27 December 2024

पूर्व पीएम डॉ. मनमोहन सिंह का दिल्ली के एम्स में 92 साल की उम्र में निधन, आर्थिक सुधारों से देश को इस संकट से उबारा, परमाणु समझौते के लिए दांव पर लगा दी थी सरकार, आर्थिक सुधारों के शिल्पकार थे डॉ. मनमोहन सिंह

देश के जाने माने अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का निधन हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने उनके आवास पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। साथ ही केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में पूर्व पीएम को श्रद्धांजलि दी गई और शोक प्रस्ताव पारित किया गया। मनमोहन सिंह लंबे समय से बीमार थे। घर पर बेहोश होने के बाद उन्हें रात 8:06 बजे दिल्ली AIIMS लाया गया था। रात 9:51 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। मनमोहन सिंह 2004 में देश के 14वें प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने मई 2014 तक इस पद पर दो कार्यकाल पूरे किए थे। वे देश के पहले सिख और सबसे लंबे समय तक रहने वाले चौथे प्रधानमंत्री थे।

 

डॉ. मनमोहन सिंह का जीवन परिचय

 

डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब के गाह में हुआ था

 

पिता का नाम गुरुमुख सिंह और मां का नाम अमृत कौर था

 

डॉ. मनमोहन सिंह के परिवार में पत्नी गुरशरण कौर और तीन बेटियां हैं

 

देश के विभाजन के बाद उनका परिवार भारत चला आया

 

पंजाब विश्वविद्यालय से ग्रेजुऐशन और PG पूरा किए

 

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी और ऑक्सफोर्ड से डी.फिल भी की

 

पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर रहे

 

1966-1969 के दौरान संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के लिए आर्थिक मामलों के अधिकारी चुने गए

 

1971 में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर कार्य किया

 

1972 में वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया

 

1982 से 1985 तक RBI के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और UGC के अध्यक्ष भी रहे

 

1991 से 1996 तक प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे

 

2004 से लेकर 2014 तक 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे

 

डॉ. मनमोहन सिंह न केवल भारत के प्रधानमंत्री रहे, बल्कि वित्त मंत्री के रूप में भी काम किया। उनके नाम पर कई उपलब्धियां हैं। जब देश 90 के दशक में बड़े आर्थिक संकट में था, तब वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने ऐसे बड़े फैसले लिए, जिसके चलते देश की पूरी अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल दी। आर्थिक उदारीकरण में उनका विशेष योगदान रहा। ग्राफिक्स के जरिए आपको बताते हैं मनमोहन सिंह के कुछ बड़े फैसले जिनके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

 

मनमोहन सिंह के बड़े फैसले

 

डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्त मंत्री रहते हुए ऐसी नीतियां बनाईं, जो देश की इकोनॉमी के लिए मील का पत्थर साबित हुईं

 

इन नीतियों ने लाइसेंस राज को खत्म कर दिया, अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोल दिया

 

ग्लोबलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन और उदारीकरण के एक ऐसे युग की शुरुआत की, जिसने देश की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया

 

जुलाई 1991 में वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने भारत के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना किया था और अपनी सूझ-बूझ से इससे देश को निकाला था

 

1991 ऐसा समय था जब विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो गया था, देश में महंगाई दर कंट्रोल से बाहर हो गई थी

हालात यहां तक खराब हो गए थे कि देश दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गया था

 

उस समय केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी और आर्थिक संकट के बीच भारतीय करेंसी रुपया क्रैश हो चुका था

 

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ये 18% तक लुढ़क गया था, खाड़ी युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमत आसमान पर पहुंच गई थी

 

ये ऐसा समय था जबकि भारत के पास महज 6 अरब डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व बचा था

 

राजकोषीय घाटा करीब 8 फीसदी और चालू खाता घाटा 2.5 फीसदी पर पहुंच गया था

 

ऐसे हालातों में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई 1991 में आर्थिक उदारीकरण के लिए बड़े ऐलान किए

 

RBI द्वारा बैंक ऑफ इंग्लैंड समेत अन्य संस्थानों के पास भारतीय सोना गिरवी रखने का फैसला किया गया और लगभग 60 करोड़ डॉलर की रकम जुटाई गई

 

साल 2004 में जब कांग्रेस की अगुवाई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने चुनाव जीता तो माना जा रहा था कि सोनिया गांधी ही प्रधानमंत्री बनेंगी। एक तरफ कांग्रेस पार्टी पूरा जोर लगा रही थी कि सोनिया गांधी पीएम पद स्वीकार करें जबकि विपक्ष उनके विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर विरोध कर रहा था। इस उधेड़बुन के बीच पूर्व वित्त मंत्री और प्रगाढ़ अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का ऐलान किया गया।

 

बड़े फैसलों ने बदल दी भारत की तस्वीर

 

जुलाई 1991-  अर्थव्यवस्था में उदारीकरण, औद्योगिक लाइसेंसिंग खत्म

जून 2005-  सूचना का अधिकार

सितंबर 2005-  रोजगार गारंटी योजना

मार्च 2006- अमेरिका से न्यूक्लियर डील

जनवरी 2009-  आधार स्कीम

अप्रैल 2010-  शिक्षा का अधिकार

 

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है भारत-अमेरिका परमाणु समझौता पर हस्ताक्षर करना। भारत और अमेरिका के बीच इस समझौते की रूपरेखा मनमोहन सिंह और संयुक्त राज्य अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वारा एक संयुक्त बयान में बनाई गई थी। समझौते के तहत, भारत अपनी नागरिक और सैन्य परमाणु सुविधाओं को अलग करने के लिए सहमत हुआ और सभी नागरिक परमाणु सुविधाओं को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अधीन रखा जाएगा। इस समझौते पर 18 जुलाई 2005 को हस्ताक्षर किए गए थे।

 

भारत-अमेरिका परमाणु समझौता दांव पर सरकार

 

भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को याद रखा जाएगा

 

इस समझौते के लिए उन्होंने अपनी सरकार दांव पर लगा दी थी, लेकिन अपने फैसले पर अटल रहे

 

2008 में अमेरिका के साथ हुआ भारत का ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौते से मनमोहन की दृढ़ता को पूरी दुनिया ने देखा था

 

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन इस ऐतिहासिक समझौते के भविष्य के परिणामों के बारे में इतने आश्वस्त थे

 

संसद में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अपनी सरकार का अस्तित्व दांव पर लगा दिया

 

असैन्य परमाणु समझौते ने अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते को रणनीतिक साझेदारी में बदलने का मार्ग प्रशस्त किया

 

तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की मदद से डॉ. मनमोहन सिंह कुछ दलों को मनाने में सफल रहे

 

वामपंथी दलों ने इस डील का पुरजोर विरोध किया और सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया

 

समाजवादी पार्टी ने पहले वाम मोर्चे का समर्थन किया था, लेकिन बाद में उसने अपना रुख बदल लिया

 

अविश्वास प्रस्ताव में डॉ. मनमोहन सिंह अपनी सरकार बचाने में भी सफल रहे

 

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अपने जीवन में एक सफल अर्थशास्त्री, पॉलिसी मेकर और एक राजनेता के तौर पर पहचान बनाने में कामयाब रहे तो वे भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप बदलने वाले महानायक भी रहे। एक ऐसे महानायक जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है। उन्हें देश उन्हें कई तरह से याद रखेगा। वह अर्थशास्त्री थे इसीलिए शायद नेताओं की तरह भाषण कला उन्हें नहीं आती थी लेकिन कई बार संसद में उन्होंने अपने शायराना अंदाज से भाजपा नेताओं को मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया था। आज भी लोग वो किस्सा याद करते हैं, जब संसद में भाजपा की दिग्गज नेता सुषमा स्वराज और उनके बीच शेरो-शायरी हुई थी। दोनों नेताओं ने शेरो-शायरी के जरिए एक-दूसरे को जवाब दिया था। किस्सा 23 मार्च, 2011 का है। लोकसभा में वोट के बदले नोट विषय पर विषय पर चर्चा हो रही थी और मनमोहन सिंह विपक्ष पर सवालों पर जबाव दे रहे थे। इस दौरान नेता विपक्ष सुषमा ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा था- ''तू इधर उधर की न बात कर, ये बता के कारवां क्यों लुटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।'' इसके जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा था- ''माना के तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं, तू मेरा शौक तो देख मेरा इंतजार तो देख।'' सुषमा स्वराज की तरफ कैमरे ने फोकस किया तो भाजपा नेता सीट पर बैठीं मुस्कुरा रही थीं। मनमोहन सिंह के इस जवाब पर सत्ता पक्ष ने काफी देर तक मेज थपथपाई थी, वहीं विपक्ष खामोश बैठा रहा था।

 

ऐसा ही एक दूसरा किस्सा 27 अगस्त, 2012 का है जब संसद का सत्र चल रहा था। मनमोहन सरकार पर कोयला ब्लॉक आवंटन में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। तब मनमोहन सिंह ने कहा कि कोयला ब्लाक आवंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट में अनियमितताओं के जो आरोप लगाए गए हैं वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और सरासर बेबुनियाद हैं। उन्होंने लोकसभा में बयान देने के बाद संसद भवन के बाहर मीडिया में भी बयान दिया। उन्होंने उनकी 'खामोशी' पर ताना कहने वालों को जवाब देते हुए शेर पढ़ा, ''हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी।''

 

2013 में भी लोकसभा में एक बार शायराना सीन देखने को मिला जब मनमोहन ने कहा, 'हमें उनसे वफा की उम्मीद, जो नहीं जानते वफा क्या है।' जवाब में भाजपा की तरफ से एक बार फिर सुषमा स्वराज ने मोर्चा संभाला और कहा कि पीएम ने बीजेपी को मुखातिब होकर एक शेर पढ़ा है। शायरी का एक अदब होता है। शेर का कभी उधार नहीं रखा जाता। मैं प्रधानमंत्री का ये उधार चुकता करना चाहती हूं। आज डॉ. मनमोहन सिंह भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, मगर उन्हें  भारत के आर्थिक सुधारों के वास्तुकार के रूप में देश हमेशा याद रखेगा।


23 December 2024

दिल्ली में चुनाव से पहले योजनाओं की सौगात, दिल्ली में आज से ‘महिला सम्मान’ रजिस्ट्रेशन, दिल्ली में ‘संजीवनी योजना’ का पंजीकरण शुरू, बीजेपी का आरोप '10 साल दिल्ली बेहाल’ AAP के खिलाफ BJP ने जारी किया 'आरोप पत्र'

राजधानी दिल्ली में भले ही सर्दी से लोगों का हाल बेहाल है, मगर दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में सियासी पारा गर्म नजर आ रहा है। अगले साल होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। आम आदमी पार्टी ने भी कई बड़े ऐलान किए हैं। आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की है कि दिल्ली सरकार की 'महिला सम्मान योजना' के तहत महिलाओं को खाते में हर महिने 2100 रूपए दिल्ली सरकार की ओर से डाले जाएंगे। इसको लेकर सोमवार से रजिस्ट्रेशन चालू शुरू हो गया है।

 

क्या है महिला सम्मान योजना ?

 

2024-25 के बजट में दिल्ली सरकार ने 'मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना' की घोषणा की थी

 

जिसके तहत 18 वर्ष से ऊपर की सभी महिलाओं को 1,000 रुपये प्रति माह दिए जाएंगे

 

अगर आम आदमी पार्टी आगामी विधानसभा चुनावों में सत्ता में लौटती है, तो यह राशि बढ़ाकर 2,100 रुपये की जाएगी

 

'योजना का पंजीकरण सोमवार शुरू होगा चुका है, महिलाओं को कहीं जाने की जरूरत नहीं है

 

आप के कार्यकर्ता आपके घर आएंगे और पंजीकरण पूरा करेंगे

 

लाभार्थियों को अपनी वोटर आईडी दिखानी होगी, दिल्ली में सभी पात्र महिला मतदाताओं को इसका लाभ मिलेगा

 

केजरीवाल ने ये भी दावा किया कि इसी दिन से 'संजीवनी योजना' का भी रजिस्ट्रेशन शुरू हो रहा है। इसके तहत 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों को मुफ्त इलाज मिलेगा। संजीवनी योजना के तहत निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलेगा...इलाज की लागत की कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी।

 

क्या है संजीवनी योजना ?

 

 

संजीवनी योजना के लिए पंजीकरण भी सोमवार से शुरू होगा चुका है।

 

बुजुर्गों का पंजीकरण AAP के कार्यकर्ता उनके घरों पर करेंगे

 

इस योजना के तहत दिल्ली के 60 वर्ष से ऊपर के लोगों को मुफ्त इलाज मिल सकेगा

 

संजीवनी योजना के तहत निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलेगा

 

इलाज की लागत की कोई ऊपरी सीमा नहीं होगी

 

'संजीवनी योजना' का लाभ लगभग 10 से 15 लाख वरिष्ठ नागरिकों को मिलेगा

 

एक तरफ पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल महिला सम्मान योजना का फॉर्म भरवाने के लिए किदवई नगर विधानसभा क्षेत्र पहुंचे, तो दूसरी तरफ बीजेपी ने AAP के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने केजरीवाल और उनकी पार्टी के खिलाफ चालीस पन्नों का आरोपपत्र जारी किया है और इसमें गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप पत्र के कवर पेज पर लिखा है, "दिल्ली सरकार हुई कंगाल, AAP विधायक मालामाल और शीशमहल में केजरीवाल" बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर, दिल्ली बीजेपी प्रमुख वीरेंद्र सचदेवा और पार्टी के अन्य कई नेताओं ने अरविंद केजरीवाल सरकार के खिलाफ आरोप पत्र जारी किया।

 

दिल्ली बीजेपी प्रमुख वीरेंद्र सचदेवा ने भी आरोप लगाते हुए कहा कि, "आरोप पत्र हम दिल्ली सरकार के खिलाफ लाए हैं, लेकिन इसके जड़ में सिर्फ अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात किया है। 2015 में पहली सत्ता ग्रहण करने के बाद उन्होंने जो रंग दिखाने शुरू किए है, वो रंग दिल्ली आज तक देख रही है।" दिल्ली में बिजली के नाम पर लूट का व्यापार शुरू किया गया।

 

हम सबने कभी न कभी हरिवंश राय बच्चन को पढ़ा लेकिन मुझे लगता है केजरीवाल ने बहुत गहराई से पढ़ा है। इन्होंने 'मेल कराती मधुशाला' को 'जेल कराती मधुशाला' कविता के जरिए केजरीवाल पर कई गंभीर आरोप लगाया। सचदेवा ने कहा, "जब कोरोना के वक्त ऑक्सीजन की सप्लाई हो रही थी, तो उस वक्त दिल्ली सरकार शराब नीति बनाने में लगी थी कि कैसे दिल्ली की गलियों में शराब के ठेके खोले जाएं। अब जब काम बताने का वक्त आया तो, हर बार की तरह आप चुनावी वादे करते हैं और झूठ बोलते हैं।"

 

दिल्ली में जल्द विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और दिल्ली की गद्दी पर काबिज आम आदमी पार्टी फिर से दिल्ली में सरकार बनाने की कोशिश में लगी हुई है। हर बार की तरह इस बार भी अरविंद केजरीवाल के चेहरे पर विधानसभा चुनाव लड़ा जा रहा है। केजरीवाल साफ कर चुके हैं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के जीतने के बाद वही मुख्यमंत्री बनेंगे। हालांकि उनके इस मनसूबे को लेकर कांग्रेस ने निशाना साधा है। पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने कहा है कि दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी जीत भी जाती है, तब भी केजरीवाल मुख्यमंत्री नहीं बन सकते। दीक्षित ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के लायक ही नहीं हैं। उनकी मजबूरी है कि दिल्ली में आप के जीतने के बाद भी उन्हें किसी और को मुख्यमंत्री बनाना होगा।

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान तो अभी तक नहीं हुआ है, हालांकि इसके फरवरी में आयोजित होने की संभावना है। मगर आरोप- प्रत्यारोप का दौर अभी से ही शुरू है। अब देखना होगा कि इस बार दिल्ली की जनता किसे मुख्यमंत्री बनाती है।


21 December 2024

5 बार के CM ओपी चौटाला पंचतत्व में विलीन, अंतिम विदाई में समर्थकों ने बरसाए फूल, ओपी की अंतिम यात्रा में उमड़ी समर्थकों की भीड़, केंद्रीय मंत्री खट्‌टर, सीएम सैनी ने दी श्रद्धांजलि

 

हरियाणा के 5 बार के मुख्यमंत्री रहे ओपी चौटाला को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। उनकी पार्थिव शरीर को सिरसा के तेजा खेड़ा गांव स्थित फार्म हाउस में बनाए समाधि स्थल पर मुखाग्नि के बाद पंचतत्व में विलीन हो गए। चौटाला साहब की अंतिम विदाई में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्‌टर और सीएम नायब सैनी शामिल हुए।

 

इससे पहले दोपहर 2 बज तक उनकी पार्थिव देह को अंतिम दर्शन के लिए इसी फार्म हाउस में रखा गया। जहां उनका शरीर तिरंगे में लपेटा गया। उन्हें हरी पगड़ी और चश्मा पहनाया गया। अंतिम विदाई के मौके पर राजनीतिक तौर पर अलग उनके दोनों बेटे अजय चौटाला व अभय चौटाला और ओपी चौटाला के भाई रणजीत चौटाला भी एक साथ मौजूद रहे।

 

चौटाला का शुक्रवार को दोपहर 12 बजे दिल का दौरा पड़ने से गुरुग्राम में निधन हुआ था। वे 89 साल के थे। इसके बाद उनकी पार्थिव शरिर शुक्रवार रात ही सिरसा स्थित तेजा खेड़ा फार्म हाउस में लाई गई। पिता के निधन पर उनके छोटे बेटे अभय चौटाला ने सोशल मीडिया पर लिखा कि पिताजी का निधन सिर्फ हमारे परिवार की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की व्यक्तिगत क्षति है, जिनके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया। उनका संघर्ष, उनके आदर्श और उनके विचार हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।

 

ओपी चौटाला के निधन पर उनके दोस्त व पूर्व विधायक गणपत राय ने शोक जताया। गणपत राय ने ओपी चौटाला के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि चौटाला उनके दोस्त थे इसलिए वे उनको ओमी नाम से बुलाते थे। चौटाला के साथ पार्टी में रहकर भी काम किया, उनका काम बोलता था। सरल स्वभाव के चौटाला का हरियाणा के विकास में विशेष सहयोग रहा है।

 

ओमप्रकाश चौटाला हिंदी, पंजाबी, संस्कृत और उर्दू के ज्ञाता थे। अपने राजनीतिक सफर में सत्ता विरोध के चलते चौटाला कई बार जेल भी गए। आपातकाल के दौरान उन्होंने 19 महीने की जेल काटी थी। आज के साइबर सिटी गुरुग्राम को विकसित करने और इसके विकास का अमलीजामा पहनाने में चौटाला का सबसे बड़ा योगदान रहा है। हरियाणा में बड़े उद्योग भी चौटाला के मुख्यमंत्री रहते ही लगे थे, जिनमें मारूति सुजुकी और होंडा जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियों ने अपने उद्योग हरियाणा में लगाए थे। कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा ने ओपी चौटाला को श्रद्धांजली देते हुए कहा कि चौटाला साहब एक अनुशासित सिपाही थे। आखिरी समय तक वे लोगों के बीच ही रहना पसंद किया।

 

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भले ही थोड़े-थोड़े समय के लिए पांच बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन उन्होंने आठ साल तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व भी संभाला। चौटाला सिर्फ एक बार साल 2000 से 2005 तक पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री रहे हैं। इनेलो पार्टी का गठन करने में चौधरी ओमप्रकाश चौटाला का अहम योगदान रहा। कांग्रेस सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने अंतिम विदाई में शामिल होने के बाद कहा कि उनके जाने से एक युग का अंत हो गया और हरियाणा ने एक बेटा खो दिया।

 

ओमप्रकाश चौटाला संगठन के व्यक्ति थे और जानते-समझते थे कि संगठन में जो ताकत है, वह किसी में भी नहीं है। चौटाला की सरकार में वित्त मंत्री रह चुके कांग्रेस नेता प्रो. संपत सिंह एक किस्से का जिक्र करते हुए बताते हैं कि एक बार दिल्ली के हरियाणा भवन में देवीलाल काफी परेशान दिख रहे थे। देर रात तक उन्हें नींद नहीं आ रही थी। वे दिल्ली की राजनीति में जाना चाहते थे, लेकिन उनकी चिंता ये थी कि उनके बाद हरियाणा की कमान कौन संभालेगा। कहीं पार्टी और परिवार बिखर तो नहीं जाएगा। इसी बीच उनका दरवाजा खटखटाया। देवीलाल बोले कि आओ संपत, नींद नहीं आ रही है। मैंने पूछा कि क्या हुआ चौधरी साहब। देवीलाल ने जवाब दिया कि मैं दोराहे पर खड़ा हूं। उप प्रधानमंत्री बनूं या मुख्यमंत्री बना रहूं? समझ नहीं आ रहा। संपत सिंह ने कहा, इसमें सोचने वाली क्या बात है। आपको इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिल रही है, आप उप प्रधानमंत्री बनिए। तब देवीलाल ने पूछा कि यहां किसे कमान दूं। संपत सिंह ने जवाब दिया कि आप जो फैसला करेंगे, वह सब मानेंगे। तब देवीलाल ने कहा, ओम कैसा रहेगासंपत सिंह बोले कि ठीक रहेंगे जी। इसके बाद देवीलाल ने घंटी बजाई और पीए को बुलाकर कहा, वीपी सिंह से बात कराओ। तब रात के करीब 11 बज रहे थे। देवीलाल ने वीपी सिंह से कहा, मैं भी आपके साथ डिप्टी प्राइम मिनिस्टर की शपथ लूंगा और फोन काट दिया। अगले दिन दिल्ली में लोकदल के विधायकों की बैठक हुई। देवीलाल ने कहा कि ओम प्रकाश मेरी जगह लेगा और हरियाणा का मुख्यमंत्री बनेगा। और फिर चौटाला साहब हरियाणा के सीएम बन गए। ओम प्रकाश चौटाला से जुड़ी ऐसे अनेकों किस्से कहानियां हैं जिसकी चर्चा हरियाणा की राजनीति में लोग अक्सर किया करते हैं।

 

एक बार चौटाला साहब के एक ख़ास कार्यकर्ता ने अपने लड़के को विश्वविद्यालय में किसी पोस्ट के लिए सिफारिश करने के लिए कहा। तुरंत उन्होंने वीसी को फोन लगाने के लिए बोला। उधर से वीसी साहब का जबाब आया कि साहब लगा तो दूं, नॉर्म्स पूरे नहीं हैं। चौटाला साहब बोले "जब तू वीसी लाया मनै तो नोर्मस तो तेरे भी पूरे ना थे।" वे एक ऐसे नेता थे जिसने शायद ही कभी ऐसा कहा हो, 'मेरे कहने का ये मतलब नहीं था, मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।'

 

अधूरा रह गया ये राजनीतिक सपना 

 

ओमप्रकाश चौटाला राष्ट्रीय राजनीति में तीसरा मोर्चा बनाने चाहते थे

 

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और जिगरी दोस्तों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के साथ चौटाला ने क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने के लिए लंबी मुहिम चलाई

 

मगर ओमप्रकाश चौटाला का भाजपा और कांग्रेस की टक्कर में तीसरे मोर्चा खड़ा करने का सपना पूरा नहीं हो पाया

 

शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल जाने के बाद उन्होंने तीसरे मोर्चे की जिम्मेदारी अपने छोटे बेटे और इनेलो के प्रधान महासचिव अभय सिंह चौटाला को दी पर डाली

 

इनेलो के प्रधान महासचिव अभय सिंह चौटाला जो लगातार क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटे रहे

 

इस दौरान ओमप्रकाश चौटाला भी निरंतर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, सामाजिक न्याय के बड़े योद्धा शरद यादव और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती संपर्क में रहे

 

पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इनेलो ने बसपा के साथ मिलकर लड़ा, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर तीसरे मोर्चे की बात नहीं बन पाई

 

चौटाला चाहते थे कि तीसरे मोर्चे का नेतृत्व नीतीश कुमार करें, लेकिन वह पाला बदल गए

 

पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल ने लोकराज लोकलाज से चलता हैका जो मंत्र दिया था, उसे ओपी चौटाला ने बखूबी अपनाया। वह ओमप्रकाश चौटाला ही थे जिन्होंने मूल्य वर्धित कर (वैट) प्रणाली अपनाने की दिलेरी दिखाई। अपने पिता की तरह चौटाला ने कई ऐसे लोगों को राजनीति में मुकाम तक पहुंचाया, जिन्होंने कभी सपने में भी ऐसा नहीं सोचा था। ताऊ देवीलाल के बड़े बेटे ने अपने नाम के आगे चौटाला जोड़कर अपने गांव को राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई। चौधरी ओमप्रकाश परिवार के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने नाम के साथ गांव का नाम चौटाला जोड़ दिया। इसके बाद उनके छोटे भाई रणजीत सिंह से लेकर परिवार के सभी लोगों ने अपने नाम के साथ चौटाला लगाना शुरू कर दिया। इससे चौटाला गांव को राजनीतिक गलियारों में नई पहचान मिली।

 

मुख्यमंत्री के रूप में अपने पूरे कार्यकाल में चौटाला का सरकार आपके द्वारकार्यक्रम इनेलो सरकार की एक बड़ी पहल थी। मुख्यमंत्री ने हर गांव का दौरा किया, लोगों से उनकी जरूरतों के बारे में पूछा और उनकी मांगों पर अमल करते हुए मौके पर ही फैसले लिए।