20 December 2013

क्या हो अमेरिकी दादागिरी का जवाब ?

अमेरिका की दादागिरी से देश एक बार फिर से उबाल पर है। हर तरफ अमेरिका विरोधी नारे गुंज रहे हैं। बीते कुछ सालों में अमेरिकी ने जिस कदर भारत के अंदर और बाहर अपनी वर्चस्व दिखा रहा है उसको लेकर कई अहम सवाल भी खड़े होने लगे हैं। अपने आप को दुनिया का दादा बताने वाला अमेरिका आज अपनी टुच्ची हरकतों को लेकर मौन है। उसे न तो कोई जवाब सुझ रहा है और नहीं कोई उपाय। अमेरिका की अतिवादीता से आज देश ये मांग कर रहा है कि अब समय आ गया है कि अमेरिका की दादागिरी का जावब उसी अंदाज में दिया जाय, जिस अंदाज में अमेरिका अपने आप को दुनिया के सामने दिखाता है। साथ ही इस मिथक को भी तोड़ने की मांग सड़क से लेकर संसद तक उठने लगी है। बात चाहे देवयानी खोबरागड़े, जार्ज फर्नांडीज, एपीजे अब्दुल कलाम, प्रफुल्ल पटेल, राजदूत मीरा शंकर की या फिर देश के जाने माने हस्तियों की। हर बार अमेरिका अपने आप को भारत के सामने सुपरपावर होने का दंभ भरता है और भारत इसके आगे दोस्ताना रिस्ते की बात कह कर हर बार इसे नज़र अंदाज कर देता है। मगर आज बात एक नारी की इज्जत का है इसलिए हिन्दुस्तान का जनमानस अमेरिकी दादागिरी को डिकाने के लिए तत्पर दिख रहा है।

अमेरिका अपने स्टैण्डर्ड प्रोसीजर का हवाला देकर देवयानी खोबरागड़े की तलाशी  की बात कर रहा है। अमेरका ने पहले देवयानी खोबरागड़े की अर्धनग्न तलाशी ली फिर उसके बाद नशेडडि़यों और देहव्यापार करने वाली औरतों के साथ हवालात में रखा। जबकी वियना समझौते के मुताबिक ऐसे किसी भी प्रकार के काईवाई भारतीय राजनयिको के साथ करने का अधिकार अमेरिका के पास नहीं है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका अपने आप को भारत के आगे दादागिरी दिखा रहा है। क्या भारत सरकार के पास अमेरका के आगे गिड़गिड़ाने के अलावे दुसरा कोई जवाब नहीं है? 

साथ ही सवाल ये भी है कि भारत सरकार की विदेश नीति अमेरिका को लेकर इतनी लचर क्यों है? क्या इसी का जतीजा है कि आज अमेरिका अपना दादागिरी दिखा रहा है? राजनयिक मान्यता एक राजनैतिक क्रिया है, जिसके द्वारा एक राष्ट्र दुसरे राष्ट्र को विषेश मान्यता और छुट प्रदान करता है। एक देश से दूसरे देश में दूत भेजने की प्रथा युगों युगों से चली आ रही है। बात चाहे रामायण, महाभारत की हो या फिर मनुस्मृति और कौटिल्य की अर्थशास्त्र। दुत प्रथा युगों युगों से चली आ रही है, और आज तक किसी ने किसी की दुत को गिरफ्तारी या तलाशी नहीं ली। मगर आज अमेरिका ने देवयानी खोबरागड़े को जिस प्रकार से द्रोपदी की तरह चिरहरण किया है उसको लेकर भारत ही नहीं पूरी दुनिया अमेरिका की हरकातों से शर्मशार है। आज देश ये मांग कर रहा है कि दादागिरी करनेवाले अमेरिका को उसीकी भाषा में जवाब देना चाहिए।

अमेरिका का ये कहना कि भारतीय राजदूत ने साड़ी पहनी थी इसलिए उनकी तलाशी ली गई, तो सवाल और भी गंभिर हो जात है। सवाल खड़ा होता है क्या अमेरिका को ये पता नहीं की भारतीय महिलाओ की पारंपरिक पोशाख साड़ी है। क्या अमेरिका अपनी पाश्चत्य सभ्यता भारत पर थोपने की कोशिशो में लगा है। क्या अमेरिका को भारतीय संस्कृति राश नहीं आ रही है। क्या अमेरिका अपने "गिव रेस्पेक्ट एंड टेक रेस्पेक्ट" की परंपरा भुल गया है। अमेरिका माफी मांगने की जगह अब तक उल्टे भारत पर ही अपनी आंखें तरेर रहा है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर क्या हो अमेरिकी दादागिरी का जवाब ?

18 December 2013

अमेरिका बनाम सोवियत संघ आज और कल !

अमेरिका में भारतीय सह दूतावास अधिकारी देवयानी खोब्रागड़े के साथ न्यूयार्क पुलिस की बदतमीजी की खबर और उस पर भारत की कड़ी प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आ रही है जब भारत में ५ राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आ चुके हैं। निश्चित रूप से केन्द्र की कांग्रेसनीत सरकार का सख्त रूख फौरी तौर पर राहत देनेवाला है लेकिन अमेरिका के सामने सिर्फ प्रतीकात्मक विरोध के जरिए भारत बहुत दूर तक और बहुत देर तक मजबूती के साथ खड़ा नहीं रह सकता। अमेरिका सिर्फ अपनी जमीन पर भारतीय राजनयिक को ही अपमानित नहीं करता है, उल्टे वह भारत के भीतर घुसकर भारतीय राजनीति को भी अपमानित कर रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि अमेरिका एक सोची समझी योजना के तहत भारत का एक और सोवियत संघ के रूप में तब्दील कर रहा है। भारतीय राजनीति में अमेरिकी घुसपैठ, मरियल मनमोहन की लंबी पारी, अरविन्द केजरीवाल का उभार, वर्तमान परिदृश्य और भारत की भावी राजनीति पर एक नज़र.

अमेरिकी कठपुतली हैं मनमोहन सिंह

भारतीय मीडिया द्वारा बुनियादी तौर पर भ्रष्ट और सत्तालोलुप अरविंद केजरीवाल की फर्जी यशोगाथा गाने में उसकी ठकुरसुहाती का मर्म है। बीते ५ वर्षों के कार्यकाल की अराजकता ने डॉ. मनमोहन सिंह को रूसी शासक बोरिस येल्तसिन का भारतीय संस्करण बना दिया है। येल्तसिन के बाद रूस की कमान यदि रूसी खुफिया संस्था केजीबी के प्रमुख रहे व्लादिमीर पुतिन ने नहीं संभाली होती तो रूस आज अमेरिका के सामने बांग्लादेश वाली मुद्रा में खड़ा होता। पुतिन ने रूस पर अपने फौलादी हाथों से सत्ता संचालित की। परिणाम है कि आज सीरिया और ईरान के मसले पर अमेरिका रूस के रवैए को स्वीकारने को मजबूर है। जबकि येल्तसिन के जमाने में रूस का बजट अमेरिकी फेडरल डिपार्टमेंट का कोई अंडरसेक्रेटरी लिखा करता था। आज कमोबेश हिंदुस्तान का वही हाल है। अमेरिकी इशारों पर मनमोहन सिंह की सरकार कान पकड़कर उठने-बैठने के लिए तैयार है। परिणाम सामने है- २६/११ मुंबई बमकांड के मुख्य षड्यंत्रकारी डेविड कोलमैन हेडली का प्रत्यर्पण हिंदुस्तान का बुनियादी अधिकार है, पर हमारी सरकार हेडली को मांगने की हिम्मत तक नहीं जुटाती। ‘भारत रत्न’ राष्ट्रपति रहे डॉ. एपीजे अबुल कलाम से राजनयिक बदतमीजी की जाती है, भारत सरकार मौन रहती है। अमेरिका में भारतीय राजदूत मीरा शंकर से अभद्रता होती है, भारत इसे गंभीरता से नहीं लेता। भारतीय उपउच्चायुक्त देवयानी खोब्रागडे को सार्वजनिक स्थान पर बेड़ियां डाल कर घुमाया जाता है भारत सरकार औपचारिक विरोध भी डर-डर कर करती है।

तब हमारी ताकत मास्को था...

आप सोच रहे होंगे कि मैं विधानसभा चुनावों की बात करते-करते रूस-अमेरिका की बात क्यों करने लगा? आप मानें या न मानें सच यही है कि हिंदुस्तान में सरकार का चयन भले ‘बैलेट’ से होता हो पर सरकारें चलती वैश्विक राजनीति के अलंबरदारों के इशारों पर। १९८० के दशक तक दिल्ली का सत्तासमीकरण मॉस्को, लंदन, पेरिस और वॉशिंगटन के चतुष्कोण से संचालित था। मॉस्को का प्रभाव इंदिरा गांधी के कार्यकाल तक सर्वाधिक था। हिंदुस्तान तकनीक, युद्ध सामग्री और संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में सोवियत संघ के वीटो का प्रार्थी था। सुरक्षा परिषद में लियोनिद ब्रेजनेव यदि इंदिरा गांधी के पक्ष में न खड़े होते तो १९७१-७२ में अमेरिका के रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर बांग्लादेश में हस्तक्षेप के मुद्दे पर भारत को रौंद डालते। जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया तब अमेरिका आपातकाल विरोधियों को प्रश्रय दे रहा था, पर रूस इंदिरा गांधी के पक्ष में खड़ा था। १९८० में जब इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आर्इं तो उन्होंने मोरारजी देसाई को अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का एजेंट करार देने का अकादमिक अभियान चलाया। चूंकि दिल्ली उन दिनों मॉस्को के प्रभाव में थी इसलिए हिंदुस्तान का अर्थतंत्र साम्यवादी था। ब्रेजनेव से आंद्रोपोव के कार्यकाल तक सोवियत संघ में बढ़िया बंगला, फर्नीचर, कार, जूते-कपड़े, तेल-फुलेल, विदेशी यात्राओं के टिकट और डॉलर की पहुंच पार्टी के चंद वफादार नेता और बुद्धिजीवी ही पाते थे। सोवियत नागरिक न पांच सितारा होटल में कदम रख सकता था और न ही विदेशी माल बेचनेवाले की दुकान में उसका प्रवेश अपेक्षित था। हिंदुस्तान का भी यही हाल था।

सोवियत विघटन से साम्यवाद हुआ पराजित

इंदिरा गांधी कार्यकाल तक डॉलर खर्च करना, विदेशी यात्राएं करना चुनिंदा लोगों के बूते की बात थी। सोवियत संघ में गोर्बाचोव और हिंदुस्तान में राजीव गांधी का शासनकाल समकालीन है। गोर्बाचोव दूरसंचार क्रांति यानी टेलीविजन और कंप्यूटर द्वारा वैश्विक दूरी को समेटने के चलते ‘खुलेपन’ को मंजूर करने के लिए मजबूर हुए। भारत में भी दूरसंचार क्रांति का पहला चरण राजीव गांधी काल में ‘खुलेपन’ की मुनादी पीटता हुआ आया। गोर्बाचोव ने जैसे ही ढील बरती अनुशासनहीनता ने सिर उठाया, भ्रष्टाचार खुलकर खेलने लगा। यदि गोर्बाचोव का शासनकाल जारी रहता आर्थिक सुधार धीरे-धीरे होते और पार्टी का शासनतंत्र फौरन नहीं टूटता। पर अमेरिका को जल्दी थी सोवियत विघटन करा साम्यवाद को पराजित करने की। सो येल्तसिन को सत्ता की चाबी सौंप दी गई। येल्तसिन साम्यवाद को सीधे पूंजीवाद की तेज गाड़ी पर छलांग लगवा बैठे। इस क्रम में उनके चमचों ने आवंâठ डूब कर भ्रष्टाचार किया। अमेरिकी विशेषज्ञ डेनियल कॉफमान ने सोवियत संघ के सार्वजनिक उद्योगों की सुनियोजित लूट को निजीकरण का नाम देकर वैâसे लूटा गया इसका विशद वर्णन किया है। भांति-भांति के तरीके अपना कर नेताओं और प्रबंधकों को अमीर बनाया गया। अब रूस बच गया था। अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय वित्त संस्थाओं से जनहित के कार्य संपन्न करने के नाम पर कर्ज दिलवाया। जनहित के लिए लाए गए कर्ज का अधिकांश हिस्सा रिश्वत में बंटा और वापस विदेशी बैंकों में चला गया।

‘नवरत्न’ बाजार में नीलाम होते रहे

राजीव गांधी भले गोर्बाचोव नहीं थे, पर उन्होंने अर्थतंत्र को पश्चिम के लिए खोलने की व्यापक शुरुआत तो की। नरसिंहराव जब शासन में आए तब तक हिंदुस्तानी ‘पेरेस्त्रोइका’ (खुलापन) सुनिश्चित हो चुका था। विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर की सरकारें भी येल्तसिन की तरह ही इंटरनेशनल मोनेटरी फंड और विश्वबैंक के दरवाजे पर कटोरा लिए खड़ी थी। तब अमेरिकी सोवियत संघ को लूटने में मस्त थे, सो हिंदुस्तानी येल्तसिन यानी मनमोहन सिंह से सिर्पâ रुपए को परिवर्तनीय करा लिया। नरसिंहराव सरकार अभी तक समाजवादी कांग्रेसियों की चंगुल से मुक्त नहीं थी। सो, २ साल बाद १९९३ में उदारवाद पर ब्रेक लग गया। १९९३- १९९८ तक उदारवाद धीमी गति से चला। १९९८- २००४ के बीच उसने कुलांचे मारने का काम किया। ‘नवरत्न’ बाजार में नीलाम हो रहे थे। २००४-२००८ में मनमोहन की सरकार साम्यवाद के कंधे पर सवार थी, सो वह फर्राटा मारने की सोच नहीं सकती थी। २००८ में जब विश्वव्यापी मंदी आई और अमेरिकी बैंक-वित्तीय संस्थान कंगाली घोषित करने लगे तब तक अमेरिका रूस के साथ-साथ चीन का बाजार भी अपनी क्षमता भर चर चुका था। उसके पास हिंदुस्तान को चरने के अलावा विशेष विकल्प शेष नहीं थे। सो, उसी अवधि में ‘ब्राजील-रूस-इंडिया-चायना (ब्रिक) का बखान शुरू हुआ। बराक ओबामा मनमोहन सिंह को अपना ‘आर्थिक गुरु’ करार देने लगे। २ साल के भीतर हिंदुस्तान के आर्थिक विकास के गीत गाकर उसमें तेजी लाकर सट्टे का एक स्तर बनाया। फिर तेजी से पूंजी खींच कर बाजार को धड़ाम से गिरा दिया। परिणाम १९९१-२०१० तक आर्थिक क्रांति के श्रेय लूटने वाले सारी आर्थिक बाजीगरी भूल गए। अब तो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह का मुंह ही नहीं खुलता। चिदंबरम की चमत्कार कला चूल्हे में जा चुकी है।

सत्ताधीश-कॉरपोरेट और अफसरशाही बेनकाब

दुनियाभर के विशेषज्ञ कहते आए हैं कि अमेरिका ने भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों की सरकारों को पूंजी, प्रौद्योगिकी और हथियार आपूर्ति कर अपने चंगुल में ले रखा है। इन देशों के चुनिंदा लोगों की महत्वाकांक्षाएं पूरी की जाती हैं। ऐसे लोगों की अपनी एक अलग दुनिया बना दी जाती है जहां वे सामथ्र्य का उपभोग करने में उलझे होते हैं। गरीबों के गुस्से, सामाजिक उथल-पुथल और सामाजिक उत्तरदायित्व से दूर रखा जाता है। बदले में इन देशों की प्राकृतिक संपदा और सस्ते श्रम का हरसंभव शोषण किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के सशर्त कर्जों को तीसरी दुनिया के भ्रष्ट और अक्षम सरकारों को टिकाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पुतिन रूस में आए तो उन्होंने भ्रष्टाचार को भस्म तो नहीं किया पर सरकार को सशक्त बना कर अंतर्राष्ट्रीय राजनय में रूस को पुनस्र्थापित करने का प्रयास किया। पुतिन के साथियों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के आंदोलन खड़े हुए, पर वेंâद्रीय सत्ता की धमक नहीं घटी। हिंदुस्तान में मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में संसाधनों की लूट के पर्दाफाश शुरू हुए। सत्ताधीश नेता-कॉरपोरेट और अफसरशाही की तिकड़ी बेनकाब होना शुरू हुई। तो विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एनजीओ वाले उतार दिए गए।

‘बोनसाई’ को कल्पवृक्ष बनाने की कवायद

जनाक्रोश को ‘डाइवर्ट’ करने के इरादे से ही केजरीवाल एंड कंपनी ने लोकपाल अभियान छेड़ा। केजरीवाल उतरे तो लोकपाल के नाम दीवानखाने को आकर्षित करने वाले सतही आंदोलनों का ‘ट्रोजन हॉर्स’ उतरा। अण्णा हजारे के इस आंदोलन का शिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हुआ। सो, तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अण्णा हजारे और रामदेव का गुण गाने लगे। परिणाम-सत्ताधारियों की विकल्प भाजपा उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड सब जगह मात खाने लगी। भाजपा विकल्प न देने पाए, मनमोहन के आका यही तो चाहेंगे। साल भर के मंथन के बाद भाजपा में नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह की जोड़ी ने सत्ता को सीधी चुनौती पेश की। नितिन गडकरी, अण्णा हजारे-रामदेव में सरकार का विकल्प ढूंढ रहे थे। राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को सत्ता के विकल्प की कमान सौंपी। परिणाम सामने है जो भाजपा नितीश कुमार की कनखियों पर कांपती थी, वह उनकी छाती पर मूंग दल रही है। येदियुरप्पा भाजपा में लौटने की बाट देख रहे हैं। राजस्थान में कांग्रेस जहां पहुंची है वहां उसे अब सत्ता मृगमरीचिका नजर आएगी। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ में हैट्रिक का हंटर चला है। दिल्ली में केजरीवाल बौने साबित होकर ‘जो गति सांप-छछूंदर ‘वाली के शिकार हैं। फिर भी इजिप्त क्रांति के ‘बोनसाई’ को राजनीति का कल्पवृक्ष करार दिए जाने की कवायद। यह कवायद क्यों? ताकि विश्वशक्ति अपने मनचाहे मीरजाफर को सत्ता का प्रासंगिक सरदार बनाए रख सके। बात यहीं अटक जाती है। मोदी अमेरिका विरोधी नहीं हो सकते। भाजपा से धुर अमेरिका विरोधी राजनीति की दरकार भी नहीं, जरूरत भी नहीं। पर क्या वह येल्तसिन के बाद वाले पुतिन होंगे?

मोदी हैं मनमोहनवादी मरियल मंजर का विकल्प?

यदि वह मध्यवर्ग को बाजार में टिके रहने का विश्वासबोध भी करा दें तो बात बन सकती है। चार राज्यों में भाजपा की बढ़त में यह अपेक्षा शामिल है। क्या सचमुच मोदी के पास मनमोहनवादी मरियल मंजर का कोई आर्थिक विकल्प है जो जनता का विश्वास जगा सके? फिलवक्त तो मनमोहन-मोदी और केजरीवाल हर किसी की अर्थप्रणाली की नाभिनाल विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से जुड़ी है। हम उसे एकाएक काटकर फेंक नहीं सकते। पर यह विश्वास जरूर दिला सकते हैं कि हम उनसे अपने हितों की शर्तों पर व्यवहार करेंगे। मनमोहन में यह दम नहीं, केजरीवाल तो उनके कुनबे के पालतू हैं, क्या मोदी इस मजबूरी से मुक्त हैं? अगर भारत नरेन्द्र मोदी में पूरी तरह से विश्वास जाहिर करता है तो क्या वे अखण्ड भारत के ब्लादिमिर पुतिन बन पायेंगे जो अमेरिका को अपनी योजना में सफल होने से पहले ही वह ताकत दे सके जो बिखरने के बाद पुतिन ने रूस को दिया है?

15 December 2013

सरकारी लोकपाल पर अन्ना की सहमती कितना सही ?

लोकपाल बनाम अन्ना हजारे का मुद्दा एक बार फिर से गर्म है। एक ओर अन्ना सरकारी बिल पर सहमती जता रहे हैं तो वहीं दुसरी ओर उनके पूर्व सहयोगी अरबिंद केजरीवाल इसे कमजोर बिल बता रहे हैं। इधर सरकार भी बीते साल की तरह सराज्यसभा में लोकपाल बिल पेश कर दिया है। साथ ही विपक्ष भी सरकार के सुर में सुर में मिलाते हुए नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या अन्ना, सरकार और विपक्ष में कोई सांठ गांठ हो गया है? या फिर अन्ना हजारे केजरीवाल की राजनीति से लोकपाल को दूर रखना चाहते है? आज के इस बदलते राजनीतिक दौर में अब ये सवाल आम हो चला है। अन्ना ने अपने रुख में नरमी दिखाते हुए कहा कि वह राज्यसभा में पेश किए गए संशोधित बिल से खुश हैं। बिल में बाद में संशोधनों के जरिए सुधार लाया जा सकता है। अन्ना ने बिल के प्रावधानों को उचित ठहराते हुए कहा कि इस मौजूदा बिल के अनुसार प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में होंगे। लोकपाल के दायरे में सीबीआई और सीवीसी को भी रखा गया है। सीबीआई लोकपाल के पूरे नियंत्रण में रहेगी। बिल से उनकी बहुत सी मांगें पूरी हो रही है।

अन्ना हजारे की इस सकरात्मक रूख को देखते हुए राहुल गांधी भी अपनी हिस्सेदारी दिखानी शुरू कर दिए हैं। राहुल गांधी ने लोकपाल को हर हाल में पास कराने की बात कही है। कलतक अन्ना आंदोलन को नाटक बताने वाले राहुल गांधी अब खुद ही राजनीतिक दलों से इसे पास कराने को लेकर अपील कर रहे हैं। इन सभी राजनीतिक उठापटक के बिच अरबिंद केजरीवाल राजनीतिक रोड़े अटकाना शुरू कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी कि ओर से ये कहते हुए मौजूदा लोकपाल बिल को खारिज कर दिया कि इसमें अन्ना की तीन शर्ते शामिल नहीं हैं। ऐसे में सवाल केजरीवाल के इस रूख को लकर भी खड़ा होता है कि क्या आम आदमी पार्टी अन्ना के मांगों को मौजूदा सरकारी लोकपाल में षामिल नहीं होने का दावा कर, अन्ना आंदोलन के आसरे राजनीति करना चाहती है। 

कल तक सरकारी बिल को बकवास बताने वाले अन्ना हजारे आज खुद संसद में विपक्ष समेत सभी दलों से मिलकर इस बिल को पारित करने का आग्रह कर रहे हैं। लोकपाल बिल पर सरकार का फिर से हृदय परिवर्तन होना और अन्ना हजारे को इसपर सहमती जताना कई चैकाने सवाल खड़े कर रहे हैं। मौजूदा सरकारी लोकपाल सरकार के कंट्रोल में ही रहेगा, स्वतंत्र संस्था की दर्जा भी नहीं होगा और नाही कोई प्रशासनिक अधिकार होगा। लोकपाल की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास होगा जिससे भ्रष्टाचार पर पुरी तरह से अंकुश नहीं लग सकेगा। नीचले स्तर के अधिकारी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। जबकी आम आदमी सबसे जयादा नीचले स्तर की भ्रष्टाचार से ही प्रभावित है। ऐसे में अन्ना हजारे की इस रूख से सवाल खड़ा होता है कि सरकारी लोकपाल पर अन्ना की सहमती कितना सही ?

14 December 2013

सोनिया गांधी को राष्ट्रमाता का दर्जा देना कितना सही ?

देश में चाटुकारीता की राजनीति किस हद तक जा सकती है इसे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दुनिया के सामने लाखड़ा किया है। मणिशंकर अय्यर ने जब सोनिया को प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में विकल्प बताया तो, चाटुकार नेता भला कहा चुप बैठने वाले थे। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने दो कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि सोनिया गांधी सिर्फ राहुल गांधी की माँ नहीं हैं, वे हमारी भी माँ  हैं और पूरे देश की माँ हैं।

विधानसभा चुनावों में हुई हार को लेकर कांग्रेसी नेताओं को कोई जवाब नहीं सूझ रहा है। ऐसे में ये नेता चापलूसी कर खुद को मेहरबान और गांधी नेहरू परिवार के आगे  अपने आप को शरणागत करने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं। खुर्शीद के बयानों से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है कि क्या राजनीतिक दलों के लिए व्यक्ति विशेष की महत्वता इतनी बढ़ गई है कि भारत माता की जगह सोनिया गांधी में देश की माँ दिखाई देने लगी है। क्या ये राष्ट्र का अपमान नहीं है? जिस देश में गाय और गंगा को माँ का दर्जा दिया जाता है, वहां आज नेताओं को सोनिया गांधी दिखाई देने लगी है। 

सवाल ये भी उठता है कि महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता बताने के बाद अब कांग्रेस पार्टी राष्ट्रमाता की घोषणा करने की योजना बना रही है या फिर  सिर्फ ये अपनी राजनीति चमकाने की चाटुकारीता ? आपातकाल के दिनों में इंदिरा गाँधी को भी माँ कहा गया था और वह इंदिरा के पतन का कारण बना। अब सोनिया को माँ कह कर क्या कांग्रेस पार्टी अपने उस पतन की ओर बढ़ रही है। जिसे देख कर 10 जनपथ आजतक नहीं उबर पाया है? सोनिया गांधी को लेकर चापलुसी का ये कोई पहला मामला नहीं है। 

आये दिन सोनिया के सम्मान में इस तरह की बाते सामने आते रहती है। हाल ही में उत्तराखंड के गवर्नर नियुक्त किए गए अजीज कुरैशी के एक बेबाक बयान ने बवाल मचा दिया था। कुरैशी ने कहा था कि मेरे लंबे समय से कांग्रेस से जुड़े रहने और गांधी परिवार के प्रति प्रतिबद्धता और वफादारी का ही नतीजा है कि मुझे गवर्नर का पद मिला। मैं सोनिया गांधी के आशीर्वाद की वजह से उत्तराखंड का गवर्नर बन सका। 

संवैधानीक पदों पर बैठने वाला पहरेदार जब व्यक्ति विशेष की वफादारी करने लगे तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है। सियासी बिसात को बदलने के लिये बेचैन कांग्रेस के सिपहसलार सोनिया को माँ बता कर प्रेरित करने जुटे हुए है। ये जताने की कोशिश में लगे है कि 2014 में सत्ता माँ के आसरे ही हासिल हो सकती है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि सोनिया गांधी को राष्ट्रमाता का दर्जा देना कितना सही ?

13 December 2013

समलैंगिक संबंधों का समर्थन क्यों ?

दो वयस्कों के बीच समलैंगिक रिश्ते को जायज माना जाए या नहीं, इसे लेकर पूरे देश में एक बहस छिड़ी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को वैध करार देते हुए 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2 जुलाई 2009 को दिए गए एक ऐतिहासिक निर्णय द्वारा भारत में वयस्कों के बीच स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्धों को संवैधानिक मूल अधिकारों के अंतर्गत मानते हुए, भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को एक हद तक शून्य करार दिया था। आज देश में लगभग 25 लाख समलैगिंक है जिनमे से 1.75 लाख एचआईवी से संक्रमित है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या इन परिस्थितयों में इसे कहीं से भी उचीत ठहराना सही है? क्या ये यौनिक आजादी के नाम पर प्राकृतिक रीतियों और वैदिक संस्कृतिक के विपरीत बिमारियों को बढ़ावा देने जैसा नहीं है?

विवाह का उद्देश्य सिर्फ यौन इकछा ही नहीं वल्कि सन्तानोत्पत्ति भी है, धर्म ग्रन्थों के मुताबिक बिना संतानोत्पत्ति के विवाह का उद्देश्य अपूर्ण है। ऐसे में अप्रकृति सेक्स को किस ओर से उचीत ठहराया जा सकता है ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है। अब तक के जितने भी समलैगिंक जोड़े ने संतान सुख हासील किए है वो सारे के सारे सेरोगेसी मां से प्राप्त हुई है। तो सवाल इस बात को लेकर भी खड़ा होता है कि फिर इसे कानूनी मान्यता देने के बाद देश में सेरोगेसी को अवैध बढ़ावा नहीं मिलेगा? क्या आधुनिकता के नाम पर पुरानी परंपराओं और मान्यताओं को त्याग से देश में पश्चात् संस्कृती को बढ़ावा नहीं मिलेगा? हाल ही में दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक न्यायालय नें भी समलैंगिकता को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। क्योकि आज अफ्रीका में इसे लेकर कई प्रकार की समस्याये खड़ी हो गई है। 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिक रिश्ते को अमान्य और आपराधिक करार दिए जाने की खिलाफत करने वालों का मानना है कि यह एक तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन है। मगर सबसे बड़ी बात यहा ये है कि भारतीय समाज पर पश्चिमी संस्कृति और मूल्यों-मान्यताओं को हम उसी रूप में स्वीकृती दे सकते है जैसे विदेशों में पहले से ही चला आरहा है? समलैंगिक रिश्ते को महज कानूनी मान्यता तक सीमित किया जा सकता है या नहीं इसे लेकर राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से खुलकर हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फैसले पर निराशा जताई है। तो वहीं पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने धारा-377 को फिर से अपराध की श्रेणी में डालने का विरोध किया है। राहुल ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले से सहमति जताते हुए इसे निजी स्वतंत्रता का मुद्दा बताया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में बदलाव के लिए सरकार ने पहल के संकेत भी दिए हैं। सरकार इसके लिए अध्यादेश भी ला सकती है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि समलैंगिक संबंधों का समर्थन क्यों ?

11 December 2013

नमो की आंधी में उड़ गये राहुल गांधी !

चार विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित हो चुके हैं। आम चुनाव से पहले जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा की गई उसे सत्ता के सेमीफाइनल का संघर्ष कहा गया था। हिन्दी पट्टी के चार राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव वास्तव में सत्ता का सेमीफानल थे। इन राज्यों के चुनाव नतीजों को आम चुनाव की आहट के रूप में देखा जा सकता है। कांग्रेस और उसके समर्थक कोई भी तर्क दें लेकिन वास्तविकता यही है कि ये चुनाव परिणाम देश में चल रही नरेन्द्र मोदी की लहर है। पांचों राज्यों में चुनाव ऐसे वक्त में करवाये गये जब भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया था। 

जिन चार विधानसभा चुनावों के परिणाम रविवार को घोषित किए गए उनमें लोकसभा की कुल 72 सीटें हैं। बीते विधानसभा चुनावों में इन चारों राज्यों में से दो राज्यों में कांग्रेस और दो में भारतीय जनता पार्टी को सफलता हासिल हुई थी। राजस्थान और दिल्ली कांग्रेस के खाते में थी तो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पर भाजपा का परचम लहराया था। इस बार नतीजा 4-0 का है।

मोदी का फहराया परचम

भाजपा तीन राज्यों में स्पष्ट बहुमत पा चुकी है और एक राज्य में उसे सबसे बड़ी पार्टी का जनादेश प्राप्त हुआ है। जिस तरह से नरेंद्र मोदी के लिए इन विधानसभा चुनाव को आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था, उसी तरह कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए भी ये चुनाव महत्वपूर्ण थे। कांग्रेस के संगठन में उपाध्यक्ष पद पर पदोन्नत किए जाने के बाद राहुल गांधी अपरोक्ष रूप से भावी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं। भले ही चुनाव परिणामों के बाद सारे कांग्रेसी एक सुर में कह रहे हों कि राहुल गांधी के लिए ये चुनाव ‘लिटमस टेस्ट’ नहीं थे, किंतु जिस अंदाज में चुनाव अभियान चलाया गया, उससे जनता के बीच मुकाबला नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी का ही गया था। ऐसे में इन चुनाव में जीत-हार में राहुल गांधी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। नरेंद्र मोदी के योगदान को नकारने के लिए तमाम कांग्रेसी और उनके छद्म सेकुलर साथी कल सुबह से ही जुबानी जुगाली कर रहे हैं। इन चुनावों में बेहतरीन सफलता हासिल होने के चलते नरेंद्र मोदी के कोण से चुनाव परिणामों को न विश्लेषित करने की सीख देनेवाले यदि चुनाव परिणाम भाजपा के खिलाफ और कांग्रेस के पक्ष में चले गए होते तो ‘नरेंद्र मोदी के गुब्बारे की हवा निकल गई’, का प्रचार करने से जरा भी पीछे नहीं हटते। ये पहले चुनाव थे जब नरेंद्र मोदी को पूरे देश में भाजपा ने मुख्य प्रचारक के रूप में उतारा था।

विफल साबित हुए राहुल गांधी

शुरुआती दौर में कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को अपने मुख्य प्रचारक की हैसियत से मैदान में उतारा। किन्तु जब चुनाव सभाओं में राहुल गांधी विफल साबित होने लगे तब कांग्रेस ने अपनी रणनीति में परिवर्तन किया था। इन चुनाव परिणामों का क्या संदेश? इसके राजनीतिक परिणाम क्या हो सकते हैं? हम वास्तविक स्थिति की ओर देखें तो जिन 72 लोकसभा सीटों के क्षेत्र में ये विधानसभा चुनाव संपन्न हुए उसमें भाजपा को हरसंभव लाभ हुआ। 2009 के लोकसभा चुनाव में इन 72 सीटों में से कांग्रेस के खाते में 40 सीटें थीं। विधानसभा चुनावों के परिणामों के आधार पर यदि लोकसभा के परिणामों को विश्लेषित किया जाए तो कांग्रेस को 32 सीटों का घाटा साफ दिखाई दे रहा है। यदि इसी तरह की वोटिंग हुई तो मई, 2014 में जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आएंगे तो इन इलाकों से कांग्रेस के केवल 8 सांसद ही लोकसभा पहुंचेंगे। चूंकि इन चारों राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच अब तक सीधी टक्कर होती रही है और दिल्ली के अलावा शेष तीन राज्यों में आगामी आम चुनाव में भी भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना है। भाजपा के पास बीते लोकसभा चुनाव में इन इलाकों से कुल 26 सांसद थे। विधानसभा चुनाव में जिस तरह का मतदान हुआ है, उसके आधार पर भाजपा को 56 सीटों पर सफलता हासिल होगी। यानी सीधे तौर पर 30 सीटें भाजपा के खाते में जुड़ जाती हैं। भाजपा को पिछले लोकसभा चुनाव में 112 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी। तब उनको सर्वाधिक सीटें कर्नाटक (19) से मिली थीं।

आंकड़े हैं भाजपा के साथ

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेसी यह तर्क दे रहे थे कि अब भाजपा सौ सीटों की सीमा को भी नहीं लांघ सकती। भाजपा और उससे अलग हुए येदियुरप्पा को मिले वोटों को यदि एक करके गिना जाए, तो भाजपा को 8 से 10 सीटों पर आज भी सफलता हासिल होगी। चूंकि येदियुरप्पा का भाजपा में आना लगभग तय हो चुका है, इसलिए इस तरह की गणना को गलत नहीं करार दिया जा सकता। यदि भाजपा नरेंद्र मोदी के प्रभाव के बावजूद कर्नाटक में नौ-दस सीटें खोती है तब भी इन 30 सीटों का फायदा भाजपा को 2004 के लोकसभा चुनाव में प्राप्त 138 सीटों के आंकड़े से आगे ले जाता है। पिछली बार कांग्रेस को 206 सीटों पर सफलता हासिल हुई थी। 206 में से यदि 32 सीटों का आंकड़ा घटा दिया जाए तो उनकी संख्या बचती है 164। पिछली बार कांग्रेस को सर्वाधिक सीटें हासिल हुर्इं थीं आंध्रप्रदेश (33) से। तेलंगाना अलग किए जाने के बाद और कांग्रेस से फूटकर वाईएसआर कांग्रेस के गठन से अब आंध्र से 33 सीटों का आंकड़ा 2014 के लिए तो दिवास्वप्न ही होगा। तेलंगाना से यदि कांग्रेस को चार-छह सीटें मिल भी जाती हैं तब भी कांग्रेस न्यूनतम दो दर्जन सीटों का घाटा उठाने जा रही है। यदि इन सीटों को घटा दिया जाए तो कांग्रेस का आंकड़ा 140 पर जा पहुंचता है। उत्तर प्रदेश में पिछली बार कांग्रेस को (21) लोकसभा सीटें जीतने में सफलता हासिल हुई थी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और ‘बीमारू’ राज्यों के चुनाव परिणामों से यह साफ दिखाई दे रहा है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इस बार एक दर्जन सीटें भी जीत ले तो हर राजनीतिक विश्लेषक को आश्चर्य होगा। यदि 12 सीटें भी कांग्रेस के खाते से घटा दी जाएं तो कांग्रेस की सीटों की संख्या हो जाती है 128। बीते चुनाव में कांग्रेस को सर्वाधिक सफलता मिली थी, बड़े शहरों से। मसलन, कांग्रेस और उसके गठबंधन के दलों को मुंबई और दिल्ली में शत-प्रतिशत सफलता हासिल हुई थी।

नरेंद्र मोदी की लहर

पिछली बार कांग्रेस की सीटों की संख्या में 60 सीटें मध्य वर्ग की डॉ. मनमोहन सिंह के अर्थतंत्र में समर्थन के चलते हासिल हुई थीं। दिल्ली में जिस तरह सात में से सातों सीटें कांग्रेस गंवाने के कगार पर है, क्योंकि जिस कांग्रेस को 2009 में जिस दिल्ली से सात सीटें हासिल हुई थीं उसी कांग्रेस को दिल्ली विधानसभा में केवल 8 सीटें मिली हैं। उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी की लहर दिखाई दे रही है। हर चुनाव सर्वेक्षण यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को 30 से 40 सीटें हासिल होंगी। फिलहाल उत्तर प्रदेश से भाजपा के नौ सांसद हैं। यदि भाजपा के सीटों की संख्या में दो दर्जन का इजाफा होता है तो भाजपा सीधे तौर पर 1996 वाले 161 के आंकड़े को पार करती नजर आती है। इसी तरह महाराष्ट्र में चुनाव सर्वेक्षणों का आकलन है कि शिवसेना-भाजपा के गठबंधन को न्यूनतम 30 सीटों पर सफलता हासिल होगी। पिछली बार महाराष्ट्र में शिवसेना 11 और भाजपा को 9 सीटें मिली थीं। सीटों की संख्या में 10 का इजाफा और जोड़ दिया जाता है तो भाजपा पहुंच जाती है 170 सीटों पर। मध्य वर्ग में अब डॉ. मनमोहन सिंह की जगह नरेंद्र मोदी का जादू चलता दिखाई दे रहा है। इसलिए किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यदि इसी ट्रेंड पर मतदान हुआ तो भाजपा अकेले के बूते 200 सीटों के आंकड़े को पार कर सकती है। इसलिए चारों विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद अब राजनीतिक लड़ाई का तेज होना स्वाभाविक है।

कांग्रेस है परेशान

कांग्रेसी संतोष कर रहे थे कि यदि शिवराज सिंह चौहान तीसरी बार चुनाव जीतेंगे तो वह नरेंद्र मोदी के लिए भाजपा में प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरेंगे। जिस तरह से चुनाव जीतते ही शिवराज सिंह चौहान ने अपनी जीत के लिए नरेंद्र मोदी को श्रेय दिया है, उससे उनकी यह अपेक्षा भी भंग होती नजर आ रही है। भाजपा के उत्साह में इजाफा स्वाभाविक है। सवाल पैदा होता है कि क्या कांग्रेस अब अपनी हार को इतनी आसानी से स्वीकार लेगी? कांग्रेस की हार के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार राहुल गांधी को माना जा रहा है। कोई बड़ा नेता कांग्रेसी परंपरा के चलते राहुल गांधी के खिलाफ बयान नहीं देगा। किन्तु कांग्रेस के शिखर नेतृत्व से लेकर गली के कार्यकर्ता तक अब राहुल के नेतृत्व की विफलता की चर्चा करने लगे हैं। क्या राहुल गांधी की जगह अब प्रियंका गांधी को पार्टी के अभियान में उतारा जाएगा? क्या सिर्फ राहुल की जगह प्रियंका गांधी को उतार देने से कांग्रेस की समस्याओं का समाधान हो जाएगा? दरअसल, कांग्रेस अब पूरे देश के नक्शे से साफ हुई नजर आ रही है। सारे बड़े राज्यों से कांग्रेस का सफाया हो चुका है। बड़े राज्यों के नाम पर उसका शासन सिर्फ कर्नाटक में है। महाराष्ट्र में उसके साझीदार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार के खिलाफ कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और प्रदेशाध्यक्ष माणिकराव ठाकरे तेवर दिखाते रहे हैं। शरद पवार मौका देखकर चौका मारने के लिए मशहूर रहे हैं।

हार के सभी जिम्मेदार

शरद पवार भी अब कांग्रेस से जमकर सौदेबाजी करेंगे। इसके अलावा कांग्रेस के पास हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा जैसे राज्य हैं। इन तीनों राज्यों के बल पर दिल्ली का सपना देखना भी मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही कहलाएगा। बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, प. बंगाल और पंजाब ऐसे राज्य हैं जहां पर अगले 150 दिनों में कांग्रेस की सियासी सेहत में सुधार लाना असंभव नजर आता है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता था कि खैराती अर्थतंत्र उनके लिए वोट बैंक का कारगर नुस्खा साबित होगा। राहुल गांधी नारे लगा रहे थे कि ‘आधी रोटी नहीं, बल्कि पूरी रोटी खाएंगे, कांग्रेस को जिताएंगे’ जनता ने उनके इस नारे को नकार कर ‘रोटी-भाजी खाएंगे, कांग्रेस को भगाएंगे’ का संकेत दे दिया है। ‘सांप्रदायिक दंगा विरोधी लक्षित हिंसा विधेयक’ को कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के तौर पर पेश कर रही थी। मध्यप्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में मुस्लिम वोट बैंक प्रभावशाली था। कांग्रेस के इस विधेयक के समर्थन में यदि मुसलमानों ने वोट किया होता तो कांग्रेस की ऐसी दुर्दशा नहीं होती। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने चुनाव हारने के बाद जिस अंदाज में अपनी पराजय का ठीकरा केन्द्र सरकार की नीतियों पर फोड़ा वह कांग्रेस के नेताओं के भीतर चल रहे अंतद्र्वंद्व का साफ संकेत है।

अपनों ने किया कांग्रेस का बेड़ा गर्क

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को अब तीसरे कार्यकाल के लिए पेश नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह की जगह प्रधानमंत्री पद की योग्यता गंवा चुके हैं। प्रियंका गांधी पर उनके पति रॉबर्ट वड्रा के चलते घोटाले के छींटे हैं। सोनिया गांधी की चमक कभी चुनाव जिताने भर की नहीं रही। हर किसी विश्लेषक ने चारों राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद एक ‘कॉमन फैक्टर’ गिनाया। कांग्रेस के बड़े 6 मंत्रियों की बदजुबानी। ये मंत्री हैं पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, जयराम रमेश, मनीष तिवारी, सुशील कुमार शिंदे और राजीव शुक्ला। दिग्विजय सिंह जब भी जुबान खोलते हैं तो कांग्रेस के कुछ मतदाता उससे पल्ला झाड़ लेते हैं। कांग्रेस के प्रवक्ताओं में रेणुका चौधरी, मीम अफजल, राज बब्बर आदि की भी लगभग यही हालत है। इसलिए अब कांग्रेस के कैडर में नई चेतना के संचार की शक्ति तो किसी में दिखाई नहीं देती। किन्तु चुनाव में डेढ़ सौ दिनों का समय अच्छा-खासा माना जाता है। भारतीय जनता पार्टी को भी अब अपने पत्ते सोच-समझकर फेंकने होंगे। भाजपा में भी ‘सेल्फ साइड गोल’ करनेवालों की कोई कमी नहीं। कांग्रेस भले ही कह रही हो कि चारों राज्यों के चुनाव परिणामों में नमो फैक्टर का कोई लेना-देना नहीं, किन्तु उसे जैसे ही मौका मिलेगा वह नरेंद्र मोदी के चरित्र पर कीचड़ उछालने से बाज नहीं आएगी। ‘रागा बनाम नमो’ के पहले चक्र में रागा न केवल हारा है बल्कि मूच्र्छित हो गया है। किन्तु नमो को शक्तिहीन करने का सामथ्र्य अभी-भी कांग्रेस में बाकी है। कांग्रेस जब भी सीधे मुकाबले से पिछड़ती है वह तिकड़म का सहारा लेती है। कांग्रेस अपनी किसी तिकड़म में कामयाब न होने पाए यह भाजपा को सुनिश्चित करना होगा।

धारा 370 पर बहस क्यों नहीं ?

यह सही है कि कश्मीर में इस समय कई ऐसी ताकतें हैं जो स्वतंत्रता से लेकर स्वायत्ता तक की मांग कर रही हैं। परंतु मोटे तौर पर, राज्य में अनुच्छेद 370 के प्रश्न पर सब एकमत है। यद्यपि यह कहना मुश्किल है कि किस मांग का समर्थन कितने लोग कर रहे हैं तथापि कश्मीर की अधिकांश जनता, अनुच्छेद 370 के साथसाथ और अधिक स्वायत्ता की पक्षधर है। लेकिन धार्मिक राष्ट्रवाद के नशे में गाफिल रहने वालों को आमजनों की क्षेत्रीय व नस्लीय आकांक्षाएं दिखलाई नहीं देतीं। विभिन्न रंगों के अति राष्ट्रवादी भी इसी दृष्दिोष से पीड़ित रहते हैं। 

भारत संघ के गठन के साथ ही, हिमाचल प्रदेश, उत्तरपूर्वी राज्यों और जम्मू कश्मीर के संघ में विलय का प्रश्न चुनौती बनकर उभरा था। इन सभी चुनौतियों का अलगअलग ढंग से मुकाबला किया गया परंतु आज भी ये किसी न किसी रूप में राष्ट्रीय चिंता का कारण बनी हुई हैं। जम्मू कश्मीर इस संदर्भ में सबसे अधिक चर्चा में है। कश्मीर, सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र है और इसलिए वैश्विक शक्तियों ने भी कश्मीर समस्या को उलझाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में प्रगा़ता की राह में कश्मीर सबसे बड़ा रोड़ा है। भारतीय साम्प्रदायिक ताकतें भी कश्मीर मुद्दे को हवा देती रहती हैं।

इस पृष्ठभूमि के चलते, जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने अनुच्छेद 370 पर राष्ट्रीय बहस का आव्हान किया तब देश में मानो भूचाल सा आ गया। उनका यह कहना कि ''इससे किसे लाभ हुआ'' दरअसल, दूसरे शब्दों में इस धारा को हटाने की मांग थी। मोदी की बात को आगे ब़ाते हुए भाजपा नेता सुषमा स्वराज व अरूण जेटली ने जोर देकर कहा कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति, हिन्दुत्व आरएसएस एजेन्डा का अविभाज्य हिस्सा बनी हुई है। जेटली ने भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुकर्जी की इस मांग को दोहराया कि कश्मीर का भारत में तुरंत व पूर्ण विलय होना चाहिए। जेटली ने ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ते मरोड़ते हुए यह कहा कि ''स्वराज, 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली और यहां तक कि आजादी की मांग के मूल में नेहरू द्वारा कश्मीर को विशोष दर्जा दिए जाने का निर्णय है।'' इस विषय पर टेलीविजन चैनलों पर लंबी लंबी बहसें हुईं, जिनसे केवल चर्चा में भाग लेने वालों की अनुच्छेद 370 और कश्मीर के विशोष दर्जे के बारे में घोर अज्ञानता जाहिर हुई।

इस मुद्दे का इतिहास जटिल है। जैसा कि सर्वज्ञात है, कश्मीर सीधे अंग्रेजों के अधीन नहीं था। वह एक रियासत थी जिसके शासक डोगरा राजवंश के हरिसिंह थे। उन्होंने केबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत गठित संविधान सभा का सदस्य बनने से इंकार कर दिया था। जम्मूकश्मीर की आबादी का 80 फीसदी मुसलमान थे। भारत के स्वतंत्र होने के बाद, कश्मीर के महाराजा के सामने दो विकल्प थेपहला, कि वे अपने राज्य को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दें और दूसरा कि वे भारत या पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय कर दें। महाराजा की इच्छा स्वतंत्र रहने की थी। जम्मू के हिन्दू नेताओं ने हरिसिंह की इस अलगाववादी योजना का समर्थन किया। 'जम्मू कश्मीर राज्य हिन्दू सभा के नेताओं, जिनमें से अधिकांश बाद में भारतीय जनसंघ के सदस्य बन गए, ने जोरदार ढंग से यह आवाज उठाई कि जम्मूकश्मीर जो कि हिन्दू राज्य होने का दावा करता है, को धर्मनिरपेक्ष भारत में विलीन नहीं होना चाहिए' परंतु कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना की मदद से कबाईलियों के हमले ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया।

हरि सिंह अपने बलबूते पर कश्मीर की रक्षा करने में असमर्थ थे और इसलिए उन्होंने भारत सरकार से मदद मांगी। भारत सरकार ने कहा कि वह पाकिस्तानी हमले से निपटने के लिए अपनी सेना तभी भेजेगी जब कश्मीर का भारत में विलीनीकरण हो जाएगा। इसके बाद कश्मीर और भारत के बीच परिग्रहण की संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें अनुच्छेद 370 का प्रावधान था। यह विलय नहीं था। संधि की शर्तों के अनुसार, भारत के जिम्मे रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामले और संचार था जबकि अन्य सभी विषयों में निर्णय लेने का पूरा अधिकार कश्मीर की सरकार को था। कश्मीर का अपना संविधान, झंडा, सदरए-रियासत व प्रधानमंत्री होना था। राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इस संधि का औचित्य सिद्ध करते हुए पंडित नेहरू ने 2 नवम्बर 1947 को कहा ''...कश्मीर सरकार और नेशनल कांफ्रेस, दोनों ने हमसे जोर देकर इस संधि को स्वीकार करने और हवा के रास्ते कश्मीर में सेना भेजने का अनुरोध किया। उन्होंने यह कहा कि विलय के प्रश्न पर कश्मीर के लोग, वहां शांति स्थापित होने के बाद विचार करेंगे. इसके बाद भारत ने संयुक्त राष्ट्रसंघ से अनुरोध किया कि वह हमले में कब्जा की गई भूमि भारत को वापिस दिलवाए और अपनी देखरेख में कश्मीर में जनमत संग्रह करवाए। इसके बाद विभिन्न कारणों से जनमत संग्रह करवाने का कार्य टलता रहा।

इसके समानांतर, भारत में एक नई प्रक्रिया शुरू हो गई। जनसंघ के मुखिया श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने जनसंघ और पर्दे के पीछे से कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के समर्थन से यह मांग उठानी शुरू कर दी कि कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय होना चाहिए। उस दौर में नेहरू बाहर से जनसंघ और कांगे्रस के अंदर से अपने कई वरिष्ठ मंत्रियों के भारी दबाव में थे जो यह चाहते थे कि कश्मीर को पूरी तरह से भारत में मिला लिया जाए। नेहरू ने कहा ''हमें दूरदृष्टि रखनी होगी। हमें सच्चाई को उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा। तभी हम कश्मीर का भारत में असली विलय करवा सकेंगे। असली एकता दिलों की होती है। किसी कानून से, जो आप लोगों पर थोप दें, कभी एकता नहीं आ सकती और न सच्चा विलय ही हो सकता है।''

तबसे झेलम में बहुत पानी बह चुका है। साम्प्रदायिक ताकतों के ब़ते शोर, गांधीजी की हत्या और भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के उभार ने शोख अब्दुल्ला को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं उन्होंने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाकर गलती तो नहीं कर दी। वे धर्मनिरपेक्षता के हामी थे परंतु उन्हें यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि देश के अन्य हिस्सों में फिरकापरस्त ताकतें आंखे दिखा रही हैं। उन्होंने अपने मन की पीड़ा और संशय को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया जिसके नतीजे में उन्हें 17 साल जेल में काटने पड़े। और इसके साथ ही शुरू हुआ कश्मीर की जनता का भारत से अलगाव। पाकिस्तान ने आग में घी डालते हुए असंतुष्ट युवकों को हथियार उपलब्ध करवाने शुरू कर दिए। सन 1980 के दशक में अल्कायदा के लड़ाकों की कश्मीर में घुसपैठ से हालात और बिगड़े। ये लोग अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को खदड़ने का अमेरिका द्वारा प्रायोजित अपना मिशन पूरा कर चुके थे और उनके पास करने को कुछ नहीं था। लिहाजा, उन्होंने कश्मीर में घुसकर जेहाद की अपनी मनमानी परिभाषा के अनुरूप काम करना शुरू कर दिया। कश्मीरियत पर आधारित आंदोलन का साम्प्रदायिकीकरण हो गया। कश्मीर की जनता का संघर्ष जेहाद का तोड़ामरोड़ा गया संस्करण बन गया। कश्मीरियत की बात हवा हो गई। इसके नतीजे में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया जाने लगा और साम्प्रदायिक ताकतों को यह कहने का अवसर मिल गया कि मुसलमान अलगाववादी, देशद्रोही, हिंसक और साम्प्रदायिक हैं।

इस सदी की शुरूआत के साथ ही कश्मीर में हालात बेहतर होने शुरू हुए। परंतु लोगों का गुस्सा अब भी शांत नहीं हुआ था। यह गुस्सा पत्थरबाजी करने वाले दलों के रूप में उभरा। भारत सरकार ने इस असंतोष को दूर करने के लिए वार्ताकारों का एक दल नियुक्त किया। दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एम. एम. अंसारी के इस समूह ने अपनी रपट (मई 2012) में 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली की मांग को खारिज करते हुए यह सिफारिश की कि कश्मीर को वह स्वायत्ता दी जानी चाहिए, जो उसे पहले प्राप्त थी। दल ने यह सुझाव भी दिया कि संसद कश्मीर के संबंध में कोई कानून तब तक न बनाए जब तक कि उसका संबंध राज्य की आंतरिक या बाह्य सुरक्षा से न हो। टीम ने अनुच्छेद 370 को 'अस्थायी' के स्थान पर 'विशेष' प्रावधान का दर्जा देने की सिफारिश भी की। दल की यह सिफारिश भी बिलकुल उचित थी कि शनै:शनै राज्य के प्रशासनिक तंत्र में इस तरह परिवर्तन लाया जाए कि उसमें स्थानीय लोगों का प्रतिनिधित्व ब़े। उसने वित्तीय शक्तियों से लैस क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना की बात भी कही और यह भी कहा कि हुरियत और पाकिस्तान के साथ वार्ताएं फिर से शुरू की जाएं ताकि वास्तविक नियंत्रण रेखा के दोनों ओर तनाव घट सके। भाजपा ने इस रपट को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इससे कश्मीर में भारत विलय कमजोर होगा। अलगाववादियों ने कहा कि रपट में की गई सिफारिशों अपर्याप्त हैं और इनसे समस्या का राजनैतिक हल नहीं निकलेगा।

धारा 370 पर बेशक बहस हो। परंतु हम सबको यह समझना होगा कि कश्मीरी आखिर चाहते क्या हैं? अतिराष्ट्रवादियों की उन्मादी बातें केवल घावों के भरने की प्रक्रिया को धीमा करेंगी और राज्य में प्रजातंत्र की जड़ों को कमजोर। जैसा कि नेहरू ने कहा था, सबसे जरूरी है लोगों का दिल जीतना। कानून उसके बाद बनाए जा सकते हैं। लोगों की आकांक्षाओं को समझकर ही उन्हें अपना बनाया जा सकता है। दंभपूर्ण बातों और आक्रामक तेवरों से लाभ कम होगा हानि ज्यादा।

08 December 2013

क्या राहुल बनाम मोदी की लड़ाई में राहुल गांधी की पोल खुल गई है ?

साल 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व सेमीफाइनल माने जा रहे चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम जिस प्रकार से भाजपा के पक्ष आये है। इसे लेकर लोग सवाल पूछ रहे है क्या वाकई राहुल बनाम मोदी की लड़ाई कांग्रेस पार्टी के युवराज राहुल गांधी की पोल खोल दी है। बीजेपी मध्य प्रदेश में सत्ता में फिर वापसी कर रही है और उसने राजस्थान से कांग्रेस को बाहर कर दिया है। दिल्ली में भी भाजपा सत्ता के करीब है। तो वहीं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर में भाजपा कांग्रेस से आगे निकल गई है।

इन रूझानों के आधार पर दिल्ली के केन्द्रीय सिंहासन के उत्तराधिकारी की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। भाजपा की बढ़त से अब ये बात स्पष्ट हो चुकी है कि मोदी बनाम राहुल की लड़ाई जनता ने काफी हद जगजाहीर कर दी है। चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में जिस कदर उभरकर सामने आया है उससे राहुल की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कटघरे में है। तो वहीं बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के सिर जीत का सेहरा बंधना लगभग तय माना जा रहा है। राहुल की अघोशित पीएम पद की उम्मीदवारी पर अब सवाल उठने लगा है कि क्या कांग्रेस अपने युवराज को अब भी मोदी के मुकाबले बेहतर मानती है? या फिर पोल खुलने के बाद पार्टी आलाकमान अपने रणनीतियों में कोई बदलाव लाएगी? एक ओर मोदी के पीएम बनने का सपना तो दुसरी ओर राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य दोनों एक साथ जुड़ा हुआ है जिसका फैसला जनता को 2014 में करना है।

रूझानों के बाद दोनों पार्टियों के बीच जुबानी जंग शुरू हो गई है। चार राज्यों में जीत का श्रेय बीजेपी मोदी को देना चाहती है, तो वही कांग्रेस इसे इनकार कर रही है। क्योकि उनके युवराज की पोल खुलती नज़र आरही है। कांग्रेस में चुनावी कमान पार्टी उपाध्यक्ष की कुर्सी संभालने के बाद राहुल गांधी के हाथ में आई है। तो वहीं भाजपा में नमो नाम की गूंज हर ओर सुनाई दे रही है। मगर आज के परिणामों से लगता है कि नमो नाम की गूज 10 जनपथ कि गलियारों में दस्तक दे चुकी है। जिसे लेकर सत्ता की साख और युवाराज की राज दोनों घुंधली हो चली है। 

चुनावों में हार या जीत नरेंद्र मोदी को पार्टी के अंदर ही नहीं बल्कि देश की जनता के बीच उनकी हैसियत दिखा दी है। साथ ही राहुल को भी कुछ इसी तरह की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस की हार ने देशभर में राहुल के नेतृत्व में पार्टी के आगे बढ़ने को लेकर सवाल खड़े होने लगा है। भाजपा को अब उम्मीद दिखने लगी है कि विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल के नतीजों से 2014 के लोकसभा चुनाव के फाइनल में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की राह आसान हो गई है। तो वहीं कांग्रेस अपनी जमीन बचाने की जुगत में है। भाजपा ने इसे अपना अंतिम लक्ष्य बना लिया है लेकिन इस मामले पर कांग्रेस में अनश्चियता और घबराहट का माहौल है। ऐसे में स्पष्ट है कि भाजपा जहां इस मुकाबले को अवश्यंभावी बना देना चाहती है, वहीं कांग्रेस को इस स्थिति से डर लग रहा है। मोदी जहां गुजरात में अपना काम दिखाने का दावा करते हैं वहीं राहुल गांधी अनुभव, परिपक्वता और काम दर्शाने के मामले में कमजोर साबित नजर आते हैं। मगर अब रहे सहे कसर चार राज्यों के चुनाव नतीजों ने पूरे कर दिए है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या राहुल बनाम मोदी की लड़ाई में राहुल गांधी की पोल खुल गई है?

अयोध्या की अनोखी कहानी !

ये पिछले साल अक्तूबर-नवम्बर की बात है। अयोध्या के अंधेरी रातों में सर्दी पर्याप्त थी। मैं फैजाबाद के स्टेशन पर देर रात उतरा था। उस वक्त फैजाबाद के कई ग्रामीण इलाक़ों में सांप्रदायिक हिंसा के कारण कर्फ्यू लगा हुआ था, पता चला कि शहर भी मेरे पहुँचने से पहले तक कर्फ़्यूग्रस्त था। बहरहाल, सुबह मैं स्टेशन से सटे जिस मकान में रुका था वहाँ की छत पर चढ़ गया और दूर तक क्षितिज निहारने लगा। मेरा क्षितिज ताकना अनायास नहीं था। दरअसल अयोध्या और बाबरी ध्वंस के संदर्भ में किस्से-कहानियों व दंतकथाओं से आगे बढ़कर मैं जिस हिन्दी पुस्तक को पढ़कर अयोध्या और उसके आंदोलन से रूबरू हुआ था, उसके लेखक ने किताब के शुरुआती पन्नों में कहा था कि यहाँ के साफ मौसम में हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ देखी जा सकती हैं।

उस बड़े लेखक ने खुद को अवध का मूल निवासी बताते हुए “अयोध्या के संदर्भ में विभिन्न विषयों पर दूसरे क्षेत्रों (शेष भारत ) के लेखकों के अधिकांश लेखन को तथ्यहीन करार दिया। हालांकि पुस्तक के प्रकाशित हुए बहुत साल नहीं हुए लेकिन उक्त लेखक का बचाव करते हुए मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि वैश्वीकरण से बढ़े प्रदूषण के कारण मैं, फैजाबाद की सरजमीं से हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ देखने से महरूम रह गया। सुबह बीतने के साथ अयोध्या को लेकर मेरा यह भ्रम बुरी तरह टूट चुका था। आपको लग रहा होगा कि मैं अपने गैरइरादे अनुभव का जिक्र क्यों कर रहा हूं। दरअसल अयोध्या में जो है और अयोध्या में जो नहीं है उसका अयोध्या से जुड़े भ्रमों से जबर्दस्त साबका है, जिसके लिए मैंने अयोध्या से जुड़े एक मामूली उदाहरण का सहारा लिया। 

दुर्भाग्य ही है कि जो अयोध्या की असलियत नहीं है, उसे ही तमाम व्यक्ति, संगठनों ने अपने अतिरेकी सिद्धांतों के लेखन, प्रचार-प्रसार से अयोध्या का सच साबित करने का प्रयास किया। अगर धर्म के नाम पर दुकानदारी की गई तो अयोध्या से जुड़े कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों ने भी सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर अवैध कारोबार किया। लोगों ने पुरस्कार बटोरे, किताबें लिखीं और अपने नकली चेहरों को चमकाया जबकि अयोध्या की जो हकीकत है वह हर बार शोर और गुबार में दबी ही रह जाती है। अफसोसजनक है कि अयोध्या के इतिहास को रथयात्रा और ध्वंस के इतिहास से ही जोड़कर देखा जाता है। उसके तमाम संदर्भ जानबूझ कर नजरअंदाज कर दिए गए। अयोध्या के संदर्भ में स्थिति यह हो गई कि किवदंतिए इतिहास का मौखिक वाचन, आज कुछ संगठनों और व्यक्तियों की बदौलत दस्तावेज बन पड़े हैं। जो वाकई इतिहास का दस्तावेज था उसकी वस्तुनिष्ठता ही संदिग्ध हो गई है। रथयात्रा काल से अयोध्या को लेकर जो इतिहास-भूगोल गढ़ा गया उसकी संरचना का आधार और केंद्रबिन्दु केवल कुछ संगठनों और लोगों की निजी महत्वाकांक्षाएँ भर हैं।

बहरहाल, विवादित अयोध्या की हकीकत को लेकर सवाल उठता है कि क्या इतिहास के उन अध्यायों को एक बार फिर परखने की जरूरत नहीं है। अयोध्या से जुड़े अनर्गल कारोबार से संवेदनशीलता और मानवीयता पर जो ख़तरा पड़ा उन्हें क्या ठीक करने की जरूरत नहीं है ! 92 की अयोध्या को लेकर रिश्तों की विरासत पर जो धूल जमीं है उन्हें साफ नहीं किया जा सकता क्या? आखिर 6 दिसंबर 1992 की तारीख से मिले अंजाम और साबिके से पैदा हुए सवालात का जवाब क्यों न ढूँढा जाए। इस दिन की एक दुर्घटना ने न सिर्फ भारतीय राजनीति और समाज बल्कि यूँ कहें कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक समरसता पर करारी चोट की तो गलत नहीं होगा। इस तारीख के जख्म अभी भी हरे ही हैं। इस बीच अयोध्या विवाद के कई पड़ाव गुजरने के बावजूद अभी और कई सुनवाइयाँ बाकी हैं जिन्हें साझी विरासत वाली जनता की अदालत में दर्ज करना होगा।

आज बहुत कम लोग इतिहास की इस सचाई को मानने के लिए तैयार हों कि कभी यहाँ मंदिर-मस्जिद का विवाद ही नहीं था। यह उस दौर के दस्तावेज की कहानी है जब नवाब शुजाऊद्दौला पोषित अयोध्या की अपनी तहजीब थी। वह तहजीब, जिसे पूरी दुनिया गंगा-जमुनी तहजीब के तौर पर देखती है। 1756 के आस-पास जब नवाब साहब ने फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाया तो हनुमानगढ़ी के निर्माण के लिए 57 एकड़ जमीन दान में दी थी। हनुमानगढ़ी के वास्तु और अभिलेखों में वह बात आज भी दर्ज दिखाई देती है, जीते-जागते दस्तावेज की तरह। हनुमानगढ़ी का निर्माण नवाब साहब की मौत के बाद आसिफ़ुद्दौला के दौर में पूरा हुआ। गढ़ी का संविधान फारसी में तैयार हुआ था। उस संविधान के कारण आज भी गढ़ी के सर्वोच्च पदाधिकारी को “गद्दीनशीन” कहकर पुकारा जाता है। अयोध्या के दर्जनों मंदिरों के निर्माण के इतिहास का दस्तावेजी साक्ष्य यही है कि यह अधिकांश मुस्लिमों द्वारा दान दी गई जमीन पर तैयार की गई। यहाँ तक कि बहुत बाद में वाजिद अली शाह के दौर में भी उनकी मदद से करीब 30 मंदिरों का निर्माण अयोध्या में हुआ। अयोध्या में हिन्दू निर्माणों का इतिहास दस्तावेज के रूप में अभी भी मौजूद है।

बाबर और अयोध्या : जो इतिहास के विद्यार्थी नहीं होंगे या जिन्होंने इतिहास का व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया है उनके लिए इतिहास जानने का स्रोत श्रुति परंपरा रही है। श्रुति परंपरा के संदर्भ में दावा तो नहीं किया जा सकता लेकिन आमतौर पर ऐसे इतिहासों में तोडमरोड़ की बहुलता ज्यादा होती है। अगर किसी इतिहास न जानने वाले से सवाल किया जाए कि बाबर का संबंध अयोध्या से क्या था, तो यह जवाब पाने गुंजाइश बहुत ज्यादा गुंजाइश होगी कि “बाबर ने वहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई”। यह बहुलतावाद के प्रचारतंत्र द्वारा इतिहास की स्थापना का एक रूप है। लेकिन अगर जवाब देने वाले उसी आदमी को यह बताया जाए कि बाबर ने अयोध्या के कई मंदिरों को भूमि और प्रश्रय दिया तो बहुत कम लोग इसे मानने को तैयार होंगे। जबकि इसके दस्तावेज उपलब्ध हैं। उल्लेखनीय है कि बाबर ने हनुमान गढ़ी से रामघाट तक करीब 121 एकड़ जमीन अयोध्या के आचार्य छत्रस्वामी को दान दी थी। 1605 में अकबर ने भी राम और सीता के मुद्रण वाले सोने के सिक्के चलवाये।

साझी विरासत साझी शहादत : दरअसल 90 के दशक में अयोध्या के मंदिर आंदोलन की गुंजाइश ही नहीं होती। अगर इतिहास ने मौका दिया होता तो शायद 1857 के आस-पास ही यह विवाद हमेशा के लिए हल हो गया होता। यह 57 के गदर के दौर की बात है, जब साझी विरासत के यकीन से हल होने वाला मामला अंग्रेजी हुकूमत की फितरत का शिकार हो गया। आप यकीन मानिए ये ठाकरे बंधुओं की किवदन्ती से बढ़कर ज्यादा मार्मिक और ज्यादा उत्सर्ग वाली कहानी है। यह हिन्दुस्तान के साझी विरासत और साझी शहादत की कहानी है। हिन्दू-मुस्लिम पहचान से परे  अयोध्या के उस दौर की कहानी, जब यहाँ के मठ-मंदिर क्रांतिकारियों की शरणस्थली और रसद का प्रमुख केंद्र थे। उस दौर में अंग्रेजों ने साझी संस्कृति को तोड़ने का बहुत प्रयास किया लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। हालांकि शायद तभी से मंदिर-मस्जिद के विवाद की सुगबुगाहट भी साझी विरासत को तोड़ने के लिए शुरू हो गई थी। जब विवाद बड़े उद्देश्य और महान विरासत के आड़े आने लगा तब फैजाबाद, हसनू कटरा मोहल्ले के अमीर अली, हनुमान गढ़ी के पुजारी बाबा रामचरण दास और अयोध्या के अच्छन खाँ आगे आए। ये तीनों बागियों के नेता भी थे और गदर में शामिल क्रांतिकारियों का नेतृत्व करते थे। उस वक्त तीनों ने सूझ-बूझ से विवाद के निपटारे के लिए आम राय भी कायम कर ली थी।

26 जून 1857 को फैजाबाद की बादशाही मस्जिद में हुई मुसलमानों की बड़ी सभा में बाबरी मस्जिद को हिंदुओं को देने का ऐलान भी कर दिया गया था। लेकिन यह क्रूर इतिहास को शायद मंजूर नहीं था। तब अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर अयोध्या की साझी सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के लिए हद दर्जे की क्रूरता दिखाई। तीनों बागी नेताओं को पकड़ लिया गया और उन्हें खूब यातनाएँ दी गई। क्रांतिकारियों के संदर्भ में तीनों ने अपनी जबान नहीं खोली। अच्छन मियाँ के सिर को रेती से रेत दिया गया था जबकि अधिग्रहित परिसर में स्थित कुबेर टीला की इमली पेड़ पर बाबा रामचरण दास और अमीर अली को खुलेआम फाँसी दी गई थी। बागियों की शहादत के साथ विवाद का निपटारा वक्त की थपेड़ों को सहने के लिए जिंदा बच गया। अंग्रेजी राज में रोक के बावजूद कुबेर टीला पर बरसों शहीदों की याद में मेले लगते रहें। इससे आजिज़ अंग्रेजों ने बहुत बाद में 28 जनवरी 1935 को पेड़ कटवाकर शहादत के ऐतिहासिक मेले को समाप्त करवा दिया। 92 के बाद पनपी नफरत की सियासत के कारण साझी विरासत की उस महान परंपरा को याद करने के लिए अब किसी के पास इतिहासबोध और समय नहीं है।    
  
अयोध्या के जातीय राम : राम के जीवन गाथा की कई कहानियाँ हैं। कई पर भारी भरकम शास्त्रीय विवाद भी। लेकिन अयोध्या में राम सबके हैं और सब राम के। जानकर आश्चर्य होगा कि 92 से पहले तक न सिर्फ अयोध्या बल्कि अवध के साथ दूसरे कई इलाक़ों में धार्मिक रूप से अलग, विभिन्न समाजों के लोग एक-दूसरे का अभिवादन “जय सिया राम” के घोष से किया करते थे। त्रिशूल के साथ पैदा हुई सियासत ने इसे “जय श्री राम” के जयघोष के रूप में तब्दील कर दिया। जाहिर है अब गुलाम अली, रुस्तम और जल्ला जैसे अवधी लोग मानसिक रूप से इस नए अभिवादन घोष को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं। इतिहास की एक करवट ने सदियों की समरसता को कमजोर कर दिया। बावजूद अभी भी फैजाबाद व अयोध्या में अलग-अलग जातियों के राम विराजमान हैं। अच्छी बात यह है कि वे विवादित नहीं हैं। राम को अपनी बपौती मानने वाले लठैत संगठनों से अलग अयोध्या में सभी जातियों के पंचायती श्रीराम जानकी मंदिर मौजूद हैं। अयोध्या में जातीय मंदिरों की लंबी शृंखला है। जिसमें कोरी मंदिर, विश्वकर्मा मंदिर, प्रजापति मंदिर, निषाद मंदिर, पासी मंदिर, मुराव मंदिर, क्षत्रीय मंदिर, बरई मंदिर, हलवाई मंदिर, बेलदार मंदिर, यादव मंदिर, रविदास मंदिर, खटिक मंदिर आदि जातीय मंदिर मौजूद हैं। अयोध्या जातियों के साथ धर्मों की साझा संगम स्थली है।

विवादित जमीन और किसानों का पक्ष :  ढाई दशक पहले अयोध्या में जो विवाद खड़ा हुआ उसके कई दूसरे पक्ष भी हैं। खासकर रामकथा पार्क का मामला बहुत ही दिलचस्प है। इस विवाद का जन्म 1988-89 से शुरू हुआ। इसकी शुरुआत में रामकथा पार्क बनाने के लिए भूमि अर्जन अधिनियम 1884 के तहत 59.93 एकड़ भूमि का अधिग्रहण था। इसमें शामिल 29 एकड़ कृषि योग्य जमीन बेनामा (पूरी मालियत की) थी। इसमें 30 एकड़ जमीन नजूल विभाग की थी। जिसे सरकार ने पट्टे पर दिया था। अधिग्रहित 30 एकड़ जमीन के लिए लोगों को मुआवजा नहीं दिया गया। सरकार द्वारा निरस्त किए गए पट्टे के कारण कई भूमिहीन हिन्दू और मुसलमान मुआवजे के दावेदार नहीं बन पाए। राज्य सरकार ने सिर्फ 15 रु. वर्गफ़ीट के हिसाब से केवल 29 एकड़ जमीन का मुआवजा दिया।  सरकार ने एक करोड़ सत्तानबे लाख इकत्तीस हजार आठ सौ तीन रुपये की मुआवजा रकम आदेश के साथ पर्यटन विभाग फैजाबाद को दी। फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी ने 16 प्रभावित किसानों को 15 रु. की जगह 2.40 पैसे प्रति वर्ग फीट के हिसाब सिर्फ 80 फीसदी किसानों को से मुआवजा देने की गलत प्रक्रिया पूरी की। किसानों ने मुआवजा ले लिया यह ऐतिहासिक तथ्य है लेकिन यह भी तथ्य है कि मुआवजा आपत्ति के साथ लिया गया। फिर 20 मार्च 1992 के दिन राज्य की तत्कालीन कल्याण सरकार ने रामकथा पार्क के लिए अधिग्रहित की गई 55.674 एकड़ जमीन को रामजन्म भूमि न्यास को सौंप दिया। जमीन 1 रु प्रति वर्ष की लीज पर 99 साल के लिए दी गई थी। हालांकि पर्यटन विभाग द्वारा लिया गया यह फैसला न्यायालय पहुँच गया। जहाँ अवांछित लीज को निरस्त कर दिया गया।

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। अयोध्या सहित पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में सांप्रदायिक हिंसा हुए जो इतिहास का काला अध्याय हैं। बहरहाल, 7 जनवरी 1993 को अयोध्या में “कतिपय क्षेत्र अधिनियम-93” के तहत रामकथा पार्क और विवादित परिसर के आस-पास कुल मिलाकर 67 एकड़ जमीन, जिसमें कई हिन्दू और मुसलमान शामिल थे, उनके रिहाइशी मकान, दुकान और कई मंदिर का भी अधिग्रहण कर लिया गया जबकि मस्जिद को लेकर जिस भूमि का विवाद है उसका रकबा केवल 2.77 एकड़ ही है। अधिग्रहण से प्रभावितों ने सर्वोच्च न्यायालय में मामला दायर किया। उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने संबंधित कानून की धारा 4(3) के तहत रामकथा पार्क के अधिग्रहण को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने जमीन का स्वामित्व भी केंद्र सरकार की बजाए राज्य सरकार को सौंप दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रामकथा पार्क परियोजना के कारण प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा राज्य सरकार ही दे। क्योंकि 1993 में जब केंद्र सरकार ने जमीन अधिग्रहित की तब रामकथा पार्क उत्तर प्रदेश सरकार के नाम दर्ज थी। सियासत के कारण प्रभावित हुए किसान 24 सालों से अपनी किस्मत पर आँसू बहा रहे हैं।

हालांकि अधिग्रहण के वक्त प्रभावितों को बहुत सब्जबाग दिखाए गए थे। उन्हें मुआवजे के साथ ही सरकारी नौकरियां देने का आश्वासन दिया गया। लेकिन हुआ क्या। रामकथा पार्क के नाम पर हुए अधिग्रहण पर कोर्ट की टिप्पणी के बाद पार्क बनाने की परियोजना यहाँ की बजाए दूसरी जगह शिफ्ट कर दी गई। सरयू किनारे स्थित नयाघाट पर रामकथा पार्क का निर्माण भी हो गया। 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के हाथों पार्क का उद्घाटन हुआ। दिलचस्प है कि जब पार्क बनाने के लिए जमीन का इस्तेमाल नहीं किया गया तो कायदे से जमीन को संबंधित प्रभावितों को लौटा दी जानी थी। संबंधित किसान ऐसी माँग भी कर रहे हैं। पर ऐसा होता दिखाई नहीं देता। वस्तुस्थिति यह है अधिग्रहित जमीन रामजन्म भूमि समिति और बाबरी मस्जिद कमेटी के बीच विवाद का प्रश्न बन गई है। सुरक्षा और अयोध्या के विकास के नाम पर हर वर्ष करोड़ों रुपये का बजट जारी होता है लेकिन सरकार के पास अधिग्रहण से भूमिहीन किसानों के लिए कोई योजना नहीं है। सरकार के कोरे आश्वासन सरयू में डूब चुके हैं। विवाद के दोनों पक्षकारों ने भी कभी अधिग्रहण से प्रभावित हुए लोगों का पक्ष जानना मुनासिब नहीं समझा। प्रभावितों के सामने यक्ष प्रश्न है कि क्या उनके जख्मों पर मरहम लग पाएगा और अधिग्रहण से प्रभावित हुए तमाम गरीब-गुरबे हिन्दू-मुसलमानों का सुकून लौट पाएगा?

07 December 2013

क्या मुस्लिमों में मोदी नाम का खौफ पैदा किया जा रहा है ?

मोदी बनाम मुस्लिम का मुद्दा बढ़ती ठंढ में फिर से गर्म हो चला है। मगर मुद्दे का माहौल इस बार मोदी ने नहीं बल्कि अयोध्या मालिकाना हक मुकदमे में सबसे पुराने वादियों में से एक मोहम्मद हाशिम अंसारी ने उठाया है। मोहम्मद हाशिम का दावा है कि कांग्रेस मुस्लिमों के दिल में नरेंद्र मोदी का खौफ पैदा कर रही है। हाशिम  यहीं नहीं रूके उन्होने ये भी कहा कि भाजपा नेता को प्रधानमंत्री बनने के लिए मुस्लिम समुदाय के समर्थन की जरूरत है। बाबरी विध्वंस के 21 साल पूरे होने के मौके पर 92 साल के हाशिम ने कहा, ‘‘नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए मुस्लिमों के पूरे समर्थन की जरूरत है।’’ गुजरात के मुसलमान खुशहाल और संपन्न भी हैं। हाशिम ने कहा, कांग्रेस यह कह कर मोदी का खौफ पैदा कर रही है कि यदि वह प्रधानमंत्री बन जाएंगे तो मुस्लिम समुदाय के लिए इसके गंभीर परिणाम होंगे।

मोहम्म हाशिम ने सवालों की झड़ी लगाते हुए कांग्रेस पार्टी को जमकर लताड़ लगाई। हाशिम ऐसा मानते है कि मुस्लिम 50 साल से ज्यादा समय से कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं पर बदले में पार्टी ने उन्हें तोहफे के तौर पर सिलसिलेवार सांप्रदायिक दंगे दिए हैं। हाशिम ने समाजवादी पार्टी पर भी अपना भड़ास निकाली। पार्टी पर आरोप मढ़ते हुए सपा सरकार के मुस्लिम मंत्रियों को ‘‘शक्तिहीन’’ करार दिया। वहीं हाशिम ने आरोप लगाया कि सपा सरकार कांग्रेस की राह पर ही चल रही है जिसने ‘‘दंगों के जरिए मुस्लिमों को दबाकर रखा’’। हाशिम  के बयान से सवाल उठना लाजमी है कि क्या वाकई चाहे कांग्रेस हो या सपा मोदी नाम का खौफ पैदा कर रही है? क्या ये पार्टीयां सिर्फ मुस्लिम मौकापरस्ती की राजनीति के मातहत ही देश में सत्ता स्थापित करना चाहती है?

हाशिम के बयान से ये कहना गलत नहीं होगा कि बीजेपी के ओर से पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लहर वाकई देश में चल चुकी है। साथ ही देष की जनता चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम रामराज या अल्लाह अलाप वायदे से इतर हट कर विकासवादी छवि को प्राथमिकता दे रही है। हाशिम के आरोपों से राजनीतिक बवंडर अपने चरम सिमा पर है। क्योकि हाशिम ने उस सच्चाई को कुरेदा है जो लोग कलतक बुर्के के आड़ में सत्ता की सैर कर रहे थे।  हाशिम अंसारी कोई पहले ऐसे व्र्यिक्त नहीं हैं जिन्होने कांग्रेस या सपा की हकीकतों से पर्दा उठाया है। इससे पहले जमियत उलेमा ए हिन्द के महासचिव मदनी ने भी कहा था कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों को ‘‘नकारात्मकता की बुनियाद पर नहीं बल्कि सकारात्मकता की बुनियाद पर वोट पाने की कोशिश करनी चाहिए, सेकुलर दलों को बताना चाहिए कि विभिन्न राज्यों में उनकी सरकारों ने क्या किया. कौन से वायदे उन्होंने पूरे किए और कौन से पूरे किए जाने बाकी हैं. उन्हें इस आधार पर वोट मांगने चाहिए न कि किसी का खौफ दिखा कर.’’ 

तो ऐसे में ये सवाल  गलत नहीं होगा कि खौफदारी के नाम पर सत्ता की दावेदारी क्या उस मुहाने पर आकर खड़ी होगई है जहा पर मोदी नाम खौफ और सेकुलरवादी नाम उदारवादी है? या फिर सेकुलरवादी आज कटघरे में है और उसके पहिए विकासवादी पुरूस की तलास में आस लगाए उस रास्ते पर आकर खड़े है, जहा पर आज हरएक तबका विकास के पंख लगाकर आसमां में उड़ान भरना चाहता है? यह बदलती राजनीति की वो तस्वीर है जिसका सामाजिक और राजनीतिक मायने आप खुद लगा सकते हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या मुस्लिमों में मोदी के नाम का सिर्फ खौफ पैदा किया जा रहा है?

06 December 2013

किसके लिए है सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम बिल ?

विपक्ष के जोरदार विरोध के कारण ठंडे बस्ते में पड़े सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक को सरकार एक बार फिर संसद में पास कराने पर उतारू है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जहां विधेयक को राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण बताते हुए इसका विरोध कर रहे है वहीं गृह मंत्रालय अधिकारियों का कहना है कि विधेयक खासतौर पर मुस्लिमों की मांग से जुड़ा है। गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय के अधिकारियों ने भी मसौदे के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। जबकी भाजपा इसे खतरनाक और बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ बता रही है।

विधेयक के अनुसार केंद्र हिंसा वाले इलाके में अर्धसैनिक बलों को तैनात करने का अधिकार रखता है जिसका राज्य सरकारें विरोध कर रही है । इसमें हिंसा वाले राज्य के मुकदमे दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने और गवाहों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का भी प्रस्ताव है। साथ ही सांप्रदायिक हिंसा फैलने पर नौकरशाहों पर कर्रवाई करने का कड़ा प्रावधान है। अधिकारियों का कहना है कि ये प्रावधान सामान्य ड्यूटी निभाने में बाधा पैदा करेगा। प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक हिंदू और मुस्लिम दंगापीडि़तों के लिए अलग-अलग अदालतें बनाने की बात कही गई है ताकि हिंदू और मुस्लिम आरोपियों पर अलग- अलग मुकदमा चलाया जा सके। ऐसे में बिल के इस प्रावधानों से सवाल खड़ा होता है कि क्या ये बिल साम्प्रदायिक दुर्भावना और ध्रुवीकरण को वैधता नहीं करेगा? क्या कथित अपराधियों को अल्पसंख्यकों, बहुसंख्यकों में बांट कर न्याय किया जा सकता है? हिंदू और मुस्लिम पीडि़तों में अंतर करने वाले कानून के आधार पर साम्प्रदायिकता और विभाजन का इलाज संभव है?

अगर बहुसंख्यक की किसी बात से अल्पसंख्यक को मानसिक कष्ट होता है तो वह भी अपराध माना जायेगा। अल्पसंख्यक वर्ग के किसी व्यक्ति के अपराधिक कृत्य का शाब्दिक विरोध भी इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध माना जायेगा। यानि अब दाउद को फांसी की मांग हो या फिर बांग्लादेशी घुसपैठियों के निष्कासन या धर्मान्तरण पर रोक लगाने संबंधि अभियान ये सब भी  अपराध बन जायेगा? जानकारों का मानना है कि अगर ये बिल अगर पास हो गया तो देश को टुकड़े में विभाजित होने से कोई रोक नहीं सकता। साथ ही देश की संघीय ढाचे पर प्रहार का एक नया औजार केन्द्र सरकार को मिल जाएगा।यदि किसी संगठन के कार्यकर्ता पर साम्प्रदायिक घृणा का कोई आरोप है तो उस संगठन के मुखिया पर भी शिकंजा कसा जा सकता है।

यदि कोई हिन्दू मुस्लिम वर्ग पर कोई जुल्म करता है तो बिना जांच के ही उसपर मुकदमा कर दिया जायेगा चाहे उसकी बातो में कोई सच्चाई हो या नहीं। आज देश में एक दर्जन राज्य मुस्लिम बहुल हो गए है और इन राज्यों में बड़े पैमाने पर हिन्दू निशाने पर है और तो और अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर आज तक जो हिंसा हुई है उसके मुख्य साजिसकर्ता एक खास समुदाय ही रहा है, तो क्या ऐसे में उसे दंडीत करने लिए सरकार कोई कानून बना सकती है? ऐसा तो बिल्कुल संभव नहीं लगता तो सवाल यहा भी खड़ा होता क्या सरकार का ये बिल दुर्भावनापूर्ण नहीं है? जिस तरह से औरंगजेब के साशन काल में हिन्दूओं पर कानूनी रूप से अत्याचार हुए क्या उसी साशनकाल को कांग्रेस भी दोहराना चाहती है?

अपराध करने वालों को संरक्षण देना और प्रतिक्रिया करने वाले को दण्डित करना क्या प्राकृतिक न्याय के खिलाफ नहीं है। भारतीय संविधान की मूल भावना के अनुसार किसी आरोपी को तब तक निरपराध माना जायेगा जब तक वह दोषी सिद्ध न हो जाये। परन्तु, इस विधेयक में आरोपी तब तक दोषी माना जायेगा जब तक वह अपने आपको निर्दोष सिद्ध न कर दे। इसका मतलब होगा कि किसी भी गैर हिन्दू के लिए अब किसी हिन्दू को जेल भेजना आसान हो जाएगा। वह केवल आरोप लगाएगा और पुलिस अधिकारी आरोपी हिन्दू को जेल में डाल देगा। इस विधेयक के प्रावधान पुलिस अधिकारी को इस कदर बाध्य करता है कि उसे अपनी प्रगति रिपोर्ट हर हाल में शिकायतकर्ता को निरंतर भेजनी होगी। देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने पहले ही कहा था कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है। तो क्या अब सरकार देश के कानून पर भी पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का ही होगा?

ट्रैप के तकनीक पर कानून का डंडा !

तकनीक के जिन पहियों पर सवार होकर हम विकास की मंजिलें तय कर रहे हैं, उनमें से एक अदृश्य पहिया है निगरानीतंत्र। आम बोल-चाल की भाषा में कहा जाए तो जासूसी। इस बगैर न सरकारें चलती हैं और न ही उसका सिस्टम। न बाजार चलता है और न ही कारोबार। प्यार-व्यार में भी यह दखल बना चुका है। संचार क्रांति के उन्नत शिखर पर खड़ी 21 वीं सदी की तकनीक व्यक्ति की निजता की रक्षा के लिए ताले बाद में बनाती है, उसे खोलने वाली सौ चाबियां पहले बन जाती हैं। इस निगरानीतंत्र का एक अहम हिस्सा है फोन टैपिंग। फोन टैपिंग तब से हो रही, जब से फोन अस्तित्व में आया है। पहले एक बड़े शहर में कुछ एक फोन होते थे अब एक छोटे से कस्बे में लाखों मोबाइल फोन होते हैं। काम मुश्किल है, लेकिन पुलिस, पैसे और पॉलिटिक्स हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। दरअसल देखा जाए तो हमारा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक ढांचा ही इस तरह का हो गया है, जहां हर तरफ अविश्वास के नाग फन काढ़े खड़े हैं। विभीषणों और मीर जाफरों को पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। इसका सस्ता और सुगम समाधान है फोन टैपिंग। असल बात पर आया जाए तो देश भर में दस लाख से ज्यादा फोन (मोबाइल+लैंडलाइन) कनेक्शन पूरे साल सरकार की निगरानी में रहते हैं।

हाल में भाजपा के शीर्ष नेता अरुण जेटली के फोन टैपिंग मामले में कुछ और गिरफ्तारियों से फोन टैपिंग फिर से सुर्खियों में है। अरुण जेटली के फोन कौन किसके लिए और किस मकसद से टैप करा रहा था, इसका पता तो नहीं चल सका है, लेकिन लंबे समय से चल रही इस निगरानी में मिस्टर एक्स (निगरानी कर रहे अज्ञात व्यक्ति) ने पहले कई प्राइवेट डिटेक्टिव्स की मदद ली। जासूसों को मालूम था कि सीडीआर यानी कॉल डिटेल रिकार्ड कैसे मिलेगी, इसलिए उन्होंने उन छोटे पुलिस वालों के सामने चुग्गा फेंका, जो उस एसीपी के मातहत थे, जिसका काम वैध रूप से विभिन्न मामलों में सीडीआर हासिल करना था।

अब इस मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने तीन पुलिसकॢमयों समेत छह लोगों को गिरफ्तार किया है। सभी आरोपी इस मामले के मास्टरमाइंड अनुराग सिंह नेटवर्क का हिस्सा थे। पुलिसकर्मी एक से दो हजार रुपए में किसी की भी  सीडीआर को जासूसी कंपनी के एजेंटों को थमा देते थे। चूंकि निचले ओहदे के इन पुलिसकर्मियों के पास अपने अफसर के लॉगइन और पासवर्ड होते थे, इसलिए यह मोबाइल फोन कंपनियों को सीडीआर की लिस्टिंग करते समय सूची में जासूसों द्वारा दिए गए नंबर डालने में परेशानी नहीं होती थी।  इससे पहले, पुलिस ने नई दिल्ली जिले में एसीपी (ऑपरेशन) के यहां तैनात कांस्टेबल अरविंद डबास के अलावा अनुराग सिंह, नीतीश कुमार व नीरज को गिरफ्तार किया था।

अनुराग के कंप्यूटर की जांच में पता चला था कि करीब 52 लोगों की सीडीआर पुलिसकॢमयों की मदद से निकाली जा चुकी है। अरु ण जेटली, विजय गोयल एवं कई अन्य नेताओं के अलावा कॉरपोरेट सेक्टर, न्यूज चैनलों के संपादकों तथा अन्य प्रभावशाली लोगों की सीडीआर निकाली गई थी। अरु ण जेटली समेत 30 लोगों की सीडीआर अरविंद डबास के माध्यम से निकाली गई थी। मामले में स्पेशल सेल ने अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी और 22 अन्य लोगों की सीडीआर निकालने की जांच जारी रही। जांच में पता चला कि हेड कांस्टेबल हरीश, एएसआइ गोपाल और कांस्टेबल हरीश ने इस गिरोह को सीडीआर सौंपी थी।

इस मामले में अब ताजा स्थिति यह है कि मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अमित बंसल ने आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मामले की जांच अभी अपने प्रारंभिक चरण में है और यदि आरोपियों को इस समय जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वे सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं। आरोपियों ने जानबूझकर और षड्यंत्र करके कई लोगों के निजता के अधिकार का हनन किया है और इससे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21  में उल्लेखित जीवन और स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार का अतिक्रमण हुआ है। इससे पहले पुलिस ने कांस्टेबल और तीन निजी जासूसों के खिलाफ इसी मामले में आरोप पत्र दाखिल किए थे, लेकिन चारों आरोपियों को दिल्ली की एक अदालत ने 30 मई को जमानत दे दी थी।

बहरहाल, अरुण जेटली के फोन निगरानी का मामला इसलिए भी गंभीर हो जाता है,  क्योंकि वह देश की एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और राज्यसभा में  प्रतिपक्ष के नेता हैं। इस मामले में अभी और खुलासे होने बाकी हैं। अभी तक पर्दे के पीछे बैठे अनाम किरदार मिस्टर एक्स का नाम सामने आना बाकी है। मिस्टर एक्स को क्या जरूरत थी कि पता करें कि किस दिन अरुण जेटली ने किससे बात की, इसका भी खुलासा होना है।

भाजपा के ही एक और नेता सुशील कुमार मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर भाजपा नेताओ  के फोन टैप कराने और स्टिंग ऑपरेशन करवाने का आरोप लगाया है। मोदी ने कहा कि सरकार की लगातार आलोचना से परेशान मुख्यमंत्री इस स्तर तक गिर गए हैं कि भाजपा नेताओ  की बातचीत सुनने के लिए उनके फोन तक टैप करवा रहे हैं। अगर ऐसा नहीं है तो कुछ दिन पहले हाजीपुर में भाजपा नेताओ  की अंदरूनी बातचीत की जानकारी मुख्यमंत्री तक कैसे पहुंच गई। मोदी ने आरोप लगाया कि नीतीश अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके विरोधियों के स्टिंग ऑपरेशन करवा रहे हैं। इसी तरह, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में दायर एक याचिका में राज्य के पूर्व पुलिस अधिकारी आरबी श्रीकुमार ने आरोप लगाया था कि उन्होंने कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला का फोन टैप करने का आदेश दिया था। साल भर पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने भी आरोप लगाया था कि जब उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से जुड़े एयरसेल-मैक्सिस मामले को उठाया तो सरकार ने उनके तथा उनके परिवार के फोन टैप करने के आदेश दिए थे।

इसी तरह, कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में उन मंत्रियों और अधिकारियों के फोन टैप किए जाने के मामले सामने आए थे, जो अपने नाम के बजाय दूसरे के नाम से लिए गए सिम का इस्तेमाल करते हैं। बाद में जब गृह विभाग ने रिकॉर्ड की गई बातों का ब्योरा मांगा तो पुलिस मुख्यालय ने गोपनीयता का  हवाला देते हुए ब्योरा देने से इनकार कर दिया था। मध्य प्रदेश पुलिस सुरक्षा और अपराधियों की गतिविधि पर नजर रखने के नाम पर गृह विभाग से हर माह औसतन दो सौ फोन टैप करने की अनुमति लेता है।

उधर, हिमाचल प्रदेश में पूर्व भाजपा सरकार के समय हुए फोन टैपिंग मामले में विजिलेंस इस मामले में संलिप्त तत्कालीन अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ करने जा रही है। यह पूछताछ पहली से सात दिसंबर तक पूरी की जानी है। इसके लिए विजिलेंस पूछताछ की प्रश्नावली में तैयार करने में जुट गई है। फोन टैपिंग मामले में फॉरेंसिक लैब की जांच रिपोर्ट का आकलन करने के बाद ही पूछताछ करने का निर्णय लिया गया है। अन्य कई राज्यों में फोन टैपिंग के बेजा और वाजिब इस्तेमाल जारी हैं।

भाजपा नेता अरुण जेटली के फोन टैप किए जाने के मामले में हाल में हुए नए खुलासे और गुजरात में एक युवती के फोन कथित रूप से टैप किए जाने के ताजा खुलासे के बाद उस टेलीग्राफ एक्ट पर बहस तेज हो गई है, जो सरकारों को किसी के फोन कॉल्स की खुफियागीरी की इजाजत देता है। ज्यादातर लोग उस अमेरिकी व्यवस्था की वकालत कर रहे  हैं, जिसके तहत न्यायालय को सबूतों के आधार पर किसी का फोन टैप करने की इजाजत देने का अधिकार है। इस मामले में याचिका दायर चुके पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर का मानना है कि नागरिका स्वतंत्रता काफी अहम है और उसे कार्यपालिका या गृह सचिव के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता है। इसमें गलत इजाजत दिए जाने का  खतरा रहता है और नाजायज टैपिंग हो सकती है।

टैपिंग संबंधी कानून:

वैसे तो फोन टैपिंग को भारतीय टेलीग्राफ कानून की धारा—पांच के सामान्य प्रावधानों के तहत मंजूरी दी जाती है। भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 के तहत केंद्र सरकार या राज्य सरकार को आपातकाल या लोक-सुरक्षा के हित में फोन कॉल्स को प्रतिबंधित करने एवं उसे टैप करने तथा उसकी निगरानी का अधिकार हासिल है। नियम 419 एवं 419 ए में टेलीफोन के कॉल्स और एसएमएस की निगरानी एवं पाबंदी लगाने की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है।

केवल सरकारी एजेंसियों को ही यह अधिकार हासिल है कि वह गृह मंत्रालय से पूर्व इजाजत लेकर किसी व्यक्ति का फोन टेप कर सकती हैं। हालांकि वित्त मंत्रालय एवं सीबीआई को यह अधिकार है कि सुरक्षा या कार्रवाई की वजह से वह गृह मंत्रालय की पूर्व इजाजत के बिना 72 घंटे तक किसी भी व्यक्ति के फोन कॉल को रिकॉर्ड कर सकती है।

गृह सचिव देता है अनुमति:  

फोन टैपिंग की इजाजत देने का अधिकार केंद्र और राज्य सरकारों के गृह सचिव को होता है। टैपिंग की अवधि दो महीने की होती है। अगर बहुत जरूरी हुआ तो इसे छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है। अवैध रूप से फोन टेप करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है और इसके लिए तीन वर्ष तक की कैद एवं जुर्माने का प्रावधान है। 

यह केवल सार्वजनिक आपातकाल या जनसुरक्षा के लिए ही किया जा सकता है। सन् 1997 में न्यायमूर्ति सच्चर की याचिका के जवाब में उच्चतम न्यायालय ने बातचीत टैप करने के पांच कारणों का निर्धारण किया था।  राष्ट्रीय संप्रभुता और एकता, राज्य की सुरक्षा, अन्य देशों के साथ दोस्ताना संबंध की स्थिति में, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और अपराध पर काबू पाने के लिए।

कड़े होंगे कानून:  

फोन टैपिंग को लेकर हाल के खुलासों से परेशान केंद्र सरकर टेलीफोन कॉल डाटा रिकार्ड (सीडीआर) हासिल करने की प्रक्रिया और कड़ी करने का मन बना चुकी है। एएसआई और पुलिस कांस्टेबिल स्तर के पुलिसकर्मियों द्वारा सीडीआर हासिल करने के ताजा खुलासों के बाद अब सरकार ने फैसला किया है कि अब मोबाइल कंपनियों से सीडीआर प्राप्त करने का अधिकार पुलिस अधीक्षक या उससे ऊपर के अधिकारी को दिया जाए। जल्द ही विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों द्वारा सीडीआर हासिल करने की प्रक्रिया को लेकर नए दिशानिर्देश जल्द जारी किये जाएंगे।

सीडीआर के लॉग का व्योरा रखने के बाद पुलिस अधीक्षक को अनिवार्यरूप से संबद्ध जिलाधिकारी के समक्ष हर महीने हासिल सीडीआर के बारे में सूचना देनी होगी। पुलिस अधीक्षक को किसी व्यक्ति का सीडीआर हासिल करने की वजह भी बतानी होगी और सुनिश्चित करना होगा कि डाटा गलत हाथों में न जाने पाए। जिलाधिकारी संबद्ध मुख्य सचिव को सूचना प्रेषित करेगा ताकि राज्यवार ब्योरा तैयार किया जा सके। गृह मंत्रालय के साथ सलाह—मशविरा कर दूरसंचार विभाग की ओर  से दिशा—निर्देश जारी किए जाएंगे। सरकार भारतीय टेलीग्राफ कानून को भी संशोधित करने का विचार कर रही है ताकि कुछ और एजेंसियों को सीडीआर एक्सेस की अनुमति दी जा सके, जिससे वे संदिग्ध व्यक्तियों और संगठनों पर निगाह रख सकें।

भुज का भयानक त्रासदी !

आप भूले नहीं होंगे। अभी अभी की बात है। इसी 15 अगस्त की। आजादी का जश्न मनाते हुए, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र दामोदारदास मोदी ने भुज की तरक्की का जिक्र किया था और उन्होंने देशभर के लोगों को भुज आने का न्योता भी दिया था। और किसी पर इसका असर हुआ कि न हुआ लेकिन नरेन्द्र भाई के इस न्योते ने मुझे भुज (गुजरात) जाने के लिए प्रेरित किया। यात्रा शायद इसलिए भी जरूरी लगी कि इसी भुज में आज से बारह साल पहले ऐसे ही आजादी के एक और पर्व गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 जनवरी 2001 को भुज में जन गण मन के साथ साथ उसे मटियामेट कर देनेवाला भयानक भूकंप भी आया था। उस भूकम्प में लगभग 19,000 लोगों की मृत्यु हुई। 16,7000 लोग घायल हुए। एक अनुमान के अनुसार, इस भूकम्प में गुजरात का 22,000 करोड़ का आर्थिक नुक्सान हुआ था। एक दशक से भी दो साल ज्यादा बीत गये और भूकंप के बाद मुख्यमंत्री बनकर आये नरेन्द्र भाई दामोदर दास मोदी ने भुज आने का न्यौता भी दे दिया लेकिन भुज अब भी उस आपदा से बाहर नहीं निकल पाया है। 

उसी आपदा में भुज का एक कस्बा चित्रोड़ भी प्रभावित हुआ था। इसी चित्रोड़ में शांतिबेन प्रेमजी से मुलाकात हुई। उनके पति दिहाड़ी मजदूर हैं। मुश्किल से घर का खर्च चलता है। पुराना घर जब भूकम्प की भेंट चढ़ गया। पुराने घर के मलबे पर झोपड़ी बनाकर शांति बेन आज भी अपने छह बच्चों के साथ रहती है। उनके नाम पर पुनर्वास में एक घर हैं, लेकिन नाम होने से क्या होता है? वे जब अपना अधिकार मांगने जाती हैं, उन्हें समझा दिया जाता है कि उनके नाम का कोई घर नहीं है। दलित समाज से ताल्लुक रखने वाली शांति बेन के पास ना अब लड़ने का साहस बचा है और ना ही इतना संसाधन है। पति की दिहाड़ी मजदूरी से मुश्किल से घर चल पाता है। बकौल शांति बेनः ‘अब हम घर मिलने की उम्मीद छोड़ चुके हैं।

कच्छ जिलान्तर्गत आने वाला गांव चित्रोड़ रापड़ ताल्लुका में आता है। यह गांव कच्छ में आए भूकम्प के बाद मलबे में तब्दील हुआ था। इस वजह से पूरे गांव का पुनर्वास हुआ। पुनर्वास के कागजों से गुजरते हुए और पुनर्वास के गांव में घुमते हुए कई तरह की गड़बड़िया सामने नजर आई। गांव के धर्मेन्द्र कांजी भाई प्रजापति कहते हैं- पुनर्वास में 604 मकान बनाए गए। जबकि जो गांव भूकम्प से प्रभावित हुआ था, उसमें 450 मकान ही थे। इसका मतलब 150 मकान जरूरत से अधिक बने। 450 में भी कई लोगों ने मुआब्जे की रकम ले ली थी। उनके लिए मकान बनने का कोई सवाल ही नहीं था। धर्मेंन्द्र के अनुसार पुनर्वास के गांव में कई ऐसे लोगों को भी घर मिला जिनका वहां घर ही नहीं था। जो यहां पढ़ाने आए थे, नौकरी कर रहे थे या फिर जिनको मकान बनाने की जिम्मेवारी मिली थी, उस एनजीओ से ताल्लुक रखते थे। धर्मेन्द ने आरटीआई के माध्यम से काफी जानकारी निकाली है, आरटीआई के आधार पर उन्होंने कहा- यहां एक एक ऐसे व्यक्ति भी हैं, जिन्होंने एक दर्जन मकान ले लिए हैं, अपने परिवार के अलग-अलग लोगों के नाम पर। जिनका यहां का राशन कार्ड नहीं था, ऐसे लोगों ने ना सिर्फ घर पर कब्जा किया बल्कि उन्हें बिजली का मीटर भी मिल गया।

मोदी को जिस धार्मिक बंटवारे के लिए देशभर में बदनाम किया गया है, उससे उलट यहां एक और बंटवारा नजर आया। शायद राज्य सरकार ने ही बहुत संवेदनशील तरीके से यह बंटवारा कर दिया हो, लेकिन चित्रोड़ के पुनर्वास कॉलोनी में जातिवाद साफ नजर आता है। यहां नया मकान देने का आधार यह बिल्कुल नहीं था कि जैसा पुराना मकान था, वैसा नया मकान मिलेगा। यहां तीन तरह के मकान नजर आए। जिसे जाति के आधार पर बांटा गया। इस कहानी का सबसे दुखद हिस्सा यह है कि दो-ढाई सौ घर जरूरत से अधिक बनने के बाद भी एक दर्जन लोग घर पाने से वंचित रह गए। कुछ थककर भूल गए अपना घर।
नवीन चन्द्र बाइलाल जोशी जो समोसे बेचकर अपना घर बड़ी मुश्किल से चला पाते हैं। वे दस साल तक भंसाली टस्ट के चक्कर काटते रहे और उन्हें हर बार यह कहकर वापस कर दिया जाता था कि उनका नाम सूचि में नहीं है। भंसाली ट्रस्ट के जिम्मे ही यहां के पुनर्वास का काम था। वे हार गए थे और हर महीने अपना घर होने के बावजूद किराए के घर में रहने को मजबूर थे। उन्हें सूचना के अधिकार से ही यह जानकारी मिली की उनका नाम सूची में है। दस साल बाद उन्होंने मिले कागज के दम पर अपने ही गांव में लड़ाई लड़ी और उन्हें अपना घर मिला। इससे पहले जोशी ने दस साल किराए के मकान में काट दिए। पत्नी के गहने भी उन्हें बेचने पड़े़। जब उन्हें घर मिला, उनके घर में तीन मीटर लगे हुए थे। उन मीटरों का बिल जोशी को चुकाना पड़ा। इन तीन मीटर में एक मीटर था, वीरेन्द्र सिंह का, जिन्हें जानकारी भी नहीं थी कि उनके नाम से कोई घर भी अलॉट कर किया गया है।

पुनर्वास कॉलोनी में घर अलॉट करने का तरिका भी अनोखा था, जो जिस घर में चला गया, वह उसका घर। आज भूकम्प के इतने सालों के बाद भी पुनर्वास कालोनी में किसी के पास अपने घर का कागज नहीं है। ना ही यह घर रहने वाले के नाम से अलॉट है। रहने वाला ना इस घर के नाम पर लोन ले सकता है और ना ही इसे कानूनी तौर पर बेच सकता है। इस वक्त धमेन्द्र 23 साल के हैं, भूकम्प के साल वह 11-12 साल के थे, वह इस बात से हैरान है कि जिनके नाम पर घर अलॉट हुए हैं, उनमें उनके स्कूल के दोस्तों के नाम भी शामिल हैं। धर्मेन्द्र को भी बताया गया था कि उनका नाम लिस्ट में नहीं है। उन्होंने भी अपना हक लड़कर छह-सात साल के बाद लिया। जो लड़ सकते थे, उन्होंने अपना घर ले लिया लेकिन ऐसे लोग बिना घर लिए रह गए जो लड़ नहीं सकते थे।

भुज आने का निमंत्रण देने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री से क्या यह उम्मीद रखना गलत होगा कि देश दुनिया को बुलावा भेजने से पहले एक बार उन घरों की तरफ नजर उठाकर दोबारा देख लें जिन्हें भूकम्प ने बारह साल पहले बर्बाद कर दिया था। 12 साल बाद ही सही, पीड़ितों को प्यारे मुख्यमंत्री से कुछ तो न्याय मिल ही जाना चाहिए। उन्हें चित्रोड़ में हुई गड़बड़ियों की जांच भी करानी चाहिए। क्या पता कोई बड़ा घोटाला ही सामने आ जाए?

05 December 2013

क्या देश में मुसलमानों की दुर्दशा के लिए बांग्लादेशी घुसपैठिए जिम्मेदार हैं ?

देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ोतरी इस कदर हो रही है कि देश में रह रहे एक खास समुदाय के लोगों का भी अधिकार अब इन बांग्लादेशी घुसपैठिए उठाने लगे हैं। हाल में ही असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने कहा था कि असम में मुसलमानों की संख्या में इजाफा होने का कारण उस समुदाय के लोगों को बहुत जयादा सरकारी लाभ नहीं मिल पारहा है। मुख्यमंत्री यह साबित करना चाहते हैं थे कि असम में बांग्लादेशी मुसलमानों का अवैध आगमन ही इसके लिए जिम्मेदार है।

1971 में असम में मुस्लिम आबादी 24.56 प्रतिशत थी, जो 2001 में बढ़कर 30.92 प्रतिशत हो गई। धुबड़ी जिला बांग्लादेश से सटा हुआ है और वहां नदी के रास्ते बांग्लादेश आना-जाना बिल्कुल आसान है। वहां की मुस्लिम आबादी का 1971 में 64.46 था। जो अब बढ़कर 2001 में 74.29 हो गया है। ऐसे में इसका प्रमुख कारण बांग्लादेशी घुसपैठिए ही बताए जा रहे हैं। धुबड़ी जिले में मुस्लिम आबादी 1971 में 64.46 फीसदी से बढ़कर 2001 में 74.29 हो गई। यानी 30 सालों में इस जिले में मुसलमानों की संख्या में 119 फीसदी बढ़ोतरी हुई। जबकि सभी समुदायों के लिए यह आंकड़ा 87.37 फीसदी था। समूचे असम राज्य में इन 30 सालों के दौरान मुसलमानों की आबादी में 129.5 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई और देश भर की मुस्लिम जनसंख्या में इस दौरान 133.3 फीसदी इजाफा हुआ। इन आकड़ों से ये साबित होता है कि देष में बांग्लादेशी घुसपैठ अपने चरम सिमा पर है। जानकार बताते है कि किसी भी स्थिति में इतना जयादा जनसंख्या वृध्दि संभव नहीं है।

यहा सबसे सहत्पूर्ण बात ये है कि देश में रोजगार से लेकर राशन पानी जैसे मिलने वाली योजनाओं में ये बांग्लादेशी भागिदार बन रहे हैं। जिससे समाज में असामनता का माहौल बन रहा है। असम में आए दिन जातीय हिंसा हो रहे हैं जिसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुख्य हाथ बताया जा रहा है। बांग्लादेशी घुसपैठियों को आतंकी घटनाओ में लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत के सामाजिक ढांचे का नुकसान व आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल में आज सबसे आगे बांग्लादेशी घुसपैठिए बताए जा रहे हैं। 

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने राज्य का जनसख्या संतुलन ऐसा बदल दिया है कि अब मुसलिम मतदाता ही सूबे में सत्ता की राह तय करने लगे हैं। यही करण है कि ममता ने मुसलिमों को रेलवे के किराए में छूट देने की योजना बनाई थी। साथ ही रंगनाथ मिश्र कमेटी की सिफारिशों को लागू कर मुसलिमों को राज्य की नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था कर भी दी है। ममता ने अपने घोषणापत्र में मुसलिम बहुल एक दर्जन जिलों के लिए सब्जी, फलों, मछलियों और समुद्री भोजन (सी फूड) का व्यापार बढ़ाने और खाद्य प्रसंस्करण के इंतजाम करने का एलान किया है। जिसका सिधा लाभ बांग्लादेशी घुसपैठियों को मिल रहा है। साथ ही ये घुसपैठिए सत्ताधरियों के लिए वोट वैंक की मजबुरी भी बनते जा रहे हैं। तो एसे में सवाल खड़ा होता है किया देश में मुसलमानों की दुर्दशा के लिए बांग्लादेशी घुसपैठिए ही जिम्मेदार हैं ?

क्या देश में बेरोजगारी की वजह बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं ?

बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ने से आज देश के ही लोगों के रोजगार छिनने के साथ ही अन्य समस्याएं पैदा हो रही हैं। घुसपैठियों ने दिल्ली के प्रमुख बाजारों में भी अपने रोजगार शुरू कर दिए हैं। बांग्लादेशी घुसपैठिये देश के लिए आज विपदा के रूप में उभरकर सामने आए है। ये घुसपैठिए न केवल भारतीय मजदूरों का रोजगार छीन रहे है। बल्कि ठेकेदारों की समुह बना कर अपने ही लोगों में ये काम का बंटवारा कर लेरहे है। साथ ही ये घुसपैठिए देष की लागों लोगों पर अपना एकाधिकार जमा रहे है।

बांग्लादेश के कारखानों में मजदूरों को समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता है। तो कुछ जगहों में ओवर टाइम का पूरा भुगतान नहीं किया जाता। कितने कारखाने तो ऐसे है जहा पर तय वेतन से कम वेतन दिया जाता है। यही कारण है कि लाखों की संख्या में ये बांग्लादेशी देश में घुसपैठ के जरीए भारतीय मजदुरों का रोजी रोटी छीन रहे हैं। बांग्लादेश में न्यूनतम मजदूरी की दर, 300 टका यानि 37 अमरीकी डॉलर प्रति माह है। मगर भारत में न्यूनतम मजदूरी की दर इससे काफी जयादा है। जिसके चलते बांग्लादेशी किसी भी हाल में हमारे के अंदर घुसना चाहते है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2012 के बांग्लादेश यात्रा के दौरान कपड़ा आयात को ड्यूटी फ्री करने की बात कही थी। जिसके चलते बांग्लादेशी घुसपैठियों का मनोबल और बढ़ गया और वे बांग्लादेश से कपड़ा लाने की तैयारी शुरू कर दिए। जिसके चलते देश के कपड़ा उद्योग और इसमे काम करने वाले लोगों के लिए एक नया संकट उत्पन्न हो सकता है। क्लोडिंग मैन्यूफैक्चरर्स ऑफ इंडिया के के प्रेसीडेंट, राहुल मेहता का कहना है कि इस फैसले के बाद देश के 80 फीसदी कपड़ा उत्पादकों पर असर पड़ सकता है। साथ ही, लाख से ज्यादा लोगों को बेरोजगार होने का भी खतरा है। साथ ही इससे अवैध घुसपैठ को बढ़ावा मिलेगा।

आज स्थिति ये है कि घुसपैठियों की गतिविधियों से तंग आकर भारतीय  नागरिकों को ही अपने स्थान से पलायन करना पड़ रहा है। इनकी बस्तियों में आतंकवादियों एवं समाजविरोधी तत्वों को शरण मिल रही है। जिसके कारण भारत की बुनियादी सुविधाएं चरमरा रही हैं और भारतीय कामगारों का रोजगार छिन रहा है। आज बात चाहे नाई की हो या फिर घरों में काम करने वाली नौकारानी की आज ये घुसपैठिए हर जगह नजर आने लगे हैं। देश की पारंपरिक रोजगार करने वाले लोगों की रोजी रोटी आज इन बांग्लादेशियों के चलते खत्म हो रही है।

हाल ही में अगरतला के कंटेनर डिपो ने बांग्लादेश से मोटरसाइकिल के आयात को हरी झंडी दी है। जिसके चलते सस्ती बांग्लादेशी मोटरसाइकिल के कारण भारतीय निर्माताओं पर असर पड़ रहा है। भारतीय निर्माता कंपनी बंद करने को मजबुर है, तो वहीं दुसरी ओर भारतीय मजदुरों के उपर बेरोजगारी का संकट भी मडराने लगा है।

प्राकृतिक संसाधनों की कमी के लिए जिम्मेदार बांग्लादेशी घुसपैठिए ?

बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ने से आज देश की अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों पर बुरा असर पड़ रहा है। बांग्लादेश सिमा से सटे किसानों की खेतों में मौजूद फसल और प्राकृतिक संसाधनों को बांग्लादेशी सुसपैठिए लूट रहे है। बांग्लादेश सिमा से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक अब ये अपना प्रमुख बाजारों में व्यापार शुरू कर दिए हैं। जिसका सिधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ये घुसपैठिये आज विपदा के रूप में कहर बरपा रहे है। घुसपैठिए न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को छती पहुंचा रहे है बल्कि जंगलों को काटने, अवैध तरिके से कोयला निकालने और समुंद्र में मछली मारने जैसे कार्यो को अंजाम दे रहे है। पश्चिम बंगाल और असम में ये घुसपैठिए कुंआ तालाब और किसानों की भूमी पर एकाधिकार जमा रहे है। इनके आतंक से वहा पर रहने वाले आम भारतीय नागरीक में लगातार पलायन बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2012 के बांग्लादेश यात्रा के दौरान कपड़ा आयात को ड्यूटी फ्री करने की बात कही थी। जिसके चलते बांग्लादेशी घुसपैठियों का मनोबल और बढ़ गया और वे बांग्लादेश से कपड़ा लाने की तैयारी शुरू कर दिए। जिसके चलते देश के कपड़ा उद्योग और इसमे काम करने वाले लोगों के लिए एक नया संकट उत्पन्न हो सकता है। इस फैसले से देश के 80 फीसदी कपड़ा उत्पादकों पर असर पड़ सकता है। साथ ही लाखों लोगों को बेरोजगार होने का भी खतरा है। साथ ही इससे अवैध घुसपैठ को बढ़ावा मिलेगा। आज इनकी बस्तियों में आतंकवादियों एवं समाजविरोधी तत्वों को शरण मिल रही है। जिसके कारण भारत की बुनियादी सुविधाएं चरमरा रही हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था का दिवाला निकल रहा है। 

इनका आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब ये सट्टा बाजार में भी अपना पैसा लगाने लगे है, तो वहीं दुसरी ओर हजारों घुसपैठिए कंपनियों का शेयर भी खरीदने रहे हैं। यही कारण है कि घुसपैठिए हर जगह नजर आरहे हैं। हाल ही में अगरतला के कंटेनर डिपो ने बांग्लादेश से मोटरसाइकिल के आयात को हरी झंडी दी है। जिसके चलते सस्ती बांग्लादेशी मोटरसाइकिल के कारण भारतीय निर्माताओं पर असर पड़ रहा है। ये बांग्लादेशी  दिल्ली के यमुना नदी से सटे इलाके में अपना झोपड़ी बना कर रह रहे हैं। दिल्ली की ही तरह अन्य शहरों में भी ये घुसपैठिए नदियों के तट पर अपना अतिक्रमण जमा कर रेत माफियाओं के साथ मिलकर अवैध खनन में भी प्रवेश कर चुके है।

2001 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या में 28 प्रतिशत और आसाम में 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। बांग्लादेश से लगी सीमा के लगभग 50 प्रतिशत गाँव पूरी तरह से बांग्लादेशी बहुल हो चुके हैं। असम में भी सीमावर्ती जिले पूरी तरह से हरे रंग में रंगे जा चुके हैं। ये घुसपैठिए भारत की अर्थव्यवस्था के लिये बोझा बनते जा रहे है, साथ ही इनके चलते देष की प्राकृतिक संसाधन नष्ट होते जा रहे हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या देश की अर्थव्यवस्था और घटते प्राकृतिक संसाधनों के लिए बांग्लादेशी  घुसपैठिए ही जिम्मेदार हैं।

गन्ने की सियासत से किसानों को आफ़त !

गन्ने की पेराई पर मिल मालिकों का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। किसानों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा। गन्ना किसानों के बारे में सरकार को अपने रवैए पर गंभीर विचार करना चाहिए। महंगाई से जूझ रही जनता को आगामी दिनों में महंगी शक्कर का भी बोझ ढोना पड़ सकता है। इस मामले में केंद्र सरकार और खाद्य मंत्रालय की पहल की सराहना नहीं की जा सकती है। उत्तर प्रदेश में शक्कर मिलर्स ने गन्ने की पेराई बंद कर दी है। गन्ना किसान सरकारी राहत के लिए सड़क पर उतर आए। महाराष्ट्र के सांगली और कोल्हापुर में भी किसानों ने अपने तेवर दिखाए। कर्नाटक के बेलगाम में भी गन्ना किसानों की उग्रता दिखी। हालात देख कर यह सहज अनुमान लगाए जा सकते हैं कि गन्ना किसानों के हाल क्या है। चीनी मिलों की लचर व्यवस्था पर सरकार का अंकुश असफल है। हालत इस बात के भी संकेत दे हैं कि आने वाले दिनों में गन्ने की खेती प्रभावित होगी। लिहाजा, चीनी का उत्पादन घटना तय है। फिलहाल सरकार ने वर्तमान हालत को देखते हुए चीनी उत्पादन में तीन प्रतिशत की कमी होने का संकेत दे दिया है। सरकार, चीनी मिलर्स और गन्ना किसानों का यह संघर्ष आज के नहीं हैं। 

केंद्र सरकार ने बीमार शक्कर मिलों को जीवन प्रदान करने के लिए ऋण मुक्त ब्याज देने पर विचार किया। लेकिन जिस तरह बीमार मिलो (उद्योगपतियों) की चिंता की गई यदि उस चिंता में किसानों को भी शामिल कर लिया जाता तो, किसानों के आक्रोश पर तत्काल सहानुभूति के छिंटे जरूर पड़ जाते। सरकार का यह कह कर खुश होना उत्पादन की कमी से देश में शक्कर आपूर्ति की समस्या नहीं आएगी, कुशल व्यापार नीति पर बट्टा  लगाना जान पड़ता है। यदि हम शक्कर पर आत्मनिर्भर हैं तो निर्यात का पुख्ता इंतजाम किया जाना चाहिए। किसानों को अधिक प्रोत्साहन देना चाहिए। 

शक्कर का कच्चा माल गन्ना किसानों की सौगात है। कच्चे माल की बुनियाद पर ही उद्योग की स्थापना की जाती है। ऐसे में गन्ना किसानों की मांग को दरकिनार करके बीमार शक्कर मिलों की चिंता उद्योगपतियों पर मेहरबानी से गन्ना किसानों का उग्र होना स्वाभाविक है। भारत शक्कर के उत्पादन और खपत करने दोनों में उस्ताद माना जाता है। दुनिया में ब्राजील के बाद भारत में शक्कर का उत्पादन सबसे ज्यादा है। ऐसे में देश के गन्ना किसान को खुशहाल होना चाहिए, मगर अफसोस गन्ना किसानों को अपनी बदहाली को लेकर सड़कों पर उतरना पड़ता है। लगातार आंदोलन के बाद भी उनकी सुध नहीं ली जाती है। शक्कर उत्पादन को लेकर सरकार को अपने रैवए पर विचार करना चाहिए। गन्ने की पेराई पर मिलर्स का प्रतिबंध निश्चित रूप से दादागिरी है। इसमें सरकार का दखल जरूरी है। कृषकों के हितों का पोषण सरकार की जवाबदारी है।

गन्ने की पेराई बंद करने, मिलर्स पर किसानों का करोड़ों रुपए का बकाया, निर्धारित मूल्य पर गन्ने का भुगतान और अन्य कारणों से सरकार द्वारा मिलर्स पर दर्ज कराई गई एफआईआर गतिरोध का मुख्य मुद्दा है। रिपोर्ट पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने से किसान नाराज हैं और मिलर्स की दबंगई जारी है। इन परिस्थितियों में गन्ना गतिरोध समाप्त होते नहीं दिखता है। पेराई के बंद होने से किसानों की परेशानी बढ़ जाएगी। उत्पादन विलंब से शुरू होगा इससे लागत में वृद्धि स्वाभाविक है। जिसका बोझ अंतत: जनता के कंधे पर ही आएगा।

पिछले दिनों उत्पादन में कमी की चर्चा मात्र से हाजिर स्टाक में शक्कर की कीमत में एक प्रतिशत के इजाफे से थोक में शक्कर की कीमत 3200 से 3275 रुपए प्रति क्विंटल हो गई। इधर आशंका जाहिर की जा रही है कि आगामी दिनों में शक्कर की दर में तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार से पहले ही शक्कर के उत्पादन शुल्क पर वृद्धि करने की अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है। साथ ही चीनी मिलों को नियंत्रण मुक्त की योजना को प्रस्तुत किया जा चुका है और इसे अमलीजामा पहने की कवायद जारी है। हालांकि इस योजना को अंजाम देने के पीछे  उतार-चढ़ाव, आयात-निर्यात में व्याप्त असंतुलन, प्रर्याप्त भंडारण की कमी आदि को महत्वपूर्ण कारण माने जा सकते हैं।  प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (पीएमईएसी) के अध्यक्ष सी रंगराजन की अगुआई वाली समिति ने पिछले साल ही शक्कर से जुड़े हुए दो तरह के नियंत्रण, मसलन-निर्गम प्रणाली और लेवी शक्कर को अविलंब समाप्त करने की सिफारिश की थी। इतना ही नहीं, इस समिति ने शक्कर उधोग पर आरोपित अन्यान्य नियंत्रणों को भी क्रमश: समाप्त करने की बात कही थी। इस मामले पर अभी भी कार्रवाई लंबित है। यदि इस योजना को अमलीजामा पहनाया जाता है तो उसके सुख परिणाम समाने आएंगे इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है।

 विनियंत्रण के मामले में देश के सर्वाधिक उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा अन्य 10 राज्यों ने अपनी मंशा से केंद्र को अवगत करा दिया है। इससे विनियंत्रण का रास्ता साफ हो गया है। इस लिहाज से कहा जा सकता है अब गेंद केंद्र के पाले में है। विनियंत्रण को किसानों के पक्ष में माना जा रहा है। वे अपने गन्ने की बिक्री अधिक कीमत देने वाले मिलर्स को बेच सकेंगे। किंतु हरहाल में गन्ने की न्यूनतम मूल्य के निर्धारण में सरकार का दखल होगा। लेकिन सरकार की इस दखल को चीनी मिलर्स की लॉबी अपने पक्ष में प्रभावित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

शक्कर उद्योग पर सरकार का नियंत्रण दो तरीके से किया जाता है। सरकार शक्कर का कोटा तय करती है जिसे खुले बाजार में बेचा जाता है। मिलर्स से उत्पादन का 10 प्रतिशत शक्कर लेवी में ली जाती है। जिसे राशन दुकानों में उपलब्ध कराया जाता है। फिलहाल लेवी की 20 रुपए की शक्कर 13.50 रुपए में बेची जा रही है। किंतु इससे किसानों को राहत मिलने की गुंजाइश कम है। बताया जा रहा है 98 लाख टन शक्कर हमारे मौजूदा स्टाक में है। आगामी वित्तीय वर्ष में हमार उत्पादन 2.44 करोड़ टन के रहने की संभावना है। इससे हमारे कुल उत्पादन में हमको दो से ढाई लाख टन का नुकसान उठाना पड़ सकता है। उत्पादन आंकड़ों के लिहाज से इस परिस्थिति की गणना सामान्य उतार-चढ़ाव के रूप से देखा जाएगा। किंतु देश की आर्थिक समृद्धि और प्रतियोगी नजरिए से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।

 भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने सरकार के दावा को खोखला बताया है। संघ के अनुसार उत्तर प्रदेश के साथ तमिलनाडु में भी शक्कर उत्पादन में गिरावट की आशंका है। इधर महाराष्ट्र में भी किसानों को असंतोष उजागर हो रहा उत्पादन में गिरावट से चीन के मूल्य में अप्रत्यशित वृद्धि हो सकती है। जिस पर नियंत्रण आसान नहीं होगा। गन्ना किसान और मिलर्स के बीच में सरकार द्वारा निर्धारित 280 रुपए प्रति क्विंटल गन्ने की कीमत विवाद का प्रमुख मुद्दा है। चीनी विवाद मात्र से थोक बाजार में उठान के संकेत मिल चुके हैं। इस असर खुदरा बाजार पर भी पड़ेगा। आलू, प्याज, टमाटर की महंगाई की मार से पस्त जनता को कड़वी शक्कर को मुश्किल से पचाना पड़ेगा।

01 December 2013

क्या बांग्लादेशी घुसपैठिए देश में राजनीतिक और सामाजिक समस्या बन गये हैं ?

देश में बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध घुसपैठ और असम समझौता लागू नहीं होने के कारण ये घुसपैठीए राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कारण बनते जा रहा है। लालकृष्ण अडवाणी ने अपने एक बयान में दावा किया था कि दिल्ली में नौ लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठिये मौजूद हैं। आज केन्द्र सरकार हो या फिर दिल्ली सरकार हर जगह वोट बैंक की राजनीति हाबी है। असम के प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दल असम गण परिषद का कहना है कि 1985 के असम समझौता लागू नहीं होने से राज्य में टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। समझौते में असम की सीमा सील करने और बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस उनके देश भेजने का प्रावधान था।

उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में निर्णय दिया था कि देश के हर थाने में बांग्लादेशी प्रकोष्ठ बनाया जाये जिसमें बंगलादेशी घुसपैठियों की धरपकड़ और समीक्षा कर उसकी जानकारी अदालत को निर्धारित रूप से दी जाये। मगर आज तक इसके उपर किसी ने कोई अमल नहीं किया। दिल्ली में बांग्लादेश से चोरी छिपे आने और अपराध करने की घटनाओं में काफी इजाफा हुआ है। आज लाखों की संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए जेहादी गुटों से मिल कर देश में आतंक फैला रहे हैं । देश की राजनीतिक पार्टियां इस समस्या की जगह चुनावी लाभ लेने में कहीं जयादा सहज मसषुष कर रही है। जबकी देश की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा के साथ साथ सांस्कृतिक पतन का कारण बनते जा रहे हैं । ये घुसपैठीए देश को इस्लामीक सड्यंत्र के तहद तोड़ने की लगातार साजिस रच रहे हैं।

कुछ साल पहले तक असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई असम में अवैध बांग्लादेशियों के अस्तित्व से ही इन्कार करते थे। यही स्थिति सीपीएम की है। कुछ साल पहले तक पश्चिम बंगाल सरकार ही इन बांग्लादेशियों को राशनकार्ड आदि मुहैया करवाती थी। दिल्ली में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ.दामिनी लाऊ ने जनवरी 2012 में अपने एक निर्णय में सरकार को फटकार लगाई थी। डॉ.दामिनी ने कहा था कि बांग्लादेशी वे सुविधाएं ले रहे हैं जो भारतीय नागरिकों को मिलनी चाहिए। 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में भारत की अहम भूमिका रही थी। लेकिन आज भारत इस कदर कूटनीतिक चुप्पी साधे बैठा है मानो उसके पूर्व में कोई देश हीं नहीं है।

मेघालय के गारो पर्वतीय जिला में गारो जनजाति समाज और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों में हिंसक झड़पें आए दिन हो रही है। जिसके चलते वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पुरी तरह से प्रभावित हो रही है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या बांग्लादेशी घुसपैठिए देश के लिए राजनीतिक, समाजिक, और सास्कृतिक समस्या का कारण बन गये हैं ?