08 September 2012

कोयले की कालिख से सबके मुह काले

देष में आज कोल आवंटन को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। इंदिरा गांधी ने 1973 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया तो मनमोहन सिंह ने 1995 में ही बतौर वित्त मंत्री। इसके चलते कोयला खादान एक बार फिर निजी हाथों में जाने लगा। असल में कैग की रिपोर्ट इन्ही निजी हाथों में खदान देने के लिये अगर बोली ना लगाये जाने पर अंगुली उठाकर, 1.86 लाख करोड़ के राजस्व के चूने की बात कर रही है। वही कोयले से करोड़ों का वारा-न्यारा कर मुनाफा बनाने में चालिस से ज्यादा कंपनिया सिर्फ इसीलिये बन गयी जिससे उन्हें कोयला खादान का लाइसेंस मिल जाये। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीते 2004 से 2009 तक में 342 खदानों के लाइसेंस बांटे गये। जिसमें 101 लाइसेंसधारकों ने कोयले का उपयोग पावर प्लांट लगाने के लिये लिया। लेकिन इन पांच सालों में इन्हीं कोयला खादानो के जरीये कोई पावर प्लांट नया नही आ पाया। एक सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या कोयला खदान के लाइसेंस उन कंपनियों को दे दिये गये, जिन्होने लाईसेंस इसी लिये लिये कि वक्त आने पर खादान बेचकर वह ज्यादा मुनाफा कमा लें। म्यूजिक कंपनी से लेकर गुटका, गंजी और अखबार निकालने से लेकर मिनरल वाटर का धंधा करने वाली कंपनी तक को लाइसेंस दे दिया गया। इतना ही नही, दो दर्जन से ज्यादा ऐसी कंपनियां हैं, जिन्हे ना तो पावर सेक्टर का कोई अनुभव है और ना ही कभी खादान से कोयला निकालवाने का कोई अनुभव। कुछ लाइसेंस धारकों ने तो कोयले के दम पर पावर प्लांट का भी लाइसेंस ले लिया और अब वह उन्हें भी बेच रहे हैं। लेकिन यहा काबिले गौर वाली बात ये है की देष की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई जब भी किसी बड़े घोटाले की जांच करने निकलती है तो, पहले खबर अखबार में छपती है फिर सीबीआई छापेमारी करती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ, तो ऐसे में एक बार फिर से सीबीआई को लेकर सवाल खड़ा हाने लगा है की क्या इन कोल भ्रश्टाचारियों को बचाया जा रहा है। कोयला खादान को औने पौने दाम में बांटकर राजस्व को चूना लगाने वालो पर आखिर कार्रवाई सरकार सिधे तौर पर क्यो नही करती है। असल सवाल यहीं से शुरु होता है कि क्या संसद के भीतर खादानों को लेकर अगर राजनीतिक दलों से यह पूछा जाये कि कौन पाक साफ है तो बचेगा कौन। क्योंकि देश के 18 राज्य ऐसे हैं, जहां खादानों को लेकर सत्ताधारियों पर विपक्ष ने यह कहकर अंगुली उठायी है कि खादानो की लूट सत्ता ने की है। तो ऐसे में ये सवाल अपने आप खड़ा होता है की आजादी के बाद देश बेचने सरीखा ही क्या ये मामला नही है। क्योंकि बाजार ने सरहद तोड़ी लेकिन उसमें बोली देश के जमीन और खनिज-संसाधन की लगी। यानी सरकार का यह तर्क कितना खोखला है कि खादानों से जब कोयला निकाला ही नहीं गया तो घाटा और मुनाफे का सवाल ही कहां से आता है। असल में झारखंड के 22 खादान, उडीसा के 9 खादान, मध्यप्रदेश के 11 और बंगाल के 9 कोयला खादानो में से बाकायदा कोयला निकाला जा रहा है। और सिगरैली के साशन में रिलायंस की खादान मोहरे एंड अमलोरी एक्सटेंसन ओपन कास्ट में भी 1 सिंतबर 2012 से कोयला निकलना शुरु हो गया। यानी कोयला खादान घोटाले ने अब झारखंड, छत्तीसगढ,मध्यप्रदेश और उडीसा,बंगाल में काम तो शुरु करवाया है। लेकिन खास बात यह भी है कि करीब 60 से ज्यादा कोयला खादानें ऐसी भी हैं, जिनका एंड यूज होगा क्या यह किसी को नहीं पता। इसलिये ये भी एक सवाल है कि दिल्ली में, जो कई मंत्रालयों से मिलकर बनी कमेटी जांच कर रही है वह महज खाना-पूर्ती कर कुछ पर तलवार लटकायेगी या फिर इनके उपर कार्रवाई भी होगी। क्योकी सीबीआई ने जो जाचं का तरीका अपनाया है उससे सवाल उठना लाजमी है की क्या सीबीआई इन भ्रश्टाचारीयो को बचा रही है।

भ्रष्ट से त्रस्त एक सेना के जवान का दर्द

कुछ जंबाजो के दिल में देष बसता है ना कि केवल सेना ऐसी ही कुछ कहानी कष्मीर सिंह की है। जब ये देष भक्त हमसे अपना दर्द सुनाया तो हम ठान लिए की इसे न्याय दिलाना चाहिए। और एक पत्रकार होने के नाते हमने इसे उन लोगो तक पहुंचाया जहा से इस जवान को न्याय मिल सके। नाम कष्मीर सिंह जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेष जिसने सेना को चुना ताकि वो देष की रक्षा कर सके उसने आप काम बखूबी निभाया भी पर कुछ लोगों को उसके काम करने का तरीका पसंद नही आया। और ये उनके लिए नासूर बन गये। उनका मकसत ही सेना को धोखा देना है। वाक्या है 2005 का जब वायु सेना केंद्र पर कष्मीर सिंह की पोस्टींग थी। तब सेना में हो रहें भ्रश्टाचार कों इनहोनें उजागर किया। सेना के राषन और गैस की भी कालाबाजारी भी चरम सीमा पर है। सेना कें अधिकारी गैस और को कौडी़ कें दामों पर कालाबाजा़रियो को बेच देते है और उसके बदले लकडि़ पर खना बनाने का काम किया जाता है। जिन सेंना कें जवानो को देष की सुरक्षा में तैनात होना चाहिए उन जवानों से हरे पेंड कटावाये जाते जो कि पुरीतरह से गैरकानूनी है। जिनका सबूत है ये तस्वीरे जो सारा वाक्या बयां कर रही है। जब भ्रश्टाचार के खि़लाफ कष्मीर सिंह ने आवाज़ उठाया, तो जिसकी सजा़ उनको पांच बार जे़ल जाकर चुकाना पडा़। और उनको नौकरी से भी से बर्खास्त कर दिया गया। इस दौरान कष्मीर सिंह को मानसीक और षारीरीक तौर पर बहुत प्रताडि़त किया गया। इतना ही नही सेना के अधिकारीयों ने कष्मीर सिंह कें खि़लाफ फ़र्जी थ्प्त् दर्ज किया और देष दो्रही बताया। इसके बावजूद सेना का ये जाबांज सिपाही कष्मीर सिंह ने हार नही मानी और अपनी आवाज़ बुलंद रखी और उच्च न्यायलय तक गया पर किसी नें भी उसकी फ़रियाद नही सुनी। अततः कष्मीर सिंह की पत्नी ने प्रधानमंत्री का दरवाजा खटखटाया जहां से उनको अगर कुछ मिला तो केवल अष्वासन की जांच की जायेगी मामला रक्षा मंत्रालय गया पर वहां भी कुछ नही हुआ । आखिरकार उन नापाक अधिकारियो को इस जाबांज सिपाही कें सामने झुकना ही पडां पर इस बार फिर उनके इरादे नेक नही थे । कष्मीर सिंह की जज्बे की बोली लगी ताकि उसके इमान को खरीदा जा सकें। बोली की कीमत थी चार लाख रूपए लेकिन भी कष्मीर सिह का इमान नही डगमगाया और वह जवान अभी भी अपने इमानदारी पर कयम है। क्योकी उनके दिल में देष बसता है।

भारतीय कृषि में कानपूर गौशाला का योगदान

कानपुर गौषाला भौंती इलाके में मौजूद हैं। यहा विभिन्न प्रकार के अत्याधुनिक तरीके से निर्मित मषीनों का संचालन बैल उर्जा से किया जाता हैं। इस तकनीक की खास बात ये है की बैलो की अल्प उर्जा से ही इन मषीनो का बड़ी असानी से संचालन हो जाता है। इस गौषाला में चारे को काटने के लिए उर्जा लेने की आवष्कता नही होती। और ये पूरी तरह आत्म निर्भर है। साथ ही साथ इससे समय की बचत भी होती हैं। इन सब के अलावा इस गौषाला में देवी देवताओं के मंदिर की स्थापना इस तरीके से की गई है कि इस गौषाला का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। यहा हरे भरे पेड़ पौधे और यहां का मनमोहक दृष्य मिलकर गौषाला को एक षान्ति के प्रदेष जैसा रूप देते । इस गौषाला में बैल उर्जा के इस्तेमाल से संचालित होने वाले यंत्रो में सबसे महत्वपूर्ण बिजली उत्पादक यन्त्र की उपयोगिता आज के दौर में काफी उपयोगी साबित हो रही है। गौषाला के महामंत्री पुरूशोतमलाल तोषनीवाल बताते हैं कि इस विधि से 5 हास पावर की कोई भी मषीन संचालित की जा सकती हैं। आधुनिकता के इस दौर में बढ़ते डीजल के मूल्यों और सूखे से किसान देष में आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में बैल उर्जा द्वारा संचालित जल निकासी का ये यंत्र काफी कारगर साबित हो रहा हैं। इसी को वृहत रूप देने के लिए ये गौषाला समाज को प्रोत्साहित करने का काम कर रही है। और समाज में ये संदेष छोड़ रही है की गौवंष कितना कारगर है। ये विधि आधुनिक कृशि और गा्रमीण भारत के लिए वरदान साबित हो रही हैं। जो किसान जयादा संख्या में पषुपालन करते है उनके लिए यह यंत्र और अधिक अहम हो जाता है। इतना ही नहीं यहा इस तरह की विधि से कई अन्य कार्य भी किए जाते है जैसे कृशि में उपयोग होने वाले औजारों में धार लगाने से लेकर, आटा चक्की या फिर चावल निकालने की मषीन असानी से विना किसी इंधन के चलाई जा सकती है। आप को बता दे की इस विधि में बैलों को जयादा उर्जा नहीं लगानी होती है। यहा तक की इस मषीन को अकेला इंसान भी बड़ी असानी से घुमा सकता है। इस विधि की खास बात यही है की कम उर्जा से बड़े से बड़ा काम बड़ी असानी से किया जा सकता है। आज के वैज्ञानिक युग में जहा कृशी पुरी तरह से नई- नई तकनीको की मोहताज हो गई है। वही कृशी के लिए बैल और गांयों का उपयोग कम हुआ है। कहा जाता है की जब किसी चिज की उपयोगिता खत्म हो जाती है तो समाज उससे कन्नी काटना सुरू कर देता है। यही आज गांयों और बैलों के साथ हुआ है। कानपुर गौषला सोसाईटी समाज में गांयो और बैलो के उपयोगिता दुबारा बढ़ाने के लिए प्रतिबध्द है। और इसके कठिन प्रयासों से ऐसा संभव प्रतीत हो रहा है। एक ओर जहा देष विजली संकट से जूझ रहा है। यहा तक की भारत के ऐसे कई गांव है जहा विजली की पहुंच ही नही है और लोग अपनी जिंदगी अंधेरे मे विताने को मजबुर है, तो वही दुसरी ओर कानपुर गौषाला सोसाईटी के अथक प्रयासो के चलते बैलों से उर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। ये उत्पादन बड़ी मात्रा में तो नही लेकिन अंधेरे में टिम- टिम करते चिराग की पनाहों में किताब खोले बैठे बच्चों के जिवन में एक चकाचैध बल्ब कि रोषनी तो फैला ही सकता है। इस विधि से होने वाले विजली उत्पादन से अंधकार में डुबे कम से कम बीस घरों में छः घंटो तक असानी से दुधिया बल्ब की रोषनी फैलाई जा सकती है। विज्ञान के विकास के बाद खेतो को जोतने के लिए बाजार में तरह- तरह के यंत्र आ चुके हैं। हैरो और टिलर जैसे कृशि यंत्र जो की बिना ट्रैक्टर के नही चलाये जा सकते, इन सब को चलाने के लिए जयादा डीजल खर्च होता है। जिससे खेती में लागत जयादा आती है ऐसे में कानपुर गौषाला सोसाईटी ने षेखर ट्रैक्टर जैसे यंत्रो का आविश्कार कर बैलों द्वारा खेतो की जुताई बिना इंधन को करना मुमकिन किया। इस षेखर ट्रैक्टर को इस तरह से तैयार किया गया है की बैल की कम उर्जा और किसानों के कम समय और कम लागत से आसानी से खेतो की जुताई की जा सके। कानपुर गौषाला सोसाईटी के भागीरथ प्रयासो से सकरातमक परिणाम अब प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते है। इन सब के अलावा इस गौषाला में एक गोबर गैस पलांट की स्थापना भी की गई है। इस पलांट की स्थापना उत्तरप्रदेष के पूर्वमुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने करवाई । भारतीय तकनीक द्वारा इजाद की गई इस विधि के अंतर्गत एक 85 घन मिटर का टैक बनाया गया है। जिसमें गोबर एकत्रित कर के सीएनजी गैस का उतपादन किया जाता है। जिसका उपयोग जनरेटर और कई प्रकार की अन्य मषीनों और वाहनों को संचालित करने में किया जाता है। अगर बिजली उत्पादन करने वाले जनरेटर का संचालन इस गैस द्वारा किया जाता है, तो 75 प्रतिषत गैस और केवल 25 प्रतिषत डीजल के इस्तेमाल से जनरेटर द्वारा बड़ी असानी से उर्जा उत्पादित की जा सकती है। आज के इस दौर में बढ़ती डीजल की क़ीमत आसमान छू रही है ऐसे में ये तकनीक और जयादा अहम हो जाती है। इस तकनीक को अगर बड़े स्तर पर काम लिया जाय तो ये गा्रमीण भारत के लिए ये एक वरदान साबित होगी। जहा पर इस तरह के छोटे मोटे यंत्रो का संचालन किया जाता है। आधुनिकता के इस दौर में आज हर कोई जयादा उपज पाने के लिए रसायनीक खाद का जयादा से जयादा उपयोग कर रहा है, ऐसे में खेतो की उर्वरा षक्ति भी घटती जा रही है, साथ ही ऐसे में रसायनीक खाद द्वारा उपजाई जाने वाली फसलो और साक सबजियों में कीटनाषको की मात्रा बढ़ जाने से कई तरह की घातक बिमारीयों का खतरा बढता ही जा रहा है। जो समाज को अस्वस्थ बना रहा है भारत के भविश्य को अंध्कार के गर्त में धकेल रहा है। ऐसे में कानपुर गौषाला सोसाइटी के पुनीत प्रयासो से जैविक खाद का उत्पादन आने वाली पीढ़ी की जरूरत को दर्षा रहा है। और समाज को रसायनीक खाद के उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक कर के कृशी में जैविक खाद की उपयोगीता बढ़ाने के लिए प्ररित का रहा है। समाज में कानपुर सोसाइटी जैसी पुनित संस्थाओ को सरकार को भी आगे बढ़ कर प्रोत्साहित करना चाहिए।

07 September 2012

क्या जुआ, सट्टा, लौट्री को मान्यता देना सही है ?

आज हम आपके सामने लाये हैं एक ऐसा मुददा, जो आज भी हमारे समाज के लिए अभिशाप बना हुआ है और सदियों पहले भी अभिशाप था। आज भी ये घरों को उजाड़ रहा है और इंसानों की जिंदगी को लील रहा है, तो वहीं इतिहास में भी ये सर्वनाष का कारण बना है। जी हां आज हम बात कर रहे हैं, जुआ, सटटा, लाट्री, जो आज माडर्न तरीके से लेकर पुराने तरीकों से खेले जा रहे हैं। इतिहास गवाह है, कौरवों पांडवों के पाषें महाभारत जैसे बड़े युद्ध की वजह बने। आज भी रायल जगह जैसे बड़े होटल्स से लेकर फार्म हाउस तक, जुआ, सटटों और लाट्री की एषगाह बने हुए हैं। यहीं नही आम आदमी भी इसके मोहपास में फंसकर, अपना घर परिवार बर्बाद कर रहा हैं। आम आदमी की गाढ़ी कमाई, लालच देकर जुआ सटटों के बहाने छीनी जा रही है। करोड़पति बनने का लालच लोगों को खोखला कर रहा है। ऐसे में लोग अपना घर बार बेचकर लाट्री जुए में फंस गये हैं। जैसे पांडवों ने द्रोपदी को दाव पर लगाया था वैसे ही उदाहरण आज भी देखने को मिल जाते हैं। लोग जुआ, लाट्री के लालच में फंसकर अपनों को और खुद को भी भूल रहे हैं। आज लाट्री और जुआ के मारे हजारों लाखों परिवार मिल जायेंगे देष में, जिन्हाने अपना सब कुछ जुआ के लालच में गंवा दिया। आज वो दर-बदर की ठोकरें खा रहे हैं। इनमें बहुत से ऐसे भी मिल जायेगे आपको, जो बहुत बड़े करोडपति और अरबपति रहे हों। राजमहलों और राजघरानों में रहने वाले जुआ की लत में फंसकर भीख मागने को मजबूर हो गये। आज जुआ और लाट्री को लूटेरों ने आम आदमी को लूटने का जरिया बना लिया है। षराबखानों के साथ जुआ को परोसना सरकार की नाक के नीचे खुलेआम चल रहा है। यहां ये लूटेरे बड़े ही षातिराना अंदाज में लोगों की जेब को खाली कर रहे हैं। आज युवा भी आसानी से इन लोगों के बहकावे में आ रहे हैं। युवा आधुनिकता के बहाने खूब इन अययासखानों के षिकार हो रहे हैं। मगर सरकार है कि हाथ पर हाथ रखे बैठी है। अब सरकार बैठे भी क्यों नही, ऐसा माना जाता है कि ये जुआघर सरकारी लोगों की आमदनी का एक जरिया हैं। इसी वजह से न तो सरकार इन जुआघरों और लाट्री पर प्रतिबंध लगाती और ना ही कोई नियम कानून लाती। अगर किसी मुख्यमंत्री ने इसे बैन करने की कोषिष भी कि तो उसे जुआखोरों के सामने झूकना पड़ा। जिसकी वजह हुई कि आज तक जुआ और लाट्री का धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। आपको पता होगा आइपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट में कितने अरबों खराबों का सटटा लगता है। कितने ही आज ऐसे खिलाड़ी है, जो सटटेबाजी में देष की इज्जत को दाव पर लगाये बैठे हैं। लेकिन अब समय आ गया है के ऐसे लूटेरों और इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए, हमें जागना होगा। सब कुछ सरकारों पर ही नही छोड़ना होगा। हमें और आपको आगे आना होगा, समाज को जगाने के लिए। इसके लिए सरकार पर भी दबाव बनाना होगा। क्योंकि जुआ सटटा इतिहास के पन्नों में भी बैन था तो अब भी होना चाहिए। क्योंकि इसने हमारे कई घरों को बर्बाद कर दिया। आज युवा जुआ के लिए जेब काटने से लेकर हत्याएं तक करने पर उतारू हैं। आपने खुद महसूस किया होगा, कि आपके बराबर वाले पार्क में युवा कैसे जुआ और षराब की लत में डूबे हुए है। ये युवा कैसे चमकते भारत की तस्वीर बनेंगे, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। तो आइए हमारे साथ। खड़े होईए समाज और सरकार को जगाने के लिए। और रखिए अपने विचार समाज के इस राक्षस को खत्म करने के लिए।

02 September 2012

क्या अश्लील विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

आज के बदलते दौर में सब कुछ बदल गया है। इस बदलाव के दौर में लोग पैसा कमाने के लिए जिन विज्ञापनो का सहारा ले रहे है, क्या ये विज्ञापन सचमुच अपने मकसद को पुरा कर है, या फिर इन विज्ञापनो के आड़ में देह व्यापार से लेकर कामुक्ता तक को बढ़ावा देने के लिए ये सब प्रयोग किये जा रहे है। ये अपने आप में वाकई एक बड़ा सवाल है। लेकिन आज जिसगती से ये सब कुछ हो रहा है इसका समाज के उपर कितना ज्यादा प्रभाव पड़ता है सायद इन विज्ञापन दाताओ को मालुम नही होगा। हमारा देष सदियों से ही विष्वगुरू रहा है। जो दुनिया को सही रास्ते पर चलना सिखाता है, मगर आज एक षिक्षित समाज के अंदर जब इस प्रकार के भ्रामक विज्ञापन अपना प्रभाव दिखाने लगे तो, सायद एक बार फिर हम सब को सोचना होगा की आखिर हम आज किस रास्ते पर जा रहे है। चाहे बात अखबार का हो या फिर टेलिविजन का हर जगर ऐसे अष्लील विज्ञापनो का चमक अपना दुषित प्रभाव छोड़ रहा है। लेकिन सबसे अहम बात ये है की ऐसे विज्ञपानो को रोकने के लिए देष में कानून होने के वावजुद इसके उपर रोक नही लग पा रहा है। हमारे देष में जिस पीछड़े वर्ग को समाज के मुख्य धारा में लाने की बात होती है, आज वही लोग इस तरह के विज्ञापनो से होने वाले दुस्प्रचार के षिकार हो रहे है। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है की आखिर इसके लिए जिम्मदेर कौन है ? टीवी चैनल तो हद तक इस तरह के असलिल विज्ञापनो के लिए एक गाईडलाईन के तहद इसे रात में दिखाते है, मगर अखबारो में तो ऐसे विज्ञापन इस कदर छाए रहते है की जैसे ये विज्ञापन ही समाचार हो। मसाज कराने से लेकर जपानी तेल के नाम पर विज्ञाप हो, या फिर सैक्स समस्या को दुर करने वाली कोई उत्पाद कही न कही ये सब कुछ उस आम उपभोक्ता को प्रभावित कारता है जो इनके हकीकतो से कोसो दुर है। इन विज्ञापनो के आड़ में आज देह व्यापार का धंधा भी काफी ज्यादा फल-फुल रहा है। इसके फिछे भी देष विदेष के नेटर्वक काम कर रहे है। जो गलत विज्ञापन देकर पहले उन्हे फंसाते है और बाद में उस गिरोह का हिस्सा बनने को मजबुर करते है जहा कि दलदल से निकलना काफी मुष्किल होता है। ऐसे विज्ञापनो के जाल में सबसे ज्यादा स्कुल के वह गरिब बच्चें सिकार होते है जो कम समय में पैसा कमाना चाहते है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ऐसे विज्ञापनो के उपर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

01 September 2012

क्या "एक था टाईगर" फिल्म पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

फिल्में हमारे समाज का आइना होती हैं। जों लोगों में देषभक्ति का जज्बा जगाती हैं। हमारे देषभक्त षहीदों और वीरों की कहानियां समाज को बताती हैं। जिसे देखकर देषवासियों में देषभक्ति की भावना हिलोरें लेने लगती हैं। लेकिन अब ऐसी फिल्में बन रही है, और पैसे कमाने का रिकार्ड भी बना रही हैं, जिनका हीरो अपने छोटे से हित के लिए देष से गददारी करता है। और हम मजे से उसकी गददारी पर अपना पैसा लूटा रहे हैं। जी हां आज हम बात कर रहे है फिल्म एक था टाइगर की। जिसका हीरो एक लड़की के लिए देष से गददारी करता है। और वो भी उस भारतीय खूफिया ऐजेंसी का ऐजेंट, जिसकी नीतियों पर देष की सुरक्षा टीकी हुई है। ऐसे ही हीरो की फिल्म कमाई के रिकार्ड बना रही है। लेकिन सोचिए आज हमारा समाज कहां पहुंच गया है। पाकिस्तान ने इस फिल्म पर बैन लगा दिया। जबकि पाकिस्तानी ऐजेंट लड़की ने कोई भी गलत काम नही किया। लेकिन भारत के ऐजेंट जिसे भारत में टाइगर नाम से जाना जाता है। वो देष और अपने पेषे से गददारी करता है। लेकिन फिर भी भारत सरकार और हमारा समाज इस फिल्म की असलियत को नही पहचानते। आखिर क्यों पाकिस्तान और हम इसकी हकीकत को पहचानते हैं। आखिर क्यों आप फिल्म देखने के बाद देष हित को भूल जाते हैं। क्या हम अपने उन जाबांजों की कद्र नही करते जो अपना सब कुछ त्यागकर देष के लिए आज भी विदेसी जेलों में सड़ रहे हैं। मगर अपनी जबान के ताले आज तक नही खोले। देष के लिए दर-बदर की ठोकरें खा रहे है। देष हित के लिए कहां कहां भीख मांग रहे हैं। अपनी हर एषो-आराम की जिंदगी को खत्म कर दिख उन जाबांजों ने देषहित के लिए। मगर कभी उनके चेहरे पर उफ तक नहीं आती। लेकिन टाइगर एक छाटे से हित के लिए देष और देष की आवाम से गददारी करता है। और हमारी आवाम भी उसे बिना कुछ सोचे समझे अपनाती है। ऐसा लगता है आज देष के फिल्म निर्माताओं में तो देष भक्ति की भावना तो खत्म हो गई लगती ही है। मगर हमारा समाज और युवा वर्ग भी देषप्रेम की भावना से कोसो दूर निकल गया लगता है। क्या आज ऐसे फिल्म मेकर खत्म हो रहे है जो लोगों में फिल्म के जरिए देष प्रेम की भावाएं जगाते थे। क्या आज ऐसा समाज खत्म हो गया है जो देषभक्ति की फिल्मों के लिए उमड़ पड़ता था। क्या अब हम थियेटर में केवल इंटरटेनमेंट के लिए जाते हैं और उसमें ये भी भूल जाते हैं कि हमारा हीरो देषप्रेम से गददारी कर रहा है। और हम भी उसका मजा उठा रहे हैं। आखिर क्यों नही आतीं हमारे मन में ऐसी बातें। क्यों सरकार और समाज ऐसी फिल्मों को नही नकारते। क्यों दूसरे मीडिया संस्थान ऐसी फिल्मों पर बेदाग टिप्पणी नही करते। क्यों फिल्म मेकर ऐसी फिल्म बना रहे हैं। और क्यों हम उनका समर्थन कर रहे है। तो क्यों ना ऐसे फिल्म मेकर और फिल्म पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

क्या हम नशामुक्ति के प्रति गंभीर है ?

आज हम आपके सामने एक ऐसा मुददा लेकर आ रहे हैं जो लगभग हर देष, दुनिया और हर समाज से जुड़ा है। ये एक ऐसा मुददा है जिसके लिए हमारे समाज में कोई जगह नही है फिर भी समाज इसे षानओषौकत का एक बड़ा जुमला मानता है। समाज का हर वर्ग इसमें खोया हुआ है। जबकि उसे पता है कि ये उसके लिए प्राणघातक है। जी हां आज हम बात कर रहे हैं समाज में फैली नषे की लत को। ऐसा नही है कि हमारे समाज में नषे के प्रति जागरूकता नही है। लेकिन सब कुछ जानते हुए और समझते हुए भी हमारे समाज का हर वर्ग नषे की लत में डूबा हुआ है। क्या रिक्षे वाला और क्या अपने आप को हाईप्रोफाइल कहने वाला, हर षख्स नषे में डूबा हुआ लगता है। अब डूबें भी क्यों नही इस नषे में डूबना आज के युवा वर्ग का ट्रेंड जो बन गया है। सबको पता है कि नषा हमारे षरीर के लिए नुकसानदायक है। लेकिन दोस्ती की पींगे मारना और पार्टी में दिखावा जो करना है। बस यही दिखावा तो कर देता है जिंदगी बर्बाद। लेकिन क्यों हो रहा है ये सब, क्या वजह है इस सब की। जब हम इसकी तह तक जाते है तो कई वजह दिखाई देती है इन सब की। सबसे बड़ी वजह है, आज ऐसा कोई सख्त कानून का ना होना जो नषा मुक्ति पर कड़ाई से रोक लगा सके। सरकारें और राजनैतिक दल हमेषा से नषा मुक्ति को पैसे और राजनीति के खेल में तोलते हैं। समाज का आइना दिखाने वाली फिल्में धड़ल्ले से युवाओं को नषे की ओर ढ़केल रही हैं। जब अपने आप को दिखाने वाले खुलेआम फिल्म में कहते है ए गनपत चल दारू ला.... तो आप खुद ही सोच सकते हैं क्या प्रभाव पड़ेगा इसका हमारे युवाओं पर। जब चिकनी चमेली पव्वा लगाके आयेगी तो युवा पीढि के मन में नही आयेगा पव्वा लगाने का। जब पार्टी में गाना चलता है दो घूंट पिला दे षाकिया बाकी मेरे पे छोड़ दे..... तो फिर क्यों नही सोचेगा युवा क्यों ना ये भी करके देखा जाये। जब फिल्म का हीरो कहेगा दम मारो दम, मिट जाये गम..... तो फिर दुनियाभर की टेंषन लिए युवा क्यों नही सोचेगा कि में भी ये सब अपनी टेंषन कम कर सकता ! आज ये सारे सींन हमारे फिल्मी जगत में धड़ल्ले से चल रहे हैं। देष में सेंसर बोर्ड नाम का बना हुआ है। फिल्मों में सिगरेट सीन बैन हैं फिर भी मिलीभगत से सब कुछ चल रहा है। क्यों चल रहा है ये आप सब जानते हैं कि कैसे पैसे के लिए सब खेल खेल जा रहा है। हमारे युवा पहले तो षौकिया ये सब अपनाते हैं मगर फिर वो उसके लती हो जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब इंसान बिना स्मौकिंग और नषो के नही रह सकता। बस यही से षुरू हो जाता है इंसान का हर तरह से पतन। क्या षालीनता, और क्या गौरव, और क्या स्वास्थ्य हर तरह से इंसान खत्म होने लगता है। अब ऐसे में कोई व्यक्ति इससे निकलना चाहे, तो फिर भी नही होता आसान निकलना। इसके लिए देष में कई सामाजिक संगठन और सरकार भी कई तरह के कार्यक्रम चलाती है। मगर क्या हम होते है इन सब से जागरूक। क्या कभी सोचते है कि स्मौकिंग, टौबेको और दूसरे नषे कितना नुकसानदायक है हमारे षरीर को, नही ना। क्योंकि हम जानते हुए भी सभी चीजों को अनदेखा कर रहे हैं। हमें नषे के बारे में सब कुछ पता है मगर फिर भी हम इसमें डूबते जा रहे हैं। तो अखिार क्यों हो रहा है ये सब। क्या इस सब के लिए समाज में आज एक आंदोलन की जरूरत नही है।

26 August 2012

सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना कितना सही ?

असम हिंसा पर खुली सरकार की पोल। अपनी नाकामी छूपाने के लिए किया सोषल नेटवर्किंग साइटों को बैन। जी हां आज ऐसा ही हो रहा है देष में। सरकार बहाना बना रही है, कि सोषल नेटवर्किंग साइटों की वजह से ही देष में हिंसा फैल रही है। ये सही है कि नेटवर्किंग साइटों पर अफवाह फैलाकर देषद्रोही और देष के दुष्मन देष में हिंसा भड़का रहे हैं। मगर सरकार देषद्रोहियों की वजाय देषप्रेमियों को निषाना बना रही है। सरकार को सोषल साइट के जरिए हिंसा फैलाने वालों के आइपी पते भी मालूम हो गये, मगर फिर भी राश्ट्रवादियों को निषाना बनाया गया। वो भी उन राश्ट्रवादियों को जो आज भी देष की संस्कृति को बचाने और राश्ट्रप्रेम की भावना के साथ जीते और मरते हैं। सरकार ने उन देषद्रोहियों पर कोई षिकंजा नही कसा जो खुलेआम देष की अस्मितता को तार तार कर रहे थे। खुलेआम देष के षहीदों का अपमान हो रहा था। पुलिस तमाषबीन बनी हुई थी। सरकारी हुक्मरानों के इषारों पर विद्रोहियों को पुलिस पकड़कर छोड़ रही थी। ये विद्रोही खुलेआम पुर्वोत्तर वासियों को धमका रहे थे। हजारों की तादात में पूर्वोत्तर भारतीय पलायन कर रहे थे, विद्रोही खुलेआम नंगा नाच नाच रहे थे। सरकार को इन विद्रोहियों पर कार्यवाही की, कभी याद नही आयी। याद आयी तो पाकिस्तान के बहाने देष के देषप्रेमियों के सोषल एकाउट बंद करने की। कई वरिश्ठ पत्रकारों और राश्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एकाउंट को बंद कर दिया गया। सरकार को सब कुछ पता था कि पाकिस्तान से हिंसा के तार जुड़े है और इसे फैला रहे हैं भारत में मौजूद कटटरपंथी। मगर सरकार ने इनके वजाय देष में अलख जगाने वाले देषप्रेमियों को निषाना बनाया। लोग कह रहे है आखिर क्यों असली बात को छुपा रही है सरकार। क्यों असम हिंसा की असली तस्वीर बाहर नही आने दी जा रही। क्यों असम हिंसा की असली तस्वीर बताने वालों को निषाना बनाया जा रहा है। क्यों देषप्रेम की भावना जगाने वालों को निषाना बनाया जा रहा है। आखिर क्या है सरकार की मंषा। अब तो लोग आवाज उठाने लगे हैं कि सरकार सोषल साइटों के बहाने किसी ना किसी तरह से हिंदुओं और संघ से जुड़े लोगों को निषाना बना रही है। नही तो क्या वजह है देष में हिंसा फैलाने वालों को बचाया जा रहा और देषद्राहियों की करतूतों पर पर्द डाला जा रहा र्है। सब जानते है कौन हिंसा के लिए जिम्मेदार है। मगर उनसे केवल बात की जा रही है। देष के ग्रहमंत्री उसी पकिस्तानी ग्रहमंत्री से बात करते है जो हमेषा भारत से सबूत मांगता है। कभी सरकार को यहां कार्यवाही करने की याद नही आती । आती है तो बस देषभक्तों और राश्ट्रवादीयों की आवाज को दबाने की। तो क्या इस तरह से सोषल नेटवर्किंग साइटों पर प्रतिबंध लगाना सही है।

क्या भारत घोटालों का देश बन गया है ?

अक्टूबर 2010 में 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। और भारत ने 38 स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रौशन किया। पर कॉमनवेल्थ गेम्स होने से पहले ही जो सच सबके सामने आया वह बेहद चैंकाने वाला था। तकरीबन 2000 करोड़ रूपए के कॉमनवेल्थ घोटाले में पानी के मग से लेकर एसी और छतरी से लेकर ट्रेडमिल की बात हो या फिर कुर्सी से लेकर फ्रिज-कूलर तक खरीदने अथवा किराए पर लेने की बात हो या स्टेडियम और टेनिस टर्फ कोर्ट के निर्माण का मामला। हर चीज में जमकर धांधली हुई। इतना ही नहीं कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन की तैयारियों के नाम पर आयोजन से जुड़े अधिकारी व कर्मचारी विदेश यात्रा का लुत्फ उठाते रहे। वहीं, बैठकों में चाय नाश्ते के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रूपए उड़ाए गए। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। अब बात आईपीएल घोटाले की करते है। आईपीएल-3 के समापन के तत्काल बाद आईपीएल प्रमुख ललित मोदी के पद से निलंबित कर दिया गया। मोदी के खिलाफ ब्लू कॉर्नर नोटिस भी किया गया। किंग्स इलेवन पंजाब और राजस्थान रॉयल्स की मालिक के हक पर सवाल भी उठा। इस प्रतियोगिता में भारी मात्रा में काले धन लगाया गया। कोच्चि की टीम से जुड़े केंद्रीय मंत्री शशि थरूर को अपने पद से हाथ धोना पड़ा और उनकी महिला मित्र सुनंदा ने भी इससे खुद को अलग कर लिया। इसका नेतृत्व करने वाली कंपनी रांदेवू स्पोर्ट्स वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड को इस सौदे में 25 प्रतिशत फ्री इक्विटी मिली थी। इस फ्री इक्विटी में से 17 प्रतिशत कश्मीरी ब्यूटीशियन सुनंदा पुष्कर को मिली। आईपीएल में 1200 से 1500 करोड़ रुपए का घोटाला होने की बात सामने आयी। कॉमनवेल्थ घोटालों को लेकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पर भी आरोप लगा। संसद में पेश होने वाली सीएजी की रिपोर्ट में कॉमनवेल्थ खेलों के कुछ ठेकों में गड़बड़ीयों को लेकर शीला दीक्षित सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया । हद तो तब हो गई जब कॉमनवेल्थ गेम्स के जांच के लिए बनाई गई षुंगलू कमेटी की रिपोर्ट दिल्ली विधान सभा में पेष होते ही षिला सरकार ने उसे खारिज कर दिया । और अपने आप को खुद पाक साफ करने के लिए कोई कोर कसर नही छोड़ा।

अगर वित्तीय घोटाले की बात करे तो यहा पर भी फेहरिस्त काफी लंबी है। सबसे पहले सुरूआत सत्यम घोटाले से करते है। भारत की चैथी सबसे बड़ी साफ्टवेयर कंपनी भी घोटाले से नही बच सकी । 7 जनवरी 2009 को उसके संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू द्वारा 8000 करोड़ रूपये के घोटाले होने की बात जब सामने आयी तो देष में हड़कंप मच गया। इस घोटाले में रामलिंगा राजू ने माना कि पिछले सात वर्षों से उसने सिलसिलेवार ढंग से कंपनी के खातों में हेरा फेरी की और जो नकदी और बैंक बैलेंस खातों में दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में आस्तित्व में है ही नहीं। उसकी नकदी और बैंक बैलेंस 5040 करोड़ा रूपये कम थे। देश में निवेश पर बुरा असर टालने, अंश धारियों के हितों की रक्षा और 51 हजार कर्मचारियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए पहले तो सरकार ने सत्यम के नये निदेशक बोर्ड का गठन किया और बाद में इस कंपनी को संकट से उभारने के लिए एक बचाव पैकेज देने का भी निर्णय किया। इस घोटाले से करोड़ो रूपया डूब गया है, हजारों कर्मी बेकारी की कगार पर पहुंच गये। राजस्व को भारी नुकसान हुआ। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सन् 1990 से 92 का वक्त बड़े बदलाव का वक्त था। देश ने उदारवादी अर्थव्यवस्था की राह पर चलना शुरू ही किया था। इसी दौर में एक ऐसा घोटाला हुआ जिसने भारत में शेयरों की खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन कर दिए। 1990 की शुरुआत से ही शेयर बाजार में तेजी का रुख था। इस तेजी के लिए जिम्मेदार शेयर ब्रोकर हर्षद मेहता, कारोबारी मीडिया में ‘बिग बुल’ का दर्जा पाकर शेयर बाजार को अपनी अंगुलियों पर नचाने वाला व्यक्ति बन चुका था। वह शेयर बाजार में लगातार निवेश करता जा रहा था और इसके चलते बाजार में तेजी बनी हुई थी। लेकिन किसी को भी ये अंदाजा नहीं था कि आखिर मेहता को बाजार में निवेश के लिए इतना पैसा कहां से मिल रहा है। आखिर जब इस रहस्य से पर्दा उठा तो लोग संन्न रह गये। 23 अप्रैल 1992 को एक अंग्रेजी अखबार में छपे एक लेख में बताया गया कि किस तरह मेहता बैंकिग के एक नियम का फायदा उठाकर बैंकों को बिना बताए उनके करोड़ों रुपए शेयर बाजार में लगाकर अकूत पैसा कमा रहा है। ये बात सामने आते ही शेयर बाजार तेजी से नीचे गिरा और निवेशकों को करोड़ों की रकम गंवानी पड़ी। इस घोटाले में कई बैंकों को सम्मिलित रूप से तकरीबन पांच हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। अब बात स्टांप पेपर घोटाले की करते है। 2001 में शहर के दिल्ली दरवाजा इलाके से 20 लाख रुपये के फर्जी स्टांप पेपर, रिवेन्यू स्टांप और शेयर हस्तांतरण स्टांप जब्त किये थे। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। सीबीआई ने घटलोदिया इलाके से तीन करोड़ रुपये के और फर्जी स्टांप पेपर आदि जब्त किये थे। पंजाब में कथित रुप से सामने आए 1,000 करोड़ रुपए गैरकानूनी हवाला कारोबार में अंतरर्राष्ट्रीय गिरोहों और दिल्ली के एक कारोबारी की संलिप्तता सामने आने के बाद एक बार फर देष में घोटाले की गुज सामने आयी। लुधियाना के दो कारोबारियों के कार्यालय और आवासीय परिसर से जब्त दस्तावेज और इलेक्ट्रानिक डाटासंग्रह उपकरणों से इस मामले के तार देश विदेश में दूर दूर तक फैले होने के सबूत मिले। जांच में जो बात सामने आया उसमें निर्यातक द्वारा फर्जी बिलों के आधार पर शुल्क वापसी योजना का दुरुपयोग करने और 60 करोड़ रुपए का प्रोत्साहन लाभ हथियाने का मामला सामने आया। जमीन हो या आसमान हर जगह घोटाला ही घोटाला है।

19 August 2012

आखिर कब बंद होगी गौ हत्या ?


भारतीय हिंन्दू समाज में गाय को मां कहा गया हैं। जिस गाय को हम देवी मानकर पूज़ा करते है, जिसके पुज़ा-पाठ करने से हमारा जि़वन धन्य हो ज़ाता है। इसके पुजा एवं सेवा करने मात्र सें मोक्ष की प्राप्ती हो जाती है। गाय में 33 करोड़ देवी देवता का वास होता है। मगर भारत जहाँ 80 करोड़ से ज्यादा हिन्दू रहतें है। वहा गौ हत्या लगातार ज़ारी है। कहा जाता है कि गौमाता समस्त तीर्थो के समान होती है गाय, गोपाल, गीता और गंगा धर्मप्राण भारत के प्राण है इसमें भी गौ माता का सर्वोपरी महत्व है। पूज्नीय गौ माता हमारी ऐसी मा है जिसकी बराबरी कोई देवी देवता नही कर सकता। गाय की सेवा करने मा़त्र से ऐसा पून्य पा्रप्त होता है जो बडे़-बडे़ यज्ञ दान जैसें कर्मो से भी नही होता। हिंन्दूधर्म के पुजा पाठ में गौ मू़त्र या दूध प्रयोग करते है, यहि बताता है कि हिंन्दूधर्म में गौ माता का क्या महत्व है। पुराणों में लिखा है कि गौ मा के गले में विश्णु,मुख , रूद्र, और गौमूत्र में गंगा का वास होता हैं। इतना ही नही गाय कें मूत्र,गोबर,दूध,दही और घी को पंचतत्व कहते है। मा और समाज का सबंध बहुत ही गहरा है क्योकि मा ही समाज की जननी होती है। जिस गाय को स्वयं भगवान श्रीकृश्ण जंगलो में चराते थे, और जि़न्होने अपना नाम ही गोपाल रखा, आज उस गाय को अपने स्वार्थ के लिए मारा जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि गाय को घास का एक टुकड़ा खिलाना मतलब 33 करोड़ देवी देवताओ को भोग लगाने ज़ैसा है। इसका सेवन मात्र कर लेने से इंसान पाप मुक्त हो जाता है। इसके बावज़ूद समाज में गौ हत्या लागातार ज़ारी है। आखि़र कयों, जिस गौ मा ने भारत कों षिखर पर बैठाया उसी गौ मा का चंद रूपयों के लिए वध किया जाता है। तो ऐसे में देष षिखर पर कैसे होगा जिस देष में उसकी मा का सम्मान ना हो । गाय हिन्दू समाज की सभ्यता और परंपरा को दर्षाती है। ऐसी मान्यता है, कि गाय निर्बल,दीनहीन जीवो का प्रतिनिधत्व करती है जो सरलता और षु़द्धता का प्रतीक भी है। भारत को पूरी दुनिया उसके धर्म और संस्कार के लिए जाना जाता है, लेकिन आज गौ हत्या के बढ़ने से देष का धर्म ही ख़तरे में है। हमारा देष ऋशि मुनियों का देष है और यहां पर युग युगों से गाय को माता के रूप में पूजा जाता है तो आखिर हत्या क्यों। आलम ये है कि आज उसी गाय को मौत के घाट उतारा जा रहा है जो स्वंय श्रीकृश्ण की प्यारी है। हमारे देष में लोग मंदिरों में नंदी को फूल माला चढ़ाते है और जीवित नंदी की हत्या कर पैसा कमाते है। गौ माता केवल भारत में ही नही विदेषो में भी पुजी जाती है तो फिर इनकी हत्या क्यों।ये जानते हुए की एक गाय की हत्या करनें से 33 करोड़ देवी देवताओ की हत्या होती है और एक बड़े समाज की आध्यात्मिक भावनाओ पर ठेस पहूचती है तो सरकार कदम क्यों नही उठाती है। कि पाप ही नही माहापाप है। आज़ देष में गाय दर-दर भटक रही है वर्तमान समय में गायों की दुर्दषा षहरों के सड़को पर समस्या बन गई है। सड़को पर गायों का झूंड उनके मौत का कारण बनता है। गौमाता केवल एक पषु ही नही है बल्कि वो हमारे समाज की जननी भी है। सरकार ने कई गौषाला भी बनायें लेकिन उनके हाल बद् से बद्तर है। वहां कोई व्यवस्था नही है जिससे गायों का पालन पोशण हो सके। गौ हत्या हमारे समाज की समस्या बन चुकी है। समाज़ कें कुछ वर्गो नं गौ हत्या को अपना व्यापार बना लिया है। चंद रूपयों के लिए अपनी मा समान गाय की हत्या करना क्या इस सभ्य समाज को षोभा देता है। आज़ हमारे समाज़ में गायों को खुलेआम काटा जा रहा है, हैदराबाद कें अलकबीर स्लटर हाउस में आज भी हजारों गायों को काटा जाता है। आलम ये है कि आज़ भारत विष्व का सबसे बड़ा मांस निर्यातक बन बैठा, और सरकार चुपचाप हाथ पर हाथ धरें बैठी है। आखिर कौन है इसका जिम्मेंवार और क्यों है सरकार चुप। लोग जिनका इरादा ही मा को बेचकर पैसा कमाने का है। गाव-षहरों से गाडि़यों में भर-भर कें गायों को बुचड़खाने तक लाया जाता है ताकि उनको काटकर पैसे कमाये जा सके। इस आधुनिक समय में सब कुछ करनें का तरीका आधुनिक होता जा रहा है। पहले तो बुचड़खाने में कुछ कर्मी इस घिनौने काम को अंजाम देते थें लेकिन अब आधुनिक मषीन इस काम को अंजाम देती है। गौहत्या का घिनौना खेल चोरी छुपे होता था लेकिन अब तों आलम ये है कि सरकारं इसकों बकायदा इज़ाज़त दे रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों देती है सरकारे ऐसी इज़ाजत? अगर आकड़ो पर ध्यान दे तो देष में लगातार गौ वंष की संख्या में गिरावट आयी है। अकेले केवल उत्तर प्रदेष में गौषालों की बात करें तो आकड़े चैका देने वाले है।

सहारनपुर में 7,97,877 जो घट कर 5,62,909 रह गई
मुरादारबाद मे 10,76,000 जो घट कर 7,54,595 रह गई
आगरा में 12,93,298 जो घट कर 9,56,006 रह गई
बरेली में 12,57,813 जो घट कर 10,29,837 रह गई
लखनउ में 35,47,304 जो घट कर 29,06,902 रह गई
वाराणसी में 18,84,928, जो घट कर 14,09,124 रह गई

इन आकड़ो पर ध्यान दे तो सबसे बुरा हाल लखनउ का है जहा गायों संख्या में भारी गिरावट आई है। अगर देष में गौ हत्या यू ही जारी रहा तो वो दिन दूर नही जब लोग दूध को तरस जायेंगें। और इसे माँ कहने वाले लोग देखते रह जाएंगे। माता कहलाने वाली इस पषुधन की दुर्दषा बढ़ती जा रही हैं। जहा पषुपक्षी भारत देष की अर्थव्यवस्था की रीड़ हैं वही इसको कुछ लोग खत्म करने में लगे है। भारत मे गायों की संख्या व उनकी खत्म होती नस्ले इस बात का सबुत है कि किस तरह से उनको देश के बाहर भोजन स्वरुप भेजा रहा है। खाद्यान्न उत्पादन आज भी गो वंश पर आधारित है। आजादी तक देश में गो वंश की 80 नस्ल थी, जो घटकर आज महज 32 रह गई है। यदि गाय को नही बचाया गया तो संकट आ सकता है। क्योंकि गाय से ग्राम और ग्राम से ही भारत है। 1947 में एक हजार भारतीयों पर 430 गोवंश उपलब्ध थे। 2001 में यह आँकड़ा घटकर 110 हो गयी और 2011 में यह आँकड़ा घटकर लगभग 20 गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो गया है। इससे ये अन्दाजा लगाया जा सकता है कि जिसे हम माँ कहते है उनका आज कैसे हालातों से सामना हो रहा है। भारत देष के छोटे बड़े षहरों में बड़े पैमाने पर कृशि और दूध देने वाले पषुधन की हत्या हो रही हैं। यहा तक की पष्ओं की हत्या करने के लिए बहुत से कत्लखाने देष मे गैर कानुनी तरीके से संविधान का उलंद्यन कर के चलाऐ जा रहे है। इन गैर कानुनी कत्लखानों को बन्द करवाने के लिए कई गौरक्षा समीतिया सरकार से कत्लखाने बन्द करवाने की माँग कर है, पर सरकार द्वारा कोइ ठोस कदम अब तक नही उठाए जा सका है। सरकार को इस बात से कोइ अफसोस नही है की कृशि योग पषुओं की खुलेआम हत्या की जा रही हैं। बड़े दुःख की बात ये है कि हमारे देश मे भी ये धड़ल्ले से हो रहा है, मालेगँव एक ऐसा षहर जाहाँ इस साल केवल दो महिनें में पाँच सौ से ज्यादा पष्ओं की बली दी गयी। इस बात की जानकारीं सरकार को भी दी गयी लेकिन सरकार हाथ पे हाथ रखकर खिलवाड़ करती रही है।आज जिस तरह से भारत सरकार गौ मांस का निर्यात कर रही है। इससे देष के संविधान और धर्म दोनो को खतरा है। तब देष को जरूरत होगी दुसरे ष्वेत का्रंती की। गौ हत्या केवल एक कानूनी अपराध ही नही बल्कि अपने मा के साथ अन्याय और दुराचार भी है। गौ हत्या को लेकर देष में कई आंदोलन हुए।कुछ आज भी जारी है लेकिन मलाल है की किसी को कोई बडी़ कामयाबी नही मिली वजह साफ है इन आंदोलनों को जनसमर्थन ना मिलना। ये कहना कतई गलत नही होगा कि ज्यादातर आंदोलन अपनी सियासत को चमकाने या निजी स्वार्थ के लिए होते है लेकिन गौ हत्या विरोधी आंदोलनो को सियासत से जोड़ना क्या सही होगा? गौ हत्या के विरोध में कई हिन्दू संगठनों ने आवाज उठाई लेकिन जब पता चला कि इनका मालिक कोई रसूखदार है तो उनकी आवाज़ दबा दी गई। हैरत की बात है कि गौ हत्या पर पाबंदी की मांग लंम्बे समय से होनें कें बावज़ूद अभी तक कोई अमल नही हुआ है। इसके बावजूद गौ हत्या का खूनी खेल जारी है। सवाल केवल गाय को मार कर उसके मांस को बेचने का नही है। उसकी हडिड्यों से तेल और पाउडर भी बनाया जाता है जो कि हमारे सेहत के लिए नुकसानदेह भी है। जिस गाय का दूध प्रयोग न कर उसके हडिडयों का प्रयोग करना क्या सही है। आज सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है। सत्ता में बैठे कुछ लोग इसके लिए स्वयं जिम्मेदार है। क्योंकि वो खुद इस माहापाप को बढा़वा दे रहे है। आपको बता दे कि गौ हत्या से बड़े पैमाने पर गौ तस्करों के साथ-साथ सरकार को भी फायदा होता है,आज देष के अनेको मुद्दों पर संसद भवन में चर्चा होती है ।लेकिन देष में गौ हत्या को रोकने के लिए कोई कानून क्यों नही बनता। देष में हर मुद्दे के लिए फास्ट टैªक कोर्ट बने है, लेकिन गौहत्या के लिए कोई कोर्ट नही? ऐसे मे सवाल उठता है कि कैसे रोका जाय गौ हत्या को। गुजरात,मध्यप्रदेष,उत्तराखंड और राजस्थान जैसे राज्यो में भी गौ हत्या पर 10 साल के सज़ा का प्रवधान है। गुजरात में गौ हत्या की सज़ा 6 महीने से बढ़ाकर 7 साल कर दी गई है साथ ही जुर्माने के तौर पर 1000 के बजाय 50,000रू देने होंगे। तो ऐसे में बडा़ सवाल उठता है कि केन्द्र सरकार गौहत्या पर चुप क्यों है।04 नवंबर 1947 को प्रार्थना सभा में भारत के राश्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गाधी ने अपने एक बयान देते हुए कहा कि गौ रक्षा के लिए देष में कानून नही बन सकता है, क्योकि भारत कोई हिंन्दू र्धिर्मक राज्य नही है। इसलिए हिंन्दूओं के धर्म को दूसरों पे थोपा नही जा सकता है। मैं गौ सेवा में पुरा विष्वास रखता हूँ, लेकिन उसे कानून द्धारा बंद नही किया जा सकता है।इतना ही नही अपने एक बयान में देष के तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बडे़ ही कठोरता से कहा था कि गौ हत्या बंदी कानून से मुसलमान एवं ईसाई समाज कांग्रेस से नाराज हो जायेगा । इस बयान का मतलब साफ है उन्हे देष से नही बल्की अपने वोट बैंक से प्यार किया। गौ हत्या राकने के लिए आगे आयें। और गौ रक्षा के लिए कदम आगे बढ़ाए करें। देष के लिए यही एक सच्चा सेवा होगा।

भारतीय चिकित्सा विज्ञान में डॉ एल पी अग्रवाल की भूमिका

भारत का चिकित्सा विज्ञान आज जो तरक्की के बुलंद सपने देख रहा है। उसको पूंज देने वालों में एक प्रमुख नाम है, प्रोफेसर ललित अग्रवाल जिनके नाम में ही प्रकाष है। संयोग देखिए प्रकाष के धनी प्रोफेसर अग्रवाल की जन्म तिथी वही है जो महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाश चन्द्र बोस की हैं। तेजस्वी ललित अपने बडे़ भाई प्रेम प्रकाष अग्रवाल आईसीएस के तरह गणित पढ़ना चाहते थे। कुषाग्र बुद्धि और परिश्रमी स्वभाव से किंग जार्ज मेडिकल कालेज में उन्हे प्रवेष मिल गया। जब युवा ललित द्वितीय वर्श की पढ़ाई कर रहे थे, उसी वक्त देष में भारत छोड़ो आन्दोलन का बिगुल बज गया। ऐसे में एक देष भक्त युवक कहा रह सकता था पीछे। वे कूद पड़े आन्दोलन में इसकी वजह से उन्हें प्रषासन का प्रकोप भी सहना पड़ा। एमबीबीएस पूरी करने के बाद डा अग्रवाल उच्च षिक्षा के लिए लंदन चले गए। ब्रिटेन में षिक्षा लेते वक्त उनके गुरूजन भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। उनके गुरू और विष्व प्रसिद्ध नेत्र विषेशज्ञ डा देवेन पोर्ट ने उन्हें एक पत्र में लिखा- आफ आल दा इंडियन पोस्टग्रेजुएट्स हू हैव बीन एट मुरफील्ड्स सिंस दा वार, देयर हैज बीन नो कीनर मैन नो मैन हू हैज डॅन बैटर इन हिज एक्जामिनेषन और वर्क हार्डर टू गैन एक्सीपियरेस इन एवरी ब्रांच आफ दासब्जैक्ट । पढ़ाई के बाद डा अग्रवाल ने भारत आकर अपने कार्य की षरूआत सिविल सर्जन के तौर पर एक छोटे से कस्बे बिजनौर से की। लेकिन उनकी मंजिल तो कुछ और ही थी। लग गए आगरा और कानपुर में युवा डाक्टरों का भारत खड़ा करने में। इस वक्त तक प्रोफेसर अग्रवाल की षोध विष्वप्रसिद्ध हो चुकी थी। महज 34 वर्श की आयु में ही वें प्रतिंश्ठत षोध पत्रिका, आप्थमेलाजीका, के संपादक मंडल के सदस्य बने। 37 वर्श की आयु में ही एम्स के प्रोफेसर के रूप में चुने गए। कानपुर मे अपनी और पत्नी डा. सावित्री के धनवर्शा करने वाली प्रैक्टिस नहीं भाई। भाती भी कैसे, एम्स में अपने सपने को साकार करने का अवसर जो मिल गया था। इस सपने के पीछे एक दर्द छुपा था, जो उन्हें लंदन में पढाई के वक्त मिला था। उन्हें पूजनीय मानने वाले डा. अग्रवाल के उसी दर्द को बताते हैं प्रोफेसर पी.के खोसला। उस वक्त तक प्रोफेसर अग्रवाल के साथ कई उपलब्धिया जुड़ चुकी थी। जैसे प्रोफेसर अग्रवाल ने एम्स परिसर में ही देष को आत्म निर्भर बनने वाले डा राजेन्द्र प्रसाद नेत्र संस्थान की स्थापना की। प्रोफेसर अग्रवाल के आर पी सेन्टर बनने के पीछे एक सोच थी। क्योंकि प्रोफेसर जानते थे, देष के हालातों के बारे में। प्रोफेसर मदनमोहन बताते हैं। आर पी सेन्टर के पीछे प्रोफेसर अग्रवाल की दूर- दृश्टि। वे भारत में आई सेन्टर और उसकी उपयोगिता जानते थे। जब देष में डा अग्रवाल ने आई सेन्टर और राश्ट्रीय नेत्र बैक की नींव रखी उस वक्त देष में कार्निया की कमी थी। प्रोफेसर अग्रवाल की दूरदर्षिता और कड़ी मेहनत सामने आने लगी। विदेषी भी सोचने पर मजबूर हो गए। भारतीय छात्रों की आवष्यकता को ध्यान में रखते हुए नेत्र विज्ञान के क्षेत्र में अनेक पुस्तकें लिखीं। वे भारत सरकार के पहले आनेनरी ओपथेलमिक एडवाइजर बने। डा अग्रवाल के कई प्रतिश्ठित राश्ट्रीय और अंर्तराश्ट्रीय सम्मान मिले। विष्व के सबसे प्रतिश्ठित केवल साठ नेत्र वैज्ञानिको की संस्था ओपथेलमिक इंन्टरनैषनल के भारत के पहले और एकमात्र सदस्य थे। विष्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से प्रोफेसर अग्रवाल ने एसिया और अफ्रीका में अंधेपन को रोकने के लिए कार्ययोजना बनाई। देष, विदेष के वरिश्ठ डा उन्हें भारत में आप्थलमोलोजी को नई उचाई तक ले जाने का श्रेय देते हैं। एम्स के डा. राजेन्द्र प्रसाद सेन्टर परिसर मे स्थित ओपथेलमीक रिसर्च एसोसिएषन का पुस्तकालय उनके सम्मान में उनके नाम पर कर दिया गया। डा. अग्रवाल के परिवार की एन जी ओ संकल्प मे रोटरी कल्ब दिल्ली अपटाउन के सहयोग से डा. एल पी अग्रवाल रोटरी मेमोरियल आई बैंक की स्थापना की। इस आई बैंक का उदघाटन भारत के उपराश्ट्रपति महामहिम हांमिद अंसारी ने 26 दिसम्बर 2011 को किया। इस अवसर पर अपने उदघाटन भाशण मे उपराश्ट्रपति ने कहा, प्रोफेसर अग्रवाल अपने जीवन काल में ही एक नेत्र विज्ञान के क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त हस्ती बन चुके थे। प्रोफेसर अग्रवाल कर्म करते- करते कर्मयोगी बने। कर्मयोगी कभी सेवानिवृत नहीं होता। जीवन की अंतिम सास लेने से आधा घंटा पहले ये कर्मयोगी इंडिया हैबिटेट सेंटर में सेमिनार के आयोजन कर व्यवस्थाओं में सक्रिय भाग ले रहा था। आज ऐसे दूर दृश्टा और कर्मयोगी की कमी खलती रहेगी। ऐसे प्रेरणा विद् को षत् षत् नमन।

18 August 2012

क्या देश को बेचा जा रहा है ?

क्या आप भूल गये अंग्रेजी जमाने की हकीकत। कैसे अंग्रेज देष को लूट रहे थे और हम उस वक्त कुछ नही कर पा रहे थे। करते भी कैसे, हमारे अपनों के हाथ में कुछ भी जो नही था। लेकिन आज तो हमारे अपनो के हाथ में देष की सत्ता है। लेकिन सत्ताधारी हमें अपना दिखाने का दिखावा कर रहे हैं। मगर पीछे से देष की हर चीज को बेचा जा रहा है। कोयला महाघोटाला सामने आने के बाद अब तो ना देष की जमीन बची है ना आकाष ना पाताल। हर ओर महाघोटाले ही घोटाले हैं। हर ओर देष की अस्मत को बेचा जा रहा है। अब तो लगने लगा है देष के सत्ताधारी देष को चलाने के बजाय देष को बेचने के लिए ही काम करते हैं। देष के सत्ताधारी देष की जरूरतों और देषवासियों की गरीबी के लिए नही देष को बेचने की ट्रिक सोचते रहते हैं। जी हां सारे घोटालों की हकीकत सामने आने के बाद अब तो ऐसा ही महसूस हो रहा है। आज देष में जितना सरकार के पास खजाना है उससे कई गुनी ज्यादा देष की संपत्ति घोटालों की भेट चढ़ गई है। हवा में तरंगों को बेचा जा रहा है। देष के एयरोस्पेस को बेचा जा रहा है। तो वही देष के पाताल को बेचा जा रहा है। देषवासियों की जिंदगी को बेचा जा रहा है। आज देष के इंसानों की हालत चूहों से भी बदतर है। किसी भी देष में चूहों पर दवाइयों के परिक्षण के लिए भी, उस देष की सरकार की पर्मिषन की जरूरत होती है। मगर भारत में तो इंसानों पर भी दवाईयों के परिक्षण की पर्मिषन की जरूरत नही होती। खुलेआम विदेसी दवाई कंपनियां गरीबों के षरीर को दवाई परिक्षण का घर बना रही हैं। भोपाल गैस त्रासदी पीडि़तों के षरीर को बिना बताये दवाई परिक्षण की लेब बनाया जा रहा है। लोगों की किडनी बेची जा रही है। यहां तक कि डेड बीडियों तक को भी नही छोड़ा जा रहा र्है। राजनीति के लिए देष के थोड़े-थोड़े हिस्सों को बेचा जा रहा है। कभी कष्मीर की बारी आती है तो कभी असम की तो कभी अरूणाचल प्रदेष का नंबर आता है। देष के सत्ताधारी, तो राजनीति के लिए पूरे देष को ही बेच दें, मगर राश्ट्रवादी ताकतों से डरे हुए हैं। लोग कह रहे है आज देष में बढ़ती उथल-पुथल सत्ताधारी राजनेताओं की राजनीति की ही वजह है। देष के सत्ताधारी खुलेआम देष को बेच रहे हैं। मगर सेनापति अब भी मौन साधे हुए हैं। जनता कह रही है कि सेनापति की आखों के सामने ही देष को बेचा जाता है और सेनापति अपनी सरदारी में मशगूल है। तो आखिर क्यों लूट रहा है देष। कौन लूट रहा है देष को। कैसे लूट रहा है देष। क्या है हकीकत देष को लूटने वालों की। क्यों है हौंसले बुलंद देष के लूटेरों के। यही आज बता रहे है हम आपको।

जमीनी स्तर पर सेना में घोटालो की फेहरिस्त

अगर घोटालो की फेहरीस्त में जमीनी स्तर की बात करे तो यहा पर पूरी जमीन ही घोटले से भरी पड़ी है। बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचैलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी। इसके बाद दुसरा घोटाला सेना से ही जुड़ा हुआ है जिसमें अमरीका से सेना में इस्तेमाल करने के लिए अल्यूमिनियम के कुछ ताबूत और शव रखने वाले थैले खरीदने के एक मामले में कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और अमरीका के एक ठेकेदार की भुमिका सामने आया। भारत के रक्षा मंत्रालय ने अमरीका की एक कंपनी से अल्युमिनियम के ताबूत और शव थैले खरीदे थे और उनका इस्तेमाल युद्ध क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों के शव सम्मानजनक तरीके से घर पहुँचाने के लिए किया जाना था। लेकिन इन संदिग्ध अधिकारियों ने 1999-2000 के दौरान ऐसे 500 अल्यूमुनियम ताबूत और 3000 शव थैले खरीदने के लिए अमरीका की एक कंपनी के साथ जो सौदा किया उसमें प्रति ताबूत 2500 अमरीकी डॉलर यानी लगभग एक लाख बीस हजार रुपए और शव थैलों के लिए 85 अमरीकी डॉलर प्रति थैला के हिसाब से भुगतान किया गया जो की बहुत बढ़ी हुई दर थी। यह सौदा करीब सात करोड़ रुपए का था। तिसरा घोटाला भी सेना ही जुड़ा हुआ है बीईएमएल के सीएमडी वीआरएस नटराजन ने 6000 करोड़ रुपये के टाट्रा ट्रकों का ठेका सीधे उत्पादन कंपनी को न देते हुए उसके ब्रिटिश एजेंट को दिया था। यह सौदा रक्षा खरीद दिशानिर्देशों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। इस जवाब को भेजे 2 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है और मामले की जांच का कोई नतीजा सामने नहीं आया है। यह घोटाला भी सेना से ही जुड़ा हुआ है, जिसमें पश्चिम बंगाल की सुखना छावनी क्षेत्र में कथित भूमि घोटाले में सैन्य अधिकारियों की संलिप्तता का मामला है। जहा पर सेना के जमीन को औने पौने दामो में बेचा गया। अब बात करते है सेना के अंदर हुए सबसे बड़ा घोटाला जो मुंबई के आदर्श हाउसिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी का घोटाला है। इसमे न केवल कारगिल शहीदों की विधवाओं के नाम पर दी गई जमीन पर बड़े और प्रभावशाली लोगों ने आपस में बांट ली बल्कि इसकी कीमत भी नहीं चुकाई। इस बेशकीमती जमीन पर बने शानदार फ्लैट उन्हें कौड़ीयों के मोल दे दिए गए। करीब साढ़े आठ करोड़ रुपए कीमत वाले ये फ्लैट सदस्यों को 60 से 85 लाख रुपए तक में मिल गए। इन सब के अलावे एक और घोटाला विमान घरीद से जुड़ा हुआ हुआ है। जिसमें सेना को नई ताकत और धार देने वाले मानव रहित विमान-यूएवी की खरीद घोटाला हुआ। यूएवी विमान को इजरायल से खरीदा गया था। चाहे आसमान हो या जमीन हर जगह घोटाला ही घोटाला है।

17 August 2012

असम की प्रतितिक्रिया देश के अन्य हिस्सों में क्यों ?

असम की आग आज सारे देष में फैल रही है। पूर्वोत्तर के लोगों पर देष के कई हिस्सों में हमले हो रहे हैं। बैगलूरू, हैदराबाद और पुणे में रहने वाले पूर्वात्तर वासी पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं। मोबाइल पर मैसेज भेजकर लोगों को डराया धमकाया जा रहा है। वापस असम न जाने पर बुरे परिणाम भुगतने की धमकी दी जा रही है। जी हां आज भारतवासी ही भारत में हर जगह रहने के लिए स्वतंत्र नही हैं। जबकि बंग्लादेषी घुसपैठिए भारत में एषे-आराम की जिंदगी जी रहे हैं। डेढ़ करोड़ बंग्लादेषी भारत में ही भारतीयों का कत्लेआम कर रहे हैं। खुलेआम पाकिस्तानी झंडे फहराये जा रहे हैं। जी हां आज यही भारत में भारतीय लोगों की सहमी हुई आजादी और बंग्लादेषियों का भारतीयों पर खुलेआम कत्लेआम। आखिर क्यों हो रहे है भारतीय भारत में सहमी हुई जिंदगी जीने पर मजबूर। क्यों भारतीय लोगों को अपने ही देष में निषाना बनाया जा रहा हैं। आखिर क्यों है देष की सरकार, भारतीयों पर ढहते जुल्म पर चुप। बंग्लादेषी घुसपैठियों के लिए देष के आजाद मैदान पर विरोध प्रदर्षन होता हैं। देष के षहीदों का अपमान किया जाता है। मुम्बई के आजाद मैदान पर अमर जवान मेमोरियल को खंडित किया जाता है। पुलिस और मीडिया को पीटा जाता है। पुलिस जवानों द्वारा पकड़े गये दंगाइयों को पुलिस कमिषनर तुरंत छोड़ने को कहते हैं। दंगाईयों को उपद्रव और देष की अस्मितता से खेलने की खुली छूट दी जाती है। आखिर किसके कहने पर कमिषनर दंगाईयों को खुली छूट दे रहे हैं। ये सवाल आज भी छूपा हुआ है। लोग कह रहे हैं वोट बैक की राजनीति की वजह से ही देष की अस्मितता से खिलवाड़ हो रहा है। देष के कटटरपंथियों को कुछ सरकारी लोग और कम्युनिस्ट ही सह दे रहे हैं। इन्हीं की वजह से आज देष में कटटरपंथियों के हौंसले बंलंद र्हैं। देष के कटटरपंथी खुलेआम पाकिस्तन जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। अमर जवान मैमोरयिल को तोड़कर पकिस्तानी झंडा फहराया जाता है। लोग कह रहे हैं, आखिर क्यों भारत में रहने वाले लोग पाकिस्तान को अपना मसीहा मानते हैं। ऐसे में सवाल उठता हैं कि क्या भारत में रहने वाला हर समुदाय भारतीय नही है। मजहब और मजहबी रिष्ते देष की मिटटी से बड़े हो गये हैं। लगता तो ऐसा ही है। आखिर कौन है ये लोग जो भारत में रहते हुए ही भारतीय अस्मितता और देष के षहीदों का अपमान कर रहे हैं। क्या ऐसे ही देष की अखंडता पाकिस्तानी मानसिकता के लिए तोड़ी जाती रहेगी। क्या कष्मीरी पंडितों की तरह ही भारतीय अपने देष से भगाये जाते रहेंगे। क्या अब ऐसे ही बंगलादेशी घुसपैठिये अपना नंगा नाच नाचते रहेगे। क्या इन बंग्लोदेसियों से सहानुभूति के नाम पर भारतीय कटटरपंथी भारतीयों पर ही कहर ढाते रहेंगे। क्या ऐसे ही देष के पुर्वोत्तर वासियों को देष से भगाया जाता रहेगा। आखिर कौन हे इसके लिए जिम्मेदार ? लोग सवाल उठा रहे हैं इसके लिए सरकार और सरकारी नीतियां ही जिम्मेदार हैं। तो ऐसे में सवल उठता है कि क्या देष के नेता ही, देष की एकता और अखंडता को तोड़ने पर तुले हुए है।

क्या रामदेव को ब्लैकमेल किया जा रहा है ?

बाबा रामदेव रामलीला मैदान पर अंषन कर रहे है। सरकार की सेहत पर बाबा की मागों का कोई असर नही है। सरकार बाबा को ब्लैकमेल करने के लिए हर तरह की साजिष रच रही है। कभी बाबा के अंषन को रामलीला मैदान पर होने वाली, हर साल की रामलीला बताया जाता है, तो कभी बाबा को पहचानने से ही इंकार कर दिया जाता है। लेकिन सरकार का सबसे बड़ा सच तब सामने आता है जब कांग्रेस महासचिव दिग्विजय बाबा को धमकाते हुए, जेल में बाबा के सहयोगी बालकृश्ण की हत्या की बात करते हैं। जी हां बाबा रामदेव के आंदोलन को कुचलने और बाबा को ब्लैकमेल करने के लिए, इसी तरह की साजिष रची जा रही हैं सरकारी आकाओं द्वारा। ये तो बाबा भी जानते हैं कि कांग्रेस का डर्टी डिपार्टमेंट आंदोलन को कुचलने के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नही हटेगा। इसी को देखते हुए रामदेव बाबा जेल में अपने सहयोगी बालकृश्ण की हत्या की आषंका पहले ही जता चुके है। बाबा को पता था कि सरकार उन्हें कमजोर करने के लिए बालकृश्ण की हत्या की साजिष रच सकती है। लेकिन दिग्विजय सिंह का ये बयान सनसनी फैलाने वाला है। अब ये बाबा रामदेव के लिए धमकी है या आषंका ये तो दिग्विजय ही बता सकते हैं। मगर इससे सरकार की साजिष का खुलासा होता है। उसे बाबा राम देव की कालेधन और लोकपाल की मागों से कुछ नही लेना। ये सरकार तो हर तरह से बाबा को डराने धमकाने में लगी हुई है। वैसे भी ऐसी भ्रश्ट सरकार से उम्मीद ही क्या की जा सकती है। ये सरकार पहले भी बाबा के आंदोलन को आधी रात को कुचल चुकी है। कौन भूल सकता है उस आधी रात को जब सोते हुए आंदोलनकारियों को बुरी तरह से कुचला गया। कैसे सरकारी हुक्मरानों के हुक्म पर महिलाओं और बुजुर्गों को भी कुचला गया। अब जब बाबा रामदेव काले धन को वापस देष में लाने के लिए फिर देषहित में आंदोलन कर रहे है तो फिर सरकार बाबा को डराने के लिए उनके सहयोगियों की हत्या की धमकी दे रही है। लगता है बाबा इन्ही धमकियों से डरे हुए हैं। यहीं वजह है ना तो बाबा सरकार के खिलाफ आक्रामक हो रहे है और ना ही अपनी आगे की रणनीति का खुलासा कर रहे हैं। इसी वजह से सरकार बाबा की मागों पर कोई ध्यान नही दे रही है। वैसे भी ये सरकार भ्रश्टाचार और काले धन के लिए कोई कदम नही उठा रही है। तो आज हम सरकार की इसी साजिष का खुलासा कर रहे हैं कि कैसे बाबा के आंदोलन पर काला साया मंडरा रहा है। कैसे बाबा के खिलाफ शडयंत्र रच रही है सरकार। कैसे बाबा के सहयोगियों की हत्या की साजिष रची जा रही है। तो यही है आज का बिंदास बोल मुददा, कि कैसे सरकारी हुक्मरान बालकृश्ण की हत्या की धमकी दे रहे है और आषंका जता रहे हैं।

14 August 2012

भूखे पेट को क्या चाहिए रोटी या मोबाइल ?

आज के इस दौर में देश के राजनैतिक दल किस हद तक जा सकते हैं, लोग शायद ही इसकी कल्पना कर पाएंगे। जब भी देश में चुनाव निकट आते हैं तो सभी पालीटकल पार्टियां मतदाताओं के लिए प्रलोभनों का पिटारा खोल देती हैं। अब तक तो चुनाओं में टैलीविजन, साडि़या लैपटॉप, मंगलसूत्र, चावल-आटा व यहां तक कि सैनीटरी नैपकिन जैसी चीजें मुफ्त देने की घोषणाएं हो चुकी है। मगर सवाल यहा ये खड़ा होता है की जिस देश में गरीब इंसान को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं होती उस देश में सरकार उस गरीब इंसान को मुफ्त में मोबाइल देना चाहती हैं !!! ताज्जुब इसलिए भी है की तकरीबन 15 प्रतिषत लोग अमीर वर्ग की श्रेणी में आते हैं, देष में तकरीबन 30 प्रतिषसत लोग माध्यम वर्गीय श्रेणी में आते हैं और बचे हुए 55 प्रतिषत लोग या जनता गरीबी की श्रेणी में आती हैं। जाहिर सी बात हैं की इन 55 प्रतिषत जनता जनार्दन को अपनी और मोबाइल के द्वारा ही खीचा जा सकता हैं। क्या वाकई में भारत जैसे देश में एक गरीब को सिर्फ मोबाइल की ही जरुरत हैं, किसी और चीज की नहीं? क्या उसे उसकी प्राथमिक जरूरते जो की उसका एक भारतीय नागरिक होने के नाते और हक के तौर पर रोटी, कपड़ा और मकान की जरुरत नहीं हैं? ये सवाल यहाँ पर इसलिए उठता हैं की आखिरकार सरकार कही देश में भ्रष्टाचार से आहात तो नहीं है ? क्या किसी मोबाइल कंपनी ने कही अपने फायदे के लिए सरकार को कोई प्रस्ताव तो नहीं दिया है। जिससे उस मोबाइल कंपनी का फायदा हो और साथ में इस नाकारा और सरकार की डूबती नैया को भी एक सहारा मिल जाये। कही यह एक तरह से दोनों के बीच में डील तो नहीं हैं या सरकार इस तरह से परदे के पीछे कुछ और करना चाहती हैं? क्या भारत के गरीब इंसान की तरक्की सिर्फ मोबाइल से ही संभव हैं? देश में 44 प्रतिशत बच्चे ऐसे है जो रात को भूखे पेट सोते हैं। इनके सिर पर न तो कोई छत है और नहीं ये सरकार द्वारा संचालित किसी खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत आते हैं। भारत में 35.6 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं और 55.3 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। यहां जन्म लेने वाले 22 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से कम होता है जबकि 79 प्रतिशत बच्चे खून की कमी का शिकार हैं। प्रत्येक 1000 नवजात बच्चों में से 53 की मौत जन्म के पहले वर्ष में और 39 बच्चों की मौत जन्म के एक महीने के भीतर हो जाती है। देष में आज भी कई ऐसे इलाके है जहा पर बिजली भी नहीं है तो सोचना चाहिए कि मोबाइल को चार्ज कैसे किया जाएगा । क्या आज के दौर में देष आज इस मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है जहा सिर्फ चुनाव जीत कर सत्ता में बना रहना ही राजनीति है। आखिर सरकार ऐसी लोकलुभावन बाते क्यों करती है? क्या सरकार अपना विष्वाष आम आदमी से खो चुकी है? क्या सरकार विकास और विष्वाष के बुते चुनाव में उतरने से डरती है? या यू कहे की सरकार का सरोकार आम आदमी से खत्म हो गया हैं ? यानी संविधान का मतलब अगर लोकतंत्र है और लोकतंत्र का मतलब अगर हर नागरिक के वोट का अधिकार है और वोट का मतलब अगर संसदीय राजनीति है। और संसदीय राजनीति का मतलब अगर संसद के जरीये बनाई जाने वाली नीतिया हैं। और नीतियों का मतलब अगर तत्काल में देश के पेट को भरना है। और पेट के भरने का मतलब पैसो वालो के जरीये विकास का ढांचा बनवाना है। और विकास के ढांचे का मतलब अगर मुनाफा बनाना है। और मुनाफे का मतलब अगर बहुराष्ट्रीय कारपोरेट को कमाने का लालच देकर निवेश कराना है। तो फिर संविधान का मतलब क्या है। तो इसका मतलब बिलकुल साफ है की सत्ता से उखडने की आहट सरकार षायद अभी से इस मोबाइ के ट्रिंग ट्रिग से सुनना चाहती है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की गरिब को क्या चाहिए रोटी या मोबाइल।

07 August 2012

सरकार द्वारा भगत सिंह को शहीद न मानना कितना सही ?

देश के लिए देश शहादत देने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह को केन्द्र सरकार आज भी स्वतंत्रता सेनानी नहीं मनाती। केन्द्र सरकार से आरटीआई के तहत जब इस सवाल का जवाब मांगा गया तो कोई भी इस बात पर संतुष्ट जवाब नहीं दे पाया। सवाल यहा ये है, की आजादी की लड़ाई में अपनी जान देने वाले भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को सरकार स्वतंत्रता सेनानी क्यो नहीं मानती? क्या सिर्फ इन तीनों की कुर्बानी को किताबों में ही याद रखा गया है। आखिर सरकार बार बार क्यों शहीद को हर मोड पर नजर अंदाज कर रही है। क्या यह भी सरकार की वोट बैक की राजनीति का एक अहम हिस्सा है। जब भी स्वाधीनता आंदोलन की बात होती है तो, गांधी, नेहरू और पटेल को ज्यादा याद किया जाता है। भगत सिंह और उनके साथियों के प्रति श्रद्धा के बावजूद उन्हें पूरा श्रेय नहीं दिया जाता। आखिर ऐसा क्यों? गांधी, नेहरू आदि नेताओं का जो भी योगदान रहा हो, लेकिन भगत सिंह के आंदोलन और बाद में उनके शहीद होने से ही आजादी को लेकर लोगों में जागृति फैली। मगर आज हमारे सरकार इन बिर हिदों के नमन करने के बजाय हिद का दर्जा देने से लेकर, सरकारी फाईलों में दर्ज जानकारी तक को सरकार और लालफिता शाही वाले अधिकारी उजागर करने से कतराते है। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव इन हिदों ने आजादी की लड़ाई में सबसे कामयाब शखिसयतों में से एक हैं। इन हिदों ने जो कुछ भी किया, उसके पीछे तर्क था, सोच थी। इनका लक्ष्य सत्ता प्राप्ति नहीं था, व्यवस्था परिवर्तन था। आज भी देगा ऐसे ही व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई चल रही है। मगर आम जनता आज भी महसूस कर रही है कि उसे अब भी वास्तविक आजादी नहीं मिल सकी है। रोज-रोज सिस्टम की नई खामियां सामने आ रही हैं। इस दौर में अब ये भी सवाल खड़ा होने लगा है की कहीं स्वाधीनता की लड़ाई में ही कोई बुनियादी गड़बड़ी तो नहीं थी? सवाल इस लिए भी जायज है की सरकार जिस प्रकार से आज सहिदों के प्रति अंधी, गुंगी, बहरी हो चुकी है ऐसे में ये कहना गलत नही होगा की

भारत क्यों तेरी साँसों के, स्वर आहत से लगते हैं,
अभी जियाले परवानों में, आग बहुत-सी बाकी है।
क्यों तेरी आँखों में पानी, आकर ठहरा-ठहरा है,
जब तेरी नदियों की लहरें, डोल-डोल मदमाती हैं।

भारतीय राष्ट्रवाद के इन नायकों से जो अपेक्षा थी उन्होंने तो अपने प्रयासों से अंजाम भी दिया। मगर आज भी हमारी सरकार देश को ऐसे राष्ट्रनायकों के पदचिन्हों का अनुसरण करना तो दुर उन्हें हिद मानने तक को तैयार नही है। एक ओर जहा देश की नई पीढियां ऐसे महान क्रांतिकारियों के कार्यों और विचारों से प्रेरणा लेना चाहती है तो वही सरकार उनके विचारो और आदर्शो को लाल फाईलो से बाहर नही निकालना चाहती है। आज देके युवाओं को ऐसे महान सपूतो की राह पर चलने की जरुरत है ताकी देश की बागडोर कर्तव्य निष्ठ युवाओं के हाथ में सुरक्षित रहे।

आज सभी आजाद हो गए, फिर ये कैसी आजादी
वक्त और अधिकार मिले, फिर ये कैसी बर्बादी
संविधान में दिए हकों से, परिचय हमें करना है,
भारत को खुशहाल बनाने, आज क्रांति फिर लाना है...

भगतसिंह और उनके साथियों के सपने आज भी अधूरे हैं। आज अगर देको बचाना है, प्रकृति को तबाह होने से बचाना है, आने वाली पीढियों के भविष्य को बचाना है तो आज हमारे पास इन हिदों के सम्मान करने और उनके राह पर चलने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है। आज हम शहीदे आजम भगतसिंह के विचारों को अमल में उतारने का संकल्प लें। आज एक बार फिर से इंकलाब को सिर्फ एक शब्द के बजाय अपने जीने का तरीका बनाना होगा। भगतसिंह और उनके सभी साथियों के प्रति यही एकमात्र सच्ची श्रद्धाजंलि हो सकती है। फिर सरकार क्या हर हिंदुस्तानी कहेगा इंकलाब जिंदाबाद।

हिदों के मजारो पर लगेंगे हर बरस मेंलें ।
वतन पर मिटने वालो का यही बाकी निशा होगा॥

04 August 2012

पाक को भारत में निवेश की अनुमति देना चाहिए ?

पाकिस्तान को भारत में प्रत्यक्ष तौर पर निवेश करने की इजाजत सरकार ने दी है। इस अनुमती से पाकिस्तान तत्काल प्रभाव से भारत में विदेशी निवेश कर सकेगा। मगर यहा बड़ा सवाल ये खडा होता है की जिस पाकिस्तान के तरतूतो से आए दिन भारत में अतंकी हमले हो रहे है। जिस पाकिस्तान द्वारा भारत में जाली नोटो का बढ़ावा दिया जा रहा है। ताकी भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर बनाया जा सके। तो ऐसे ये सवाल रह उस हिंदुस्तानी के मन में उठ रहा है की क्या ये भी पाकिस्तान की कोई साजिद्गा तो नही है। डीआईपीपी के मुताबिक, पाकिस्तान का कोई भी नागरिक या पाकिस्तान की कोई भी कंपनी भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कर सकता है। ऐसे एक बार फिर सवाल उसी मोड पर आकर खड़ा हो जाता है की क्या अजमल आमिर कासाब जैसे पाकिस्तानी नागरिक भी भारत में निवेद्गा कर सकेगा। दाउद और ओसामा जैसे खुंखार आतंकवादीयों के परिवार के लोग भी भारत में अपनी पैसा लगा सकेंगे। अबैध तरिके से हवाला के जरिए होने वाले पैसे का लेन देन अब इस निवेद्गा के जरिए किया जाएगा। अमूमन सवाल कई सारे है मगर आज पाकिस्तान जिन हालातो से गुजर रहा उन हालातो से निपटने में क्या उसका भारत में किया गय निवेद्गा कुछ राहत दिला पाएगा? अगर निवेद्गा से पाकिस्तान को लाभ होता है तो क्या पाकिस्तान उस पैसे का इस्तेमाल हिंदुस्तान में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने में नही करेगा। क्या निवेद्गा के जरिए किया गया मुनाफा हमारे देद्गा के सैनिको के उपर हमले करने और सिमा पार से अपनी घुसपैठी सक्रियता को बढ़ावा देने, और पाकिस्तान के सरजमी से हिदुस्तान को दहलाने का साजिद्गा रचने से पाकिस्तान बाज आ पाएगा? ये बड़ा सवाल है ऐसे में उंगली भारत सकार के उपर भी उठती रही है की आखिर सरकार ऐसे क्यों कर रही है । क्या उसे देद्गा के लोगों के बारे में कोई फिक्र नही है। क्या सरकार का सरोकार आम आदमी से टुट गया है। पाकिस्तान के साथ हर तरह का व्यापार लगातार हो रहा है, उसके साथ सदभावना एक्सप्रेस रेल गाड़ी चालू करने से लेकर एफ डी आई में निवेद्गा तक की अनुमती दी जा रही है। मगर पाकिस्तान हर बार भारत के साथ अपनी दोगली नीती ही अपनाता है। कारगिल युद्ध के दौरान भी पकिस्तान से आने वाली चीनी का अग्रिम भुगतान कर दिया गया था, भारत ने यह मिसाल कायम की, मगर पाकिस्तान उस रकम से हथियार खरीद कर कारगिल युद्ध में हमारे हजारों वीर जवानों को मौत की नींद सुला दिया। बात चाहे इतिहास का हो या वर्तमान का पाक का नपाक चेहारा हर बार उजागर हुआ है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या भारत में पाकिस्तान को बिदेशी निवेद्गा की अनुमती देना चाहिए ?

क्या अन्ना को राजनीती में आना चाहिए ?

देद्गा में चारों ओर भ्रच्च्टाचार ही भ्रच्च्टाचार है । जनता के चुने हुए ही जनता को चूना लगा रहे हैं। देद्गा का आम आदमी अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। लेकिन इसी वक्त देद्गावासियों में एक उम्मीद की लहर जगी। लगा जैसे देद्गा को लुटने से बचाया जा सकता है। आखिर टीम अन्ना जो एक उम्मीद बनकर आयी थी आम आदमी के लिए। ऐसा लग रहा था मानों दोराहे पर खड़े देद्गा को एक दिशा मिलेगी। देद्गा को लूटने से बचाया जा सकेगा। भ्रच्च्टाचारियों को जेल में डाला जायेगा। देद्गा की जनता सकून महसूस करेगी। जनता को उसका हक मिलेगा। जी हां यही उम्मीद थी टीम अन्ना के आंदोलन से जनता को। मगर अन्ना के चारों तरफ के कुछ लालची आंदोलनकारियों ने जनता को कहीं का न छोड़ा ये तो सबको पता था कि टीम अन्ना के सदस्य अपनी राजनैतिक रोटियां सेक रहे हैं। मगर ये किसी को नहीं पता था कि आंदोलन को ऐसे मझधार में छोड कर चले जायेंगे। जनता को लग रहा था कि टीम अन्ना जनलोकपाल की लड ई अंत तक लड़ेगी । मगर ये किसी को नही पता था कि जनलोकपाल की लड़ाई , टीम अन्ना अपने राजनैतिक मकसद के लिए लड रही है। देद्गा का, क्या बूढा क्या जवान, सब अन्नामय हो गये। देद्गा का हर समुदाय भ्रच्च्टाचार की लड़ाई में शामिल हुआ, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन देद्गा भ्रच्च्टाचार से मुक्त होगा। अन्ना की एक आवाज पर देद्गा का युवा जहां था वहीं रूक गया। हर देद्गावासी जहां था वो भ्रच्च्टाचार की इस लड़ाई का समर्थन कर रहा था। भ्रच्च्टाचारियों को अहिंसा का सबक सिखाया जा रहा था। भ्रच्च्टाचारी इस आंदोलन से घबराने लगे थे। ये लड़ाई पूरे देद्गा बनाम चंद भ्रच्च्टाचारियों की थी। भ्रच्च्टाचारियों के पांव उखड ने लगे थे। जनता अपने हक के लिए खरी हो गई थी। लेकिन टीम अन्ना की राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने जनता की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। टीम अन्ना अब राजनैति पार्टी बनाने की सोच रही है। नेता बनकर टीम अन्ना देद्गा का भ्रस्टाचार खत्म करना चाहती है। टीम अन्ना का विचार है संसद में पहुंचकर ही भ्रच्च्टाचारियों को खत्म किया जा सकता है। लेकिन क्या इस आंदोलन से भ्रच्च्टाचार खत्म नही होता। क्या देद्गा की सरकार इस आंदोलन से नही झुकती। क्या जनता टीम अन्ना का आंदोलन के रूप में समर्थन नही करती। लेकिन सवाल उठता है कि क्या भ्रच्च्टाचारी टीम अन्ना को संसद तक पहुंचने देंगे। क्या टीम अन्ना इन भ्रच्च्टाचारी राजनेताओं के सामने टिक पायेगी। सबको पता है ये भ्रच्च्टाचारी अपने सामने किसी को नही टिकने देंगे। ऐसा लगता है टीम अन्ना को न तो देद्गा की राजनैति दिशा का पता न भौगोलिक दिशा का। राजनीति के लिए क्या है टीम अन्ना के पास। थोड़े से इंटरनेंट यूजर और देद्गा का थोडा सा पढ़ा लिखा तबका। क्या देद्गा की इस एक डेढ पर्सेंट जनसंखया से चुनाव जीते जा सकते हैं। क्या देद्गा का ये छोटा सा समूह टीम अन्ना को संसद तक पहुंचा देगा। वैसे अन्ना हजारे कर्ई बार कह चुके हैं कि अगर वो चुनाव में आये तो उनकी जमानत जब्त हो जायेगी। मगर अन्ना के इर्दगिर्द वाले कुछ लोग लगता है अन्ना को अपने जाल में फंसाने में कामयाब हो गये। सरकार जो चाहती थी अब टीम अन्ना वहीं करती दिखाई दे रही है। लगता है टीम अन्ना को ये बात समझ में नही आयी। और एक सफल आंदोलन को चढ़ा दिया राजनीति की भेट। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या टीम अन्ना राजनीति में आकर देद्गा को सुशासन की राह दिखा पायेगी। लगता तो नही है, कि राजनीति में आकर किसी ने देद्गा का भला किया।

29 July 2012

क्या आचार्य बालकृष्ण को फसाया जा रहा है ?

बाबा रामदेव ने सरकार के खिलाफ आंदोलन की घोषणा कर दी है। सरकार ने भी बाबा को कमजोर करने के हर हथखंडे अपनाने शुरू कर दिये हैं। सरकार बाबा को हर तरह से कमजोर करना चाहती है। आखिर बाबा ने सरकार की दुखती रग पर हाथ जो रख दिया है। जी हां एक बार फिर दिखाना शुरू कर दिया है सरकार ने अपना दमनकारी रूप। बाबा रामदेव के शिष्य आचार्य बालकृष्ण को सीबीआई ने हिरासत में ले लिया है। सीबीआइ ने बालकृष्ण पर फर्जी दस्तावेज के जरिए पासपोर्ट हांसिल करने और धोखधड़ी का आरोप लगाया है। सीबीआई आचार्य बालकृष्ण को फर्जी डिर्गीधारी बता रही है। बालकृष्ण के संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल नरेद्गचंद्र द्ववेदी को भी आरोपी बनाया है। आचार्य बालकृष्ण को सीबीआई ने न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। ऐसे में देश  के लोग सवाल उठा रहे हैं, आखिर उसी वक्त क्यों बालकृष्ण को हिरासत में लिया जाता है, जब बाबा आंदोलन की घोषणा करते हैं। संस्कृत कॉलेज के लोग क्यों पहले बालकृष्ण की डिग्री को सही बताते है। लेकिन बाद में आखिर कौन सा दवाब आ गया जो वो डिग्री को फर्जी बता रहे हैं। प्रिंसिपल डिग्री को सही बताते हैं तो उनको भी फंसाया जाता है। अब ऐसे में एक ही सवाल उठता है कि क्या सरकार बाबा के आंदोलन से डरने लगी है। क्या सरकार काले धन को वापस नही लाना चाहती।

लगता तो ऐसा ही है। सरकार के कारनामों ने दिखाना सुरु कर दिख है। वो अपने खिलाफ होने वाले हर आंदोलन को कुचलना चाहती है। वो नही चाहती देश का काला धन वापस आये। वो नही चाहती देश से बालकृष्ण खत्म हो। आंदोलन से जुड़े लोगों को कमजोर करने के लिए सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार है। लेकिन इससे योग गुरू बाबा रामदेव कही कमजोर होते नही दिख रहे। योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि बालकृष्ण ने क्या डकैती की है, या वो आतंकवादी हैं। झूठे मुकदमें दर्ज करके उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। केंद्र सरकार हमें दबाने की कोशिश कर रही है। हमारा आंदोलन दबने वाला नहीं है। इससे हमारा आंदोलन और तेज होगा। बाबा रामदेव ने कहा कि हमें न्याय व्यवस्था में पूरा भरोसा है। बालकृष्ण को सताया जा रहा है, अभी तक उनकी नागरिकता को सीबीआई झुठला नहीं सकी है। लेकिन चार्जशीट दाखिल कर दी। योग गुरु ने कहा कि जो लोग लाखों रुपये के घोटाले किए हैं उन्हें सीबीआई छोड़ देती है और संत को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बालकृष्ण के साथ ऐसा क्यूं किया जा रहा है ये समझ से बाहर है। बाबा रामदेव ने आरोप लगाया कि ९ अगस्त को होने वाले आंदोलन को कमजोर करने की ये साजिश है। लेकिन आंदोलन होकर रहेगा।

क्या अब आर पार की लड़ाई हो जाए ?

अन्ना देश के अन्ना हैं, इस बार जंतर मंतर पर गम और गुस्से का अजीब संगम है, हर तरफ बस एक ही शोर है कि शायद अन्ना का ये अनशन आम आदमी के हक में एक ऐसा कानून बना सके जिसके डर से भ्रष्टाचारी को पसीने आ जाएं, क्योंकि अन्ना के समर्थन में आने वालों का ये मानना है कि अन्ना जो कहते हैं सही कहते हैं। बेईमान सियासत के इस न खत्म होने वाले दंगल में आम आदमी थक कर चूर हो चुका हैं। मगर फिर भी बेईमान नेताओं, मंत्रियों, अफसरों और बाबुओं की बेशर्मी को देखते हुए अन्ना लड़ रहे हैं। बेईमान और शातिर सियासतदानों की नापाक चालें हमें चाहे जितना जख्‌मी कर जाएं, अन्ना हजारों के आगे दम तोड देती हैं। देश में ऐसी परिस्थितियां बन चुकी हैं जहां आम जनता अपने आप को अकेला, असहाय और ठगा हुआ महसूस कर रही है, जिसे यह पता नहीं कि जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वह आन्दोलन कर रही है वह कभी उसे मिलेगा भी या नहीं। ऐसे अब इस बार लोकपाल की यह लड़ाई आर पार की स्थिति में आ पहुंची है। पिछले ४० साल से देश की आम जनता की नजर एक ऐसे विधेयक पर पड़ी है जिसे यदि पास कर दिया जाए और एक कानून का रूप दे दिया जाए तो शायद देश की आधी समस्या दूर हो सकती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का संघर्ष जारी है, लेकिन अब यह आंदोलन इस ओर बढ ने लगी है जहां पर अन्ना आंदोलन बनाम केंन्द्र की सोई हुई सियासतदानो के साथ जंग ए ऐलान हो जुका है। तमाम तरह की मीडिया और जनता के सपोर्ट के बाद यह आन्दोलन तो सफल रहा लेकिन अंत में सरकार ने वही किया जिसके लिए वह जानी जाती है। उसने बिल तो पास नहीं किया उलटे आंदोलन करने वाली टीम अन्ना पर ही वार कर दिया। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या टीम अन्ना को अपनी अंतिम युध्द बाड छोड नी चाहिए। इस बार टीम अन्ना भी आन्दोलन को अंतिम अंजाम तक ले जाने की मूड में हैं। पिछले डेढ साल से सरकार के धोखों और ढकोसलों से वह पूरी तरह वाकिफ हो चुकी है इसलिए इस बार टीम अन्ना लोकपाल पर कम फोकस करते हुए उन मंत्रियों पर ज्यादा हमले दाग रही है जो लोकपाल कानून बनने में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। अगर बात की जाए पिछले दो दिन से जारी इस आंदोलन की तो इस बार सरकार की बातों से बता चलता है कि वह किसी भी तरह से आंदोलन को हाइप देना नहीं चाहेगी और न ही उन सभी मुद्दों पर गौर फरमाएगी जिसे टीम अन्ना ने रखा है। इस बार के आंदोलन में मीडिया की भी कुछ कमी दिखाई दे रही है। इसका एकमात्र कारण सरकार की मीडिया जगत पर दबाव और दमनकारी नीति है। जंतर-मंतर के गम और गुस्से को करीब से सायद अभी देद्गा के सताधिशो को अभी नही हो पा रहा है। जंतर मंतर की भीड किसी वोट बैंक का हिस्सा नहीं बल्कि उनकी है जो भ्रष्टाचार से तंग आ चुके हैं। हजारों लोगों को किसी एक नाम से पुकारेंगे तो यकीनन वह नाम अन्ना ही होगा। बहरहाल ये एक ऐसा आंदोलन है जिसकी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । तो ऐसे में कहना गलत नही होगा की अब आर पार की लड़ाई हो ही जाय।

सरकार अणा आन्दोलन को नजर अंदाज़ क्यों कर रही है ?

टीम अन्ना जंतर-मंतर पर भ्रच्च्टाचार के खिलाफ आंदोलन कर रही है। टीम अन्ना के कई सदस्य भूख हड़ताल पर बैठे हैं। सरकार अपनी मस्ती में मद्गागूल है। भ्रच्च्टाचारी मंत्री खुलेआम देद्गा को लूट रहे हैं। टीम अन्ना हर हाल में इन भ्रच्च्टाचारियों को जेल में देखना चाहती है। लेकिन टीम अन्ना को जनता का समर्थन जोद्गा और आक्रोद्गा के साथ नहीं मिल रहा है। जंतर-मंतर पर युवा भ्रच्च्टाचार की लड़ाई में समर्पित नही दिख रहे हैं। जी हां आज ऐसा ही लग रहा है। भ्रच्च्टाचार से त्रस्त जनता सरकारी भ्रच्च्टाचार के खिलाफ सुस्त दिख रही है। ऐसा लग रहा है जनता, खुद भ्रच्च्टाचार के खिलाफ ईमानदार नही है। भ्रच्च्टाचार की लड़ाई में जनता सांझेदार नही होना चाहती। पीछले आंदोलन के मुकाबले जनता में जोद्गा कम दिख रहा है। क्या जनता हार मान गई है। क्या जनता ने भ्रच्च्ट सरकारी हुक्मरानों को मांफ कर दिया है। क्या जनता झूंठी और भ्रच्च्ट सरकार के आद्गावासनों से सहमत हो गई है। क्या सरकार जनता की बहानेबाजी को भूल गई। लगता है ऐसा ही अंदाजा लगा रही है भ्रच्च्ट सरकार। सरकार को लगता है की जंतर-मंतर पर पहले दो दिन जनता की भागेदारी कम रही। सरकार इस गुमान में है कि जनता के कम शामिल होने से भ्रच्च्टाचार की लड़ाई कमजोर हो गई है। लेकिन जनता फिर से अन्ना आंदोलन में बढ -चढ कर हिस्सा ले रही है। आखिर जनता कैसे भूल जायेगी भ्रच्च्ट सरकार के झूंठे वादों को। कैसे इस भ्रच्च्ट सरकार ने अन्ना को जनलोकपाल लाने का वादा किया था। कैसे अपने वादे से मुकरते हुए सरकारी लोकपाल लेकर आयी। सरकार की मंशा कभी भी जनलोकपाल लाने की नही रही। सरकार कभी भी काले धन को वापस नही लाना चाहती। जनता आज भी भ्रच्च्टाचार से त्रस्त है। जनता पहले भी भ्रच्च्टाचार से परेशान थी। लेकिन सरकार को गलफहमी हो है। उसे लगता है जनता सुस्त हो गई है। लेकिन नही, जनता अपनी लड़ाई आखिरी दम तक लड़ाई । अखिर जनता को अन्ना और रामदेव के रूप में दो मसीहा जो मिल गये है। लेकिन सरकार और सरकारी हुक्मरानों को गलतफहमी हो गई है। सरकारी आका तरह तरह के बयान दे रहे है। कभी अन्ना टीम को तानाशाही बताया जाता है तो कभी बिदेशी ऐजेंट। सरकार जनता को बहकाना चाहती है। बाबा रामदेव के सहयोगियों को परेशां किया जा रहा है। अन्ना टीम को तोड़ने की साजिद्गा रची जा रही है। मीडिया संस्थानों को खरीदा जा रहा है। साजिद्गा के तहत मीडिया संस्थान आंदोलन की खाबरों को नही दिखा रहे है। सरकार इसके लिए करोडो अरबों खर्च कर रही है। गरीब को रोटी नही मिल रही है। सरकारी आका आंदोलनों को तोड ने के लिए सरकारी पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं। लेकिन सरकार समझा जाये, ये जनता का आदोलन है। जनता कभी पीछे नही हटेगी। सरकार को जनता की मांग माननी ही पड़ेगी । तो ऐसे में अब सरकार की बहानेबाजी नही चलने वाली। सरकार जल्दी से जल्दी जनता की मांगों पर गौर करे। अगर अभी भी सरकार को सदबुद्धि नही आयी तो ऐसी भ्रच्च्ट सरकार के खिलाफ देद्गा में विद्रोह भड क जायेगा। ऐसे में भड की जनता कानून व्यवस्था भी अपने हाथ में ले सकती है। इसलिए सरकार जल्दी से जल्दी आंदोलनकारियों की मांग माने और उन पर कार्यवाही करे।

क्या असम में कश्मीर दोहराया जा रहा है ?

आज हम आपके सामने एक ऐसा मुददा लेकर आये हैं, जो बड़ा ही संबेदंशील और बिदेशियो की साजिद्गा का एक नमूना है। आज देद्गा की अस्मितता, एकता और अखण्डता से खिलवाड किया जा रहा है। देद्गा के नोर्थ-इस्ट पार्ट को भी, कद्गमीर बनाने की साजिद्गा हो रही है। जैसे कद्गमीर में पाकिस्तानी घुसपैठिये नंगा नाच कर रहे है, वैसे ही असम में बंगलादेशी घुसपैठिए, असम के मूल निवासियों को खदेड रहे हैं और सरकार इन घुसपैठियों का साथ दे रही है। जी हां एक बार फिर हो रही है देद्गा को तोड ने की साजिद्गा और सरकारी हुकमरान देख रहे हैं तमाशा । असम के स्थाई निवासी बोडो समुदाय को अपना घर-बार छोड ने को मजबूर किया जा रहा है। कांग्रेसी सरकार मजे से इस खेल का मजा ले रही है। कार्यवाही के नाम पर बोडो समुदाय को ही परेशान किया जा रहा है। बंगलादेशी घुसपैठियों को सुरक्षा दी जा रही है। केंद और राज्य सरकारें वोट बैंक की राजनीति कर रही हैं। जो कभी कद्गमीर में हुआ था, आज असम में दोहराने को सरकार ने खुली छूट दे रखी है। घुसपैठियों के हौंसले बुलंद हैं। कांग्रेंस को पता है ये घुसपैठिये उसका वोट बैंक है। असम दंगों की असली तस्वीर बाहर नही आने दी जा रही है। कोई भी मीडिया संस्थान असम दंगों की सही तस्वीर पेद्गा नही कर रहा है। क्योंकि सरकार ने मीडिया संस्थानों को सही तस्वीर पेद्गा ना करने का समझौता कर रखा है। असम में घुसपैठिय नंगा नाच नाच रहे है। असम के स्थाई निवासी अपना घर बार छोड ने को मजबूर हैं। स्थाई निवासियों को कोई सुरक्षा नही दी जा रही र्है। डेढ करोड से ज्यादा बंगलादेशी असम में मौजूद हैं। २३ विधान सभाओं से ज्यादा में वो अपना प्रभाव रखते हैं। कोई भी स्थानीय नेता बोडो समुदाय पर होने वाले कहर की आवाज नही उठा रहा है। बोडों समुदाय की महिलाओं को जिंदा जलाया जा रहा है। प्रशाशन बोडों समुदाय की आवाज को दवा रहा है। बोडो समुदाय को ही दंगाई मानकर गोली मारी जा रही है। असम का मूल निवासी बोडो समुदाय असम को छोड ने को मजबूर है। जैसे कद्गमीर के मूल निवासी कद्गमीरी पंडितों को कद्गमीर छोड ने पर मजबूर किया गया, वैसे ही बोडो समुदाय को असम छोड ने पर मजबूर किया जा रहा है और इसमें सारा सरकारी महकमा घुसपैठियों का साथ दे रहा ह। कद्गमीरी पंडितों के साथ आज विदेसियों जैसा बर्ताव हो रहा है। वो भारत के मूल निवासी है मगर उनकी सुनने वाला कोई नही है। जैसे पाकिस्तान से आये घुसपैठियों और विद्रोहियों का इज्जत दी जा रही है। वैसे ही आज बंगलादेशी घुसपैठियों को कत्लेआम करने की छूट दी जा रही है। इन बंगलादेशी को भारतीय होने का प्रमाण पत्र दिया जा रहा है। भारतवासियों को शिबिरो में रहने को मजबूर किया जा रहा है। भारतीय आपने देद्गा में ही बेगाने हो रहे है। विदेशी उनका हक जबर्दस्ती छीन रहे हैं। सरकारें भी बिदेशियो को भारत में खुला तांडव करने की छूट दे रही हैं। देद्गा के सीमवर्ती इलाको पर घुसपैठियों का कब्जा हो गया है। कश्मीर की आग सीमवर्ती प्रदेशो में भी भड़कने लगी है। स्थाई निवासियों का कत्लेआम हो रहा। सरकार मौन है। असम कद्गमीर की आग में झुलस रहा है। तो क्या ऐसे ही देद्गा के सीमावर्ती इलाकों पर घुसपैठियों का कब्जा होता रहेगा। तो क्या देद्गा के मूल निवासी ऐसे ही अपना घर छोड ने को मजबूर होते रहेंगे। क्या कांग्रेस सरकार ऐसे ही वोट बैंक की राजनीति के लिए देद्गा तोड़नेवाले ने घुसपैठियों का समर्थन करती रहेंगी।

20 July 2012

पाक के साथ क्या हो क्रिकेट या जंग ?

पाकिस्तानी की क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आएगी। बीसीसीआइ और सरकार के रहनुमाओं ने इस दौरे को हरी झंडी दी है। इस खबर से देश के लोगों के मन में तरह तरह के सवाल उठ रहे है। वे पूछ रहे हैं, हमने जब पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय क्रिकेट श्रृंखला बंद करने का फैसला किया था, तब से अब तक क्या बदला है। क्या पाकिस्तान ने मुंबई के आतंकवादी हमलों के दोषियों को सजा दी। क्या पाकिस्तान में बैठे लश्करे-तैयबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी जैसे लोगों को वह भारत को सौंपने को तैयार हो गया है। क्या पाकिस्तान ने अबू जुंदाल के बयान के बाद मान लिया है, कि मुंबई पर आतंकवादी हमले में आइएसआइ और पाकिस्तानी सेना के लोग शामिल थे। क्या पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर बंद कर दिए हैं। जी नही ऐसा कुछ भी नही हुआ है। लेकिन लगता है भारत सरकार ने मान लिया है, पाकिस्तान से इन मुद्दों पर कोई भी उम्मीद करना बेमानी है। भारत में एक वर्ग है जो मानता है कि कुछ भी हो पाकिस्तान के साथ बातचीत चलती रहनी चाहिए। भारत सरकार की भी यही राय है। लेकिन पिछले ६४ सालों से भारत यही तो कर रहा है। हर धोखे और हमले के कुछ दिन बाद हम फिर बातचीत की मेज पर पहुंच जाते हैं। कश्मीर का एक-तिहाई हिस्सा चला गया, १९६५ और १९७१ का युद्ध हुआ, कारगिल हुआ, देश की संसद पर हमला हुआ, मुंबई पर हमला हुआ। हमने देश में मोमबत्ती जुलूस निकाला और उसके बाद पाकिस्तान के साथ विश्वास बहाली के नियमित कर्मकांड में जुट गए। भारत और पाकिस्तान आपस में क्रिकेट खेलें भला इससे क्यों इनकार होना चाहिए। लेकिन क्रिकेट के जरिये दोनों देशों के संबंध सुधारने का सपना हम १९७८ से देख रहे हैं। क्रिकेट कूटनीति में यकीन करने वाले मानते हैं कि इससे दोनों मुल्कों के लोगों में आपसी भाईचारा बढ़ेगा और तनाव कम होगा। क्रिकेट देखेंगे तो क्रिकेट की बात करेंगे। ऐसा कहने वाले शायद यह भी मानकर चलते हैं कि भारत पाकिस्तान की समस्या का एक बड़ा कारण, दोनों देशों के अवाम के बीच भाईचारे और आपसी विश्वास की कमी है। इस धारणा को दोनों देशों के लोगों ने हर उपलब्ध मौके पर झुठलाया है। जाहिर है कि मर्ज कहीं और है और इलाज कहीं और हो रहा है। भारत और पाकिस्तान की समस्या दोनों देशों के अवाम नहीं है। राजनीतिक दल और नेता भी नहीं है। समस्या पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आइएसआइ है। मुश्किल यह है कि आइएसआइ और पाकिस्तान की सेना क्रिकेट नहीं खेलतीं। वे जो खेल खेलते हैं वही दोनों देशों की मूल समस्या है। वे चाहते हैं कि दोनों देशों के लोग क्रिकेट में मशगूल रहें, ताकि उन्हें अगले हमले की तैयारी के लिए, आतंकवादियों के प्रशिक्षण के लिए और उन्हें भारत में भेजने के लिए शांति का वातावरण मिले। ये किसी आशंका या अविश्वास पर नहीं, छह दशकों के अनुभव पर आधारित है। जब हमने द्विपक्षीय क्रिकेट श्रृंखला बंद की थी तो एक ही मुद्दा था कि क्रिकेट और आतंकवाद साथ-साथ कैसे चल सकता है। इस सवाल को उठाने वाले युद्धोन्मादी मान लिए जाते हैं। पूछा जाता है कि युद्ध से भी तो समस्या हल नहीं हुई। युद्ध का माहौल बनने से किसका फायदा होगा। मगर बातचीत से ही अब तक हमें क्या मिला। तो इसका एक ही इलाज है हमें पाक से सारे संबंध तोड़ने होगे। हमें तकतवर बनना होगा। तो पाक फौज और आइएसआइ सोचने पर मजबूर होगी। हमारी ताकत से उसे खोप होगा। लेकिन वोट बैंक की राजनीति करने वाली भारत सरकार, देद्गा को कभी मजबूत नही करना चाहती। यही है आज देद्गा की सरकार और सरकारी रहनुमाओं की हकीकत। तो आइए खड़े होइए, इस निटठल्ली सरकार को जगाने के लिए। बता दीजिए भारत की इस निटठल्ली सरकार को, कि इस देद्गा के लोगों की जिंदगी भेड बकरियों की तरह नही है, कि पाकिस्तानी आतंकी आयें और मासूम देद्गावासियों का कत्लेआम करके चले जायें।

17 July 2012

मुस्लिम बाहुल्य इलाके में केवल मुस्लिम अधिकारी कितना सही ?

केंन्द्र सरकार की मुस्लिम तुस्टीकरण की नीति एक बार फिर से खुल कर सामने आयी है। मजहब़ और धर्मनिरपेक्षता की आड में सत्ता के शिखर पर राज करने वाली कांग्रेस सरकार एक बार फिर सरेआम अपनी हदें पार कर चुकी है। आज मुस्लिम इंस्पेक्टर, कल मुस्लिम थाना। फिर मुस्लिम पुलिस, फिर मुस्लिम न्याय संहिता। फिर मुस्लिम न्यायालय, फिर मुस्लिम न्यायाधीश। फिर मुस्लिम फौज, फिर मुस्लिम राज्य। फिर अंत में देश का बंटवारा, शायद इसी ओर आज देद्गा में केंन्द्र सरकार आगे बढ रही है, और धर्म निरपेक्षता का दंभ भरने वाले सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह, और कांग्रेसी नेताओ की ये सोच देद्गा को किस ओर धकेल रही है इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या ये कांग्रेस सरकार की मुस्लिम तुस्टीकरण और वोट बैक की राजनीति नही है। केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को मुस्लिम बहुल इलाकों में कम से कम एक मुस्लिम इंस्पेक्टर या सब-इंस्पेक्टर तैनात करने की सच्चर कमिटी की प्रमुख सिफारिश को लागू करने को कहा है। केंद्रीय गृह सचिव आर. के. सिंह ने इस सिलसिले में सभी राज्यों के मुखय सचिवों को चिट्ठी लिखी है। उन्हें जून के आखिर तक स्टेटस रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। तो सवाल यहा भी खड ा होता है की जब कानून व्यवस्था और अधिकारियों की तैनाती का विच्चय राज्य सरकार की है तो फिर यहा पर केंन्द्र सरकार अडंगा क्यो डाल रही है। मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिम इंस्पेक्टर कि तैनाती से क्या सरकार की इस नीति से आतंकवादियों को अपने मोहल्ले में पहले से और बेहतर छुपा पाने का मौका नही मिलेगा ? क्या हिन्दुओ पर योजना बध तरीके से हमला नही बढेगा ? क्या कांग्रेस सरकार को हिन्दुओ के लिए चिंता कोई चिंता नही है? पानी के लिए हिन्दुओ को पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी अक्सर पीटते है। लेकिन अब लगता है, सरकार के इस पाकिस्तानी हुक्म से अपने ही देद्गा में हिन्दुओ को पीटा जाएगा । तो ऐसे में यहा प्रद्गन जरूर झकझोरने वाला है कि क्या केंन्द्र सरकार हिन्दुस्थान में कई छोटे -छोटे पकिस्तान बनाने की योजना है तो नही चला रही है। सरकार के इस तालिबानी हुक्म से तो यही लगता है। ब्रिटिश काल में अंग्रेजो द्वारा कुछ ऐसे ही आदेद्गा जारी किए गए थे। तो ऐसे में इस आदेद्गा से यही साबित होता हैं की सरकार एक बार फिर से स्वतंत्र भारम में ब्रिटिस शासन लागू कर रही है। अगर पुलिस हिंदुओं पर हमला होन पर मुसलमानों से मिल कर मामले को रफा- दफा कर लेगी तो क्या ऐसे में देद्गा के अंदर हिंदुओं को न्याय मिल पाएगा ? इसी लिए यहा यह स्वाल खड़ा हो रहा है। विभाजन के दंगों के दौरान भी इसी तरह की बात प्रस्तावित किया गया था । संबिधान में कहा गया है की धर्म के नाम पर पक्षपात ना किया जाय लेकिन मुस्लिम के नाम मुस्लिमो को बिशेस सुबिधाये दी जा रही है, क्या यह साम्प्रदायिकता नहीं है। आज वोट के लिए संबिधान बिरोधी साम्प्रदायिकता का घोर खेल खेला जा रहा है। तो ऐसे में सवाल उठना जायज है की, क्या मुस्लिम बहुल इलाके में केवल मुस्लिम अधिकारी की तैनाती कितना सही है ?

15 July 2012

क्या राष्ट्रपति पद की गरिमा घटी है ?

भारतीय राजनीति आज जिस ओर बढ़ रही है उसको लेकर अब कई सारे सवाल खड़ा होने लगा है। इस दौर में अब सवाल यहा तक उठने लगा है की राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का बैकग्राउंड क्या हो, उसका जाती क्या है। वह किस पार्टी से संबंध रखता है। वह चाहे जिस क्षेत्र से आए, मूल शर्त यही रहती है कि वह चीजों की बेहतर समझ रखने वाला हो और सभी के लिए स्वीकार्य हो। साथ ही, उसकी निष्पक्षता पर किसी को संदेह नहीं हो। राष्ट्रपति का पद बेहद सम्मानित और मर्यादापूर्ण होता है। इस पद की गरिमा बरकरार रखने की क्षमता जिस किसी व्यक्ति में हो, वह राष्ट्रपति बनने के योग्य हो सकता है। राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च पद होता है, और इस पद पर बैठे व्यक्ति के पास बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील अधिकार होते हैं। मगर इस दौर में सवाल यहा इस ओर बढ ने लगा है की क्या वाकई ये सब आज देद्गा की राजनीतिक व्यवस्था में सटिक बैठता है। डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन, और एपीजे अब्दुल कलाम का कोई सीधा राजनीति संबंध नहीं था। हालांकि राजनीति से संबंध नहीं रखने के बावजूद इन सभी ने उत्तरदायित्व अन्य राष्ट्रपतियों की तरह ही बेहतरीन ढंग से निभाए। फिर भी हमारे देश में अब तक जितने भी राष्ट्रपति हुए हैं, उनमें कम ही ऐसे थे जिनका संबंध राजनीति से न रहा हो। मसलन , राष्ट्रपति को कई तरह के विधेयकों पर अपनी मंजूरी देनी होती है। देश के प्रथम नागरिक के चयन को लेकर संर्किण राजनीति के चलते इस पद की गरिमा दिन प्रतिदिन गिर रही है। राट्रपति चुनाव को लेकर आज हर राजनीतिक दल इस कदर हो हल्ला मचाये हुए है जैसे देद्गा में आम चुनाव हो रहा है। हर कोई अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने में लगा हुआ है। इस बार का राट्रपति चुनाव राजनीतिक गलियारों में ज्यादा हलचलें इसलिए हो रही है की २०१४ में होने वाले लोकसभा चुनाव में इसका भरपूर लाभ उठाया जा सके । मगर सवाल यहा इस लिए खड़ा होता है की क्या राट्रपति का पद भी आज के दौर में राजनेताओ के लिए उतना ही अहम साबित हो रहा है जितना देद्गा के प्रधान मंत्री और केंन्द्रीय मंत्री का पद है। अगर सवाल जायज है तो जाहिर है की इस पद की गरिमा भी उसी तरह गिर रहा है जैसे आज के मंत्री परिच्चद का है। मामला चाहे राट्रपति का हो या उपराच्च्ट्रपति का सियासत इस कदर हाबी है की पद और सम्मान से बड़ा वोट बैक कही ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। अगर उपराच्च्ट्रपति की बात करे तो यहा भी हालात वैसे ही है। यानी की उहापोह की स्थिति हर जहग हाबी है। भारत के उपराष्ट्रपति का पद निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। पूरे विश्व में भारत का उपराष्ट्रपति ही ऐसा है, जिसे कार्यपालिका का भी अंग माना गया है और विधायिका का भी। मगर आज के दौर में सियासत और वोट बैक इस कदर राजनीतिक दलो पर हाबी हो गया है की राच्च्ट्रपती का पद भी सत्ता के अखाड़े में दब कर रह गई है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या राष्ट्रपति पद की गरिमा घटि है ?

14 July 2012

नाइट लाइफ का समर्थन कितना सही ?

आधी रात को दिल्ली के पॉस इलाके में महिला से छेड़छाड की गई, गुड गॉव में देर रात लड की के साथ बदसलूकी की गई, असम में आधी रात को लडकी के कपडे उतारने की कोसिस की गई, मुम्बई में आधी रात को पुलिस वालों ने महिला से बदसलूकी की। जी हां आये दिन आज ऐसा ही देखने को मिल रहा है, देद्गा के बड़े बड़े द्याहरों और कस्बों में। क्या कभी हमने सोचा है इसके लिए कौन जिम्मेवार है। सोचते भी हैं तो हमेशा यही कि आज देद्गा में कोई कानून व्यवस्था नही है। देद्गा में आधी रात को गुंडा राज होता है। अब देद्गा में आधी रात को मनचलों की हरकत बढ गई हैं। बस हम इन्ही लोगों और कानून व्यवस्था को कोसना सुरु कर देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी इसके दूसरे पहलू के बारे में सोचा है। जी हां इसका दूसरा पहलू है नाइट लाइफ। समाज के एक छोटे से वर्ग के लिए हम नाइट लाइफ का समर्थन कर रहे हैं। इस छोटे से वर्ग की वजह से ही आज आधी रातों को कई अद्गलील घटनाएं घट रही हैं। अपने आप को रॉयल कहने वाला ये समाज, नाइट लाइफ के एशो आराम में मद्गागूल रहता है। इसी वर्ग की देखादेखी मध्यम वर्ग भी, इस नाइट लाइफ में आपने आप को शामिल कर रहा है। लेकिन वो अपनी सुरक्षा और जरूरतों को भूल जाता है। ऐसे में कई घटनाओं का शिकार होना पड रहा है। ये बात सही है कि गुंडाराज के खिलाफ समाज के हर वर्ग को आवज उठानी चाहिए। अगर गुंडाराज किसी के घर पर हमला करता है या फिर दिन दहाड़े घटना को अंजाम देता हो तो ऐसे में, ये एक खतरना पहलू है। आधी रात को दिल्ली के पॉस इलाके में महिला से छेड़छाड की गई, गुड गॉव में देर रात लड की के साथ बदसलूकी की गई, असम में आधी रात को लडकी के कपड़े उतारने की कोशिस की गई, मुम्बई में आधी रात को पुलिस वालों ने महिला से बदसलूकी की। जी हां आये दिन आज ऐसा ही देखने को मिल रहा है, देद्गा के बड़े बड़े द्याहरों और कस्बों में। क्या कभी हमने सोचा है इसके लिए कौन जिम्मेवार है। सोचते भी हैं तो हमे यही कि आज देद्गा में कोई कानून व्यवस्था नही है। देद्गा में आधी रात को गुंडा राज होता है। अब देद्गा में आधी रात को मनचलों की हरकत बढ गई हैं। बस हम इन्ही लोगों और कानून व्यवस्था को कोसना सुरु कर देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी इसके दूसरे पहलू के बारे में सोचा है। जी हां इसका दूसरा पहलू है नाइट लाइफ। समाज के एक छोटे से वर्ग के लिए हम नाइट लाइफ का समर्थन कर रहे हैं। इस छोटे से वर्ग की वजह से ही आज आधी रातों को कई अद्गलील घटनाएं घट रही हैं। अपने आप को रॉयल कहने वाला ये समाज, नाइट लाइफ के एशो आराम में मद्गागूल रहता है। इसी वर्ग की देखादेखी मध्यम वर्ग भी, इस नाइट लाइफ में आपने आप को शामिल कर रहा है। लेकिन वो अपनी सुरक्षा और जरूरतों को भूल जाता है। ऐसे में कई घटनाओं का शिकार होना पड रहा है। ये बात सही है कि गुंडाराज के खिलाफ समाज के हर वर्ग को आवज उठानी चाहिए। अगर गुंडाराज किसी के घर पर हमला करता है या फिर दिन दहाड़े घटना को अंजाम देता हो तो ऐसे में, ये एक खतरना पहलू है। जी नही हमारा मतलब तालिबानी उसूलों का समर्थन करना नही है। लेकिन अपने आप को रइसजादे कहने वाले ये लोग ही तालिबान की तरह हमारे समाज में आदर्द्गावादों को खत्म कर रहे हैं। जब हम दिखाबे के नाम पर अद्गलील, पद्गिचमी संस्कृति की ओर रूख करते हैं, तो ये भी तो हमारे समाज में एक तरह का तालीबानीकरण है। ये बात सही कि किसी भी तरह की गुडागर्दी का सपोर्ट नही किया जा सकता। मगर नाइट जिन्दगी से बढ़ने वाली गुडागर्दी के लिए कौन जिम्मेदार है। तो फिर क्या हमें ऐसी नाइट लाइफ का समर्थन करना चाहिए।

क्या राजनीति से आदर्शवाद ख़त्म हो गया है ?

वैसे तो आप सभी जानते है देद्गा के नेताओं के बारे में, क्या है देद्गा के नेताओं की असलियत। कितने स्वाभिमान और जज्बे वाले है हमारे नेता, किस तरह मलाई जैसा है नेताओं का ईमान और कितने पक्के र्हैं अपने विचारो के हमारे नेता जी जी हां यही सवाल उठ रहा है देद्गा में आज की नेता पीढी के बारे में। दरअसल अभी कुछ दिन पहले बंगाल की मुखयमंत्री ममता बनर्जी ने फेसबुक पर एक वाक्य पेस्टकिया वे कह रही थी देद्गा के तथाकथित नेता आज बिना रीढ की हडडी के हो गए है। ये एक इंट्रेस्टीग रिर्सच का विच्चय हो सकता है। भले ही ममता ने ये कांग्रेस और सपा नेताओं के धोखेबाजी पर कहा हो, मगर ये बात काफी हद तक सही लगता है । वाकई देद्गा की बागडोर देद्गा के नेताओं के हाथ मे जिनका स्वाभिमान और आर्दद्गा खत्म हो गए है। अगर देद्गा के नेताओं में थोडा भी आर्दद्गा होता तो देद्गा में फैली अराजकता और अफरा- तफरी पर अर्लट होते। लेकिन वो तो मुर्ति की तरह बैठे हुए है और तोते की जुबान में बोलते हुए महसुस हो रहे है। ये नेता बस द्याासन करने वाले और रॉयल जिदगी का मजा उठाने वाले बाकी रह गए है। देद्गा की राजनीति में कभी ऐसे नेता भी सकिय राजनीति में मौजूद थे जो देद्गा और अपने स्वाभिमान के लिए मरते थे। अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आप है वहां भी अपनी बात हिन्दी में रखते थे। भले ही वे राजनीति से रिटायर हो गए हो पर आज भी उनके स्वाभिमान और आर्दद्गा पर कोई उगंली नहीं उठा सकता। ये ऐसे नेता रहे है जो अपने स्वाभिमान और देद्गा सेवा को सर्वोपरि मानते थे। बुद्धिजीवी भी उस वक्त कहते थे कि देद्गा में अभी कोई नेता बचा है तो वो हैं अटलबिहारी वाजपेयी। आज किसी नेता को कहते सुना है कि फलां नेता सही मायनों में आदर्द्गावादी नेता है। अब ममता बनर्जी का कहना चाहे अपने आप को उंचा दिखाना ही क्यों ना हो लेकिन तीर बड़े निशाने पर मारा है। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर मुलायम का धोखा हो या चिदंबरम का कोलकाता की कानून व्यवस्था पर उंगली उठाना। इन्ही वजह से ममता ने तथाकथित नेताओं को बिना रीड की हडडी का बताया। वेसे जिस तरह से नेता अपने छोटे छोटे स्वार्थों के लिए देद्गाहित और अपनी विचारधारा तक से मुकरने में जरा भी द्यार्म महसूस नही करते उससे तो यही लगता है कि आज के नेता, नेता बने रहने के लिए अपनी मान मर्यादा को भी भूल जाते हैं। तो क्या है आज के नेताओं की सच्चाई। कितने आदर्द्गावादी और कितने स्वाभिमानी रह गये है हमारे देद्गा के नेता।

09 July 2012

कण में भगवान को विज्ञान की सविकृति हमारी संस्कृति की विजय है ?


ना मै मंदिर ना मै मस्जिद ना काबा कैलाद्गा में।
खोजिएगा का तो तुरंत मिलेंगें पलभर के तलाद्गा में॥

यानी की भगवान हर जगह, हर कण एक-कण कण में मौजूद है। जी हम ऐसा इसलिए कह रहे है की हम जिस ब्रह्मांड में रहते हैं, आखिर इसकी उत्पत्ति कैसे हुई आसमान में टिमटिमाते तारे आखिर कैसे बने? इन सभी सवालों के जवाब जानने के लिए हर कोई आतुर रहता है। लेकिन अभी तक इन सभी सवालों का जवाब हमें नहीं मिला था। लेकिन दुनिया के १११ देशों के करीब पांच हजार वैज्ञानिक इन सवालों के जवाब के बेहद करीब पहुंच गए हैं। वैज्ञानिकों ने इसको हिग्स बोसान नाम दिया है, जिसे गाड पार्टिकल्स के नाम से भी जाना जाता है। पूरी दुनिया में अपनी परचम लहराने वाली भारतीय संस्कृति को अब एक नया आयाम मिल गया है। भारतीय दर्द्गान में कण कण में ब्रम्हा की मान्यता हजारो बर्च्चो से रही है। मगर अभी तक इसकी कोई पुष्टि नहीं हो सकी थी। अब गॉड पार्टिकल की खोज से विज्ञान के इस मूल सवाल के साथ ही दर्द्गान की यह रहस्यमयी गुत्थी भी लगभग सुलझती नजर आ रही है। महाविस्फोट के बाद ब्रहमाण्डनिर्माण हुआ। इस दौरान एक ही तत्व का रंग या प्रभाव बाकी सभी पर चढ़ गया। ये कुछ और नही बल्कि सुक्ष्म कण थे। इस खोज का असल फायदा यह है की ब्रहमाण्ड का अभी तक ९० प्रतिद्गात अज्ञात डार्क मैटर को जानने में मद्‌द मिलेगा। जेनेवा स्थित यूरोपियन ऑर्गनाइजेद्गान फॉर न्यूक्लियर रिसर्च द्वारा जिस गॉड पार्टिकल की खोज से पूरी दुनिया रोमांचित है, इन्हीं कणों को ईद्गवरीय कण ब्रम्हा कण या फिर दैव कण के अलग अलग नामों से संबोधित किया जा रहा है। इन सारे नामो पर पहले ही भारतीय दर्द्गान विज्ञान ने खोज कर चर्चा कर चुका है। इस खोज का श्रेय सबसे ज्यादा भारतीय सभ्यता को जाता है जो हजारो बर्च्चो पहले इसके उपर अपना खोज दुनिया को बता चुके थे। यह भारतीय सभ्यता बताती है की कण कण में भगवान है। ऐसी मान्यता है की १३.७ अरब पहले महाविस्फोट के बाद ब्रहमाण्ड की रचना इन्हीं खोजे गए ब्रम्ह कणो से हुई। भारतीय दर्शनशात्र में भी ऐसे ब्रम्ह कणो के उल्लेख मिलते है। गॉड पार्टिकल्स को हिन्दू जैन पुद्‌घ्गल और बौद्ध अनात्मा कहते हैं। भारतीय दार्शनिक इस ब्रह्माणु की अलग-अलग तरीके से व्याखया की है। ऐसे में कण कण में भगवान जैसे भारतीय दर्द्गान को गॉड पार्टिकल की खोज द्वारा वैज्ञानिक प्रमाणिकता मिलना भारतीय संस्कृति के लिए एक बरदान है।

07 July 2012

अमरनाथ यात्रा के दिन को कम करना कितना सही ?

अमरनाथ यात्रा अनादिकाल से चलती आ रही है, लेकिन अब यात्रा को मौसम का बहाना बनाकर अवधि सीमित करने की षडयंत्र हो रही है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल अमरनाथ श्राइन बोर्ड के पदेन अध्यक्ष हैं। उनका दायित्व यात्रा का विकास है, लेकिन दुर्भाग्य से वह यात्रा को विनाश की ओर ले जा रहे हैं। सवाल उठता है कि समय रहते यात्रा सुविधाओं से जुड़ी तैयारियों को पूरा क्यों नहीं किया जा सका ? बाबा बर्फानी के दर्शनार्थी श्रद्धालुओं की तादाद जब हर साल बढ ती जा रही है तो ऐसे में अमरनाथ यात्रा की अवधि कम किए जाने का क्या औचित्य बनता है ? पहले भी यात्रा अवधि दो महीने यानी ६ दिनों की रहती थी। इस बार यह महज ३९ दिन कर दिया गया है। केन्द्र सरकार की मुस्लिम वोट बैक की राजनीति की बात करे तो, सरकार हज यात्रीयों के लिए करोड़ो रूपए खर्च करती है। उनके लिए सारी तैयारिया पहले ही पूरी कर ली जाती है। उनके उपर कभी आतंकवादी हमला नही होता है। वही दुसरी ओर अमरनाथ यात्रा को आतंकवादियों की धमकियों के चलते १९९१ से १९९५ तक बंद रखा गया था। १९९६ में आतंकियों द्वारा बाधा नहीं पहुंचाने के आश्वासन पर यात्रा शुरू हुई। अमरनाथ तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाजनक व्यवस्थाएं बढ़ाने और सुरक्षा बंदोबस्त करोड़ो करने के बारे में कई उपाय सुझाए गए थे। सवाल उठता है कि अबतक उन सुझावों पर अमल क्यों नहीं हो सका है? अगर इस बार यात्रा अवधि घटाने का निर्णय भी अलगाववादी ताकतों के प्रभाव में आकर लिया गया है तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक प्रवृत्ति को बढावा देने वाला साबित होने वाला है। धर्म और आस्था से जुड़े विषयों को लेकर किसी के आगे घुटने टेकने की नीति पर चलना अनर्थकारी संकेत देता है। अमरनाथ जैसी पवित्र यात्रा को लेकर किसी तरह का विवाद पैदा करने की साजिशों और कोशिशों को पनपने देना घोर अनुचित कार्य माना जा रहा है। अनादिकाल से चली आ रही बाबा अमरनाथ यात्रा का हमेशा से ही राष्ट्रीय महत्त्व रहा है। जेहादियों को अपने लक्ष्यों को पूरा करने में यह यात्रा बहुत बड़ी बाधा लग रही है, उन्हें ध्यान में आ गया है कि जब तक यह यात्रा चलेगी हिन्दू समाज घाटी में आता रहेगा । और जब तक वह आता रहेगा घाटी को दारुल इस्लाम बनाने का संकल्प पूरा नहीं हो पायेगा।

क्या आज देश में आपातकाल जैसे हालात है ?

भ्रटाचार और काले धन को लेकर एक बार फिर से टिम अन्ना और सरकार आमने सामने है। एक ओर जहा टिम अन्ना हर हाल में २५ जुलाई से दिल्ली के जंतर मंतर पर अनद्गान करने के लिए तैयार है, तो वही दुसरी ओर सरकार उसे निरस्त करने के लिए अपनी हर ताकत को अजमा रही है। इस बार टिम अन्ना आर पार के मूड में है। ऐसे में ये प्रतित होता है की देद्गा के अंदर आपातकाल जैसी स्थिती उत्पन्न्न हो गई है। तो यहा सवाल खड़ा होता है की क्या सरकार अन्ना हजारे की ललकार से सहमी हुई है। या फिर देद्गा के अंदर आम आदमी की आवाज को दबाना और कुचलना चाहती है। आज देद्गा का हर नागरीक सरकार से सिर्फ एक ही सवाल कर रहा है, भ्रटाचारियों पर लगाम सरकार आखिर कब कसेगी,बिदेशो में जमा काला धन वापस कब आयेगा ? मगर सरकार ने आम अदमी के दर्द और कराह को नजरअंदाज किया हुआ है। मानो आज के हालात में देद्गा का हर एक आदमी आपातकाल से गुजर रहा है। १२ जून १९७५ को इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायधीद्गा जे एम एल सिन्हा ने १९७१ के लोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेद्गा से निर्वाचित तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदरा गॉधी के निर्वाचन को अवैध घोसित कर दिया ।२६ जून १९७५ को राष्ट्रपति फखरूदीन अली अहमद ने आन्तरीक सुरक्षा एवं अव्यवपस्था के नाम पर आपातकाल का आदेश दे दी। आपातकाल जनवरी १९७७ तक चलता रहा । उस दौरान सरकार ने प्रतिष्टित राजनीतिक नेताओं कार्यकताओं और गैर राजनीतिक व्यक्तियों की गिरफतारी की। प्रेस पर सेंसर शिप लगा दी गई। बिना किसी न्यायिक जांच के कुछ संगठनो को प्रतिबंधित कर दिया गया। साथ ही महानगरों को सुंदर बनाने के नाम पर कई लोगों को बेघर कर दिया गया । लोग आजाद भारत में गुलाम हो गए थे। लोकतंत्र के अंदर हुए इस काले अध्याय का पूरजोर विरोध होता रहा। आखिरकार १८ जनवरी १९७७ को राच्च्ट्र के नाम संदेद्गा प्रसारित करते हुए इंदरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की घोच्चणा कर दी। उस दौरान विरोधियों ने नारा दिया था। तानाशाह बनाम लोकतंत्र। लगता है इस बार का नारा होगा। भ्रच्च्टाचार बनाम लोकतंत्र। आपातकाल के दंद्गा को लोग भुला नही पाए थे ।आपातकाल के बहाने प्राप्त अतिरिक्त द्याक्ति का नौकरशाहो ने जम कर दुरूप्योग किया गया। पुलिस का अत्याचार और बरर्बरता ने कांगेस सरकार को सत्ता से आम आदमी ने बाहर कर दिया। अब लगता है वही स्थिति आज देद्गा के अंदर एक बार फिर से आ कर खड़ी हो गई है। जहां पर नेता और नौकशाहो देद्गा को लुट रहे, है और आम आदमी और समाजसेवी लोगों के उपर सरकार और पुलिस दोनों मिल कर अत्याचार कर रहे है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या आज देद्गा में आपातकाल जैसी स्थिति है।

01 July 2012

आखिर हमारी सरकार चुप क्यों है ?

पाकिस्तान अपने हरकतों से बाज नही आ रहा है। पाकिस्तान की काली करतूत के चलते भारत में आए दिन निर्दोस लोगो की जाने जा रही है। आतंकियों की घुसपैठ पाकिस्तान की ओर से लगातार जारी है। आतंक और घुसपैठ से लड़ते हुए सेना और सुरक्षा बल के हजारों जवान शहीद हो चुके हैं। हजारों नागरिक मारे जा चुके हैं। लाखों की संखया में लोग देश के कई हिस्सों में शरणार्थियों का जीवन जीने को मजबूर हैं। यहां तक कि कश्मीर घाटी में भी चल रहे आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों कश्मीर में पाकिस्तान की आतंकवाद फैलाने की योजनाओं बढ ते मदरसे जमायते-इस्लामी की कट्टरवाद फैलाने की योजना अब भी जारी है। इन सब के अलावे पाकिस्तान भारत में नकली नोटों को भेज कर भारतीय अर्थव्यवस्था को भी कमजोर करने की साजीस लगातार रच रहा है। अधिकांश भारतीय नकली नोट पाकिस्तान से आते हैं। अमेरिका के पास हर नकली अमेरिकी डालर का फोटो सहित डाटाबेस है और यह जानकारी भी है कि नकली डालर कहां से आया, किस रास्ते आया और इसे लाने वाले लोग कौन थे। पीओके से आतंकियों की वापसी के लिए जो योजना जम्मू कद्गमीर सरकार तैयार की है उसे लागू करने में पाक परेशानी पैदा कर रहा है। पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर हुए दंगों ने २ लाख से अधिक हिंदुओं और अन्य अल्पसंखयकों को भारत आने पर मजबूर किया है। पी ओ के में ५० हजार हिन्दू-सिखों के नरसंहार पाकिस्तान द्वारा किया जा चुका है । आजाद भारत की सबसे बड़ी असफलता है कि ६३ वर्षों में लाखों करोड रूपये खर्च कर हजारों सैनिकों के बलिदान के पश्चात भी भारतीय सरकार चुप बैठी है। बाड मेर के सीमावर्ती इलाकों में पाकिस्तानी मोबाइल नेटवर्क मिलने की समस्या से भारतीय नागरीको की गोपनीयता भंग हो रही है। नई समस्या अब पाकिस्तान सरहदी इलाको में रेडियो के माध्यम से भारत के सामने खड़ी कर रहा है। रेडियो एफएम के जरिये पाकिस्तान कट्टरता के विचार सरहद पर के गाँवों तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है। इन्डस वाटर ट्रीटमेंट के बावजूद पाकिस्तान कश्मीर में पानी के लिए भी प्रत्यक्ष युद्ध लड रहा है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता हैं की पाकिस्तान द्वारा भारत को इतनी समस्या होने के बाद भी पाकिस्तान पर सरकार कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करती !

पाकिस्तान पर सरकार कड़ी कारवाई क्यों नहीं करती ?

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