से नाता जोड़ने की भी बात सुनी जा सकती है।

ऐसे हालातों में प्रश्न यह उठता है कि आखिर इज्जत का ठीकरा महिलाओं के सिर फोड़कर हम क्यों उन्हें पुरुषों का शिकार बनने देते हैंघ् इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों का दो वर्ग अलग.अलग राय रखता है। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो यह स्पष्ट कहता है कि सामाजिक मानसिकता के अनुसार महिलाओं को ही घर और परिवार की इज्जत कहा जाता है। इसीलिए जब किसी व्यक्ति को परिवार पर आघात करना होता है तो वह उसकी ष्इज्जतष् यानि महिला को ही अपना निशाना बनाता है। पारिवारिक कलह और रंजिश का बदला लेने के लिए महिलाओं के साथ ही यौन हिंसा की जाती हैए क्योंकि महिला ही परिवार की कथित इज्जत है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार काफी हद तक उनके सिर मढ़ी गई इज्जत ही है।

वहीं बुद्धिजीवियों के दूसरे वर्ग में शामिल लोगों का स्पष्ट कहना है कि यद्यपि महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अत्याचार बेहद दुखद हैं लेकिन इनका संबंध परिवार या समाज की इज्जत से ना होकर उनकी कमजोर शारीरिक अवस्था से है। पुरुष अपनी भड़ास निकालने के लिए महिलाओं को इसीलिए निशाना नहीं बनाते क्योंकि वे परिवार की इज्जत हैं बल्कि उन्हें इसीलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं और उन्हें आसानी से दबाया जा सकता है। पुरुषों द्वारा पुरुषों पर अत्याचार इसीलिए कम किया जाता है क्योंकि समान ताकत की बात हो जाती है।

इसीलिए वे परिवार या समाज की महिलाओं पर ही अपना रोष निकालते हैं। वहीं ऐसा करने का दूसरा कारण यह भी है कि महिलाओं को निशाना बनाने से उनसे संबंधित पुरुष टूट जाते हैंए मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं जो अपने आप में एक अचूक हथियार है। पुरुषों द्वारा महिलाओं को बस इसीलिए निशाना नहीं बनाया जाता क्योंकि वे उन्हें इज्जत मानते हैं बल्कि इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वे परिवार की सबसे कमजोर हिस्सा होती हैं जिन पर वार करना आसान होता है।

06 April 2013

मुलायम की चाहत और सियासी चालबाजी !

राजनीति में वह ताकत है जो होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी में बदलने का माद्दा रखती है। राजनीति में कभी कोई स्थाई विरोधी और स्थाई दोस्त नहीं होता। कब क्या होगा यह कोई नहीं जानता। कल तक एक दूसरे की आलोचना करने वाले राजनेता कब एक दूसरे का समर्थन करने लगें इसे भी कोई नहीं जनता। लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति अवसरों को भुनाने का सुपर एक्शन खेल है। जो इस खेल के हर बिशात को समझ जाता है केन्द्रिय राजनीत की चाभी उसी के हाथ में होती है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव राजनीत के इस खेल के एक ऐसे ही खिलाडी है जिसकी हर चाल के अपने आप में एक अलग मायने होते है। वो कब किस के साथ होंगे ये समझना किसी के बस की बात नहीं होती। वक़्त से साथ अपने रुख को कैसे बदलना है ये मुलायम सिंह यादव बेहतर भला कौन समझ सकता है ? यही कारण है कि कल तक कांग्रेस के संकटमोचक रहे मुलायम आज उसके लिए चिंता का विषय बन गए हैं। कांग्रेस को डर है कि कहीं सपा उससे अपने समर्थन वापस न ले। दरअसल मुलायम सिंह की खासियत ही यही है कि वो जब भी अपनी चाल चलते है तो हुकुम का इक्का अपने हाथ में रखते है। यही कारण है कि क्या साथी और क्या विरोधी ? सभी सब कुछ जान कर भी मुलायम का खुला विरोध नहीं कर पाते। मौजदा दौर में कांग्रेस अपनों में उलझी है एक-एक करके उसके सभी साथी उसका साथ छोड़ रहे है, ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास अपनी सरकार बचाने के लिए सिवाए सपा की बातों को मानने के आलावा कोई चारा नहीं है। हलाकि बसपा एक विकल्प के तौर पर है लेकिन कांग्रेस अच्छी तरीके से जानती है कि सिर्फ बसपा के दम पर वो अपनी सरकार नहीं बचा पायेगी इसलिए वो सपा की हर जायज  ना-जायज बातों को मान रही है। 

जिसकी बानगी पिछले दिनों देखने को मिली जब बेनी के बयान पर सपा ने लोकसभा में हंगामा किया और उनके इस्तीफे की मांग की। सपा अच्छी तरह से जानती थी की अपने सहयोगियों से परेशान कांग्रेस हर कीमत पर सपा को मनायेगी कि वो बेनी के इस्तीफे मांग छोड़ दे और हुआ भी यही, चलते सदन में कांग्रेस प्रमुख ने मुलायम के पास जाकर उनसे बेनी के इस्तीफे की मांग न करने का अनुरोध किया जिसे सपा प्रमुख ने मान लिया। हालाँकि एक बार फिर बेनी ने मुलयम के खिलाफ तल्ख़ टिपण्णी की है। एक बार फिर सपा ने उनका इस्तीफा माँगा है पर अंततः परिणाम फिर वही होंगे जो पिछली बार हुए। कांग्रेस सपा को मनायेगी और सपा मान भी जाएगी। दरासल बेनी का इस्तीफा तो सपा भी नहीं चाहती थी, सपा तो ये बताना चाहती थी कि तुम क्या तुम्हारी पार्टी प्रमुख भी हमारे सामने झुकेगी जो वो लगातार करके दिखा रही है । समर्थन वापसी के डर चलते कांग्रेस लगातार सपा के दबाव में आ रही है। यही कारण है कि पिछले एक महीनो कई बार सपा प्रमुख ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ तल्ख़ टिपण्णी की और कांग्रेस उसे सुनती आई। अधिकृत तौर पर कांग्रेस का कोई भी नेता मुलायम की टिप्पड़ी के खिलाफ खुलकर नहीं बोल रहा है पर अनधिकृत तौर कांग्रेस ने बेनी वर्मा आगे कर दिया है। बेनी लगातार बयानबाजी कर रहे है। दरअसल कांग्रेस की रणनीत है कि जब तक यूपी में कांग्रेस लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत न हो जाये बेनी अघोषित तौर पर पार्टी के लिए सपा के खिलाफ बयानबाजी करते है ताकि मुस्लिम मतदाताओ में सपा की छवि कुछ हद तक ख़राब हो। 

मुलायम कांग्रेस की इस रणनीत का बखूबी समझ रहे है। यही कारण है कि जब भी केंद्र की कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी की बात आती है मुलायम सांप्रदायिक शक्तियों के नाम कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लेने से इनकार कर देते है। दरसल मुलायम इस बात को अच्छी तरीके से समझ रहे है कि यदि अभी केंद्र से समर्थन वापस लिया गया तो राजनैतिक रूप से सपा का नुक्सान होगा और उस पर एक धर्मनिरपेक्ष सरकार गिराने की तोहमत लगेगी जो सपा पर बेनी के लगाये आरोपों को प्रमाणित करेगा। इसलिए राजनीत में 60 बरस बिताने वाले मुलायम अभी समर्थन वापसी के पक्ष में नहीं है। मुलायम जानते है कि लोकसभा चुनावो के हिसाब से अभी सपा यूपी में तैयार नहीं है। यूपी में स्थापित उनकी सरकार कानून व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से विफल है। मुलायम की दृष्टि यू.पी. की बिगड़ती कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार से उपजी सरकार विरोधी आवाजों को पहचान रही है। वे अच्छी तरह जान गए हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव सपा के लिए सरल नहीं हैं। यदि यही स्थिति रही तो उनकी हार निश्चित है। वे यह भी जानते हैं कि चुनाव की दृष्टि से केन्द्र सरकार की नाकामियों, भ्रष्टाचार और घोटालों के कारण कांग्रेस की स्थिति दयनीय है। पिछले साल हुए यू.पी. विधानसभा चुनावों में युवराज राहुल गांधी के धुआंधार प्रचार के बाद भी कांग्रेस की शर्मनाक पराजय को भी वे अच्छी तरह जानते हैं।

 वे यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि राज्य की बिगडती कानून व्यवसथ के चलते वर्तमान में यू.पी. में भाजपा की स्थिति मजबूत होती जा रही है और सपा के खिलाफ बड़ा चुनवी मुद्दा भाजपा के हाथ में है जिसका लाभ भाजपा को लोकसभा चुनावों में मिलना तय है। ऐसी स्थिति में अभी केंद्र सरकार को गिरना कही न कही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। इसलिए अब वो यूपी में सपा का बिगड़ता जनाधार सँभालने में लगे हुए है। और इसके लिए उनका सबसे मुफीद हथियार साम्प्रदायिकता है। इसलिए वो लगातार ऐसी बयानबाजी कर रहे है जिसका सीधा असर मुस्लिम वोट बैंक पर हो। इसी क्रम में उन्होंने उतर प्रदेश की बिगडती कानून व्यवस्था को मीडिया का दोगलापन करार देते हुए उसे दिल्ली और गुजरात की कानून व्यवस्था से जोड़ते है। वस्तुतः मुलायम की यह पैंतरेबाज़ी एक तीर से दो निशाने लगाने वाली है। एक तरफ जहाँ वो दिल्ली की कांग्रेस सरकार के खिलाफ बने महौल को भुनाना चाहते है वो वही दूसरी तरफ गुजरात को जोड़कर मुस्लिम मतदाताओ में ये जता रहे है कि किस तरह मीडिया जान बूझकर सांप्रदायिक शक्तियों को मजबूत कर रही है। उनकी कोशिश है कि साम्प्रदायिकता की धार को प्रदेश में इतना मजबूत कर दिया जाये कि आगमी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा के खिलाफ बिगडती कानून व्यवस्था को विपक्ष चुनावी मुद्दा न बना पाए । वो चाहते है की उत्तर प्रदेश का लोकसभा चुनाव साम्प्रदायिकता के ऐसे चूल्हे पर सेका जाये जहाँ से उत्तर प्रदेश के मुलिस्मो के वोटो को पूरी तरह से सपा के लिए केन्द्रित किया जा सके।

 और जब तक पूरी तरह से यूपी में सिक नहीं जायेगा  मुलायम केंद्र की कांग्रेस सरकार अपना समर्थन वापस नहीं लेंगे। अब देखना ये होगा कि प्रदेश में साम्प्रदायिकता को मजबूत करने की मुलायम ये कोशिश लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलाती है? और मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश से सपा के लिए कितनी सीट निकाल पाते हैं ? रही बात मुलायम के तीसरे मोर्चे की। तो मुलायम ये बात अच्छी तरह से समझ रहे है कि मौजूदा दौर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ है एक तरफ जहाँ आम जनता कांग्रेस की महंगाई और भ्रष्टाचार से उबी है तो वही दूसरी अल्पसंख्यक वर्ग भाजपा के मोदी प्रेम के चलते उससे अलग हो जायेगा। ऐसे में उन्हें अपनी बरसो पुरानी हसरत पूरी होती दिख रही है। हसरत इस देश का प्रधानमंत्री बनने की। उन्हें लग रहा है कि अगर इस मौके को भुनाया जाये तो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुचना आसन होगा। मुलायम जानते है कि प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना तीसरे मोर्चे की सरकार आने पर ही पूरा हो सकता है इसलिए वो लगातार जनता के सामने तीसरे मोर्चे को विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है। हालाँकि ये कोई पहली बार नहीं हो रहा जब तीसरे मोर्चे को राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प बनाने के प्रयास किये जा रहे हो इससे पहले भी कई बार तीसरे मोर्चे को राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिशे वामपंथी दलों विशेषकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में की गयी जो हर बार विफल रही। 

तीसरे मोर्चे के गठन की अब तक कवायद पर गौर करे तो पता चलता है जब भी इस तरह की जब भी कोई कोशिश हुई, वो कोशिश मुह के बल गिरी। १९९६ में जब अटल सरकार अल्पमत में आ गयी तो वामपंथी पार्टियों ने छोटे दलों को जोड़ कर तीसरे मोर्चे का गठन किया। कांग्रेस और सी.पी.एम ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया जबकि प्रमुख वामपंथी पार्टी सी.पी.आई सरकार में शामिल हुई और एच.डी देवगौड़ा के नेतृत्व में केंद्र में तीसरे मोर्चे ने सरकार बनायीं किन्तु देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पायी और देवगौड़ा की जगह पर तीसरे मोर्चे ने इंद्र कुमार गुजराल को देश का प्रधानमंत्री बनाया पर गुजराल की सरकार भी ज्यादा नहीं चल पायी और तीसरे मोर्चे की यह सरकार लगभग दो साल के कार्यकाल में ही सिमट कर रह गयी। वर्तमान दौर में मुलायम की जो तीसरे मोर्चे को स्वरुप में लाने की चाहत उभरी है वो वस्तुतः १९९६ की इसी घटना की देन है जब एच.डी. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद लेफ्ट के सपोर्ट से मुलायम सिंह प्रधानमंत्री पद के बेहद नजदीक पहुंच गए थे पर अपने ही समाजवादी नेताओं की यादवी लड़ाई में मुलायम उस समय पीएम बनते-बनते रह गए और आइ.के. गुजराल पीएम बन गए। अप्रैल १९९७ की वो कसक सपा प्रमुख के दिल में अभी तक है और उन्हें लगता है की अब वो समय आ गया जब उनका १५ साल पुराना सपना पूरा हो सकता है इसीलिए वे राष्टीय स्तर पर इस कोशिश में लगे है कि सभी छोटे दलों को मिलाकर तीसरे मोर्चे का गठन किया जाये।

 हलाकि की तीसरे मोर्चे के गठन की सम्भावना काफी कम दिखती है क्योकि संभावित रूप से तीसरे मोर्चे में शामिल होने वाले दलों की अपनी अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा है लेकिन फिर भी चूँकि राजनीत अंतहीन समझौतो और संभावनाओ का खेल है इसलिए अभी से कुछ भी कहना सही नहीं होगा। पर इतन तय है कि तीसरा मोर्चा की सरकार न आने की स्थिति में भी मुलायम सत्ता के लिए अपना मोह नहीं छोड़ पाएंगे और जरुरत पड़ने पर वो भाजपा के साथ भी जायेंगे जिसका इजहार वो आडवानी प्रेम के रूप में कर चुके हैं।

आधुनिक प्रेम और यौन-अपराध का संबंध !

भारतीय समाज में प्रेम की अवधारणा जितनी पवित्र और मासूम मानी गई है आज उस अवधारणा को उतना ही कलंकित किया जा रहा है. प्रेम को किसी समय में आत्मिक रूप देकर उसकी पवित्रता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता था वहीं आज प्रेम को आत्मा से विलग करके देह के आसपास केन्द्रित कर दिया गया है. प्रेम को लेकर जैसे ही बात की जाती है उसके निहितार्थ शरीर से, शारीरिक संबंधों से लगाने शुरू कर दिए जाते हैं. हमारा वास्तविक समाज हो या फिर फिल्म की काल्पनिक दुनिया, सभी में प्रेम को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि यदि युवा लड़के-लड़कियों ने आपस में प्रेम नहीं किया तो उनका जीवन व्यर्थ. अपने जीवन की इसी व्यर्थता को रोकने के लिए ही युवा प्रेम संबंधों के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं और कहीं न कहीं इसी भटकन में वे अपने आपको अपराधों की तरफ ले जाते हैं. इस बात को पूर्वाग्रह मुक्त होकर देखा जाना चाहिए और समझना चाहिए कि समाज में किस तरह से सेक्स की अवधारणा को प्रतिष्ठित किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके साथ ही इस बात को भी समझना चाहिए कि जिस समाज में सेक्स को सर्वोपरि रखकर युवाओं के सामने पेश किया जा रहा हो वहां प्रेम की सात्विक अवधारणा कैसे बरकरार रह सकेगी? टीनएजर्स आज बुरी तरह से इस रोग से पीड़ित दिखाई देते हैं. स्कूली छात्र-छात्राओं को गलबहियाँ करते हुए, आपत्तिजनक स्थितियों में आसानी से देखा जा सकता है. 

यही उन्मुक्त वातावरण और स्वछन्द सोच ऐसे युवाओं को शारीरिक संबंधों की तरफ ले जाता है. कई बार सहमति से और कई बार असहमति होने पर जबरन शारीरिक संबंधों की परिणति इन युवाओं के द्वारा होती देखी जाती है. शारीरिक संबंधों को किसी भी कीमत में पाने की कोशिश जाने-अनजाने युवाओं को प्रेम-अपराधों की तरफ मोडती है. हमारे आसपास एक-दो नहीं कई-कई उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे युवाओं ने प्रेम संबंधों के नाम पर गैंग रेप को, रेप को अंजाम दिया है. ऐसा नहीं है कि प्रेम के सभी मामलों में ऐसा ही होता है, ऐसा भी नहीं है कि सभी युवा प्रेम के नाम पर अपराधों को अंजाम देते हैं पर जिस तरह का माहौल आज बनता जा रहा है उसके चलते निरपराध प्रेम सम्बन्ध देखने को न के बराबर मिल रहे हैं. प्रेम संबंधों के चलते होने वाले अपराधों को रोकने के लिए समाज में सेक्स से ज्यादा सकारात्मक प्रेम संबंधों की अवधारणा को पुष्ट करने के प्रयास किये जाने चाहिए. युवाओं में इस बात का सन्देश दिया जाना चाहिए कि प्रेम गलत नहीं है, प्रेम की विकृति गलत है. प्रेम के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सेक्स-प्राप्ति की चाह रखना, उसे पोषित करना गलत है. इस तरह की अवधारणा को रोकने से ही प्रेम-अपराधों पर रोक लग सकेगी.

नरेंद्र मोदी बनाम भाजपा की रणनीति !

भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है, यह अनुमानों के अनुसार ही था। जैसा कि सभी को पहले से पता था कि इस बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी को शामिल किया जाएगा। मोदी को ना सिर्फ इस शीर्ष समिति में शामिल किया गया बल्कि उनके नजदीकी गुजरात के गृहमंत्री रहे अमित शाह को शामिल किया जो कथित तौर पर सोहराबुद्दीन फर्जी इनकाउंटर मामले में लिप्त हैं और कोर्ट में इस संबंध में केस चल रहा है। एक बार तो शाह को राज्य से बाहर यानि की तड़ीपार भी किया गया था। अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है। शाह, मोदी के सबसे प्रमुख विश्वासपात्रों में से एक हैं। बिडंबना देखिए कि राजनाथ सिंह ने ही छह साल पहले नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए पार्टी की केंद्रीय समिति से बाहर कर दिया था कि जब कोई अन्य मुख्यमंत्री समिति में नहीं हैं तो मोदी क्यों? लेकिन इस बार तो सब कुछ जैसे मोदीमय लग रहा है। वैसे भी पुरानी कहावत है कि समय होत बलवान जगत में, समय होत बलवान। और अभी मोदी सभी पर भारी पड़ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर मीनाक्षी लेखी को लाया गया है जो मोदी की धुर प्रशंसक हैं और उनकी तरफ से विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर बहस हिस्सा लेती रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा इस बार फिर से अपने पुराने राग पर लौट आई है, लेकिन इस बीच पार्टी का चाल,चेहरा और चरित्र पूरी तरह से बदल चुका है और वह सत्ता प्राप्त करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाना चाहती है चाहे वह कथित तौर पर कट्टर हिदुत्व का मामला हो या कोई और। भाजपा की केंद्रीय समिति में वरुण गांधी, उमा भारती जैसे चेहरों को शामिल करके पार्टी यही संदेश देना चाह रही है।


केंद्रीय समिति में बिहार से नीतीश कुमार के आलोचक और पूर्व बिहार भाजपा अध्यक्ष और प्रसिद्ध चिकित्सक सी.पी.ठाकुर को शामिल करके पार्टी ने नीतीश कुमार को स्पष्ट तौर पर संदेश दे दिया है। बिहार से ही मोतिहारी के सांसद, राधामोहन सिंह को पार्टी अनुशासन समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। जबसे नरेंद्र मोदी ने गुजरात में तीसरी बार सफलता हासिल की है तभी से भारतीय जनता पार्टी में उनका कद लगातार बढ़ता जा रहा था। मोदी ने गुजरात में 2002 में हुए गोधरा दंगों को भूलाकर गुजरात को विकास की नई पटरी पर खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है और इसे उनके घोर विरोधी भी स्वीकार करते हैं। हां, ये बात अलग है कि हरेक राजनीतिक दल की तरह उनकी कृपा भी अन्य उद्ममियों की अपेक्षा में एक विशेष समूह अडानी समूह पर ज्यादा बनी रही और उनके शासन के दौरान यह देखने आया कि अडानी समूह ने बड़ी तेजी के साथ हर क्षेत्र में विकास की। चाहे वह बिजली परियोजना हो या कोई और अडानी समूह का हस्तक्षेप हर जगह है, दूसरे उद्ममियों को भी गुजरात ने इस बीच अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पश्चिम बंगाल के सिंगुर विवाद के बाद टाटा को अपनी फैक्ट्री लगाने के लिए नरेंद्र मोदी ने हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने में सहयोग किया। आज गुजरात में भरपूर बिजली मिल रही है और इसका परिणाम यह है कि हर उद्ममी के लिए वह प्राथमिकता सूची में पहले स्थान पर कायम है। 
 
गुजरात में नरेंद्र मोदी विकास के लाख वादें करें लेकिन राज्य में कुपोषण की दर काफी है, ऐसा लगता है जैसे प्रमुख शहरों में दिन-रात चमकती बिजली और औद्योगिकीरण के बाद राज्य के दूर-दराज और गांवों में रहने वाले लोगों की अपेक्षा हुई है। जैसा कि दिल्ली और अन्य राज्यों के महानगरों में भी देखने को मिलता है। बड़ी-बड़ी सड़के और अट्टालिकाओं के बीच मध्यम वर्ग और गरीब तथा झोपड़ियों में रहने वालों की सुध लेना नेताओं के लिए जरूरी नहीं रह गया है। जब-जब कांग्रेस पार्टी और अन्य दल नरेंद्र मोदी और गोधरा कांड की चर्चा करते हैं, तब-तब नरेंद्र मोदी के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण तेजी से होता है। दूसरी पार्टियां जहां मुस्लिम वोटों के लिए गोधरा कांड को चर्चा में बनाए रखना चाहती है तो इसी कारण से कांग्रेस को तीसरी बार गुजरात में हार का सामना करना पड़ा है। हाल के दिनों में यह देखने को मिला है कि नरेंद्र मोदी के या तो पक्ष में बातें की जाती है या उनके धुर विरोध में, लेकिन चर्चा का केंद्र मोदी ही रहते हैं। राजनाथ सिंह भली-भांति से इस स्थिति को समझते हैं और उन्होंने पार्टी की नैया पार लगाने के लिए नरेंद्र मोदी पर दांव लगाने का निर्णय लिया है। नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए के कुछ घटक दल नाराज हो सकते हैं, लेकिन आज की परिस्थिति में भाजपा के लिए यह भी उचित नहीं है कि वह नमो यानि नरेंद्र मोदी को नकार सके।
 
बिहार में जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी का संयुक्त गठबंधन शासन कर रहा है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धमकी देते रहे हैं कि वे नरेंद्र मोदी को आगे करने पर पार्टी के साथ अपना गठबंधन तोड़ देंगे, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा है। हां, पर्दे के पीछे से नीतीश कुमार कांग्रेस के साथ जरूर गलबहियां कर रहे थे, जिसका परिणाम बजट सत्र के दौरान दखने को मिला जब नीतीश कुमार ने केंद्रीय बजट को सराहा और वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने विशेष राज्य के दर्जा के लिए जरूरी बदलाव के संकेत दिए। लेकिन यह बात नीतीश कुमार को अच्छी तरह से पता है कि मौजूदा समय में बिहार और देश में कांग्रेस की हालत अच्छी नहीं है और देश भर में कांग्रेस के खिलाफ एक लहर सी है। यूपीए-2 के दौरान आए दिन भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले। यहां तक कि पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री और डीएमके के नेता ए.राजा ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले का बारे प्रधानमंत्री को सारी बातें मालूम थीं और प्रधानमंत्री कार्यालय में विशेष सचिव पुलक चटर्जी भी सारी बातों से अवगत थे, तो फिर प्रधानमंत्री ने पूरे देश के सामने झूठ बोला कि उन्हें हकीकत मालूम नहीं था, जबकि स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। सभी ने देखा कि किस तरह से डीएमके के द्वारा समर्थन वापस लेने के अगले ही दिन सीबीआई या दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन ने किस तरह से डीएमके प्रमुख करुणानिधि के पुत्र स्टालिन के बेटे के घर पर छापा मारा और छापा मारने का कारण दो महीने पहले खरीदी गई विदेशी गाड़ी पर आयात शुल्क ना चुकाना कारण बताया गया। 

सीबीआई छापे से केंद्र सरकार मायावती और मुलायम को संदेश देने में कामयाब रही, क्योंकि दोनों नेताओं के खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति का मामला सीबीआई के यहां लंबित है। छापे का परिणाम यह हुआ कि मायावती और मुलायम ने अपना समर्थन जारी रखने का एलान कर दिया। यह केंद्र सरकार के लिए राहत की ख़बर थी क्योंकि केंद्र सरकार डीएमके के समर्थन लेने के बाद से अल्पमत में चल रही है और उसे बचाए रखने के लिए मायावती, मुलायम के समर्थन की बेहद जरूरत है। देश भर में मंहगाई और भ्रष्टाचार के कारण सत्ताधारी दल के विरुद्ध माहौल बन रहा है लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि विपक्षी पार्टियां इस माहौल को अपने पक्ष में किस तरह से भुनाती हैं, क्योंकि विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों में भी अच्छी स्थिति नहीं है। अब नरेंद्र मोदी के सामने आने वाले विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है। पार्टी में एकमात्र वे ऐसे नेता हैं जिनका कद राज्य के बाहर है और उनमें वोटों के ध्रुवीकरण की क्षमता भी है।
कर्नाटक और दिल्ली विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव नमो के लिए एक परीक्षा की घड़ी है और पूरे देश पर इसका असर पड़ने की संभावना है। वैसे सभी दलों की नज़र यूपी में अधिक से अधिक लोकसभा सीट लाने पर है, क्योंकि यूपी में 80 लोकसभा सीट है और जो भी पार्टी यहां अच्छा प्रदर्शन करेगी। आगामी सरकार के गठन में उसकी भूमिका निश्चित तौर पर निर्णायक होगी। 

मुलायम सिंह यादव ने साल भर पहले से इस संबंध में तैयारी शुरू कर दी है और पार्टी प्रत्याशियों के नाम भी घोषित कर दिए हैं, लेकिन हाल के दिनों में यूपी में प्रशासन की कमजोरी और दंगों के भड़कने से समाजवादी पार्टी का मुस्लिम वोट प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से सौदेबाजी के लिए एनडीए के शासन को बेहतर तक बता डाला। सपा का एकमात्र मकसद कांग्रेस से अधिक से अधिक वित्तीय मदद झटकना है जिससे कि अखिलेश सरकार विभिन्न योजनाओं को पूरा कर सके और आगे के लिए संभावना भी बनाई रखी जा सके। यानि कि दोनों हाथों में लड्डू, लेकिन यह कई बार भारी भी पड़ता है जैसा कि पहले कल्याण सिंह और साक्षी महाराज का सपा में शामिल करके पार्टी भुगत चुकी है, लेकिन पहलवान मुलायम सिंह कब कौन पैंतरा बदल दें, ये तो वही जाने। आखिर में वे कुश्ती के पुराने खिलाड़ी रहे हैं और राजनीति में दांव-पेंच बहुत मायने रखता है। खैर, हम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा आगामी चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे और अभी देखना बाकि है कि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है। यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

दुनिया की मजा लेलो ये दुनिया तुम्हारी है !

एक तरफ गुजरात के सौराष्ट्र का पूरा इलाका और महाराष्ट्र भीषण सूखे की चपेट में है. वहीँ आसाराम बापू का नया शिगूफा सुनिए. उन्होंने भरी सभा में कहा है कि वे चमत्कारी हैं. जहां चाहे वहां पानी बरसा सकते हैं. एक तरफ गुजरात का सौराष्ट्र और दूसरी तरफ महाराष्ट्र दोनो जगह भीषण सूखे की चपेट में हैं. बावजूद इसके आसाराम ने अपने भक्तों पर होली के बहाने जमकर पानी की बर्बादी की. जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि वे सूखाग्रस्त इलाके में जब चाहे तब पानी बरसवा सकते हैं.  आसाराम ने गुजरात में अपने भक्‍तों के साथ होली मनाते हुए अपनी सारी सीमाएं लांघ दीं. इस दौरान उन्होंने मीडियावालों की तुलना कुत्तों से भी की. साथ ही कहा कि हम किसी सरकार के बाप से पानी नहीं लेते. गौरतलब है कि 40 साल के सबसे भीषण सूखे से संघर्ष कर रहे महाराष्ट्र की सरकार ने आसाराम से सिर्फ इतना कहा था कि लोग प्यास से मर रहे हैं, आप होली के नाम पर पानी ऐसे मत बहाइए और पानी देने से मना कर दिया था. इस पर आसाराम का पारा चढ़ गया था. उन्होंने आध्यात्मिक संत की परम्परा को ताक पर रख कर एक सड़क छाप की तरह व्यवहार किया.  मीडिया पर निशाना साधने के दौरान अपने आप को बापू कहते हुए आसाराम कहते हैं कि बापू मूंग दल रहे हैं और कुत्ते भौंक रहे हैं. इतना ही नहीं गुजरात और महाराष्ट्र के सूखे को नजरअंदाज करते हुए आसाराम कहते हैं कि भगवान मेरे साथ हैं, मैं तो दिल खोल के रंग बरसाऊंगा. उन्होंने खुद के पास चमत्कारिक शक्ति होने का दावा किया. इतना ही नहीं भगवान को अपना यार बता डाला. उन्होंने कहा कि हम तो ‘यार’ के पानी से रंग बरसाते हैं. जहाँ भी सुखा पड़ रहा होता है हम वहां पानी बरसवा देते हैं…!

इन सब बातों को सुनकर एक आम आदमी जो आसाराम की अंधी भक्ति करता है वो और भी अन्धविश्वासी हो जाएगा. क्योंकि उसे लगता है कि बाबा सब कुछ कर सकते हैं. क्या खूब आसाराम का कमाल है. मुझे तो हँसी आती है ऐसे ढोंगियों की बातों पर….क्या खूब मजाक है हमारे देश मे अलादीन का चिराग है और हम लोगो को खबर नही. आसाराम को तत्काल महाराष्ट्र और देश के अन्य सूखाग्रस्त राज्यों मे जाकर बारिश करवानी चाहिये. आसाराम के होते हुए इस देश मे सूखे की वजह से देश मे इंसानो और जानवरो की भूख से मौत हो रही है ? वाह, आसाराम कभी भी बारिश करवा सकता है मगर लगता है दिमाग और आंख से कमजोर है जो सूखाग्रस्त इलाके इसे नजर नही आ रहे. दोष बापू का नही, बापू के अन्धे भक्तो का है, अनपढ और अज्ञानी की फ़ौज को सामने खड़ा करके बापू यह भूल कर रहे है कि उसकी लाठी मे आवाज नही होती है. फिर यह ना कहना की अरे क्या हुआ हमारे यार ने ही तो लाठी मारी है. आसाराम जी आप संत का मतलब जानते हो या यूँ ही आम जनता को बेवकूफ बना रहे हो ....!

 स्व अंत जो अपने यानी उसके पास अपना कहने के लिये परिवार,घर, धन संपदा यहा तक कि शरीर भी अपना न माने उसे संत (अपभ्रंश) बोलते है. ढोंग पाखंड पर आधारित धर्म व्यवसाय करने वाला,क्रोध-लोभ-मोह से युक्त सांसारिक लाभ लेने वाला तुम्हारी तरह स्वयंभू संत कोई और न होगा. आसाराम बापू की उम्र कितनी है यह तो पता नही लेकिन उनके आये दिन आये बयानों को  सुन कर ऐसा लगता है की वो पूरी तरह से ये भूल चुके हैं कि वो एक मनुष्य मात्र हैं. और एक भारतीय परिवेश में निवास करते हैं.आसाराम क्या कहते है उसका भी उसे भान नही है, कभी-कभी मुझे तो उन लोगो पर भी तरस आता है जो इस सत्य के मार्ग से भटके हुए के पीछे दौड़ते है, संत कौन होता है ? उसका जीवन कैसा होता है ? हिन्दू या मुसलमान दोनो में संतो और सूफ़ियों की परम्परा रही है जो आम लोगों के दुख-दर्द और मुश्किल में सही राह बताते हैं जिससे उनका दुख कुछ कम हो और वे संकटों का धैर्य से मुकाबला कर सकें. सच्चे संत का जीवन आडंबर रहित, सदा और अहंकार से मुक्त होता है. आज के संत बड़े-बड़े आश्रम-बंगले बना कर बैठे हैं, आलीशान कारों में घूमते हैं और अपने ही बेटों-बेटियों को उत्तराधिकारी बना देते हैं जिससे उनका अपार धन उनके पास ही रहे. या सारे ढोंगी-धूर्त लोग होते हैं जो दिखाने के लिये थोड़ा जन-कल्याण का काम करते हैं लेकिन सबसे बड़ा हिट उनका खुद का स्वार्थ साधना होता है. 

ऐसों को ईश्वर कभी माफ नहीं करता और हम आपने सामने ही इनकी दुर्गति देख सकते हैं. जनता ने अंधभक्ति नहीं बल्कि विवेक और समझदारी से काम लेना चाहिये. जिस दिन आचार्य रजनीश ने अमेरिका में अपने आप को भगवान होने की घोषणा की थी उसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी सरकार ने रजनीश को लात मारकर भगा दिया था,उनके भक्तों की आंखे भी खुल गयी सभी उन्हें छोड् कर चले गये । वहां से उनका पतन चालू हो गया था जो उनके अंत के साथ समाप्त हो गया ।इसका भी अंत निकट है क्योंकि इसने भी अहं ब्रम्हास्मी रूप मिथ्याहंकार की घोषणा कर दी है । देखा जाए तो प्राचीन काल के संतों के पास ना तो कोई फोज थी ना उनके पास कोई क़िला या महल था जबकि उनसे पहले के लोगो की निशानियाँ मिस्र मे भरी पड़ी है जो मालदार थे ओर अपनी पूजा करवाते थे ना उन्होने कभी यह कहा की उनकी तो अल्लाह से यारी है वो बारिश करा देंगे बस उन्होने एक सीधा ओर सच्चा रास्ता दिखाया था  लेकिन आजकल के बाबा सारे महलों मे रहते है जिसे चाहता है कुत्ता बोलते है जिसे चाहता है उड़वा देते है.कारों का काफिला साथ चलता है ओर हम जेसे भोले भाले लोग 10/ 10रू चंदा देकर इन बाबा लोगों को अरबपति बना देते है ओर फिर नीचे खड़े होकर अपने ही पेसों का रंग डलवा कर खुश हो जाते है…! 

जो लोग इस चोर पाखंडी को समर्थन करते हैं वो लोग पानी की इस तरह बर्बादी छोटे बच्चो की हत्या, उनके आश्रम मे सेक्स स्कॅंडल, समगलिंग इन सब चीजो को भी समर्थन कर रहे हैं.. यह विशुद्ध धर्म व्यवसायी है. अंधभक्तो का हुजूम इसे ईश्वर का पर्याय समझता है. ढोंगी इस देश को लूटते आये और मूर्खो की बहुलता से लूटते रहेगे. और एक बात इन्हे संत की पदवी किसने दी या तो ए स्वाएंभु संत हो गये है या किसी बेवकूफ ने ही संत की पदवी बहाल की होगी, और यह संत जो इतनी मस्ती मे बात करता है तो इसकी सरकार ने भी इंक्वाइरी करना चाहिये. सच तो यह है कि हमें बेसिरपैर की बातें और बकवास सुनने में मजा आता है और हम भी अपने जीवन में किसी चमत्कार की आशा करने लगते हैं..!

अगर सच ही बरसात करवाना किसी के हाथ में होता तो दुनिया में कभी अकाल नहीं पड़ता…सूखा भी नहीं पड़ता और सूखे से लोग कभी मरते नहीं ऐसी बातों की उपेक्षा कीजिये.आज से पहले भी ऐसे बहुत से लोग हुये है जिन्हे यह भ्रम था की वे भगवान है. परंतु न वे भगवान थे और न यह भगवान है. यह हम लोगों की बेफकूफी है कि हम इन लोगों के सामने नतमस्तक होकर इन लोगों को इस प्रकार भ्रम में डूबने देते है. आसाराम का भ्रम भी दूर हो जायेगा बस जरूरत है कि अपने आपको पहचानो और अंधभक्ति में न पड़ो. भारत मे बेवकूफो की कोई कमी नहीं है इसीलिये ये धर्म के ठेकेदार लोगो को बेवकूफ बनाते है ये देखकर मुझे शमशाद बेगम का वो गाना याद आता है “दुनिया की मजा लेलो दुनिया तुम्हारी है, दुनिया को लात मारो दुनिया सलाम करे ”