16 June 2013

अपने बुजुर्गों के प्रति युवा वर्ग का नजरिया !

परिवार में युवा पुरुष सदस्य परिवार की आय का स्रोत होता है, जिसके द्वारा अर्जित धन से वह अपने बीबी बच्चों के साथ साथ अक्सर घर के बुजुर्गों के भरण पोषण एवं देख भाल  की जिम्मेदारी भी उठाता है. इसलिए बुजुर्गों के प्रति उसका नजरिया महत्वपूर्ण होता है, की वह अपने बुजुर्गों के प्रति क्या विचार रखता है? उन्हें कितना सम्मान देना चाहता है,वह अपने बीबी बच्चों और बुजुर्गों को कितना समय दे पाने में समर्थ है, और क्यों? वह अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति क्या नजरिया रखता है ?वह नए ज़माने को किस नजरिये से देख रहा है?क्योंकि वर्तमान बुजुर्ग जब युवा थे उस समय और आज की जीवन शैली और सोच में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ चुका है. आज का युवा अपने बचपन से ही दुनिया की चकाचौंध से प्रभावित है.उसे बचपन से ही कलर टी.वी.मोबाइल ,कार, स्कूटर,कंप्यूटर, फ्रिज जैसी सुविधाओं को देखा है, जाना है.जिसकी कल्पना भी आज का बुजुर्ग अपने बचपन में नहीं कर सकता था.जो कुछ सुविधाएँ उस समय थी भी तो उन्हें मात्र एक प्रतिशत धनवान लोग ही जुटा पाते थे.

आज इन सभी आधुनिक सुविधाओं को जुटाना प्रत्येक युवा के लिए गरिमा का प्रश्न बन चुका है.प्रत्येक युवा का स्वप्न होता है की, वह अपने जीवन में सभी सुख सुविधाओं से सुसज्जित शानदार भवन का मालिक हो. प्रत्येक युवा की इस महत्वाकांक्षा के कारण ही प्रत्येक क्षेत्र में गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा उत्पन्न हुई है.अब वह चाहे शिक्षा पाने के लिए स्कूल या कालेज में प्रवेश का प्रश्न हो या नौकरी पाने के लिए मारामारी हो. रोजगार पाने के लिए व्यापार ,व्यवसाय की प्रतिस्पर्द्धा हो या अपने रोजगार को उच्चतम शिखर पर ले जाने की होड़ हो या फिर अपनी नौकरी में उन्नति पाने के अवसरों की चुनौती हो .प्रत्येक युवा की आकांक्षा उसकी शैक्षिक योग्यता एवं रोजगार में सफलता पर निर्भर करती है यह संभव नहीं है की प्रत्येक युवा सफलता के शीर्ष को प्राप्त कर सके परन्तु यदि युवा ने अपने विद्यार्थी जीवन में भले ही मध्यम स्तर तक सफलता पाई हो परन्तु चरित्र को विचलित होने से बचा लिया है, तो अवश्य ही दुनिया की अधिकतम सुविधाएँ प्राप्त करने में सक्षम हो सकता है,चाहे वे उच्चतम गुणवत्ता वाली न हों.और वह एक सम्मान पूर्वक जीवन जी पाता है.

सफलता,असफलता प्राप्त करने में ,या चरित्र का निर्माण करने में अभिभावक और माता पिता के योगदान को नाकारा नहीं जा सकता.यदि सफलता का श्रेय माता पिता को मिलता है तो उसके चारित्रिक पतन या उसके व्यक्तित्व विकास के अवरुद्ध होने के लिए भी माता पिता की लापरवाही , उचित मार्गदर्शन दे पाने की क्षमता का अभाव जिम्मेदार होती है.जबकि युवा वर्ग कुछ भिन्न प्रकार से अपनी सोच रखता है.वह सफलता का श्रेय सिर्फ अपनी मेहनत और लगन को देता है और असफलता के लिए बुजुर्गो को दोषी ठहराता है. आज के युवा के लिए बुजुर्ग व्यक्ति घर में विद्यमान मूर्ती की भांति होता है, जिसे सिर्फ दो वक्त की रोटी,कपडा और दवा दारू की आवश्यकता होती है.

उसके नजरिये के अनुसार बुजुर्ग लोग अपना जीवन जी चुके हैं.उनकी इच्छाएं, भावनाएं, आवश्यकताएं सीमित हो गयी हैं. उन्हें सिर्फ मौत की प्रतीक्षा है. अब हमारी जीने की बारी है.जबकि वर्तमान का बुजुर्ग एक अर्धशतक वर्ष पहले के मुकाबले अधिक शिक्षित है.,स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर है,और मानसिक स्तर भी अधिक अनुभव के कारण अपेक्षाकृत ऊंचा है.(अधिक पढ़े लिखे व्यक्ति का अनुभव भी अधिक समृद्ध होता है) अतः वह अपने जीवन के अंतिम प्रहार को प्रतिष्ठा से जीने की लालसा रखता है,वह वृद्धावस्था को अपने जीवन की दूसरी पारी के रूप में देखता है, जिसमे उस पर कोई जिम्मदारियों का बोझ नहीं होता. और अपने शौक पूरे करने के अवसर के रूप में देखना चाहता है.वह निष्क्रिय न बैठ कर अपनी मन पसंद के कार्य को करने की इच्छा रखता है,चाहे उससे आमदनी हो या न हो.

यद्यपि हमारे देश में रोजगार की समस्या होने के कारण युवाओं के लिए रोजगार का अभाव बना रहता है,एक बुजुर्ग के लिए रोजगार के अवसर तो न के बराबर ही रहते हैं.और अधिकतर बुजुर्ग समाज के लिए बोझ बन जाते हैं.उनके ज्ञान,और अनुभव का लाभ देश को नहीं मिल पाता. कभी कभी उनकी इच्छाएं,आकांक्षाएं, अवसाद का रूप भी ले लेती हैं.क्योंकि पराधीन हो कर रहना या निष्क्रिय बन कर जीना उनके लिए परेशानी का कारण बनता है. आज का युवा अपने बुजुर्ग के तानाशाही व्यक्तित्व के आगे झुक नहीं सकता.सिर्फ बुजुर्ग होने के कारण उसकी अतार्किक बातों को स्वीकार कर लेना उसके लिए असहनीय होता है.परन्तु यह बात बुजुर्गों के लिए कष्ट साध्य होती है.क्योंकि उन्होंने अपने बुजुर्गों को शर्तों के आधार पर सम्मान नहीं दिया था,और न ही उनकी बातों को तर्क की कसौटी पर तौलने का प्रयास किया था.उनके द्वारा बताई गयी परम्पराओं को निभाने में कभी आनाकानी नहीं की थी.उन्हें आज की पीढ़ी का व्यव्हार उद्दंडता प्रतीत होता है.समाज में आ रहे बदलाव उन्हें विचलित करते हैं.

क्या सोचता है आपका पुत्र, क्या चाहता है आपका पुत्र, वह और उसका परिवार आपसे क्या अपेक्षाएं रखता है?इन सभी बातों पर प्रत्येक बुजुर्ग को ध्यान देना आवश्यक है.आज के भौतिकवादी युग में यह संभव नहीं है की अपने पुत्र को आप उसके कर्तव्यों की लिस्ट थमाते रहें और आप निष्क्रिय होकर उसका लाभ उठाते रहें.आपका पुत्र भी चाहता है आप उसे घरेलु वस्तुओं की खरीदारी में यथा संभव मदद करें,उसके बच्चों को प्यार दुलार दें, उनके साथ खेल कर उनका मनोरंजन भी करें,बच्चों को स्कूल से लाने और ले जाने में सहायक सिद्ध हों,बच्चों के दुःख तकलीफ में आवश्यक भागीदार बने, बुजुर्ग महिलाएं गृह कार्यों और रसोई के कार्यों में यथा संभव हाथ बंटाएं,बच्चों को पढाने में योग्यतानुसार सहायता करें,परिवार पर विपत्ति के समय उचित सलाह मशवरा देकर लौह स्तंभ की भांति साबित हों. 

बच्चों अर्थात युवा संतान द्वारा उपरोक्त अपेक्षाएं करना कुछ गलत भी नहीं है, उनकी अपेक्षाओं पर खरा साबित होने पर परिवार में बुजुर्ग का सम्मान बढ़ जाता है, परिवार में उसकी उपस्थिति उपयोगी लगती है.साथ ही बुजुर्ग को इस प्रकार के कार्य करके उसे खाली समय की पीड़ा से मुक्ति मिलती है,उसे आत्मसंतोष मिलता है, वह आत्मसम्मान से ओत प्रोत रहता है.उसे स्वयं को परिवार पर बोझ होने का बोध नहीं होता.

15 June 2013

क्या हर भारतीय को सैन्य शिक्षा अनिवार्य किया जाए ?

1962 में हुए भारत चीन युध्द के बाद सैनिक शिक्षा को देश के हर नागरिक को अनिवार्य की मांग उठी थी। मगर आज तक देश में इसको लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। मगर अब ये आज के दौर में और भी महत्वपूर्ण हो गयी है। एैसे में जरुरत है की आज एक सार्थक कदम के साथ इस सैन्य शिक्षा की अनिवार्यता को समझा जाय और इसे अमल में लाने के प्रयास किया जाए। इससे सेना पर निर्भरता भी कम होगी और हर आदमी कम से कम ऐसी घटनाओं से अपनी रक्षा करने  में आत्मनिर्भर बन सकेगा। जिस प्रकार से आज विश्व के लगभग 21 से जयादा देश में सैन्य देश अनिवार्य है उसको लेकर अब देश के अंदर भी ये मांग एक बार फिर से तेज हो गई है कि भारत में भी सैन्य शिक्षा को अनिवार्य किया जाए।

देश के  हर नागरिक को मिलिट्री ट्रेनिग अनिवार्य रूप से दी जाय। चाहे भले ही सबको हथियार और गोले बारूद इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग न जी जाय मगर कम से कम बेसिक चीजें अवश्य  जुडी हो जैसे युद्ध, हवाई हमलों, आतंकवादी हमलों, प्राकृतिक आपदाओं आदि में एक नागरिक को किस प्रकार सक्रिय होना  चाहिए और उसकी क्या भूमिका हो सकती है ? सैनिक शिक्षा सिर्फ सीमा पर  लड़ रहे जवानो से ही संबंधित नहीं है, आज कई बार तो हालत देश के अंदर ही युद्ध जैसे भीषण हो जाते है। देश में 26/11 जैसे मुंबई में हुए आतंकवादी हमला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

सेना का जितना ही आक्रामक पहलू महत्वपूर्ण होता है उतना ही महत्वपर्ण अपना तथा  अपने नागरिकों का बचाव भी होता है। ऐसे आतंकवादी  हमलों  के दौरान एक नागरिक का क्या कर्तव्य हो सकता है, मसलन वह कैसे अपने हो छिपा कर बचा सकता और फिर दूसरे फँसे लोंगों को कैसे बचाया जा सकता है. इसके अतिरिक्त आतंकवादियों से मोर्चा सम्हाले अपने जवानों की किस तरह से मदद की जा सकती है, यह सैनिक शिक्षा के माध्यम से हर नागरिक को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। साथ ही सैनिक शिक्षा गुंडों, चेन स्निचरो और बदमाशों से निपटने में आम नागरिक के लिये लाभप्रद साबित हो सकती है।

लड़ाई सीमा पर  जवान लड़ता है मगर उसकी यह लड़ाई बहुत हद तक उसके बैक अप, सप्लाई लाइन और पीछे से मिल रहे सहयोग पर निर्भर करती है, ऐसे में आम जनता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। रसद, गोला बारूद और  अन्य चीजों की सप्लाई में नागरिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सेना अकेले ही यह सब त्वरित गति से नहीं कर पाती ऐसे में अगर एक प्रशिक्षित जनता का पूरा सहयोग  मिले तो जयादा बेहतर हो सकता है। आज हमारे देश में व्यवसायिक शिक्षा, सेक्स शिक्षा, शारीरिक और योग शिक्षा आदि पर तो बहस होती है मगर सैनिक शिक्षा पर न के बराबर बहस हुई है।

आरएसएस, के सर संघसंचालक मोहन भागवत ने देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ते खतरे के मद्देनजर पहले ही ये मांग कर चुके है की देश में सैन्य शिक्षा अनिवार्य किया की जाए। युद्ध के समय सिर्फ जवान ही नहीं मरता है वरन दुश्मन के हमलों में आम नागरिक भी मारे जाते है। हर नागरिक को यह पाता होना चाहिए की दुश्मन के जमीनी, हवाई, नुक्लियर बायोलोजिकल व केमिकल जैसे हमलों मे किस तरह से सरवाईव  करना है। हवाई हमलों के दौरान बलैक आउट और  गड्ढों व बंकरों  में छिपना तथा  रासायनिक और जैविक हमलों के असर से  किस तरह से कम प्रभावित हुए बचा जा सकता है, यह हर नागरिक के लिये जानना महत्वपूर्ण होना चाहिए।

वह देश जहाँ सैन्य सेवा अनिवार्य है

इजराइल- 18 साल या 12 वीं ग्रेड के बाद सभी पुरुषों तथा महिलाओं के लिए अनिवार्य।
पुरुषों के लिए तीन,
जबकि महिलाओं के लिए दो साल की सेवा अनिवार्य है।

मैक्सिको- 18 साल की आयु के सभी पुरुषों को एक साल की मिलिटरी सेवा का पंजीकरण अनिवार्य।

रूस- 18-27 साल के पुरुषों के लिए 12 महीने की सेवा

टर्की- 20-41 साल के सभी पुरुषों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य, उच्च शिक्षा के छात्रों को कोर्स पूरा करने की छूट

जर्मनी- पुरुषों को नौ माह तक, महिलाओं को ऐच्छिक

आस्ट्रिया- 18-35 साल के लोगों के लिए 6 महीने की अनिवार्य सैन्य सेवा

बेलारूस- 18-27 साल के लोगों के लिए अनिवार्य, उच्च शिक्षा के लिए 12 महीने, जबकि सामान्य शिक्षित के लिए 18 महीने की सेवा

ब्राजील- 18 साल से ऊपर के सभी पुरुषों को 12 महीने की सेवा

चिली- 18-45 साल के पुरुषों की 12 महीने की सेना तथा 24 महीने की नौसेना तथा वायुसेना में सेवा

चीन- अनिवार्य सैन्य सेवा

डेनमार्क- अनिवार्य सैन्य सेवा

मिस्र- 18-30 साल के युवाओं के लिए अनिवार्य, छात्रों को पढाई तक छूट

फिनलैंड- 6 महीने की अनिवार्य सेवा

यूनान- पुरुषों के लिए एक साल की अनिवार्य सेवा

ईरान- 21 महीने की अनिवार्य सेवा

दक्षिण कोरिया- 24-27 महीने की अनिवार्य सेवा

नॉर्वे- 18 .5 से 44 साल के पुरुषों के लिए 19 महीने की अनिवार्य सैन्य सेवा

पौलैंड- पुरुषों के लिए 9 महीने की अनिवार्य सेवा

सिंगापुर- 18 -21 साल के पुरुषों के लिए 24 महीने की अनिवार्य सेवा

स्वीडन- सन् 1902 से सैन्य सेवा अनिवार्य

स्विट्जरलैंड- पुरुषों के लिए अनिवार्य, महिलाओं के लिए ऐच्छिक

14 June 2013

अदालती कार्यवाही हमारी भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं ?

अदालतों में अंग्रेजी की अनिवार्यता हमारी गुलाम मानसिकता का परिचायक है, और इसी गुलामी की जंजीर को तोड़ने के लिए आज समाज में अब ये मांग भी उठने लगी है, की कदालती कार्यवाही हमारी भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं की जाए। लार्ड मैकाले अंगे्रजी में भारतीय दण्ड संहिता आईपीसी की रचना कर भारत पर अंग्रेजी न्याय व्यवस्था थोप दी। और आज हम उसी को ढो रहे है। आज देश की सिर्फ 3 प्रतिशत आबादी ही भली-भान्ति अंग्रेजी बोल और लिख लेती है। केवल 10 प्रतिशत लोग ही इसे समझ सकते हैं। फिर भी यह हमारी सभी भारतीय भाषाओं व मातृभाषाओं पर हावी है। एैसे में ये सवाल खड़ा होने लगा है की आखिर ये कानून किसके लिए है।

आज हमारे देश में केवल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार के हाई कोर्टों में हिंदी के वैकल्पिक प्रयोग की इजाजत दी गई है। भारतीय भाशाओं में कोर्ट की कार्यवाही करने के लिए छत्तीसगढ़ ने 2002 में तमिलनाडू ने 2010 में और 2012 में गुजरात ने गुजराती में विकल्प की मांग केंद्र सरकार से की, लेकिन उसे ठुकरा दिया गया। एैसे में सवाल सत्ता में बैठे उन हुक्मरानों से भी है की आखिर वे लोगों पर अग्रेजी को क्यों थोप रहे है !

अंग्रेजी की अनिवार्यता के चलते आज तक इन अदालतों में महज तीन फीसद लोगों का कब्जा है जो अंगेजी बोलते है। इससे संविधान में मिले आम आदमी के अधिकारों का भी एक तरह से उल्लंघन हो रहा है। साथ ही आम जन का न्याय चंद अग्रेजी लिखने पढ़ने वाले लोगों की मुट्ठी के अंदर बंद होकर रह गया है। इन कठीन समस्या का कारण संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (1) के उपखंड (क) है, जिसमे कहा गया है की उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां अंग्रेजी भाषा में होंगी। जो पूरी तरह से अग्रेजी मानसिकता को दर्शाता है।

2001 में हुए जनगणना के अनुसार अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा मानने वाले लोगों की कुल जनसंख्या दो लाख छब्बीस हजार के आसपास है, जो तत्कालीन कुल जनसंख्या की 0.2 प्रतिशत के लगभग है। एैसे में यहा भी सवाल उठता है कि क्या इन्हीं 0.2 प्रतिशत लोगों को ध्यान में रख कर न्यायिक प्रक्रिया का यह भाषाई पैमाना तय किया गया है या इसके पीछे सरकार का कोई और तर्क भी है? जिस देश 99.98 प्रतिशत आबादी अंग्रेजी को अपनी प्रथम भाषा के रूप में स्वीकार तक नहीं करती है उस देश की समूची उच्च न्यायिक प्रक्रिया में ना सिर्फ अंग्रेजी का अनिवार्य होना अपने आप में एक बेहद गंभिर सवाल खड़ा करता है।

1958 में 14वें लॉ कमीशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन एम.सी. सीतलवाड़ ने भारत की अदालतों का दौरा करने के बाद कहा था कि देश की सभी बारों के सदस्यों ने एक सुर से कार्यवाही भारतीय भाशाओं में करने का समर्थन किया था। मगर अब तक इसके उपर विचार नहीं किया गया। गांव-देहात से जुड़े आज सैकड़ों ऐसे वकील हैं, जिन्हें भारतीय भाशाओं में कानून की अच्छी समझ है, परंतु अंग्रेजी अनिवार्य होने के कारण वे अपने मुअक्किल को न्याय नहीं दिला पाते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या अदालती कार्यवाही हमारी भारतीय भाषाओं में क्यों नहीं ?

11 June 2013

क्या भाजपा बिना नीतीश को मिलेगा जनाधार ?

नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए भाजपा को अस्पष्ट शब्दों में यह तो बता दिया कि नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवारी को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक नेता करार देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू नेता नीतीश कुमार ने उन्हें अयोग्य साबित किया था जिसके बाद भाजपा और जेडीयू के बीच की खाई और अधिक बढ़ती नजर आ रही है भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी भाजपाई सदस्य को सांप्रदायिक कहता है तो वह सिर्फ उस व्यक्ति पर नहीं बल्कि पार्टी पर आक्षेप लगा रहा है और अगर जेडीयू ऐसा कर रहा है तो अगर जनता दल यूनाइटेड गठबंधन से खुद को अलग करना चाहती है तो हो जाए हम अपने 17 साल पुराने साथी को बेइज्जत कर नहीं कर सकते !

जाहिर है यह कहकर भाजपा ने जनता दल यूनाइटेड के गठंबधन से बाहर जाने के लिए रास्ते खोल दिए हैं, लेकिन यहां मसला यह नहीं है कि आखिर क्यों मात्र नरेंद्र मोदी को अपने साथ रखने के लिए भाजपा अन्य सहयोगी दलों से दूरियां बढ़ाती जा रही हैए बल्कि मसला यह है कि अगर जेडीयू खुद को राजग अर्थात भाजपा से अलग कर लेता है तो क्या नीतीश कुमार आगामी लोकसभा चुनावों में वही करिश्मा दिखा पाएंगे जो उन्होंने वर्ष 2009 में दिखाया था !
 
अगर नीतीश कुमार आगामी चुनावों में भाजपा के सहयोग के बिना चुनावी मैदान में उतरते हैं तो वे मतदाताओं को प्रभावित करने में किस सीमा सफल हो पाएंगे यह थोड़ा संदेहास्पद है! जिन महादलितों और अति पिछड़े वर्गों को हथियार बनाकर नीतीश ने अपने स्पेशल एजेंडे की शुरुआत की थी जातिगत स्थिति के आधर पर अगर उनका प्रतिशत देखा जाए तो वह बहुत कम है, जबकि लालू प्रसाद यादव जिस वोटबैंक के आधार पर चुनाव जीतते हैं वह है, अर्थात मुस्लिम.यादव वोटबैंक इसके विपरीत नीतीश कुमार की अपनी जाति कुर्मी का भी बिहार में प्रतिशत कुछ ज्यादा प्रभावित करने वाला नहीं है !

वहीं दूसरी ओर सवर्ण वोटर जो कि बिहार की राजनीति में हमेशा से ही प्रमुख भूमिका निभाता है उसका झुकाव भाजपा की तरफ रहा है और इस बार भी भाजपा की ही तरफ रहने की उम्मीद है संभावित तौर पर कहा जा सकता है कि बिहार के सवर्ण वोट भाजपा की ही झोली में जाकर गिरेंगे बिहार में जेडीयू.भाजपा गठबंधन की वजह से जो भी वोट इन दो दलों को पृथक.पृथक तौर पर मिलते थे उसका दोनों को ही फायदा मिलता था इसीलिए अगर यह गठबंधन टूटता है तो इसका नुकसान भी दोनों को ही उठाना पड़ेगा हालांकि भाजपा काफी विशाल और राष्ट्रीय पहचान वाली पार्टी है इसीलिए जाहिर तौर पर यह नुकसान जेडीयू को ज्यादा वहन करना पड़ सकता है !
 
नीतीश जिस आधार पर भाजपा के साथ अपने संबंध तोड़ना चाह रहे हैं वह सिर्फ धर्मनिरपेक्षता का ही एजेंडा है, इस एजेंडे के लिए उन्होंने निशाना भी सिर्फ नरेंद्र मोदी को ही बनाया है इसीलिए यह कहना सही होगा कि नरेंद्र मोदी की वजह से ही नीतीश भाजपा का दामन छोड़ने की धमकियां दे रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि अगर मोदी को उम्मीदवार नहीं बनाया गया तो राजग गठबंधन में उन्हें स्वीकार कर जनता उन्हें ही वोट देगी जो साफतौर पर उनके अति.आत्मविश्वास को दर्शाता है नीतीश को शायद यह लगता है कि मोदी का विरोध करने से मुस्लिम वोटरों में उनकी छवि अच्छी बन जाएगी किंतु शायद वह भूल रहे हैं कि मुस्लिम वोटर तो कभी भी उनके साथ नहीं था और जब तक वह एनडीए के साथ हैं मुसलमानों को लुभाना उनके वश से बाहर की चीज हैण् नीतीश कुमार भाजपा के किसी अन्य वरिष्ठ सदस्य जैसे आडवाणी सुषमा आदि किसी को भी स्वीकार करने के लिए तैयार हैं जबकि उनका विरोध सिर्फ नरेंद्र मोदी को लेकर है! लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते.बनाते वह भाजपा की छवि के साथ छेड़छाड़ करने का भी दुस्साहस कर रहे हैं जिसका खामियाजा उन्हें कभी भी भुगतना पड़ सकता है !
 
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चुनावों में भले ही कितने ही राजनीतिक दल अपनी किस्मत आजमाने मैदान में उतरते हैं लेकिन युद्ध हमेशा देश की दो बड़ी और प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होता है! हालांकि अब किसी एक दल की सरकार बनना असंभव सा ही प्रतीत होता है लेकिन जीत दर्ज करने के बावजूद देखा यही जाता है कि हर क्षेत्रीय और छोटे दल को खुद को इन दो पार्टियों के साथ हाथ मिलाना ही पड़ता है! एक समुद्र की भांति यह दो दल अपनी पहचान बनाए हुए हैं जिनमें छोटी.छोटी नदियां अर्थात दलों जिनकी अपनी व्यक्तिगत छवि मजबूत नहीं होतीए को चाहे.ना.चाहे इस समुद्र में आकर मिलना ही पड़ता है! इससे समुद्र को तो ना किसी प्रकार का नुकसान होता है और ना ही फायदा लेकिन सत्ता में शामिल होने के लिए उन छोटे दलों को कुछ समझौतों और कुछ मतभेदों के बावजूद गठबंधंन करना ही पड़ता है और वैसे भी इस बार बात विधानसभा चुनावों की नहीं है जो किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित होकर रह जाए बल्कि इस बार परीक्षा राष्ट्रीय स्तर की है, इसीलिए ऐसे मौके पर खुद को एक राष्ट्रीय पार्टी से अलग करना कहीं जेडीयू के लिए नुकसानदेह न साबित हो जाए !

क्या भाजपा में खत्म हो चुकी है अडवाणी युग !

भाजपा की नींव उसका आधार कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी की राजनैतिक अस्मिता पर खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा नरेंद्र मोदी को वर्ष 2014 के लिए चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष घोषित करने पर ऐसा लगने लगा है कि पार्टी के भीतर ही नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी के बीच विरोधाभास की आग को हवा मिलने लगी है। इसका स्पष्ट उदाहरण हाल ही में गोवा सम्मेलन में लालकृष्ण आडवाणी के ही उपस्थित ना होने से मिलता है। बहुत से लोगों का तो यह भी कहना है कि सम्मेलन से संबंधित कट.आउट्स में भी पहले लालकृष्ण आडवाणी को शामिल नहीं किया गया था। इस बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर ही नरेंद्र मोदी बनाम लालकृष्ण आडवाणी जैसा माहौल विकसित हो गया है जो उन्हें अपने प्रतिद्वंदी गठबंधनए यूपीए के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देगा क्योंकि भाजपा अंदर ही अंदर नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है जबकि कांग्रेस और यूपीए में राहुल गांधी के नेतृत्व को पूर्णत: स्वीकार कर लिया गया है। 

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जहां आडवाणी के प्रति पार्टी में हो रहे ऐसे रवैये को पार्टी द्वारा उनके बहिष्कार के रूप में देख रहा है वहीं अन्य इसे नरेंद्र मोदी को पार्टी की ओर से मिशन 2014 के लिए चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी कह रहे हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि क्या वाकई लालकृष्ण आडवाणी को मिलने वाली प्रमुखता में अब कमी आने लगी है और पार्टी के भीतर ही दो गुट एक.दूसरे से लड़ने के लिए तैयार हैं बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जो यह साफ कहता है कि भाजपा के भीतर चलने वाली तकरार जो अभी तक सिर्फ पर्दे के पीछे का खेल थीए अब खुलकर सामने आने लगी है। पहले बस इसे एक अफवाह माना जाता था लेकिन अब यह हकीकत सभी के सामने है कि भाजपा में दो गुट विभाजित हैं जिनमें से एक गुट नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ा है तो दूसरा लालकृष्ण आडवाणी को अपना समर्थन दे रहा है। 

इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का यह मानना है कि पार्टी के ऐसे नकारात्मक अंदरूनी हालातों को अगर जल्द से जल्द सुलझाया नहीं गया तो इसमें कोई दो राय नहीं कि इन्हीं की वजह से चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ेगा। एक सच यह भी है कि भले ही आज नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जा रहा हो लेकिन पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता पर आज भी एक प्रश्नचिह्न ही लगा है। ऐसे में लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी के बीच जो समस्याएं उत्पन्न हुई हैं उन्हें जल्द से जल्द सुलझा लिया जाना चाहिए नहीं तो इसी अंतर्कलह की वजह से बिना कुछ खास मेहनत किए ही चुनावी नतीजे यूपीए के हक में चले जाएंगे और भाजपा के पास हाथ मलने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा।


वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग इस बात पर सहमति नहीं रखता कि भाजपा के अंदर लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी को लेकर दो खेमे बंटे हुए हैं क्योंकि इनका मानना है कि पार्टी के भीतरी हालात नरेंद्र मोदी के पक्ष में हैं। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के वरिष्ठ और सम्माननीय नेता हैं लेकिन अब समय नरेंद्र मोदी का है और जनता उनसे यह अपेक्षा रखती है कि जिस तरह उन्होंने गुजरात को एक वर्ल्ड क्लास मॉडल बनाया है वैसे ही वह पूरे भारत की कमान संभालेंगे।

09 June 2013

महाराणा प्रताप की वीर गाथा- महाराणा प्रताप जयंती विशेष

9 मई 1540 को राजस्थान के कुम्भलगढ में महाराणा उदयसिंह व राणी जीवत कंवर के घर में जन्में महाराणा प्रताप बचपन से ही बुद्विमान, ज्ञानवान व वीर थे। उन्हें मेवाड-मुकुट मणि के नाम से भी पुकारा जाता था। धर्म और स्वाधीनता के लिए उन्होंने ज्योतिर्मय बलिदान किया। वह विषव में सदा परतंत्रता और अधर्म के विरूद् संग्राम करने वाले मानधनी, गौरवषील लोगों के लिए मशाल सिद्व हुए। उस युग में भी उन्होंने सच्ची राश्ट्रीयता को कायम किया। धर्म के संबंध में भी अपने दीन ए इलाही के द्वारा हिन्दू धर्म की श्रद्वा को बरकरार रखा। हिंदुत्व और उसी उज्जवल ध्वजा को गर्वपूर्वक उठाने वाला एक ही अमर सेनानी महाराणा प्रताप थे। महाराणा प्रताप का नाम आते ही हल्दीघाटी के युद्व की यादें ताजा हो जाती है। राजपूताने की पावन भूमि के बराबर विष्व में इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं। 

हल्दीघाटी का युद्व अरावली की घाटियों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप सिंह और दिल्ली के सम्राट अकबर की शाही सेना के बीच 18 जून 1576 को हुथा था। अकबर ने मेवाड पर आक्रमण कर चित्तौड को घेर लिया था। महाराणा प्रताप ने साहस और वीरता के साथ युद्व लडा।युद्व के दौरान भीलों का अपने देश और नरेश के लिए वह अमर बलिदान राजपूत वीरों की वह तेजस्विता और महाराणा की पराक्रम इतिहास में अंकित है। मेवाड के पवित्र रक्त ने हल्दीघाटी का कण कण लाल कर दिया। उस शौर्य एवं तेज की भव्य गाथा से इतिहास रंगा हुआ। महाराणा प्रताप युद्व के बाद चित्तौड छोडकर बनवासी हो गए। जन्मभूमि की रक्षा के लिए भोग विलास को त्याग दिया और पूरा परिवार घास की रोटियां, पर्वतीय कंदमूल फल पर ही जीवन व्यतीत करने लगा। अपने 24 वर्शों के षासन काल में उन्होंने मेवाड की केसरिया पताका सदा उॅची रखी।

महाराणा प्रताप के जीवन काल में अगर वफादारी की बात करें तो पराक्रमी चेतक के जिक्र को छोडा नहीं जा सकता। महाराणा का सबसे प्रिय घोडा चेतक था। आज भी चेतक वफादारी का प्रतीक है। 29 जनवरी 1597 को महानायक, कुशल प्रशासन व वीरता के इस परिचायक को मौत ने अपने आगोश में ले लिया। लेकिन जाते जाते भी वह अपने राज्य की सुरक्षा के विशय में ही चिंतित नजर आए। इतिहास में लिखे तथ्यों के अनुसार। एक साधारण कुटी में लेटे हुए प्रताप ने अपने विष्वासपात्रों  से उनके जीवित रहने तक राज्य को तुर्को से बचाने का बचना लिया। विष्वासपात्रों ने जब उनको मातृभूमि की रक्षा देने का वचन दिया। यह सुनकर ही उन्होंने प्राण त्याग दिए।

इस प्रकार एक ऐसे राजपूत के जीवन का अंत हो गया। जिसकी स्मृति आज भी प्रत्येक व्यक्ति को प्रेरित करती है। इस संसार में जितने दिनों तक वीरता का आदर रहेगा। हमेषा महाराणा प्रताप को याद किया जाएगा।

क्या हम हमाराणा प्रताप को भूल गए है ?

                      महाराणा प्रताप इस भारत भूमि के, मुक्ति मंत्र का गायक है।
                      महाराणा प्रताप आजादी का, अपराजित काल विधायक है।।


भारतभूमि सदैव से ही महापुरुषों और वीरों की भूमि रही है। यहां ताकत और साहस के परिचायक महाराणा प्रताप, झांसी की रानी, भगतसिंह जैसे लोगों ने भी जन्म लिया है। यह धरती हमेशा से ही अपने वीर सपूतों पर गर्व करती रही है। ऐसे ही एक वीर सपूत थे महाराणा प्रताप। महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास में वीरता और राष्ट्रीय स्वाभिमान के जीता जागता उदाहरण हैं। इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये हमेशा ही महाराणा प्रताप का नाम सबसे उपर रहा है। मगर आज हम ऐसे विरयोध्दा को भूलते जा रहे है। दिल्ली में सम्राट अकबर का राज्य था जो भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था। मगर महाराणा प्रताप जैसे कर्मठ योध्दा की ललकार से अकबर के किला की दिवारें हील उठती थी।

 मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने हेतु महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, मैं महलों को छोड़ जंगलों में निवास करूंगा। किन्तु अकबर का अधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करूंगा। अभूतपूर्व वीरता और मेवाड़ी साहस के चलते मुगल सेना के दांत महाराणा प्रताप ने खट्टे कर दिए और सैकड़ों अकबर के सैनिकों को मौत के घाट उतार दिए। बालक प्रताप जितने वीर थे उतने ही पितृ भक्त भी थे उनकी मां भी उस विर को हमेषा युध्द के लिए तैयार रखती थी।

इस देश में एक समय ऐसा भी आया जब भारतीय सत्ता दो भागो में बट गयी इस्लामिक सत्ता जो अकबर के हाथ में थी दूसरी हिन्दू सत्ता जो महाराणा प्रताप द्वारा नियंत्रित थी, मगर इसी वंश के पूवर्जो ने एक लाख की सेना संगठित कर ईरान से लेकर अफगानिस्तान तक जीत का भगवा झंडा फहराया जिसका केंद्र मेवाड़ था। इसी मेंवाड़ की धरती पर महाराणा प्रताप जैसे तेजस्वी राजपुरुष पैदा हुए जिन्होंने इस्लामिक सत्ता को हमेशा चुनौती ही नहीं दी, बल्कि मेवाड़ को भारतीय हिन्दू सत्ता का केंद्र बनाऐ रखा। सम्पूर्ण जीवन युद्ध करके और भयानक कठिनाइयों का सामना करके महाराणा प्रताप ने जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया उसकी प्रशंसा इस संसार से कभी मिट न सकेगी। मगर आज हम अपने आदर्श पुरुषों को स्मरण तक नही कर पाते है। महाराणा प्रताप व छत्रपति शिवाजी जैसे वीरों के नाम हमारे सामने आते है। मगर हमे उन्हे याद करने के लिए समय नहीं है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या हम हमाराणा प्रताप को भूल गए है?


                             राणा प्रताप की कर्मशक्ति, गंगा का पावन नीर हुई।
                            राणा प्रताप की देशभक्ति, पत्थर की अमिट लकीर हुई।।

08 June 2013

नरेद्र मोदी का विरोध आखिर क्यों ?

मोदी ही हमारे प्रधान मंत्री पद के लिए नेता है, इस बात को कहने में आखिर बीजेपी क्यों हिचक क्यों रही है। ये सवाल आज हर वो पार्टी कैडर पुछ रहा है। अब बीजेपी के पास ऐसा कोई मौका भी नहीं गया है, ताकी वह कह सके की मोदी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं होंगे। दरअसल बीजेपी में मोदी का कोई विरोध नहीं है। ये आने वाले दिनों में और साफ हो जाएगा और कुछ हद तक हो भी चुका है। जिस प्रकार से मोदी को प्रधान मंत्री पद की उमीदवार बनाने के लिए पीम पीम की नारों की गुंज हर ओर आज सुनाई दे रही है उससे लगता है की मोदी ही बीजेपी हैं और बीजेपी मोदी। तो यहा सवाल खड़ा होता है की एैसे में फिर नरेन्द्र मोदी का विरोध क्यों? मोदी आज की तारीख में देश के सबसे चर्चित व्यक्ति हैं। ये भी किसी से छुपा नहीं है। मोदी के मॉडल में नया मध्यमवर्ग है, शहरी मतदाता है, और चकाचैंध भी है। साथ ही मोदी के मॉडल हिंदुस्तान की आत्मा के कहीं अधिक करीब दिखती है। 

वही अगर नरेन्द्र मोदी की धुर विरोधी नीतीश कुमार की बात करे तो नीतीश बिहार से आते हैं और उनका वोट बैक अल्पसंख्यक वर्ग है, जो कभी लालू यादव के जिताउ सर्मथकों में से था। एैसे में अपनी जमीन बचाने के लिए नीतीश कुमार कांग्रेस का हाथ थाम सकते है। मगर यहां कांग्रेस का वजूद लगभग खत्म है। नीतीश को समर्थन देने पर कांग्रेस सैकुलरवाद के साथ-साथ विकास को प्राथमिकता देने का नाटक भी कर सकती है। हालांकि तीसरे मोर्चे की नौबत आने पर नीतीश को मुलायम सिंह यादव से चुनौती मिलेगी। एैसे में मोदी का ये विरोध नीतीश कुमार के आने वाले दिनों में और मुषीबते बढ़ा सकती है। वही एनडीए की घटक दल शिवसेना मराठी हिंदू वोटरों की राजनीति करती रही है। मुंबई और पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना खुद को हिंदुत्व की सबसे बड़ी पैरोकार के तौर पर पेश करती रही है। ऐसे में छवियों का टकराव शिवेसना और मोदी के बीच तल्खी की एक वजह बताया जा रहा है।


मोदी की अगुवाई में अगर बीजेपी 180 के आंकडे तक भी पहुंचती है तो नये सहयोगी साथ आ खडे हो सकते है। और मोदी को लेकर फिलहाल राजनाथ गोवा अधिवेशन में इसी बिसात को बिछाना चाहते है जिससे संकेत यही जाये कि मोदी के विरोधी राजनीतिक दलो की अपनी मजबूरी चुनाव लडने के लिये हो सकती है लेकिन चुनाव के बाद अगर बीजेपी सत्ता तक पहुंचने की स्तिति में आती है तो सभी बीजेपी के साथ खड़े होगें ही। साथ ही मोदी बेहद दृढ संकल्प व्यक्ति है और जिस चीज को ठान लेते है उसे पूरा करके ही दम लेते है। यही सब कारण है की मोदी हिंदुत्व अस्मिता के पहचान बन चुके है और मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में लोग देख रहे है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की फिर नरेद्र मोदी का विरोध आखिर क्यों ?

आपसे सीखा है दर्द में भी मुस्कुराना- “फादर्स डे” स्पेसल !

मातृ देवो भवः पितृ देवो भवः ये वही वाक्य है जो माता पिता को देव यानी की भगवान होने का दर्जा प्रदान करता है। परंतु अब इन वाक्यों का अभिप्राय हमारे युवा पीढ़ी से कोसों दूर हो गई है। आज की युवा पीढ़ी अपने माता-पिता को पुरानी पीढ़ी कह कर नकारने लगी है। मगर किसी भी बच्चे के जीवन में उसके माता पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता। आपके पहले दोस्त पहले अध्यापक और एकमात्र सच्चे संरक्षक सिर्फ और सिर्फ माता पिता ही होते हैं। क्योंकि वह ना सिर्फ आपसे प्यार करते हैं बल्कि एक वट वृक्ष की भांति आपको और आपके पूरे परिवार को अपनी छाया में रखकर संरक्षण भी प्रदान करते हैं। आप भले ही अनदेखा कर दें लेकिन सच यही है कि आज भी वह आपकी हर छोटी छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी बड़ी बड़ी जरूरतें दरकिनार कर देते हैं। मगर आज के हमारे युवा पीढ़ी जब खुद को अपने पैर पर खड़े हो जाते है तो उन्हें अपने आप से अलग कर देते है। फिर भी पिता के मन में अपने लाडले के लिए प्यार में कोई कमी नहीं आती है।

वैसे तो किसी भी संतान के लिए अपने पिता के अनमोल ऋण को चुका पाना संभव नहीं है, लेकिन अगर फिर भी आप उनके लिए कुछ करना चाहते हैं तो आपके जीवन में शामिल सबसे महत्वपूर्ण शख्स को समर्पित दिन फादर्स डे पर आपकी बारी है कि आप उनके प्यार दुलार और उनसे जुड़ी अपनी भावनाओं को उन तक पहुंचाएं, कुछ पल उनके साथ बिताए और उनके जरूरत और सपनों को पूरा करें। यही उनके लिए सच्ची सेवा होगी। आज जब हम उनके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलना चाहते, तब बचपन के उन पलों को हमें याद करना चाहिए जब हमें अपने हाथों का सहारा देकर चलना सिखाया।

आज की युवा पीढ़ी बाहरी दिखावटों, पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर अपने आदर्शों और संस्कारों को खोती चली जा रही है। जिससे समाज में पितृत्व धर्म आज संकट में पड़ गई है। आज बुजुर्ग माता पिता की जिंदगी घर के एक कोने में बेबस सी होकर रह गयी है। कुछ युवा आज एैसे भी है जो अपने माँ बाप को घर में रखना ही पसंद नहीं करते हैं। एैसे इन बेषाहारा मां बाप को बृद्ध आश्रम में जिंदगी के आखिरी पल काटने को मजबूर होना पड़ रहा हैं। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या आज की युवा पीढ़ी पितृत्व धर्म को भूल गई है।

                    पिता एक जीवन को जीवन का दान है, पिता दुनिया दिखाने का अहसान है,
              पिता से बड़ा तुम अपना नाम करो, पिता का अपमान नहीं उन पर अभिमान करो।

03 June 2013

क्या भारतीय सिनेमा समलैंगिकता को बढ़ावा दे रहा है ?

हाल ही में बंगाली और हिंदी फिल्मों के प्रख्यात निर्देशक ऋतुपर्णो घोष का निधन हो गया। ऋतुपर्णो घोष खुद समलैंगिक थे और इसी विषय पर उन्होंने कई फिल्मों का भी निर्देशन कर समलैंगिकों के अधिकारों जैसा मुद्दा उठाया। एक ओर तो परंपरागत भारतीय समाज कभी समलैंगिकता को अपने भीतर शामिल नहीं होने दे सकता लेकिन आधुनिक मानसिकता से ग्रस्त वर्तमान विचारधारा समलैंगिकता के पक्ष में जाती दिखाई दे रही है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि आम जनता से अगर कोई खुद को समलैंगिक घोषित कर अपने अधिकारों की मांग करता है तो उसे घृणित नजरों से देखा जाता है लेकिन वहीं अगर कोई प्रख्यात सिलेब्रिटी पुरुष होने के बावजूद महिलाओं के परिधानए उनकी वेश.भूषा पहनकर सामने आता है तो उसे रोल मॉडल मानकर स्वीकार कर लिया जाता है। 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके ऋतुपर्णो घोष का व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही था जिसे ना सिर्फ काफी सराहा गया बल्कि उन्हें एक आदर्श की भांति मीडिया और बॉलिवुड के गलियारों में प्रवेश भी दिया गया।


बॉलिवुड हमेशा से ही भारतीयों जन सामान्य को आकर्षित और प्रेरित करता रहा है। हालत यह है कि सिनेमा के पर्दे पर दिखाई गई चीजों और सिलेब्रिटियों की जीवनशैली में खुद को ढालने के लिए हर वर्ग का भारतीय उत्सुक रहता है। ऐसे में ऋतुपर्णो घोष जैसे सिलेब्स को मुख्य धारा में ना सिर्फ जोड़ना बल्कि उन्हें आदर्श बनाकर पेश करना एक बहुत बड़ी बहस का विषय बन गया है कि क्या बॉलिवुड ही समाज में समलैंगिकता को बढ़ावा दे रहा हैघ् क्या एक समलैंगिक व्यक्ति को आदर्श की भांति दिखाकर सिनेमा समलैंगिकता पर ढकी परत को हटाने का प्रयास कर रहा है!

बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जो इस बात पर सहमति रखता है कि बॉलिवुड ही आम जन मानस को प्रभावित कर समलैंगिकता के पक्ष में खड़ा हैए का कहना है कि बॉलिवुड की चहल.पहल आम जनता को प्रभावित करती है। खुले तौर पर सिलेब्रिटीज का खुद को समलैंगिक स्वीकारना और इसके बाद एक रोल मॉडलए आत्मविश्वासी और स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह मीडिया द्वारा उन्हें लाइम लाइट में खड़ा कर देना समलैंगिकता को सीधे.सीधे बढ़ावा दे रहा है। भारतीय परिदृश्य में पूर्णत: घृणित मानी जाने वाली ऐसी हरकतों को शह देकर सिनेमा समाज को गर्त की खाई में ढकेलने का काम कर रहा है। सिनेमा से ताल्लुक रखने वाले समलैंगिक व्यक्ति की छवि एक रोल मॉडल की तरह बनाने से दो बड़े नकारात्मक प्रभावों का सामना करना पड़ता है एक तो वे लोग जो खुद को समलैंगिक मानते हैंए जो अभी तक पर्दे के पीछे ही रहते थे वे खुलकर सामने आकर अपने अधिकारों की मांग करने लगेंगे वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों को देखकर वो लोग जो समलैंगिक हैं भी नहीं उनके स्वभाव और सेक्सुअल प्राथमिकताओं में अंतर आने लगेगा। सिनेमा समाज का आइना होता हैए सच के नाम पर जो दिखाया जाता है वह किस तरह जन मानस को प्रभावित करता है इस बात को भी समझना चाहिए।


वहीं दूसरी ओर उदार मानसिकता वाले बुद्धिजीवियोंए जो ना तो समलैंगिकता के विरोधी हैं और ना ही समलैंगिक व्यक्ति को सिलेब्रिटी की तरह दर्शाने में ही उन्हें किसी तरह की परेशानी नजर आती है का मत है कि यौनेच्छा प्रत्येक व्यक्ति का बेहद निजी मामला है। समलैंगिक व्यक्ति भी एक इंसान है और उसे इंसान होने के नाते सभी अधिकार उसी तरह मिलने चाहिए जो अन्य किसी को भी मिलते हैं। वह चाहे कोई सिलेब्रिटी हो या फिर आम व्यक्तिए अगर वह कुछ अच्छा कर रहे हैं या उनके कामों से किसी को प्रेरणा मिल रही है तो उन्हें आदर्श बयां करने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती हैघ् इतना ही नहीं इस वर्ग में शामिल लोगों का यह भी कहना है कि अगर भारतीय सिनेमा द्वारा समलैंगिक अधिकारों की पैरवी की भी जा रही है तो इसमें बुराई क्या है यह अधिकार की मांग है और हक तो मिलना ही चाहिए। ऐसे लोगों का मानना है कि समलैंगिकता हमेशा से ही समाज का हिस्सा रही है और इसके प्रचार में बॉलिवुड का सिनेमा को दोष देना बेहद बचकाना सा लगता है।

01 June 2013

क्या सट्टेबाजी को बैध करना सही है ?

अगर खेल मंत्रालय की मंशा पूरी हुई तो जल्दी ही देश में सट्टेबाजी वैध हो जाएगी। मंत्रालय का मानना है कि मैच फिक्सिंग या स्पॉट फिक्सिंग जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए ये सबसे अच्छा तरीका है। ऐसा करने से 30 खरब रुपये का कारोबार सरकारी नियंत्रण में आ जाएगा। मंत्रालय के अनुसार, घुड़दौड़ की तरह कई अन्य खेलों में भी सट्टेबाजी को मंजूरी दी जा सकती है। फिक्की के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक सरकार सट्टेबाजी से सालाना 20 हजार करोड़ रुपये तक की कमाई कर सकती है। कानून मंत्रालय ने मैच फिक्सिंग जैसी गतिविधियां रोकने के लिए प्रस्तावित नए कानून का एक मसौदा तैयार किया है। तो वही दुसरी ओर केंद्रीय नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने भी सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध बना दिया जाना चाहिए। ऐसे में ये प्रश्न उभरकर सामने आता है कि “क्या क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता दिया जाना सही होगा?


मगर कुछ समय पूर्व सट्टेबाजों का एक और गोरखधंधा था “लॉटरी” लोग झट से पैसा कमाने की चाह में कई-कई हजार रुपये की लॉटरी खरीदते थे। कुछ अमीर भी बनते थे लेकिन ज्यादातर के हाथों ठेंगा लगता था। कई राज्य की सरकारों ने इसे कुछ मानकों के अनुरूप कानूनी मान्यता दी मगर जब ये धंधा गैरकानूनी कार्य बन गया तो आखिर में सरकार को इसे बंद करना पड़ा। क्या अब केन्द्र सरकार उसी को एक बार फिर से अब क्रिकेट में दोहराना चाहती है। सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता देने से कुछ ऐसे समूह सामने आ सकते हैं जो कानून की आड़ में गैरकानूनी कार्य करेंगें, तो क्या सरकार पैसे के लिए गैरकानूनी कार्य को बढ़ावा देना चाहती है।

आज देश में सिर्फ क्रिकेट ही नहीं सट्टेबाजों के हवाले शेयर बाजार, से लेकर बालीवुड और देशी-विदेशी पूंजीपतीयों के पक्ष में अर्थनीति ‘फिक्स’ की जा रही है। यहा तक कि कारपोरेट समूह के पक्ष में नीतियां ‘फिक्स’ की जा रही हैं। साथ ही कोर्ट के फैसले भी ‘फिक्स’ करवाने के दावे किये जा रहे हैं। तो सवाल एक बार फिर से यहा खड़ा होता है कि क्या सरकार आने वाले समय में इसे भी कानूनी मान्यता देगी? लाबीइंग के इस दौर में मंत्रिमंडल से लेकर नौकरशाही तक में अपने अनुकूल नेताओं और अफसरों को ‘फिक्स’ करवाया जा रहा। याद कीजिए, नीरा राडिया टेप्स को जिसमें नेता, उद्योगपति, अफसर और संपादक किस तरह, मंत्री से लेकर कोर्ट और नीतिगत फैसले तक को अपने मुताबिक ‘फिक्स’ करवाते सुनाई दे रहे है। साथ ही खुद केन्द्र सरकार भी फिक्सींग की आंच से अपने आप को दुर नहीं रख पाई और कोयला खदानों से लेकर हाईवे और एयरपोर्ट के ठेकों के आवंटन को भी उन्होने फिक्स कर डाला।

पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था ही कैसिनो अर्थतंत्र में बदल दी गई है जहाँ पैसे से पैसा बनानेवाले सट्टेबाज ही नीतियां और फैसले तय कर रहे है, और सरकार के लिए आज के दौर में लाबीइंग और फिक्सिंग अपवाद नहीं रह गए हैं, बल्कि नियम बन गए हैं। आज आई.पी.एल कालेधन को खपाने और सट्टेबाजी के एक संगठित अंडरवर्ल्ड को एक लोकप्रिय प्लेटफार्म उपलब्ध कराने के इसे कानूनी मान्यता दिलाने के लिए लाबीइंग हो रही है। और यही प्लेटफार्म आने वाले समय में आतंकवाद के लिए आगे का रास्ता और सरल करेगा। जहा देश सट्टेबाजों के चंगुल में होगा और सरकार सटोरियों की पैरोकार बन कर रह जाएगी। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की सट्टेबाजी को बैध करना सही है ?

31 May 2013

क्या फैसले के अतरिक्त टिप्पणियां करना उचित है ?

इन दिनों एक जुमला बड़ा चर्चित है। वो है कि सीबीआई पिंजरे में कैद तोता है, जो केवल सरकार की भाषा बोलता है। असल में यह देश के सर्वोच्च न्यायालय की ओर से की गई टिप्पणी है, जिसका प्रतिपक्षी नेता जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर सैकड़ों कार्टून बन चुके हैं। हाल ही यूपीए टू सरकार के चार साल पूरे होने पर देश की राजधानी दिल्ली में भारतीय जनता युवा मोर्चा की ओर से जो रैली निकाली गई, उसमें तो बाकायदा तोते के एक पुतले को शामिल किया गया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में सीबीआई लिखा हुआ था। बेशक न्यायालय की टिप्पणी विपक्ष को अनुकूल तो सरकार को प्रतिकूल पड़ती है, मगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए तो सवाल ये उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास कानून के तहत फैसले सुनाने के अधिकार के साथ इस प्रकार की तीखी टिप्पणी करने का भी अधिकार है, जिसने एक संवैधानिक संस्था को इतना बदनाम कर दिया है, जिससे उसे कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा। यह एक नजीर जैसी हो गई है।

हालांकि यह सही है कि जिस मामले में यह टिप्पणी की गई है, उसमें सीबीआई ने सरकार के इशारे पर काम किया, इस कारण टिप्पणी ठीक ही प्रतीत होती है, मगर वह वाकई सरकार का गुलाम तोता ही होती तो सच-सच क्यों बोलती। उसने जो हल्फनामा पेश किया, उसमें भी सरकार की ओर से कही गई भाषा ही बोलती। इसमें कोई दो राय नहीं कि सीबीआई का कई बार दुरुपयोग होता है, या उसको पूरी तरह से स्वतंत्र होना ही चाहिए, उसके कामकाज में सरकारी दखल नहीं होना चाहिए, मगर टिप्पणी से निकल रहे अर्थ की तरह उसका दुरुपयोग ही होता है या दुरुपयोग के लिए ही उसका वजूद है अथवा वह पूरी तरह से सरकार के कहने पर ही चल रही है, यह कहना उचित नहीं होगा। अगर ऐसा ही होता तो वह केवल प्रतिपक्ष के नेताओं पर ही कार्यवाही करती, सरकारी मंत्रियों को शिकंजे में कैसे लेती? इसे यह तर्क दे कर काटा जा सकता है कि सरकार अपनी सुविधा के अनुसार उसका उपयोग करती है और बहुत राजनीतिक जरूरत होने पर अपने मंत्रियों को भी लपेट देती है, मगर यह बात आसानी से गले नहीं उतरती कि मात्र कोर्ट की टिप्पणी की वजह से ही सरकार ने अपने मंत्री शहीद कर दिए।

वस्तुत: न्यायालय ने यह टिप्पणी करके सीबीआई के अस्तित्व पर ही एक प्रश्रचिन्ह खड़ा कर दिया है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय सबसे बड़ी कानूनी संवैधानिक संस्था है, इस कारण वह किसी के भी बारे में कुछ भी टिप्पणी कर सकती है, इसको लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसकी पहल की कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने। हालांकि न्यायालय की अवमानना के डर से वे कुछ संभल कर बोले, मगर जन चर्चा में इस प्रकार की टिप्पणी को उचित नहीं माना जा रहा। वैसे यह पहला मौका नहीं है कि न्यायपालिका की ओर से इस प्रकार की टिप्पणी आई है। इससे पूर्व भी वह ऐसी व्याख्या कर देती है, जिसमें शब्दों को उचित चयन न होने का आभास होता रहा है। विशेष रूप से पुलिस तो सदैव नीचे से लेकर ऊपर तक जलील की जाती रही है। माना कि पुलिस अधिकारी विशेष अगर गलत करता है तो उस पर टिप्पणी की जा सकती है, मगर वही टिप्पणी अगर पूरे पुलिस तंत्र पर चस्पा हो जाती है तो कहीं न कहीं अन्याय होता प्रतीत होता है।

आम धारणा है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च है, मगर सच ये है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों एक दूसरे के पूरक तो होते ही हैं, नियंत्रक भी होते हैं। तीनों के पास अपने-अपने अधिकार हैं तो अपनी-अपनी सीमाएं भी। ऐसे ये कहना कि इन तीनों में न्यायपालिका सर्वोच्च है, गलत होगा। जहां विधायिका कानून बनाती है तो न्यायपालिका उसी कानून के तहत न्याय करती है। स्पष्ट सीमा रेखाओं के बाद भी दोनों के बीच कई बार टकराव होते देखा गया है। प्रधानमंत्रियों तक को न्यायपालिका को अपनी सीमा में रहने का आग्रह करना पड़ा है। इसकी वजह ये है कि न्यायपालिका की टिप्पणियों की वजह से कई बार विधायिका को बड़ी बदनामी झेलनी पड़ती है। कई बार तो ऐसा आभास होता है कि न्यायपालिका इस प्रकार की टिप्पणियां करके अपने आपको सर्वोच्च जताना चाहती है। वह यह भी प्रदर्शित करती प्रतीत होती है कि चूंकि विधायिका ठीक से काम नहीं कर रही इस कारण उसे कठोर होना पड़ रहा है। 

 मगर सवाल ये है कि अगर न्यायपालिका के उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति विशेष अगर अतिक्रमण करें और एक आदत की तरह फैसले के अतिरिक्त टिप्पणियां भी करे तो उसकी देखरेख कौन करेगा? अर्थात अगर कोई न्यायाधीश अलिखित रूप से कोई अवांछित टिप्पणी कर दे तो प्रभावित किस के पास अपील करे? कदाचित पूर्व में न्यायाधीश इस प्रकार की टिप्पणियां करते रहे होंगे, मगर आज जब कि मीडिया अत्यधिक गतिमान हो गया है तो फैसले की बजाय इस प्रकार की टिप्पणयां प्रमुखता से उभर कर आती हैं। और नतीजा ये होता है कि जिन न्यायाधीशों का उल्लेख करते हुए सम्मानीय शब्द का संबोधन करना होता है, उनके बड़बोले होने का आभास होता है। आखिर में एक महत्वपूर्ण बात। अगर उच्चतम न्यायालय की ताजा टिप्पणी पर चर्चा करना अथवा उसके प्रतिकूल राय जाहिर करना उसकी अवमानना है तो उस टिप्पणी का विपक्षी दलों का अपने पक्ष में राजनीतिक इस्तेमाल या इंटरपिटेशन करना क्या है? क्या संदर्भ विशेष में न्यायालय की टिप्पणी करने के अधिकार की तरह अन्य किसी को भी उस टिप्पणी का हवाला देकर हमले करने का अधिकार है?

इस सिलसिले में हाल ही हुआ एक प्रकरण आपकी नजर है। बीते दिनों जब राजस्थान की राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने एक समारोह में कहा कि अधिकारी योजनाएं तो खूब बनाते हैं, मगर उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं होता, तो उनके बयान का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने इस्तेमाल करते हुए सरकार पर हमला करना शुरू कर दिया। इस पर अल्वा को आखिर कहना पड़ा कि उनके बयान का राजनीतिक इस्तेमाल करना ठीक नहीं है और कम से कम राजनीतिक छींटाकशी में उन्हें तो मुक्त ही रखें।

नक्सली हमले- आखिर कब तक ?

आमतौर पर मीडिया की सुर्खियों से गायब रहने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर से सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ के सुर्खियों में रहने की वजह एक बार फिर से नक्सली ही हैं जिन्होंने घात लगाकर किए हमले में छ्त्तीसगढ़ कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं की हत्या कर छत्तीसगढ़ पीसीसी को वीरान कर कर दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं पर शायद ये नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला है लेकिन राजनीतिक दलों से इतर नक्सली इससे भी बड़े हमले कर सरकार का अपनी ताकत का एहसास पहले भी करा चुके हैं। तीन साल पहले अप्रेल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने राज्य व केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी। सवाल मुंह बाएं खड़ा था कि जब नक्सली 76 हथियारबंद जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार सकते हैं तो नक्सली क्या नहीं कर सकते..? 

इसी तरह बीते साल अप्रेल 2012 में सुकमा कलेक्टर एलैक्स पॉल मेनन का अपहरण कर भी नक्सलियों ने सरकार को खुली चुनौती दी थी। कलेक्टर मेनन तो आखिर रिहा हो गए लेकिन एक कलेक्टर का अपहरण अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। जब एक कलेक्टर ही सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी है..? छत्तीसगढ़ में अमूमन रोज नक्सली कभी गोलीबारी कर तो कभी बारुदी सुरंग से विस्फोट कर जवानों को निशाना बनाते रहे हैं। ये ख़बरें सिर्फ स्थानीय अख़बारों के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं क्योंकि इन हमलों में एक या दो जवान ही शहीद होते हैं लेकिन जब तीन साल पहले दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद होते हैं या फिर कांग्रेस के काफिले पर हमला होता है जिसमें दिग्गज कांग्रेसी नेताओं समेत करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है तो ये ख़बरें छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक भी पहुंचती हैं। 

नक्सलियों के बड़े हमलों के बाद छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक हंगामा मचता है। नकस्लियों के हमलों पर बहस का दौर शुरु हो जाता है लेकिन कुछ दिनों बाद शांति पसर जाती है और ऐसे ही एक बड़े हमले पर छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है..! हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्रवाई एक तरफ से ही होती है। सर्चिंग के दौरान या मुठभेड़ के दौरान आए दिए एक आद नक्सली के मारे जाने की खबर भी आती है और इस दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या का आरोप भी जवानों पर लगता है जैसे हाल ही में बीजापुर के एड़समेटा गांव में तीन बच्चों समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप जवानों पर लगा था लेकिन सवाल यहां भी खड़ा होता है कि आखिर क्यों नक्सल प्रभावित इलाकों में हमेशा अघोषित जंग के हालात बने रहते हैं..? 

जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों और आदिवासियों के बाद अब नेताओं को अपने निशाने में लिया है उससे ये साफ जाहिर होता है कि नक्सली खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानते और लोकतांत्रिक सरकार से इतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं या कहें कि चला रहे हैं। अपने बाहुल्य वाले इलाकों में वे विकास कार्य नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सड़क का निर्माण हो गया या उस इलाके में पक्के स्कूल या सरकारी इमारतें बन गयी तो सुरक्षाबल उसका इस्तेमाल उनके खिलाफ कर सकते हैं। सरकार नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की बात करती है लेकिन इसके बाद भी आए दिन छोटी मोटी नक्सली हमलों के बीच दंतेवाड़ा या सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले सामने आते रहते हैं ! 

जो साफ ईशारा करते हैं कि नक्सली कभी हथियार नहीं डालने वाले लेकिन इसके बाद भी स्वामी अग्निवेश टाइप लोग कहते हैं कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या की तो क्या हुआ…जवानों ने भी तो निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी हत्या की थी..! मतलब तो ये हुआ कि अग्निवेश नक्सलियों द्वारा जवानों की हत्या को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं और अघोषित तौर पर नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं..! एक तरफ भारत पहले ही अपने पड़ोसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और ड्रैगन के दोहरे खतरे से जूझ रहा है ऊपर से देश के अंदर विभिन्न राज्यों में नक्सली इससे भी बड़ा खतरा बनकर ऊभर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार हर चीज का हल शांति प्रक्रिया से निकालना चाहती है। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चल रही हमारी सरकारों को कौन समझाए कि नक्सली शांति वार्ता से नहीं मानने वाले..!

नक्सली भी इस देश की ही नागरिक हैं लेकिन अगर वे हथियार की भाषा ही बोलना और समझना चाहते हैं तो क्यों न उनकी भाषा में उनसे बात की जाए..? क्या हमारी सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि नक्सल बाहुल्य इलाकों में अभियान चलाकर नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया जाए। जाहिर है हमारी सरकार भी सक्षम है और सुरक्षाबल भी लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि ये फैसला ले कौन..? केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ये फैसला लेना होगा कि वे अब और नक्सली हमले नहीं सहेंगे और समर्पण या बातचीत के रास्ते से न मानने पर नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एक दृढ़ निर्णय लेना ही होगा वर्ना एक अंतराल के बाद फिर से दंतेवाड़ा या फिर सुकमा जैसी घटनाएं हमारे सामने आती रहेंगी।

क्या पत्रकारिता में वाकई तरक्की आई है या फिर गिरावट ?

हिंन्दी पत्रकारिता के 187 वर्श पूरे हो चुके है, इन बिते वर्षो  में ये क्षेत्र अनेक गिरावट और तरक्की को देखा है। इन सब के अलावे अग्रेजी शासकों की प्रहार और अपातकाल की दंश को भी झेला है। मगर आज ये क्रांतिकारी हथियार कारपोरेट घरानों की जागिर बनते जा रहा है। क्योंकि आज संपादक मैनेजर की भूमिका अदा कर रहा है, तो मालिक दलाल के रूप में खबरों की आत्मा निकाल कर व्यापार कर रहा है। आज न्यूज चैनलों को लेकर यह सवाल बार बार उठता है कि जो कुछ खबरों के नाम पर परोसा जा रहा है, उससे इतर पत्रकारिता की कोई सोचता क्यों नहीं है। क्या ये सोच गिरावट की ओर इषारा नहीं करता है ? आज की पत्रकारिता कमरे में सिमटी कर रह गई है, जिसमें पत्रकारिता शब्द बेमानी हो चला है, और धंधा समूची पत्रकारिता के कंधे पर सवार होकर बाजार और मुनाफे के घालमेल में उलझ कर रह गया है। तो वही दुसरी ओर राजनीतिक दलों ने पत्रकारिता को अपने कोख में ही बड़ा करना शुरु कर दिया है। कोई संपादक कितनी क्रियेटिव है, आज ये मायने नहीं रखती है, उससे ज्यादा उस संपादक का महत्व बाजार से मुनाफा बटोरने का है। साथ ही इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तकनीकी विस्तार ने मीडिया को जो विस्तार दिया है उतना विस्तार पत्रकारों का नहीं हुआ है। और मीडिया का यही तकनीकी विस्तार ने इस चकाचैध की रोशनी में युवाओं को अपने ओर खिंचने लगा है। और आज असल में इसी को पत्रकारिता मानने लगा है, और राजनीति को प्रभावित करने वाला चैथा खम्भा भी।

आज अखबार के एक ही पन्ने पर एक ही व्यक्ति से जुड़ी दो खबरें छपती हैं, जो एक दूसरे को काटती हैं। जो पीत पत्रकारिता के रूप में इस पेषे में जहर घोल रही है। जिस पत्रकारिता को लोकत्रंत्र के पहरुआ होना है, वह आज पहरुआ होने का कमीशन मांगने लगा है। साथ ही टीआरपी के नाम पर खबरों की जगह मनोरंजन और सनसनाहट पैदा करने वाले तंत्र-मंत्र को दिखा कर, आज के बाजारवादी चैनल और अखबार पत्रकारिता की परिभाशा को बदल दिया है। हाल के दौर में न्यूज चैनलों का लाइसेंस जिस तरह चिट-फंड करने वाली कंपनियो से लेकर रियल-इस्टेट के धुरंधरों को मिला है उसको भी लेकर सवाल उठ रहा है।

मिशन से शुरू हुई पत्रकारिता के कौशल में तब्दील होने का सच है। अब बेमानी लगने लगी है। यानी जिस जमाने में देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और पत्रकारिता उसकी तलवार थी तब वह मिशन हो सकती थी। उसमें धन और रोजी नहीं थी। मगर बदलाव के इस दौर में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ का जुमला उछालकर पत्रकार और पत्रकारिता के स्वरूप और दायित्वों को समेटना अब बेमानी लगने लगी है। मगर इसी पत्रकारिता ने बोर्फोस से लेकर आदर्श सोसाइटी घोटाले को उजागर करके पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। तो वही दुसरी ओर अन्ना हजारे की आंदोनल का मीडिया कवरेज ने सरकार को जनसरोकार के आगे झुकने पर मजबुर किया। 
 
साथ ही आज के दौर में सोशल मीडिया ने मिस्र में सत्ता परिर्वतन में जो भूमिका अदा की उसको लेकर विष्व के कई सारे तानाषाहों की पैर तले जमीन खिसक गई। आज के बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता का काम भले ही बदला है। मगर फिर भी भारतीय पत्रकारिता की मूलधारा इस बाजारीकरण की आंच से नहीं पिघली हैं। उसमें जोखिम झेलने का जज्बा आज भी बरकरार है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पत्रकारिता में वाकई तरक्की आई है या फिर गिरावट ?

30 May 2013

बदलते समय में पत्रकारिता- हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष रिपोर्ट !

अनेक दिवस-दिवसों की तरह 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक कर्मकांड नहीं है। साल-दर-साल अपने पेशे यानी पत्रकारिता को कसौटी पर कसने, मूल्यांकन करने और आत्म-निरीक्षण का यह दिन हमें अपनी परंपरा के प्रति जागृत करता है और आगे का रास्ता भी तय करने का अवसर देता है। साल 1826 की 30 मई को कलकत्ते (अब कोलकाता) की आमड़ातल्ला गली के एक कोने से प्रकाशित अल्पजीवी पत्र उदन्त मार्तण्ड ने इतिहास रचा था। मुफलिसी में भी अपने पत्रकारीय जज्बे को जिंदा रखने वाले इसके संपादक युगल किशोर सुकुल को 187 साल बाद याद करके भारतीय पत्रकारिता की संघर्षशीलता का रोमांच कौंध उठता है। थोड़ा पीछे देखें, तो ‘संघर्ष’ भारतीय पत्रकारिता की नियति प्रतीत होता है और आज भी वह इस पेशे का प्रेरणा-बिंदु या थाती है। पत्रकारिता के पौधे को सींचने वाली ‘कंपनी’ के मुलाजिम जेम्स आगस्टस हिक्की (भारत के पहले समाचार पत्र के संपादक) को ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश से निकाला दिया। कोलकाता के ही राजा राममोहन राय को अपने समाचार-पत्रों को सुधारवादी आंदोलनों का हथियार बनाने के लिए कट्टरपंथियों की तीखी आलोचनाएं व प्रहार झेलने पड़े। 

कोलकाता में ही बड़ा बाजार और दूसरे बाजारों में दुकान-दुकान, घर-घर जाकर सेठों को अपना अखबार ‘बांच’ (पढ़) कर सुनाने और बदले में चार-छह पैसा पाकर अखबार चलाने वाले उचित वक्ता के संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र का संघर्ष कम ही लोगों को ज्ञात होगा। घोर मुफलिसी में काशी की गंदी अंधेरी कोठरी में ‘स्वनामधन्य- संपादकाचार्य’ पराड़करजी के आखिरी दिनों की कहानी और भी सिहरन भरी है। वर्तमान दौर भी कम उद्वेलित नहीं करता। समूचे विश्व में पत्रकारिता आज भी संघर्ष और जज्बे का पेशा है। मिशन से प्रोफेशन और फिर ‘बिजनेस’ की बातें बहुत होती रही हैं, पर वास्तविकता से परे पत्रकारिता का कोई भी विमर्श कुछ भी अर्थ नहीं रखता। पहले मानते थे कि ललाट (मस्तक) पर टीका, धोती-कुरता, अंग-वस्त्रम् के बिना संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का काम नहीं हो सकता। वक्त बदल चुका है। कुछ वैसी ही धारणा पत्रकारिता की ‘संघर्षशीलता’ को लेकर भी रही। बढ़ी हुई दाढ़ी, कुरता, कंधे पर बगल में टंगा थैला, फटी-पुरानी चप्पलें, बिवाई वाले पांव व वाचलता यानी किसी भी विषय पर कुछ भी उल्टी-सीधी क्रांतिकारी बयानबाजी- ये सभी एक पत्रकार को रूपायित करते थे। 

लेकिन आज के व्यावसायिक दौर में पत्रकारिता की कार्यशैली काफी कुछ बदल चुकी है। उसका स्वरूप निरंतर बदल रहा है। बदलाव के इस दौर में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ का जुमला उछालकर पत्रकार और पत्रकारिता के स्वरूप और दायित्वों को समेटना बेमानी है। मेरी दृष्टि में ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ के दौर में पहुंची पत्रकारिता के लिए व्यावसायिक नैतिकता (प्रोफेशनल एथिक्स) का महत्व सबसे ऊपर है। इसके बावजूद समूचा परिदृश्य निराशापूर्ण है। कितना भी प्रोफेशनलिज्म हो, पत्रकारिता का मूलमंत्र या पत्रकारिता की आत्मा ‘मिशन’ ही है और  वही रहेगी। तभी तो देश के लगभग 37,000 से ज्यादा स्ट्रिंगर और अल्पकालिक संवाददाता-पत्रकार पत्रकारिता की सेवा में जुटे हुए हैं। मोटी तनख्वाह या तनख्वाह न पाने वालों का असली मानदेय ‘मिशन’ की पूर्ति से मिलने वाला संतोष ही है। आखिर अपना कैमरा संभाले कमर तक पानी में घुसकर या नक्सलियों के ‘डेन’ (अड्डों) में जाकर कवरेज करने वाले किस पत्रकार की भरपायी की जाती है?

 या फिर आतंक के महासागर पाकिस्तान में मीडिया के लिए समाचार या कंटेंट जुटाने-लाने के लिए अपनी जान गंवा देने वाले, सिर कटा लेने वाले डैनियल पर्लो को भला कितना वेतन मिलता है? यह सच है कि आज के बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता का काम बदला है। ‘मीडिया कर्म’ को या पत्रकार को जर्नलिस्ट नहीं, ‘कंटेंट प्रोवाइडर’ माना जाने लगा है। फिर भी भारतीय पत्रकारिता की मूलधारा इस बाजारीकरण की आंच से नहीं पिघली। उसमें जोखिम झेलने का जज्बा बरकरार है। आज पत्रकारिता के कामकाज की दशाएं बदली हैं। एक पत्रकार को जीविका के लिए पूरा साधन न मिले, तो वह देश-दुनिया की चिंता क्या करेगा? फिर भी दूसरे पेशों में यह स्थिति पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से काफी अच्छी है। चीन के ‘नंगे पैर डॉक्टर’ वाले प्रयोग का हमारी पत्रकारिता में एक अलग समर्पित रूप मिलता है। नंगे पैर गांव-गिरांव की सेवा करने वाले पत्रकारों की यहां कमी नहीं, पर इन्हें पूछता कौन है? वह दौर-ए-गुलामी था, यह दौर-ए-गुलामां है- पत्रकारिता के संघर्ष की इससे दो दिशाएं साफ होती हैं।

 तब ‘मिशन’ था अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का और अब दौर है आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक दासता से मुक्ति का। इसी ‘मुक्ति’ की चाहत के साथ समर्पित भाव से काम करने वाले दुनिया के 29 देशों में 141 पत्रकारों ने अपनी जानें गंवा दीं। आंकड़े देखें, तो सीरिया पत्रकारों व पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक देश है। भारतीय पत्रकारिता के बारे में भी कहा गया- ‘तलवार की धार पे धावनो है’- पत्रकारिता तलवार की धार पर दौड़ने के समान है। सचमुच इन 141 पत्रकारों ने सिर्फ एक वर्ष 2012 में ऐसा कर दिखाया। इनके जज्बे को भी सलाम करने का मौका है, अंडमान निकोबार की सेलुलर जेल में ही हजारों भारतीयों ने कालापानी की सजा काटी थी।  उस जेल की काल कोठरियों से अंग्रेज हुक्मरानों को दहला देने वाली ‘वंदे मातरम’ की जो आवाजें गूंजती थीं, उनमें बहुत से स्वर पत्रकारों-संपादकों के भी थे। जेल के फांसी घर में लटकते तीन फंदों पर कितने पत्रकार-संपादक झूल गए थे, लोगों को यह पता भी नहीं। इस विषय पर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों और विभागों में शोधकार्य की आवश्यकता पर केंद्र सरकार-राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए। 

उन पत्रकारों के संघर्ष और बलिदान को यह नमन-श्रद्धांजलि होगी। आज इसी के साथ स्वंतत्र पत्रकारिता के नाम पर मीडिया में, ब्लैकमेलरों के विरुद्ध समाज और खुद मीडिया की मुहिम जरूरी है। तभी तो भाषा, संदर्भ और विषय की जानकारी न रखने वाले, कहीं काम न पा सके लोगों के पत्रकारिता में घुस आने पर देश के जिम्मेदार लोगों की चिंता का हल ढूंढ़ा जा सकेगा।  तिलक, गांधी और भगत सिंह सहित आजादी के दौर के प्राय: सभी क्रांतिकारियों-राजनेताओं ने मिशन के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया। वह भी भाषायी पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता का, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। आज पत्रकारिता में इस मिशन या समर्पण को बनाए रखने के लिए समाज के सहारे और व्यापक समर्थन की जरूरत है।

लिव इन रिलेशनशिप- रखैल व्यवस्था का बढ़ता प्रचलन !

वर्तमान युवा पीढ़ी लिव इन रिलेशनशिप जैसे गैर सामाजिक संबंधों के प्रति अत्याधिक आकर्षित दिखाई दे रही है. इसके पीछे उनका तर्क यह है कि विवाह के बंधन में बंधने से पहले एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो वैवाहिक जीवन में ताल.मेल बैठा पाना और आसान हो जाता है हालांकि हमारा परंपरावादी समाज महिला और पुरुष को विवाह से पहले साथ रहने की इजाजत नहीं देता किंतु अब हमारे युवाओं की मानसिकता ऐसी सोच को नकारने लगी है जो उन्हें किसी भी प्रकार के बंधन में बांध कर रख पाए इसीलिए युवा लिव इन में जाने से बिलकुल नहीं हिचकिचाते महिलाएं और पुरुष जब प्रेम संबंध में पड़ते हैं तो उन्हें लगता है कि विवाह से पहले एक साथ रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक.दूसरे के साथ को लेकर सहज हो जाने से आगामी जीवन बिना किसी परेशानी के काटा जा सकता है शायद नहीं अनेक ऐसे उदाहरण हैं हमारे सामने जो लिव इन रिलेशनशिप की हकीकत बयां करते हैं ऐसे संबंध प्रेम पर नहीं शारीरिक आकर्षण पर निर्भर होते हैं और जब यह आकर्षण समाप्त होने लगता है तो तथाकथित प्रेम बोझ लगने लगता है झगड़े शुरू हो जाते हैं एक.दूसरे की उपस्थिति तक सहन नहीं की जातीण् अंतत: लिव इन रिलेशनशिप के साथ प्रेम भी समाप्त हो जाता है

हम इस बात को कतई नकार नहीं सकते कि लिव इन जैसे संबंधों के टूटने का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है हमारा समाज एक ऐसी महिला को कभी सम्मान नहीं दे सकता जो विवाह पूर्व किसी पुरुष के साथ एक ही घर में रह चुकी हो ऐसे हालातों में संबंध जब टूटता है तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है वहीं लिव इन में संलिप्त रह चुका पुरुष जो हमेशा से ही महिलाओं की अस्मत से खेलना अपना अधिकार समझता आया है की गलती को कोई महत्व ना देकर नजरअंदाज कर दिया जाता है महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अपने संबंधों के प्रति अधिक संजीदा और भावनात्मक लगाव रखती हैं इसीलिए लिव इन संबंध के टूटने का प्रभाव केवल उन महिलाओं पर ही पड़ता है जो परंपरावादी सोच वाली आर्थिक तौर पर सेटल या अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं बल्कि यह उन महिलाओं को भी अपनी चपेट में ले मानसिक रूप से आहत करता है जो मॉडर्न और आत्म .निर्भर होती हैं हालंकि कई ऐसी महिलाएं भी हैं जो अपने कॅरियर को प्राथमिकता देते हुए शादी जैसी बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से बचना चाहती हैं, लेकिन ऐसे में उन महिलाओं की मनोदशा को नहीं नकारा जा सकता जो किसी बहकावे में आकर ऐसे झूठे रिश्तों की भेंट चढ़ जाती हैं

हाल ही में पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजली गुप्ता और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की प्रथम वर्ष की छात्रा मालिनी मुर्मू द्वारा लिव इन के टूटने और प्रेमी के धोखा देने के बाद सुसाइड करना इसी तथ्य का एक ज्वलंत उदाहरण है आईआईएम जैसे संस्थान में दाखिला लेते ही मालिनी अपने उज्जवल भविष्य के विषय में आश्ववस्त हो गई थी, लेकिन उसकी किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. फेसबुक पर सार्वजनिक स्टेटस के रूप में मालिनी के प्रेमी ने उसे ब्रेक.अप की जानकारी दी वहीं एक शादीशुदा व्यक्ति के प्रेम में धोखा खाने के बाद अंजली ने भी दुनियां के तानों से बचने के लिए आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठा लिया. लेकिन प्रेम के नाम पर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करने वाले उनके प्रेमियों पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई.

यही हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है यहां महिलाओं के अस्तित्व और उनके सम्मान को स्वीकार करना अभी तक एक चुनौती ही बना हुआ है पुरुष जैसे चाहेए जब चाहे महिलाओं को नीचा दिखा सकते हैं लेकिन हम नारी. सशक्तिकरण के विषय में सुनकर ही संतुष्ट हो जाते हैं जबकि जमीनी सच्चाई आज भी पहले जैसी ही है जिसके स्वरूप में भले ही थोड़ा.बहुत बदलाव आया है लेकिन महिलाओं की शोचनीय दशा जस की तस बनी हुई है ऐसी व्यवस्था में पुरुष द्वारा महिलाओं का भरपूर शारीरिक शोषण किया जाता है लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार का पारिवारिक दर्जा या सामाजिक दर्जा देने का कोई रिवाज नहीं है

हम हमेशा भारतीय संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देकर लिव इन रिलेशनशिप को गैर परंपरावादी मानकर गलत कहते हैं जबकि हमारा इतिहास इस बात का गवाह है कि महिलाओं को अपने अधीन रखनाए उनका शोषण करना भारतीय पुरुषों का बहुत पुराना शौक है जिसे परंपरा स्वरूप बेरोकटोक आज भी अपनाया जा रहा है जबकि यह सीधे.सीधे पुरुषों को उनका दमन करने का एक अन्य मौका दे देता है यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि महिलाओं का शोषण करने का ट्रेंड नए स्वरूप में एक बार फिर अपनी जड़ें जमा चुका है और अपनी आंखों पर आधुनिकता की पट्टी  बांधे हमारे मॉडर्न युवा इस बात को सोचना तो दूर सुनना भी पसंद नहीं करते

28 May 2013

सत्यमेव जयते वास्तविकता या बाजारवाद ?

कन्या भ्रूण हत्या मानव जाति को कलंकित करता यह मसला आज भारतीय समाज की एक घृणित पहचान बन चुका है। गर्भ में पल रही कन्या भ्रूणों को कितनी बेदर्दी के साथ उसकी मां से अलग कर दिया जाता हैए उससे जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। भारतीय समाज की जड़ों तक जा पहुंचे कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय अपराधों पर भी अब बाजार की नजर पड़ गई है। आमिर खान जैसे स्टार ने अपने पहले टेलीविजन शो सत्यमेव जयते का इतना प्रचार किया कि सभी इस शो को देखने के लिए उत्सुक हो गए और कार्यक्रम को देखने के बाद दर्शक क्या मीडिया भी अब आमिर खान का गुणगान करने लगा और यह दिखाने की कोशिश करने लगा कि आमिर से पहले इस मुद्दे पर किसी ने आवाज उठाने की कोशिश नहीं की।


उपरोक्त मुद्दे पर कई लोगों का मानना है कि मीडिया के मिस्टर पर्फेक्शनिस्ट ने टेलीविजन पर डेब्यू करने के लिए सत्यमेव जयते नामक एक ऐसे शो को चुना जो दर्शकों का ना सिर्फ मनोरंजन करे बल्कि उन्हें समाज की कड़वी सच्चाइयों से भी अवगत करवाए। उनका पहला एपिसोड कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित था। वर्षों से चली आ रही इस प्रथा के विरोध में ना जाने कितनी ही बार आवाज बुलंद की गई लेकिन जब इस आवाज पर मीडिया और ग्लैमर का तड़का लगा तब जाकर यह हमारे कानों तक पहुंची। बहुत लंबे समय से एक न्यूज चैनल पर जिंदगी लाइव नामक कार्यक्रम दिखाया जाता है जिसमें समाज के ऐसे ही चेहरों को उजागर किया जाता हैए जिन्हें देखकर आंखों में आंसू तक आ जाते हैं। लेकिन ना तो इस प्रोग्राम में कोई ग्लैमर है और ना ही इसे बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया है। इसीलिए किसी ने भी इस कार्यक्रम के भावनात्मक पक्ष को तवज्जो नहीं दी। अगर इस कार्यक्रम को भी आमिर खान के बहुचर्चित शो सत्यमेव जयते की तरह प्रचारित किया जाता तो शायद बहुत पहले कन्या भ्रूण हत्या जैसी अनेक समस्याओं का हल खोज लिया जाता। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जिन राज्यों में यह घटनाएं घट रही हैं वहां की सरकारें भी अपनी दुर्गति से परिचित नहीं थीं उन्हें तो आमिर ने बताया।


जैसा कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही इस मुद्दे पर विपरीत विचारधारा रखने वाले लोगों का साफ कहना है कि बेशक यह समस्याएं पहले भी कई बार उजागर की जाती रही हैंए इन पर कई बार आवाज उठाने की भी कोशिश की गई लेकिन अगर बॉलिवुड और बाजारवाद की सहायता लेकर कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय कृत्यों पर रोक लगाई जा सकती है तो इसमें बुराई क्या है अगर आमिर खान अपने एक टेलीविजन शो के जरिए एक बड़े बदलाव का आश्वासन जनता को दे रहे हैं तो हमें उन्हें समर्थन देना चाहिए। ना कि पुरानी बातों और सरकार की नाकामियों को इस मार्ग में अवरोध बनने देना चाहिए।

क्या सामाजिक जरुरत है यौन संबंधों में उम्र वृद्धि ?

दिल्ली की एक अदालत के न्यायाधीश का मानना है कि सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित करने की उम्र को बढ़ा कर अठ्ठारह वर्ष करने जैसा प्रस्ताव अलोकतांत्रिक है। इतना ही नहीं संबंधित जज का यह भी कहना है कि केंद्र सरकार का यह प्रस्ताव भारतीय समाज में व्याप्त पिछड़ेपन को साफ दर्शाता है। इससे पहले भी दिल्ली की एक अदालत ने सेक्स करने की उम्र अठ्ठारह वर्ष बढ़ाए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। हालांकि यह न्यायाधीश महोदय का अपना निजी मत है लेकिन हमारे समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों की उम्र को बढ़ाए जाने के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि पहले की अपेक्षा युवाओं का मानसिक और शारीरिक विकास कम उम्र में हो जाता है। ऐसे में यह कतई जरूरी नहीं है कि 18 वर्ष से कम उम्र की युवती के साथ जबरन संबंध स्थापित किया गया हो। सेक्स के प्रति रुझान और सहमति के कारण अगर युवती किसी प्रकार की पहल करती है तो इसे बलात्कार की श्रेणी में रखना पूर्णतरू गलत है। इस प्रस्ताव का सीधा और एकमात्र नुकसान केवल युवकों को ही होगा। 

भले ही वह इसमें पूरी तरह दोषी हों या ना हों उन्हें बलात्कार का दोषी ठहराकर प्रताड़ित किया जाएगा। यह दौर समानता का है इसीलिए एक ऐसे प्रस्ताव को पारित करनाए जो पूरी तरह एक पक्ष पर ही केंद्रित हैए नासमझी होगी। वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जो महिलाओं के हितों की रक्षा और उनके सम्मान को बरकरार रखने के लिए इस प्रस्ताव को बहुत जरूरी मानते हैं। सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों की उम्र अट्ठारह वर्ष करने जैसे प्रस्ताव का पक्ष लेते हुए इनका कहना है कि भारतीय समाज में हमेशा से पुरुषों द्वारा महिलाओं का शोषण किया जाता रहा है। भारतीय पुरुषों ने महिलाओं को हमेशा से ही उपभोग की वस्तु से अधिक और कुछ नहीं समझा है। कभी जबरन तो कभी उसे बहला.फुसलाकर उन्होंने अपने हितों को साधने का प्रयत्न किया है। किसी कठोर कानून की अनुपस्थिति के कारण महिलाओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने वाला कोई बच ना सके इसीलिए इस प्रस्ताव का कानूनी रूप लेना बहुत जरूरी है।

जिस्मानी रिश्तों के लिए जरुरी क्या है, समाज या रजामंदी ?

पाश्चात्य देशों की तरह भारत में भी गर्भनिरोधक और कॉंट्रासेप्टिव पिल्स का बाजार दिनोंदिन गर्माता जा रहा है। युवाओं के बीच ऐसी दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता उनके जीवन में आते खुलेपन की ओर इशारा करती है। विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाना आज के युवाओं के दृष्टिकोण में कोई सामाजिक निषेध नहीं बल्कि व्यक्तिगत रजामंदी बन गया है। सेक्स जिसे कुछ समय पहले तक सामूहिक वार्तालाप में भी शामिल नहीं किया जाता था आज उसे धड़ल्ले के साथ प्रचारित किया जा रहा है। हाल ही में मुंबई की एक फार्मा कंपनी ने 18 अगेन नामक एक ऐसी क्रीम को बाजार में उतारा है जिसकी सहायता से महिलाएं अपना खोया कौमार्य वापिस पा सकती हैं। हालांकि इससे पहले भी सर्जरी की मदद से महिलाएं एक बार फिर से खुद को वर्जिन महसूस कर पाती थीं लेकिन यह सर्जरी भारत समेत अन्य एशियाई देशों के लोगों के लिए महंगी साबित होती थी। ऐसे में 18 अगेन क्रीमए जिसका उपयोग बड़ी सहजता और सुलभता के साथ किया जा सकता है का भारतीय समाज में प्रवेश करना अपने आप में बहस का मुद्दा बन गया है कि क्या भारतीय समाज में संबंधों की गरिमा और उनका महत्व घटता जा रहा है

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की पैरवी करने वाले लोगों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति किससे और कब शारीरिक संबंध बनाता है यह उसकी अपनी मर्जी और सोच होनी चाहिए। यह पूरी तरह व्यक्तिगत मसला है जिसमें समाज या फिर किसी भी अन्य व्यक्ति को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। व्यक्तिवाद का पक्ष लेने वाले लोगों का यह साफ कहना है कि आधुनिकता के निरंतर बढ़ते प्रचार.प्रसार के बाद भी अगर हम व्यक्ति के जीवन पर इस प्रकार पहरे लगाते रहेंगे तो यह वैयक्तिक रूप से बेहद निराशाजनक साबित होगा। आज की पीढ़ी की जीवनशैली काफी खुलापन लिए हुए हैं ऐसे में सेक्स को परंपरा से जोड़कर देखना हैरानी भरा कदम ही कहा जाएगा क्योंकि इसका संबंध संस्कृति से नहीं बल्कि व्यक्ति की अपनी मर्जी और उसके अपने निजी विचारों से है। उनके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती करना या संस्कृति के नाम पर उनके आपसी संबंधों को बाधित करना किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है। कोई दो व्यक्ति अपने संबंध को आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक रूप से नजदीक आते हैं तो यह उनकी अपनी सोच है इसमें समाज की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। कई बार प्रेम संबंध सभी सीमाएं पार करने के बाद भी सफल नहीं हो पाता तो आगे का जीवन बिना किसी परेशानी के बिताने के लिए अगर महिलाएं 18 अगेन या ऐसी कोई अन्य क्रीमों का उपयोग करती हैं तो इसके बुराई भी क्या है।


वहीं दूसरी ओर गर्भनिरोधक गोलियों और 18 अगेन जैसी क्रीमों की भारत में बढ़ती लोकप्रियता को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बेहद घातक समझने वाले लोगों का मत है कि अगर हर कोई व्यक्तिगत विचारों और मर्जी को ही प्राथमिकता देगा तो इससे सामुदायिक एकता और सामाजिक गरिमा को नुकसान पहुंचेगा। भारत में विवाह पूर्व शारीरिक संबंध हमेशा से ही निषेध हैं और रहेंगे। अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां सामाजिक गरिमा पर पर प्रहार करती हैं तो इसे किसी भी रूप में सहन नहीं किया जा सकता। गर्भनिरोधक गोलियों और कौमार्य वापिस दिलवाने वाली क्रीमों की बढ़ती मांग भारतीयों के गिरते नैतिक स्तर को दर्शाती है जो हमारी संस्कृति को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। टीण्वीण् पर आने वाले इनसे संबंधित विज्ञापन को देखकर युवा पीढ़ी भटक रही है और अगर इस बढ़ते प्रचलन को रोका नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब पाश्चात्य देशों की भांति भारत में भी लोग बिना किसी शर्म और लिहाज के सार्वजनिक तौर पर एक.दूसरे के साथ शारीरिक निकटता बनाते नजर आएंगे।

आखिर क्या है नक्सलवाद का हल ?

हाल ही में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफीले पर हुए घातक नक्सली हमलेए जिसमें प्रदेश के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं समेत लगभग 30 लोगों की जानें गईं और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुएए को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘रेड कॉरिडोर’ अब और अधिक विस्तृत और खतरनाक होता जा रहा है। मध्य.प्रदेश के घने और आदिवासी इलाकों में फैला नक्सलवाद अब और अधिक खतरनाक होता जा रहा है और जो हिमाकत इस बार उन्होंने दिखाई उसे देखते हुए इस नक्सली हमले को अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला करार दिया जा रहा है। आतंकवाद से भी कहीं ज्यादा विनाशक नक्सलवाद देश की अंदरूनी सुरक्षा को एक ऐसा खतरा है जिस पर आज तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका है इसके विपरीत यह अपने पांव अब और ज्यादा पसारने लगा है। भारत की सीमाओं के भीतर पनप रही इस विरोधी लहर को जड़ से समाप्त करने के लिए बुद्धिजीवियों के दो वर्ग अलग.अलग कार्यवाहियों की मांग कर रहे हैं जिसमें से कुछ नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए केवल सैनिक कार्यवाही को ही एकमात्र विकल्प बता रहे हैं तो कुछ सामाजिक.आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाकर इस खतरे को टालने की पैरवी कर रहे हैं। हालांकि दोनों ही वर्ग देश के अंदरूनी हालातों को सुरक्षित करने के पक्ष में हैं लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने के मामले पर एक.दूसरे से पूरी तरह असहमत प्रतीत होते हैं जिसकी वजह से इस बार यह मुद्दा एक गंभीर बहस में परिवर्तित हो गया है।


सैनिक कार्यवाहियों के पक्षधर बुद्धिजीवियों का कहना है कि भले ही इस बार के नक्सली हमले में ज्यादा संख्या में जानें गई हों लेकिन नक्सली शुरुआत से ही इतना ही ज्यादा निर्मम और हत्यारे प्रवृत्ति के रहे हैं। हर बार उन्होंने निर्दोष लोगों की जान ली है और उन पर कभी भी बातचीत का कोई असर नहीं हुआ है। इसके विपरीत हर बार वह और वहशीपन के साथ अवतरित होते आए हैं। देश के लिए खतरा बन चुके नक्सलवाद को समाप्त करने का एकमात्र उपाय सिर्फ और सिर्फ सैनिक कार्यवाही ही है। उनका कहना है कि हमारे पास इतने सक्षम सैनिक हैं कि वह मात्र कुछ दिनों में नक्सलियों की कौम को समाप्त कर देंगे और अगर व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो आज हमारे पास यही एक उपाय भी है। सरकार के आगे हर समय नई मुश्किलें पैदा करने वाले नक्सलियों के सिर पर हर समय खून सवार रहता है और वह नहीं देखते कि जो उनका शिकार बन रहा है वो कौन हैए ऐसे में उनके प्रति किसी भी तरह की सांत्वना रखना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है इसीलिए सख्त कदम तो उठाने ही पड़ेंगे।

वहीं दूसरी ओर इस विचारधारा के विपरीत पक्ष रखने वाले लोगोंए जिनका मानना है कि भारत के राजनैतिकए सामाजिक और आर्थिक हालातों में सुधार कर नक्सलवाद की समस्या पर काबू पाया जा सकता है का कहना है कि नक्सली हत्यारे नहीं बल्कि हमारी नीतियों से प्रभावित आदिवासी और गरीब तबके के लोग हैं। उनकी जमीनों पर अतिक्रमण करए उनसे उनके रहने और फलने.फूलने के सभी साधनों को छीनकरए हमने उन्हें अपने खिलाफ कर लिया है। अगर हम वाकई नक्सलवाद को समाप्त करने और देश की सुरक्षा के लिए गंभीर हैं तो हमें उन आदिवासियों से वार्तालाप कर इस समस्या का हल खोजना पड़ेगाए उन्हें हर वो हक देने होंगे जिनके ऊपर उनका अधिकार है। 

भारतीय सरकारों की नीतियों से आक्रोशित भारत के ही कुछ लोग भारत के खिलाफ हो गए हैंए उनकी समस्याओं को सुलझाए बिना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि उन पर हुए अत्याचारों और अन्यायों की ही वजह से आज वह यह खूनी खेल खेलने के लिए मजबूर हुए हैं। उनकी दुर्दशा को समझते हुए सैनिक कार्यवाही जैसा विकल्प ना सिर्फ मानवाधिकारों के विरुद्ध है बल्कि घोर अमानवीय भी है क्योंकि इसमें ना सिर्फ नक्सली अपनी जान गवाएंगे बल्कि कई अन्य निर्दोष लोगों की भी जाने जाएंगी। इसीलिए बेहतर विकल्प सामाजिक और आर्थिक नीतियों में सुधार कर प्रत्येक भारतीयए भले ही वह नक्सली ही क्यों ना होए को अपने साथ लेकर चलना ही है।

26 May 2013

क्या नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारा जाए ?

छत्तीसगढ़ में हुए अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमले के बाद नक्सलियों के प्रति सरकार की नमरम रूख को लेकर कई अहम सवाल खड़े होने लगे है। 1200 से अधिक नक्सलियों ने सुकमा बस्तर हाईवे पर दरभा घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर जो बर्बर हमला किया है, उससे नक्सलियों की कायरता एक बार फिर सत्ता में बैठे केन्द्रीय नेतृत्व को, नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारने के लिए सोचने पर मजबुर कर दिया है। मगर यहा एक सवाल सरकार की उस नीति को लेकर उठ रहा है की कुछ दिन पहले सरकार ने नक्सलियों के लिए पैसा और सैन्य प्रषिक्षण देने की बात कर रही थी। जिसको लेकर सवाल खड़े भी खड़े हुए की आखिर सरकार नक्सलियों को बढ़ाना चाहती है या फिर उन्हें जड़ से मिटाना चाहती है।


आखिर सरकार अब तक नक्सली ऑपरेशन में सेना ओर वायुसेना का उपयोग क्यों नहीं करना चाहती हैं? आखिर कब तक निर्दोश लोगों की जान जाती रहेगी? कब तक हमारे जवाना और राजनेता तो कभी सरकारी अधिकारी उनके कायता की षिकार होते रहेंगे? इस हमले के बाद एक बार फिर से नक्सलियों के लिए वायुसेना का उपयोग करने की मांग उठने लगी है। श्रीलंका ने जिस तरह सेना का इस्तेमाल नक्सलियों की सफाया के लिए किया वैसी जरुरत आज देश में पनम रहे नक्सलियों की आंतरीक आतंकवाद को लेकर उठने लगी है। इतना कुछ होने बाद भी आज सरकार सेना का इस्तेमाल करें या न करें जैसे स्थिती में उलझी हुई है। केंद्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में इस कदर भ्रम में है कि 5 महीने में ही सैकड़ों लोगों की जान जाने के बाद भी वो फैसला नहीं ले पा रही है। 

आखिर सरकार ये फैसला लेने में इतना संकोच क्यों कर रही है। सेना का इस्तेमाल वहीं किया जाता है जहां देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पैदा होता दिखे। फिर वो चाहे पड़ोसी मुल्क से हमला हो या फिर बाहर-भीतर से देश में दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों का हमला हो। आज ये नक्सली अपने खिलाफ खड़े हर हिंदुस्तानी की जान आसानी से ले रहे हैं जैसे आतंकवादी- फिर सेना के इस्तेमाल में इतना संकोच आखिर क्यों? आखिर अर्धसैनिक बलों की पूरी ताकत झोंककर नक्सलियों के सफाए की ही कोशिश तो सरकार कर रही है। फिर ये कोशिश आधे मन से क्यों?

रॉ की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 604 में से 160 जिलों के कई हिस्सों में आतंक के बूते इनकी समानांतर सरकार चलती है। तो फिर इस आतंक को कुचलने के लिए सेना को क्यों नहीं उतारा जा रहा है? नक्सलियों का असर उन इलाकों में सबसे अधिक है जहां खनिज संपदा भरपूर है जिसे नक्सली लूट कर व्यापार कर रहे है, और उस पैसे से निर्दोश लोगों की खून बहा रहे है, फिर भी हमारी सरकार आखिर क्यों चुप है। इतना ही नहीं ये नक्सली गा्रमीण इलाकों में लड़कियों, औरतों के साथ बंदूक के नोक पर स्वछंद यौनाचार कर रहे है, इस देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है।
1967 में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन आज सत्ता पर कब्जे के लिए देष में शस्त्र युध्द की षुरूआत ये नक्सली कर चुके है, मगर लचर नेतृत्व के कारण आज ये अपनी हेकड़ी दिखा रहे है। ये नक्सली सड़क बिजली, स्कूल, पुल और दूसरी सुविधाओं को भी ध्वस्त करना शुरू कर दिए है। इस लड़ाई के खत्म होने में जितनी देर होगी। अपने ही देश के लोग उतना ज्यादा इस लड़ाई के हवन में स्वाहा होते जाएंगे। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारा जाए ?

25 May 2013

क्या खेलों से राजनेताओं को दूर रखना चाहिए ?

एक जमाने तक देश के सबसे लोकप्रिय खेल हॉकी और फुटबॉल होते थे। मगर आज खेलों की भरमार लग गई है, जहा पर देश के जाने माने राजनेता खेल महासंघों की कुर्सी पर विराजमान होकर करोड़ो अरबों की वारे न्यारे कर रहे है। मगर आए दिन जिस प्रकार से देश के खेलों में राजनेताओं की पैठ बनी है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। आज रसूख का पर्याय बन चुकी खेल संघों की कुर्सी पर राजनेता बरसों बरस से चिपके हुए है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या इन्हें वाकई खेल संघों की कुर्सी पर रहना चाहिए? भारत में बचपन में खिलवाड शब्द का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है मगर आज के दौर में खेल संघों को देखकर यह कहा जा सकता है कि देश में खेल अब खिलवाड बन गए हैं।

नए दिशा निर्देशों के अनुसार कोई भी अध्यक्ष अधिकतम तीन और पदाधिकारी दो कार्यकाल ही पूरा कर सकता है। मगर आज महाराष्ट्र प्रदेश के पुणे से सांसद सुरेश कलमाडी पिछले 14 सालों तक भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष बने रहे। साथ ही वर्ष 2000 से एशियाई एथलेटिक्स संघ के अध्यक्ष का पद भी कलमाडी कब्जा जमाए रहे। इसी तरह विवादों से गहरा नाता रखने वाले जगदीश टाईटलर भारतीय जूडो फेडरेशन के अध्यक्ष पद पर बीस साल से काबिज हैं। वे भारतीय आलंपिक संघ के उपाध्यक्ष का ताज भी अपने ही सर पर रखे हुए हैं।

अखिल भारतीय फुटबाल संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल अब इस संघ के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हैं। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा दस सालों से अखिल भारतीय टेनिस संघ के अध्यक्ष हैं। भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विजय कुमार मलहोत्रा ने तो सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं, वे 1973 से भारतीय तीरंदाज संघ के अध्यक्ष पद पर जमे हुए हैं। तो वही दुसरी ओर अरूण जेटली बीसीसीआई के उपाध्यक्ष पद पर बने हुए है। भारतीय बेडमिन्टन संघ के अध्यक्ष वी.के.वर्मा चैथी बार इसके अध्यक्ष बने हैं। वर्मा इसके अलावा एशियन बेडमिन्टन कनफडरेशन के सचिव और विश्व बेडमिन्टन फेडरेशन के उपाध्यक्ष भी हैं।

 हरियाणा के विधायक अजय सिंह चैटाला हरियाणा टेबिल टेनिस संघ पर अपना कब्जा 1987 से बनाए हुए हैं, वे सन 2000 से अखिल भारतीय टेबिल टेनिस संघ में अपनी जोरदार उपस्थिति भी दर्ज कराए हुए हैं। साथ ही अभय सिंह चैटाला पिछले नौ सालों से भारतीय बाक्सिंग संघ पर अपनी दावेदारी बनाए हुए हैं। इन नियम कायदों को धता बताते हुए नानावटी ने भारतीय तैराकी संघ के सचिव की कुर्सी छटवीं बार संभाली है, वे 1984 से इस संघ में हैं। शान का प्रतीक मानी जाने वाली भारतीय हाकी की स्थिति आज किसी से छिपी नहीं है। वर्षों से मठाधीशों के कब्जे से मुक्ति के लिए छटपटाती हाकी दम तोड चुकी है।

खन्ना परिवार का टेनिस संघ पर कब्जा 1988 से बरकरार है। 1988 से 1993 तक राजकुमार खन्ना टेनिस संघ के सचिव रहे और 2000 तक इसके अध्यक्ष रहे। इसके बाद राजकुमार खन्ना ने अपनी विरासत अपने पुत्र अनिल खन्ना को सौंप दी जो आज तक सचिव पद पर कायम हैं। निशानेबाजी के मामले में कभी अव्वल रहने वाला भारत आज इस क्षेत्र में दुर्दशा के आंसू बहाने पर मजबूर है। भारत में खेल संघ एक दशक से पूरी तरह से राजनेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों के घरों की जागीर बनकर रह गया हैं। लंबी असाध्य बीमारी और निधन के चलते ही ये लोग संघ से विदा होते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी 1986 से भारतीय फुटबाल संघ के अध्यक्ष थे। जब वे 2008 में गंभीर रूप से बीमार हुए तब जाकर उनके स्थान पर संघ के ही उपाध्यक्ष एवं केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को अध्यक्ष बनाया गया। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह जिनका निधन कुछ माह पहले हुआ है, वे भी 1999 से नेशनल रायफल संघ के अध्यक्ष रहे हैं।

अभी राजीव शुक्ला आईपील के चेयरमैन और बीसीसीआई के उपध्यक्ष बने हुए है। इसके पहले षरद पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर मौजुद थे। कुल मिलाकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि देष में खेल अब खिलवाड बनकर रह गए हैं। बीसीसीआई चालीस हजार करोड़ रूपए की कंपनी बन चुकी है, मगर यहा खेलों का पतन हुआ है। देश की जनसंख्या 121 करोड़ हो गई है, फिर भी उस हिसाब से खेलों में हम कहीं नहीं हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ खेलों में राजनेताओं का प्रवेश ही जिम्मेदार माना जा रहा है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या खेलों से राजनेताओं को दूर रखना चाहिए ?

खेल संघो में राजनेताओ की सूची 


शरद पवार, पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष, राजीव शुक्ला, आईपील चेयरमैन, प्रफुल पटेल अध्यक्ष, आल इंडिया फुटबाल फेडरेशन, फारूक अब्दुला अध्यक्ष, जम्मू कष्मीर क्रिकेट एसोसीएशन, सी पी जोषी अध्यक्ष, राजस्थान क्रिकेट एसोसीएशन, सुरेश कलमाडी पूर्व अध्यक्ष, भारतीय ओलंपिक संघ, जगदीश टाईटलर अध्यक्ष, भारतीय जूडो फेडरेशन, यशवंत सिन्हा अध्यक्ष, अखिल भारतीय टेनिस संघ, विजय कुमार मलहोत्रा अध्यक्ष, भारतीय तीरंदाज संघ, अरूण जेटली उपाध्यक्ष, बीसीसीआई, अजय सिंह चैटाला अध्यक्ष, हरियाणा टेबिल टेनिस संघ, अभय सिंह चैटाला, अध्यक्ष, भारतीय बाक्सिंग संघ, प्रियरंजन दासमुंशी पूर्व अध्यक्ष, भारतीय फुटबाल संघ, दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री पूर्व अध्यक्ष, नेशनल रायफल संघ बृजभूषण शरण सिंह अध्यक्ष, भारतीय कुश्ती संघ, परमिंदर सिंह ढीढसा अध्यक्ष साइकिलिंग संघ, डी डी बोरो अध्यक्ष, फेंसिंग संघ, जे एस गहलौत अध्यक्ष, एमच्योर कबड्डी फेडरेशन, दिगंबर कामत अध्यक्ष, तैराकी संघ, भारत

24 May 2013

क्या पानी का निजीकरण सही है ?

देश में आज जिस प्रकार से पानी का निजीकरण किया जा रहा है उससे तो लगता है की अब ‘‘जल ही जीवन है‘‘ जैसे नारा अब सिर्फ किताब के पन्ने में दब कर रह जाएगा। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की ओर से जो बयान कुछ दिन पहले जारी किया गया है वो बेहद ही चैंकाने वाली है। केन्द्र सरकार पानी के निजीकरण करने पर विचार कर रही है। राष्ट्रीय जल नीति बहुत ही जल्द जारी की जाने वाली है। जल संसाधन मंत्रालय के मुताबिक जल नीति का मसौदा कई माह पहले तैयार कर लिया गया है, मगर विरोध के चलते अब तक सरकार कदम आगे नहीं बढ़ा पा रही है। इस बारे में लगातार विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से चर्चा भी हो रही है। इसे देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी के रूप देखा जा रहा है। यहा सवाल खड़ा होता है की पानी हमारा होगा, सप्लाई प्रणाली एवं उपकरण भी हमारे होंगे और उसकी पंपिंग कर देसी या विदेशी कंपनियां देश से भारी भरकम मुनाफा कमाकर अपने खजाने भरेंगी। अगर यह योजना सफल हो जाती है तो इसके बाद देष में विदेशी कंपनियों से 30 साल तक समझौता किया जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी संस्थानों के हाथ में पेयजल आपूर्ति का कार्य पूरी तरह आ गया तो फिर जल शुल्क तीन गुने हो जाएंगे।

हमारे देश में सबसे जयादा मीठे जल का भंडार है मगर अब इस निजीकारण के बाद जिसके पास पैसा नहीं होगा वो अब देष में प्यासे रहेगा। पिछले कई वर्षो से कॉरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इस मीठे जल पर लगी हुई है। वे जानते हैं कि इसकी मार्केटिंग में कमाई की अपार संभावना है। उनकी नजर में यह नीला सोना है और आने वाले दिनों में इसका महत्व जमीन के नीचे से निकलने वाले कच्चे तेल से भी ज्यादा होगा। इसलिए 70 के दशक से शुरू हुए इस प्रयास में पहले जल वितरण की टेक्नोलॉजी से कमाई की गई, और अब निजीकरण करके एक बार फिर मुनाफे की रकम वसुलने के लिए सरकार ये प्रयास कर रही है। पानी जीवन के लिए आवश्यक है, पानी को हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है मगर अब वह बाजार का माल होगा। उसे खरीदने और बेचने का मतलब है, जिसके पास खरीदने की ताकत नहीं है, उसका पानी से वंचित होना। क्या किसी सरकार या व्यवस्था को ऐसा करने का अधिकार है? क्या सरकारें हवा और पानी जैसे नैसर्गिक संसाधनों का स्वामित्व किसी को सौंपने का अधिकार रखती हैं? 

क्या ऐसे प्राकृतिक संसाधनों पर हर प्राणी का बुनियादी हक नहीं है? ये तमाम एैसे सवाल है जिसका जवाब सरकार के पास नहीं है। अगर एक गरीब परिवार की आय तीन हजार रुपये मासिक हो तो वह एक हजार या 900 रुपये तक पानी का बिल कहां से भरेगा और फिर बिल देने के बाद उनके पास क्या बचेगा। ये बेहद गंभिर सावाल है जो भारत जैसे देश के लिए सवालिया निषान खड़े कर रहे है। दुनिया में पानी का निजीकरण कोई नई बात नहीं है। सन् 1999 में लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया में पानी का निजीकरण किया गया था। ठेकेदार कंपनी एगुअम डेल तुनारी ने अनुबंध के बाद न सिर्फ तीन गुना दाम बढ़ए बल्कि उसने कुओं और टयूबवेलों पर भी कब्जा कर उन पर मीटर लगा दिए थे। पानी की दर वृध्दि से उत्पन्न जनाक्रोश ने वहां गृहयुध्द की स्थिति निर्मित कर दी थी। 

अब लगता है की हमारे देश में पानी का निजीकरण के बाद इसी प्रकार की स्थिती उत्पन्न होने वाली है। समाज में आज कई एैसे समाजिक कार्यकर्ता है जिनका कहना है की पानी प्रकृति की देन है और उस पर किसी का स्वामित्व नहीं है, मगर सरकार को अपने मुनाफा के आगे ये सारी बातों का कोई तर्क समझ में नहीं आ रही है। पानी व्यक्ति के जीने का आधार है, इसलिए संविधान भी पानी की कीमत वसूलने की इजाजत नहीं देता। संविधान की धारा-21 व्यक्ति को जीने का अधिकार देती है जिसमें ऐसी वस्तु जिससे व्यक्ति का जीवन जा सकता है उसका निजीकरण संविधान का उल्लंघन है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पानी का निजीकरण सही है ?

21 May 2013

क्या मनमोहन सिंह चीनी पी एम के आगे घुटने टेक दिए है ?

क्या अर्थशास्त्री ली कचिंयांग ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को ताड़ लिया है। क्या मनमोहन के बाजारवाद में अब चीनी सामानों की खुली घुसपैठ होगी। क्या उत्पादन समझौते से चीन भारत की खेती पर भी कब्जा करेगा। क्या चीन पड़ोसियो के जरीये भारत को सरहद पर घेरेगा। क्या चीन की नयी विदेश नीति भारत की आत्मनिर्भरता खत्म करने की है। यह सारे सवाल इसलिये क्योंकि जिस तरह चीन के साथ मीट, मछली, पानी, उत्पाद, इन्फ्रास्ट्रकचर और आपसी संवाद या रिश्तों को लेकर समझौते हुये, उसने कई सवाल समझौते के तौर तरीको को लेकर ही खड़े कर दिये हैं। मसलन चीनी सैनिकों ने लद्दाख में खुल्लम-खुल्ला घुसपैठ की। 22 किलोमीटर तक घुस आये। 

टैंट अभी भी भारत की सीमा के भीतर लगे हुये हैं। लेकिन चीन के प्रधानमंत्री के साथ खडे हुये तो मनमोहन सिंह घुसपैठ शब्द तक नहीं कह पाए। बोले घटना हुई। समझौते को लेकर कहा गया कि बॉर्डर मेकैनिज्म को और कारगर बनाया जाएगा। लेकिन कैसे, ना विस्तार से चर्चा हुई और ना ही कुछ बताया गया। और तो और चीन ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव की जानकारी साझा करेगा यानी भारत में बाढ़ आने से पहले चीन बता देगा कि क्या होने वाला है, लेकिन मनमोहन सिंह यह भी पूछ नहीं पाये कि नदी पर जो डैम बनाए गए हैं, उस पर तो कोई जानकारी दीजिये ।

फिर आर्थिक-व्यापारिक समझौतों ने बता दिया कि जो कारोबार अभी 66 अरब डॉलर का है वह समझौतों के बाद बढ़कर 100 अरब डालर हो जायेगा। यानी अभी चीन की कमाई भारत के साथ तमाम व्यापारिक रिश्तों के 80 फिसदी लाभ की है, वह समझौते के बाद 90 फिसदी तक पहुंच जायेगी । तो फिर मनमोहन सिंह कर क्या रहे थे। जबकि इसी दौर में समझना यह भी चाहिये कि चीन भारत को चौतरफा घेर रहा है। पाकिस्तान के पीओके और अक्साई चीन ही नहीं बल्कि ग्वादर बंदरगाह उसके रणनीतिक कब्जे में हैं। श्रीलंका के हम्बटोटा बंदरगाह पर उसी का कब्जा है। बांग्लादेश की सेना में जल, थल वायु तीनो के लिये चीनी हथियार, टैंक, जहाज सभी चीनी ही हैं। 

जबकि यह वही चीन है जो बांग्लादेश को मान्यता देने के लिये 1971 में तैयार नहीं था। यही हाल म्यांमार का है। वहां भी चीन ने भारी निवेश किया है। नेपाल के साथ तो हर स्तर पर अब चीन जा खड़ा हुआ है । यानी भारत की चौतरफा घेराबंदी चीन के प्रधानमंत्री ली कचिंयाग ने शुरु की है। यह अलग बात है ली कचिंयाग ने राजनीति 1962 के बाद शुरु की। लेकिन जो रणनीति चीन बिछा रहा है उस बिसात को चीनी प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा से ही समझना चाहिये कि दिल्ली से मुंबई होते हुये वह पाकिस्तान ही जायेंगे, तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या मनमोहन सिंह चीनी प्रधान मंत्री के आगे घुटने टेक दिए है ?

क्या जनता के लिए “भ्रष्टाचार” चुनावी मुद्दा नहीं है ?

हाल ही में हुए एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे के नतीजों पर गौर करें तो यदि आज चुनाव हो जाए तो यूपीए सरकार फिर से सरकार नहीं बना पाएगी। दिल्लीए उत्तर प्रदेशए महाराष्ट्रए बिहार समेत 21 राज्यों में हुए इस सर्वे के नतीजे ना सिर्फ कांग्रेस के विरोध में जा रहे हैं बल्कि भारी मतों से कांग्रेस की हार भी सुनिश्चित प्रतीत हो रही है। लेकिन वहीं अगर हम 2012.13 के बीच हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे देखें तो एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे के उलट ही हमें हर जगह कांग्रेस की जीत ही नजर आई है। जिसके बाद यह एक बहस का विषय बन गया है कि क्या एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को आधार मानकर आगामी लोकसभा चुनावों में बड़े बदलावों की अपेक्षा की जा सकती है या फिर कांग्रेस की जीत के हालिया उदाहरण ही मिशन 2014 की तस्वीर पेश करने के लिए काफी हैं। बुद्धिजीवियों का वो वर्गए जो कांग्रेस की हार को मात्र एक भ्रम कह रहा हैए उसका कहना है कि भले ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के बड़े.बड़े आरोपों से जूझ रही हो लेकिन जनता इस बात को समझती है कि कोई भी सरकार या राजनीतिक दल दूध का धुला नहीं है।
 
 सत्ता में आने के बाद हर कोई ताकत और पैसे के नशे में चूर हो जाता है। लेकिन जनता यह समझती है कि जिस तरह कांग्रेस ने देश की कमान संभाली हैए वह कोई अन्य दल कर ही नहीं सकता क्योंकि अंदरूनी कलहों और मतभेदों की वजह से कोई भी जनता के हित में काम नहीं कर पाएगाए जिसके परिणामस्वरूप जो हालात आज है उससे भी कहीं ज्यादा बदतर हालातों का सामना करना पड़ सकता है। कर्नाटकए हिमाचल प्रदेशए उत्तराखंड आदि राज्यों में कांग्रेस को मिली जीत यही जाहिर करती है कि जनता के बीच कांग्रेस का करिश्मा अभी भी बरकरार है और उसे कोई टक्कर नहीं दे सकता। जनता चाहे कुछ भी कह ले या सोच ले लेकिन बात जब वोट डालने की आती है तो वह उसे ही चुनती है जिसे वह सही समझती है।

लेकिन दूसरी ओर एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को आगामी लोकसभा चुनावों का परिणाम मानने वाला बुद्धिजीवी वर्ग कुछ और ही तर्क दे रहा है। इस वर्ग के अनुसार कर्नाटक चुनाव जिसमें कांग्रेस की जीत को उसकी लोकप्रियता करार दिया जा रहा है वह कांग्रेस की जीत नहीं बल्कि भाजपा की हार थी। येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होते ही यह स्पष्ट हो गया था कि वहां भाजपा जीत ही नहीं सकती। यहां तक कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी यह चुके हैं कि अगर कर्नाटक में भाजपा को जीत मिलती तो यह उनके लिए हैरानी का कारण बनता। नील्सन सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मात्र 5 सीटें ही हासिल होंगी जबकि पिछले लोकसभा चुनावों में इनकी संख्या 21 थी। 
 
महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस गठबंधन को पिछले साल 29 सीटें मिली थीं सर्वे के अनुसार उनकी संख्या घटकर मात्र 16 रह जाएगी। पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली के सभी सातों निर्वाचन क्षेत्र में जीत सुनिश्चित करने वाली कांग्रेस को इस बार 5 जगहों पर हार मिलने की पूरी संभावना हैए वहीं दूसरी ओर बिहार में भी कांग़्रेस के लिए कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही है। एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे देश के 21 राज्यों में किए गए और सभी ओर से नतीजे कांग्रेस के विरोध में ही जाते नजर आ रहे हैं। एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को प्रमाण मानने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि श्जनता कांग्रेस के सभी हथकंडों को अच्छी तरह समझती है इसीलिए वह अब दोबारा उस पर विश्वास करने का जोखिम नहीं उठा सकती। यह नतीजे भी उसी जनता की प्राथमिकताओं पर आधारित हैं जिसके वोट से राजनीतिक दलों की किस्मत तय होती है और अब जब इन्हीं नतीजों में जनता का रुख साफ दिखाई दे रहा है तो कैसे यूपीए सरकार के जीत की बात की जा सकती है।

19 May 2013

कौमार्य परीक्षण, यहां पीडि़ता पर उठती है उंगली !

देश की राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म पीडि़ताओं को मुआवजा नहीं मिल पाने पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए इस संबंध में समुचित कदम उठाने के लिए दिशा.निर्देश जारी किया है। पिछले दिनों रोहिणी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के सामने आए एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई। इस बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय की तरफ से भी ऐसे लोगों की सहायता के लिए क्षतिपूर्ति योजना लागू करने के संबंध में अदालती आदेश राज्य सरकार को पहले दिया जा चुका है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने तत्काल यह आदेश दिया कि पीडि़ता के परिवार को एक लाख रुपया अंतरिम मुआवजे के तौर पर दिया जाए। इसके अलावा अदालत ने दिल्ली सरकार की उदासीनता पर तीखे प्रहार किए और कहा कि महिला व बाल विकास विभाग को ऐसे जरूरतमंद लोगों की हर तरह से मदद के लिए आगे आने की जरूरत है। वैसे मामला तब चर्चा में आया जब न्यायालय के सामने एक महिला ने यह अर्जी लगाई कि वह अपनी बेटी के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले को आगे नहीं लड़ना चाहती। यह जानते हुए भी कि अपराधी के खिलाफ पक्के सबूत थेए कुछ समय के लिए समूची अदालत में सन्नाटा छा गया। न्यायाधीश महोदय द्वारा इसकी वजह पूछे जाने पर कि वह मां ऐसा क्यों सोचती है तब उसने अपनी आपबीती जो कहानी सुनाई उसे सुनकर वहां एकत्रित सभी लोगों का दिल पसीज गया।

गौरतलब है कि पांच साल पहले विकासपुरी के किसी विक्की सेन ने उस महिला की 14 साल की लड़की के साथ दुष्कर्म किया और उसके बाद से ही परिवार पर कहर बरपाना शुरू हो गया। जांच प्रक्रिया से आजिज आकर लड़की ने बताया कि पुलिस वाले उस प्रसंग को बार.बार उससे पूछते थे और उसे इस बात के लिए टोकते थे कि उस वक्त ही वह बाहर क्यों निकली थीघ् एसिड पीकर आत्महत्या की कोशिश करने के बाद उसे कृत्रिम आहार नली लगाई गई। पीडि़ता आज भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है और वह ठीक से बोल भी नहीं पाती है। इस घटनाक्रम से क्षुब्ध मगर बेबस पिता को दो बार दिल का दौरा पड़ा। परिवार की माली हालत इस कदर खराब हो गई कि मकान तक बेचना पड़ा तथा इन दिनों महिला दूसरों के घरों में नौकरानी का काम कर परिवार का भरण.पोषण कर रही है। निश्चित ही दुष्कर्म पीडि़तों के साथ ऐसे असंवेदनशील व्यवहार का यह कोई पहला किस्सा नहीं है। कुछ समय पहले ही खबर आई थी कि किस तरह यौन अत्याचार पीडि़तों के लिए अनिवार्य घोषित की गई डीएनए जांच को भी अंजाम नहीं दिया जा रहा है।

राजधानी दिल्ली के आंकड़े थे कि पीडि़तों में से बहुत कम लोगों की डीएनए जांच कराई गई। दुष्कर्म पीडि़तों की जांच में बरती जा रही लापरवाही और इस दौरान प्रकट होते पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह के मसले अक्सर बहस का मुद्दा बनते हैं लेकिन स्थिति में बदलाव लाने की बजाय इसे एक सामान्य घटना मान लिया जाता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बलात्कार एक मात्र ऐसा अपराध हैए जहां पीडि़त को ही आमतौर पर कठघरे में खड़ा किया जाता है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते वह भी मामले में रुचि खो देता है। ऐसे मामलों में त्वरित अदालतें कायम करने की बात भी अभी नीतिगत स्तर पर मंजूर नहीं की जा सकी है। पिछले ही साल ह्यूमन राइट्स वॉच नामक संगठन द्वारा तैयार रिपोर्ट डिग्निटी ऑन ट्रायल जो यौन अत्याचार पीडि़तों के परीक्षण में संतुलित पैमाने बनाने की जरूरत पर केंद्रित है प्रकाशित हुई। यौन अत्याचार अन्वेषण के तरीकों में मौजूद मध्ययुगीन पैमानों को उजागर करती रिपोर्ट ने इस विचलित करने वाले तथ्य को पेश किया कि किस तरह आज भी अदालती फैसलों या उसकी पूर्वपीठिका बनती अदालती कार्रवाइयों में पीडि़ता के चाल.चलन या उसके यौनिक अनुभव का मसला परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उठता रहता है। तीस साल पहले इस संदर्भ में लंबे संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जरूरी दिशा.निर्देश दिए थे। इतना ही नहीं पीडि़ता की मेडिकल जांच के नाम पर आज भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी हैए जिसके तहत डॉक्टर पीडि़ता के यौनांग की जांच करके यह प्रमाणपत्र जारी करता है कि वह सहवास की आदी थी या नहीं और इस प्रमाणपत्र को बाद में मुकदमे के दौरान एक प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट जारी होने के पहले दिल्ली की अदालत के सामने उपस्थित एक मामले में यह मसला चर्चा में आया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ को साफ करना पड़ा था कि यौन हिंसा के मामलों की सुनवाई में इस किस्म का परीक्षण .जिसे पीवी परीक्षण कहा जाता है अप्रासंगिक है। एक महिला के साथ यौन अत्याचार के मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने यह बात कही थी और साथ ही साथ यह भी बताया कि इस आदेश की प्रतियां दिल्ली पुलिस आयुक्त को भेजी जानी चाहिए ताकि वह पुलिस अधिकारियों का ध्यान इस दिशा में खींच सके। अदालत का साफ मानना था कि पीडि़ता का फिंगर टेस्ट दरअसल उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। लगभग 27 साल पहले दुष्कर्म कानूनों में संशोधनों के लिए एक अहम कोशिश हुई थी। एक आदिवासी युवती मथुरा दुष्कर्म कांड में सुप्रीमकोर्ट ने तीस साल पहले एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया थाए जिसके बाद दुष्कर्म पीडि़ताओं के निजी इतिहास की बात करना अनुचित एवं गैर जरूरी माना गया।

1983 में सामने आए संशोधनों के बाद जब नया कानून बनाया गया तो उसमें ऐसे संवेदनशील पहलुओं के प्रति पर्याप्त सतर्कता बरती गई। इसके अलावा हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जिस तरह दुष्कर्म के बाद पीडि़ता के सामाजिक बहिष्कार की स्थिति बनती दिखती हैए उसे मद्देनजर रखते हुए ही सर्वोच्च न्यायालय ने पीडि़ता की पहचान को गोपनीय रखने पर जोर दिया था। यौन अत्याचार पीडि़तों की जांच में प्रयुक्त अपराध चिकित्सा ;फॉरेंसिक साइंसद्ध के तौर तरीकों की दयनीय एवं भयानक स्थिति की चर्चा करने वाली सेवाग्राम के मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर की बेहद चर्चित रिपोर्ट पीटिएबल एंड हारेंडस क्वॉलिटी ऑफ फोरेंसिक मेडिकल एक्जामिनेशन ऑफ सेक्सुअली असाल्टेड विक्टिम्स ने कुछ समय पहले इस संबंध में अहम सुझाव दिए थे। फोरेंसिक परीक्षण को बेहतर बनाने के लिए उसने नए नियमों की भी सिफारिश की थी। मालूम हो कि प्रोफेसर खांडेकर द्वारा तैयार सिफारिश पीडि़त महिलाओं के राय को अधिक तवज्जो देते हैं। वह इस संभावना को भी मद्देनजर रखते हैं कि किन्हीं दबाव में या प्रलोभन में आकर पीडि़त द्वारा अपने बयान से मुकर जाने की स्थिति में भी रिकॉर्ड में दर्ज अन्य सुबूत उत्पीड़क को दंडित करने में कामयाब हो सकें। बंबई उच्च न्यायालय के नागपुर पीठ के समक्ष प्रस्तुत इस रिपोर्ट के बाद अदालत की तरफ से महाराष्ट्र सरकार को बताया गया है कि वह इन नियमों को अस्पतालों एवं पुलिस थानों में भेजें और इस बारे में संपन्न कार्रवाइयों के बारे में अदालत को भी सूचित करे।

18 May 2013

क्या भारतीय व्यापारियों को खत्म किया जा रहा है ?

महाराष्ट्र के व्यापारी एक बार फिर से सड़को पर है, महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों द्वारा व्यापारियों पर लगाए जा रहे कर एलबीटी, को लेकर व्यापररियों में विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। लगता है एफडीआई के बाद अब सरकार एलबीटी कर लागू करके वहा के व्यापारियों को समाप्त करना चाहती है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई सहित महाराष्ट्र के अन्य शहरों में एलबीटी के विरोध में चल रही हड़ताल के कारण अब तक 75,000 करोड़ रुपयों के नुकसान हुआ है। ये नुकसान सिर्फ सरकारी राजस्व का ही नहीं हो रहा है, इसमे तमाम एैसे छोटे बड़े व्यपारियों का कमर टूट रहा है जो लगातार इसके बिरोध में पीछले कई दिनों से अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे है।


व्यापारियों के विरोध के बावजूद सरकार अभी तक झुकने को तैयार नहीं है। राज्य के दोनों सत्तारूढ़ दल कांग्रेस व राकांपा इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। अब तक राज्य के 19 नगरपालिका क्षेत्रों में एलबीटी लागू की जा चुकी है। मुंबई में इसे एक अक्टूबर से लागू किया जाना है। एक महानगर में पहले सरकार एफडीआई की अनुमति देती है और फिर उसके बाद अब एलबीटी जैसे कर लागू करके उनके रोजी रोटी को मारना चाहती है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या ये कर सरकार विदेशी व्यापारियों के दबाव में लागू कर रही है, जो हमेषा से ही छोटे भारतीयें व्यापारियों के लिए तरह तरह के साजि़ष करते रहते है। 

मुंबई सहित राज्य के कई हिस्सों में चल रहे बंद के कारण आम आदमी को जरूरी सामानों की किल्लत होने लगी है। लोकल बॉडी टैक्स का ये मामला दिनों दिन गहराता ही जा रहा है। एलबीटी को लेकर महाराष्ट्र सरकार और फेडरेशन ऑफ महाराष्ट्र के बीच जारी टकराव की स्थिति उतपन्न हो गई है। इस पुरे घटनाक्रम पर अब सियासत भी तेज हो गई है। बीजेपी-शिवसेना और एमएनएस के बाद अब एनसीपी भी व्यापारियों के समर्थन में उतर आई है।

महाराष्ट्र में सबसे अधिक आक्ट्राई है और यहां हर चीज पर सबसे अधिक टैक्स देना पड़ता है। अगर अभी एलबीटी पूरी तरह से लागू की जाती है तो इससे हर जिस अन्य शहरों के मुकाबले जयादा दाम पर मिलेगी। अगर आप एक कार खरीदते हैं, और ये कार दिल्ली मे यदि पांच लाख में मिलेगी तो वही कार आपको मुम्बई में पांच लाख पचपन हजार में मिलेगी। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर एक देश में इतना अन्तर क्यों ? यह व्यवस्था व्यापारीयों पर सरकार जबरन थोपना चाहती है, ताकी विदेशी व्यापारियों को लूट की खुली छूट दी जा सके और वालमार्ट जैसे विदेशी व्यापारी आसानी से अपना पांव पसार सके। 

हर व्यापार मे कभी न बिकनेवाला भी माल होता है जिसे डेड स्टॉक के नाम से जाना जाता है, एल बी टी जैसे कर मे इसका कोई व्यवस्था नहीं किया गया है, इससे व्यापारियों को कर के नाम पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार की ओर से सेट ऑफ का कोई जिक्र नहीं है जिससे जितना माल बिके केवल उसी के उपर टैक्स भरा जाए। इसको लेकर व्यापारियों में काफी जयादा आक्रोष का माहौल बना हुआ है , और सरकार हाथ पर हाथ धरे चुप चाप तमाशा देख रही है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या वालमार्ट और एफडीआई के लिए भारतीय व्यापारियों को खत्म किया जा रहा है?

17 May 2013

क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

क्या आईपीएल को बंद कर दिया जाना चाहिए? स्पॉट फिक्सिंग में तीन खिलाडि़यों की गिरफ्तारी के बाद ये मांग फिर उठने लगी है। अपने खेल से देश के एक अरब लोगों का मनोरंजन करने वाले क्रिकेटर अगर इस तरह मुंह काला कर घूमें तो समझना मुश्किल नहीं कि संकट कितना बड़ा है। क्रिकेट का ये खेल माफिया डॉन से लेकर सत्ता की गलियारों तक गूंज रही है, आज यही कारण है की कोई भी दल या राजनेता इसे रोकने की जहमत नहीं उठा पा रहा है। खिलाडि़यों के साथ सट्टेबाजों की सांठ गांठ का गठजोड इस खेल के अंदर होने वाली खेल को उजागर कर दिया है। क्रिकेट के नाम पर पनपता हुआ ये कारोबार इतना प्रभावी होता जा रहा है और इसका मुनाफा इतना बडा है कि अब इसे रोक टोक पाना उसी तरह असंभव है जैसे कि देश में शराब के बढते फलते फूलते कारोबार को रोक पाना। जब भी ऐसी कोशिश की जाती है तो एक दलील दी जाती है कि करों के रूप में इससे भारत सरकार को बहुत बड़ी आय होती है। मगर ये दलील देने वाले हर बार क्यों भूल जाले है की राजस्व से भी एक बड़ा हिस्सा दफ्तरों में काम करने वालों लोगों को भी ये खेल कितना जयादा प्रभावित करता है, जो इसे देखने में समय को बर्बाद करते है।  

वैसे आईपीएल के साथ विवादों का सुरू से ही चोलि दामन का नाता रहा है। इससे पहले के संस्करण में भी अनेक विवाद आईपीएल की झोली में आए, जिसमें खिलाडियों द्वारा स्टेडियम में नशीले पदार्थ का उपयोग करने से लेकर चियर्स गर्ल का असलील नांच और मैच के बाद होने वाली रेव पार्टी काफी जयादा सुर्खीयों में रहा है। इन सब के अलावे आईपीएल में पैसों की अनियमितताएं भी एक बड़ा विवाद का कारण हमेषा से रहा है, इसी विवाद के कारण आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी को हटाया गया। आईपीएल के पांचवें संस्करण में एक टीवी चैनल ने स्टिंग आपरेशन में कुछ आईपीएल खिलाडि़यों को स्पॉट फिक्सिंग करते हुए दिखाया। इस खबर ने क्रिकेट जगत को एक बार फिर शर्मसार किया। इस घटना के बाद एक और विवाद सामने आया जिसमे मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक मैच के बाद कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान ने सुरक्षाकर्मियों और स्टेडियम प्रबंधक से हाथापाई तथा गालीगलौज भी की। एैसे में ये सभी घटनाए इस बात को और प्रबल बना देती है की क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए? रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर की तरफ से खेलने वाले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ल्यूक पॉमबाश पर भी आरोप लगा कि उन्होंने दिल्ली के एक होटल में अमरीकी महिला जोहल हमीद को छेड़ा और उनके मंगेतर के साथ मारपीट भी की। विवादों का दौर यहीं समाप्त नहीं हुआ ये कारवा और आगे बढ़ता गया। 

मुंबई पुलिस ने ऑकवुड होटल में एक छापे के दौरान पुणे वॉरियर्स के दो खिलाडियों को पकड़ा जहा पर रेव पार्टी का आयोजन किया गया। इस पार्टी में नशीले पदार्थ और शराब बरामद किया गया। इन सब से इतर आईपीएल विवादों का साया संसद में भी गूंजा जहां पर 60 सांसदों ने एक सुर में कहा कि आईपीएल बंद किया जाए, सरकार ने उचित कदम उठाने के लिए आष्वसान दिया मगर ये खेल बदस्तूर जारी है। अंत में अपनी सनसनीखेज और आपत्तिजनक तस्वीरों से सोशल मीडिया में तहलका मचाने वाली पूनम पांडे ने कोलकाता नाइट राइडर्स की जीत के बाद ट्विटर पर अपनी निर्वस्त्र तस्वीर जारी करके विवादों की सूची को और गहरा कर दिया। आज आईपीएल में विवादों की सूची लगातार बढ़ती जा रही है, एैसे में  इसके अस्तित्व को लेकर कई सारे सवाल खड़े हो रहे है। अब आईपीएल में खिलाडि़यों को पैसे के साथ साथ लडि़कियां भी परोसी जा रही है। आईपीएल खेल कम मनोरंजन अधिक हो गया है जहा पर आज पैसों के साथ हंसीनाओं का संगम और जमघट लग रहा है। इन तमाम विवादों को खंगालने के बाद सवाल खड़ा होता है की क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए?