27 February 2013

क्या रामसेतू तोड़ना सही है ?

हिन्दुओं कि आस्था का प्रतिक राम सेतू का मुद्दा एक बार फिर से गर्म है। भाजपा ने सरकार को आगाह किया है कि वह राम सेतु से छेड़छाड़ करने वाली सेतुसमुद्रम परियोजन पर आगे नहीं बढ़े, क्योंकि इससे करोड़ों हिन्दुओं की आस्था जुड़ी हुई है। वही सरकार इस पूरे परियोजना पर टस से मष होने को तैयार नहीं है। सेतुसमुद्रम जहाजरानी चैनल 30 मीटर चैड़ा, 12 मीटर गहरा और 167 किलोमीटर लंबा होगा। सरकार इस पुरे परियोनजा के लिए पहले ही 800 करोड़ रूपया खर्च कर चुकी है। प्रस्तावित रामसेतू परियोजना से सरकार हाथ पीछे खीचने के मूड में बिल्कुल नजर नहीं आ रही है। देश में आज के समय में हिन्दू एवं हिन्दुओं के सांस्कृतिक धरोहर से खिलवाड़ सरकार के लिए आम बात हो गई है। सरकार का तर्क है की इस परियोजना से जहाजों को राम सेतु के इस पार से उस पार जाने में आसानी होगी, और भारत आने वाली जहाजी बेड़ों को श्रीलंका होकर आना और जाना नहीं पड़ेगा। 2007 में भारत के कई हिंदूवादी संगठनों ने जब इसके खिलाफ प्रदर्शन किया तो सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना पर तत्काल रोक लगा दी। जब ये मुद्दा केंन्द्र सरकार लेकर आयी तो केंद्र के यु.पी.ए. सरकार को समर्थन दे रहे तत्कालीन तमिल नाडू के मुख्यमंत्री करूणानिधि भूख हड़ताल पर चले गये थे। मगर इस बार करूणानिधि सरकार के हां में हां मिला रहे है। राम सेतु को लेकर सरकार का मत अबतक स्पष्ट नही है कभी वो मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम को काल्पनिक बताती है, तो कभी कहती है कि भगवान राम ने लंका से लौटने के वक्त राम सेतु को नष्ट कर दिया था। मगर कालिदास ने रघुवंश के तेरहवें सर्ग में राम के आकाश मार्ग से लौटने का वर्णन किया है। इस सर्ग में राम द्वारा सीता को रामसेतु के बारे में बताने का वर्णन है। एैसे में सरकार का ये भी तर्क गलत साबित है कि राम ने लंका से लौटते हुए सेतु तोड़ दिया था।

यह वही रामसेतू है जो वर्ष 2004 में सुनामी लहरों से लड़ कर हमसब का रक्षक बना था। रामसेतु का चित्र नासा ने 14 दिसम्बर 1966 को जेमिनी-11 से अंतरिक्ष से प्राप्त किया था। इसके 22 साल बाद आई.एस.एस 1 ए ने तमिलनाडु तट पर स्थित रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच समुद्र के भीतर भूमि-भाग का पता लगाया और उसका चित्र जारी किया। इससे अमेरिकी उपग्रह के चित्र की पुष्टि हुई। 15वीं शताब्दी तक इस पुल पर चलकर रामेश्वरम से मन्नार द्वीप तक जाया जा सकता था, लेकिन तूफानों ने यहाँ समुद्र को कुछ गहरा कर दिया। 1480 ईस्वी में यह चक्रवात के कारण टूट गया और समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण यह डूब गया। अगर भूगर्भवेत्ताओं को माने तो इस क्षेत्र में सक्रिए ज्वालामुखी और गतिमान प्रवाल भित्तियां हैं, इसलिए यहाँ की प्रकृति से छेड़-छाड़ करना भारी नुकसान का कारण बन सकता है। पारिस्थितिकी विशेषज्ञ का दावा हैं कि रामसेतु बंगाल की खाड़ी के अनियमित प्रवाहों को रोकता है, ऐसे में यदि रामसेतु तोड़ दिया जाए तो सुनामी की प्रलयकारी लहरों को भारत और श्रीलंका के तटीय समुद्री क्षेत्रों के बीच थामने वाला कोई नहीं होगा। एैसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या रामसेतू तोड़ना सही है ?

23 February 2013

क्या देश में एक बार फिर से पोटा कानून की जरूरत है ?

देश में एक बार फिर से पोटा कानून को लागू करने कि मांग तेज हो गई है। जिस प्रकार से देश में आतंकी हमला बढ़ रहा है उससे निपटना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौति बन गई है। आतंकवाद से निपटने के लिए बनाए गए इस कानून की तो कांग्रेस सरकार ने मिट्टीपलित कर दी, मगर आज देश इस कानून को एक बार फिर से लागू करने की मांग कर रहा है। एक ओर जहां सरकार आतंकवाद को समाप्त करने की बात करती हैं तो वही दूसरी ओर पोटा जैसे कानून को समाप्त कर आतंकवादियों को पनहा दे रही हैं। एैसे में सवाल सरकार की नीयत और नीति को लेकर खड़ा हो रहा है की आखिर अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिए बेगुनाहों का खुन कब तक बहता रहेगा। जो सरकार आतंकवाद निरोधक कानून पोटा लागू करने में सकक्षम नहीं है रह सकी वो आतंकवाद से कैसे निपटेगी इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है। 9/11 के बाद बने आतंकवाद विरोधी माहौल में जिस बीजेपी ने अभूतपूर्व जिद का परिचय देते हुए संसद के संयुक्त अधिवेशन में पोटा को पास कराया था, उसे यूपीए सरकार देश की सुरक्षा से समझौता कर निरस्त कर दिया। आज यही कारण है की गृहमंत्रालय द्वारा राज्यों को बार बार खुफिया एलर्ट भेजने के बाद भी हैदराबाद जैसे आतंकवादी घटनाए बढ़ रही है। अगर आज पोटा जैसे कड़ा कानून होता तो देश की सुरक्षा एजेंसियां सड्यंत्रकारियों को हिरासत में लेकर कड़ी पुछ ताछ कर पाती और आतंकयुग में खौफ का माहौल होता। लचीला रुख और कमजोर कानून का ही नतीजा है की आज देश के महत्वपूर्ण ठिकानों पर आतंकी हमला बदस्तुर जारी है। ऐसे में एक बार फिर कानूनविद पोटा जैसे सख्त कानून की पैरवी कर रहे हैं।

देश के जाने माने वकील और पूर्व एटार्नी जनरल सोली सोराबजी पोटा को फिर से लागू करने की वकालत पहले ही कर चुके है। टाडा और पोटा के बाद महाराष्ट्र में संगठित अपराध से निपटने के लिए मकोका आया। लेकिन घटनाएं नहीं थमी। कानून को कड़ा करने की बहस इतनी जोर पकड़ी कि सरकार आनन फानन में गैरकानूनी गतिविधि रोक, कानून में संशोधन करने पर मजबूर हुई। इस कानून में टाडा और पोटा के प्रावधानों को थोड़ा लचीला कर शामिल किया गया। आतंकवादियों में आज कानून का खौफ बिल्कुल नहीं है। उन्हे पता है कि अगर पकड़ लिए गए तो वर्षों मुकदमा चलेगा। अल्पसंख्यक वोट बैंक कि राजनीति होगी और अंत कमजोर कानून का लाफ उठा कर छुट जाएंगें। एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या देश में एक बार फिर से पोटा कानून की जरूरत है ?

22 February 2013

क्या बंगाल को बांगलादेश बनाया जा रहा है ?

पश्चिम बंगाल में एक बार फिर से दंगे की आग भड़की है, और इस दंगे में हर बार की तरह इस बार भी हिन्दुओं को ही निशाना बनाया गया है। पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के नालीखली गांव में एक धार्मिक नेता की गुंडों द्वारा हत्या के बाद वहां पर हिंसा भड़क गई। नेता की मौत से गुस्साई भीड़ ने 200 घरों को आग के हवाले कर दिया। कथित तौर पर 60 साल के एक धार्मिक नेता जामतला गांव में किसी समारोह में गए हुए थे। सोमवार रात जब वह मोटरसाइकल पर लौट रहे थे, तभी गुंडों के एक दल ने उन पर गोली चला दी और उनकी मौत हो गई। इसके बाद अफवाहों का बाजार गर्म हो गया और हवा में यह बात तैरने लगी कि धार्मिक नेता की हत्या नालीखली गांव के किसी शख्स ने ही की है। इसके बाद लोग घटनास्थल पर जमा होने लगे। शुरू में पुलिस ने इस समस्या को हलके में लिया और लोगों को हटाने के लिए एक जूनियर ऑफिसर और दो कॉन्स्टेबल को भेजा। मगर देखते ही देखते भीड़ उग्र हो गई और दंगा पर उतारू हो गई। दंगाईयों ने सड़क तक को जाम कर दिया और रेलवे ट्रैक को भी बाधित कर दिया।

हमलावरों ने कई गांवों में लूट-खसोट भी की। मगर यहा सबसे चैकाने वाली बात ये है की पुलिस पूरे घटनाक्रम पर मूकदर्शक बनी रही। हमलावरों का एक गुट कोलकाता से ट्रक में चढ़कर आया था। खुफिया एजेंसियों ने भी इस बात की पुष्टि की है। दंगे का दंश झेलरहा ये नालीखली गांव केनिंग सबडिविजन के अंर्तगत आता है। यहां पर स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है और ऐसी आशंका जताई जा रही है कि हिंसा जिले के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है। हमलावरों ने हिन्दुओं के घरों पर हमला कर दिया मगर पुलिस वहां खड़ा होकर मुंह ताक रही थी। हमला कितना कायरतापूर्ण था ये तस्वीरे खुद ब खुद बयां कर रही है। ये हमला पूरी तरह सुनियोजित थी कयोंकि इन दंगाईयों के हाथों में बम, तलवार, और धारदार हथियार थी।

दंगाईयों ने पेट्रोल झिड़क कर हिन्दुओं के घरों में आग लगा दिए। जिन लोगों ने उनका विरोध किया उनकी हमलावरों ने जमकर पिटाई की। हमलावर 3 घंटे तक लोगों का घर जलाते रहे और पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी। यहा सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर ममता बनर्जी क्यों सोई रही। इतनी बड़ी संख्या में दंगाई यहा कैसे इकट्टे हुए? आखिर ममता और ममता की पुलिस क्या कर रही थी ? ये अपने आप में एक बेहद गंभिर सवाल खड़ा करता है। ये वही ममता बनर्जी है जिन्होने अल्पसंख्यक दंगाईयों के लिए स्पेशल हॉस्पिटल बनवाने का एलान किया था। दंगाईयों द्वारा हिन्दू दुकानदार की दुकाने भी जला कर राख कर दिया गया है, यही कारण है यहा से हिन्दु जान बचाने के लिए दुकानें छोड़कर भाग गए है।

जो दुकाने बच गई थी उन्हें लूट कर राख कर दिया गया है। इस घटाना के बाद से आसपास के गांवों के हिन्दू भी बेहद खौफजदा हैं। प्रियोर मोर की स्थिति मुस्लिमों के भयानक आतंको की पृष्ठिभूमि में सुरू से ही बेहद संवेदनशील रही है, इसके बावजूद पुलिस ने दंगाईयों के हिंसक विनाशलीला को रोकने के लिए पहले से कोई कदम नहीं उठाए। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पश्चित बंगाल की ममता सरकार हिन्दुओं का महाविनाश करने पर उतारू है? क्या बंगाल को बांगलादेश बनाया जा रहा है ?

17 February 2013

सरकार गोमांस खाने के लिए क्योँ प्रोत्साहित कर रही है ?

भारत सरकार द्वारा गौहत्या को बढ़ावा देने वाली नीती एक बार फिर से उजागर हो गई है। केन्द्र सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की पुस्तिका ‘पोषण’ विवादों में घिर गई है क्योंकि इस पुस्तिका द्वारा केंद्रीय अल्पसंख्यक और राष्ट्रीय जनसहयोग एवं बाल विकास मंत्रालय यू.पी. के अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में शरीर में ऑक्सीजन और खून बनाने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ ही मुर्गा व गौमांस खाने की सलाह दे रहा है। सरकार कि इस बेतुके और गैर जिमेदाराना हरकतों से देष के हिन्दु समाज में आक्रोस का माहौल खड़ा हो गया है। जब ये मामला मेरठ के मवाना में सामने आने तो अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी का लोगों ने घेराव किया, तो वही भाजपा ने जमकर नारेबाजी की। इस मामले को संसद सत्र में भी उठाने के लिए पार्टी ने एलान कर दिया है। सरकार की इस फैसले ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए है कि क्या पोषण के नाम पर गौमांस खाने का प्रचार करना अत्यन्त निंदनीय नहीं है? क्या यह संविधान के नीति निर्देशक तत्वों का गंभीर उल्लघंन नहीं है? यह हिन्दू धर्म का अपमान नहीं है। क्या ये गौभक्तों की अवज्ञा नहीं है। अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा गौमांस प्रचार की पुस्तिकाओं का वितरण देश की सभ्यता एवं संस्कृति पर कलंकीत करता है। सवाल यहा उन सरकारी अधिकारियों पर भी खड़ा होता है की पुस्तिका के अंदर एैसी गैर जिमेदाराना तथ्यों को बढ़ावा देने वाले पर कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई। गाय को हिन्दु धर्म में मॉ का स्थान प्राप्त है जिसका हिन्दु संस्कृति में पूजनीय स्थान भी है एैसे में ये कांग्रेस सरकार की अल्पसंख्यक वोट बैक की राजनीति को पुरी तरह से दर्षाता है।

उत्तर प्रदेश में गोवंश की हत्या पुरी तरह से प्रतिबंधित है, यूपी में गोरक्षा के लिए 2001 से ही गोवंश निवारण अधिनियम लागू है। इसके बाद भी केंद्र सरकार के मंत्रालय द्वारा यह पर्चा बांटना इस बात का प्रमाण है कि केंद्र सरकार गो-हत्या को बढ़ावा दे रही है। आखिर सरकार किस अधार पर विभागीय किताब में गाय के मांस को आयरन, ऑक्सीजन तथा खून बनाने के लिए जरूरी बता रही है, क्या ये कानुनी तौर पर जुर्म नही है। गौमांस को बढ़ावा देने वाला ये पहला कोई वाक्या नहीं है, इससे पहले भी वर्तमान यूपीए सरकार गौ हत्या के मुद्दे पर अपनी संवेदनहीनता दिखा चुकी है। पिछले साल भी केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधीन आने वाले पशुपालन एवं डेयरी विकास विभाग ने हिन्दुस्तान से गौमांस पर निर्यात का प्रतिबंध हटाने की सिफारिश की थी। वर्ष 2012 से 2017 की 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए जो रूपरेखा तैयार की गई उसमें भी कृषि मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने एक्सिम पॉलिसी यानी कि आयात-निर्यात नीति के तहत गौमांस का निर्यात खोले जाने की अनुशंसा की थी। सरकार की ये अनुषंसा यूपीए सरकार की पींक क्रांति को दर्षाता है, जो देष में लगातार गौहत्या को बढ़ावा दे रही है। तो एैसे में सवाल एक बार फिर से वही आकर रूक जाता है की सरकार आखिर क्यों गौमांस खाने को प्रोत्साहित कर रही है।

16 February 2013

देशद्रोही ओवैसी को दस हजार की जमानत पर छोड़ना सही है ?

देषद्रोह के आरोपी अकबरुद्दीन ओवैसी को आखिरकार जमानत मिल गई। मगर इस आरोपी को मिली जमानत से कई अहम सवाल खड़ा हो गया है। निजामाबाद जिले की एक अदालत ने इस आरोपी को शुक्रवार को जमानत दे दी, वो भी मात्र दस हजार के मुचलके पर। ओवैसी के वकील के मुताबिक अदालत ने स्वास्थ्य के आधार पर जमानत मंजूर की है। ओवैसी को अदालत ने 10,000 रुपये का मुचलका और दो जमानत राशियां चुकाने का निर्देश दिया। एमआईएम विधायक ओवैसी हैदराबाद से 300 किलोमीटर दूर आदिलाबाद की एक जेल में बंद था। मगर यहा सवाल खड़ा होता है की क्या इतने बड़े आरोपी को सिर्फ दस हजार के मुचलके पर छोड़ने से इसका मनोबल नहीं बढ़ेगा। क्या इतने बड़े देषद्रोही को खुला घुमने की छुट दिया जाना चाहिए। ये तमाम एैसे सवाल है जिसका जवाब आंध्रप्रदेष की सरकार को भी देना होगा। ओवैसी के उपर जो धारा लगाई गई थी वो पूरी तरह से गैरजमानती थी। यही कारण है की ओवैसी ने जमान लेने के लिए स्वास्थ्य को अधार बनाया। इस आरोपी को जमानत मिलते है उसके समर्थकों में खुषी की लहर दौड़ पड़ी, इस कट्टरपंथी के समर्थकों ने हैदराबाद, निजामाबाद, और आसपास के षहरों में जम कर उत्पात मचाया और ओवैसी के समर्थन में नारे भी लगाये।
औवैसी को भले ही निजामाबाद के अदालत से जमात मिल गई है मगर भड़काऊ भाषण के मामले में निर्मल टाउन की एक अदालत में भी ओवैसी के खिलाफ मुकदमा चल रहा है। यहां से जमानत पाने के लिए औवेसी को कड़ी मषक्कत करनी होगी। निर्मल टाउन में 22 दिसंबर को हिन्दु देवीदेवताओं को अपमान करने और राश्ट्रविरोधी भाशण देने के अरोप में ओवैसी को आठ जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। तभी से वह जेल में बंद था। उनसे खिलाफ ऐसा ही एक मामला आठ दिसंबर को निजामाबाद में भी दर्ज किया गया था। दोनों ही अदालतों में उसकी आवाज रिकार्ड की गई और सीडी को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया। हैदराबाद जिले के चंद्रायनगुट्टा विधानसभा क्षेत्र से विधायक ओवैसी देषद्रोह, देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ने और लोगों के बीच विद्वेष फैलाने जैसे आरोपों का सामना कर रहा हैं। एैसे में इस बात की क्या गारंटी है की वह आग फैलाने वाली अपनी भाशणबाजी पर लगाम लगा पाएगा ? क्या इस देषद्रोही को जमानत से छुटने पर देष की एकता और अखंडता पर इसका असर नहीं पड़ेगा, जो हमेसा से ही हिन्दुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, जो देष को तोड़ने वाली बात करता है। जिसका सिधा सरोकार पाकिस्तान के साथ है। जो देष में रहकर ही देष को तोड़ने, हिन्दुओं के मंदिरों को तोड़ने, यहा तक कि हिन्दुओं को जिंदा काटडालने की बात करता है। जिसके चलते देष की एकता और अखंडता पर हमेषा घतरे की घंटी नजर आती है। जहा पर कभी भी दंगा भड़क सकता है तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की एैसे देषद्रोही को सिर्फ दस हजार रूपये की जमानत पर छोड़ा जाना चाहिए ?

15 February 2013

क्या आज के दौर में प्यार की पारिभाष बदल गयी है ?

21 साल की अंजली हाथो में गुलाब का ये फूल लिए अपने प्रेमी के आने के इंतजार कर रही है। ये सब बेलेंटाइन का ही नतीजा है। उसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस इंतजारी के मायने इस दौर में क्या हैं ? आज जहाँ इजहार और इकरार करने के तौर तरीके बदल गए हैं वही इंटरनेट के इस दौर में प्यार भी बाजारू हो चला है। हर जगह विदेशी संस्कृति पूत की भांति पाव पसारती जा रही है। आज के युवाओं को लगा वैलेंटाइन का चस्का भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। विदेशी संस्कृति की गिरफ्त में आज हम पूरी तरह से नजर आ रहे है। युवाओ में वैलेंटाइन की खुमारी सर चढ़कर बोल रही है। आज का प्यार मैगी के नूडल जैसा बन गया है जो दो मिनट चलता है। सच्चे प्रेमी के लिए तो पूरा साल प्रेम का प्रतीक बना रहता है लेकिन आज के समय में प्यार की परिभाषा बदल चुकी है। ये प्यार की चाहत आज के दौर में वासना का रूप ले चुकी है। जो हर वक्त हवस की भूख और जिस्म की रोमांस में सड़क से लेकर पार्क और गली मोल्लों में नजर आने लगी है।

आज देश में वैलेंटाइन डे के नाम पर असलीलता और वैलेंटाइन के फेर में आने वाले प्रेमी भटकाव की राह में अग्रसर हो रहे है । एक समय ऐसा था जब राधा कृष्ण मीरा वाला प्रेम हुआ करता था जो आज के वैलेंटाइन प्रेमियों के जैसा नही होता था । आज लोग प्यार के चक्कर में बरबाद हो रहे है। हीर रांझा, लैला मजनू रोमियो जूलियट के प्रसंगों का हवाला देने वाले हमारे आज के प्रेमी आखिर ये क्यों भूल जाते है की देश के साथ प्यार करना उनका पहला राष्ट्रधर्म होना चाहिए। षरहद पर तैनात हमारे जवानों को आखिर ये गुलाब क्यों नहीं दिया जाता है, जिनके चलते आज हम अपने घरों में सुरक्षित है। आज की युवा पीढ़ी हमारे शहीदों को भूल रही है जिसके जलते उनके अंदर राष्ट्रधर्म की कमी साफ तौर पर नजर आ रही है। आज प्यार बाहरी आकर्षण की चीज बनती जा रही है। प्यार को गिफ्ट और पॉकेट में तोला जाने लगा है। वैलेंटाइन के प्रेम में फसने वाले युवा लगातार असफल साबित होते है।

जो उन्हें मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसे घटनाओं का कारण बना रहा है। असफल लोग के तबाह होने के कारण यह वैलेंटाइन डे तब और घातक बन जाता है जब ये प्यार टूटता है या फिर प्रेमी जोड़ों की सादी एक दुसरे के साथ नहीं हो पाती है। आज प्यार करने की स्टाइल बदल गई है। गुलाब का गिफ्ट और पार्टी में अश्लील के साथ थिरके बिना काम नही चल रहा है। ये सब मनाने के लिए आपकी जेब भी गर्म होनी चाहिए। डी जे की थाप पर थिरकते रात बीत जाती है, प्यार की खुमारी में शाम ढलने का पता भी नही चलता, जिसके चलते समाज में क्राइम की ग्राफ भी बढ़ रही है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या वाकई प्यार की परिभाषा बदल गई है ?

10 February 2013

युद्ध स्मारक बनाने पर शीला का विरोध क्या जायज है ?

सियासत जब जन सरोकार के लिए होती है, तो उसका असर आम आदमी के उपर होता है, मगर जब ये दो बिभागों के बिच आपसी रस्सा कस्सी का हिस्सा बन जाता है तो इससे राश्ट्र की एकता और अखंडता दोनों के उपर समान रूप से पड़ता है। कुछ एसा ही वाक्या दिल्ली के मुख्यमंत्री षीला दीक्षित और रक्षा मंत्री एके एंटनी के बिच इनदिनों देखने को मिल रहा है। दिल्ली सरकार ने इंडिया गेट के पास राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाए जाने संबंधी केंद्र सरकार के प्रस्ताव का विरोध किया है। प्रस्ताव के तहत इंडिया गेट कैनोपी के करीब स्वतंत्रता के बाद शहीद हुए सैनिकों की याद में एक राष्ट्रीय स्मारक का निर्माण किया जाना है। इसकी दीवारों पर तमाम शहीदों के नाम लिखे जाएंगे। कारगिल युद्ध के बाद से ही इस स्मारक के निर्माण की चर्चा होती रही ळें रक्षा मंत्री एके एंटनी का कहना है कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के निर्माण के लिए इंडिया गेट सही स्थान है। ये स्मारक षहीदों के लिए सच्ची श्रध्दांजली होगी। जिसे आने वाली पीढ़ी हमेषा याद रखेगी। मगर सूबे की सरकार की राय में इंडिया गेट दिल्ली ही नहीं देश व विदेश के सैलानियों के घूमने-फिरने की भी पसंदीदा जगह है। यहा स्मारक बनाए जाने की सूरत में यहां पर सुरक्षा इंतजामों की वजह से आम लोगों का आना-जाना मुश्किल हो जाएगा। लिहाजा, इस स्मारक के लिए दिल्ली में कोई अन्य बेहतर जगह तलाश की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटनी, गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे व शहरी विकास मंत्री कमलनाथ को अलग-अलग पत्र लिखकर स्मारक के निर्माण को तुरंत रोक लगाने की मांग की है। अपने पत्र में दीक्षित ने केंद्रीय मंत्रियों को लिखा है कि इंडिया गेट और इसके आसपास स्थित इमारतें ऐतिहासिक महत्व की हैं। यह पूरा इलाका खुला-खुला रहना चाहिए। षीला के पास अंगे्रजी षाशकों के षैनिकों के लिए षहिदों के स्मारक और गांधी नेहरू परिवार के लोगों के मूर्ति लगाने के लिए जगह है। इसी इंडीया गेट के पास सांसद मंत्रियों के बंगला बनाने के लिए जगह है पर जो देष के अपने आप को षहिद कर दिया उसका विरोध षीला कर रही है, क्या ये षीला द्वारा षहिदों का अपमान नहीं है। क्या दिल्ली कि मुख्यमंत्री षीला दीक्षित को षहीदों के ऐसे अपमान करने वाले बयान पर माफी नहीं मांगनी चाहिए। क्या षीला को इस तरह युध्द स्मारक का विरोध करना जायज है।

09 February 2013

इतिहास में दर्ज संसद हमले की परत दर परत कहानी

13 कुछ तारीखें अपने साथ इतिहास लेकर आती हैं। 13 दिसंबर 2001 की तारीख भी इतिहास में दर्ज हो जाने के लिए आई। भारतीय लोकतंत्र को थर्रा देने के लिए आई। पूरा देश भौचक था कि आखिर संसद पर हमला कैसे हो सकता है। गोलियों की आवाज, हाथों में एके-47 लेकर संसद परिसर में दौड़ते आतंकी, बदहवास सुरक्षाकर्मी, इधर से उधर भागते लोग, कुछ ऐसा ही नजारा था संसद भवन का। जो हो रहा था वो उस पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था। लेकिन ये भारतीय लोकतंत्र की बदकिस्मती थी कि हर तस्वीर सच थी।

सुबह 11 बजकर 20 मिनट

उस रोज उस वक्त, लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही ताबूत घोटाले पर मचे बवाल के चलते स्थगित हो चुकी थीं। वक्त था 11 बजकर 20 मिनट। इसके बाद तमाम सांसद संसद भवन से बाहर निकल गए। कुछ ऐसे थे जो सेंट्रल हॉल में बातचीत में मशगूल हो गए। कुछ लाइब्रेरी की तरफ बढ़ गए, कुल मिलाकर सियासी तनाव से अलग माहौल खुशनुमा ही था। किसी को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने जा रहा है। उधर दूर एक सफेद रंग की एंबैसेडर कार संसद मार्ग पर दौड़ी चली जा रही थी। घनघनाती हुई लाल बत्ती और सायरन की आवाज। किसी को शक की गुंजाइश ही नहीं थी। ये कार विजय चैक से बाएं घूमकर संसद की तरफ बढ़ने लगी। इस बीच संसद परिसर में मौजूद सुरक्षा कर्मियों के वायरलेस सेट पर एक आवाज गूंजी। उप राष्ट्रपति कृष्णकांत घर के लिए निकलने वाले थे, इसलिए उनकी कारों के काफिले को आदेश दिया गया कि तय जगह पर खड़ी हो जाएं। ये जगह थी संसद भवन के गेट नंबर 11 के सामने। चंद ही सेकेंड में सारी गाडि़यां करीने से आकर गेट नंबर 11 के सामने लग गईं। उप राष्ट्रपति किसी भी वक्त बाहर आने वाले थे। तब तक सफेद एंबेसडर कार लोहे के दरवाजों को पार करते हुए गेट नंबर 12 तक पहुंच चुकी थी। इसी गेट से राज्यसभा के भीतर के लिए रास्ता जाता है। कार इस दरवाजे से उधर की ओर आगे बढ़ गई जहां उप-राष्ट्रपति की कारों का काफिला खड़ा था।

11 बजकर 35 मिनट


दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर जीतराम उप राष्ट्रपति के काफिले में एस्कॉर्ट वन कार पर तैनात थे। जीतराम को सामने से आती हुई सफेद एंबेसडर दिखाई दी। सेकेंडों में ये कार जीतराम के पास तक आ गई। उसकी कार के चलते रास्ता थोड़ा संकरा हो गया था। एंबेसेडर की रफ्तार धीमी होने के बजाय और तेज हो गई। वो कार की तरफ देखता रहा, अचानक ये कार बाईं ओर मुड़ गई। जीतराम को कार के ड्राइवर की ये हरकत थोड़ी अजीब लगी जब कार पर लाल बत्ती है। गृह मंत्रालय का स्टीकर है तो फिर वो उससे बचकर क्यों भागी। जीतराम ने जोर से चिल्ला कर उस कार को रुकने को कहा। एएसआई की आवाज सुनकर वो कार आगे जाकर ठिठक गई। लेकिन वहीं इंतजार करने के बजाय उसके ड्राइवर ने कार पीछे करनी शुरू कर दी। अब जीतराम तेजी से उसकी तरफ भागा। इसी हड़बड़ी में वो कार उप राष्ट्रपति के काफिले की मुख्य कार से टकरा गई।

सेना की वर्दी पहनकर आए थे आतंकी

जब गाड़ी खड़ी थी तभी आतंकियों की गाड़ी ने उनकी कार में टक्कर मारी। इसके बाद विजेंदर सिंह ने गाड़ी में बैठे आतंकी का कॉलर पकड़ा और कहा कि दिखाई नहीं दे रहा, तुमने उपराष्ट्रपति की गाड़ी को टक्कर मार दी। सुरक्षाकर्मियों के हल्ला मचाने के बावजूद कार में बैठे आतंकी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जीतराम समेत बाकी लोग उस पर चिल्लाए कि तुम देखकर गाड़ी क्यों नहीं चला रहे हो। इस पर गाड़ी में बैठे ड्राइवर ने उसे धमकी दी कि पीछे हट जाओ वर्ना तुम्हें जान से मार देंगे। अब जीतराम को यकीन हो गया कि कार में बैठे लोगों ने भले सेना की वर्दी पहन रखी है, लेकिन वो सेना में नहीं हैं। उसने तुरंत अपनी रिवॉल्वर निकाल ली। जीतराम को रिवॉल्वर निकालता देख संसद के वॉच एंड वार्ड स्टाफ का जेपी यादव गेट नंबर 11 की तरफ भागा। एक ऐसे काम के लिए जिसके शुक्रगुजार हमारे सांसद आज भी हैं।

कार चला रहे आतंकी ने अब कार गेट नंबर 9 की तरफ मोड़ दी। इसी गेट का इस्तेमाल प्रधानमंत्री राज्यसभा में जाने के लिए करते हैं। कार चंद मीटर बढ़ी लेकिन आतंकी उस पर काबू नहीं रख पाए, कार सड़क किनारे लगे पत्थरों से टकरा कर थम गई। तब तक जीतराम भी दौड़ता हुआ कार तक पहुंच गया। उसके हाथ में रिवॉल्वर देख पांचों आतंकी तेजी से बाहर निकल आए। उतरते ही उन्होंने कार के बाहर तार बिछाना और उससे विस्फोटकों को जोड़ना शुरू कर दिया, लेकिन तब तक जीत राम को यकीन हो गया कि ये आतंकवादी हैं। उसने बिना देर किए एक पर गोली दाग दी जो उसके पैर पर लगी। जवाब में उस आतंकी ने भी जीतराम पर फायर कर दिया। गोली उसके पैर में जाकर धंस गई और वो वहीं गिर गया। इस वक्त तक सरकार में ऊपर से लेकर नीचे तक किसी को अंदाजा नहीं था कि संसद की सुरक्षा में कितनी बड़ी सेंध लग चुकी है।

आतंकियों ने की ताबड़तोड़ फायरिंग

उधर, कार में धमाका कर पाने में नाकाम आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। गेट नंबर 11 पर तैनात सीआरपीएफ की कॉन्सटेबल कमलेश कुमारी भी दौड़ते हुए वहां आ पहुंची। संसद के दरवाजे बंद करवाने का अलर्ट देकर जेपी यादव वहां आ गया। दोनों ने आतंकियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए उन्हें वहीं ढेर कर दिया। आजाद देश के सबसे बड़े आतंकी हमले की शुरुआत करने के बाद अब आतंकी गोलियां चलाते और हैंड ग्रेनेड फेंकते हुए गेट नंबर 9 की तरफ भागे। संसद परिसर में ताबड़तोड़ गोलियां की आवाज ने सुरक्षाकर्मियों में हड़कंप मचा दिया। उस वक्त सौ से ज्यादा सांसद मेन बिल्डिंग में ही मौजूद थे। पहली फायरिंग के बाद कई सांसदों को इस बात पर हैरत थी कि आखिर कोई कैसे संसद भवन परिसर के नजदीक पटाखे फोड़ सकता है। वो इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि संसद पर आतंकी हमला हुआ है, लेकिन तब तक संसद की सुरक्षा में लगे लोग पूरी तरह हरकत में आ चुके थे। गहरे नीले रंग के सूट पहने हुए ये सुरक्षाकर्मी परिसर के भीतर और बाहर फैल गए। वो सांसदों और मीडिया के लोगों को लगातार अपनी जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे। उस वक्त तक ये भी तय नहीं था कि आतंकी सदन के भीतर तक पहुंच गए हैं या नहीं। इसलिए तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और कैबिनेट के दिग्गज मंत्रियों को संसद भवन में ही एक खुफिया ठिकाने पर ले जाया गया। वहीं जो सांसद परिसर से बाहर निकल रहे थे उन्होंने देखा कि हर तरफ अफरातफरी मच गई है। पुलिस की वर्दी पहने हुए लोग इधर से उधर भाग रहे हैं। हर तरफ से गोलियों और हेंड ग्रैनेड दागे जाने की आवाज आ रही थीं। ये वो वक्त था जब पहली बार सही मायने में लोगों को एहसास हुआ कि दरअसल हुआ क्या है। फिर तो इसके बाद गोलियों की तड़तड़ाहट में एक और आवाज गूंज उठी, आतंकवादी, आतंकवादी।

संसद परिसर में मची अफरातफरी

संसद में फायरिंग और बम धमाके की कान फाड़ देने वाली आवाज के बीच शुरुआती मिनटों में पूरे परिसर में जबरदस्त अफरातफरी मची रही। कई सांसदों को संसद के वॉच एंड वार्ड स्टाफ के लोग सुरक्षित बाहर निकालकर ले गए। संसद के भीतर मचे हड़कंप के बीच पांचों आतंकवादी अंधाधुंध गोलियां दागते हुए गेट नंबर 9 की तरफ भागे जा रहे थे। गेट नंबर 9 और उनके बीच की दूरी कुछ ही मीटर की थी, लेकिन तब तक गोलियों की आवाज सुनकर गेट नंबर 9 को बंद कर दिया गया था। आतंकियों पर जबरदस्त जवाबी फायरिंग भी जारी थी। सुरक्षाबलों की गोली से तीन आतंकी जख्मी थे, लेकिन वो लगातार आगे बढ़ते जा रहे थे। उन्होंने एक छोटी सी दीवार फांदी और गेट नंबर 9 तक पहुंच ही गए। लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि उसे बंद किया जा चुका है। इसके बाद वो दौड़ते हुए, बंदूकें लहराते हुए आगे बढ़ने लगे। तभी पहली मंजिल पर मौजूद एक पुलिस अफसर अपने साथियों पर चिल्लाया कि एक-एक इंच पर नजर रखो। कोई आतंकी सदन के भीतर ना पहुंचने पाए कोई आतंकी यहां से भाग ना पाए। तुरंत ही सुरक्षाकर्मियों ने उन नेताओं और पत्रकारों को संसद के भीतर धकेलना शुरू कर दिया जो इतनी फायरिंग और हैंड ग्रेनेड के धमाकों के बाद भी दरवाजों के आसपास खड़े थे।

हमला होते ही काटे गए फोन

नेताओं को सेंट्रल हॉल तक ले जाने के बाद सुरक्षाकर्मी तमाम संवाददाताओं को उस कमरे में ले गए जहां से अहम सरकारी दस्तावेज बांटे जाते थे। इस कमरे का दरवाजा बंद कर दिया गया और कमरे में पहुंचते ही संवाददाता वहां के फोन की तरफ भागे। लेकिन कमरे में लगे सभी फोन ने काम करना बंद कर दिया था। ये फोन हमला शुरू होने के तुरंत बाद ही काट दिए गए थे। मकसद ये कि कोई आतंकी संसद भवन के संचार तंत्र पर कब्जा ना कर ले। संसद के भीतर की इस हलचल के बीच आतंकी गेट नंबर 9 से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। 4 आतंकी गेट नंबर 5 की तरफ लपके भी, लेकिन उन 4 में से 3 को गेट नंबर 9 के पास ही मार गिराया गया। हालांकि एक आतंकवादी गेट नंबर 5 तक पहुंचने में कामयाब रहा। ये आतंकी लगातार हैंड ग्रेनेड भी फेंक रहा था। इस आतंकी को गेट नंबर पांच पर कॉन्टेबल संभीर सिंह ने गोली मारी। गोली लगते ही चैथा आतंकी भी वहीं गिर पड़ा।

पांचवां आतंकी मचाता रहा कोहराम

चार आतंकियों को मार गिराने की कार्रवाई के बीच एक आतंकी गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ गया। ये आतंकी फायरिंग करते हुए गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ता जा रहा था। गेट नंबर 1 से ही तमाम मंत्री, सांसद और पत्रकार संसद भवन के भीतर जाते हैं। ये आतंकी भी वहां तक पहुंच गया। फायरिंग और धमाके की आवाज सुनने के तुरंत बाद इस गेट को भी बंद कर दिया गया था। इसलिए पांचवां आतंकी गेट नंबर 1 के पास पहुंचकर रुक गया। तभी उसकी पीठ पर एक गोली आकर धंस गई। ये गोली इस आत्मघाती हमलावर की बेल्ट से टकराई। इसी बेल्ट के सहारे उसने विस्फोटक बांध रखे थे। गोली लगने के बाद पलक झपकते ही विस्फोटकों में धमाका हो गया। उस आतंकी के शरीर के निचले हिस्से की धज्जियां उड़ गईं।

खून और मांस के टुकड़े संसद भवन के पोर्च की दीवारों पर चिपक गए। जले हुए बारूद और इंसानी शरीर की गंध हर तरफ फैल गई। पांचों आतंकियों के ढेर होने के बावजूद इस वक्त तक ना तो सुरक्षाकर्मियों की पता था और ना ही मीडिया को कि आखिर संसद पर हमला कितने आतंकियों ने किया है। अफरातफरी के बीच ये अफवाह पूरे जोरों पर थी कि एक आतंकी संसद के भीतर घुस गया है। इसकी एक वजह ये भी थी कि मारे गए पांचों आतंकियों ने जो हैंड ग्रेनेड चारों तरफ फेंके थे, उनके में कुछ आतंकियों को मारे जाने के बाद फटे। संसद के भीतर और बाहर मचे घमासान के बीच सुरक्षाकर्मियों को कुछ वक्त लगा ये तय करने में कि क्या खतरा वाकई टल गया है। आधे घंटे के भीतर सभी आतंकियों के मारे जाने के बावजूद वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। तब तक सुरक्षाबल के जवान संसद और आसपास के इलाके को बाहर से भी घेर चुके थे। गोलियों की आवाज, हैंड ग्रेनेड के धमाके की जगह अब एंबुलेंस के सायरन ने ले ली थी।

हमला नाकाम करने में लगे 30 मिनट

संसद पर हमले को नाकाम करने में तीस मिनट लगे। लेकिन इन तीस मिनटों ने जो निशानी हमारे देश को दी वो आज भी मौजूद है। पांचों आतंकियों को ढेर करने के बाद कुछ वक्त ये तय करने में लगा कि सारे आतंकी मारे गए हैं। कोई सदन के भीतर नहीं पहुंचा। तब तक एक-एक करके बम निरोधी दस्ता, एनएसजी के कमांडो वहां पहुंचने लगे थे। उनकी नजर थी उस कार पर जिससे आतंकी आए थे और हरे रंग के उनके बैग जिसमें गोला-बारूद भरा हुआ था। तलाशी के दौरान आतंकियों के बैग से खाने-पीने का सामान भी मिला, यानी वो चाहते थे कि संसद पर हमले को दौरान सासंदों को बंधक भी बनाया लिया जाए। वो ज्यादा से ज्यादा वक्त तक संसद में रुकने के लिए तैयार होकर आए थे। अब जाकर सरकार को एहसास हुआ कि अगर आतंकी भीतर घुस जाते तो उसका अंजाम कितना खतरनाक होता।

विस्फोटकों को किया नाकाम

बम निरोधक दस्ते ने वहां पहुंचने के बाद विस्फोटकों को नाकाम करना शुरू किया। उन्हें परिसर से दो जिंदा बम भी मिले थे। जिस कार से आतंकी आए थे, उसमें 30 किलो आरडीएक्स था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर आतंकी इस कार में धमाका करने में कामयाब हो गए होते तो क्या होता। सुरक्षाबलों को पूरी तरह तसल्ली करने में काफी देर लगी। वो अब किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते थे। हर किसी की एक बार फिर जांच की गई। संसद परिसर से निकलने वाली हर कार की भी तलाशी ली जा रही थी। जिन कारों पर संसद का स्टीकर लगा था उन्हें भी पूरी छानबीन करके ही बाहर जाने की इजाजत दी जा रही थी। एक-एक आदमी का आईकार्ड चेक किया जा रहा था। जब सुरक्षा में जुटे लोग पूरी तरह संतुष्ठ हो गए कि अब खतरा नहीं है, तब संसद सांसदों और मीडिया के लोगों को एक-एक करके बाहर निकालने का काम शुरू हुआ। दोपहर साढ़े ग्यारह बजे के करीब हुए हमले के बाद मचे हड़कंप को थमते-थमते शाम हो गई। पूरा देश अब तक इस हमले को जज्ब नहीं कर पाया था। सत्ता के गलियारों में बैठक पर बैठक पर हो रही थी कि इस हालात का मुकाबला कैसे किया जाए। उधर इतिहास में 13 दिसंबर की तारीख को हमेशा के लिए दर्ज कराकर सूरज भी धीरे-धीरे डूबने लगा था।

अफ़जल के फांसी में देरी करने वाले गुनहगारो को सज़ा कब मिलेगी ?

13 दिसंबर, 2001 को संसद सत्र के दौरान ही पांच बंदूकधारियों ने संसद परिसर पर हमला बोल दिया था। इस हमले में पांचों आतंकवादी ढेर हो गए थे। आतंकवादियों से मोर्चा लेते हुए सात सुरक्षाकर्मी और संसद के कर्मचारी भी शहीद हो गए थे। जबकि 18 लोग जख्मी हुए थे। देश के सत्ता का प्रतिक संसद भवन पर हमले के अरोपी अफजल गुरू को आखिरकार फांसी तो हो गई, मगर इस फांसी की सजा में हुई देरी ने सत्ता में बैठे नेताओं पर कई अहम सवाल छोड़ गई है। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने अफजल की सजा पर मुहर लगा दी थी। तब से वह तिहाड़ जेल में बंद था। विपक्ष उसे जल्द से जल्द फांसी दिए जाने की मांग करती रही, और मौत के गुनहगार की फाईलें देष के गृहमंत्री कार्यालय से लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री षीला दीक्षित के पास घुमती रही। किसी ने इतने बड़े हमले के दोशी फाईल पर हस्ताक्षर करने की हिम्मत नहीं उठाई।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त, 2005 को अफजल गुरु की फांसी की सजा बरकरार रखने का फैसला सुनाया था। कुछ महीने पहले विकीलीक्स के हवाले से यह खुलासा हुआ था कि कांग्रेस के नेता और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने अफजल गुरु को माफ किए जाने की सिफारिश की थी। कलाम और सोनिया के बीच अफजल गुरु के मामले में मतभेद की एक बड़ी वजह यही थी। सरकार को आतंकवाद जैसी आंच को बुझाने में भी वोट की राजनीति आड़े आती रही। अफजल गुरु को संसद पर हमले के मामले में दोषी ठहराते हुए 18 दिसंबर 2002 को दिल्ली की एक स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 29 अक्तूबर 2003 को दिए अपने फैसले में इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद अफजल गुरु ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जो 4 अगस्त 2005 को नामंजूर हो गई। सेशन जज ने तिहाड़ जेल में उसकी फांसी की तारीख 20 अक्तूबर 2006 भी तय कर दी थी। मगर, उसके बाद उसने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी जहां से इसे गृह मंत्रालय के पास भेजा गया। गृहमंत्रालय ने ऐसी दया दिखाई की ये लाल फीते वाली फाईल में बंद हो गई, और गृहमंत्री को मानो सांप सुघ गया था। अफजल गुरू की फांसी की फाइल चार सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अलमारियों की धूल फांकती रही। फांसी की फाइल पर शीला दीक्षित कुंडली मार कर बैठ गयी। इस दौरान गृहमंत्रालय ने 16 बार रिमाइंडर भेजी। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अफजल गुरू की फांसी पर कानून व्यवस्था का सवाल उठाकर रोड़ा डाल दिया। शीला दीक्षित ने अपने सिफारिष में लिखा,,,फांसी देने से पहले कानून व्यवस्था की स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।

षीला की इस प्रतिक्रिया ने तुरंत अपना असर दिखाया। दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना फांसी की फाइल को वापस भेजने के लिए मजबूर हुए। कांग्रेस प्रारंभ से ही अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने के प्रसंग पर ईमानदार नहीं रही है। और इसका सीधा मकसद मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति है। कांग्रेस की संप्रदायीक सत्ता और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति एक-दूसरे से गंभीरता के साथ जुड़ी रही है। राष्ट्रहित और राष्ट्र की सुरक्षा के मद्देनजर अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने में क्या देरी नहीं होनी चाहिए ? यहा कई अहम सवाल खड़े हो रहे है, आखिर अफजल गुरू की फांसी वाली फाइल चार सालों तक किस मकसद से कांग्रेस दबा कर रखी ? आखिर सरकार इस मामले में देरी करने वाले दोशियों को कड़ी सजा कब देगी ?

क्या साधु संतों को पी एम के उमीदवार पर बोलने का अधिकार नहीं है

अप्रैल 1984 में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा दिल्ली के विज्ञान भवन में पहली धर्म संसद को आयोजित किया गया था, मुद्दा था, राम जन्मभूमि के द्वार से ताला खुलवाना। इस संसद में प्रस्ताव भी पारित हुआ। धर्म संसद कि इतिहास आज के राजनीतिक परिदृश्य में भले ही नेताओं को नया लगे, मगर स्वामी विवेकानंद जैसे महान संत भी ऐसे धर्म संसद का आयोजन देष- विदेष में अकसर करते थे। आज तुच्छ राजनीति करने वाले नेता बयान दे रहे है की धर्म और राजनीति का मेल नहीं हो सकता। मगर संगम तट पर चल रहे महाकुंभ में राजनीति के चैसर पर चल रही चालों को देखिए तो ऐसा प्रतीत होता है मानो धर्म ही अब राजनीति का मार्ग प्रशस्त करने की ओर अग्रसर है। भारत धार्मिक मान्यतों पर चलने वाला देश है, और यहां की अधिसंख्य आबादी धर्म के अधार पर अपने तमाम फैसले लेती है लिहाजा अब जनता के राजनीतिक फैसलों के लिए धर्म संसद का सहारा लिया जा रहा है तो हमारे संप्रदायिक नेता इस पर हाय तौबा मचा रहे है। विश्व हिन्दू परिषद से लेकर तमाम संत समुदाय देश के भावी प्रधानमंत्री कैसा व कौन हो तथा राजनीति की दशा-दिशा को लेकर चिंतन कर रहे हैं। इस चिंतन-मंथन सत्र ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है। एक ओर इस धर्म संसद में साधु संतों की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग उठ रही है, वही जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ये कहते नही चुक रहे है कि धर्म संसद को हिन्दू समाज की असली समस्याओं से कोई सरोकार ही नहीं है। पीएम का उमीदवार साधु संत नहीं तय कर सकते। ऐसे में यहा पर सवाल खड़ा होता है की क्या ये साधु संतो को इस देष में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, क्या ये संत- समाज हमारे देष के नागरिक नहीं है। क्या इन्हें अपने विचार रखने का कोई अधिकार नहीं है। भले ही आप इन बातों से सहमत न हो पर जदयू के शिवानंद तिवारी सरीखे नेताओं को तो कुछ ऐसे ही लग रहा है। जहां तक कुंभ में साधू संतों के जमावड़े और हिंदुत्व को पुनः उसके पुराने स्वरुप को जिंदा करने की बात है तो यह पहल अवश्य राजनीति में शुचिता का वरण करेगी। हिंदू समाज को विभाजित करने का आज जो कुचक्र चल रहा है उसे कुचलने में साधु संतो का ये धर्म संसद आज के राजनीति में एक नई दिषा दिखाने में जरूर सफल हुए है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने हिंदुत्व को जमकर नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में संतों के चिंतन का निष्कर्ष अगर देष के प्रधानमंत्री को तय करता है तो वाकई ये साधु संतो के लिए और इस भारत भूमी के लिए मील का पत्थर साबित होगा। और देष एक बार भीर से अपने अपने सही रास्ते पर चल सकता है।

03 February 2013

क्या बाल अपराध कानून में बदलाव जरुरी है ?

किशोरावस्था की उम्र को लेकर आज कल चर्चा जोरों पर है। देष में लगातार बढ़ रहे बाल अपराध को लेकर आज समाज में एक नई बहस छिड़ गई है। आए दिन जिस प्रकार से छोटे- छोटे बच्चे समाज के अंदर दिल दहला देने वाली घटनाओं को अंजाम दे रहे है उससे कही न कही देष का भविश्य और समाज दोनो खतरे में पड़ता दिख रहा है। हमारे राष्ट्र का भावी विकास और निर्माण वर्तमान पीढ़ी के साथ ही आने वाली नई पीढ़ी पर भी निर्भर है। तभी तो कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं। लेकिन आज नैतिक पतन आगामी पीढ़ी के लिए विध्वंसक का कार्य कर रहा है। स्वच्छंद सेक्स, नशा, बड़े-बुजुर्गों का अपमान, अनुशासनहीनता, उदंद्डता बच्चों की जीवन शैली में ढलने लगे हैं। बच्चों को बीड़ी पीते, गुटका खाते, चोरी करते और युवतियों के साथ अश्लील हरकतें करते जैसे घटनाए लगातार बढ़ रही है। आश्चर्य की बात है कि बच्चे-बच्चियां, जिन्हें उम्र का तकाजा नहीं है, वे वर्जनाओं और मर्यादाओं की सीमाओं को लांघ चुके हैं। शायद यही वजह है कि बाल अपराध के आंकड़े दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। बालअपराध के मुख्य कारणों में गरीबी और अशिक्षा सबसे महत्वपूर्ण हैं। बाल अपराधी ज्यादातर लड़के होते हैं तथा उनकी भी आयु सीमा 12 से 16 वर्ष के बीच रहती है, यही नहीं बाल अपराधी ग्रामीण क्षेत्र की बजाए शहरी क्षेत्र में अधिक होते हैं। 

भारतीय कानून के अनुसार, सोलह वर्ष की आयु तक के बच्चे अगर कोई ऐसा कृत्य करें जो समाज या कानून की नजर में अपराध है तो ऐसे अपराधियों को बाल-अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है। किशोर न्याय-सुरक्षा और देखभाल अधिनियम 2000 के तहत ऐसे अपराध में सजा दी जाती है। इस अधिनियम के अंतर्गत बाल अपराधियों को कोई भी सख्त या कठोर सजा ना देकर उनके मस्तिष्क को स्वच्छ करने का प्रयत्न किया जाता है। दिल्ली में 16 दिसंबर की रात चलती बस में 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा से गैंगरेप कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया गया था। 29 दिसंबर को लड़की की सिंगापुर के अस्पताल में मौत हो गई थी। छात्रा के साथ हुए इस गैगरेप की विभत्स घटना के बाद से ऐसे कानून में बदलाव की मांग जोर पकड़ चुकी है तरह- तरह के सवाल भी उठने लगे है। वर्ष 2011 में बच्चों के खिलाफ अपराधों की सूची में राजधानी दिल्ली शीर्ष पर है जबकि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बच्चों से बलात्कार और हत्या के सर्वाधिक मामले दर्ज हुए हैं। देश में 2011 में बच्चों के खिलाफ अपराध संबंधी कुल 33 हजार 98 मामले दर्ज हुए जबकि 2010 में यह आंकड़ा 26 हजार 694 था। यानी बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में 24 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। दिल्ली सामूहिक बलात्कार के 6 आरोपियों में से एक की उम्र 18 साल से कम है। जुवेनाइल एक्ट के तहत वह अधिकतम तीन साल बालसुधारगृह में रहने के बाद वह असानी से छूट जाएगा और उसके साथ केस की सुनवाई जुवेनाइल अदालत में होगी। इस बीच सुझाव आ रहे हैं कि किशोरों में बढ़ते अपराध दर को देखते हुए यह उम्रसीमा घटा कर 16 कर दी जाए। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या बाल अपराध की कानून में बदलाव जरूरी है ?

सिसकता बचपन और बाल अपराध की घटनाये

अभी कुछ महीने पहले ही जब राजस्थान के अलवर के दो गांवों में दिल्ली पुलिस राजधानी से लापता हुई लड़कियों की तलाश में पहुंची तो यह जानकार सन्न रह गई कि इस गांव में कम उम्र की गायब लड़कियों की तादाद काफी ज्यादा थी बाकी बची लड़कियों को देखरेख के साथ पाला जा रहा था  ठीक उसी तरह जैसे बकरे की बलि चढ़ने से पहले पाला जाता है यहां पांच.छह साल की लड़कियों को लगातार उस ऑक्सीटॉक्सिन का इंजेक्शन दिया जा रहा था जिसका इस्तेमाल अधिक कमाई के लालच में दूधवाले गाय और भैंसों से अधिक दूध पाने के लिए किया करते हैं ताकि इन सभी बच्चियों की काया जल्द से जल्द चौदह.पन्द्रह साल की किशोरियों की तरह हो जाय किशोरी काया में ढालने की ये अमानवीय प्रयोगशालाएं मेरठ और अलवर जैसे जगहों पर आसानी से पाई जा सकती हैं इन अमानवीय प्रयोगशालाओं में तैयार करने के बाद इस तरह की ऑक्सिटॉक्सिन पीड़ित बच्चियों को मोटी रकम लेकर दिल्लीए मुम्बई से लेकर सिंगापुर तक भेजा जाता है बाल यौन शोषण का यह भयावह रूप आज भी मेरठ और अलवर की गलियों में देखी जा सकती है  समय.समय पर धड़.पकड़ भी होती है। बातें मीडिया में आती हैं। बरामदगी के कुछ दिनों के बाद उस बच्ची की याद न मीडिया को रहती हैए न गैर सरकारी संस्था कोए और न ही पुलिस को। वह बच्ची अगर मेरठ में पकड़ी गई थी तो उसके बाद वह आगरा पहुंच जाएगीण इस तरह बाल यौन शोषण का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है बाल यौन शोषण का यह घिनौना उदहारण तो बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध का एक नमूना मात्र है
वास्तव में बच्चों के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध की श्रेणियों  की लिस्ट बनाई जाय तो निश्चित तौर पर माथे पर  बल पड़ जाएंगेण् छोटे.छोटे बच्चों को  स्कूल भेजने  के बजाय मजदूरी के काम में लगा दिया जाता है अधिकाँश बँधुआ माता.पिता अपने बच्चों की पिटाई करते हैं कक्षा में शिक्षक भी उनकी पिटाई करते या फिर जाति व धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है महिला बाल शिशु को जन्म लेने से रोका जाता है इसके लिए उनकी गर्भ में या फिर जन्म के बाद हत्या कर दी जाती है अथवा फिर उन्हें परिवार या समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है जन्म के बाद बालिकाओं को बाल.विवाहए बलत्कार या फिर तिरस्कार की मार अलग से झेलनी पड़ती है आसमान में पतंग उड़ानेए कहीं दूर तक सैर तक जानेए मजे .मौज और पढ़ाई करने वाले दिनों में अपनी इच्छाओं का दमन करके बच्चो का एक बड़ा वर्ग कहीं कल.कारखानों मेंए कहीं होटलों में तो कहीं उंची चहारदीवारियों में बंद कोठियों की साफ .सफाई में लगा हुआ है कॉलोनियों के बाहर पड़े कूडेदानों में जूठन तलाशते मासूमोंए पन्नी बटोरने वालों की संख्या करोड़ों में है मां.बाप के प्यार से वंचितए सरकारी अनुदानोंए राहतों की छांव से विभिन्न कारणों से दूर इन बहिष्कृत बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं है इन बच्चों को सूरज की पहली किरण के साथ ही पेट की आग शांत करने की चिंता सताने लगती है। इसके लिए वे ट्रेनोंए बसों व सड़कों पर केले मूंगफलीए पानी के पाउच व अखबार बेचने निकल पड़ते है। ऐसे बच्चों की भी कोई कमी नहीं है जो हाथ में पॉलिश की डिब्बी व बु्रश लिए बूट पॉलिस करते दिखाई दे जाते है। होटलोंए ढाबों पर चंद पैसों की खातिर जूठन साफ करने वाले छोटूए चवन्नी हीरोए अठन्नीए भैयाए पप्पूए मुन्ना हीरोए छुटकू और न जाने ऐसे कितने जाने पहचाने व अनगिनत नाम है जो दिन भर अपने मालिक के इशारे पर इधर से उधर भागते फिरते है

बाल शोषण बच्चो के विरुद्ध होने वाले अपराध


बच्चों के खिलाफ अपराधों को हम मुख्य रूप से चार भागों में बांट सकते हैं.;1 बलात्कारए ;2 अपहरणए ;3 छोटे बच्चों की खरीद.फरोख्त और 4 कन्या भ्रूण.हत्याण् राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में साल 2007ए 2008 और 2009 में बच्चों के खिलाफ अपराध के क्रमश 20ए 410 ए 22ए 500 और 24ए 201 मामले दर्ज किये गए थे 2007 में बच्चों की हत्या के । ए377 मामलेए 2008 में ।ए296 मामले और 2009 में ।ए488 मामले दर्ज किये गए थे जबकि 2007 में बलात्कार के 5ए 045 मामले ए2008 में 5ए 446 मामले और 2009 में 5ए 368 मामले दर्ज किये गए थे बच्चों के अपहरण के बारे अगर बात की जाए तो 2007 में 6ए 377 मामलेए 2008 में 7ए 650 मामले और 2009 में 8ए 945 मामले दर्ज किये गए थे जबकि वेश्यावृति के लिए लड़कियों की खरीद के 2007 में 40 मामलेए 2008 में 49 मामले और 2009 में 57 मामले दर्ज किये गए थे उपरोक्त आंकड़ों से ये बात साफ़ हो जाता है  कि बाल शोषण आधुनिक समाज का एक घिनौना और ख़ौ़फनाक सच बन चुका है वर्तमान  दौर में निर्दोष एवं लाचार बच्चों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने की घटनाएं इतनी आम हो चुकी हैं कि अब तो लोग इस ओर ज़्यादा ध्यान भी नहीं देते जबकि वास्तविकता यह है कि बाल शोषण बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है सामान्यतया हम यही मान कर चलते हैं  कि बाल शोषण का मतलब बच्चों के साथ शारीरिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार है लेकिन सीडीसी ;कंसलटेंसी डेवलपमेंट सेंटरद्ध के अनुसारए बच्चे के माता.पिता या अभिभावक द्वारा किया गया हर ऐसा काम बाल शोषण के दायरे में आता हैए जिससे बच्चे पर  बुरा प्रभाव पड़ता हो या ऐसा होने की आशंका हो या जिससे बच्चा मानसिक रूप से भी प्रताड़ित महसूस करता होण् भारत में हालत ऐसी है कि अक्सर बाल शोषण के वजूद को ही को सिरे से नकार दिया जाता हैए लेकिन सच यह है कि ख़ामोश रहकर हम बच्चों के साथ दुर्व्यवहार की वारदातों को बढ़ावा ही दे रहे हैं देश में बाल शोषण की घटनाओं को ऐसे अंजाम दिया जाता है कि दोषी के साथ.साथ पीड़ित बच्चे भी खुलकर सामने नहीं आते पीड़ित बच्चे शर्मिंदगी के चलते कुछ भी बोलना नहीं चाहते इसके पीछे भी हमारी सामाजिक बनावट और मानसिकता काफी हद तक ज़िम्मेदार है हम भी ऐसे बच्चों को कुछ अलग नज़र से देखने लगते हैं संभवतरू इसी लज्जा के चलते उन्हें दुनिया की निगाहों में ख़ौ़फ नज़र आता है पश्चिमी देशों में हालात ऐसे नहीं हैं शिक्षा के कारण वहां का समाज और वहां के बच्चे निडर होकर अपनी बात कह सकते हैं वहां के बच्चों में कम से कम इतना साहस तो होता ही है कि वे दुनिया को खुलकर अपनी आपबीती बता सकें केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा यूनीसेफ के सहयोग से कराए गए एक अध्ययन के परिणामों से जो बात सबसे ज़्यादा उभर कर सामने आई हैए वह यह है कि 5 से 12 साल तक की उम्र के बच्चे बाल शोषण के सबसे ज़्यादा शिकार होते हैं हैरत की बात यह है कि हर तीन में से दो बच्चे कभी न कभी शोषण का शिकार रहे हैंण् अध्ययन के दौरान लगभग 53. 22 प्रतिशत बच्चों ने किसी न किसी तरह के शारीरिक शोषण की बात स्वीकारी तो 21. 90 प्रतिशत बच्चों को भयंकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा इतना ही नहीं क़रीब 50.76 प्रतिशत बच्चों ने एक या दूसरे तरह की शारीरिक प्रताड़ना की बात कबूली

बाल मजदूरी रोता बचपन

तमाम कोशिशों के बाद भी दुनिया में बच्चों की एक बड़ी आबादी मेहनत की भटटी में तपने को मजबूर है देश के भावी कर्णधार मजदूरी में अपने बचपन की खुशियों को गिरवी रख देते हैं जिन बच्चों के हाथों में खिलौने एकागज . कलम , कापी . किताब, एस्लेट . पेंसिल होनी चाहिए थी उन नाजुक हाथों में औरों के जूते पालिश करने के ब्रश ए दूसरों के पढने के लिए स्लेट . निर्माण की सामग्रियां एपत्थर तोडने के हथौडे अथवा द्री कालीन बुनने के लिए धागों का जाल होता है एजिसके मकडजाल में उनकी जिंदगी पिसती रहती है जिन बच्चों को मां . बाप की गोद में होना चाहिए था या भाई . बहन की बांहो में जिनको दुलार मिलना चाहिए था वे भयंकर शीतलहरीए तपती दोपहरी या घनघोर वर्षो के थपेड़ो या जलती भटठियों के शिकार होते हैं वे मिटटी के दीये या मोमबत्ती जलाकर दीवाली नहीं मनाते बल्कि अपना बचपन सुलगाकरए उंगलियां जलाकर अमीर बच्चों की दीवाली के उत्सव के लिए पटाखे या मोमबत्ती बनाते हैं कानून किताबों में पड़ उंघ रहा है। क्योंकि उसे जगाने वाले हाथ देखकर भी कुछ नहीं करते बल्कि कई बार तो वह खुद ही कानून तोड़ते नजर आते हैं। और इस पर भी दर्दनाक बात यह कि बच्चों के मुददे कभी विधानसभा और संसद में गंभीरता और नियमितता से उठाए ही नहीं जाते क्योंकि बच्चों का कोई वोट बैंक नहीं होताए बच्चों के मुददे जनप्रतिनिधियों को चर्चा में नहीं लातेदेश में बालमजदूरों की संख्या 2001 की जनगणना के मुताबिक लगभग सवा करोड़ है। जबकि स्वयंसेवी संस्थाओं के मुताबिक यह संख्या दो करोड नब्बे लाख है।  मप्र में यह आंकड़ा दस लाख के आसपास है। मतलब दस लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। बेहतर शिक्षा से वंचित हैं और शारीरिक .मानसिक विकास से भी। भारतीय संविधान संशोधन के बाद देश के चौदह वर्ष तक के में हर बच्चे को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा अधिकार दिया गया है। जाहिर है यह दस लाख बच्चे इस हक से तो महरूम हैं ही पर यह संविधान का सीधे .सीधे मखौल उड़ाने वाला प्रहसन भी है। संयुक्त राष्ट महासभा ने 1989 में बच्चों के अधिकारों से संबंधित एक महत्वपूर्ण घोषणा पत्र जारी किया था। बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की व्यवस्थाए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षाए और बालश्रम को दूर कर संरक्षण की व्यवस्था। यह उस घोषणापत्र के तीन मुख्य बिंदु थे। लेकिन इस घोषणापत्र के लगभग सत्रह साल पूरे हो जाने के बाद भी स्थितियों में कोई खास सुधार नहीं आ पाया है।  

जानवरों से भी सस्ती दर में बिकते बच्चे 
बचपन बचाओ आंदोलन द्वारा चौबीस राज्यों में सूचना के अधिकार के तहत दाखिल अर्जियों के बाद प्राप्त  आंकड़ों के अनुसार भारत में हर रोज करीब 165 व साल भर में 60 हजार बच्चे लापता हो जाते हैं। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा  बच्चे गायब हुए हैं पश्चिम बंगाल दूसरे नंबर पर है और दिल्ली तीसरे नंबर पर है बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक ज्यादातर लापता बच्चों को गैरकानूनी ढंग से अलग.अलग काम पर लगाया जाता है या उनके शरीर के अंग बेचे जाते हैं जानवरों से भी सस्ती दर में बच्चों को बेचा जाता  है जहां एक भैंस की कीमत कम से कम पंद्रह हजार रूपए होती है वहीं देश में बच्चों को पांच सौ रूपए से लेकर 25 सौ रूपए में आसानी से बेचा जाता है अधिकतर बच्चों से या तो मजदूरी कराई जाती है या सेक्स वर्कर का पेशा कराया जाता है  बाल व्‍यापार के क्षेत्र में भारत स्रोतए गंतब्य और पारगमन केंद्र के रूप में काम कर रहा हैण् नेपाल और बंगला देश से बच्चे यहाँ लाये जाते हैंण् यहाँ से बड़ी तायादात में बच्चे अरब देशों में ले जाए जाते हैंण् अरब देशों में कम उम्रकी लड़कियां भी सप्लाई की जाती हैं जिनका शोषण ईय्यास और कामुक दौलतमंद शेखों के द्बारा किये जाते हैं इनमें मुस्लिम लड़कियों की संख्या ज्यादा होती हैं और जो मुस्लिम नहीं भी होती हैं उन्हें भी मस्लिम बनाकर पारगमन कराया जाता है इसके अलावा अन्य देशों में घरेलु मजदूर और जानवरों की चरवाही के लिए मासूम बच्चों को ले जाया जाता है दिल्ली में सबसे ज्यादा गुमशुदगी दिल्ली में बच्चों के गुम होने या अपहरण से सम्बंधित मामले अधिक हैं। दिल्ली में प्रत्येक दिन 17 बच्चे गुम होते हैं जिसमें से 6 कभी भी नहीं मिलते हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की एक रिपोर्ट के अनुसार चारों महानगरों में गुमशुदगी सम्बंधित मामलों में दिल्ली पहले स्थान पर है। आरटीआई के अंतर्गत प्राप्त सूचना के अनुसार जनवरी 2008 से अक्टूबर 10 तक दिल्ली से 13ए 570 बच्चे गुम हुए और 1 जनवरी 11 से 26 अप्रैल 11 तक 550 बच्चे गुम हुए हैं। गुम हुए बच्चों में सर्वाधिक 12.19 वर्ष की लड़कियां हैं और सामान्यतरू 0.19 वर्ष तक के लड़के व लड़कियां हैं। 90 प्रतिशत गुम हुए बच्चे झुग्गी.झोपड़ियों व स्लम के हैं। दिल्ली का उत्तरी.पूर्वी जिला गुमशुदा बच्चों के मामले में प्रथम स्थान पर है। 70 प्रतिशत गुमशुदा बच्चे पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार और झारखंड के रहने वाले हैं। दिल्ली में गुम हुए कुल बच्चों में से 80 प्रतिशत पलायित लोगों केए 50 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से 80 प्रतिशत एससी एसटी और ओबीसी समुदाय से तथा 90 प्रतिशत बच्चे असंगठित क्षेतों में कार्य करने वाले मजदूरों के हैं

देहव्यापार अहम अपराध

बच्चों द्वारा कराए जाने वाले अपराधों में सेक्स टूरिज्म या देह व्यापार में उन्हें लगाना सबसे प्रमुख है। यह एक संगठित अपराध है जिसमें बड़े पैमाने पर बच्चों को धकेला जा रहा है। एक अन्य तरीके से बच्चों का अंग.भंग कर उनसे भीख मंगवाने का भी व्यवसाय चल रहा है जिसका सबसे बड़ा केन्द्र कानपुर है। इसी तरह जेब काटने के धंधे के लिए गाजियाबाद एक बड़े प्रशिक्षण केन्द्र के तौर पर उभरा है। ड्रग्स की सप्लाई या तस्करी के काम के लिए जिस प्रशिक्षण की जरूरत होती हैए उसे उपलब्ध कराने वाला सबसे बड़ा केन्द्र मुम्बई है। इधरए चाइल्ड पोनरेग्राफी के रूप में बच्चों के खिलाफ अपराध का एक नया बाजार तैयार हुआ है। पिछले चार.पांच वर्षों में इस अपराध में काफी उछाल आया है। यह एक प्रकार का सायलेंट क्राइम है जिसे हम साइबर क्राइम के अंतर्गत रख सकते हैं। इसकी तरफ मां.बाप काए एनजीओ का और पुलिस का भी ध्यान बहुत कम है। अगर इन पर ध्यान दिया जाए तो अपराध के आंकड़ों में जबरदस्त उछाल आ जाएगा। स्कूलों में शिक्षकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की भी एक नई प्रवृत्ति इधर बड़े पैमाने पर देखने में आ रही है जिसे देखते हुए स्कूलों के नियम. कानूनों में भी बदलाव लाने की जरूरत सामने आई है।

उकसाने वाले दो कारक

बच्चों के खिलाफ अपराध को उकसाने वाले कारकों को हम दो भागों में बांट कर समझ सकते हैं पुश फैक्टर और पुल फैक्टर। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तबाही कृषि में गिरावटए अशिक्षा और गरीबी को हम पुश फैक्टर के तौर पर समझ सकते हैं जबकि पुल फैक्टर में शहरी चमक.दमक या आकर्षण फिल्मों के मायालोक और संगठित गिरोहों के पल्रोभनों को रखा जा सकता है। बच्चों के उत्पीड़न को देखने के नजरिये में आज दुनिया के पैमाने पर काफी परिवर्तन आया है पर हमारे देश में बच्चों के हित में काम करने वाली मशीनरी आज भी पुराने र्ढे पर ही काम कर रही है। जहां तक पुलिस के नजरिये की बात है तो वह पूरी तरह भारतीय दण्ड संहिता से बंधी हुई है और इसलिए वह केवल पेनिट्रेटिव सेक्स को ही यौन हिंसा मानती है जबकि आज परिदृश्य काफी बदल गया है। 1992 में संयुक्त राष्ट्र समझौते का अनुमोदन करने के बाद भारत को अब वही नीति लागू करनी होगी जो संधि में दी गई है। इसके अनुसार किसी भी उम्र में बच्चे का यदि किसी वयस्क द्वारा अपनी यौन संतुष्टि के लिए किसी भी तरह से उपयोग किया जाता है तो ऐसा करना यौन उत्पीड़न के दायरे में आएगा। उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करनाए उसे गंदी तस्वीरें या फिल्में आदि दिखा कर उत्तेजित करना भी यौन उत्पीड़न के अंतर्गत ही माना जाएगा। आज हमें अपने कानूनों को इसी हिसाब से पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। सरकार भी इसे मानती है। हमें इस मुद्दे पर एक सामाजिक जागरूकता लाने के लिए भी काम करना होगा।

अपराध की भेंट चढ़ता देश का बचपन ;बाल अपराध 

नेशनल क्राइम रिकॉड्‌र्स ब्यूरो के नवीनतम आंकड़े देश के भविष्य की ख़ौ़फनाक तस्वीर पेश करते हैं उनके मुताबिक़ पूरे देश में अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि बाल अपराधों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है पिछले दस वर्षों यानी 1998.2008 के बीच बच्चों द्वारा किए गए अपराधों में ढाई गुना इज़ा़फा हुआ है और कुल अपराधों की तुलना में बाल अपराधों का अनुपात भी दोगुने से ज़्यादा हो चुका है ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसारए साल 1998 में बाल अपराधों की कुल संख्या 9352 थी जो 2008 में बढ़कर 24ए 535 हो गई देश भर में दर्ज किए गए कुल आपराधिक मामलों के प्रतिशत के लिहाज़ से देखें तो 1998 में बाल अपराधों का प्रतिशत केवल 0.5 थाए जो 2008 में 1. 2 प्रतिशत के आंकड़े को छू चुका हैण् यदि लगातार दो वर्षों के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2007 में बच्चों द्वारा किए गए कुल अपराधों की संख्या 22ए 865 थीए जो 2008 में बढ़कर 24ए 535 हो गई यानी एक साल के अंदर बाल अपराधों की संख्या में तक़रीबन 7.3 प्रतिशत की वृद्धि हो गई इससे पहले वर्ष 2007 में 2006 के मुक़ाबले बाल अपराधों की संख्या में 8.4 प्रतिशत का इज़ा़फा दर्ज किया गया थाण् ये तो केवल वे आंकड़े हैंए जो पुलिस थानों में दर्ज किए गए हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है कि अपराध के लगभग आधे मामले पुलिस के पास नहीं पहुंच पाते या पहुंचते भी हैं तो उन्हें दर्ज नहीं किया जाता इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि इन आंकड़ों पर ग़ौर करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश का बचपन लगातार अपराध की आगोश में समाता जा रहा है

सफेद हाथी बने विभिन्न राष्ट्रीय आयोग 

देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों की हिफाजतए देखभालए विकास और शिक्षा की गारंटी देता है। बाल मजदूरीए बंधुआ मजदूरी शिक्षा और बाल अधिकारों से सम्बंधित अनेक कानून बने हुए हैं। किंतु इन पर अमल करने की किसी की भी जवाबदेही नहीं है। बाल अधिकारों की रक्षा के लिए राष्ट्रीय व राज्य आयोग बनाए गए हैं। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि ढिंढोरा पीटने वाले राष्ट्रीय आयोग को पिछले साल भर में देश भर से बच्चों के उत्पीड़न की कुल 75 शिकायतें ही मिली। इनमें से दिल्ली से 13 और उप्र से 6 शिकायतें थीं। इनमें भी ज्यादातर शिकायतें स्कूली छात्रों के साथ हुई मारपीट की थीं। सफेद हाथी बने इन आयोगों से भला कौन पूछे कि इतने भारी भरकम बजट की कीमत पर इन्होंने कितने बच्चों को उत्पीड़न से बचाया हमारी जानकारी में तो एक भी बच्चे को बंधुआ मजदूरी से छुटकारा दिलाकर पुनर्वासित करने की कोई घटना नहीं है। न ही बलात्कारए अपाहिज बनाकर जबरिया भीख मंगवानेए बाल वेश्यावृत्ति की किसी घटना पर उनका ध्यान जाता हैए इंसाफ दिलाना तो दूर की बात है।

संविधान और अंतरराष्ट्रीय संधि


बच्चों के अधिकारों से सम्बंधित अन्तरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने के साथ.साथ हम अपने देश के संविधान द्वारा बच्चों से किए गए उन वादों के लिए भी जवाबदेह हैं जो उन्हें स्वस्थ और सम्मानपूर्ण हालात में विकास करने का सम्पूर्ण अवसर देने के लिए किए गए थे। लेकिन आज स्थिति यह है कि बच्चों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। हम हर अन्तरराष्ट्रीय संधि पत्र पर हस्ताक्षर तो कर देते हैं पर बदकिस्मती से जमीनी स्तर पर उसे लागू करने का प्रयास ही नहीं करते। गरीबी और अशिक्षा इसके लिए दो सबसे बड़े उत्पादक कारक हैं। इन्हीं कारणों से जमीनी स्तर पर कोई कार्यवाही शुरू नहीं हो पाती। बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए बजट में जो प्रावधान होने चाहिए वह आज भी उपलब्ध नहीं कराया गया है। हमारे पास जरूरतमंद बच्चों के पुनर्वास के लिए आश्रय तक नहीं हैं। जो हैं वे अपराधी बच्चों के सुधार गृह हैं। मजबूरी में हम मासूम बच्चों को भी अपराधी या आरोपित बच्चों के साथ रखते हैं। यह असंवेदनशीलता धड़ल्ले से बरती जा रही है। पुनर्वास व्यवस्था की कमी के चलते ही हम फुटपाथों पर बच्चों को भीख मांगते देखते हैं पर कुछ हस्तक्षेप नहीं कर पाते। हमारे देश की पुलिस की मानसिकता आज भी औपनिवेशिक दौर में है जबकि बच्चों के मामले में पुलिस से ज्यादा मानवीय और संवेदनशील रवैया रखने की अपेक्षा होती है। पुलिस के प्रशिक्षण पर आज विशेष ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

समस्या के त्रि. आयाम

बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराध की समस्या को हमें तीन तरह से देखना होगा। एक तो हमारे देश में एक दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है जिसके तहत बच्चों का पुनर्वास एक लम्बी प्रक्रिया में किया जा सके। बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए अब तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया जा सका है। जिन पाश्चात्य देशों की तर्ज पर हमने अपने रिमांड होम्स बनाए हैंए उन्होंने अपने यहां उन्हें पूरी तरह बदल लिया है पर हम किसी किस्म के बदलाव की दिशा में नहीं सोच रहे। देश के सुधार.गृहों पर सरकार को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए ताकि देश की जनता उनकी वास्तविक स्थिति का पता चल सके। सरकार ने मुश्किल परिस्थितियों में फंसे बच्चों की हिफाजत और उनके पुनर्वास के लिए बाल कल्याण समितियों की स्थापना तो कर दी पर उन्हें बिल्कुल अक्षम बना कर रखा है। इन समितियों में जहां प्रतिबद्ध और जानकार लोगों की जरूरत थीए वहां आज केवल राजनीतिक सम्पकरे की वजह से ही उनमें लोग रखे जा रहे हैं और इसका खमियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। इस व्यवस्था में बच्चों के लिए नियुक्त ज्यूडिशियरी काम के बोझ से इतनी दबी हुई होती है कि वह बच्चों की जरूरतों को समझ ही नहीं पाती।

नोडल एजेंसी की जरूरत

देश के पुलिस थानों की तरह वे भी सीमा विवाद में उलझे रहते हैं और इस कारण समय पर बच्चों को समुचित मदद नहीं मिल पाती। जरूरत इस बात की है कि बच्चों के सम्पूर्ण विकास और उनके संरक्षण के लिए एक ही नोडल एजेंसी हो तथा इस मकसद के लिए आम नागरिकों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। वर्तमान कानूनों की वजह से अक्सर आम नागरिक बच्चों की मदद करने से घबराते हैं। बच्चों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम में बाल सुरक्षा आयोग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो सकती थी पर चूंकि उसके पास कोई न्यायिक अधिकार नहीं है इसलिए वह भी प्रभावकारी हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा। वह अभी एक सलाहकार समिति भर है। इतने सीमित संसाधनों के होते हुए वह कोई योगदान कर पाएगा ऐसा सोचना बेवकूफी ही होगी। जब तक इसे भी एससीएसटी आयोग की तरह प्रभावकारी बनाने के लिए संसद द्वारा पारित नहीं किया जाएगाए यह कोई भी प्रभावकारी भूमिका निभाने में सक्षम नहीं हो सकेगा। पर यह सब करने के लिए बच्चों के प्रति एक जिम्मेदारी का अहसास और कुछ बदलाव लाने की इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। फिलहाल तो ये दोनों ही चीजें दृश्यपटल से ओझल हैं।

01 February 2013

क्या अन्ना की नयी पारी इस बार सफ़ल होगी ?

अन्ना हजारे अपनी नई टीम के साथ एक बार फिर से भ्रश्टाचार के खिलाफ पटना के गांधी मैदान में बिगुल  फूंका है। अन्ना अपने जिस मकषद से भ्रश्टाचार मिटाने के लिए देषवासीयों में पहली बार ऐसा अलख जगाया था उसने देष की सत्त्ता को झकझोर कर रख दिया। जे पी आंदोलन के तरह चाहे आम हो या खास हर कोई अन्ना के आंदोलन में कूद पड़ा। सरकार को इस जन आंदोलन के आगे झुकना पड़ा, आखिरकार सरकार ने संसद में जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव पारित किया। भ्रश्टाचार विरोधी आंदोलन के इस प्रभावी अध्याय से देषवासियों में एक नई उमीद जगी। इस आंदोलन को आजादी की दुसरी लड़ाई मान कर लोगों ने पूरे दिल अन्ना को समर्थन किया। मगर इस लड़ाई में कुछ ऐसे लोग भी षामील हुए जिनका अंदरूनी मकसद था जन आंदोलन के रास्ते सत्ता की रास्ते को तय करना। अन्न ऐसे विचारों के पूरजोर विरोधी थे। अन्ना नहीं चाहते थे की कभी भी राजनीतिक लाभ इस आंदोलन को मिले। और यही से सुरू हुआ मदभेदों का दौर। अग्निवेश तो पहले ही टीम से बाहर हो चुके थे अग्निवेश अन्ना को “पागल हाथी” कह रहे थे। 

अरविंद केजरीवाल और मनीश सिसोदिया जैसे लोग एक ओर अन्ना पर राजनीतिक दल बनाने के लिए दबाव डाल रहे थे तो वही दुसरी ओर कुछ सदस्य सरकार से दो- दो हाथ करने में लगें हुए थे।  शांतिभूषण और प्रशांत भूषण ने अन्ना से अलग विचार प्रकट करने शुरू कर किए, प्रशांत भूषण ने कश्मीर पर ऐसा बयान दिया कि खुद अन्ना भी शर्मसार हो गए। किरण बेदी पर भी अतिरिक्त विमान किराया वसूलने का आरोप लगा। इन सब ने टीम अन्ना को अंदर से खोखला कर दिया। कहते हैं जब घर का भेदी ही बाहर खबरें पहुंचाए तो लंका जलनी पक्की है। इस बार भी अन्न की नई टीम में कुछ गलत तत्व षामील हो चुके है जो आने वाले दिनों में अन्ना की मुष्किलों को और बढ़ा सकते है। जिससे अन्ना की भ्रश्टाचार विरोधी आंदोलन को एक बार फिर से घक्का लग सकता है। रास्ते अलग-अलग हों पर यदि मंजिल एक है तो इस बात की सम्भावनाएं ज्यादा होती हैं कि दो अलग-अलग रास्तों पर चलने वाले व्यक्तियों के हितों के बीच में टकराव हो। इस बार भी कुछ ऐसी ही संभावना नजर आ रही है। तो ऐसे में एक सवाल और प्रबल हो जाता है की क्या इस बार अन्ना की नई पारी सफल होगी।

11 January 2013

क्या पाकिस्तान को माकूल जवाब देने का वक्त आगया है ?

क्या पाकिस्तान कभी भारत का मुकाबला कर सकता था। हकीकत तो ये है कि पाकिस्तान में कभी भारत के खिलाफ जंग छेड़ने की ताकत ही नहीं थी। इसलिए तो वो कश्मीर में आतंकियों के घुसपैठ का तरीका अपनाता है। क्या है हमारी ताकत और कितना कमजोर है हमसे पाकिस्तान। जब भी भारत की सैन्य ताकत की बात होती है तो मुकाबला चीन से ही होता है न कि पाकिस्तान से। फिर भीपाकिस्तान हमेशा से खुद की तुलना भारत से करता आया है। अपने इन दोनों पड़ोसियों से हमारे रिश्तों की हकीकत हर कोई जानता है और दोनों दुश्मनों के आपसी रिश्तों को भी जानता है। थल सेना की बात करें तो भारत के पास 13 लाख सैनिक हैं जबकि पाकिस्तान के पास 10 लाख थल सैनिक हैं। भारतीय वायुसेना के बेड़े में दुनिया की सबसे बेहतरीन जहाज मौजूद हैं। भारत के पास करीब 1000 लड़ाकू विमान हैं। जिनमें सुखोई, मिराज, मिग-29, मिग-27, मिग-21 और जगुआर शामिल हैं। पाकिस्तान के पास सिर्फ 500 लड़ाकू विमान हैं। जिनमें चीनी एफ-7, अमेरिकी एफ-16 और मिराज शामिल है। मिसाइलों की बात करें तो भारतीय सेना के बेड़े में सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस, अग्नि, पृथ्वी, आकाश और नाग जैसे मिसाइल हैं। पाकिस्तान की बात करें तो उसके पास गौरी, शाहीन, गजनवी, हत्फ और बाबर जैसे मिसाइलें हैं। ब्रह्मोस की तकनीक सबसे आधुनिक है और इसे 5 मिनट में दागने के लिए तैयार किया जा सकता है। वहीं भारत के पास 27 युद्धपोत हैं, जबकि पाकिस्तान के पास सिर्फ 11 युद्धपोत हैं। वहीं परमाणु हथियारों की बात करें तो भारत के पास 50 से 90 परमाणु हथियार हैं।

पाक सेना के पास 50 से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। इधर भारतीय सरकार बलात्कारियों से निपटने में, बलात्कार और महिला हिंसा के विरोध में सड़कों पर उतरने वालों को सबक सिखाने में, तमाम सारे लोगों की बयानबाजियों पर तर्क-कुतर्क करने में, अपने भ्रष्ट से भ्रष्टतम मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को बचाने में, क्रिकेट के द्वारा रिश्तों की कटुता को समाप्त करने में लगी हुई है। ऐसा लग रहा है जैसे उसके पास देश की, समाज की, नागरिकों की कोई चिन्ता नहीं..इसी के साथ ऐसा भी लगा कि सरकार को देश की सुरक्षा की भी चिन्ता नहीं। यह इस कारण समझ में आ रहा है कि वह देश के अन्दर के दहशतगर्दों से तो निपटने में घनघोर रूप से नाकाम रही है इसके साथ ही वह अपने चिरपरिचित दुश्मन पड़ोसी की चालों से निपटने में भी नाकाम रही है। पाकिस्तान ने अपनी औकात दिखाते हुए सीमा पर हमला किया और अपनी कमीनी हरकत दिखा दी। लगातार मिलते समाचारों से ज्ञात हुआ कि पाकिस्तानी सेना ने न सिर्फ हमला किया, न सिर्फ हमारे जवानों को मारा बल्कि निहायत घटिया हरकत दिखाते हुए एक जवान का सिर काटकर ले गये। ऐसी घिनौनी हरकत की अपेक्षा पाकिस्तानी सेना से ही की जा सकती है। यह इस कारण से और भी क्षोभकारी है कि एक ओर हमारी सरकार बात-बात पर पाकिस्तान के प्रति अपना प्रेम दर्शाने में नहीं चूकती हैय भारत का दाना-पानी खाते तथाकथित बुद्धिजीवी जो पाकिस्तान से दोस्ती बनाये रखने के लिए आये दिन मोमबत्तियां जलाकर खड़े हो जाते हैंय हमारे तमाम सारे कथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता तुष्टिकरण के चलते सोते-जागते पाकिस्तान-पाकिस्तान का राग अलापते रहते हैं और वहीं दूसरी ओर अपनी जात-औकात से, अपने जन्म से ही हरामखोरी दिखाने वाला पाकिस्तान खुलेआम हम पर हमला करने से नहीं चूकता है।

अभी कुछ दिनों पूर्व ही उनके आला मंत्री ने आकर अपनी बदजुबानी दिखाई और उसका प्रत्युत्तर देने के बजाय हमारी सरकार चूडि़यां पहन कर बैठी रही। उनकी इस सरकारी बदजुबानी और हमारी सरकारी नपुंसकता का ही दुष्परिणाम यह रहा कि पाकिस्तानी सैनिकों ने मौका ताक कर हमारे सैनिकों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार कर दिया। यह बात हमारे पूरे देश को, पाकिस्तान-प्रेम दर्शाते लोगों को और समूचे पाकिस्तान को भी बहुत अच्छी तरह से पता है कि हमारी सेना ने एक बार अपनी ताकत का एक बहुत छोटा सा प्रदर्शन कर दिया तो पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जायेगा। इतना मालूम होने के बाद भी पाकिस्तान की ओर से, हमारी सरकार की ओर से, तथाकथित पाकिस्तान-प्रेम दर्शाते भारतीयों की ओर से भाईचारे की, दोस्ती की, रिश्तों को सुधारने की नौटंकी होती रहती है। अभी-अभी ही हमारे देश ने रिश्तों को सुधारने के लिए उनके साथ ‘सुर-संग्राम’ सरीखा गायकी का राग आलापा थाय हमारे और उनके रुपया पसंद क्रिकेट खिलाडि़यों ने क्रिकेट खेलकर औपचारिकता का निर्वाह किया था, अब वे सब जाकर अपनी उस दोगले व्यवहार वाली पाकिस्तानी सरकार को, चिरकुट हरकतें करके हमारे सैनिकों को मौत बांटने वाली पाकिस्तानी सेना को दोस्ती, रिश्ते, भाईचारे की सही-सही परिभाषा समझायें।

अब कम से कम इस देश के लोगों को जागरूक होना होगा, अति-जागरूक होना होगा और सरकार की, तथाकथित पाकिस्तान पसंद बुद्धिजीवियों की, मुस्लिम तुष्टिकरण वाले राजनेताओं की उन तमाम हरकतों का विरोध करना होगा जो सिर्फ और सिर्फ अपनी-अपनी रोटियां सेंकने के लिए पाकिस्तान के साथ सम्बन्ध मधुर बनाये रखने की वकालत करते रहते हैं। यदि हम ऐसा नहीं कर पाये तो आये दिन हमें पाकिस्तान की ओर कभी संसद पर, कभी किसी शहर पर तो कभी सीमा पर ऐसे हमलों को सहना पड़ेगा और हमारे अनेक परिवारों को आंसू बहाना होगा। अभी भी शायद बातचीत से कोई रास्ता निकल जाए इसी आशा में भारत लगा हुआ है। पाकिस्तान द्वारा किए गए इतने बर्बर व्यवहार के बाद भी उससे यह आस लगा बैठना कि वो बात कर मामले को सुधार लेगा क्या यह उम्मीद बेकार नहीं लगती है? जिस प्रकार से पाकिस्तान बार-बार अपने किए किए गए वायदे से पीछे हट रहा है उसको देख कर यह मानना बहुत मुश्किल है कि शांति बनाए रखने के मामले में वह भारत का साथ देगा। अपनी आदत से मजबूर पाकिस्तान शांति के क्षेत्र में कोई कार्यवाही करना ही नहीं चाहता है। कुछ दिन पहले हुई घटना के बाद भी इस तरह की आशा रखना बेकार ही सबित होगा। इस तरह की घटनाएं जो बार-बार हो रही हैं क्या उन पर उतना ध्यान न देकर कोई देश की राजनीति और यहां के राजनेता पर विश्वास कर सकता है? यहां के लोगों की यह अवस्था है जो कुछ कर नहीं सकते हैं और किसी ना किसी रूप में अपने बच्चों को गोली का शिकार होते देखते रहते हैं. अपनी आंखों के सामने इन बर्बादियों का मंजर किसको अच्छा लगता होगा? अपने ओज का परित्याग कर चुके भारतीय राजनीति से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वो आने वाले समय में देशवासियों की रक्षा आतंकवाद से कर सकेगी? संवेदनहीनता को कैसे और कब तक बर्दाश्त करना होगा इसका कोई लेखा-जोखा नहीं है और ना ही कोई कभी इस सियासत से यह उम्मीद कर सकता है। ऐसे में कह सकते है की पाकिस्तान को माकूल जवाब देने का वक्त आ गया है।

10 January 2013

ओवैसी का साम्राज्य और साम्प्रदायिकता की बोल से सत्ता का सफ़र

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन लगभग 80 वर्ष पुराना संगठन है जिसकी शुरुआत एक धार्मिक और सामाजिक संस्था के रूप में हुई थी लेकिन बाद में वो एक ऐसी राजनैतिक शक्ति बन गई जिस का नाम हैदराबाद के इतिहास का एक अटूट हिस्सा बन गया है। गत पांच दशकों में मजलिस और उसे चलने वाले ओवैसी परिवार की शक्ति रफ्ता रफ्ता इतनी बड़ी है कि हैदराबाद पर पूरी तरह उसी का नियंत्रण है. विधान सभा में उस के सदस्यों की संख्या बढ़ कर 7 हो गई है, विधान परिषद में उस के दो सदस्य हैं. हैदराबाद लोक सभा की सीट पर 1984 से उसी का कब्जा है और इस समय हैदराबाद के मेयर भी इसी पार्टी के है। मजलिस को आम तौर पर मुस्लिम राजनैतिक संगठन या मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है और है दराबाद के मुसलमान बड़ी हद तक इसी पार्टी का समर्थन करते रहे हैं हालांकि खुद समुदाय के अन्दर से समय समय पर उस के विरुद्ध आवाजें भी उठती रही है। जहाँ तक ओवैसी परिवार का सवाल है उस के हाथ में पार्टी की बागडोर उस समय आई जब 1957 में इस संगठन पर से प्रतिबंध हटाया गया। मजलिस के इतिहास को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। 1928 में नवाब महमूद नवाब खान के हाथों स्थापना से लेकर 1948 तक जबकि यह संगठन हैदराबाद को एक अलग मुस्लिम राज्य बनाए रखने की वकालत करता था. उस पर 1948 में हैदराबाद राज्य के भारत में विलय के बाद भारत सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया था, और दूसरा भाग जो 1957 में इस पार्टी की बहाली के बाद शुरू हुआ जब उस ने अपने नाम में ऑल इंडिया जोड़ा और साथ ही अपने संविधान को बदला. कासिम राजवी ने, जो हैदराबाद राज्य के विरुद्ध भारत सरकार की कारवाई के समय मजलिस के अध्यक्ष थे और गिरफ्तार कर लिए गए थे, पाकिस्तान चले जाने से पहले इस पार्टी की बागडोर उस समय के एक मशहूर वकील अब्दुल वहाद ओवैसी के हवाले कर गए थे। उसके बाद से यह पार्टी इसी परिवार के हाथ में रही है! अब्दुल वाहेद के बाद सलाहुद्दीन ओवैसी उसके अध्यक्ष बने और अब उनके पुत्र असदुद्दीन ओवैसी उस के अध्यक्ष और सांसद हैं जब उनके छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी विधान सभा में पार्टी के नेता हैं। असदुद्दीन ओवैसी, मजलिस के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद हैं।

इस परिवार और मजलिस के नेताओं पर यह आरोप लगते रहे हैं की वो अपने भड़काऊ भाषणों से हैदराबाद में साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ावा देते रहे हैं। लेकिन दूसरी और मजलिस के समर्थक उसे भारतीय जनता पार्टी और दूसरे हिन्दू संगठनों का जवाब देने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं। राजनैतिक शक्ति के साथ साथ ओवैसी परिवार के साधन और संपत्ति में भी जबरदस्त वृद्धि हुई है जिसमें एक मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज, कई दूसरे कालेज और दो अस्पताल भी शामिल हैं। एइएमइएम ने अपनी पहली चुनावी जीत 1960 में दर्ज की जब की सलाहुद्दीन ओवैसी हैदराबाद नगर पालिका के लिए चुने गए और फिर दो वर्ष बाद वो विधान सभा के सदस्य बने तब से मजलिस की शक्ति लगातार बढती गई। बढ़ती हुई लोकप्रियता के साथ साथ सलाहुद्दीन ओवैसी सलार-ए-मिल्लत के नाम से मशहूर हुए. वर्ष 1984 में वो पहली बार हैदराबाद से लोक सभा के लिए चुने गए साथ ही विधान सभा में भी उस के सदस्यों की संख्या बढती गई हालाँकि कई बार इस पार्टी पर एक सांप्रदायिक दल होने के आरोप लगे लेकिन आंध्र प्रदेश की बड़ी राजनैतिक पार्टिया कांग्रेस और तेलुगुदेसम दोनों ने अलग अलग समय पर उससे गठबंधन बनाए रखा। दिलचस्प बात यह है की हैदराबाद नगरपालिका में यह गठबंधन अभी भी जारी है और कांग्रेस के समर्थन से ही मजलिस को मेयर का पद मिला है। 2009 के चुनाव में एइएमइएम ने विधान सभा की सात सीटें जीतीं जो की उसे अपने इतिहास में मिलने वाली सब से ज्यादा सीटें थीं. कांग्रेस के साथ उस की लगभग 12 वर्ष से चली आ रही दोस्ती में दो महीने पहले उस समय अचानक दरार पड़ गई जब चारमीनार के निकट एक मंदिर के निर्माण के विषय ने एक विस्फोटक मोड़ ले लिया। मजलिस ने कांग्रेस सरकार पर मुस्लिम-विरोधी नीतियां अपनाने का आरोप लगाया और उस से अपना समर्थन वापस ले लिया. अकबरुद्दीन ओवैसी के तथाकथित भाषण को लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ है और जिस तरह उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज गया है उसे कांग्रेस और मजलिस के टकराव के परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। अधिकतर हैदराबाद तक सीमित मजलिस अब अपना प्रभाव आंध्र प्रदेश के दूसरे जिलों और पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और कर्नाटक तक फैलाने की कोशिश कर रही है। हाल ही में उस ने महाराष्ट्र के नांदेड़ नगर पालिका में 11 सीटें जीत कर हलचल मचा दी है। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस इस संभावना से परेशान है कि 2014 के चुनाव में एइएमइएम जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के साथ हाथ मिला सकती है। यही कारण है की कांगेस गिरफ्तारी को लेकर इतनी देरी कर रही थी। अकबरुद्दीन ओवैसी की गिरफ्तारी के बाद तो मजलिस और कांग्रेस के बीच किसी समझौते की सम्भावना नहीं रह गई।

06 January 2013

भारत में छोटा पाकिस्तान और दाउद नगर शर्म या सियासत

यह बात सोलह आने सच है कि भारत में छोटा पाकिस्तान और लादेन नगर नाम की बस्तियां भी मौजूद हैं। इस बात का सबूत हैं इन इलाकों के बिजली बिल। लेकिन इस सब में यहां के लोगों का कोई दोष नहीं है। सरकारी कागजात में ही इन जगहों के नाम ऐसे रखे गए हैं। मुंबई के नाला सोपारा की झुग्गियों में बसीं दो बस्तियों को ये नाम दिए गए हैं। जब मामाला मीडिया में आया तो राज्य सरकार इसकी जांच कराने और दोषियों को दंडित करने की बात कह रही है। पुलिस ने इन बस्तियों के ये नाम दिए और सरकारी बिजली कंपनी ने उसी नाम से बिजली बिल भेजकर आधिकारिक रूप से इस नामाकरण पर मुहर लगा दी। राज्य की पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी यानी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रिब्यूशन कम्पनी में इन बस्तियों को इसी नाम से जाना भी जाता है। यह मामला तब सामने आया जब आधार कार्ड के रजिस्ट्रेशन के लिए रेजिडेंस प्रूफ के तौर पर यहां के लोगों ने अपने बिजली के बिल जमा करवाए। इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। इलाके के लोग इस बात से आहत हैं कि उनका नाम पाकिस्तान और अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के साथ जोड़ा जा रहा है। बताया गया कि इस इलाके का असली नाम लक्ष्मी नगर है। स्थानीय लोगों ने शिकायत की है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद किसी भी सरकारी अधिकारी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। उनका आरोप है कि इस घपले की जानकारी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को थी लेकिन वहां के अधिकारियों ने इसे ऐसे ही जाने दिया। जब जांच की गई तो सामने आया कि संतोष नगर और पश्चिमी एक्सप्रेस हाइवे के बीच की इस जगह पर कुछ समय पहले यहां के लोकल बिल्डर माफिया और पुलिस के बीच काफी टेंशन चल रही थी। उसी दौरान पुलिस ने इस इलाके का नाम छोटा पाकिस्तान रख दिया और यह नाम प्रचलन में आ गया। स्थानीय कॉर्पोरेटर छाया पाटिल ने यह मुद्दा उठाया। तब यह बात डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और राज्य बिजली विभाग के संज्ञान में लाई गई। इसी बीच राज्य अल्पसंख्यक समुदाय ने बिजली विभाग को बिलों पर हुई इस गंभीर चूक की जांच करने की ताकीद की है। राज्य के पावर मिनिस्टर अजीत पाटिल ने इस मामले में जांच के बाद ऐक्शन लेने का वादा किया है। पुलिस ने इन बस्तियों के ये नाम दिए और सरकारी बिजली कंपनी ने उसी नाम से बिजली बिल भेजकर आधिकारिक रूप से इस नामाकरण पर मुहर लगा दी। राज्य की पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनी यानी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रिब्यूशन कम्पनी में इन बस्तियों को इसी नाम से जाना भी जाता है। यह मामला तब सामने आया जब आधार कार्ड के रजिस्ट्रेशन के लिए रेजिडेंस प्रूफ के तौर पर यहां के लोगों ने अपने बिजली के बिल जमा करवाए। इन बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। इलाके के लोग इस बात से आहत हैं कि उनका नाम पाकिस्तान और अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन के साथ जोड़ा जा रहा है। बताया गया कि इस इलाके का असली नाम लक्ष्मी नगर है। स्थानीय लोगों ने शिकायत की है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद किसी भी सरकारी अधिकारी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। उनका आरोप है कि इस घपले की जानकारी महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को थी लेकिन वहां के अधिकारियों ने इसे ऐसे ही जाने दिया। जब जांच की गई तो सामने आया कि संतोष नगर और पश्चिमी एक्सप्रेस हाइवे के बीच की इस जगह पर कुछ समय पहले यहां के लोकल बिल्डर माफिया और पुलिस के बीच काफी टेंशन चल रही थी। उसी दौरान पुलिस ने इस इलाके का नाम छोटा पाकिस्तान रख दिया और यह नाम प्रचलन में आ गया। स्थानीय कॉर्पोरेटर छाया पाटिल ने यह मुद्दा उठाया। तब यह बात डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और राज्य बिजली विभाग के संज्ञान में लाई गई। इसी बीच राज्य अल्पसंख्यक समुदाय ने बिजली विभाग को बिलों पर हुई इस गंभीर चूक की जांच करने की ताकीद की है। राज्य के पावर मिनिस्टर अजीत पाटिल ने इस मामले में जांच के बाद ऐक्शन लेने का वादा किया है।

मिया दाद को भारत में यात्रा की अनुमति देना कितना सही ?

भारत के दुश्मन दाउद इब्राहिम के समधी जावेद मियांदाद को भारत दौरे पर वीजा देने का मामला तूल पकड़ रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने मियांदाद को वीजा देने का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो जावेद मियांदाद शुरु से ही भारतीय टीम के सबसे बड़ा सरदर्द रहे हैं। भारत के खिलाफ खेले गए 35 वन डे मैचो में उन्होंने 51 की औसत से 1175 रन बनाए ।वन डे में उन्होंने भारत के खिलाफ 3 शतक और 6 अर्धशतक लगाए हैं। उनकी 119 रनों की सर्वश्रेष्ठ पारी भारत के खिलाफ ही रही है जो उन्होंने 77 गेंदो पर बनाई थी। हालांकि यह मैच पाकिस्तान हार गया था पर इस पारी में मियांदाद ने भारतीय गेंदबाजो की बहुत धुनाई करी थी। मियांदाद को टीम इंडिया आखिर तक आउट नहीं कर पायी थी। यही नहीं टेस्ट में तो उन्होंने टीम इंडिया की खूब मिट्टी पलीद करी है। मियांदाद ने भारत के खिलाफ खेले गए 28 मैचों में  2228 रन बनाए हैं। इससे पता चलता है कि भारतीय बॉलिंग एटैक मियांदाद को कितना भाता था। टेस्ट मैचों में भारत के खिलाफ मियांदाद ने 67 की औसत से रन बनाए हैं। इसमें 280 रनों की नाबाद पारी में उन्होंने भारतीय टीम को अपने विकेट के लिए तरसा दिया पर उन्हें विकेट नहीं मिला। उन्होंने भारत के खिलाफ 14 अर्धशतक और पांच शतक बनाए हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच  1986 में शारजाह में खेले गए ऑस्ट्रेलिया कप के फाइनल को शायद ही कोई भारतीय फैन भुला पाएगा। इस मैच में पाकिस्तान कहीं से कहीं तक मैच जीतने की स्थिती में नहीं था। पहले बल्लेबाजी करते हूए भारत ने सुनील गावस्कर की 92 रनों की पारी की बदौलत भारतीय टीम ने 7 विकेट के नुकसान पर 245 रनों का लक्ष्य रखा। जवाब में पाकिस्तान की टीम लगातार अंतराल पर विकेट गंवाती रही। अंतिम 10 ओवर में पाकिस्तान को जीतने के लिए 90 रन चाहिए थे। वहीं आखिरी ओवर में पाकिस्तान को 11 रनों की दरकार थी। इस ओवर ने भारत और पाकिस्तान क्रिकेट की सूरत ही बदल कर रख डाली। आखिरी बॉल पर पाकिस्तान को जीतने के लिए चार रन चाहिए थे। चेतन शर्मा की एक फुल टॉस गेंद को मियांदाद ने सीमा रेखा पार करवा दिया। मैच के साथ ही पाकिस्तान ने ऑस्ट्रेलिया कप भी जीत लिया। इस जीत के बाद मियांदाद पाकिस्तान के लिए नेशनल हीरो बन गए। लगभग एक दशक तक पाकिस्तान क्रिकेट का भारतीय क्रिकेट का दबदबा रहा। मियांदाद की भारतीय क्रिकेट टीम से मैदान पर काफी नोक झोंक भी हुई है। 1992 में किरन मोरे और मियांदाद के बीच हुई कहा सुनी को कौन भूल सकता है। पाकिस्तान की पारी के दौरान किरन मोरे की अपील से जावेद मियांदाद काफी चिढ़ गए। उन्होंने गेंदबाज को बीच में ही रोककर मोरे से बार बार अपील बंद करने को कहा। मोरे और मियांदाद की कहा सुनी के बाद मैच वापस शुरु हो गया। कुछ गेंदो बाद मियांदाद ने रन लेकर किरन मोरे की तरह कूद कर बताया। मियांदाद के इस मखौल की चर्चा काफी मशुहूर हूई। जावेद मियांदाद ने भारत को क्रिकेट छोड़ने के बाद भी नहीं बक्शा।  कोच बनकर उन्होंने हर भारतीय खिलाड़ी के विरुद्ध खास रणनीति बनायी। उस वक्त कप्तान वसीम अकरम की अगुवाई में पाक टीम ने भारत में एशियन टेस्ट चैंपयिनशिप जीती और भारत को वन डे सीरीज भी हराई। पाकिस्तानी टीम की सफलता में मियांदाद का एक बड़ा हाथ था। जावेद मियांदाद के दो लड़को के पिता है। उनके बेटे जुनैद खान की शादी माहरुख इब्राहिम के साथ हुई। माहरुख इब्राहिम, दाउद इब्राहिम की बेटी है जो एक अंडर वर्लड डॉन है। दाउद इब्राहिम 1992 के मुम्बई में हुए बम विस्फोट का मुख्य आरोपी है। विदेश मंत्री खुर्शीद ने मियांदाद को वीजा देने के फैसले का बचाव करते हुए कहा है कि ये फैसला गृह मंत्रालय का है। सुरक्षा एजेंसियों से राय-मश्विरा के बाद ही वीजा देने का फैसला लिया गया। जबकि कांग्रेस के भीतर ही इस मसले पर विरोध के स्वर उठने लगे हैं। जावेद मियांदाद को भारत-पाकिस्तान वनडे मैच देखने के लिए वीजा दिए जाने पर कांग्रेस नेता जगदंबिका पाल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जगदंबिका पाल के मुताबिक जावेद मियांदाद मोस्ट वांटेड आतंकी दाऊद इब्राहिम के समधी हैं और दाऊद के समधी जावेद मियांदाद को भारत का वीजा देना उचित नहीं है। पहले से ही पाकिस्तानी टीम के दौरे का विरोध कर रही शिवसेना ने कहा है कि मियांदाद को वीजा देना दाऊद को वीजा देना जैसा है। शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा है कि इस मुद्दे पर देश के सभी लोगों को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। उन्होंने जावेद मियांदाद को वीजा देने का कड़ा विरोध किया है। उनके मुताबिक मियांदाद को वीजा देना दाऊद को वीजा देने जैसा है। उधर बीजेपी नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने वीजा के फैसले पर सीधी राय जाहिर करने की जगह सुरक्षा एजेंसियों को कठघरे में खड़ा किया है। नकवी का कहना है कि सुरक्षा एजेंसियों को मालूम होना चाहिए कि कौन भारत आ रहा है, जबकि बीजेपी नेता कीर्ति आजाद ने भी कहा कि मियांदाद को वीजा देना ठीक नहीं है।

04 January 2013

क्या अकबरुदीन ओवैसी को देशद्रोही घोषित करना चाहिए

हैदराबाद के अदिलाबाद में एक समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोपी विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने धारा 153ए के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल ओवैसी लंदन में हैं। मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट ने तमाम सबूत देखने के बाद उस्मानिया यूनिवर्सिटी पुलिस स्टेशन को ओवैसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे। ओवैसी ने 24 दिसंबर 2012 को अदिलाबाद में भड़काऊ भाषण दिया था। हिन्दुस्तान और हिन्दुओं के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने वाले मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी लंदन चले गये है. ओवैसी के खिलाफ कोर्ट के आदेश पर गुरुवार को एक और एफआईआर दर्ज की गई है। एफआईआर की भनक मिलने के बाद अकबरुद्दीन ओवैसी के लंदन जाने की खबर है। गौरतलब है कि हैदराबाद के सांसद असादुद्दीन ओवैसी के छोटे भाई और चंद्रायनगट्टा इलाके से विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी कट्टरपंथी माने जाते हैं। 24 दिसंबर को उन्होंने एक सार्वजनिक भाषण में जम कर भारत के खिलाफ आग उगला। हिन्दुओं और भारत वासियों को ललकारते हुये ओवैसी ने कहा कि अरे हिन्दुस्तान, हम पच्चीस करोड़ हैं न तुम सौ करोड़ हो ना ..ठीक है .. 15 मिनट को पुलिस हटा लो बता देंगे किसमें हिम्मत है और कौन ताकतवर है। ओवैसी ने मुंबई धमाकों को भी जायज ठहराया और कहा कि ऐ हिन्दुस्तान, यदि मुसलमानों पर जुल्म नहीं होते तो मुंबई में धमाके नहीं होते। ओवैसी वहीं नहीं रुके उन्होंने अजमल कसाब की भी तरफदारी की उन्होंने कहा कि उस बच्चे अजमल कसाब को फांसी पर लटका दिया गया, ठीक है, उसने दो सौ बेकसूर लोगों की जान ली थी, लेकिन गुजरात में दो हजार मुसलमानों की हत्या के गुनहगार नरेंद्र मोदी को फांसी क्यों नहीं दी? पाकिस्तानी को हिंदुस्तानी को मारने पर फांसी दे दिया। हिंदुस्तानी है तो हिंदुस्तानी को मारने पर देश की गद्दी अगर देश में इंसाफ है तो कसाब की तरह मोदी को भी ऐसी सजा दी जाए। ओवैसी ने कहा कि मोदी हैदराबाद आकर दिखाएं उनको बता देंगे। ओवैसी के इन भाषणों के बाद उनके खिलाफ अदालत में याचिका दायर की गई थी, जिस पर अदालत ने एक और एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। दालत में सुनवाई के दौरान बुधवार को करुणासागर ने कहा कि उन्हें शिकायत दाखिल करने के बाद से धमकीभरे फोन कॉल आ रहे हैं। उन्होंने इस संबंध में सरूरनगर थाने में दर्ज प्राथमिकी की प्रति भी अदालत में जमा की। उधर, आंध्र प्रदेश के सीएम ने कहा कि भड़काऊ भाषण बड़ा मुद्दा नहीं है। इस बारे में मुझसे नहीं पुलिस से पूछें। ऐसे मामलों में सरकार दखल नहीं देती। हम सेकुलर पार्टी हैं और अल्पसंख्यकों और दूसरों के साथ एक समान व्यवहार करती है। अकबरुद्दीन ओवैसी इत्तेहादुल ए मजलिस मुस्लिमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के भाई हैं। इससे पहले भी अकबरुद्दीन विवादों में रह चुके हैं। उन्होंने अपने समर्थकों के साथ बांग्लादेशी तस्लीम नसरीन के साथ मारपीट भी की थी। सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी ने निर्मल टाउन में 24 दिसम्बर को दिए गए ओवैशी के भाषण की ओर ध्यान दिलाते हुए पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। हाशमी ने अपनी शिकायत में कहा है कि ओवैशी का भाषण पूरी तरह आपत्तिजनक, भड़काऊ और देश की सांस्कृतिक विरासत के खिलाफ है। यह देश के संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के खिलाफ है। ऐसे भाषणों से समाज में बंटवारा होने, शांति भंग होने और समुदायों के बीच दंगे होने की आशंका है। विश्व हिंदू परिषद एवं बजरंग ने आंध्र प्रदेश के विधायक अकबरूद्दीन औवेसी द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना आतंकी अजमल कसाब से करने की निंदा की है। बजरंग दल एवं विश्व हिंदू परिषद ने विधायक पर देशद्रोह का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति से कार्यवाही करने की मांग की है, ताकि आतंकवादियों को सबक मिल सके।

23 December 2012

क्या हमारी सरकार संवेदनहीन हो गयी है ?


लोकतंत्र का मतलब है हर नागरिक को बराबर अधिकार और सत्ता में भागेदारी के लिये बराबर के अवसर। लेकिन बीते 8 बरस में जिस तरह भ्रष्टाचार, महंगाई, काला धन को लेकर संसद के भीतर बहस हुई और जनता के हित-अहित को अपने- अपने राजनीतिक जरुरत की परिभाषा में पिरोकर लोकतांत्रिक होने का मुखौटा दिखाया गया। उसको लेकर अब नये- नये सवाल खड़े होने लगे है। जो सिधे सरकार के उपर संवेदहीन होने का प्रत्यक्ष प्रमाण को दर्षाता है। देष में आज एक के बाद एक बड़े बड़े आंदोलन लगातार लोग कर रहे है मगर सरकार हर बार उसे सुलझाने के बजाय दबाने और कुचलने के लिए प्रयास कर रही है। भारत कुछ दिनों बाद तानाषाही में न बदल जाय इसको भी लेकर लोगो के मन में अभी से भय सताने लगा है। आज जो आवाज उठ कर सामने आ रही हैं उसको दबाने में सत्ता पक्ष को कोई खास मुश्किल नहीं आ रही है क्योकी सरकार इसे लोकतंत्र की गला घोंट कर असानी से निपटा ले रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का तमगा लगाकर जीना आसान काम नहीं है। खासकर लोकतंत्र अगर संसदीय राजनीति का मोहताज हो। और संसदीय सत्ता की राजनीति समूचे देश को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाये। और सत्ता के प्रतीक संसद पर काबिज राजनीतिक दलों के नुमाइन्दे भ्रश्टाचार, बलात्कार, जैसे विशयों पर जब चुप्पी ले तो सवाल अराजकता के मुहाने पर आकर खड़ा हो जाता है। आज देष का आक्रोस बात्कार पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए सड़को पर उमड़ रहा है, और सत्ता का षिखर रायसीना हिल्स अगर डगमगा रहा है तो इसका एकमात्र कारण भी सरकार की संवेदनहीनता है। जो समय रहते किसी भी मसले का समाधान निकालने के बजाय उसे रफा- दफा करने की प्रयास करती है। आम इन्सान की बिसात क्या जब इस देश में महिला आई ,ए .एस . अफसर मधु शर्मा के आई पी एस पति के ठीक उसी दिन हत्या कर दी गयी जिस दिन महिला दिवस था। अफसर की विधवा जो खुद भी आई 'ए .एस . अफसर है , जिसे खून के आंसू पीने को मजबूर कर दिया गया है तो किस से न्याय की उम्मीद की जा सकती है और किसे न्याय मिल सकती है। फिर भी देष ने बर्दास्त किया। मगर लगता है अब लोगों को न्याय से उमीद टूट चुकी है, राजनीति दलों से आस उठ चुकी है। क्योकी औरत की आबरू को सड़को पर चिरहरण होने लगा है। आम आदमी के अधिकार को दलाली के बाजार में बेचा जा रहा है तो एसे में ये जनआक्रोस बुलंद होना आम आदमी के गुस्से का प्रतीक को याद दिलाता है। जो बार- बार सरकार की संवेदनहीनता को दर्षाता है। दिल्ली में दरिंदगी की दहला देने वाली घटना के बाद जो माहौल दिखा है, वह कोई पहली बार नहीं दिखा। पिछले डेढ़ दशकों में करीब आधा दर्जन से ज्यादा बार दिल्ली इस तरह के झकझोर देने वाले माहौल से गुजर चुकी है। पिछले डेढ़ दशकों में दिल्ली कई बार उबली है। कई बार शर्मसार हुई है। कई बार मोमबत्तियों की रोशनी के साथ एकजुट हुई है, लेकिन खीझ और हताशा यही है कि बार-बार ऐसे मौकों की पुनरावृत्ति हो रही है। सवाल है कि गुस्से से उबल रहा देश इसकी पुनरावृत्ति के लिए क्यों मजबूर हो रहा है? आखिर दरिंदे इतने बेखौफ क्यों हैं? उन्हें कोई डर, अपराधबोध या चिंता क्यों नहीं होती? क्यों किसी प्रियदर्शिनी मट्टू, किसी मेडिकल कॉलेज की छात्रा, किसी कॉल सेंटर की कर्मचारी के साथ बर्बर दरिंदगी की घटना के कुछ महीनों बाद ही फिर उससे भी बड़ी दरिंदगी की घटना घट जाती है? आज सरकार की संवेदनहीनता इन्ही सवालों के इर्द- गिर्द ही घुम रही है। क्योंकि ये सवाल बार-बार हमारे गुस्से को आईना दिखाते हंै। क्योंकि ये सवाल बार-बार हमारे गुस्से को नपुंसक ठहराते हैं। हमारी सरकार हमें कैसी प्रशासन व्यवस्था प्रदान कर रही है यह आज सब के सामने आ गया है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या सरकार संवेदनहीन हो गयी है।

बलात्कारियों को सज़ा का प्रावधान क्या होना चाहिए ?

दिल्ली को भारत का दिल कहा जाता है मगर आज इसी दिल्ली में वहशी दरिंदों का आतंक मचा हुआ है। दिल्ली में छात्रा के साथ हुए गैग रेप की घटना पर हर ओर से कड़ी सजा के लिए मांगे उठने लगी है। भारतीय दंड सहिंता की धारा 376 में ये प्रावधान है की बलात्कार के लिए सजा दस वर्ष से कम न होगी और ये अधिकतम आजीवन कारावास तक हो सकेगी, साथ ही जुर्माने का प्रावधान भी है। मगर वर्तमान बिगडती हुई परिस्थितियों में अब ये सवाल भी खड़े होने लगे है की बलात्कारीयों के लिए सजा क्या होना चाहिए ? क्या सिर्फ कोरी बयान बाजी और आन्दोलन इस समस्या का समाधान है। ऐसे में कही न कही समाजिक सानसिकता को बदला जयादा अहम साबित हो सकता है। क्योकी आज सिर्फ पुरूस प्रधान समाज को दोशी ठहराने मात्र से इसका समाधान नही हो सकता, जब तक कानुन के हाथ सजबूत न हो जाए। भारत में पिछले 5 वर्षों में दुष्कर्म और बलात्कार की घटनाओं में 20 फीसदी की भयावह वृद्धि हुई है। बलात्कार की घटनाएँ इतनी तेजी से बढ़ने की दो मुख्य वजह सामने आई है षराब की नषा और अपने आप को मार्डन दिखाने वाले की अश्लीलता और नग्नता। दुष्कर्म की घटनाओं के सभी मामलों में 80 फीसदी दोषी शराब के नशे में ये कुकर्म करता है। मगर सरकारें सराबखोरी को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही हैं। भारत के चरित्र को गिराने के लिए अंग्रेजो ने 1758 में कलकत्ता में पहला शराबखाना खोला जहाँ पहले साल सिर्फ अंग्रेज जाते थे और आज पूरा भारत जाता है। यही से सुरू होता है ये असमाजिक कुर्कमों का खेल। साथ ही आज के हिन्दी फिल्में राज़, जिस्म- 2 और मर्डर- 2 को पारित करना और ‘डर्टी पिक्चर’ को राष्ट्रीय पुरस्कार देकर अश्लीलता और नग्नता को बढ़ावा देना भी कही न कही इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है। आज इन दुष्कर्मियों और बलात्कारियों को फांसी या नपुंसक बनाने जैसी कठोर सजा देकर और उपर्युक्त कारणों पर रोक लगाकर समाज में ऐसी वीभत्स घटनाओं को क्या रोका जा सकता है, आज ये एक बहस का विशय बन चुका है। पैरामेडिकल छात्रा से हुई सामूहिक बलात्कार की घटना सभ्य समाज में कोई पहली घटना नहीं है बल्कि आज देश में हर रोज औसतन सौं से अधिक महिलायें बलात्कार की शिकार हो रही है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कब तक इस तरह की घटनाएं होती रहेंगी और आखिर क्यों हर बार पुलिस और सरकार इन घटनाओं के होने के बाद ही हरकत में आती हैं और इन घटनाओं को रोकने के लिए इस पर मंथन होता है ? संसद में दिल्ली गैंगरेप के बाद ऐसे आरोपियों को फांसी की सजा देने की बात उठी और गृहमंत्री ने भी सख्त से सख्त कार्रवाई का भरोसा तो दिलाया। मगर ये अवाज़ सिर्फ संसद के अंदर ही दब कर रह गई, और सड़कों पर मस्तमौले अब भी हर जगह मौज करते दिख रहे है। ऐसे में महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। भारतीय समाज में पाश्चात्य सभ्यता के संस्कारों की घुसपैठ ने भारतीयों के सनातन विचारों की मानों होली ही जला डाली है। आज समाज में बढता व्याभिचार इसी का परिणाम है। किसी लड़की के साथ रेप होना केवल उसकी अस्मिता पर ही प्रहार नहीं है, बल्कि यह उसकी आत्मा पर लगने वाला ऐसा घाव है जो उसे जिंदगी भर कुरेदता है। तो सवाल खड़ा होता है की ऐसे बलात्कारीयों के लिए सजा क्या होनी चाहिए।

21 December 2012

क्या नरेन्द्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहिए ?

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी अक्तूबर 2001 मे पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री, इसके बाद दिसम्बर 2002 और दिसम्बर 2007 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल किया। जिसके चलते  नरेन्द्र मोदी को लोग विकास पुरुष के नाम से पुकारने लगे। एक बार फिर से मोदी तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे है। विधानसभा का यह पहला चुनाव है जिसमें मुख्यमंत्री से ज्यादा उनकी प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की चर्चा हुई। गुजरात विधानसभा के चुनाव के दौरान लोगों को मोदी के दिल्ली आने की आहट सुनाई दे रही थी। गुजरात में मोदी की हैटिक से ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाएगी? मगर अब गुजरात चुनाव के नतीजे से एक बात साफ हो गई कि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है। इस बार चुनाव में कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं था। ऐसे में गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद अब नरेंद्र मोदी के दिल्ली आने की चर्चा तेज हो गई है। साथ ही विरोधीयों के खोखले बोल पर बिराम लग गई है। ऐसे में अब लगता है भाजपा के अंदर समीकरण बदलेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भी समीकरण को बदलना होगा। अब तक मोदी बिरोधी भाजपा नेता उन्हे पार्टी से उपर होने का आरोप लगा रहे थे मगर मोदी ने पार्टी को मां का दर्जा देकर सबका मुंह बंद कर किया है। मोदी अपने जिंदगी में बहुत सारे मेडल हासिल किए है मगर तीसरी बार जीत के बाद जब सामने आए तो उन्होने कार्यकर्ताओं और गुजरात के मतदाताओं को अपने लिए सबसे बड़ा मेडल बताया। जिन सरकारी मुलाजिमों को बिरोधयों ने हर समय उनके उपर ज्यादा कार्य कराने के आरोप लगाते थे, मगर उन मुलाजिमों के आगे विरोधीयों की एक भी नही चली। गुजरात में मोदी की जीत देश के दूसरे राज्यों के मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा के बारे में अपनी पुरानी राय पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित कर सकती है। मोदी का दिल्ली आना कांग्रेस के लिए भी बड़ा सिरदर्द बनने वाला है, क्योंकि राहुल गांधी का मुकाबला अब नरेंद्र मोदी से होने वाला है। जो जिम्मेदारी लेकर अपने को साबित कर चुका है। मगर राहुल गांधी अभी तक जिम्मेदारी से बचते रहे है। लगातार तीसरी बार जीत हासिल करने के कारण नरेंद्र मोदी एक नए अवतार के रूप में सामने आए हैं। वह न केवल हिंदुत्ववादी नेता की छवि तोड़कर विकास के लिए समर्पित राजनेता के रूप में उभरे हैं, बल्कि प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी दावेदारी और मजबूत हो गई है। ज्योति बसु भी एसे ही सफलता से प्रधानमंत्री के लिए दावेदार बन गए थे। नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक पंडितों को भी एक नई सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया कि एंन्टी इन्कम्बन्सी यानी की सत्ता विरोधी लहर का असर विकास के आगे दम दोड़ सकती है। मोदी ने अपने जीत के संबोधन में कहा कि गुजरात के मतदाता काफी परिपक्व हैं वे जाति और क्षेत्र के आधार पर वोट नहीं करते है। ऐसा कहते हुए मोदी यूपी और बिहार के मतदाताओं को ये संदेश दे रहे थे कि हमारे मतदाताओं के इसी नजरिए के चलते गुजरात एक विकास करने वाला राज्य है। इसे नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कहा जाएगा कि गुजरात विधानसभा चुनाव पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से कहीं ज्यादा मोदी का व्यक्तित्व ही हावी रहा तो ऐसे में ये कहना गलत नही होगा कि क्या मोदी को प्रधान मंत्री बनाना चाहिए ?

16 December 2012

चार रुपये में काटो दिन, शीला दीक्षित का नया हिसाब ?

भारत की गरीबी रेखा हमेशा से ही बड़ी बहस का विषय रही है पर यह बहस आज अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं तक ही सीमित नही है। आज के इस बदलते राजनैतिक दौर में हर कोई अपना पैमाना बनाने लगा है। इस बार सामने आयी है दिल्ली के मुख्यमंत्री षीला दीक्षित ने। 600 रुपये में पांच लोगों के एक परिवार का एक महीने के लिए दाल-रोटी का इंतजाम आराम से हो सकता है, आप भले ही ये ना मानें लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के हिसाब से ऐसा संभव है। गरीबी के खिलाफ जंग की सरकारी योजना का दम मंजिल पर पहुंचने के पहले ही भ्रश्टाचार के षिकार हो जाता है, इसलिए इसे, गरीब परिवार के महिला मुखिया के बैंक खाते में हर महीने 6 सौ रुपये ट्रांसफर करने की योजना बनाई गई है। इसकी सुरूआत अन्नश्री योजना के लिए कैश सबसिडी ट्रांसफर स्कीम के रूप में की गई है। इस योजना को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने लांच किया है। क्या इस देष का गरिब सिर्फ संख्या मात्र के लिए है, जो अपने वजूद को बचाने के लिए दिन रात मेहनत करता है। ताज्जुब इसलिए भी है की तकरीबन 15 प्रतिषत लोग अमीर वर्ग की श्रेणी में आते हैं, देष में तकरीबन 30 फीसदी लोग माध्यम वर्गीय श्रेणी में आते हैं और बचे हुए 55 प्रतिषत लोग या जनता गरीबी की श्रेणी में आती हैं। दिल्ली सरकार की ओर से कहा गया है की गरिब परिवार के लोगों को 600 रूपये में कम से कम दाल, चावल और गेहूं तो मिल ही सकता है। मगर यहा बड़ा सवाल ये है की क्या सिर्फ दाल, चावल और गेहूं मात्र से ही गरिब व्यक्ति का आहार पूरा हो जाएगा ? क्या उसे खाना तैयार करने के लिए एल पी जी गैस सिलिंडर के साथ- साथ, दुध, तेल, सबजी, की जरूरत नही पड़ेगी ? अगर इसे प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो एक दिन में सिर्फ चार रूपया बैठता है। अब सवाल उठता है कि क्या दिल्ली में रहने वाले किसी आदमी का पेट सिर्फ 4 रुपये में भर सकता है? मतलब साफ है की दिल्ली क्या देश और दुनिया के किसी कोने में भी 4 रुपये में पेट नहीं भरा जा सकता हैं, लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री के मुताबिक दिल्ली में ऐसा संभव हैं। गरिबों के मजाक उडाने का ये कोई पहला एसा वाक्यां नही है इससे पहले खुद योजना आयोग भी एसे बेतूके आकडे़ को सही ठहरा चुका है। जिसमें गांव में रहने वाले गरिब परिवार के लिए 28 रूपये और षहरी क्षेत्र के लिए 32 रूपये एक दिन के लिए निर्धारित की गई थी। योजना आयोग द्वारा शौचालयों की मरम्मत के नाम पर 30 लाख रूपये खर्च किए गए। आयोग के उपाध्यक्ष मोटेंक सिंह अहलूवालिया ने 2011 के मई और अकतुबर के बीच विदेष यात्रा पर रोजाना दो लाख दो हजार रूपये खर्च किए जो उस समय काफी विवादित रहा था। मगर अब षिला का हिसाब तो योजना आयोग के आकड़े को भी झुठला रहा है। तो एैसे में आप भी कहेंगे की ये दिल्ली के गरीबों का मजाक नहीं तो और क्या है ?

15 December 2012

क्या भारत सरकार पाकिस्तान के आगे झुक गयी है ?

पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक शुक्रवार को दिल्ली पहुंचे तो उनके आवभगत और स्वागत के लिए भारत के गृहराज्य मंत्री आर पी एन सिंह ने उनका इस कदर गर्मजोषी से स्वागत किया मानो भारत के लिए मलिक कोई तौफा लेकर आये है। बाद में बयान आया ये अमन का पैगाम लेकर आए हैं। यहा सवाल खड़ा होता है की क्या देष के दुष्मनो के सरर्णाथी पाकिस्तान के साथ भारत सरकार झुक गई है। क्या सरकार समझौते के नाम पर देष के दुष्मो को एक बार फिर से गले लगाना चाहती है। जो आए दिन देष में दहसत फैलाते है, और मासुमों का खुन बहाते है। फिर भी सरकार एक के बाद एक समझौते कर रही है। जो नए समझौते हुए है उसमें 12 वर्ष से कम तथा 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को तथा व्यापारियों को पुलिस रिपोर्टिग से छूट जैसे नए समझौते शामिल है। यह वीजा समझौता ऐसे समय में लागू होने जा रहा है, जब पाकिस्तान-भारत के बीच क्रिकेट श्रृंखला होने वाली है। इसके तहत 25 दिसम्बर से भारत में तीन एक दिवसीय और दो ट्वेंटी-20 मैच खेले जाने हैं। मगर क्रिकेट के आड़ में होने वाली सियासत की बात करे पहले हमे एक बार फिर से बाला साहब ठाकरे के द्वारा सामना में छपे उस लेख को याद करना होगा जिसमे कहा गया था की अगर देष में इन्हे जयादा संख्या में आने की अनुमती दी गई तो इससे आतंकीयों की फौज देष में घुसपैठ करेगी। मगर इन सब के अलावे अगर रहमान मलिक की बात करे तो उनके द्वारा दिए गए बयान देष के लोगो के मन में कई सवाल खड़े करते है। मलिक ने कहा बाबरी मस्जिद विध्वंस और समझौता एक्सप्रेस जैसी घटनाएं दोबारा न हों, हमें इसका ख्याल रखना होगा। मलिक का यह बयान देष के अंदर समाजिक सौहार्द को बिगाड़ने जैसा है क्योकी यहा पर मलिक को हमारे देष के आंतरिक विशयों पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार नही है। पाकिस्तान में आए दिन मंदिरों को तोड़ा जाता है और हिन्दुओं को धरमांर्तरण कराया जाता है तब क्यो रहमान मलिक चुप्पी साध लेते है। ये सवाल आज हर हिंन्दुस्तानी मलिक से पुछ रहा है, साथ ही करगिल में शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के बारे में रहमान मलिक ने जिस प्रकार से अपना पल्ला छाड़ लिया उससे तो यही साबित होता है की रहमान मलिक भारत के प्रति सामरिक रिस्तों को लेकर कितना गंभिर है। मलिक ने कहा है की उन्हे नही मालूम कि कालिया की मौत पाकिस्तान की गोली से हुई या मौसम से। भारत जिन मुद्दों को पाकिस्तान के सामने उठाना चाहता उसे पाक मानने से इंनकार करता रहा है। मुम्बई हमले के आतंकवादियों के सूत्रधार हाफिज सईद को सौंपने को लेकर पाकिस्तान हमेषा इंकार करता है, सिमापार से फर्जी भारतीय नोटों को देष के अंदर लाने का कार्य लगातार किया जा रहा है। दाऊद इब्राहिम समेत लगभग चार दर्जन मोस्टवांटेड आतंकियों व अपराधियों को सौंपे जाने के मामले में पाकिस्तान अपने पुराने रुख पर कायम है उसे भारत के हाथ में कतई सौपने को तैयार नही है। मगर फिर भी भारत सरकार पाक को गले लगा कर इसे षांति का पैगाम बता रही है। तो सवाल खड़ा होता है की क्या पाकिस्तान के आगे सरकार झुक गई है।

14 December 2012

सरक्रीक, पाकिस्तान को सौपना कितना सही ?

गुजरात के कच्छ की समुद्री सीमा पर स्थित 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सर क्रीक एक बार फिर से अचानक सुर्खियों में आ गया है। इस मुद्दे को उठाया है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने और दबाने की कोशिश कर रही है केंद्र की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस। सर क्रीक 650 वर्ग किलोमीटर का भारत का वो समुद्री इलाका है, जिस पर पाकिस्तान अपना दावा करता है। इतिहास के पन्ने पलटें तो भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान चार्ल्स नैपियर ने 1842 में सिंध पर जीत हासिल की और उसे बंबई राज्य को सौंप दिया। उसके बाद सिंध में शासन कर रही सरकार ने सिंध और बंबई के बीच सीमारेखा खींचने का निर्णय लिया, जो कच्छ से गुजरती थी। उस निर्णय के अंतर्गत सरक्रीक खाड़ी को सिंध प्रांत में दर्शाया गया। जबकि दिल्ली में शासन कर रही अंग्रेज सरकार के नक्शे में इसे भारत में दर्शाया गया। विवाद हुआ और फाइलों में दब गया। लेकिन स्वतंत्रता के बाद जब दोनों देशों के बीच बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान ने सरक्रीक खाड़ी पर अपना मालिकाना हक जता दिया। इस पर भारत ने एक प्रस्ताव तैयार किया जिसमें समुद्र में कच्छ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक सीधी रेखा खींची और कहा कि इसे ही सीमारेखा मान लेनी चाहिये। यह प्रस्ताव पाकिस्तान ने ठुकरा दिया, क्योंकि इसमें 90 फीसदी हिस्सा भारत को मिल रहा था। तब से लेकर आज तक दोनों देशों के बीच इस खाड़ी के मालिकाना हक को लेकर विवाद जारी है। मगर अब खबरे आ रही है की भारत सरकार इसे पाकिस्तान को सौपे पर बिचार कर रही है। इसी बिच मोदी के प्रखर राश्ट्रवादी नजरों ने सरकार के इस कुटनीती को पकड़ा है। मोदी ने इसे किसी भी हाल में पाकिस्तान को नही सौपने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा है। जिसमे कहा गया है की इतिहास को देखते हुए सरक्रीक को पाकिस्तान को सौंपे जाने की कोई भी कोशिश एक रणनीतिक भूल होगी। साथ ही मोदी ने ये भी आग्रह किया है की, पाकिस्तान के साथ यह वार्ता बंद हो और पाकिस्तान को इसे नहीं सौंपा जाना चाहिए। ऐसी खबर आयी है कि हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर डील फाइनल करने की चर्चा की। रक्षामंत्री एके एंटनी और तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी इस पर राजी हो गये। माना जा रहा है कि यूपीए इस मामले को जल्द ही पाकिस्तान के सामने रख सकती है।

सरक्रीक इस लिए भी महवपूर्ण है क्यों की देश की सरक्रीक प्राकृतिक संपदा का भंडार भी है। इस क्षेत्र में भारी मात्रा में कच्चा तेल अथवा गैस होने की संभावना है, जो भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिये सकारात्मक साबित हो सकता है। दलदली भूमि होने की वजह से सैनिकों को इस इलाके से होने वाली तस्करी और घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई करने में कठिनाई आती है। हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इस इलाके में बीएसएफ की यूनिट बढ़ाने के लिए बजट में 44 करोड़ रुपये को मंजूरी दी है। सन 2000 में पाकिस्तान ने सरक्रीक पर भारी संख्या में सैनिकों को तैनात किया था। उसका मकसद था कारगिल जैसे युद्ध की तैयारी। इसी लिए यह इलाका काफी संवेदनषील माना जा रहा है। 1965 के बाद ब्रिटिश पीएम हेरोल्ड विल्सन के हस्तक्षेप के बाद अदालत ने 1968 में फैसला सुनाया था, जिसके अनुसार पाकिस्तान को 9000 वर्ग किलोमीटर का मात्र 10 फीसदी हिस्सा मिला था। पाकिस्तान ने सिंध और कच्छ के बीच हुए एग्रीमेंट की कुछ तस्वीरों के आधार पर क्रीक को सिंध का भाग घोषित कर दिया और एक रेखा खींची जिसे ग्रीन लाइन बाउंड्री कहा जाता है। मगर भारत ने इसे मानने से इंकार करता रहा है। भारत का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के मुताबिक 1924 के आधार पर लगाये गये स्तंभों के आधार पर पाकिस्तान ने दावा पेश किया। पाकिस्तान ने उसे यह कहकर मानने से इंकार कर दिया कि इस सीमा से नाव पार नहीं की जा सकती है, जबकि इस सीमा को आसानी से पार किया जा सकता है। साथ ही 1999 में भारतीय वायुसेना ने सरहद के पार से आये एक पाकिस्तानी विमान को ध्वस्त कर दिया था। यह विमान भारतीय सीमा में सर क्रीक की स्थिति को टोहने के लिये आया था। यह घटना कारगिल युद्ध के कुछ महीनों बाद ही हुई थी। तो सवाल खड़ा होता है की सरक्रीक पाकिस्तान को सौपना कितना सही ?

01 December 2012

क्या जाकिर भारत का तालिबानीकरण करना चाहता है ?

आज भारत जैसे लोकतांत्रिक देष के अंदर हर धर्म और मजहब के लोगो पुरी अजादी मिली हुई है, भारत एक एैसा देष है जिसकी सभ्यता और संस्कृति से पुरा विष्व अभिभूत रहा है। जो भी इसके रास्ते पर चला वह अपने बुलंदियों को हासिल किया। मगर आज इसी देष में एक एसे कटट्रपंथी उन्माद मचा रखा है जिसका मकसद आज हिन्दुस्तान को तालिबानी नितियों में दबदिल करना है। जी हा, हम बात कर रहे है जाकिर नाईक के तालिबानी शैली, कुरान और हदीस सहित विभिन्न भाषाओं में साहित्य, और अपने संबंधित मिशनरी गतिविधियो के चलते मुस्लिम समाज ही नही देष विदेष के नागरिक चिंतित है। सबसे षर्म की बात ये है की 2010 में इंडियन एक्सप्रेस ने नाईक को शक्तिशाली भारतीयों की सूची में 89वा प्रदान किया। जो हमारे देष के अंदर तालिबानीकरण को बढ़ावा दे रहा है। आज जिस प्रकार से जाकिर देष के अंदर तालिबानी हुक्म को बढ़ावा दे रहा है उससे समाज में एक नई बहस छिड़ चुकी है और तरह- तरह के सवाल भी खड़े होने लगे है की क्या जाकिर का ये फरमान और बयान हिंन्दुस्तान को तालिबानीकरण करना चाहता है ? मुस्लिम और गैर, मुस्लिम हलकों में जाकिर का समाजिक बहिसकार करने के लिए लोग अब लामबंद हो रहे है। आज जाकिर व्यापक रूप से वीडियो और डीवीडी के अलावे मीडिया और सोषल नेटवर्किग बेब साईट के माध्यम से लोगो के बिच में अफवाहे फैला रहा है। नाईक ने दुनिया भर में नई बहस और व्याख्यान का आयोजन कर रहा है। मगर अब हर ओर इसका बहिसकार  हो रहा है क्योकी जाकिर के तालिबानी बयानो से आज हर कोई चिंतित है। नाइक कहता है कि कोई भी गैर मुसलमान अगर इस्लाम चुनता है तो वह इस्लाम के अनुसार सही है लेकिन अगर एक मुस्लिम धर्मान्तरण करना चाहता है तो यह देशद्रोह है। नाईक इसे अपराध मानता है और इसकी सजा इस्लामी कानून के तहत मौत बताता है। एसे में सवाल अब भी जस का तस बना हुआ है की क्या एसे बयानो से हिन्दुस्तान जैसे लोकतांत्रिक देष को क्या जाकिर तालिबान का सक्ल देना चाहता है, जहा पर न तो कानुन है और न ही मानावता नाम की कोई चिज। जहा पर स्कुल में महिलाओ के जाने पर प्रतिबंध है जहा पर छोटी सी गलती के लिए लोगो को मौत के घाट उतार दिया जाता है, जहा पर मंदिरो को तोड़ कर मस्जिद बनाया गया। तालिबान में आज भी पुरे दुनिया के मुकाबले सबसे कम साक्षरता दर है। लेकिन अब  लगता है भारत में भी मंदिरो को तोड़ा जाएगा, महिलाओ को भी बुर्के में निकलना पड़ेगा, और हर जुर्म की सजा मौत होगी। नाइक ने कहा है कि वह बिन लादेन की आलोचना नहीं करता। जाकिर कहता है की बिन लादेन इस्लाम के दुश्मनों से लडाई की इसलिए हम उसके साथ है। आज हिन्दुस्तान में भले ही जाकिर अपने तालिबानी प्रचार करने के इधर उधर घुम रहा है मगर ब्रिटेन सहित कई कई अन्य देष अपने यहा जाकिर के प्रवेष पर प्रतिबंध लगा दिया है। नाईक को जून 2010 मे कनाडा और लंदन में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। रजा अकादमी, ने ब्रिटेन के उच्च आयोग को पत्र लिख कर डॉ. जाकिर नाईक के प्रवेश को प्रतिबंधित करने के लिए ब्रिटिश सरकार की पहल की प्रशंसा कि है। तो सवाल यहा भारत सरकार से भी है कि भारतीय दंड सेहिता के धारा 295, 298 और 153 के तहद हिंन्दु भावनाओं को भड़काने के अरोप जब सजा का प्रावधान है तो फिर जाकिर आखिर अब तक खुल्ला कैसे घुम रहा है। डॉ. नाईक का कहना है कि एक इस्लामी राज्य के भीतर अन्य धर्मों के प्रचार बिलकुल गलत है, जबकि वह अन्य मुसलमानों को आजादी से अपने देश में इस्लाम को फैलाने की अनुमति होने कि बात कहता है। नाईक चर्च और मंदिरों के निर्माण के बारे में, कहता है कि उनके धर्म गलत है उनकी पूजा गलत है तो एसे में मंदिर निर्माण कि अनुमति कैसे दि जा सकती हैं। आज ये कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक हर ओर गलत उपदेष दे रहा है। तो एसे में सवाल खड़ा होता है की क्या जाकिर नाईक भारत का तालिबानीकरण करना चाहता है?

आतंकियों के समर्थक जाकिर की गिरफ़्तारी क्यों नहीं ?

इस्लाम के विवादित विद्वान् डा. जाकिर नाईक के खिलाफ देश भर के लोग लामबंद हो रहे है। पीस चैनल से धार्मिक प्रचार करने वाले कटटरपंथी इस्लामिक विद्वान डा जाकिर नाईक ने हिंदुओं की आस्था से लगातार खिलवाड़ कर रहा है। क्या कभी जाकिर नाईक ने मुसलमानों से पूछा है। क्यों पत्थर की रस्म अदा करते हो। क्यों अल्लाह में इतनी श्रद्धा दिखाते हो। जी नही। क्योंकि उसके अनुसार इस्लाम के अलावा सभी धर्म तुच्छ हैं। जाकिर नाईक ओसामा बिन लादेन को अतंकी नही मानता हैं। सभी मुसलमानों को ओसामा की तरह आतंक फैलाने की बात कहता हैं। हर मुसलमान को ओसामा की तरह जीने का हुक्म देता हैं। यही कारण है की देष के अंदर आज उबाल मचा हुआ है। देष भर में जाकिर नाईक के खिलाफ देष भक्तों में गुस्सा भर गया है। देष के कोने- कोने से लोग जाकिर नाईक के खिलाफ केस दर्ज करा रहे है। क्योकी धर्म के आड़ में जाकिर अतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। लोग कह रहे हैं कि ऐसे लोगों की वजह से ही दो संप्रदायों में दरार पैदा हो रही है। इसी वजह से लोग एक दूसरे की जान के दुष्मन बन गये हैं। आज हमारे देष की सरकार क्यो सोई हुईं है। जो हमेषा कहती है की धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले को तुरंत जेल में डाला जाये। तो फिर जाकिर को किस बात की रियायत मिली हुईं है? जो नेता धर्म निरपेक्षता की बात करते है वे खुद आज एसे धर्मविरोधी ढोंगी के प्रति चुप क्यो है? जाकिर नाईक जानबूझकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहा हैं। मगर यहा गौर करने वाली बात ये है की कई एसे मुस्लिम धर्म गुरू है जो जाकिर के इस बेतुके बयान से बिलकुल सहमत नही है। इस्लामीक धर्मगुरूओं का मानना है की इस्लाम दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुचाने में विष्वास रखता है। मगर जाकिर नाईक एसे धर्म विरोधी बयानो को इस्लामिक समस्याओ का निवारण मानता है, और कहता है की हर मुस्लमान को आतंकवादी होना चाहिए। लेकिन इन सब के अलावे जो काबिले गौर करने वाली बात ये है की जाकिर अंग्रेजो के विचारो से अपने आप को सहमत बताता है और कहता है की अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियो को आतंकवादी कहते थे क्योकी ये लोग देष में उन्माद फैलाते थे। साथ ही अमेरीका के पूर्व राश्ट्रपती जार्ज वासिंगटन को आतंकवादी नंबर वन बताता है। जिसे अमेरिका अपना राश्ट्रपिता मानता है। यही कारण है की आज देष ही नही बिदेषो में भी एसे दिगभ्रमित उन्मादी की आलोचना हो रही है। और लोगों में रोश है। अगर ऐसे कटटरपंथी को जेल में नही डाला गया तो ये देष ही नही पूरे विष्व के लिए एक समस्या बन जाएगा। तो एसे में सवाल भी फिर से वही आकर रूक जाता है की आतंकियो के समर्थक जाकिर की गिरफ्तारी क्यो नही ?